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बुधवार, 16 जनवरी 2013

आप कैसे समझते हैं कि खाना ख़राब हो गया?

एक नई रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया का आधा भोजन यूं ही बर्बाद चला जाता है. अक्सर उपभोक्ता खाने को फेंकने से पहले ये नहीं देखते हैं कि खाना खराब हुआ है या नहीं बल्कि वे इस्तेमाल करने की अंतिम तिथि देखने के बाद इसे फेंक देते हैं. 

लेकिन क्या ऐसा करने से पहले खाने को सूंघा नहीं जाना चाहिए? 
"समस्या ये है कि छोटे लेकिन ख़तरनाक रोगाणुओं की मौजूदगी का पता केवल सूंघने से नहीं लगाया जा सकता है. याद रखिए कि जीवाणु अच्छे और बुरे दोनों तरह के हो सकते हैं. खासकर योगर्ट और चीज़ में अच्छे जीवाणु होते हैं जबकि ई. कोली, साल्मोनेला, बोट्यूलिज्म और क्लोस्ट्रिडियम जैसे जीवाणु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं" अक्सर लोग खाद्य पदार्थों को फेंकने के लिए उन पर लगे अंतिम तिथि के लेबलों को देखते हैं. ब्रिटेन की खाद्य मानक एजेंसी के दिशानिर्देशों के मुताबिक इस्तेमाल करने की अंतिम तिथि का मतलब उपभोक्ताओं को सुरक्षा के बजाए गुणवत्ता की अधिक जानकारी देना है. इसका मतलब है कि खाने की कोई ची़ज़ कब अपना स्वाद खोना शुरु करेगी लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं है कि अमुक भोज्य पदार्थ अब खाने के लायक नहीं रहा. 

अंडे भी नहीं हैं अपवाद 
अंडे भी कोई अपवाद नहीं हैं. अंडों के सेवन की नियत तिथि से एक या दो दिन के बाद भी खाया जा सकता है बशर्ते कि उन्हें अच्छी तरह पकाया गया हो. अंडे में अगर साल्मोनेला विषाणु मौजूद है तो उसका सेवन आपको बीमार कर सकता है. इस्तेमाल की नियत तिथि ऐसे खाद्य पदार्थों पर लागू होती है जो जल्दी खराब हो जाते हैं जैसे मांस उत्पाद. ये ऐसे भोज्य पदार्थ हैं जिनका नियत समय के बाद सेवन आपके स्वास्थ्य को मुश्किल में डाल सकता है. 

लेकिन क्या सूंघने से खाने की बर्बादी कम की जा सकती है? 
खाद्य विशेषज्ञ स्टीफेन गेट्स के मुताबिक खाद्य पदार्थों विशेषकर मांस से आ रही तीक्ष्ण बदबू का मतलब है कि इसे तुरंत फेंक देना चाहिए लेकिन वास्तविकता ये है कि केवल सूंघकर आप निश्चत रूप से नहीं कह सकते कि अमु्क खाद्य पदार्थ खाने लायक है या नहीं. 

भोजन में होते हैं फायदेमंद जीवाणु भी 
उन्होंने कहा, “समस्या ये है कि छोटे लेकिन ख़तरनाक रोगाणुओं की मौजूदगी का पता केवल सूंघने से नहीं लगाया जा सकता है. याद रखिए कि जीवाणु अच्छे और बुरे दोनों तरह के हो सकते हैं. खासकर योगर्ट और चीज़ में अच्छे जीवाणु होते हैं जबकि ई. कोली, साल्मोनेला, बोट्यूलिज्म और क्लोस्ट्रिडियम जैसे जीवाणु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं.”

उन्होंने कहा, “ऐसे जीवाणुओं पर काम करने वाले शोधकर्ताओं का कहना है कि इनमें से कुछ की बदबू अलग तरह की होती है लेकिन ये तभी होता है जब वे एक निश्चित मात्रा में होते हैं और संभवतया इसमें दूसरे कारक भी शामिल होते हैं.” गेट्स खासकर मांस जैसे खाद्य पदार्थों के इस्तेमाल के मामले में नियत तिथि पर चलने की वकालत करते हैं. लेकिन साथ ही उन्होंने कहा कि यह फार्मूला सब्जियों के मामले में ज्यादा कारगर नहीं है क्योंकि कम हानिकारक जीवाणु होते हैं. उन्होंने कहा कि लोग खासकर बच्चे खाना बनाने में ज्यादा दिलचस्पी लें तो उन्हें इस बारे में ज्यादा जानकारी मिलेगी और इस तरह खाने की बर्बादी को कम किया जा सकता है. 

मैनचेस्टर खाद्य शोध केन्द्र में खाद्य विज्ञान के प्रोफेसर क्रिस स्मिथ भी इस बात से सहमत हैं कि इस मामले में जानकारी ही सबसे अहम है. उन्होंने कहा कि उपभोक्ताओं का नियत तिथि पर निर्भर होने की सबसे बड़ी वजह ये है कि वे अब इस बात को नहीं जानते हैं कि कोई खाद्य पदार्थ कब खाने के लायक नहीं रहता. स्मिथ ने कहा, “1960 के दशक में लोग बूचड़ के पास जाते थे और उससे पूछते थे कि मांस कितना ताज़ा है. सर्वोत्तम गोमांस को 21-28 दिन तक लटका रहता था और उसके बाद ही उसका सेवन किया जाता था. लेकिन अब सबकुछ पहले के ही डिब्बाबंद रहता है और लोगों के पास सूंघने का वो अनुभव नहीं रह गया है.” उन्होंने कहा “जब तक हम सूंघकर किसी भोज्य पदार्थ की असली स्थिति का पता लगाने की क्षमता को दोबारा हासिल नहीं करते हैं तब तक हमें नियत तिथि जैसी मौजूदा व्यवस्थाओं पर ही निर्भर रहना पड़ेगा.” 

विशेषज्ञों की सलाह मानें तो रूक सकती है भोजन की बर्बादी 

सूंघना कुछ ही मामलों में है कारगर

वो कहते हैं कि सूंघकर ये पता लगाने के लिए कि डिब्बाबंद मांस खाने के लिए सुरक्षित है या नहीं, डिब्बा खोलना पड़ेगा और कमरे के तापमान पर 30 मिनट के लिए खोलकर रखना पड़ेगा. लेकिन उन्होंने साथ ही कहा कि सूंघकर भोजन के सेवन के लिए सुरक्षित होने का पता लगाना कुछ परिस्थितियों में मददगार हो सकता है लेकिन अन्य मामलों में ये इतना आसान नहीं है. स्मिथ ने कहा “गंध वाले चीज़ जैसे स्टिंकिंग बिशप का पता सूंघकर नहीं लगाया जा सकता है. कई मामलों में तो खाद्य पदार्थों के तभी खाया जाता है जब वे खराब होना शुरू होते हैं. 

कई लोग तीतर को खाने से पहले उसे कई दिनों तक लटकाकर रखते हैं.” उन्होंने कहा “अन्य मामलों में सूंघना उतना कारगर नहीं होता है. ब्रेड पर दुर्गंध आने से पहले ही फंफूद लगना शुरू हो जाता है. ऐसे में सूंघने के बजाए देखकर खाना ही ज्यादा कारगर है.” तो पाककला के शौकीनों के लिए सूंघकर खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता का पता लगाना एक अतिरिक्त विकल्प हो सकता है लेकिन सबसे सुरक्षित सलाह यही है कि नियत तिथि की व्यवस्था पर ही चलें(बीबीसी डॉटकॉम,15.1.13).

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शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

एंटी-ऑक्सीडेंट करता है शरीर को विषमुक्त

भोजन को पचाने में कई क्रियाएं होती हैं। शरीर भोजन से अपने लिए जरूरी तत्वों को ले लेता है लेकिन उन तत्वों को अलग कर देता है जो नुकसानदेह हैं। ये विषैले तत्व कई बार शरीर से आसानी से नहीं निकलते। ऐसे में एंटी-ऑक्सीडेंट उन्हें शरीर से बाहर करता है और शरीर की सफाई करता है। आइए,जानते हैं एंटी ऑक्सीडेंट के फायदे हैं और इसके स्रोतों के बारे में- 

हम सभी चाहते हैं स्वस्थ और चुस्ती से भरा-पूरा जीवन, जिसमें रोग और बुढ़ापा न सताए। शरीर से विषैले तत्वों को हटा कर एंटी ऑक्सीडेंट हमारे इसी मिशन को पूरा करने में सहायक बनते हैं। एंटी ऑक्सीडेंट वह अणु होते हैं जो दूसरे अणुओं के ऑक्सीडेशन को रोकते हैं। सैकड़ों नहीं हजारों पदार्थ एंटी ऑक्सीडेंट की तरह कार्य करते हैं। यह विटामिन, मिनरल्स और दूसरे कई पोषक तत्व होते हैं। बीटा कैरोटिन, ल्युटिन लाइकोपीन, फ्लैवोनाइड, लिगनान जैसे एंटी ऑक्सीडेंट हमारे लिए बहुत जरूरी और महत्वपूर्ण हैं। इनके अलावा मिनरल सेलेनियम भी एक एंटी ऑक्सीडेंट की तरह कार्य करता है। विटामिन ए, विटामिन सी और विटामिन ई की एक एंटी ऑक्सीडेंट के रूप में हमारे शरीर में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। 

