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बुधवार, 26 दिसंबर 2012

दुनिया की सबसे सस्ती हार्ट सर्जरी मैसूर में इस हफ़्ते से

नारायण हृदयालय हॉस्पिटल्स की ऐसी चेन बना रहा है, जिसमें दुनिया में सबसे कम कॉस्ट में हार्ट सर्जरी होगी। नारायण हृदयालय की पहचान लो-कॉस्ट कॉर्डिक केयर वाले हॉस्पिटल के तौर पर रही है। वह हॉस्पिटल्स चेन में कंस्ट्रक्शन टेक्नीक्स से लेकर पोस्ट-ऑपरेटिव केयर के लिए कई तरह के इनोवेशन कर रहा है। इससे ओपन हार्ट सर्जरी महज 65,000 रुपए में की जा सकेगी। यह कॉर्पोरेट हॉस्पिटल्स में आने वाले खर्च का एक-चौथाई है। 

बेंगलुरु के इस हॉस्पिटल्स ने अगले 7 साल में 5 लाख से 10 लाख की आबादी वाले देश के 100 शहरों में हॉस्पिटल्स खोलने का टारगेट रखा है। मैसूर स्थित पहला मल्टिस्पेशिऐलिटी हॉस्पिटल इस हफ्ते खुल जाएगा। इसमें कर्नाटक सरकार की 26 फीसदी हिस्सेदारी है। नारायण हृदयालय के प्रपोज्ड हॉस्पिटल्स के खुलने से सस्ते इनोवेशन के रूप में इंडिया की धाक और बढ़ेगी। टाटा मोटर्स की नैनो कार, अरविंद केयर सिस्टम, जयपुर फुट प्रोस्थेटिक और बेंगलुरु में नारायण हृदयालय सस्ते इनवेशन की मिसाल हैं। 

200 बेड वाले 1.5 लाख वर्ग फुट के नारायण हृदयालय हॉस्पिटल को 45 करोड़ रुपए में बनाया गया है। यह इसी तरह के दूसरे मल्टिस्पेशिऐलिटी हॉस्पिटल से 80 फीसदी सस्ता है। नारायण हृदयालय के फाउंडर देवी प्रसाद शेट्टी ने कहा, 'चैरिटी सस्टेनबल नहीं होती। इसके लिए बिजनेस मॉडल होना चाहिए। इनोवेशन को सस्ता होना चाहिए।' 

नारायण हृदयालय हॉस्पिटल्स में सीनियर वाइस प्रेज़िडेंट, स्ट्रैटिजी ऐंड प्लानिंग वीरेन प्रसाद शेट्टी ने बताया, 'यह जितना कम से कम हो सकता है, उतना कम है। हमने इस सिस्टम में हर मुमकिन कटौती की है। वीरेन देवी शेट्टी के बेटे हैं। उन्होंने स्टैनफोर्ड ग्रैजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस से पढ़ाई की है। हेल्थकेयर मुहैया कराने वाली इकाइयों के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर की ज्यादा कॉस्ट बड़ी बाधा है। इसकी लागत कम करने के लिए नारायण हृदयालय मैसूर फसिलिटी को स्टार्टअप की तरह चला रहा है। 

वीरेन शेट्टी कहते हैं, 'हमाराकॉन्सेप्टरोजानाप्रॉफिट ऐंड लॉस अकाउंटबनाने का है।' भारत में हर साल 25 लाख हार्ट सर्जरी की जरूरतहोती है, जबकिइनमें से सिर्फ 90,000 ही मुमकिन हो पाती हैं। मौजूदा आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए देश को 30 लाख और बेड की जरूरत है। अगले 5 साल में छोटे और मझोलेशहरों में नारायण हृदयालय की 30,000 बेड और बढ़ाने की योजना है। सस्ती हेल्थकेयर फसिलिटीदेने वाले वात्सल्य हॉस्पिटल्स के को-फाउंडर और सीईओअश्विननायक ने बताया कि अरविंद केयर सिस्टम और नारायण हृदयालय का लो कॉस्ट सेवाएंशुरू करने का इतिहास रहा है(पीरजादा अबरार,मैसूर की रिपोर्ट आज के नभाटा में)।

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शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

ज़रूरी नहीं कि हर सीने का दर्द दिल का दौरा ही हो

सीने का दर्द कई कारणों से हो सकता है लेकिन इसे हमेशा दिल के दौरे से जोड़ कर देखा जाता है। लोगों में दिल के दौरे का खौफ इस कदर समाया हुआ है कि जरा सा छाती में खिंचाव, दर्द या जलन की शिकायत हुई नहीं कि दौड़ पड़े निकट के डॉक्टर के पास। तुरंत ईसीजी और खून की कई जाँचें तत्काल करा ली जाती हैं पर नतीजा कुछ नहीं निकलता। इसके बाद भी संतोष नहीं हुआ तो पास के किसी नर्सिंग होम या छोटे अस्पताल में जाकर भर्ती हो गए और वहाँ के आईसीयू में चार-पाँच दिन गुजारने के बाद तसल्ली मिली। 

मरीज और उसके परिजन सीने के दर्द हमेशा बढ़ा-चढ़ाकर ही देखते हैं। कई साधन संपन्न मरीज तो इतनी हाय तौबा मचाते हैं कि अस्पताल वाले एंजियोग्राफी तक करवा लेते हैं। दरअसल इलाज करने वाले चिकित्सक पर मरीज एवं उनके परिजनों को भरोसा करना चाहिए। 

सीने में दर्द को कब अनदेखा न करें? 
अगर आपकी उम्र चालीस वर्ष या उससे ऊपर है और आप डायबिटीज के शिकार है और धूम्रपान या तंबाकू (जर्दा, खैनी, चैनी या जाफरानी पत्ती, गुल) के आदी है और छाती में तेज चलते वक्त या सीढ़ी चढ़ने पर छाती के बायीं तरफ दर्द या हल्का भारीपन उभरता हो या थोड़ा शारीरिक व्यायाम करने पर साँस फफूलने लगे, तो दिल की बीमारी होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। इन परिस्थितियों में सीने में उठ रहे दर्द को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। 

सीने के दर्द में खास बात यह होती है कि आराम करने से या चलते वक्त रुक जाने पर छाती का हल्का दर्द व भारीपन गायब हो जाता है। दिल का दर्द चलते वक्त बाएँ हाथ, बाई गर्दन व बाएँ जबड़े में भी उभरता है। छाती दर्द की चिंता से मुक्ति होने का एक ही रास्ता होता है, पहले ट्रेडमिल टेस्ट करवा लें। अगर परिणाम संदेहास्पद है तो स्ट्रेस इको करवाकर हार्ट की बीमारी होने के संदेह का निराकरण करें। पूर्णतः निश्चिन्त होने के लिए सबसे उत्तम जाँच मल्टी स्लाइस सीटी कोरोनरी एंजियोग्राफी करवाएँ। इस विशेष एंजियोग्राफी के लिए अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं होती है और न ही जाँच के जरिए तार डालने की आवश्यकता होती है।

सीने में दर्द के और क्या कारण हो सकते हैं? 
छाती दर्द का सबसे बड़ा कारण छाती की अंदरूनी दिवारों में सूजन का होना है। होता यह है जब फेफ़डे के ऊपरी सतह पर स्थित झिल्ली में सूजन आ जाती है तो छाती की अंदरूनी दीवार में स्थित सूजी हुई सतह से साँस लेते वक्त हवा रगड़ खाती है तो असहनीय दर्द होता है। इस अवस्था को मेडिकल भाषा में प्ल्यूराइटिस कहते हैं। यह प्ल्यूराइटिस छाती में पानी इकट्ठा होने का शुरूआती संकेत है। देश में प्ल्यूराइटिस का ज्यादातर कारण टीबी का इंफेक्शन होता है। लोग छाती दर्द के लिए दर्द निवारक गोलियों का सेवन करते रहते हैं और सही जाँच व इलाज के अभाव में समस्या को और गंभीर बना देते हैं। अगर प्ल्यूराइटिस की समस्या को सही समय पर नियंत्रित न किया गया तो छाती में फेफ़डे के चारों ओर पानी इकट्ठा हो जाता है। टीबी के अलावा न्यूमोनिया का इंफेक्शन भी इस अवस्था को पैदा कर देता है। इस तरह की समस्या पर किसी थोरेसिक सर्जन यानी चेस्ट सर्जन से परामर्श लें।

मवाद से भी होता है सीने में दर्द 
छाती में मवाद यानी पस जमा हो जाने की घटना बहुत आम है। न्यूमोनिया या अन्य फेफ़डे का इंफेक्शन जब पूरी तरह से नियंत्रित नहीं हो पाता है, तो फेफ़डे के चारों ओर विशेषतः निचले हिस्से में इंफेक्शन वाला पानी या मवाद (पस) इकट्ठा हो जाता है।

सरवाईकल स्पोन्डिलाइटिस 
व्यायाम के अभाव में रीढ़ की हड्डियों के जोड़ काफी सख्त हो जाते हैं और उनमें लचीलापन खत्म हो जाता है। जिसके परिणामस्वरूप रीढ़ की हड्डी से हाथ, कंधे और छाती के हिस्से में जाने वाली नसों पर दबाव पड़ने लगता है। जिसके फलस्वरूप छाती और हाथ में दर्द उभरने लगता है और लोग इसे दिल का रोग व संभावित हार्ट अटैक गलती से मान बैठते हैं और अंजानें में अप्रत्याशित हार्ट अटैक की संभावना के मद्देनजर अपनी दिनचर्या में अनावश्यक आमूलचूल परिवर्तन करते हैं। इसकी वजह से उनमें आत्मविश्वास व कार्यक्षमता दोनों में ही भारी कमी आती है।

पसलियों की कमजोरी  
अक्सर युवा सीने में दर्द की शिकायत करती हैं। यह दर्द सामने की ओर ज्यादा होता है। यह दर्द पसलियों का होता है जो छींक या खाँसी आने पर और बढ़ जाता है। अगर पसलियों के ऊपर झटका लगा तो ऐसा लगता है कि जान निकल गई। आजकल देखा गया है कि खून में विटामिन "डी" की मात्रा कम होने से भी पसलियों की बीमारी व छाती दर्द होता है। अगर आप प्रोटीन युक्त संतुलित भोजन व विटामिन से भरपूर सलाद (न्यूनतम तीन सौ ग्राम प्रतिदिन) व फल(300 ग्राम रोज़ाना) और बिना मलाई वाले दूध का सेवन प्रतिदिन करते हैं तो पसलियो की इस बीमारी और छाती दर्द से कोसों दूर रहेंगे। कुछ लोगों को कढ़ी रायता,आइसक्रीम व दही-बड़े के सेवन करने से छाती में दर्द उभर आता है। इसका कारण छाती की मांसपेशियों का ठंडी चीज़ों के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता है(डॉ. के.के.पांडेय,सेहत,नई दुनिया,सितम्बर प्रथमांक 2012)। 

हर चार मिनट में एक जान लेता है दिल का दौरा 
४० साल की शिखा शर्मा एक विज्ञापन एजेंसी में उच्च पद पर कार्यरत थी। यूँ तो वे नियमित रूप से प्राइवेट जिम जाती थी, खानपान पर भी समुचित ध्यान देती थीं। उसकी प्रोफेशनल लाइफ इतनी व्यस्त थी कि वह कभी जिम नहीं जा पाती थी और जंकफूड खाने से बच पाती थी। एक शाम वे लौट रही थीं कि अचानक उनके पैर लड़खड़ाने लगे, बाईं ओर छाती में तेज चमक सी उठी, हाथों में से मानों किसी ने रक्त ही निकाल लिया हो, वे पसीना-पसीना हो गईं। उन्हें लगा कि निश्चित ही कुछ गंभीर समस्या है। वे तुरंत नजदीकी अस्पताल में पहुँचीं। डॉक्टर ने उन्हें सघन चिकित्सा केंद्र (आईसीसीयू) में इलाज के लिए दाखिल किया। उनका ईसीजी बता रहा था कि उन्हें दिल का दौरा पड़ चुका है। दिल की धमनियों में खून का थक्का जम गया है। कोई विश्वास नहीं कर पा रहा था कि इतनी मेहनत करने वाली लड़की को भी दिल की दरअसल, शिखा के परिवार में हृदय रोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा था। उसके पिता, चाचा, फूफी, चाचा का लड़का भी पिछले दस साल के भीतर के दौरे के शिकार हो चुके थे। शिखा जैसे बेशुमार लोग आज इस कड़वे सच से परिचित नहीं हैं कि हम भारतीय आनुवांशिक तौर पर हृदय रोग के जोखिम पर हैं। 

क्यों जमता है थक्का 
रक्त संचार के मुख्य मार्गों को अवरोध मुक्त रखने के लिए हृदय और उसकी संचालन प्रणाली को रोजाना लगातार संघर्ष करना पड़ता है। इसमें मुख्य बाधक है कोलेस्ट्रॉल, जो लीवर में बनता है। बैड कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल कोलेस्ट्रॉल) धमनियों में एक मोटी और कड़क परत का निर्माण करता है। यह क़डक परत करता है। यह क़डक परत धमनियों का रास्ता ब्लॉक कर देती है। इसे ही हम आर्टरी ब्लॉक कहते हैं, जिसे दूर करने के लिए बाईपास सर्जरी की जरूरत होती है। 

चिकित्सा विज्ञानियों को संदेह है कि कोलेस्ट्रोल हमारी नलिकाओं के भीतर रक्त को थक्के और फिर गाढ़े चकत्तों में बदल देता है। एलडीएल कोलेस्ट्रॉल से बना थक्का रक्त प्रवाह को खतरनाक स्तर तक कम कर देता है। इससे हृदय पेशियों को ऑक्सीजन की खुराक नहीं मिलती। फिर अमूमन रक्त नलिकाओं के फैलाव में मदद करने वाली इन्सुलिन भ्रम में उल्टा काम करने लगती है। 

जब कोशिकाओं की दीवारों को नुकसान पहुँचता है, तो इंसुलिन मांसपेशी को मोटा करती है, जिससे धमनियाँ और संकरी हो जाती हैं। रक्त और ऑक्सीजन को रास्ता तय करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है(डॉ. पवन कुमार,सेहत,नई दुनिया,सितम्बर प्रथमांक 2012)।

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मंगलवार, 11 सितंबर 2012

क्या गुड कोलेस्ट्रॉल बढ़ाना काफी है?