क्या होते हैं फ्री रेडिकल्स 
हमारे शरीर की खरबों कोशिकाओं को पोषण की कमी और संक्रमण का ही खतरा नहीं होता है, बल्कि फ्री रेडिकल्स भी कोशिकाओं को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। यह दूसरे अणुओं से इलेक्ट्रॉन चुराने की कोशिश करते हैं, जिससे डीएनए और दूसरे अणुओं को नुकसान पहुंचता है। यह फ्री रेडिकल्स भोजन को ऊर्जा में बदलने की प्रक्रिया में उप-उत्पाद के रूप में निकलते हैं। इसके अलावा कुछ उस भोजन में होते हैं जो हम खाते हैं, कुछ उस हवा में तैरते रहते हैं जो हमारे आसपास मौजूद होती है। फ्री रेडिकल्स अलग-अलग आकार, माप और रासायनिक संगठन के होते हैं। फ्री रेडिकल्स कोशिकाओं को नष्ट करके हृदय रोगों, कैंसर और दूसरी बीमारियों की आशंका बढ़ा सकते हैं। एंटी ऑक्सीडेंट फ्री रेडिकल के प्रभाव से कोशिकाओं को बचाते हैं। 

शरीर की सफाई करते हैं एंटी ऑक्सीडेंट 
शरीर में बहुत सारी गतिविधियां होती हैं। हम खाना खाते हैं, उसका पाचन और अवशोषण होता है। मेटाबॉलिज्म में यह तय होता है कि इन पदार्थों में से कितना इस्तेमाल होगा और कितना संग्रह होगा। इस पूरी प्रक्रिया में मुख्य उत्पाद के साथ कई उप-उत्पाद भी बनते हैं। यह उप-उत्पाद दरअसल व्यर्थ पदार्थ होते हैं, जिन्हें कई बार शरीर बाहर नहीं निकाल पाता। एंटी ऑक्सीडेंट उनके साथ क्रिया करके शरीर को उनके नकारात्मक प्रभाव से बचाते हैं। एंटी ऑक्सीडेंट वैसे तो कई भोज्य पदार्थों में पाए जाते हैं, लेकिन ताजे फल और सब्जियों में यह सबसे अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। इन्हें स्कैवेंजर भी कहते हैं, क्योंकि यह फ्री रेडिकल्स को खाकर शरीर की सफाई करते हैं। 

स्वस्थ रहने के लिए जरूरी एंटी ऑक्सीडेंट 

-एंटी ऑक्सीडेंट कैंसर, हृदय रोगों, ब्लड प्रेशर, अल्जाइमर और दृष्टिहीनता के खतरे को कम करते हैं। 

-एंटी ऑक्सीडेंट बुढ़ापे के लक्षणों को धीमा करते हैं। विटामिन सी, विटामिन ई, बीटा-कैरोटिन और जिंक जैसे एंटी ऑक्सीडेंट एज रिलेटेड मैक्युलर डिजनरेशन से सुरक्षा करते हैं। 

-ल्युटिन हमारी आंखों की रोशनी बनाए रखने के लिए जरूरी है। 

-सेलेनियम त्वचा, बड़ी आंत और फेफड़े के कैंसर से सुरक्षा करता है। 

-एंटी ऑक्सीडेंट रोग प्रतिरोधक तंत्र को मजबूत बनाकर संक्रमणों से बचाते हैं। 

-कोशिकाओं में टॉक्सिन इकट्ठे होने से उनका डिजेनरेशन शुरू हो जाता है। यह टॉक्सिन को नष्ट कर कोशिकाओं को मृत होने से भी बचाते हैं। 

इनमें है भरपूर एंटी-ऑक्सीडेंट 
गाजर 
गाजर शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट बीटा-कैरोटिन से भरपूर होती है, जो स्वास्थ्यवर्धक कैरोटिनाइड परिवार का एक सदस्य है। यह शकरकंद, शलजम और पीली एवं नारंगी रंग की सब्जियों में होता है। यह कैंसर और हृदय रोगों से बचाता है। आर्थराइटिस के खतरे को 70 प्रतिशत तक कम करता है। 

टमाटर 
टमाटर में लाइकोपीन होता है। यह फेफड़े, बड़ी आंत और स्तन कैंसर से बचाता है और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को दुरुस्त रखता है। यह आंखों की मोतियाबिंद और मैक्युलर डिजनरेशन से रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। टमाटर में मौजूद ग्लुटाथियोन एंटी ऑक्सीडेंट इम्यून तंत्र को मजबूत करता है। 

ब्रोकली 
ब्रोकली, पत्तागोभी और फूल गोभी आदि सब्जियों में इंडोल्रू काबरेनेल पाया जाता है, जो ब्रेस्ट कैंसर के खतरे को कम करता है और एस्ट्रोजन के प्रति संवेदनशील कैंसर जैसे गर्भाशय तथा सरविक्स के कैंसर से भी बचाव करता है। 

चाय 
चाय हमें कैंसर, हृदय रोगों, स्ट्रोक और दूसरी बीमारियों से बचाती है। हरी और काली दोनों चाय काफी लाभदायक होती हैं। हरी चाय में जो कैटेचिन्स पाया जाता है, वह काली चाय बनाने में ऑक्सीडाइज्ड होकर थियाफ्लेविन बनाता है। यह भी फ्री रेडिकल्स से लड़ता है। 

लहसुन 
लहसुन एंटी ऑक्सीडेंट से भरपूर होता है जो कैंसर और हृदय रोगों से लड़ने में मददगार होता है और बढ़ती उम्र के प्रभावों को कम करता है। लहसुन में जो तीखी गंध होती है वह सल्फर के कारण होती है। यही उसके स्वास्थ्यवर्धक गुण का प्रमुख कारण है। लहसुन ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करता है। यह फ्री रेडिकल से मुकाबला करता है और रक्त का थक्का बनने से रोककर दिल की हिफाजत करता है(रॉकलैंड हॉस्पिटल की वरिष्ठ डायटीशियन सुनीता राय चौधरी से शमीम खान की बातचीत पर आधारित यह आलेख दैनिक हिंदुस्तान,दिल्ली में 20.12.12 को प्रकाशित है)।

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रविवार, 25 नवंबर 2012

खानपान के अजीबोग़रीब तरीक़ों से पैदा डिसऑर्डर

हेल्दी ईटिंग की आदत कई बार अनजाने ही ईटिंग डिसऑर्डर में बदल जाती है, जिसका परिणाम शारीरिक और मानसिक परेशानी के रूप में दिखाई देता है। ध्यान रखें कि कहीं आप ऑबसेस्ड तो नहीं हो रहे। 

बीते कुछ सालों में खानपान की आदतों में काफी बदलाव आया है। लोगों में बढ़ी हुई अवेयरनेस उन्हें जंक फूड छोड़कर संतुलित डायट की ओर ले जा रही है। वहीं इसी दिशा में एक्सट्रीम तक जाने वाले लोग भी हैं, जो अतिवाद के कारण कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। कुछ लोग फलाहार, वेगनिज्म आदि को इस हद तक फॉलो कर रहे हैं कि शरीर कई पोषक तत्वों से भी वंचित रह जाए। वहीं कुछ लोग खाकर उसे बाहर निकालने के लिए अजीबोगरीब तरीके फॉलो कर रहे हैं। इस श्रेणी के कुछ डिसऑर्डर्स- 

एनोरेक्जिया 
एनोरेक्जिया या एनोरेक्जिया नर्वोसा एक तरह की मनोवैज्ञानिक स्थिति है, जिसमें व्यक्ति वज़न बढ़ने के डर से खाने को भूखे रहने की हद तक कंट्रोल कर लेता है। अधिकतर इससे महिलाएं प्रभावित होती हैं, जिसमें टीनएज लड़िकयों से लेकर ३० पार की महिलाएं भी शामिल हैं। इसका कोई एक कारण नहीं है। नेशनल वीमन्स हेल्थ इंफॉर्मेशन सेंटर के अनुसार हॉर्मोनल बदलाव के अलावा सोशल और इमोशनल फैक्टर्स भी इसके पीछे हैं। स्लिम यानी ब्यूटीफुल की छवि पाने की कोशिश में इसे अनजाने ही अपनाते किशोरवय बच्चे पेरेंट्स के सामने भी इसे स्वीकारते हुए कतराते हैं। उन्हें जोर-जर्बदस्ती से कुछ खिलाने की बजाए उन्हें इस स्थिति से अवगत कराने की कोशिश करना कारगर हो सकता है। वहीं महिलाएं खुद अपनी स्थिति को देखने की कोशिश करें और अपने किसी करीबी से समस्या की चर्चा करें। 

बुलीमिया नर्वोसा 
यह गंभीर ईटिंग डिसऑर्डर है, जिसमें व्यक्ति अधिकतर समय खाने की आदतों पर कंट्रोल नहीं कर पाता लेकिन ज्यादा खाने के बाद उल्टी करने से लेकर, व्रत, लैक्सटिव, डाययुरेटिक और यहां तक कि बहुत ज्यादा व्यायाम करता है ताकि वजन न बढ़े। वे अपने एपीयरेंस को लेकर अतिसंवेदनशील होते हैं लेकिन स्किनी दिखने की चाह उन्हें तनावग्रस्त कर देती है। ये एनोरेक्जिया से अलग है, जहां व्यक्ति भूखे रहने लगता है। बुलीमिया में ज्यादा खाकर उसे शरीर के भीतर न रहने देने की कोशिश होती है। चूंकि समस्याग्रस्त व्यक्ति सबके सामने अच्छी तरह से खाता है और उसे पेट में न रहने देने की क्रिया छिपकर करता है इसलिए समस्या तब तक पकड़ में नहीं आती, जब तक कि कोई गंभीर परेशानी न हो जाए। 

ऑर्थोरेक्जिया नर्वोसा 
यह सबसे अनोखी समस्या है, जो हाल में बढ़ी है। इसमें व्यक्ति खाने की क्वांटिटी पर नहीं , बल्कि खाने की क्वालिटी पर ओवर-फोकस्ड रहने लगता है। संतुलित खाने के प्रति किसी का इतना संवेदनशील हो जाना कि कुछ खास तरह की चीजें खाना संतुलन को ग़लत तरह से प्रभावित करने लगता है। ऐसे लोग क्रमशः खाने को कुछ खास चीजों तक ही लिमिटेड करते जाते हैं और "राइट फूड" के लिए इतने संवेदनशील हो जाते हैं कि हर व्यक्ति की आलोचना करने लगते हैं, जो उन-सा न हो। इनका सामाजिक दायरा भी बहुत छोटा होता है क्योंकि खाने की लिमिटेड पसंद इन्हें कई बार भूखा भी रखने लगती है।

ये हैं नुकसान 
ईटिंग डिसऑर्डर से कई तरह की समस्याएं होने लगती हैं। गौरतलब है कि ऐसे डिसऑर्डर्स की आशंका मिडिल और उच्च वर्ग को ही होती है क्योंकि कई बार ये अपीयरेंस के लिए अति-संवेदनशील होते हैं। चूंकि किशोरियां सबसे ज्यादा वल्नरेबल होती हैं, इसलिए ये डिसऑर्डर उनके विकास को प्रभावित करते हैं। इनसे एनीमिया, थॉयरॉइड असंतुलन, लो ब्लडप्रेशर, हड्डियां और बाल-नाखून कमज़ोर होना, जोड़ों में सूजन से लेकर फेटल समस्याएं भी हो सकती हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि पेरेंट्स बच्चों को विश्वास में लें और उनमें अपीयरेंस को लेकर आत्मविश्वास की कमी न आने न दें। लंबे समय तक पकड़ में न आने पर बढ़ती उम्र के बच्चों में इससे बहुत सी परेशानियां पैदा हो सकती हैं इसलिए डायग्नोस होना उपचार की दिशा में पहला कदम है(सेहत,नई दुनिया,नवम्बर द्वितीयांक 2012)

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गुरुवार, 19 जुलाई 2012

एक ही तेल का लगातार इस्तेमाल ठीक नहीं

कुकिंग ऑयल हमारे खाने का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। सही कुकिंग ऑयल और कुकिंग ऑयल का सही इस्तेमाल हमारे जीवन में बहुत अहमियत रखता है। आमतौर पर लोग खाने के तेल को लेकर ज्यादा गंभीर नहीं होते, यह ठीक नहीं है। आपकी थोड़ी-सी लापरवाही आपके परिवार की सेहत पर भारी पड़ सकती है।

कुकिंग ऑयल के चयन और इस्तेमाल को लेकर ज्यादातर लोग अक्सर दुविधा में रहते हैं। तरह-तरह के विज्ञापनों ने हमारी इस उलझन को और भी बढ़ा दिया है, क्योंकि हर तेल सेहतमंद होने का दावा करता है। लेकिन किसका दावा सच्चा है और किसका झूठा, यह तय कर पाना सबसे मुश्किल होता है। हेल्थ एक्सपर्ट की मानें तो तेल चुनते समय इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि आप जहां रहते हैं, वहां की जलवायु कैसी है और वहां कौन-कौन से परंपरागत तेलों का उपयोग किया जाता है। भारत के हर इलाके की भौगोलिक परिस्थितियां भी अलग-अलग हैं। यही वजह है कि हर स्थान का अलग खानपान होता है, जो वहां के मौसम के अनुकूल होता है। खाने के तेल पर भी ये बातें लागू होती हैं। एक्सपर्ट्स कहते हैं, अगर कुछ बातों को छोड़ दें तो हर तेल में कुछ औषधीय गुण होते हैं, इसलिए तेल का चुनाव करते वक्त शरीर की जरूरतों का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है-श्रीबालाजी एक्शन इंस्टीटय़ूट की सीनियर डाइटीशियन 

डॉ़ शिवानी पासी के अनुसार, ‘कुकिंग ऑयल में चार तरह की वसा होती है- सैचुरेटेड (संतृप्त), मोनो अनसैचुरेटेड (एकल असंतृप्त), पॉली अनसैचुरेटेड(बहुसंतृप्त) और ट्रांस फैट एसिड। सैचुरेटेड व ट्रांस फैट एसिड हमारे शरीर के लिए नुकसानदेह हैं। यह शरीर में एलडीएल कोलेस्ट्रॉल बढ़ाती है। इसलिए इसका उपयोग सीमित मात्र में होना चाहिए। दिन में कुल तीन से चार छोटे चम्मच (15-20 मि.ली.) खाना पकाने का तेल ही प्रयोग करना चाहिए। बाकी वसा की जरूरतें अनाज, दूध, दाल व सब्जियों से पूरी हो जाती हैं। 

बदलते रहें तेल 
नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ न्यूट्रिशन, हैदराबाद के वैज्ञानिकों ने एक शोध के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि लगातार एक ही तेल का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। थोड़े-थोड़े समय के अंतराल पर तेल बदलते रहना चाहिए। इससे दिल की बीमारियां, मोटापा, शुगर व तेल के कारण होने वाली अन्य बीमारियों की आशंका कम हो जाती है। वैज्ञानिकों ने खाने वाले तेल को दो भागों में बांटा है। समूह ए में सरसों और सोयाबीन के तेल हैं, जिनमें ओमेगा 3 पाया जाता है और समूह बी में सूरजमुखी, मूंगफली जैसे तेल रखे गए हैं, जिनमें ओमेगा 6 होता है। यदि आप बदल-बदल कर तेल इस्तेमाल करेंगी तो ओमेगा 3 और ओमेगा 6 दोनों की जरूरतें पूरी हो जाएंगी। 

तेल कैसे-कैसे 
लगातार हो रहे शोधों से यह बात सामने आई है कि वनस्पति घी सेहत के लिए बहुत खतरनाक है। इसे खाने से हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक तेल के मामले में रिफाइंड ऑयल ही सबसे अच्छा विकल्प है। देसी घी का सेवन भी सीमित मात्र में ही किया जाना चाहिए, क्योंकि यह भी धमनियों में जम जाता है। 

माइक्रोवेव, स्टीमिंग, स्टिर फ्राइंग, ग्रिलिंग और रोस्टिंग, खाना पकाने की कुछ ऐसी विधियां हैं, जिनमें कम से कम या जीरो ऑयल कुकिंग की जाती है। ये स्वास्थ्य के लिहाज से खाना पकाने की बहुत ही सुरक्षित विधियां हैं। डाइटीशियन डॉं नंदिनी भाटिया का कहना है कि इन तरीकों से बनाए गए खाने में पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं और घी या तेल की जरूरत भी कम या ना के बराबर ही होती है। चटपटा, तीखा और स्वादिष्ट खाने के लालच में खाने के पोषक तत्वों को हम लगभग खत्म कर देते हैं। यह हमारे भोजन और हमारे स्वास्थ्य दोनों के लिए अच्छा नहीं है। 

-सूरजमुखी का तेल दिल की बीमारियों में फायदेमंद 

-सोयाबीन का तेल तलने के लिए उपयुक्त नहीं 

-सरसों के तेल से दिल की बीमारियों की आशंका होती है 70 प्रतिशत कम -नारियल के तेल से करें दिल के मरीज परहेज 

-मूंगफली का तेल रखता है कोलेस्ट्रॉल के स्तर को सामान्य 

-राइस ब्रॉन तेल एलडीएल का स्तर रखता है कम 

-ऑलिव ऑयल से शरीर में फैट डिस्ट्रीब्यूशन रहता है नियंत्रित 

किस तेल के क्या हैं गुण और अवगुण 
सोयाबीन का तेल: मध्य भारत में इस तेल का सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाता है। यह शरीर में एलडीएल और एचडीएल में संतुलन बनाकर रखता है, पर तलने के लिए यह उपयुक्त तेल नहीं है। 