बुरे कोलेस्ट्रॉल को दिल की बीमारियों के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है। हाल ही में हुए ताजा शोध अध्ययनों से मालूम हुआ है कि गुड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ा देने भर से यह ज़ोखिम कम नहीं होता। दिल की बीमारी के ज़ोखिम को कम करने के लिए टोटल कोलेस्ट्रॉल को कम करना ज़रूरी होता है। आनुवांशिकी के क्षेत्र में हुए शोध अध्ययनों के मुताबिक़,हाई डेंसिटी लिपोप्रोटीन(एचडील) कोलेस्ट्रॉल की अधिकता और दिल की बीमारी का ज़ोखिम कम होने के बीच कोई कड़ी नहीं है। 

दुनिया भर में लाखों लोग लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन कोलेस्ट्रॉल(एलडीएल) या बुरे कोलेस्ट्रॉल को कम करने के लिए कई तरह की औषधियां लेते हैं। शोध अध्ययन बताते हैं कि एचडीएल की मात्रा बढ़ाने से भी कोई उल्लेखनीय फायदा नहीं होता। इसी तरह एचडीएल बढ़ाने वाली दवाओं के सेवन के बाद निराशा ही हाथ लगती है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल, अमेरिका में दिल की बीमारी और जीन के बीच की कड़ी ढूंढने के लिए शोध की अपेक्षाकृत नई तकनीक का इस्तेमाल किया। उन्होंने यह भी पता लगाया कि दिल की बीमारियों के जोखिम और एचडीएल का सीधा संबंध है या नहीं। इससे पहले जो शोध हुए थे उनमें आबादी के २.६ प्रतिशत हिस्से का एचडीएल स्तर बढ़ा हुआ पाया गया था। 

मैसाच्यूसेट्स जनरल हॉस्पिटल के एक अन्य शोधकर्ता डॉ. सेकर काथीरेसान मानते हैं कि एक ख़ास किस्म के जीनधारक मरीज़ों को एचडीएल का स्तर बढ़ाने से फायदा हो सकता है। एचडीएल दिल की बीमारी के जोखिम का आंकलन करने के लिए एक महत्वपूर्ण औज़ार बना रहेगा लेकिन इसका स्तर बढ़ाने वाली औषधियों के फायदों पर कई प्रश्न खड़े हुए हैं। 

अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. रॉबर्ट एकेल के मुताबिक नए शोध दिल की बीमारी के जोखिम को कम करने के लिए एचडीएल का स्तर बढ़ाने की योजना पर कई संदेह पैदा हो रहे हैं। एचडीएल के स्तर का दिल की बीमारी के जोखिम से सीधा संबंध है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि एचडीएल का स्तर बढ़ाने से फायदा होता है। यह तो सभी जानते हैं कि एलडीएल का स्तर घटाने से दिल की बीमारी का जोखिम कम हो जाता है। इसलिए एलडीएल का स्तर घटाना हमेशा फायदेमंद होता है। 

कैसे घटाएं कोलेस्ट्रॉल 
-३० मिनट तक रोज़ नियमित कसरत करें।

-धूम्रपान न करें और न तंबाकू खाएँ।

-जंकफूड से परहेज़ करें।

-फल और सब्ज़ियाँ अधिक खाएँ।

-शराबखोरी बंद कर दें।

-तनाव घटाने के लिए योगासन और ध्यान करें।

-कमर का घेरा ९० सेंटीमीटर से अधिक न होने दें।

-संतुलित खाना, सही समय पर, सही स्थान पर तथा सही मात्रा में खाएँ।

-३० साल की उम्र के बाद साल भर में एक बार पूरे शरीर का चैकअप कराएँ(सेहत,नई दुनिया,अगस्त तृतीयांक 2012)।

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सोमवार, 14 मई 2012

महिलाओं के मानसिक तनाव से जुड़ा है उनका हृदय-रोग

पैन्सिल्वेनिया अमेरिका में पैन स्टेट्स कॉलेज ऑफ मेडिसिन में हुए एक शोध अध्ययन से मालूम हुआ है कि तनाव ग्रस्त होने पर महिलाओं में हृदय की ओर रक्त का प्रवाह नहीं बढ़ता है। इसी शोध अध्ययन से पता चला है कि महिलाओं के हृदय को मानसिक तनाव का सामना करना पुरुषों के मुकाबले अधिक मुश्किल हो सकता है। 

अध्ययन के दौरान महिलाओं और पुरुषों को गणित का एक कठिन सवाल हल करने के लिए दिया गया। जैसा कि सोचा गया था, सवाल को हल करते हुए सभी का रक्तचाप और दिल धड़कने की गति दोनों बढ़ गए थे। आमतौर पर दिल धड़कने की गति और रक्तचाप के बढ़ने पर हृदय की ओर रक्त का संचार बढ़ जाता है। इससे हृदय को अधिक कार्य करने में मदद मिलती है। शोध के दौरान सभी महिलाएँ और पुरुष तनाव में काम कर रहे थे, उनके हृदय पर भी कार्यभार बढ़ गया था। इस दौरान पुरुषों की तरह महिलाओं के हृदय की ओर रक्त का प्रवाह नहीं बढ़ा था। जाहिर है कि रक्त का प्रवाह कम होने से जोखिम अधिक हो जाता है। इससे पता चलता है कि भावनात्मक तौर पर परेशान होने से महिलाओं में हृदय की समस्या होने की आशंका अधिक होती है।

मानसिक तनाव और हृदय 
शोधकर्ताओं ने गणित की यह समस्या ९ पुरुषों और ८ महिलाओं को दी। ये सभी स्वस्थ थे और सभी की उम्र २० वर्ष के आसपास थी। इन सभी का रक्तचाप और दिल की धड़कन की गति नापी गई थी। हृदय की मांसपेशियों की ओर रक्त की आपूर्ति नापने के लिए विशेष अल्ट्रासाउंड का उपयोग किया गया। शोध के दौरान, इसके पहले और बाद में हुए परिवर्तनों को नापा गया था। 

मानसिक तनाव को बढ़ाने के लिए शोधकर्ताओं ने उन्हें फटाफट समस्या हल करने के लिए कहा। उत्तर सही होने पर भी उन्होंने कई बार इसे ग़लत बताया। सवाल हल करने से पहले महिलाओं और पुरुषों में तीनों जाँचों का परिणाम एक जैसा ही था। एक बार तनाव बढ़ जाने के बाद पुरुषों के हृदय की ओर रक्त का प्रवाह बढ़ जाता था वहीं महिलाओं में ऐसा नहीं हुआ। 

शोधकर्ताओं का मानना है कि तनाव सभी के लिए हानिकारक है, इससे दूर रहने के प्रयास सभी को करने चाहिए लेकिन महिलाओं के इस संबंध में अधिक सर्तक रहने की ज़रुरत है। जो महिलाएँ तनावपूर्ण स्थिति में हृदय संबंधी समस्या के लक्षण महसूस करती हैं उन्हें इस बारे में चिकित्सक से परामर्श ज़रुर लेना चाहिए। 

ये करें तनाव-मुक्ति के लिए 

-तनाव हर व्यक्ति के लिए नुकसानप्रद होता है, विशेषकर गर्भवती महिलाओं के लिए ये बेहद हानकारक है क्योंकि इससे उसके साथ ही भ्रूण पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। तनाव को नियंत्रित न करने पर महिला को उच्च रक्तचाप, अपच या रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने जैसी समस्या हो सकती है। फलस्वरुप गर्भस्थ शिशु गंभीर रुप से प्रभावित हो सकता है।

-पौष्टिक आहार लें। थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बार-बार खाएँ। यह रक्त में शर्करा का स्तर नियंत्रित करने में सहायक होता है।

-समय-समय पर पानी पीते रहें ताकि निर्जलीकरण न हो।

-नियमित व्यायाम करें। व्यायाम से दिमाग़ में तनाव को कम करने वाले रसायन स्रावित होते हैं। योग,ध्यान या फिर मन को सुकून देने वाली कोई और गतिविधि केरं। 

-पसंदीदा खुशबुओं के साथ अरोमा बाथ लेने से राहत मिल सकती है। 

-रचनात्मक कार्यों में समय बिताना तनाव-मुक्ति के सबसे बढ़िया उपायों में से है। इस दौरान आपका दिमाग़ नई रचना की ओर केंद्रित होता है.इसलिए परेशानी से दूर हट जाता है। इन कार्यों को करते हुए दिमाग़ का हल खोजने वाला हिस्सा सक्रिय हो जाता है। भले ही आपका ध्यान इस ओर न हो,लेकिन आपका दिमाग़ समस्य का हल खोज रहा होता है। यानी,आपका तनाव अपने आप कम हो जाता है(सेहत,नई दुनिया,मई द्वितीयांक 2012)।

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मंगलवार, 22 नवंबर 2011

ठंड के महीनों में दिल को चाहिए ज़्यादा हिफ़ाज़त

हदय रोगों के लिए सर्दी के महीने बेहद घातक होते हैं । ठंडे मौसम का हृदय रोगों से गहरा संबंध होता है । हृदय एवं रक्त संचार कई तरह से प्रभावित होते हैं । गाढ़ा हो जाने से रक्त का लसलसापन बढ़ जाता है । पतली रक्त नलिकाएं और संकरी हो जाती हैं । इससे रक्त का दबाव बढ़ जाता है, दिल की धड़कन भी बढ़ जाती है। 

जाड़े की दस्तक के साथ ही मौज-मस्ती का सिलसिला शुरू हो रहा है । क्रिसमस से लेकर पूरे जनवरी महीने तक बेफिक्री का आलम रहेगा। रंग में भंग डालने की मेरी कोई मंशा नहीं है लेकिन मौज-मस्ती के अपने धांसू आइडिया के साथ अपने दिल की खैरियत के खयाल की गठरी भी बांध लें तो बेहतर होगा । इस दौरान दिल की तरफ से बेतकल्लुफ हो जाना खतरे से खाली नहीं है । ब्रिटेन के चर्चित कवि टी. एस. इलियट की तर्ज पर कहें तो दिल की परवाह नहीं की तो ये महीने सबसे निर्दयी साबित हो सकते हैं । खाने-पीने का दौर ही नहीं, जाड़े की ठिठुरन भी घातक साबित होती है । सीधे कहें तो इन महीनों में दिल के दौरे का खतरा बहुत बढ़ जाता है । उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोग तो खास खयाल रखें । हदय रोगों के लिए ये महीने सबसे घातक होते हैं । 

ठंडे मौसम का हृदय रोगों से गहरा संबंध होता है । हृदय एवं रक्त संचार कई तरह से प्रभावित होते हैं । गाढ़ा हो जाने से रक्त का लसलसापन बढ़ जाता है । पतली रक्त नलिकाएं और संकरी हो जाती हैं । इससे रक्त का दबाव बढ़ जाता है, दिल की धड़कन बढ़ जाती है । यह स्थिति दिल के मरीजों के लिए तो ठीक नहीं ही है, उनके दिलों के लिए भी घातक हैं जो मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा एवं कोलेस्ट्रॉल जैसे जोखिम कारकों से लैस हैं । इस मौसम में श्वसन से संबंधित बीमारियां होती हैं जो दिल पर बुरा असर डालती हैं । जाड़े में लोग शराब का अधिक सेवन करते हैं । उच्च रक्तचाप एवं खून को पतला करने सहित अन्य जरूरी दवाइयों से बचते हैं । मस्ती के दौरान उन लक्षणों को गंभीरता से नहीं लेते जो दिल के दौरे की तरफ इंगित करते हैं । छाती के दर्द तक को गैस या अपच के कारण हुआ समझने की भूल करते हैं । जाड़े में अधिक समय तक ठंड में रहने और खुली जगह में शारीरिक मेहनत करने से बचें तभी आपके दिल की गर्मजोशी बरकार रहेगी । 

होम्योपैथ 
हृदय रोगों से बचाव के लिए हमेशा तत्पर रहने की जरूरत है । ३५-४० वर्ष के लोगों में आजकल हृदय रोग के ज्यादा मामले देखे जा रहे हैं । इसकी मुख्य वजह अतिरिक्त वसा वाला भोजन, आरामतलब जीवन, तनाव एवं फास्ट फूड आदि माना जा सकता है । सर्दियों में अतिरिक्त वसा युक्त भोजन, मांसाहार, शराब आदि का सेवन हृदय रोगों को आमंत्रण देता है । देखा जा रहा है कि बच्चों और युवाओं में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है । यह भी हृदय रोगों का कारण है । आजकल हृदयघात के लिए लाइपोप्रोटीन, फीनोटाइप, इन्सुलिन प्रतिरोध, हिमोसिस्टीन आदि भी जिम्मेदार हैं । 

नए शोध बताते हैं कि सर्दियों में लोग ज्यादा धूम्रपान करते हैं । इससे थ्रामबोसिस की संभावना बढ़ जाती है । महिलाओं में ज्यादा गर्भनिरोधी गोलियों का सेवन भी थ्रामबोसिस को बढ़ा देता है और हृदयघात हो सकता है । सर्दियों में नमक का ज्यादा सेवन भी उच्च रक्तचाप को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है । सर्दियों में घुटनों के रोग व रुमेटाइड आर्थराइटिस आदि की वजह से भी हृदय रोगों में अधिकता देखी जाती है । आवश्यकता है कि लोग सर्दियों में अपनी जीवनशैली स्वास्थ्यवर्द्धक रखें । नियमित व्यायाम, लंबी सैर, सादा भोजन, तनाव से मुक्ति आदि हृदय रोग से मुक्ति के नहीं बल्कि संपूर्ण आरोग्य के नुस्खे हैं। होम्योपैथी में हृदय रोगों से बचाव व उपचार की अच्छी औषधियां उपलब्ध हैं। हृदय में थक्का बनने से रोकने के लिए एलियबसिपा,लैकेसिस,डिजिटेलिस,एकोनाइट आदि दवाएं बेहद प्रभावी हैं लेकिन ध्यान रहे कि होम्योपैथिक चिकित्सक से परामर्श के बिना दवाएं न लें। 

आयुर्वेद 
वैसे तो दिल की बीमारी रोगी से हमेशा सावधानी मांगती है पर सर्दियों में अधिक सतर्कता बरतनी जरूरी हो जाती है । सर्दियों में हृदयरोगियों को कुछ विशेष एहतियात बरतने चाहिए । जैसे बहुत अधिक परिश्रम, तीक्ष्ण आहार एवं गरिष्ठ भोजन आदि से बचना चाहिए । गर्म-सर्द से बचने का हर संभव प्रयास करना चाहिए । सर्दियों में मल-मूत्र रोकने व चिंता करने से बचने की पूरी कोशिश करनी चाहिए । आयुर्वेद में हृदय रोगियों के लिए कुछ ऐसे उपाय हैं जो सर्दियों में उनके हृदय की देखभाल के लिए हितकारी हैं । 

ठंड से बचाव व रक्तचाप सुचारु रखने के लिए वक्ष स्थल पर वात नाशक तेल या मोम तेल की मालिश करें । आमतौर पर लोग सर्दियों में आलस्य व ठंड की वजह से प्रातः काल टहलने में आनाकानी करते हैं पर इस मौसम में सुबह स्वच्छ वायु में टहलना बहुत आवश्यक है । हो सके तो प्राणायाम का अभ्यास भी करें । सर्दियों में आंवले का मुरब्बा, गुलकंद, चंदन का अवलेह, संतुलित मात्रा में मक्खन व मिसरी का सेवन, जौ, परवल, करेला, सेंधा नमक, मुनक्का, पुराना गुड़, सोंठ, अजवायन, लहसुन, अनार, अमलताश, नई मूली, अदरक, सिरका, मधु आदि दिल की सेहत के लिए फायदेमंद हैं । सर्दियां बलकारक व रसायन औषधियों के प्रयोग का सही मौसम है इसलिए प्रतिदिन च्यवनप्राश, अश्वगंधा चूर्ण, नागबला चूर्ण, अर्जुन का चूर्ण आदि का सेवन हृदयरोगियों के लिए बहुत लाभकारी हैं । 