सरसों का तेल: सरसों के तेल का प्रयोग पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार आदि में काफी होता है। सरसों के तेल में मोनो अनसैचुरेटेड फैटी एसिड व पॉली अनसैचुरेटेड फैटी एसिड अधिक मात्र में होते हैं। कोलेस्ट्रॉल व एलडीएल कम होता है। इस तेल में तले खाद्य पदार्थ सेहत के लिए अच्छे हैं। पर हमेशा इसका उपयोग न करें। इसमें मौजूद यूरोसिक एसिड नुकसान पहुंचाता है। इसके साथ-साथ अन्य तेल भी कुकिंग के दौरान इस्तेमाल करें। यह दिल की बीमारियां होने की आशंका 70 प्रतिशत कम कर देता है। इसमें विटामिन अच्छी मात्र है। 

नारियल तेल: इसमें सैचुरेटेड फैट होते हैं, लेकिन कोलेस्ट्रॉल नहीं होता। यह तेल सेहत के लिहाज से ठीक है, लेकिन इसके साथ अन्य तेलों का प्रयोग करना चाहिए। डीप फ्राई के लिए यह उपयुक्त नहीं है। यह वायरस, फंगस और बैक्टीरिया से हमारे शरीर की रक्षा करता है। कॉर्डियोलॉजिस्ट की राय में दिल के मरीजों को नारियल के तेल से परहेज करना चाहिए। 

मूंगफली का तेल: मूंगफली के तेल में मोनो अनसैचुरेटेड फैट होते हैं। यह हमारे एलडीएल को कम करता है और गुड कोलेस्ट्रॉल के स्तर भी सामान्य रखता है। इसका प्रयोग तलने या कुकिंग में किसी भी तरह से किया जा सकता है। 

राइस ब्रॉन तेल: इसे धान के छिलकों से तैयार करते है। कुछ समय पहले तक इसका इस्तेमाल विदेशों में ही किया जाता था, लेकिन अब भारत में भी यह प्रयोग किया जा रहा है। इसमें मोनो अनसैचुरेटेड फैट्स होते हैं, जो सेहत की दृष्टि से ठीक हैं। यह एलडीएल का स्तर कम रखता है और त्वचा के लिए भी फायदेमंद है। इसका इस्तेमाल तलने के लिए भी किया जा सकता है। 

ऑलिव ऑयल: इस तेल का सबसे ज्यादा उपयोग विदेशों में होता है, पर अब भारत में भी इसका इस्तेमाल हो रहा है। इसमें मोनोसैचुरेटेड फैट्स होते हैं। इस तेल के सेवन से शरीर में फैट डिस्ट्रीब्यूशन नियंत्रित रहता है, अतिरिक्त चर्बी इकट्ठा नहीं होती है। पर इस तेल का उपयोग तलने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। 

कॉर्न ऑयल: इसमें सैचुरेटेड फैट्स कम होते हैं। यह भी कोलेस्ट्रॉल पर नियंत्रण रखता है और एचडीएल, एलडीएल नहीं बढ़ता है। लेकिन इसका सेवन कम करना चाहिए। इस तेल का लगातार सेवन स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है(मृदुला भारद्वाज,हिंदुस्तान,दिल्ली,12.7.12)।

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सोमवार, 18 जून 2012

खाएँ या न खाएँ चॉकलेट?

चॉकलेट अब हमारी जन्मदिन पार्टियों और त्योहारों का हिस्सा बन गई है। बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों को चॉकलेट खाने के लिए लुभाने वाले विज्ञापन टेलीविजन पर छाए रहते हैं। आज भी आम आदमी के मन में चॉकलेट के बारे में बहुत स्पष्ट मत नहीं है कि यह स्वास्थ्य के लिए अच्छी है या बुरी। चॉकलेट में अच्छे और बुरे दोनों ही तरह के गुण होते हैं लेकिन खाने वाले को जानकारी के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। इसलिए अपनी चॉकलेट चुनने और खाने से पहले कुछ बातें जानना ज़रूरी है। 

फायदे
-जर्मनी के हेनरिच हेन विश्वविद्यालय में चॉकलेट खाने वालों पर एक शोध किया गया। चॉकलेट खाने वालों को छह सप्ताह के लिए पराबैंगनी प्रकाश में जाने को कहा। चॉकलेट खाने वाले वालों की त्वचा इस तरह के प्रकाश से १५ प्रतिशत तक कम प्रभावित हुई। शोध करने वालों का मानना है कि चॉकलेट में पराबैंगनी किरणों से लड़ने वाले तत्व होते हैं।

-जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया कि स्तन कैंसर की कोशिकाएँ चॉकलेट में पाए जाने वाले फ्लेवेनोल की वजह से बहुगुणित नहीं होती है।

-हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के डॉ. नार्मन होलेनबर्ग का मानना है कि कोको का सेवन करने वालों में हृदयाघात, हृदयरोग, कैंसर और मधुमेह की आशंका १० प्रतिशत तक कम होती है। कोको में एक तत्व पाया जाता है जो नाइट्रिक ऑक्साइड को बढ़ाता है। नाइट्रिक ऑक्साइड रक्त वाहिनियों को फैलाकर रक्त संचार को सुचारू बनाता है।

-ब्रिटेन के नॉटिंघम विश्वविद्यालय में शोधकर्ताओं ने पाया कि फ्लेवेनॉल से भरपूर कोको मस्तिष्क तक रक्त संचार को बेहतर करता है। कोको स्मृतिभ्रंश (डिमेंशिया) और अल्ज़ाइमर्स जैसे मानसिक रोगों में भी फायदेमंद हो सकता है। 

-लगातार थकान महसूस करने वालों को डार्क चॉकलेट फायदा पहुँचाती है। शोधार्थियों का मानना है कि यह न्यूरोट्रांसमीटर्स को रेगुलेट करती है और इससे नींद और मूड अच्छा रहता है। 

नुक़सान 
-ऑस्ट्रेलिया के सिडनी स्थित प्रिंस ऑफ वेल्स हॉस्पिटल के शोधकर्ताओं के अनुसार चॉकलेट खाने से थोड़े समय के लिए भले ही मूड अच्छा हो जाए लेकिन चॉकलेट का असर खत्म होते ही यह फिर बिगड़ सकता है। खराब मूड को अच्छा करने के लिए एक एंटीडिप्रेसेंट टेबलेट खाना ज़्यादा अच्छा है क्योंकि इसकी जगह चॉकलेट बहुत अधिक मात्रा में लेने से ही फायदा होगा।

-चॉकलेट में पाए जाने वाले एक तत्व की वजह से उसका स्वाद हल्का कड़वा रहता है। कई बार चॉकलेट को पसंदीदा बनाने के लिए उसमें से इस तरह के उपयोगी फ्लेवेनोल्स को निकाल दिया जाता है। ज़्यादा मीठी चॉकलेट से दूर रहने में ही भलाई है। दूध वाली चॉकलेट के बजाय डार्क चॉकलेट लेना फायदेमंद होता है। खाना ही हो तो ऐसी चॉकलेट खाएँ जिसमें कोको की मात्रा कम से कम ६० प्रतिशत हो।

-चॉकलेट का एक बड़ा दुर्गुण यह है कि उसमें खूब वसा होती है। चॉकलेट से मिलने वाली उर्जा में ५० प्रतिशत फैट की वजह से होती है। हालाँकि चॉकलेट में तो आधी संतृप्त वसा स्टीअरिक एसिड होती है जो अच्छे कोलेस्टेरॉल को बढ़ाने में मदद करती है और बुरे को कम करती है। चॉकलेट में पाया वसा की मात्रा अधिक होती है।

-बुजुर्ग महिलाओं पर हुए एक अध्ययन में सामने आया कि जो रोज चॉकलेट खाते हैं उनकी हड्डियाँ मजबूत नहीं होती हैं। इसका कारण है कि चॉकलेट में पाया जाने वाले ऑक्सालेट से कैल्शियम का अवशोषण अवरूद्घ होता है।

तो कैसी चॉकलेट खाएँ 
कनाडा में प्रति व्यक्ति चॉकलेट की खपत बहुत ज़्यादा है। वहाँ की खानपान की आदत में चॉकलेट शुमार है। चॉकलेट से रक्त में एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा बढ़ाती है और कई अन्य फायदे भी हैं लेकिन चॉकलेट का चयन करते वक्त उसके कोको कंटेंट पर ध्यान देना चाहिए। हमेशा ज़्यादा कोको कंटेंट वाली चॉकलेट ही चुनें। इसके अलावा इस बाद का भी ध्यान रखें कि जब चॉकलेट में दूध ज़्यादा हो तो उसके लाभ पहुँचाने वाले गुण समाप्त हो जाते हैं। शोधकर्ता मानते हैं कि ७० प्रतिशत कोको वाली चॉकलेट या डॉर्क चॉकलेट स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होती है लेकिन यह भी ध्यान रहे कि किसी भी चीज़ को एक सीमा में लिया जाए तो ही यह फायदेमंद होती है(सेहत,नई दुनिया,जून द्वितीयांक 2012)। 