इसके अलावा, हृदयावर्ण रस, प्रभाकर वटी, चिंतामणि रस, हृदयरत्न चूर्ण, अर्जुनारिष्ट, पाठादि चूर्ण आदि का सेवन सर्दियों में लाभदायक है । सर्दियों में हृदयरोगियों को अपनी विशेष देखभाल करनी चाहिए । भोजन पर नियंत्रण व संतुलित शारीरिक श्रम सर्दियों में खुशहाल दिल की राह खोलती हैं(डाक्टर पुरूषोत्तम लाल से धनंजय की बातचीत, डाक्टर ए के अरूण से प्रियंका पांडेय पाडलीकर की बातचीत तथा डाक्टर आकाश परमार के विचारों पर आधारित यह आलेख संडे नई दुनिया, 20-26 नवम्बर,2011  के अंक में प्रकाशित है)।

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गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

आधुनिक जीवन-शैली और हृदय-रोग

आदिकाल से भारतीय आहार में घी और तेल खूब इस्तेमाल किया जाता है। कृषि प्रधान शाकाहारी देश में सभी को अधिक कैलोरी की जरूरत रही होगी। संभवतः इसी वजह से वसा अधिक खाई जाती थी। काम करने का तरीका तो बदल गया, लेकिन हमने भोजन शैली में कोई परिवर्तन नहीं किया। वसा हम पहले की तरह ही खूब खाते हैं। पहले हम खेती किसानी में अच्छी खासी शारीरिक मेहनत कर लेते थे, अब उतनी नहीं करते। 

जितनी कैलोरी खाते थे उससे कहीं ज्यादा खर्च हो जाती थी। हम वसा के रूप में कैलोरी पहले जितनी ही खा लेते हैं, लेकिन खेतों में मेहनत करके उतनी कैलोरी खर्च नहीं करते। ग्रामीण आबादी तेज़ी से शहरों की ओर आ रही है। कई ग्रामीण युवा अब सूचना उद्योग द्वारा रची क्रांति के हिस्सेदार हैं। गुड़गाँव, नोएडा, पुणे, बेंगलुरू और हैदराबाद जैसे कई बड़े शहरों के अलावा कई मझोले और छोटे शहर भी आईटी की फसल काटने वालों में शामिल हो गए हैं। पहले की तुलना में शहरी आबादी अधिक हो गई है। आईटी उद्योग अपने साथ विदेशी जीवनशैली भी लेकर आया है। कई शहरों में फास्टफूड और जंकफूड के आउटलेट २४ घंटे खुले रहते हैं। कारबोनेटेड ड्रिंक्स की खपत कई गुना बढ़ गई है। इस सबका असर युवाओं के शरीर पर दिखाई देने लगा है। कम उम्र में दिल की बीमारियाँ आम हो गई हैं। डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसे रिस्क फैक्टर अब सामान्य हो गए हैं। युवा हृदयरोगियों की संख्या बढ़ने का यह भी एक बड़ा कारण है। व्यावसायिक तनाव और आधुनिक जीवनशैली इसके लिए बराबर की ज़िम्मेदार हैं। आने वाले वर्षों में दिल से जुड़ी कई बीमारियों के युवा मरीजों की संख्या में तेजी से इजाफा होगा। हमने अभी तक भविष्य में मधुमेह, उच्च रक्तचाप और दिल की बीमारी के अन्य रिस्क फैक्टरों से निपटने के संसाधन विकसित नहीं किए हैं(संपादकीय,सेहत,नई दुनिया,अक्टूबर प्रथमांक)। 

अपने दिल का रखें ख़याल 
ज़िंदगी की एक भयानक घटना दिल दहला देती है। गम के लम्हों में दिल बैठ जाता है। दिल ही व्यक्ति के दिलेरी की पहचान कराता है। छोटे आकार तथा हल्के वजन के बावजूद इस दिल को कितना अधिक कार्य करना पड़ता है। दिल एक मिनट में 72 बार धड़कता है। इस तरह, एक वर्ष में दिल करीब 3 करोड़ 70 लाख बार धड़कता है । पैंसठ वर्ष की औसत आयु तक हृदय 240 करोड़ बार धड़कता है तथा लंबी रक्त नलिकाओं में प्रवाहित करता है जो एक दूसरे से मिला दी जाएं तो पूरी दुनिया का ढाई बार पूरा चक्कर लगा लेगी। कुदरत का कमाल है कि दिल आराम हराम है को चरितार्थ कर निरंतर धड़कता रहता है। लेकिन यही धड़कन तीव्र ज्वर,भय,हर्ष,व्यायाम,दौड़,मनोविचार,क्रोध के समय दो से चार गुना तक बढ़ जाती है। इसी प्रकार,अवसाद,निर्बलता,उपवास में हृदय की धड़कन घट जाती है। दिल 100 वर्ष या इससे अधिक समय तक निरंतर कार्य कर सकता है। 

दुनिया तेज़ी से बदल रही है, लोगों के खानपान जीवनशैली में बहुत से बदलाव आए हैं। यही कारण है कि आज तीस या चालीस वर्ष के वयस्कों में १० प्रतिशत रोगी दिल के मरीज़ होते हैं। धूम्रपान, शराब, शारीरिक श्रम की कमी, आलस्य, तंबाकू, मानसिक तनाव, चिंता दिल के दौरे का कारण बनते हैं। यही वजह है कि देश में दिल के रोगियों की संख्या में लगातार वृद्घि हो रही है। एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग ७ करोड़ ७० लाख दिल के रोगी हैं। लगभग ५० लाख लोगों की मृत्यु दिल के रोगों के कारण प्रतिवर्ष होती है। इनमें से ३० प्रतिशत रोगी ६२ वर्ष से कम आयु के होते हैं। ५० प्रतिशत दिल के मरीज़ों में पहले से कोई लक्षण दिखाई नहीं देते। हृदय की धमनी के ७० प्रतिशत रक्त प्रवाह के बंद होने पर ही दिल के दौरे के लक्षण प्रकट होते हैं। 

हृदय रोग से कैसे बचें... 
दिल के रोग के खतरे की यदि पहले ही जाँच-पड़ताल हो जाए तो समय रहते इनसे बचाव करना संभव होता है। हृदय रोग से बचने के लिए इन घातक लक्षणों से सावधान रहें। मोटापा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान, शराब, तंबाकू, शारीरिक श्रम में कमी, आलस्य शरीर के शत्रु हैं। मोटापे के कारण हृदय रोग, उच्च रक्तचाप व मधुमेह जैसे रोगों की संभावना बढ़ जाती है, इसलिए जिन लोगों का वजन अधिक है, जिनके परिवार में हृदय रोगी हैं, उन्हें अपना वजन कम करना चाहिए। यह तभी संभव है, जब वे चीनी, चिकनाई, चावल, मिठाई आदि का सेवन कम करें। तले हुए वसायुक्त नमकीन को त्याग दें। और इसके बजाए भुने हुए चने जैसी कम कैलोरीयुक्त चीज़ों का सेवन करें। प्रतिदिन एक घंटा सुबह टहलना शुरू करें। एक मिनट टहलने से १.५० मिनट आयु बढ़ती है। 

एक सामान्य व्यक्ति को प्रतिदिन १० हजार कदम रोज चलना चाहिए। यह तभी संभव है, जब अधिक से अधिक पैदल चलने की आदत डाली जाए। उच्च रक्तचाप की पहचान होने पर नियमित रूप से जाँच कर रक्तचाप भी नियंत्रित रखें। खाने में नमक की मात्रा कम रहने तथा नियमित रूप से डॉक्टर से परामर्श अनुसार औघधियाँ लेते रहें। यदि दिन में ५-७ बार सब्जियों और फूलों का सेवन किया जाए तो दिल के रोगी में ४० प्रतिशत की कमी हो सकती है। अंतर्राष्ट्रीय हार्ट फेडरेशन के अनुसार जीवनशैली में परिवर्तन कर जागरूक रहने से दिल के दौरे से होने वाली कुल मौतों में से ८० प्रतिशत टाली जा सकती है। एक ही दिल है, इसका ध्यान रखकर हम स्वस्थ, सुखी एवं निरोग रह सकते हैं(डॉ. अनिल चतुर्वेदी,सेहत,नई दुनिया,अक्टूबर प्रथमांक 2011)। 

हृदय रोग में लापरवाही प्राणघातक 
कार्डियोवैस्क्युलर रोग या हृदय रोग विश्वभर में लोगों की मौत के लिए ज़िम्मेदार सबसे बड़ा कारण हैं। सालाना १ करोड़ ७३ लाख लोग हृदय रोग की वजह से मर जाते हैं। उच्च रक्तचाप, अधिक कोलेस्ट्रॉल और मधुमेह जैसी बीमारियाँ, खानपान की अनियमितता, आहार में फल-सब्ज़ी जैसी पोषक चीज़ों का अभाव, धूम्रपान, मोटापा और शारीरिक श्रम में कमी कुछ ऐसे कारण हैं, जो हृदय रोग और हृदयाघात के खतरे को बढ़ाते हैं। 

परिजनों के लिए : 
यदि घर का कोई सदस्य हृदय रोग से पीड़ित हो तो घर के सभी लोग इस बीमारी के बारे में जान लें। ऐसे में सबसे ज़रूरी है हार्ट अटैक के लक्षणों को पहचानना। कई बार मरीज़ को हार्टअटैक के लक्षण महसूस होते हुए भी उन्हें समझ न पाए। ऐसे में हर दिन मरीज़ से बातचीत करें। अगर वह किसी प्रकार के दर्द की बात करे तो कार्डियोलॉजिस्ट को बताएँ। कुछ मरीज़ ऐसे भी होते हैं, जो डॉक्टर के पास जाना पसंद नहीं करते और दर्द या किसी अन्य परेशानी के बारे में बताने के बजाए उसे टाल देते हैं, लेकिन यह लापरवाही प्राणघातक सिद्घ हो सकती है। ऐसे में परिजनों की ज़िम्मेदारी बनती है कि वो समय रहते मरीज़ को डॉक्टर के पास लेकर जाएँ। उनकी दवाओं का नाम और देने का समय, दवा किस प्रकार लेनी है आदि बातें घर के अन्य सदस्यों को भी मालूम होनी चाहिए। ध्यान रखें कि मरीज़ समय पर दवाई ले। घर का कोई ज़िम्मेदार सदस्य रोज़ उन्हें दवाई दे या कम से कम इस ओर ध्यान दे। कार्डियोलॉजिस्ट, नज़दीकी अस्पताल, एम्बुलेंस और आपातकालीन सेवाओं के फोन नंबर घर के सभी सदस्य अपने पास लिखकर रख लें और मरीज़ के कमरे में बड़े अक्षरों में लिखकर दीवार पर चिपका दें। हार्टअटैक जैसी आपातकालीन स्थिति उत्पन्न होने पर यह जानकारी काफी महत्वपूर्ण होती है। 

पकाने के चुनिंदा तरीके 
खूब तेल-घी इस्तेमाल करके बनाया गया खाना हृदय रोगियों के लिए बहुत ही खतरनाक है। इसके बजाय अन्य तरीकों को अपनाया जा सकता है - 

भूनना : भूनना और बेक करना लगभग एक जैसी प्रक्रिया हैं। कंवेक्शन तरंगें ओवन के तापमान को एक समान रखती हैं, जिससे इसमें तेल की आवश्यकता बिलकुल नहीं होती और भोजन स्वाद से भरपूर होता है। स्टोव पर भी इसी तरह से चीज़ को भूना जा सकता है। 

उबालना, भाप द्वारा पकाना : उबालना यानी खाने को पानी में पकाना। भाप द्वारा पकाने के लिए बर्तन में पानीभरकर उसके ऊपर एक जाली रखी जाती है, जिस पर भोजन को रखकर पकाया जाता है। पानी उबलने के साथ जो भाप बनती है, उससे ऊपर रखा भोजन पक जाता है। इन प्रक्रियाओं से खाना आसानी से पक जाता है और पोषक तत्व भी नष्ट नहीं होते एवं तेल की ज़रा भी ज़रुरत नहीं होती। कुकर में खाना इसी तरह अंदर एकत्रित भाप से पकता है। 

बिना तेल-घी के मसाला भूनने का तरीका : क़ड़ाही गर्म कर उसमें जीरा डालकर भूरा होने तक भूनें। भूरा होते ही इससे खुशबू आने लगती है। फिर इसमें प्याज़ डालकर धीरे-धीरे चलाएँ। इसके बाद लहसुन-अदरक डालें। प्याज़ के हल्के भूरे रंग का होने तक चलाते रहें। अब पिसा हुआ टमाटर डाल दें। कुछ देर चलाएँ, फिर थोड़ा-सा पानी डालकर भूनें। मसाले को पानी छोड़ने तक भूनते रहें। फिर इसमें हल्दी डालकर थोड़ी देर और भूनें। इसके बाद नमक, मिर्च, धनिया डालकर कुछ देर चलाएँ। अब इसमें जो सब्ज़ी या दाल बनानी है, वो डालकर पकाएँ। व्यंजन बनाने के बाद उसमें गरम मसाला डालें और ऊपर से धनिया डालें(सेहत डेस्क,नई दुनिया,अक्टूबर प्रथमांक 2011)।

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शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

हार्ट अटैकःपहचानें लक्षण को और बचें पल भर की भी देरी से

फिल्मों में हार्ट अटैक का दृश्य पूरे ड्रामे के साथ दिखाया जाता है, व्यक्ति को दिल में दर्द होता है, वो छाती पर हाथ रखकर कुछ देर कराहता है और फिर नीचे गिर जाता है। ज़रुरी नहीं कि हर किसी को हार्ट अटैक फिल्मों के ड्रामाभरे अंदाज़ में आए। इसलिए हार्ट अटैक के सही लक्षणों के बारे में जानना ज़रुरी है, ताकि असल ज़िंदगी में आए हार्ट अटैक को समय रहते पहचाना जा सके।
शरीर की सभी अन्य मांसपेशियों की तरह हृदय को भी ठीक से काम करने के लिए खून की ज़रुरत होती है। हृदय रक्त वाहिकाओं और धमनियों के ज़रिए पूरे शरीर में रक्त पंप करता है। इसी तरह हृदय तक रक्त पहुँचाने का काम कोरोनरी धमनियाँ करती हैं। यदि कोरोनरी धमनी प्लाक बनने के कारण अवरुद्घ हो जाएँ तो इससे हार्ट अटैक आ सकता है।
यह कई कारणों से हो सकता हैः
 -अधिक वज़न।
 -शारीरिक श्रम की कमी।
 -अधिक वसा व कोलेस्ट्रॉलयुक्त खाना।
 -तनाव एवं धूम्रपान। अधिक शराब पीना।
 -परिवार के अन्य सदस्यों को हार्ट अटैक की समस्या।

ये कुछ ऐसे कारण हैं, जो प्लाक बनने की प्रक्रिया यानी आर्थेरोस्क्लेरॉसिस को बढ़ावा देते हैं। धीरे-धीरे जमा हो रहे इस प्लाक के कारण अंततः धमनी अवरुद्घ हो जाती है, नतीजा होता है हार्ट अटैक। धमनी के अवरुद्घ होते ही हृदय तक खून की आपूर्ति बंद हो जाती है।

हार्ट अटैक आने पर आमतौर पर ये लक्षण सामने आते हैं- 
 -पसीना आना एवं साँस फूलना।
 -छाती में दर्द होना एवं सीने में ऐंठन होना।
 -हाथों, कंधों, कमर या जबड़े में दर्द होना।
 -मितली आना, उल्टी होना।