आज के नवभारत टाइम्स में भी नवभारत टाइम्स ने डार्क चॉकलेट पर प्रकाश डाला हैः 


कई स्टडीज बताती हैं कि डार्क चॉकलेट्स से कई हेल्थ बेनेफिट्स हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर डार्क चॉकलेट आपके लिए फायदेमंद होगी। जानते हैं इस बारे में कुछ फैक्ट्स: 


चॉकलेट्स हमारी लाइफस्टाइल से इस तरह से जुड़ गई हैं कि इनके बगैर कहीं भी बात नहीं बनती। वैसे भी , रिसर्च बताती हैं कि कोको का प्रॉडक्शन पिछले कुछ दशकों में कई गुना बढ़ चुका है। दरअसल , चॉकलेट्स के हेल्थ बेनेफिट्स के बारे में जानकर हमें इसे खाते हुए कोई गिल्ट-फीलिंग भी नहीं होती। लेकिन यहां कुछ बातों पर गौर करने की जरूरत है। 


कोको है इंपॉर्टेंट 
गौरतलब है कि फ्लेवेनॉयड्स और फ्लेवेनॉल्स एक तरह के प्लांट मोलिक्यूल्स हैं। ये कलर्ड वेजीटेबल्स , टी , वाइन और चॉकलेट में मौजूद होते हैं। न्यूट्रीशनिस्ट डॉ. सुरभि तोमर बताती हैं कि कोको में एपिकाटेसीन मौजूद होते हैं , जो ब्लड फ्लो को बढ़ाते हैं और हार्ट को हेल्दी रखते हैं। 


डार्क चॉकलेट का मेजर इंग्रीडियेंट कोको ही होता है। जाहिर है कि वाइट और मिल्क चॉकलेट में एपिकाटेसीन नहीं होगा। फिर इससे सेहत को भी कोई फायदा नहीं होगा। 


फायदे फ्लेवेनॉल्स के 
कुछ स्टडीज बताती हैं कि फ्लेवेनॉल्स हार्ट अटैक के रिस्क को 50 पर्सेंट कम कर सकते हैं। वहीं इनसे कोरोनरी डिजीज को 10 पर्सेंट और प्रिमच्योर डेथ को 8 पर्सेंट तक कम किया जा सकता है। यही नहीं , बॉडी मेटाबॉलिक शुगर की हेल्प करके ये डिवेलपिंग डायबिटीज के रिस्क को भी कम कर देती हैं। 


इसके अलावा , ये गुड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ावा देती हैं और बैड कोलस्ट्रॉल को कम करती हैं। एक रिसर्च यह भी बताती है कि डार्क चॉकलेट को खाने के दो-तीन घंटे बाद ब्रेन का ब्लड सर्कुलेशन बढ़ जाता है। 


60 पर्सेंट कोको 
एक्सपर्ट्स की मानें तो , डार्क चॉकलेट्स को अपने बेनेफिशल इफेक्ट्स के लिए 60 पर्सेंट कोको चाहिए। यही नहीं , जब इसमें 75-85 पर्सेंट कोको मौजूद होगा , तब यह ज्यादा इफेक्टिव होगा। खास बात यह है कि इस लेवल के कोको के प्रेजेंट होने के बाद चॉकलेट टेस्टी नहीं हो सकती। 


दरअसल , डार्क कलर होने भर से डार्क चॉकलेट नहीं बनती। यह कलर तो कोको सॉलिड्स की वजह से आता है , जबकि चॉकलेट में कोको की उतनी क्वॉन्टिटी नहीं होती। चॉकलेट मनुफैक्चर्स फ्लेवेनॉल्स को पहले ही रिमूव कर देते हैं , क्योंकि इसका टेस्ट कड़वा होता है। फिर इस बारे में प्रॉडक्ट पर भी कोई रिटन इंफर्मेशन नहीं होती। 


इसकी तरह एंटरऑक्सिडेंट्स भी नहीं के बराबर रह जाते हैं। जाहिर है , अगर आपको फ्लेवेनॉयड्स और फ्लेवेनॉल्स के बेनेफिट्स चाहिए , तो फ्रूट्स , टी और रेड वाइन को अपनी डाइट में शामिल करना होगा।

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रविवार, 17 जून 2012

कौन-सा आइसक्रीम बेहतर है?

गर्मियों के मौसम में आइसक्रीम से अधिक ललचाने वाली कोई और स्वीटडिश नहीं होती। शादी-ब्याह के मौकों पर बच्चों को आइसक्रीम के स्टॉल से दूर रखना मुश्किल होता है। कई लोग नहीं जानते कि आइसक्रीम का भी मादक दवाओं की तरह एडिक्शन हो सकता है। आइसक्रीम के "नशे"को लेकर हाल ही में अमेरिका में हुए एक शोध के मुताबिक एक समय ऐसा आता है जब एक कप आइसक्रीम से खाने वाले को "तसल्ली" नहीं होती।

इस शोध अध्ययन में वैज्ञानिकों ने किशोरों के दो समूहों को एक साथ शोध में शामिल किया। एक समूह के किशोर नियमित रूप से आइसक्रीम खाने के आदी थे जबकि दूसरे समूह के किशोर कभी-कभार ही आइसक्रीम खाते थे। जिस समूह के किशोर कभी-कभार ही आइसक्रीम खाते थे उन्हें आधा कप आइसक्रीम से ही तसल्ली हो जाती थी क्योंकि उनके मस्तिष्क के केंद्र से संतुष्टि का संकेत आ जाता था जबकि नियमित आइसक्रीम खाने वाले किशोरों के मस्तिष्क से संतुष्टि का संकेत कई कप आइसक्रीम खाने के बाद ही आता था।

किसमें है ज़्यादा कैलोरी 
अमेरिका स्थित सेंटर फॉर साइंस इन द पब्लिक इंटरेस्ट के वैज्ञानिकों का मानना है कि मिल्कशेक में आइसक्रीम से अधिक कैलोरी होती है। इसी तरह तले हुए आलूओं में ५४० कैलोरी होती हैं जबकि आइसक्रीम के एक स्कूप में २५० से ३५० तक कैलोरी होती है। 

लो फैट लाइट आइसक्रीम
लो फैट लाइट आइसक्रीम में रेग्युलर आइसक्रीम की तुलना में ५० प्रतिशत वसा कम होती है तथा कैलोरी भी ३३ प्रतिशत तक कम होती है। पर इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई जितनी चाहे लाइट आइसक्रीम खा ले। हमेशा लेबल पर वसा की मात्रा जांच लेना चाहिए। हो सकता है कि लाइट आइसक्रीम में सामान्य से अधिक वसा हो। कप की साइज पर भी ध्यान दें और ऱछोटे-छोटे चम्मच से आइसक्रीम लेकर खाएं। 

सिरदर्द हो सकता है आइसक्रीम से 
जो चीज़ मज़ा लेने के लिए खाई जा रही है,वही सिरदर्द का कारण भी बन सकती है। कुछ लोगों को आइसक्रीम हेडैक भी होता है। इसे ब्रेन फ्रीज कहा जाता है। ऐसा इसलिए होता है कि आइसक्रीम मुंह में जाते ही तालु को ठंडा कर देती है। इससे वह नाड़ी भी प्रभावित होती है जो मस्तिष्क तक प्रवाहित होने वाली रक्तकोशिका का नियंत्रण करती है। इस नाड़ी की वजह से रक्त नलिकाएं सूज जाती हैं और इससे सिरदर्द होने लगता है। इससे बचने का एक ही तरीक़ा है कि ठंडे खाद्य अथवा पेय पदार्थों को बहुत धीरे-धीरे आनंद लेते हुए खाएं अथवा पिएं।

कौन सा कोन बेहतर 
आइसक्रीम के कोन दो तरह के होते हैं। एक शक्कर का बना होता है,दूसरा बिस्किट की तरह कुरकुरा होता है। शक्कर के कोन में जहां 60-80 कैलोरी होती है,वहीं कुरकुरे कोन में 320 से भी अधिक कैलोरी होती है। इससे बचने का सबसे अच्छा तरीक़ा यही है कि पेपर कप अथवा कांच के बने कप में आइसक्रीम खाएं(सेहत,नई दुनिया,जून द्वितीयांक 2012)


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गुरुवार, 17 मई 2012

....ताकि ज़हर न बने शहद

शहद को आयुर्वेद में अमृत माना गया है। रोजाना सही ढंग से शहद लेना सेहत के लिए अच्छा होता है। लेकिन गलत तरीके से शहद का सेवन करने से फायदे की जगह नुकसान भी हो सकता है। इसलिए जब भी शहद का सेवन करें नीचे लिखी बातों को जरूर ध्यान में रखें। 

- चाय, कॉफी में शहद का उपयोग नहीं करना चाहिए। शहद का इनके साथ सेवन जहर के समान काम करता है। 

- अमरूद, गन्ना, अंगूर, खट्टे फलों के साथ शहद अमृत है। 

- इसे आग पर कभी न तपायें। 

- मांस, मछली के साथ शहद का सेवन जहर के समान है। 

- शहद में पानी या दूध बराबर मात्रा में हानिकारक है। 

- चीनी के साथ शहद मिलाना अमृत में विष मिलाने के समान है। 

- एक साथ अधिक मात्रा में शहद न लें। ऐसा करना नुकसानदायक होता है। शहद दिन में दो या तीन बार एक चम्मच लें। 

- घी, तेल, मक्खन में शहद जहर के समान है। 

- शहद खाकर किसी तरह की परेशानी महसूस हो रही हो तो नींबू का सेवन करें(दैनिक भास्कर,उज्जैन,5.5.12)।

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मंगलवार, 15 मई 2012

क्या आपका बच्चा भी मिट्टी खाता है?