 महिलाओं में हार्ट अटैक आने पर कुछ अन्य लक्षण भी देखे जा सकते हैं। त्वचा पर चिपचिपाहट, उनींदापन, सीने में जलन महसूस होना और असामान्य रूप से थकान इसमें शामिल है।

हार्ट अटैक कई लोगों के लिए मृत्यु का कारण बनता है। इससे मरने वाले करीब एक तिहाई मरीज़ों को तो यह पता ही नहीं होता कि वे हृदय रोगी हैं और अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। इसके लिए ज़िम्मेदार एक बड़ा कारण यह है कि पहले आए हार्ट अटैक को मरीज़ ने पहचाना ही न हो। ऐसा हार्ट अटैक,जिसके लक्षण अस्पष्ट हों या जिनका पता ही न चले,उसे साइलेंट हार्ट अटैक कहते हैं(डा. ए के पंचोलिया,सेहत,नई दुनिया अक्टूबर प्रथमांक 2011)।

"साइलेंट" हार्ट अटैक 
कभी-कभी लोगों को हार्ट अटैक होता है और उन्हें इसका पता भी नहीं चलता। हार्ट अटैक के लक्षण दिखाई नहीं देना, मरीज़ द्वारा लक्षणों को नज़रअंदाज़ कर देना या फिर इन्हें समझ ही न पाना साइलेंट हार्ट अटैक के कारण हैं। हार्ट अटैक से उबरने के लिए अवरुद्घ रक्त प्रवाह को जल्द से जल्द शुरु करना सबसे ज़्यादा ज़रुरी है। चूँकि साइलेंट हार्ट अटैक में मरीज़ या उसके परिजनों को इसका पता ही नहीं चल पाता, इसलिए उन्हें उबरने का कोई मौका भी नहीं मिलता। यही कारण है कि साइलेंटहार्ट अटैक ज़्यादा घातक होते हैं। हृदय तक रक्त की आपूर्ति कुछ देर के लिए बंद हो जाए तो मरीज़ को सीने में दर्द या एंजाइना की तकलीफ होती है। यह असल में एक चेतावनी की तरह होता है, जो इस ओर इशारा करता है कि स्थिति सामान्य नहीं है।

यहाँ पर भी ध्यान न दें तो स्थिति को बद से बदतर होते देर नहीं लगेगी। एंजाइना का लक्षण होता है सीने में दर्द उठना, लेकिन कई मरीज़ों को इसका पता ही नहीं चल पाता यानी उन्हें साइलेंट एंजाइना हो जाता है। यह आगे चलकर साइलेंट हार्ट अटैक का कारण बनता है। हार्ट अटैक के लक्षणों को कभी-कभी मरीज़ समझ ही नहीं पाता। इन लक्षणों को वो एसिडिटी, थकान, तनाव, घबराहट या ऐंठन जैसी छुटपुट समस्या समझ बैठता है और परिजनों या चिकित्सक को बताना उचित नहीं समझता। उसे लगता है कि थोड़ी देर में दर्द अपने आप ही कम हो जाएगा, लेकिन यह दर्द जानलेवा हो जाएगा, यह तथ्य उनके ज्ञान से परे होता है।

हार्ट अटैक के सभी मामलों में से २५ फीसद साइलेंट हार्ट अटैक के होते हैं। फिल्मों और टी.वी. पर दिखाए गए हार्ट अटैक के दृश्यों का लोगों पर प्रभाव इसके लिए ज़िम्मेदार कारणों में से है। साइलेंट हार्ट अटैक से मरीज़ की मौत तो हो ही सकती है, साथ ही इससे पुरुषों में डिमिंशिया का खतरा भी बढ़ जाता है। इसीलिए हार्ट अटैक के लक्षणों के बारे में जानना और महसूस होने पर इन्हें समझना बहुत ज़रुरी है। कोई भी लक्षण महसूस होने पर, चाहे वो हल्का ही क्यों न हो और कुछ ही समय के लिए हो, तुरंत चिकित्सकीय मदद के लिए संपर्क करें। इन्हें करना नज़रअंदाज़ जानलेवा हो सकता है। सही समय पर हुई मदद जीवन और मौत के फासले को बढ़ा सकती है।

दिल के दौरे में खून की जांच 
दिल का दौरा सुनते ही आँखों के सामने ज़्यादातर दर्द से तड़पते, पसीने से तरबतर हाँफते-घबराते व्यक्ति की तस्वीर आती है। ऐसी स्थिति में मरीज़ को तुरंत चिकित्सकीय देखरेख की आवश्यकता होती है। चिकित्सक सबसे पहले आवश्यक जाँच करते हैं और ई.सी.जी. व संभव हो तो ईको की जाँच भी करते हैं। इसके आधार पर वे तुरंत ही निदान करते हैं कि मरीज़ को दिल का दौरा पड़ा है या नहीं?

मरीज़ों में दिल के दौरे का निदान ज़्यादातर इन्हीं दो जाँचों के आधार पर किया जाता है। कभी-कभी इन जाँचों के लिए मशीन या इनके संचालन के लिए कुशल चिकित्सक के अभाव में दिल के दौरे का इलाज शुरू कर दिया जाता है। खून की जाँच से भी इस बात का पता लगाया जा सकता है कि व्यक्ति को दिल का दौरा वास्तव में पड़ा था या नहीं?

कभी-कभी व्यक्ति को पहले से दौरा पड़ा रहता है या उसके कार्डियोग्राम में एलबीबीबी नामक जन्मजात खराबी होती है। हो सकता है कि ऑपरेशन के दौरान मरीज़ को दिल का दौरा पड़ा हो या मरीज़ की दिमागी हालत ऐसी न हो कि वह बता सके कि उसे पहले भी कभी इस तरह की तक़लीफ हुई थी या नहीं? ऐसी स्थितियों में खून की जांच काफी मददगार सिद्घ हो सकती है।

अगर दिल का दौरा बहुत हल्का हो या पहले पूरी तरह बंद नस तुरंत इलाज़ मिलने पर खुल गई हो तोऐसे में ईसीजी व ईको की जांच का नतीज़ा नार्मल आ सकता है। सीपीकेएमबी और ट्रॉप-1 दो ऐसी जांचें हैं जो दिल के दौरे के 100 फीसदी निदान में मददगार होती हैं। अस्पताल में इन जांचों की सुविधा न हो तो खून को संबंधित लैब में भेजकर निदान किया जा सकता है ताकि दिल के दौरे का वास्तविक रूप से पता लगाया जा सके। सही निदान इसलिए ज़रूरी होता है ताकि दिल के दौरे का इलाज़ एक निश्चित पैटर्न पर किया जा सके तथा भविष्य के लिए सलाह दी जा सके(डा. मनीष वंदिष्टे,सेहत,नई दुनिया,अक्टूबर प्रथमांक 2011)।

किसी भी बीमारी में अगर वक्त पर सही इलाज मुहैया हो जाए तो मरीज की जिंदगी बचने के चांस काफी बढ़ जाते हैं। हार्ट अटैक के मामले में यह और भी जरूरी हो जाता है क्योंकि यहां कई बार कुछ मिनटों की देरी भी भारी पड़ जाती है। इसलिए,आइए अब जानते हैं कि हार्ट अटैक के लक्षण होने पर क्या करना चाहिएः

घरेलू इलाज की बजाय हॉस्पिटल पहुंचें 
जब किसी मरीज को चेस्ट पेन होता है, तो उसे अमूमन यह यकीन नहीं होता कि इसकी वजह हार्ट अटैक हो सकती है। वह समझता है कि यह दर्द किसी दूसरी वजह मसलन, एसिडिटी, गैस, मांसपेशियों में खिंचाव, नर्व्स में चुभन वगैरह से हो रहा है। ज्यादातर मरीज इस तरह के लक्षणों में घरेलू इलाज को तरजीह देते हैं और उससे बेहतर होने की उम्मीद भी बांधे रहते हैं। ऐसा देखा गया है कि एक आम आदमी ऐसी स्थितियों में हमेशा हॉस्पिटल जाने से बचता है और इस तरह देरी बढ़ती जाती है। यह गलत है। 

जब किसी को हार्ट अटैक आए, तो उसे फौरन हॉस्पिटल पहुंचाना चाहिए ताकि उसे जल्द-से-जल्द अटैक से रिकवर करने में मदद मिले। सबसे बेहतर नतीजे अटैक के दो घंटे के भीतर ट्रीटमेंट मिलने पर पाए जा सकते हैं जबकि पेशंट अमूमन घर पर रहकर या घरेलू इलाजों में इस समय को गंवा देता है। हम सलाह देते हैं कि पेशंट घरेलू इलाजों में समय बर्बाद न करें, न ही इसके लक्षणों को नजरअंदाज करें और जल्द-से-जल्द मेडिकल हेल्प लें। 

डॉक्टरों की खोजबीन में समय नष्ट न करें 
अटैक के बाद पेशंट का एंजियोग्राम कराया जाता है। अगर उसके नतीजे बताते हैं कि उसकी एक या एक से ज्यादा धमनियों में ब्लॉकेज है तो डॉक्टर सलाह देते हैं कि उसे सर्जरी करा लेनी चाहिए। लेकिन पेशंट डॉक्टर की सलाह पर अमल करने की बजाय दूसरे डॉक्टरों के चक्कर काटना शुरू कर देते हैं, ताकि वे सर्जरी से बच सकें। इस बीच उनका काफी समय बर्बाद हो जाता है, जो उनके लिए घातक भी साबित हो सकता है। 
केस स्टडी 
ऐसे ही एक पेशंट थे गंगाराम। उम्र 55 साल, पेशे से सरकारी कर्मचारी। उन्हें एंजाइना (आर्टरी में रुकावट या सिकुड़न से दिल में तेज दर्द) था। उनकी एंजियोग्राफी हुई, जिससे पता चला कि उनकी दो धमनियों में ब्लॉकेज है। उन्हें सलाह दी गई कि आप जल्द-से-जल्द बाईपास सर्जरी कराएं, लेकिन उन्होंने इसकी बजाय दूसरे कार्डियोलॉजिस्ट को तलाशना बेहतर समझा। इसमें उनके करीब पांच दिन बेकार हो गए और हॉस्पिटल पहुंचने से पहले ही उनकी मौत हो गई। गंगाराम के साथ जो हुआ, उससे यह बात साफ होती है कि डॉक्टर की सलाह को हमेशा गंभीरता से लेना चाहिए क्योंकि यह जिंदगी और मौत का सवाल है। हार्ट अटैक जैसी स्थितियां ऐसी होती हैं, जिनमें डॉक्टर की सलाह को दरकिनार कर बिला वजह दूसरे डॉक्टरों की खोजबीन में समय गंवाना महंगा पड़ सकता है। 

पेशंट की कंडिशन से तय होगा ट्रीटमेंट 
एक आम आदमी का कार्डियोलॉजिस्ट से हमेशा यह सवाल होता है कि वह बाईपास सर्जरी कराए या स्टेंट डलवाए और इसके लिए वह एक हॉस्पिटल से दूसरे हॉस्पिटल अपनी रिपोर्ट लेकर चक्कर काटता है। बाईपास सर्जरी में खून के बहाव का रास्ता नए चैनल के जरिए बदल दिया जाता है, जिससे धमनियों के ब्लॉकेज बाईपास हो जाते हैं। स्टेंट ब्लॉकेज को खेलने में मदद करते हैं। पेशंट की कंडिशन देखने के बाद डॉक्टर राय देते हैं कि उसके लिए क्या मुफीद होगा। खुद जिद न करें कि बाईपास करवाएं या स्टेंट डलवाएंगे। 

ब्लॉकेज खोलने के सर्जरी से अलग तरीके 
ब्लॉकेज खोलने के सर्जरी से अलग तरीके हैं : थ्रॉम्बोलेटिक, बलून एंजियोप्लास्टी और स्टेंट। थ्रॉम्बोलेटिक सिर्फ हार्ट अटैक आने के छह घंटे के भीतर दिया जा सकता है, वह भी डॉक्टर की सलाह पर। इससे बेहतर बलून एंजियोप्लास्टी हॉस्पिटल के कैथ-लैब में होती है, जिसमें बलून प्रॉसेस से ब्लॉकेज को खोला जाता है। लेकिन स्टेंट टेक्नॉलजी इसी बलून प्रॉसेस को और भी कारगर तरीके से अंजाम देती है। 
स्टेंट, एक मेटल के छल्ले के आकार का होता है, जो बॉलपॉइंट पेन की स्प्रिंग जैसा दिखता है। यह शरीर में बाहरी तत्व की तरह काम कर सकता है, जिससे ब्लॉकेज के फिर से बनने का डर बना रहता है। इसीलिए कुछ स्टेंट्स को दवा का लेप लगा कर तैयार किया जाता है, जिससे ब्लॉकेज बनने के चांस कम हो जाते हैं। इन्हें ड्रग कोटेड स्टेंट कहा जाता है। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि महंगे स्टेंट ज्यादा कारगर होंगे लेकिन यह सच नहीं है। बेयर-मेटल स्टेंट, ड्रग कोटेड स्टेंट के मुकाबले काफी सस्ते हैं। यह कहना मुश्किल है कि कौन-सा स्टेंट किस पेशंट के लिए सही है। डॉक्टर इसका फैसला करने के लिए अपनी जानकारी और अनुभव का इस्तेमाल करते हैं। अलग-अलग डॉक्टर की राय इसमें अलग-अलग हो सकती है। आमतौर पर ड्रग-कोटेड स्टेंट, बेयर-मेटल स्टेंट से बेहतर होता है। 
केस स्टडी 
इसके इस्तेमाल को आप इस उदाहरण से समझें। 74 साल के गोविंद घुटने की सर्जरी से काफी परेशान थे। एक सामान्य मेडिकल टेस्ट के बाद उन्हें पता चला कि उनकी एक आर्टरी में ब्लॉकेज हो चुका है। डॉक्टरों ने उन्हें बेयर-मेटल अनवेटेड स्टेंट इस्तेमाल करने की सलाह दी, क्योंकि इससे उन्हें एक साल तक खून पतला करने वाली दवा की जरूरत नहीं पड़ती। बेयर मेटल स्टेंट के इस्तेमाल से गोविंद को एंजियोप्लास्टी करवाने के बाद घुटने की रिप्लेसमेंट सर्जरी करानी पड़ी और यह ड्रग-कोटेड स्टेंट के इस्तेमाल के दौरान मुमकिन नहीं है।  

बाईपास सर्जरी के बाद स्टेंटिंग 
ज्यादातर मरीज सोचते हैं कि बाईपास सर्जरी ब्लॉकेज को ट्रीट करने का आखिरी ऑप्शन है और उसके आगे कुछ भी नहीं है। वे यह भी मानते हैं कि स्टेंटिंग टेम्पररी प्रॉसेस है और यह सिर्फ वक्ती तौर पर काम करता है। पर यह सच नहीं है। अगर इन पद्धतियों का इस्तेमाल सही तरीके से सही पेशंट में किया जाए तो इसकी सफलता का प्रतिशत 90 तक हो सकता है। स्टेंटिंग की जरूरत बाईपास सर्जरी के बाद बार-बार आने वाले ब्लॉकेज को खोलने के लिए पड़ सकती है। 
इसी तरह बाईपास सर्जरी की जरूरत स्टेंटिंग प्रोसेस के बाद भी पड़ सकती है। इसलिए न तो स्टेंटिंग प्रोसेस और न ही बाईपास सर्जरी, अपने आप में आखिरी ऑप्शन है। 

जानकारी के लिए 
जिन हॉस्पिटल में बाईपास सर्जरी और एंजियोप्लास्टी की सुविधा उपलब्ध है, वहां डॉक्टर सबसे बेहतर विकल्प बताने की स्थिति में होते हैं। आमतौर पर हम पेशंट के लिए प्रॉपर थेरेपी ही रिकमेंड करते हैं। 
ऐसी मान्यता है कि अगर डॉक्टर बाइपास सर्जन हैं तो वे बाईपास सर्जरी के लिए ही रिकमेंड करेंगे। जबकि एक कार्डियोलॉजिस्ट उसे स्टेंट से ठीक करने की कोशिश करेगा। एक ही हॉस्पिटल के दोनों डॉक्टरों की टीम से बात करने के बाद ही पेशंट नतीजा निकाल सकता है कि उसके लिए बेहतर इलाज क्या है। 
डायबीटीज और कमजोर हार्ट पंप के मरीज की अगर तीनों आर्टरी या मेन आर्टरी में ब्लॉकेज है तो उन्हें बाईपास सर्जरी के लिए भेजा जाता है। 
हार्ट अटैक होने पर मरीज को फौरन हॉस्पिटल पहुंचाना चाहिए। सबसे बेहतर नतीजे अटैक के दो घंटे के भीतर ट्रीटमेंट मिलने पर पाए जा सकते हैं। 

हाइब्रिड सर्जरी या कम्बाइंड सर्जरी 
कुछ पेशंट्स में किसी भी एक प्रोसेस को रिकमेंड करना मुश्किल हो जाता है। उनकी आर्टरी चैनल के ब्लॉकेज के इलाज के लिए बाइपास सर्जरी ज्यादा अच्छी होती है, वहीं ब्लॉकेज में वेंस लगाने की बजाय ड्रग कोटेड स्टेंट लगाना ज्यादा अच्छा होता है। इन पेशंट्स की कंडिशन के बारे में काफी सोच-विचार के बाद दोनों ही प्रोसेस का मेल करते हुए हाइब्रिड सर्जरी या कम्बाइंड प्रोसेस करना सही होता है। विदेशी मुल्कों में यह काफी प्रचलित है, लेकिन भारत में इस पद्धति को अभी कम अपनाया गया है क्योंकि यह बाईपास सर्जरी से डेढ़ गुना ज्यादा महंगा पड़ता है। ऐसे में ज्यादातर एक ही प्रोसेस का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि इस प्रोसेस का सही इस्तेमाल करने से किसी एक किस्म के प्रोसेस से बेहतर नतीजे आते हैं। 
केस स्टडी 
मिसेज खन्ना 83 साल की हेल्थी महिला हैं। उनको एंजाइना है। उनके परिवार में डॉक्टर भी हैं। एंजियोग्राफी में पता चला कि मेन आर्टरी में केल्सीफाइड ब्लॉकेज है और बाकी की दो आर्टरी में सॉफ्टर ब्लॉकेज हैं। मिसेज खन्ना के लिए बाईपास सर्जरी मुश्किल है क्योंकि उनकी उम्र ज्यादा है। उनकी हाइब्रिड सर्जरी हुई है, जिसमें मेन आर्टरी के लिए बाईपास सर्जरी हुई थी और बाकी दो आर्टरी में स्टेंट डाले गए थे। उन्होंने बहुत जल्द रिकवर कर लिया। 
एक और पेशंट हैं 45 साल के फार्मेसिस्ट। उन्हें सीने में दर्द होने पर हॉस्पिटल लाया गया था। उनको हार्ट अटैक हुआ था। एंजियोग्राफी में वह इस नतीजे पर पहुंचे कि हार्ट अटैक की वजह राइट मेन आर्टरी है और लेफ्ट आर्टरी के ब्लॉकेज की वजह भी वही है । ऐसे पेशंट के लिए बाईपास सर्जरी में बहुत रिस्क है। स्टेंटिंग प्रॉसिजर लेफ्ट आर्टरी के लिए ठीक नहीं है। इसलिए उनकी हाइब्रिड सर्जरी हुई, जिसमें राइट आर्टरी में एंजियोप्लास्टी और लेफ्ट आर्टरी में बाइपास हुआ था। इससे नतीजा निकला कि स्टेंटिंग प्रॉसिजर बाईपास सर्जरी का रिस्क कम कर देती है और हाइब्रिड सर्जरी को एक कामयाब सर्जरी बनाता है(डॉ.विनय बी.सांघी,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,9.10.11)।

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बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

रक्तचाप,हृदय रोग और आहार

दिल की चिंता तो हम सब करते हैं लेकिन उसके लिए हम ईमानदारी से कोशिश नहीं करते। खानपान में थोड़ा बदलाव कर और अपनी लाइफ स्टाइल से सिगरेट स्मोकिंग जैसी आदतों को दूर कर हम अपने दिल की सेहत को दुरुस्त रख सकते हैं। 

हृदय रोग अधिकांश लोगों में मृत्यु, विकलांगता और कार्य के घंटों के नुकसान के सबसे प्रमुख कारणों में से एक है। ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं और हमारे देश में किए गए अनेक प्रमुख अध्ययनों के अनुसार दिल्ली, कोलकाता, मुम्बई, चेन्नई, बेंगलुरु, जयपुर, तिरुवनंतपुरम समेत तमाम महानगरों में 35 वर्ष की आयु से ऊपर की लगभग 10 प्रतिशत जनसंख्या हृदय धमनी रोग (कोरोनरी हार्ट डिसीज) से पीड़ित है। ग्रामीण भारत के आंकड़े कम हैं, लेकिन ये भी निरंतर वृद्धि (लगभग 4 प्रतिशत) दर्शा रहे हैं। 

ये आंकड़े अत्यंत चिंताजनक हैं जो यह संकेत देते हैं कि अनुमानत: भारत में 6 करोड़ लोग हृदय की धमनियों में रुकावट से जुड़ी समस्याओं से पीड़ित हैं। इसलिए उन जोखिम वाले कारणों को समझना बहुत महत्वपूर्ण है जो समस्या के लिए जिम्मेदार हैं। 

सन 2000 में एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्ययन इंटरहार्ट में बताया गया कि 90 प्रतिशत मामलों में 9 जोखिम कारक ही दिल के दौरों के कारण बनते हैं। इस अध्ययन में शामिल 30 प्रतिशत रोगी दक्षिण एशियाई देशों से थे। 

जोखिम के कारक प्रतिकूल जोखिम कारणों में अत्यधिक धूम्रपान, उच्च रक्तचाप, खराब कोलेस्ट्रॉल के उच्च स्तर (एपीओबी/एपीओए1 का बढ़ा हुआ अनुपात), डायबिटीज मैलिट्स, मोटापा व मनो-सामाजिक दबाव प्रमुख होते हैं। सुरक्षात्मक जोखिम कारणों में फलों एवं सब्जियों का दैनिक सेवन, नियमित व्यायाम, शराब का सीमित सेवन शामिल हैं। 

याद रखें प्रतिदिन 20 से अधिक सिगरेट या बीड़ी पीने से दिल का जोखिम 5 गुना, 10 से 19 तक सिगरेट या बीड़ी पीने से 3 गुना तथा 5 से कम सिगरेट या बीड़ी पीने से यह जोखिम 1.5 गुना बढ़ जाता है। एक सिगरेट जिंदगी के 11 मिनट कम कर देती है और सिगरेट के धुएं से दिल के दौरों का खतरा 90 प्रतिशत अधिक बढ़ जाता है। 

क्या है उपयुक्त रक्तचाप 
उपयुक्त रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) 120/180 एमएमएस एचजी. 110/75 एमएमएस से अधिक बीपी होने को स्ट्रोक व हार्ट अटैक की दरों में वृद्धि के रूप में देखा जाता है। अनेक महामारी विज्ञान अध्ययनों व जीवन बीमा आंकड़ों द्वारा यह प्रमाणित हो चुका है। सिस्टॉलिक या डायस्टॉलिक प्रेशर में 10 एमएमएस की वृद्धि से हृदय संबंधी समस्या का जोखिम दोगुना हो जाता है। दुर्भाग्यवश उच्च रक्तचाप में किसी तरह के लक्षण नहीं होते। इस कारण इसकी पहचान व प्रबंधन एक चुनौती है। इसलिए इसे कई बार ‘साइलेंट किलर’ (खामोश हत्यारा) कहा जाता है। 

कुछ भ्रम 
रक्तचाप उम्र के साथ बढ़ता है। यह सामान्य प्रक्रिया है। 60 वर्ष के व्यक्ति का ब्लड प्रेशर 160 और 80 वर्ष के व्यक्ति का 180 (उम्र +100) होता है, यह सत्य नहीं है। सभी आयु वर्गो के लिए सामान्य बीपी 120/80 एमएमएस होना चाहिए। 

बीपी कम करने वाली दवाएं सामान्य रूप से ब्लड प्रेशर के 140/85 एमएमएस से अधिक होने पर दवा लेने की सलाह दी जाती है। कुछ विशेष स्थितियों में 130/80 एमएमएस के स्तर पर भी दवाइयां लेने की संस्तुति की जाती है। ऐसे लोगों में मधुमेह से पीड़ित रोगी, गुर्दे के रोग व उच्च ब्लड यूरिया व क्रेटिनिन वाले रोगी, पहले दिल के रोग या स्ट्रोक से पीड़ित रह चुके रोगी शामिल होते हैं। 

बीपी कम करने के उपाय 
रक्तचाप को 10 से 15 एमएमएस कम करने के लिए बिना दवाइयों वाले उपायों में नियमित व्यायाम, प्रतिदिन नमक की मात्र 4-5 ग्राम से अधिक लेना, प्रतिदिन 4-5 बार ताजे फल एवं सब्जियों का इस्तेमाल, अल्कोहल से परहेज, वजन कम करना आदि शामिल हैं। ये उपाय हर उस व्यक्ति को अपनाने चाहिए जिन्हें रक्तचाप है। जीवनशैली से जुड़े इन तरीकों से दवाइयों की मात्र व संख्या कम की जा सकती है। सभी लोगों को इन दवा रोधी तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि उनका रक्तचाप 120/80 एमएमएस रह सके। 

कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रखने के लिए 
उपयुक्त कोलेस्ट्रॉल के लिए नियमित व्यायाम, वजन कम करना, ओमेगा 3 वसीय अम्लों (जैतून का तेल, सरसों का तेल, बादाम, अखरोट, ठंडे पानी में पाई जाने वाली मछलियां जैसे सालमन, ट्राऊट आदि) में वृद्धि आदि शामिल हैं। 

दबाव या तनाव 
दबाव या तनाव एक महत्वपूर्ण जोखिम है। इससे एड्रेनेलिन का स्नव बढ़ता है। लगातार तनाव से ब्लड प्रेशर बढ़ता है। इससे मधुमेह हो सकता है और हृदय की धमनियां संकरी हो सकती हैं। तनाव को कम करने में श्वसन व्यायाम, सामान्य व्यायाम, योग, ध्यान व मालिश वाले तनाव प्रबंधन कार्यक्रम उपयोगी साबित हुए हैं। ये ऐसे तरीके हैं जो तनाव के कारण उत्पन्न होने वाले एडरेनलिन का प्रभाव घटाते हैं। ये आरामदायक तकनीकें काफी सुरक्षित भी हैं। उच्च जोखिम वाले लोगों को इससे काफी लाभ होगा। इसके साथ, फलों व सब्जियों से भरपूर प्रोटीन लेना, कम नमक लेना काफी उपयोगी सिद्ध हो सकता है(डा. उपेन्द्र कौल,हिंदुस्तान,दिल्ली,5.10.11) ।

दिल की तबीयत खराब हो जाए तो हमारी तबीयत खराब हो जाती है। ऐसे में दिल का अच्छी तरह इलाज जरूरी हो जाता है। होमियोपैथिक चिकित्सा किसी भी बीमारी का पूरी तरह सफाया करने के लिए प्रसिद्ध है। तो दिल की बीमारी के इलाज के लिए भी इसका लाभ क्यों न उठाया जाए। 

बदलते दौर में आदतों के साथ-साथ कई नई समस्याएं भी अलग-अलग रूप धारण कर लेती हैं। दिल की बीमारी कुछ इन्हीं समस्याओं में से एक है। वर्तमान में जो भी परिस्थितियां हों, लेकिन आने वाला समय सेहत के लिए और भी खतरनाक होने वाला है। जानकारों की मानें तो कम हो रही शारीरिक भाग-दौड़ और बढ़ते मानसिक भार के कारण आने वाले समय में लगभग हर व्यक्ति को रक्तचाप और दिल की बीमारी हो सकती है। ऐसे में दवाओं का बोझ कहां तक आप बरदाश्त कर पाते हैं, ये आपके एम्यून सिस्टम पर भी निर्भर करेगा। 

डॉक्टरों के अनुसार दिल की बीमारी का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। पहले इसे बुढ़ापे की बीमारी माना जाता था। लेकिन अब यह कम उम्र के लोगों को भी अपनी चपेट में ले रही है। ऐसे में अपने दिल की सेहत का खयाल रखना जरूरी है। बेहतर लाइफस्टाइल और सही जानकारी से इस बीमारी से काफी हद तक बचा जा सकता है। बीमारी हो ही जाए तो भी सही इलाज और देखभाल से जिंदगी अच्छी कट सकती है। 

परिवार में दिल की बीमारी की हिस्ट्री होने के अलावा सही लाइफस्टाइल न अपनाने पर भी ब्लॉकेज की आशंका बढ़ जाती है। खानपान ठीक न होना, स्मोकिंग करना, एक्सरसाइज न करना, बेहद बिजी और टेंशन में रहना जैसे फैक्टर बीमारी की आशंका को 15 से 20 फीसदी बढ़ा देते हैं। हालांकि वक्त पर ब्लॉकेज का पता लगने और सही इलाज होने से हार्ट अटैक से बचा जा सकता है। एनडीएमसी के चीफ मेडीकल ऑफिसर (होम्यो) सुभाष अरोड़ा ने बताया कि इस बीमारी से लड़ने में दुनिया की कोई भी दवा सिर्फ आपकी सहायता कर सकती है। लेकिन कोशिश आपको खुद ही करनी होगी, क्योंकि जब तक आप अपनी लाइफ स्टाइल में कोई बदलाव नहीं करेंगे, कोई भी दवा कारगर सिद्ध नहीं होगी। सुभाष अरोड़ा के मुताबिक ऐसी परिस्थितियों में एलोपैथी दवाएं बीमारी को दबा देती हैं, लेकिन होम्योपैथी दवाएं उसका जड़ से निवारण करती हैं। निश्चित तौर पर दिल के लिए होम्योपैथी दवाएं एक अच्छे साथी की तरह काम करती हैं। 

सबसे खास बात ये है कि इन दवाओं का कोई साइड इफेक्ट नहीं है। ये दवाएं सिर्फ बीमारी को ठीक करने का काम करती हैं, किसी दूसरी बीमारी का कारण नहीं बनती। हालांकि डॉक्टर सुभाष यह भी कहते हैं कि होम्योपैथी दवाएं भी तभी काम करती हैं, जब आप अपने लाइफस्टाइल में थोड़ा बदलाव करते हैं। प्रकृति के खिलाफ जाकर कोई दवा काम नहीं कर सकती। 