बच्चों में मिट्टी खाने की आदत लाइलाज नहीं है लेकिन पहले उसकी तह में जाना होगा कि वह मिट्टी क्यों खाता है। सर्वप्रथम तो बच्चों के साथ प्यार और सहानुभूति से पेश आएं। यह देखें कि मां होने के नाते आप अपना फर्ज पूरा कर रही हैं या नहीं? एक मां का कर्तव्य है कि वह अपने शिशु को पर्याप्त अवधि तक स्तनपान कराए अपने साथ सुलाए ताकि वह अपने आपको सुरक्षित महसूस कर सके। इसी प्रकार यदि आप कामकाजी महिला हैं तो बच्चे के लिए भी समय निकालें, न कि उसे अपने हाल पर छोड़ दें। जितने समय भी आप घर में रहें उसे प्यार, दुलार दें, दुत्कार नहीं। 

बच्चे को उसकी इस आदत के लिए उसे दूसरों के सामने प्रताडि़त या अपमानित नहीं करें अन्यथा उसमें मनोवैज्ञानिक कुंठाएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए उसे अकेले में प्यार से समझाएं कि यह प्रवृत्ति ठीक नहीं है। उसकी आदत छुड़ाने के लिए उसके हाथ बांध देना या उसे मारना ठीक नहीं। इससे वे ढीठ हो जाते हैं। यदि उसका साथ मिट्टी खाने वाले बच्चों से है, तो वह छुड़ाइये। ऐसे बच्चे को सृजनात्मक कार्यों में जोड़ें या उसकी रुचि के अनुकूल कार्यों में व्यस्त कर दें ताकि उसे मिट्टी खाने का अवसर ही नहीं मिले। मिट्टी खाने वाले बच्चों में आंत्रकृमि की शिकायत होती है अत: उनके मल की जांच करा कर कृमिनाशक दवाइयां देना बहुत जरूरी है। इसी प्रकार उन्हें लोहतत्व की प्रधानता वाला भोजन दें ताकि शरीर में खून की कमी दूर हो सके। डाक्टर के परामर्श से उन्हें कैल्शियम भी दिया जा सकता है। इसके अलावा उनकी छाती का एक्स-रे भी कराना चाहिए ताकि पता चल सके कि कहीं वह प्राइमरी काम्प्लेक्स के शिकार तो नहीं है? अन्यथा उसका उपचार भी कराना होगा। 

यदि आपको लगता है कि आप प्रयास करते-करते थक गई हैं फिर भी वह अपनी आदत नहीं छोड़ रहा, तो उसे किसी मनोवैज्ञानिक के पास ले जाएं। मनोचिकित्सक के पास इस समस्या का समाधान है। सामाजिक दृष्टि से भी ऐसे बच्चों का लोग मजाक बनाते हैं जिससे उनमें हीनभावना पैदा होने लगती है और उनका व्यक्तित्व विकास रुक जाता है। ऐसे बच्चे एकांत में रहना पसंद करते हैं। (डा. विनोद गुप्ता,दैनिक ट्रिब्यून,7.5.12 )।

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मंगलवार, 8 मई 2012

ऑर्गेनिक फूड से जुड़ी कुछ ज़रूरी जानकारियां

ऑर्गेनिक फूड्स बेशक कीमती हों, पर स्वास्थ्य के लिहाज से ये बेहतर हैं। इसलिए लोग इसे तेजी से अपना भी रहे हैं। बढ़ती लोकप्रियता की वजह से इसका बाजार बढ़ रहा है। ऑर्गेनिक फूड क्या हैं और इसके फायदे क्या-क्या हैं, बता रही हैं सुषमा कुमारीः 

बोलचाल की भाषा में कहें तो ऑर्गेनिक फूड्स वे फूड्स हैं, जिन्हें किसी केमिकल का इस्तेमाल किए बगैर तैयार और पैक किया जाता है। स्वास्थ्य के लिहाज से ये अन्य फूड्स के मुकाबले बेहतर माने जाने हैं। इस कारण ऑर्गेनिक फूड इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है। ऑर्गेनिक फूड में न केवल फल, सब्जियां और अनाज आते हैं, बल्कि यह मांसाहारियों के लिए भी उपलब्ध हैं। 

ऐसे फूड्स हमें दिल से जुड़ी बीमारियों और कैंसर से बचाते हैं क्योंकि वे फेनॉलिक अवयव लिए होते हैं। यह उच्च गुणवत्ता के होने का यकीन दिलाता है, लेकिन अन्य पारंपरिक फूड्स के साथ ऐसा नहीं है। प्राकृतिक व ताजा होने के कारण ऑर्गेनिक फूड टेस्टी भी होता है। बाजार में खरीदने पर सामान्य फूड्स के मुकाबले यह 20 प्रतिशत तक महंगा पड़ता है। इस कारण बहुत से लोग अपने घर के बागीचे में ही ऑर्गेनिक फूड उगाना पसंद करते हैं। 

पौष्टिकता से भरपूर 
ऑर्गेनिक फूड को प्रामाणिक फूड भी कहा जाता है। यानी उत्पादन मानकों को ध्यान में रखकर इन्हें तैयार किया जाता है। इन्हें ऑर्गेनिक फार्म में उपजाया जाता है। उत्पादन के दौरान मान्यता प्राप्त विशेषज्ञ इस पर नजर रखता है। सामान्य फूड के उलट ऑर्गेनिक फूड उत्पाद सामान्यतया पेस्टिसाइड्स और केमिकल फर्टिलाइजर्स के बिना ही उपजाया जाता है। सामान्य फूड्स और इनमें अंतर कर पाना मुश्किल होता है, क्योंकि रंग, आकार और प्रकार में वे एक जैसे दिखते हैं। 

पहले केवल छोटे परिवार ही अपने बगीचे में ऑर्गेनिक फूड्स उपजाते थे। इससे बड़े स्तर पर उनकी उपलब्धता नहीं हो पाती थी। ऑर्गेनिक फूड्स केवल छोटे स्टोर्स और किसानों के बाजारों में ही मिल पाते थे। लेकिन आज ये दिल्ली में जगह-जगह उपलब्ध हैं। इसकी गुणवत्ता लोगों को खूब आकर्षित भी कर रही है। 

इसके फायदे 
ऑर्गेनिक तौर पर उपजाए गए ये फूड्स प्राकृतिक होते हैं, जिन्हें उपजाने के लिए किसी भी तरह के केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। 

-ये फूड्स पौष्टिकता और स्वाद से भरपूर होते हैं। हालांकि ये उतने कलरफुल और प्रेजेंटेबल नजर नहीं आते जैसे कि दुकानों में सजाकर रखे जाते हैं। 

-ऑर्गेनिक फूड्स पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचाते। ये उपजाऊ मिट्टी की ऊपरी सतह को नुकसान नहीं पहुंचाते। नतीजतन प्रकृति के और भी करीब कहे जा सकते हैं। 

-शोध बताते हैं कि पारंपरिक फूड के मुकाबले ऑर्गेनिक फूड 10 से 50 प्रतिशत तक अधिक पौष्टिक होते हैं। 

-ऑर्गेनिक फूड का अधिक से अधिक इस्तेमाल करके आप स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के खतरों को कम कर सकते हैं। 

-प्रमाणन निकाय के अधिकारी नियमित रूप से उन फार्म या प्लांट की जांच के लिए दौरे पर आते रहते हैं, जहां ऑर्गेनिक फूड स्टफ्स उपजाए जाते हैं। वे जांचते रहते हैं कि ये फूड तय गुणवत्ता को ध्यान में रखकर उपजाए जा रहे हैं या नहीं। यही वजह और गुण हैं कि ये पारंपरिक फूड को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। 

-ऑर्गेनिक फूड्स पर अक्सर लेबल्स लगे होते हैं, इसलिए आप अन्य फूड के मुकाबले उन्हें आसानी से अलग कर सकते हैं या उनकी पहचान कर सकते हैं। 

-पारंपरिक फूड के मुकाबले ऑर्गेनिक फूड लंबे समय तक सुरक्षित रहता है। ऑर्गेनिक फूड में फेनॉलिक कंपाउंड्स मौजूद होते हैं जो हमारे दिल को कार्डियोवस्कुलर रोग और कैंसर के खतरों से बचाकर रखता है। 

-फूड फार्म एनिमल्स भी ऑर्गेनिक फार्मिग के तहत आते हैं जिनकी देखभाल ग्रोथ हार्मोस का प्रयोग किए बिना ही की जाती है। किसान इन बातों का खास ख्याल रखते हैं कि इन जानवरों को अच्छा और संतुलित खानपान दिया जाए। 

-ऑर्गेनिक फॉर्म्स में उपजाए जाने वाले फलों और सब्जियों में अन्य जरिए से की जाने वाली पैदावार के मुकाबले अधिक एंटीऑक्सीडेंट्स मौजूद होते हैं। 

ऑर्गेनिक फूड्स खरीदने के पहले 
-उत्पादन और प्रसंस्करण की निगरानी करने वाले आधिकारिक प्रमाणन निकाय की ओर से पैकेट पर लगे लेबल या लोगो को जरूर देख लें। 

-आपके आसपास ऑर्गेनिक फूड बेचने के लिए अधिकृत संगठनों से जुड़ी जानकारी अवश्य रखें। 

-अलग-अलग दुकानों में जाकर विभिन्न फूड आइटम्स की कीमत से जुड़ी जानकारी लें, फिर उसी अनुसार खरीदारी करें। 

-ऑर्गेनिक फूड्स की कीमतों में 10 से 200 प्रतिशत तक का अंतर हो सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि दुकानदार सामान कहां से खरीदकर लाया है? 

इनकी है मांग 
ऑर्गेनिक चाय, कॉफी, दूध, शहद, सब्जियां, फल, चावल, दाल, तेल, नारियल तेल, जैतून का तेल, शराब, मटन आदि(हिंदुस्तान,दिल्ली,19.4.12)।

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रविवार, 6 मई 2012

आरामतलबी में एनर्जी ड्रिंक से बचें

ऐसे लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जो स्पोर्ट्स एनर्जी ड्रिंक्स पीते हुए अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं। एनर्जी ड्रिंक्स बहुत मेहनत वाली कसरतों के साथ इस्तेमाल की जानी चाहिए जबकि ये लोग ऑफिस में बैठे-बैठे एनर्जी ड्रिंक्स की कई बोतल गले में उतार देते हैं। इसके नतीजे बीमारियों के रूप में सामने आ रहे हैं। 

यह जानकारी एक शोध अध्ययन से सामने आई है कि स्पोर्ट्स एनर्जी ड्रिंक के ग़लत इस्तेमाल से कई लोगों ने अपनी जिंदगी को जोखिम में डाल दिया है। एनर्जी ड्रिंक्स में शक्कर बहुत अधिक डाली जाती है ताकि एथलीट या तीव्र कसरत करने वाले तत्काल ताकत हासिल कर सकें। इसकी हर २५० मिलीलीटर की बोतल में ३०० से अधिक कैलोरी होती हैं। साथ ही इसमें कैफीन भी अधिक मात्रा में होती है। शक्कर की अधिकता से अनेक नुकसान हैं जबकि कैफीन की ज्यादा मात्रा दिल की बीमारियाँ एवं सामाजिक व्यवहार में बदलाव के लिए जिम्मेदार मानी जाती है। इस शोध अध्ययन का सुझाव है कि एनर्जी ड्रिंक केवल गहन कसरत करने वाले व्यक्तियों को ही पीना चाहिए। १८ प्रतिशत लोग ऑफिस में काम के दौरान थकान महसूस करने के साथ ही एनर्जी ड्रिंक की बोतल मुंह से लगा लेते हैं। कसरत से पहले पानी पीने से निर्जलीकरण की समस्या नहीं होती। ८० प्रतिशत लोग कसरत से पहले पानी पीना भूल जाते हैं।

नुकसान एनर्जी ड्रिंक के

-एनर्जी ड्रिंक्स के फायदों से अधिक नुकसान हैं। एनर्जी ड्रिंक्स पीने वालों को इसकी लत लग जाती है। 

- इस तरह की ड्रिंक्स पर यह नहीं लिखा होता है कि यह पेय किस औषधि के साथ रिएक्शन कर सकता है। किस औषधि के साथ यह पेय प्रतिक्रिया कर सकता है यह लिखा जाना चाहिए।

-एनर्जी ड्रिंक्स में शक्तिशाली रसायन डाले जाते हैं जो शरीर के पूरे सिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं।

-इस पेय से दिल की धड़कन एवं रक्तचाप प्रभावित होते हैं।

ध्यान रहे कि एनर्जी ड्रिंक कभी भी पानी का विकल्प नहीं हो सकता। जब भी प्यास लगे उसे पानी से ही बुझाएं। कसरत के बाद पसीने के रूप में शरीर का पानी निकल जाता है। इस समय एनर्जी ड्रिंक पानी का विकल्प नहीं है। इसलिए कसरत से पहले पानी पी लें ताकि शरीर में कसरतों के दौरान निर्जलीकरण न हो। पानी के स्थान पर एनर्जी ड्रिंक में कैफीन की वजह से और अधिक निर्जलीकरण हो सकता है।

एनर्जी ड्रिंक्स को कभी भी शराब के साथ मिलाकर न पिएं। एनर्जी ड्रिंक ऊर्जा को सक्रिय करती है जबकि शराब अवसादग्रस्त करती है(डॉ. प्रीति शुक्ला,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल चतुर्थांक 2012)।

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शुक्रवार, 4 मई 2012

जरूर खाएं मेवे

मेवे सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं। यह शरीर को जरूरी पोषक तत्व तो उपलब्ध कराते ही हैं, ऊर्जा भी प्रदान करते हैं। इससे शरीर कई रोगों से मुक्त रहता है। एस्कॉर्ट हार्ट हॉस्पिटल के डॉ. एम. एस. जैन का कहना है कि सेहत के लिए संतुलित और नियमित खान-पान तो महत्वपूर्ण है ही, मेवे भी बहुत जरूरी हैं। नीलम कोठारी का आलेखः 

अधिकांश लोगों को मेवों के प्रति भ्रम है कि मेवे गरम होने की वजह से मोटापे और हाईब्लड प्रेशर का कारण बनते हैं। ऐसे भ्रम तो लोगों को मेवों से और दूर करते हैं। मेवों में वसा की मात्र होती है। इसलिए वसा के कारण मेवों का सेवन मोटापा बढ़ाता है। इसलिए यह भ्रम तोड़ना होगा कि मेवे वसा की मात्र के कारण हानिकारक होते हैं। ये हानिकारक कतई नहीं होते, जब तक कि उचित मात्र व उचित ढ़ंग से लिए जाए। 

सेहत के हिसाब से बादाम: 
सूखे मेवे में सेहत के हिसाब से सबसे अधिक फायदेमंद बादाम होता है। अमेरिका के हार्ट एसोसिएशन नाम की संस्था ने बादाम को मोनोअनसैचुरेटेड फैट्स की मात्र के कारण कोलेस्ट्रोल की मात्र को कम करने का सबसे अच्छा मेवा बताया है। बादाम मस्तिष्क की सक्रियता और याददाश्त बढ़ाने में सहायक होता है। बादाम कब्ज के रोगियों के लिए भी उपयोगी होता है। 

काजू: 
यह भी कोलेस्ट्रोल को रोकने में उपयोगी होता है क्योंकि इसमें भी 65 प्रतिशत मोनोअनसैचुरेटेड फैट्स की मात्र होती है। काजू खासकर महिलाओं के लिए उपयोगी होता है, क्योंकि इसमें मोनोअनसैचुरेटेड फैट्स की मात्र महिलाओं को होने वाली ब्रैस्ट केंसर की बीमारी को नियंत्रित रखती है। 

पिस्ता: 
पिस्ता स्वाद में लाजवाब होने के साथ-साथ सेहत के लिए भी उतना ही फायदेमंद है। नियमित रूप से इसका सेवन करने से हृदय और दिल संबंधी रोगों की आशंका कम होती है। पिस्ता व अन्य मेवों में उपलब्ध फाइबर खाना पचाने में सहायक होता है। 

किशमिश: 
इसमें उपलब्ध एंथोयायनिन गैस संबंधित रोगों को दूर करता है। फ्रांस में किए एक अध्ययन के अनुसार किशमिश खाने से आंखों से संबंधित बीमारियां दूर होती हैं और मधुमेह जैसे रोगों की आंशका कम होती है। अखरोट: अखरोट सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है। प्रतिदिन आहार में पांच अखरोट शामिल कर सकते हैं। अखरोट में उपस्थित वसा और ग्लूकोज डायबिटिज से पीड़ित लोगों में इंसुलिन की स्थिरता बनाए रखता है । 

कैसे करें सेवन 
मेवे प्रोटीन, विटामिन और ताकत से भरपूर होते हैं। जहां आपको स्नैक्स में दो से चार ग्राम प्रोटीन मिलता है, वहीं काजू, बादाम, मूंगफली जैसे तमाम सूखे मेवों में इससे दस गुना ज्यादा प्रोटीन मिलता है। इसलिए मेवे खाना स्नैक्स की अपेक्षा अधिक उपयोगी है। 