दरअसल, दिल से जुड़ी अधिकतर बीमारियों का कारण आज का डिब्बा बंद खाना है, जिसमें अत्यधिक मात्र में सोडियम होता है। हमारा शरीर न तो उतनी शारीरिक मेहनत कर पाता है और न ही सोडियम इतनी आसानी से घुल पाता है। इसके चलते रक्त चाप और कॉलेस्ट्रॉल के बढ़ने की शिकायत आम है। 

खाने में करें बदलाव 
खाने में तेल के इस्तेमाल से ब्लॉकेज तेजी से बढ़ता है, इसलिए तेल का इस्तेमाल कम से कम करें। वैसे भी तेल का अपना कोई स्वाद नहीं होता। खाने में स्वाद मसालों से आता है। इसके अलावा अनाज, फलों और सब्जियों में भी फैट होता है। ये सब खाने से शरीर को 18 फीसदी फैट मिल जाता है, इसलिए अलग से ऑयल की जरूरत नहीं पड़ती। 

दूध और दूध से बनी चीजें भी सीमित मात्र में खाएं। मीट, चिकन, अंडा, दूध, पनीर आदि चीजें कॉलेस्ट्रॉल का स्नोत होती हैं। जिनका कॉलेस्ट्रॉल पहले ही ज्यादा है, वे दिन में 200 ग्राम से ज्यादा दूध न लें। डबल टोंड दूध न पीने पर होने वाली कैल्शियम की कमी की भरपाई राजमा, मोठ, चना, पत्तेदार सब्जियां, कमल ककड़ी, मेथी आदि से की जा सकती है। 

ज्यादा से ज्यादा फल खाएं। डायबिटीज के मरीज ऐसे फल खाएं जिनमें मिठास कम हो ताकि शुगर लेवल नियंत्रित रहे। सिगरेट, शराब या किसी भी तरह के तंबाकू से तौबा कर लें। ये दिल के सबसे बड़े दुश्मन होते हैं(मृत्युंजय भारती,हिंदुस्तान,दिल्ली,5.10.11)।

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रविवार, 9 अक्टूबर 2011

योग करें,हृदय-रोग से मुक्त रहें

आज की लाइफ स्टाइल में अपनी सेहत का खयाल रखने के लिए भी हम पर्याप्त समय नहीं निकाल पाते। व्यस्त दिनचर्या का असर धीरे-धीरे हमारे दिल पर भी पड़ने लगता है जिससे बाद में बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है। अगर योग का थोड़ा सहयोग लें तो हम अपने दिल का खयाल रख सकते हैं। 

हमारे देश में दिल के दौरे की समस्या दिनोदिन बढ़ती जा रही है। हर साल तकरीबन 25 लाख लोग दिल के दौरे के कारण असामयिक मौत के मुंह में चले जाते हैं। इनमें लगभग 5 लाख लोगों की मौत अस्पताल पहुंचने से पहले ही हो जाती है। देश के शहरी हिस्सों में 30 साल से अधिक उम्र के 10 प्रतिशत लोग रक्त धमनियों में रुकावट की बीमारी से ग्रस्त हैं। धीरे-धीरे यह रोग महामारी की तरह सारे समाज के लोगों को अपनी आगोश में ले रहा है। 

हृदय रोग के कारण 
हमारे रक्त में कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना, मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, तनाव, मांस-मदिरा, धूम्रपान, वंशानुगत और दोषपूर्ण जीवन शैली आदि हृदयरोग के प्रमुख कारण हैं। 

योग का अभ्यास 
योग का नियमित अभ्यास दिल की सेहत को काफी हद तक दुरुस्त रखता है तथा खान-पान में परहेज रखकर काफी हद तक इस समस्या को दूर किया जा सकता है। हृदय रोग से बचने के लिए हमें अपने खान-पान में प्याज, टमाटर, लौकी, लहसुन, गाजर आदि को शामिल करना चाहिए। 

हृदय रोग से बचने के लिये रोज एक घंटा जरूर घूमें। साथ में कुछ योगाभ्यास भी बेहद लाभकारी होते हैं। इनमें ताड़ासन, चक्रासन, वज्रासन, पद्मासन, भुजंगासन, नाड़ीशोधन, मृत्यु संवीजनी मुद्रा, हृदय स्तभ्मन की क्रिया, अपान मुद्रा, श्वासन आदि प्रमुख हैं। 

ताड़ासन 
पैरों को एक साथ मिलाकर खड़े हो जाएं। अब पंजों पर जोर देते हुए धीरे-धीरे ऊपर उठें एवं दोनों हाथों को मिलाकर ऊपर की तरफ तान दें। इस अवस्था में पूरे शरीर का भार पैरों के पंजों पर होगा और पूरे शरीर को सीधा ऊपर की ओर तानेंगे। इस अवस्था में जितनी देर रह सकते हैं, रुकेंगे और फिर ना रुक पाने की अवस्था में धीरे-धीरे वापस आ जाएंगे। इसे करते वक्त पेट अन्दर की ओर खिंचा रहना चाहिए तथा सीना बाहर की ओर तना हुआ रहना चाहिए। कमर-गर्दन बिल्कुल सीधी रखें। इस आसन का अभ्यास कम से कम 5 बार अवश्य करें। इसके बारे में अधिक विस्तार से यहां देखिए।

लाभ 
यह हृदय के रोगों से बचाता है। यह लम्बाई बढ़ाने में भी लाभप्रद है। मांसपेशियों को भी मजबूत बनाने में यह खास भूमिका निभाता है। स्त्रियों के लिये भी यह बहुत लाभप्रद है। इससे आपका मानसिक तथा शारीरिक संतुलन बनता है। यह मेरुदण्ड के लिये तो राम बाण का काम करता है। 

इस विधि से बायां हाथ दाहिने कंधे पर और दाहिना हाथ पीठ के पीछे रखकर दाहिनी ओर घूमकर जितना पीछे की तरफ देख सकते हैं उतना देखने का प्रयास करें। अब मूल अवस्था में आएं। फिर दाहिने हाथ को बाएं कंधे पर रखकर और बाएं हाथ को पीठ के पीछे रखकर बाई तरफ जितना देख सकते हैं, देखें। इस प्रकार यह अभ्यास दोनों ओर कम से कम 10 बार करें। इसकी विधि यहांयहां  और यहां भी है।

लाभ 
यह आसन कमर, मेरुदण्ड, गर्दन के दर्द में राम बाण का काम करता है। कब्ज को दूर करता है और मोटी कमर को पतला करता है(सुनील सिंह,हिंदुस्तान,दिल्ली,5.10.11)।

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सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

दिल्लीःहृदय रोग के लिए हेल्पलाईन जारी

अगर किसी दिल्लीवासी को सीने में दर्द की शिकायत हो तो उसे 24 घंटे इलाज मिल जाएगा, बशर्ते उसे एक नंबर डायल करना होगा। दरअसल दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. अशोक कुमार वालिया ने चेस्ट पेन हेल्पलाइन का उद्घाटन किया है। हेल्प लाइन का नंबर 011-23281318 होगा जो 24 घंटे उपलब्ध होगा, वह भी फ्री। नंबर डायल करने के बाद पेशंट के पास दो विकल्प होंगे कि उसे सरकारी अस्पताल में इलाज कराना है या प्राइवेट अस्पताल में। इसके बाद पास के किसी अस्पताल में इलाज की व्यवस्था की जाएगी। डॉ. वालिया ने कहा कि इसके लिए अस्पतालों की लिस्ट तैयार की गई है, जिसमें डॉक्टरों के मोबाइल नंबर भी हैं। यह सेवा नैशनल मेडिकल फोरम और कार्डियॉलजिस्ट असोसिएशन के सहयोग से शुरू हुई है। इसके अध्यक्ष डॉ. प्रेम अग्रवाल ने बताया कि अगर हार्ट अटैक के पेशंट को शुरू में ही क्लॉट बस्टर का इंजेक्शन लग जाए तो उसकी जान तो बचेगी ही, आगे वह महंगे एंजियोप्लास्टी, एंजियोग्राफी, बायपास और ओपन हार्ट सर्जरी से भी बच जाएगा। उन्होंने कहा कि यह देश में इस तरह की पहली हेल्पलाइन है(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,1.10.11)।

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बुधवार, 17 अगस्त 2011

जानलेवा है दिल के आसपास भरा पानी

पेरीकार्डियल इफ्यूजन एक ऐसी बीमारी है, जिसमें दिल के चारों तरफ पानी भर जाता है। पंप के रूप में काम करने वाला दिल हमारे शरीर का बेहद महत्वपूर्ण अंग है। पूरे शरीर से खून इसके दाएँ हिस्से में आता है, जिसे पंप करके यह फेफड़ों में भेजता है। फेफड़ों में पहुँचने पर इसमें मिश्रित कार्बनडाइऑक्साइड निकल जाती है व फेफड़ों में आई ऑक्सीजन इसमें घुल जाती है। यह खून वापिस दिल के बायें हिस्से में आता है। फिर यहाँ से पंप करके इसे पूरे शरीर में भेजा जाता है। यह प्रक्रिया जीवनभर सतत चलती रहती है। दिल के चारों तरफ एक पतली झिल्ली नुमा आवरण होता है, जिसे पेरीकार्डियम कहते हैं। इसका काम होता है हृदय की उसके आसपास मौजूद अन्य अंगों से रक्षा करना। पेरीकार्डियम और हृदय के बीच १०-१५ मिलीलीटर पानी भरा रहता है, लेकिन अगर यहाँ इससे कहीं अधिक मात्रा में पानी भर जाए तो इस स्थिति को पेरीकार्डियल इफ्यूजन कहते हैं। इस बीमारी के तहत पानी इकठ्ठा होने की जो प्रक्रिया है, वो धीरे-धीरे होने पर तो हृदय सुचारू रूप से काम कर लेता है, लेकिन अचानक ही बहुत ज़्यादा मात्रा में पानी भर जाए तो फिर हृदय ठीक से काम नहीं कर पाता। कुछ बीमारियाँ होती हैं, जिनमें हृदय में पानी भर जाने की संभावना बनी रहती है जैसे टी.बी. वायरल बुखार, कैंसर, चोट लगना, रुमेटिक फीवर, खून बहने की बीमारी आदि। ऐसी स्थिति में हृदय के चारों तरफ दबाव होता है, जिसके कारण हृदय के अंदर खून आने में परेशानी होती है। इसके अलावा हृदय पूरी तरह फैल भी नहीं पाता, अतः इसे खून पंप करने में मुश्किल होती है। पेरीकार्डियल इफ्यूजन की स्थिति अचानक बन जाने पर न तो हृदय में खून आ सकता है और न ही यह रक्त पंप करके बाहर भेज सकता है। ऐसी स्थिति को कार्डियक टेंपोनॉड कहते हैं, जो कि एक मेडिकल इमरजेंसी होती है। इसमें मरीज़ की साँस भरने लगती है, बेचैनी होती है, दिल की धड़कन तेज़ हो जाती हैं, गले की नसें फूल जाती हैं व पैरों में सूजन आ जाती है। बाद में लिवर भी सूज जाता है और पेट में पानी भरने लगता है। कार्डियक टेंपोनॉड का निदान होना अत्यंत ज़रुरी है, नहीं तो मरीज़ की जान को खतरा रहता है। ऐसे में ई.सी.जी. व एक्स-रे जैसी सामान्य जाँचों के अलावा सबसे महत्वपूर्ण होती है ईको की जाँच। इससे तुरंत पता चल जाता है कि हृदय के चारों ओर पानी भरा है व यह कितनी मात्रा में है। इसके उपचार का सबसे कारगर तरीका है हृदय के आसपास जमे अतिरिक्त पानी को बाहर निकालना। छाती के बीचोंबीच निचले हिस्से में यानी पेट के ऊपरी हिस्से से ई.सी.जी. मशीन व ईको की सहायता से एक सुई डाली जाती है और पानी बाहर निकाल लिया जाता है। इस पानी की जाँच करके पानी भरने की वजह का पता लगाया जाता है। मरीज़ को कुछ दिनों के लिए ऑबज़रवेशन में रखा जाता है तथा नियमित जाँच की जाती है। चूँकि यह एक मेडिकल इमरजेंसी होती है, अतः शंका होने पर जाँच के द्वारा तुरंत ही इसका निदान किया जाना चाहिए। देर होने से मरीज़ की जान को खतरा रहता है। यदि पानी वहीं पर भरा रहे और पूरी तरह न सूख पाए तो पेरीकार्डियम कालांतर में सख्त हो जाता है व सिकुड़ जाता है। ऐसा होने पर हृदय न तो ठीक से फैल सकता है और न ही पंपिंग कर सकता है। यह स्थिति दवाओं से ठीक नहीं की जा सकती तथा धीरे-धीरे मरीज़ की तबियत बिगड़ती ही जाती है। साँस भरना, पैरों में सूजन आना व थकान बनी रहने जैसी समस्या मरीज़ की दिनचर्या का हिस्सा बन जाती हैं। इसे कांस्ट्रिक्टिव पेरीकार्डायटिस कहते हैं। हृदय के चारों तरफ की सख्त पड़ चुकी झिल्ली को काटकर इसका उपचार किया जाता है(डॉ. मनीष वंदिष्टे,सेहत,नई दुनिया,अगस्त द्वितीयांक 2011)।

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शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

महिलाओं में हृदय रोग का जोखिम अधिक

एक्यूट कोरोनरी सिंड्रोम (एसीएस) के पश्चात ३० दिनों तक मर्दों की बनिस्बत महिलाओं पर मौत का साया मँडराता रहता है। एसीएस से तात्पर्य है दिल की रक्त वाहिका में चर्बी के जमाव के कारण उत्पन्ना समस्याएँ जैसे हृदयाघात़। इस मामले में रोग की गंभीरता और एसीएस की किस्म जैसे कारकों पर भी बहुत कुछ निर्भर होता है। हृदयाघात के बाद पहले वर्ष में पुरुषों की मृत्यु दर २५ प्रतिशत और महिलाओं की मृत्यु दर ३८ प्रतिशत होती है। कम उम्र के मरीज़ों में यह अंतर और अधिक है। ५० साल से कम उम्र की औरतों में उसी वर्ग के पुरुषों के मुकाबले मृत्यु दर दोगुनी है। महिलाओं को जोखिमों पर आधारित निम्न, मध्यम या उच्च हार्ट अटैक का खतरा रहता है। रजोनिवृत्ति के बाद हृदय रोग विकसित होने का खतरा २-३ गुना बढ़ जाता है। जो स्त्रियाँ धूम्रपान करती हैं उन्हें २ से ६ गुना ज़्यादा खतरा होता है। जितनी अधिक सिगरेटों की संख्या होगी जोखिम उतना ही बढ़ता जाएगा। शारीरिक निष्क्रियता, मधुमेह, उच्च कॉलेस्ट्रॉल ये सब दिल की बीमारी में प्रमुख रूप से योगदान देते हैं। ६६ से ७५ प्रतिशत मधुमेह के मरीज़ दिल के रोग से मरते हैं। मधुमेह खराब कॉलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लीसिराइड का स्तर बढ़ा देता है। मधुमेह से ग्रस्त कई औरतों को उच्च रक्तचाप भी होता है और उनका वज़न भी अधिक होता है इसलिए उन्हें हृदय रोग का अधिक खतरा होता है। हृदय रोग का पहला लक्षण है हार्ट अटैक। इसलिए अच्छा है कि हार्ट अटैक के लक्षणों को जान लें ताकि वक्त पड़ने पर तुरंत चिकित्सकीय मदद ली जा सके। अधिकतर हार्ट अटैक के मामलों में सीने में दर्द या परेशानी महसूस होती है, छाती के निचुड़ने या भरे होने का अहसास होता है। दर्द बढ़कर बाएँ जबड़े या कंधे या शरीर के वाम भाग के अन्य किसी अंग को प्रभावित कर सकता है। उबकाई आना, साँस का छोटा होना ये कुछ लक्षण हैं, जो आमतौर पर प्रकट होते हैं। आदर्श स्थिति यह है कि दिल के दौरे का पहला लक्षण सामने आने के 1 घंटे के अंदर उसका इलाज़ शुरू हो जाए(सेहत,नई दुनिया,अगस्त 2011 प्रथमांक)।

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बुधवार, 1 जून 2011

उत्तर भारत में पहली बारःगंगाराम अस्पताल में हुआ हृदय प्रत्यारोपण

दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में डॉक्टरों की एक टीम ने एक महिला मरीज के हृदय प्रत्यारोपण में सफलता प्राप्त की है। पचास डॉक्टरों व पैरामेडिकल स्टाफ की टीम ने लगातार दस घंटे तक ऑपरेशन कर यह कामयाबी हासिल की।

गंगाराम अस्पताल प्रशासन ने दावा किया है कि उत्तर भारत में किसी भी निजी अस्पताल में हृदय प्रत्यारोपण करने का यह पहला मामला है।

सर्जरी टीम के प्रमुख डॉ. डीएस राणा ने मंगलवार को संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि दिल्ली के बलजीत नगर की रहने वाली सुनीता (44) को सांस लेने में दिक्कत महसूस होने के कारण अस्पताल में भर्ती किया गया था।

शुरुआती जांचों में उसके हृदय में खामियां होने की बात सामने आई। इस पर डॉक्टरों ने उसका हृदय प्रत्यारोपित करने का निर्णय लिया। संयोग से सुनीता के ब्लड ग्रुप का ही एक कैडावोर भी मिल गया।

डॉ. राणा ने बताया कि इस जटिल सर्जरी को करने के लिए चार ऑपरेशन थिएटरों का प्रयोग किया गया। इसके अलावा, बीस यूनिट खून इस्तेमाल किया गया और पूरी सर्जरी में 17-18 लाख रुपए का खर्च आया।

चूंकि, मरीज गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है, इसलिए अस्पताल प्रशासन ने उसकी सर्जरी का पूरा खर्चा वहन किया है। फिलहाल, सुनीता को किसी भी प्रकार की पोस्ट सर्जरी जटिलता नहीं है।

इस अवसर पर केंद्रीय स्वास्थ्य सेवा के महानिदेशक डॉ. आरके श्रीवास्तव ने कहा कि पूरे देश में अब तक 100 मरीजों का हृदय प्रत्यारोपण किया गया है।

इनमें से 27 सर्जरी एम्स में संपन्न हुई हैं। दिल्ली में ही स्थित आर्मी के आरआर हॉस्पिटल में भी एक मरीज का हृदय प्रत्यारोपण किया जा चुका है।

चालीस अस्पतालों की बनी चेन
डॉ. आरके श्रीवास्तव ने बताया कि आर्गेन ट्रांसप्लांट को बढ़ावा देने के लिए 40 अस्पतालों की एक चेन बनाई गई है। इनमें अंग प्रत्यारोपण से संबंधित तमाम सूचनाओं के आदान-प्रदान की व्यवस्था की गई है।

इसके जरिए चेन में शामिल सभी अस्पताल प्रशासकों को यह पता लग सकेगा कि किस अस्पताल में कितने कैडावोर ने पंजीकरण करवाया है और किस अस्पताल में कितने मरीजों को किस प्रकार के अंग की जरूरत है। इस व्यवस्था के बाद मरीजों को विभिन्न अस्पतालों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे(दैनिक भास्कर,दिल्ली,1.6.11)।

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रविवार, 22 मई 2011

घातक है दिल की बीमारी

चिकित्सा विज्ञान के शोधों से मालूम होता है कि दिल के रोगों से मरने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। एड्स, टीबी, मलेरिया, मधुमेह, सभी प्रकार के कैंसर और श्वास रोगों से मरने वाले मरीजों से कहीं ज्यादा मौतें दिल की बीमारियों से होती हैं। दिल की बीमारी के लक्षण घातक दौरा पड़ने से पहले ही दिखाई देने लगते हैं, लेकिन लोग इसे नजरंदाज करते हैं।

हमारा हृदय विशेष प्रकार की मांसपेशियों से बना होता है। ये मांसपेशियाँ हमारे मानव शरीर में सबसे कठिन कार्य करने वाली मांसपेशियाँ होती हैं। हमारे शरीर में छाती के बीचों-बीच हृदय स्थित होता है। दोनों हाथों को कटोरानुमा बनाकर मिलाने से जो आकार बनता है, करीब उतना आकार ही एक विकसित मानव के हृदय का होता है। हमारा हृदय एक मिनट में ८० बार और एक दिन में १,१५,००० बार धड़कता है, यानी पूरे सालभर में ये ४.२ करोड़ बार धड़क चुका होता है। एक साधारण जीवनकाल में हमारा हृदय ३ खरब से भी ज्यादा बार धड़कने के साथ ही करीब १ अरब बैरल के बराबर खून पंप करता है। दौड़भाग, खेलकूद के समय तो दिल को अधिक परिश्रम करना पड़ता ही है, शरीर के आराम की स्थिति में भी इसका काम कम नहीं होता। जाहिर है कि इतना काम करने वाले दिल की देखभाल भी अच्छी ही होना चाहिए।

हृदय कैसे काम करता है?

हृदय में चार चेंबर होते हैं- दो एट्रियम, जो हृदय में खून वापस लेते हैं और दो वेट्रिकल होते हैं, जो शरीर में खून पंप करते हैं। हमारे पूरे शरीर में एट्रिया और वेन का जाल बिछा होता है। मुख्य धमनी हृदय से शरीर के अन्य अंगों में खून लेकर जाती है। रक्त नलिकाएँ शरीर के अन्य अंगों से खून को हृदय में पहुँचाती है। हृदय में चार वॉल्व होते हैं, जो खून को पीछे जाने से रोकते हैं। हर वॉल्व रक्त को आगे तो जाने देता है, लेकिन पीछे आने से रोकता भी है।

इलेक्ट्रिकल सिस्टम

हृदय की धड़कन को नियंत्रित करने के लिए एक इलेक्ट्रिकल सिस्टम होता है। मोटे तौर पर देखा जाए तो हृदय मांसपेशी का बना पंप होता है, जिसे काम करने के लिए एक ऊर्जा स्रोत की जरूरत होती है। हृदय को रक्त पंप करने की यह शक्ति इसी इलेक्ट्रिकल सिस्टम से मिलती है।



दिल की मुख्य धमनी 

हमारे शरीर के प्रत्येक अंग को कार्य करने के लिए खून की जरूरत होती है। सभी अंगों को खून पंप करने का काम हृदय करता है, लेकिन हृदय की मांसपेशियों को खून पहुँचाने का काम मुख्य धमनी करती है। यह दो भागों में होती है। मुख्य धमनी के इन्हीं दोनों भागों के ठीक से काम नहीं करने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। जैसे हृदय को खून न मिलना, इससे आगे चलकर हृदयाघात भी हो सकता है। यही व्यक्ति की मृत्यु का कारण भी बन जाता है। 

मुख्य धमनी की बीमारियाँ

मुख्य धमनी के अंदर की सतह पर चर्बी के जमने से दिल की बीमारियों की शुरुआत होती है। चर्बी का इस तरह से जमना बचपन से ही शुरू हो सकता है। समय के साथ जमावड़े की यह प्रक्रिया निरंतर चलती जाती है। इसी के कारण मुख्य धमनी का घेरा कम होता जाता है, जिससे रक्त नलिका का आकार सँकरा हो जाता है। कई बार रक्त प्रवाह पूरी तरह थम जाता है और यही हृदयाघात होता है। सीने में दर्द- एंजाइना पेन कहे जाने वाले इस दर्द की गंभीरता लक्षणों पर निर्भर करती है। हो सकता है कि दिल की बीमारी के मरीज में सीने में कभी कोई दर्द न हुआ हो या वैसा कोई लक्षण नहीं दिखा हो, लेकिन इसकी वजह से कुछ मरीजों को हृदय में कभी हल्का तो कभी तेज दर्द महसूस होता है। जब ऑक्सीजन मिश्रित रक्त हृदय को पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलता तो सीने में दर्द होता है, जिसे "एंजाइना" कहते हैं। जब हृदय को रक्त मिलना पूरी तरह बंद हो जाता है, तब हार्ट-अटैक होता है।

साइलेंट अटैक भी होते हैं

कुछ मरीजों को हार्ट-अटैक आने के बाद भी कोई लक्षण नहीं दिखते। उन्हें कुछ मालूम ही नहीं चल पाता है, इसे "साइलेंट हार्ट अटैक" कहते हैं। मधुमेह के मरीज़ों में इसका खतरा अधिक रहता है। दिल की बीमारियों के आ रहे लक्षणों को पहचानिए। लक्षणों को पहचानकर उनका निराकरण कराना भी महत्वपूर्ण है। इसके अलावा वार्षिक हेल्थ चेकअप भी नियमित रूप से कराएँ। 

इसे आजमाएं-
-लहसुन की 10 कलियों को 250 मिलीलीटर दूध में डालकर अच्छी तरह से उबाल लें। इसे छान लें। लहसुन की कलियों को खाकर ऊपर से दूध पी लें। हृदयाघात के मरीज़ों के लिए यह उपाय बहुत कारगर होता है।
-दालचीनी का एक छोटा टुकड़ा एक कप पानी में उबाल लें। पानी आधा रह जाने पर इसमें आधा चम्मच शङद मिलाकर पिएं। चाय में भी दालचीनी का छोटा टुकड़ा उबाल सकते हैं(डॉ. विनीत पांडे,सेहत,नई दुनिया,मई 2011 द्वितीयांक)।

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गुरुवार, 19 मई 2011

हृदय रोग से कैसे बचें?

दिल के रोग के खतरे की यदि पहले ही जाँच-पड़ताल की जाए तो हम समय रहते इनसे अपना बचाव कर सकते हैं। यदि आप हृदय रोगों से बचना चाहते हों तो इन खतरों से सावधान रहें।

मोटापा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान, शराब, तनाव, शारीरिक श्रम में कमी आदि। ये शरीर के शत्रु हैं। मोटापे के कारण हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, कैंसर और श्वास के रोगों की संभावना प्रबल हो जाती है। इसलिए जिन लोगों का वज़न अधिक है, जिनके परिवार में हृदय रोगी हैं, उन्हें अपना वज़न कम करना चाहिए। यह तभी संभव है, जब वे चीनी, चिकनाई, चावल आदि का सेवन कम करें। तले हुए वसायुक्त नमकीन और मिठाइयों को त्याग दें और प्रतिदिन सुबह एक घंटा टहलना शुरू करें। एक सामान्य व्यक्ति को अपने शरीर का वज़न नियंत्रित करने के लिए प्रतिदिन १० हज़ार कदम चलना चाहिए। यह तभी संभव है, जब अधिक से अधिक पैदल चलने की आदत डाली जाए। शारीरिक श्रम और संतुलित आहार के बल पर ही आप अपने हृदय की ५० प्रतिशत रक्षा कर सकते हैं। उच्च रक्तचाप की पहचान होने पर नियमित रूप से जाँच कर रक्तचाप १३०/८५ मिमी तक नियंत्रित रखें। नमक की मात्रा कम करें और डॉक्टर के परामर्श के अनुसार दवाइयाँ नियमित रूप से निरंतर लेते रहें। रक्तचाप नियंत्रित करके आप हृदय रोगों के साथ ही पक्षाघात की संभावना से भी बच सकते हैं। अनुसंधानों से यह सामने आया है कि यदि दिन में ५-७ बार सब्जियों और फलों का सेवन किया जाए तो दिल के रोगों में ४० प्रतिशत तक की कमी हो सकती है। ४० वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक व्यक्ति को साल में एक बार शारीरिक स्वास्थ्य परीक्षण ज़रूर करवाना चाहिए, ताकि हृदय रोग और उच्च रक्तचाप के कारणों और लक्षणों का समय पर निदान हो सके(डॉ. अनिल चतुर्वेदी,सेहत,नई दुनिया,मई 2011 द्वितीयांक)।

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शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

घरेलू नुस्खों से करें कोलेस्ट्रोल ठीक

बढ़ता कोलेस्ट्रोल निशानी है हृदय रोग होने की। हृदय रोग होने का मतलब है जीवन को खतरा। हमें जानकारी होनी चाहिए कि क्यों बढ़ता है रक्त का कोलेस्ट्रोल। कैसे पाएं इससे छुटकारा?
* कोलेस्ट्रोल का बढऩा, हृदय रोग का होना आमतौर पर वंशानुगत रोग है फिर भी खानपान की गलतियों के कारण किसी को भी हो सकता है।
* कोलेस्ट्रोल का अपना रंग पीला है। हल्का पीला रंग होता है। यह चर्बी व वसा लिये होता है।
* कोलेस्ट्रोल का होना जरूरी है। किंतु सामान्य से अधिक हो तो हानिकारक।
* व्यक्ति के भोजन का 30 प्रतिशत तक का भाग कोलेस्ट्रोल ही है। यह जिगर में बनता है। होता है यह सामान्य से अधिक।
* यह हमारे शरीर को हमारे भोजन से ही प्राप्त होता है। यह वसायुक्त पदार्थ है। यह हमारे भोजन में विद्यमान निम्रलिखित पदार्थों की ही उत्पत्ति है। शराब, धूम्रपान, मक्खन, घी, तले पदार्थ, तेल, मांस, अंडा या कोई भी अन्य चर्बीयुक्त पदार्थ।
कैसे करें कोलेस्ट्रोल कम ?
व्यायाम
योगासन जिस में प्राणायाम भी हो हल्के व्यायाम, खेलना, तैरना, पैदल चलना, बड़े कदमों से सैर, साइकिल चलाना, कम से कम समय आराम करना, शरीर चलाये रखना।
परहेज
अनाज व तले पदार्थों की जगह अधिक फलों का प्रयोग, फल ऐसे हों जो पेड़ पर ही पके हों। हरी सब्जियां खाना, सैर करना, लेटे नहीं रहना, जिन कारणों से यह रोग होता है उसे निकाल फेंकें।
उपचार
* कोलेस्ट्रोल कम करने का अर्थ है हृदय रोग का सही उपचार। इसके लिए प्रतिदिन प्रात: अंकुरित अनाज मुट्ठी भर जरूर खाएं।
* अंकुरित दालें भी खानी आरंभ करें।
* सोयाबीन का तेल अवश्य प्रयोग करें यह भी उपचार है।
* लहसुन, प्याज, इसके रस उपयोगी हैं।
* नींबू, आंवला जैसे भी ठीक लगे, प्रतिदिन लें।
* शराब या कोई नशा मत करें, बचें।
* इसबगोल के बीजों का तेल आधा चम्मच दिन में दो बार।
* रात के समय धनिया के दो चम्मच एक गिलास पानी में भिगो दें। प्रात: हिलाकर पानी पी लें। धनिया भी चबाकर निगल जाएं।
* आप धनिया को पानी में डालकर उबालकर, पीकर लाभ उठा सकते हैं।
* यदि आप अपने रक्त में कोलेस्ट्रोल की ठीक मात्रा रख सकें जो सामान्य तक रहे, बढ़े नहीं, ऐसे में यह रोग होगा ही नहीं। इन सब जानकारियों की चर्चा पहले ही अपने चिकित्सक से कर लें तो बेहतर होगा(सुदर्शन भाटिया,दैनिक ट्रिब्यून,28.4.11)।

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बुधवार, 27 अप्रैल 2011

एम्स का शोधः तंबाकू से सिकुड़ रहीं दिल की धमनियां

अभी तक तंबाकू सेवन के कारण कैंसर जैसी घातक बीमारी पर बहस हो रही थी लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि तंबाकू खाने वालों की धमनियां सिकुड़ रही हैं। इसका खुलासा एम्स के कार्डियोलॉजी विभाग के डॉक्टरों के शोध से हुआ है। शोधकर्ताओं ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि दिल के मरीजों को तंबाकू का सेवन न करने की नसीहत देना डॉक्टर भी भूल जाते हैं। दिल पर तंबाकू के असर को लेकर किए जाने वाला यह पहला शोध है। एम्स के शोध को अमरीकन जर्नल ऑफ कार्डियोवास्कुलर ड्रग्स में प्रमुखता के साथ स्थान दिया गया है।
देश में तंबाकू सेवन करने वालों की तादाद सबसे ज्यादा है। आंकड़ों के अनुसार एक तिहाई भारतीय युवा धूम्रपान करते हैं। जबकि आधे तंबाकू या इसके अन्य रूपों का सेवन करते हैं। लगभग सात लाख लोग तंबाकू के कारण प्रति वर्ष मरते हैं। आम लोगों में यह धारणा बनी हुई है कि धूम्रपान के कारण दिल के रोग का खतरा बढ़ता है। जबकि तंबाकू के सेवन करने वालों में यह खतरा समान रूप से उपस्थित है। एम्स के कार्डियोलॉजी विभाग के डॉ. बलराम भार्गव के नेतृत्व में डॉ. सिवासुब्रमण्यिन रामकृष्णन, डॉ. राजेंद्र थंगजम, डॉ. अंबुज राय, डॉ. संदीप सिंह, डॉ. लक्ष्मी रामकृष्णन, डॉ. संदीप सेठ, डॉ. राजीव नारंग ने तंबाकू का सेवन करने वाले औसत ५१ वर्ष के १२ पुरुषों पर तंबाकू के असर का अध्ययन किया गया। इनमें से दो मधुमेह से पीड़ित थे जबकि छह हाईपरटेंशन के और चार एंजाइना के शिकार थे। एंजियोग्राफी के समय सभी लोगों को एक ग्राम तंबाकू के पत्ते चबाने के लिए दिए गए। डॉ. बलराम भार्गव ने बताया कि मात्र दस मिनट के अंदर दिल की धमनियों का व्यास ३.१७ मिलीमीटर से घटकर २.७९ मिलीमीटर हो गया। तंबाकू का असर १२ से १३ मिनट में चरम पर पहुंच गया। उन्होंने बताया कि धमनियां सिकुड़ने के कारण धड़कन प्रति मिनट ६८ से बढ़कर ८० पर पहुंच गई। साथ ही, कार्डिएक आउटपुट ३.८ से बढ़कर ४.७ पर पहुंच गया। तंबाकू के असर का पता लगाने के लिए एक घंटे तक शोध किया जाता रहा। तंबाकू में मौजूद निकोटिन रक्त में शामिल होकर दिल तक पहुंच जाता है और दिल के काम करने पर ज्यादा भार दे देता है। खास बात यह है कि तंबाकू की लत के शिकार जब डॉक्टर के पास जाते हैं तो उन्हें तंबाकू छोड़ने की सलाह देना डॉक्टर भूल जाते हैं(अमर उजाला,दिल्ली,27.4.11)।

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मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

कंप्यूटर, टीवी के सामने घंटों बिताना दिल के लिए खतरनाक

सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक और आकरुट पर चैटिंग करने और वीडियो गेम खेलने के लिए कंप्यूटर या टेलीविजन के सामने घंटों बैठे रहने वाले बच्चों में दिल की बीमारियों के खतरे बढ़ रहे हैं। नए वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार जो बच्चे घर के बाहर खेलने-कूदने की बजाय घंटों फेसबुक और आकरुट जैसी सोशल नेटवर्किग साइटों पर चैटिंग करते हैं, वीडियो गेम खेलते हैं अथवा टेलीविजन देखते हैं उनमें बड़े होने पर हृदय रोग एवं उच्च रक्तचाप होने के खतरे कई गुना बढ़ जाते हैं। सुप्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ तथा नोएडा स्थित मेट्रो हार्ट इंस्टीच्यूट के निदेशक पुरुषोत्तम लाल ने बताया कि जो बच्चे खेल-कूद से दूर रहते हैं और लैपटाप, पीसी अथवा टेलीविजन के सामने घंटों बैठे रहते हैं उनकी रक्त धमनियां सिकुड़ जाती है और बाद में उनमें दिल रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। दिल्ली नेत्र विज्ञान सोसायटी (डीओएस) के सचिव डा. अमित खोसला ने बताया कि कंप्यूटर और टेलीविजन के सामने अधिक समय तक बैठे रहने का असर केवल आंखों पर ही नहीं बल्कि हृदय एवं रक्त धमनियों पर पड़ता है। असल में जो बच्चे अपना ज्यादा समय इंटरनेट, कम्पयूटर व टेलीविजन पर बिताते हैं वे खेलने-कूदने में काफी कम समय देते हैं। इस कारण उनकी रक्त नलिकायें अन्य बच्चों की तुलना में अधिक सिकुड़ती हैं और उन्हें बड़े होने पर हृदय रोग एवं उच्च रक्तचाप होने के खतरे अधिक होते हैं। भारतीय मूल के वैज्ञानिक डा. बामिनी गोपीनाथ एवं उनके सहयोगी वैज्ञानिकों ने डेढ़ हजार बच्चों पर अध्ययन करने पर पाया कि जो बच्चे अधिक समय तक घर के बाहर खेलते हैं उनमें रक्त की पतली नलिकाओं की स्थिति उन बच्चों की तुलना में अच्छी होती है जो घर में या तो कंप्यूटर या टेलीविजन के सामने बैठकर गेम खेलते हैं या चैटिंग करते हैं। इस अध्ययन में अधिक देर तक कंप्यूटर पर गेम खेलने या चैटिंग करने वाले छह साल उम्र के बच्चों की आंखों की रक्त नलिकाओं को संकुचित पाया गया जो कि हृदय रोग के खतरे के बढ़ने का संकेत है। यूनिवर्सिटी आफ सिडनी के सेंटर विजन रिसर्च के वैज्ञानिक डा. गोपीनाथ का कहना है कि बच्चों की अस्वास्थ्यकर जीवनशैली रक्त की पतली नलिकाओं में रक्त संचार पर बुरा प्रभाव डालती है जिससे भविष्य में उन्हें रक्त वाहिका रोग तथा उच्च रक्तचाप होने का खतरा बढ़ता है। दरअसल टेलीविजन देखने अथवा कंप्यूटर पर गेम खेलने या चैटिंग करने से जो नुकसान होता है उससे कहीं अधिक नुकसान घंटों तक बैठे रहने और व्यायाम नहीं करने के कारण होता है। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि महानगरों एवं बड़े शहरों मे व्यायाम एवं खेल-कूद से दूर होने तथा फास्ट फूड के बढ़ते इस्तेमाल के कारण बच्चे हाइपरटेंशन, मधुमेह और हृदय रोग जैसी बीमारियों के तेजी से शिकार हो रहे हैं। हाल के एक अध्ययन से पता चला है कि शहरों में रहने वाले करीब 25 प्रतिशत किशोरों और बच्चों को हृदय रोग का खतरा है। डा. लाल ने बताया कि पिछले कुछ सालों में रहन-सहन एवं खानपान की आदतों में बदलाव तथा बढ़ते तनाव के कारण शहरी बच्चों में मोटापा 20-25 प्रतिशत बढ़ा है जिसके कारण उनमें हृदय रोगहोने के खतरे बढ़े हैं(राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,25.4.11)।

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सोमवार, 18 अप्रैल 2011

दिल की हिफाज़त इंटरनेट से

चिकित्सा वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिसकी मदद से इंटरनेट के जरिए दिल की हिफाजत की जा सकेगी और उसकी गडबडि़यों को भी ठीक किया जा सकेगा। यह तकनीक अब भारत में भी उपलब्ध है।पिछले दिनों इस तनकीक की मदद से दुबई में रहने वाले डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी के एक मरीज की जान बचाई गई। इंटरवेंशनल कार्डियोलाजिस्ट डॉ ऋषि गुप्ता ने पिछले दिनों फरीदाबाद स्थित एशियन इंस्टीटच्यूट आफ मेडिकल साइंसेस (एआईएमएस) में मरीज के शरीर में उक्त तकनीक पर आधारित अत्यंत छोटे आकार खुद व खुद हृदय की पंम्पिग क्षमता में सुधार करता है। यह उपहरण हृदय की गडबडि़यों पर नजर रखता है और कंपन के जरिए मरीज को सतर्क करता है। इसके साथ ही साथ यह हृदय के संबंध में सभी जानकारियों को इंटरनेट के जरिए संबंधित अस्पताल को भेज देता है।

एआईएमएस के निदेशक डॉ एन के पाण्डे ने बताया कि यह उपकरण एक साथ कई तरह के कार्य करने में सक्षम है और इसे हृदय के प्रत्यारोपण से पहले दिन के मरीजों के लिए सवरेत्तम एवं सर्वाधिक कारगर उपकरणों में से एक माना जाता है। यह उपहरण हृदय की पंम्पिग क्षमता में सुधार करता है और हृदय के आकार को घटाता है। अनियमित हृदय धड़कन होने की स्थिति में यह दिल की धड़कन को खुद ठीक करता है और दिल के काम करना बंद कर देने पर यह हृदय को स्वत शॉक देकर उसे दोबारा चालू करता है। दिल की धड़कन के शुरु नहीं होने पर यह पेसिंग शुरु कर देता है।


डायलेट कार्डियोमायोपैथी वैसी घातक स्थिति है जिसमें हृदय की मांसपेशियां कमजोर हो जाती है और हृदय की दीवार पतली हो जाती है जिसके कारण उसकी पंम्पिग क्षमता घट जाती है। इसमें हृदय का आकार बडा हो जाता है।

डॉ. एन के पाण्डे ने बताया कि यह उकपरण हृदय की अनियमित धड़कन से संबंधित सभी तरह की जानकारियों को दर्ज करता है। अनेक कार्य करने वाला यह उकपरण मरीज को अनायास होने वाली मौत से बचाता है। उनके जीवन काल को बढाता है तथा जीवन की गुणवत्ता में सुधार करता है।

अध्ययनों से पता चला है कि यह बीमारी हर एक लाख लोगों में से पांच से आठ लोगों को होती है। इस बीमारी के लिये आनुवांशिक, पारिवारिक कारण और वायरल संक्रमण मुख्य रुप से जिम्मेदार होते हैं। यह बीमारी कोई लक्षण प्रकट किये बगैर बनी रह सकती है। इससे हृदय का आकार धीरे-धीरे बढ जाता है। सांस लेने में दिक्कत होती है तथा पैरों और शरीर के अन्य अंगों में सूजन हो जाती है(दैनिक भास्कर,दिल्ली,18.4.11)।

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शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

हृदयरोगियों के लिए सभी राज्यों में लगेंगे आवासीय योग शिविर

केंद्रीय योग एवं प्राकृतिक अनुसंधान परिषद की रिपोर्ट के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने हृदय रोगियों के उपचार के लिए सभी राज्यों में आवासीय शिविरों का आयोजन करने जा रहा है। इसके तहत हृदयरोगी को अपने जीवन साथी के साथ शिविरों में एक सप्ताह तक रखा जाएगा और उन्हें हृदयरोग की शल्य क्रिया से बचाने के लिए योग एवं जीवन शैली बदलने के गुर सिखाए जाएंगे। इन शिविरों में आवास, भोजन व जांच आदि पूरी तरह नि:शुल्क होगा। दरअसल यह निर्णय एम्स के वरिष्ठ हृदयरोग विशेषज्ञों के अनुसंधान की एक रिपोर्ट को योग अनुसंधान परिषद द्वारा परखने के बाद किया गया है। रिपोर्ट में यह साबित किया गया है कि योग और ध्यान से न केवल हृदयरोगी होने से बचा जा सकता है बल्कि जो लोग हृदयरोगी बन चुके हैं और उनकी धमनियों में अवरोध है तो उसे भी योग के माध्यम से ठीक किया जा सकता है। एम्स के इस अनुसंधान के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने तय किया है कि भारत जैसे देश में जहां हृदयरोग का उपचार सबके वश में नहीं है वहां पर अनुसंधान रिपोर्ट के नतीजों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए राज्यों शिविर लगाए जाएंगे और इसका पूरा खर्चा केंद्र सरकार उठाएगी। इसके लिए अखिल भारतीय अणुवृत न्यास को मंत्रालय ने काम दे दिया है। यह न्यास सभी राज्यों में अपने अध्यात्म साधना केंद्रों के माध्यम से आवासीय शिविरों का आयोजन करेगा। हालांकि अभी यह काम कुछ निजी केंद्र कर रहे हैं मगर वहां पर इतना ज्यादा खर्च आता है कि वह आम आदमी की पहुंच से बाहर होता है। मगर अब सरकार ने अध्यात्म साधना केंद्रों के माध्यम से यह काम पूरी तरह से नि;शुल्क कर दिया है ताकि किसी भी व्यक्ति को हृदयरोग होने से पहले ही उसकी जीवन शैली में परिवर्तन कर उसे बचाया जा सके और जिन्हें हृदयरोग हो चुका है कि उन्हें साधना केंद्रों में योग आदि के माध्यम से रोग मुक्त किया जा सके। मंत्रालय ने यह परियोजना अध्यात्म साधना केंद्र के स्वामी धर्मानंद को सौंपी है। उनका कहना है कि इस परियोजना को फिलहाल हमने दिल्ली में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू कर दिया है और धीरे-धीरे इस सभी राज्यों में लागू कर दिया जाएगा। उनका कहना है कि शिविर में आने वाले मरीजों के पहले, मध्य और अंत में तीन बार रक्त व अन्य जांच होती है। मरीजों में काफी अंतर मिलता है। इन शिविरों में मरीज के परीक्षण का काम एम्स के हृदयरोग विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एससी मनचंदा की देखरेख में किया जाता है। न्यास के ट्रस्टी शांति कुमार जैन का कहना है कि हृदयरोग के उपचार में यदि इस परियोजना को हम पूरे देश में लागू कर ले गए तो शल्य चिकित्सा दर को काफी कम करने में सफल हो जाएंगे(ज्ञानेंद्र सिंह,राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,31.3.11)।

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