हर रोज सिर्फ एक मुठ़्ठी 
मेवों को तलने या भुनने से उनकी पौष्टिकता कम हो जाती है। इसलिए उनका इस्तेमाल बिना तले, भूने ही करें। मेवों को बिना नमक के ही खाएं। नमक में मेवे मिलाकर खाने से मेवे में कैलोरी मात्र बढ़ जाती है। मेवे को हमेशा फीका ही खाएं। उसके साथ किसी अतिरिक्त कैलोरी की जरूरत नही है(हिंदुस्तान,दिल्ली,25.4.12)।

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शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

शहद हो तो पातालकोट का

मध्यप्रदेश के छिंदवाडा जिले के पातालकोट में आदिवासियों के लिये शहद आय का एक ज़रिया है। उनके जीवन में शहद अच्छे स्वास्थ्य के लिये महत्वपूर्ण माना जाता है। बेहतर पोषण और स्वास्थ लिये वे अपने बच्चों को सुबह रोटी के साथ शहद खाने को देते है। उनका मानना है कि शहद याददाश्त के लिये उत्तम है।

शहद को छांछ के साथ लेने से स्मरण शक्ति बढ़ती है। दूध के साथ मिलाकर लेने पर यह हृदय, दिमाग़ और पेट के लिये फ़ायदेमंद होता है। गर्मियों में अक्सर नींबूपानी के साथ शहद मिलाकर पीने से ये शरीर को ऊर्जा और ठंडक प्रदान करता है। शहद का सेवन प्रतिदिन करने से शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखने में काफ़ी मदद मिलती है। यह शारिरिक ताक़त को बनाए रखकर थकान दूर करता है। शुद्घ शहद की एक-एक बूँद दोनो आँखो मे डालने से आँखो की सफ़ाई के साथ-साथ रौशनी बढ़ती है। बच्चों में दाँत आने के वक्त मसूड़ों पर शहद लगाने से आराम मिलता है। जंगल से प्राप्त शहद को पानी में मिलाकर शौच जाने से पहले प्रतिदिन चंद महीनों तक लेने से वज़न कम होता है। कटे अंगों, घावों और शरीर के जल जाने पर शहद लगाने से फ़ायदा होता है। शहद के एंटीबैक्टिरियल गुणों को आधुनिक विज्ञान भी मानता है। खाँसी, जुक़ाम और नज़ले में शहद का उपयोग लगभग हर भारतीय घर में होता है। आदिवासी सिरदर्द दूर करने के लिए शहद के साथ चूना मिलाकर माथे पर लगाते हैं।

छह प्रकार के शहद हैं पातालकोट में
पातालकोट के आदिवासी अपने इलाके से छह प्रकार का शहद इकठ्ठा करते हैं। इनमें से पलसा शहद मुख्य है जिसे मधुमक्खियाँ पलास के पेड़ पर तैयार करती हैं। एक छत्ते से कम से कम पंद्रह किलो शहद मिल जाता है।

तेंदवा शहद तेंदू के पेड़ पर लगे छाते से निकाला जाता है। इसके अलावा करंज के पेड़ से प्राप्त हुआ करंजा शहद, नीम या कड़व शहद नीम के पेड़ से मिलता है। बबूलई शहद बबूल के पेड़ से और पहाड़ी शहद (चटटानो से) प्राप्त होता है। शहद निकालना और उसको बेचना इन आदिवासियों के जीवन यापन का साधन ही नहीं बल्कि उनकी जीवन शैली भी है। शहद के बनने से लेकर उसके निकाले जाने तक बहुत से पारंपरिक समारोह किये जाते हैं। जब शहद का मौसम शुरू होता है तो पहली बार जंगलों में प्रवेश करने से पहले उसकी पूजा की जाती है।अगर एक ही पेड़ पर मधुमक्खियों के कई छत्ते हैं या कोई पेड़ किसी पवित्र स्थान पर है तो उसके लिए विशेष पूजा-पाठ की जाती है। यह पूजा कबीले के किसी बुज़ुर्ग द्वारा करवाई जाती है। पूजा में पूर्वजों और जंगल में मान्य देवी देवताओं का आहवान किया जाता है। उनसे अपनी सुरक्षा और आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करते हैं। मधुमक्खियों के छत्तों से शहद निकाने के लिए उनसे भी माफी मांगी जाती है। जब शहद निकालने का काम पूरा हो जाता है तो मधुमक्खियों को धन्यवाद दिया जाता है और प्रार्थना की जाती है कि अगले वर्ष भी वह इसी जंगल में आकर अपना शहद बनाएँ (डॉ. दीपक आचार्य,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल तृतीयांक 2012)

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बुधवार, 18 अप्रैल 2012

हेल्थ ड्रिंक कितने हेल्दी?

अगर आप ऑरेंज या कोई भी फ्रेश जूस ज्यादा मात्रा में ले रहे हैं तो खुद ही शूगर के साथ कई अन्य बीमारियों को जन्म दे रहे हैं। दरअसल हम जिस फ्रेश जूस को हेल्दी समझते हैं, उनमें ग्लूकोज की मात्रा ज्यादा और फाइबर कम होता है। इससे एक तो बॉडी में शूगर फैट के रूप में जमा होता है, दूसरे फाइबर कम होने से यह आसानी से डाइजेस्ट भी नहीं होता। नतीजा शूगर, हार्ट और लीवर प्रॉब्लम। एक्सपर्ट्स का कहना है कि 20 से 25 पर्सेंट फाइबर डाइट में लेने से शूगर पर काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। फ्रेश जूस ही अंडा, टोमैटो सॉस, स्नैक्स, रेडी मील्स और यहां तक कि शूगर फ्री प्रॉडक्ट भी हमें शूगर दे सकते हैं। 

डायबिटिक स्पेशलिस्ट डॉ. एके झिंगन का कहना है कि नॉर्मली दिन में दो से तीन संतरे खाना ठीक होता है। एक तो उसमें फाइबर मिलता है, दूसरे ग्लूकोज भी मात्रा संतुलित होती है। लेकिन जब हम बड़ा ग्लास जूस लेते हैं तो इसका मतलब हम करीब 8से 10 संतरे ले रहे होते हैं। जूस निकालने से उसमें से फाइबर भी निकल जाता है और ज्यादा ग्लूकोज बॉडी में जाता है। फाइबर कम होने से यह आसानी से पचता भी नहीं और एक्स्ट्रा फैट के रूप में बॉडी में जमा होने लगता है। जब यह महत्वपूर्ण अंगों के पास जमा होता है, तो उनके लिए खतरनाक है। इससे डायबिटीज, हार्ट और लीवर की समस्या शुरू हो जाती है। यही फैट धमनियों में जमकर हार्ट पर यह एक्स्ट्रा प्रेशर डालने लगता है। 

विशेषज्ञों का कहना है कि हम अपने खाने और ब्रेकफास्ट में सॉल्ट, कैलरी, फैट और कार्बोहाइड्रेट आदि का तो ध्यान रखते हैं, लेकिन उनमें छिपी हुई शूगर की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। यहां तक कि कई ऐसे फूड प्रॉडक्ट जिनमें फैट या शूगर न होने की बात कही जाती है, उनमें भी शूगर डाली गई होती है और हम शूगरफ्री के चक्कर में शूगर ले रहे होते हैं। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि कई बार तो जिस डायट को हम हेल्दी समझते हैं, उसमें जरूरत से ज्यादा शूगर पाई जाती है। इन्हें खाने से हमें हर दिन की जरूरत के हिसाब से ज्यादा शूगर मिल जाता है। कई स्टडी में यह बात साबित भी हो चुकी है कि प्रॉडक्ट को ज्यादा टेस्टी बनाने के लिए कंपनियां उनमें ज्यादा शूगर डाल देती हैं। स्नैक्स हो या रेडी मील्स हो या टोमैटो सॉस, इन सभी में जरूरत से ज्यादा शूगर मौजूद होता है। इन चीजों को लोग रोजाना यूज करते हैं, वह भी बिना यह जाने कि इसमें शूगर की मात्रा कितनी है(सुशील कुमार त्रिपाठी,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,17.4.12)। 

वस्तुतः,नाम भले ही हेल्थ ड्रिंक हो लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि यह सेहत के लिए बहुत फायदेमंद नहीं होते क्योंकि उनमें चीनी की मात्रा बहुत ज्यादा होती है और यह एक बार में आपकी डाइट में 450 कैलरी का इजाफा कर सकती है। 

17 अप्रैल,2012 के ही नभाटा ने 'डेली मेल' की खबर छापी है जिसमें कहा गया है कि 'ग्लासगो यूनिवर्सिटी' की टीम ने इस सर्वे के लिए ब्रिटेन में 2,000 लोगों से कहा कि वे ड्रिंक में चीनी की मात्रा का अनुमान लगाएं। रिसर्चरों ने पाया कि लोगों ने कोला की कैटिगरी में आने वाले पेय पदार्थों में चीनी की मात्रा को वास्तविक से ज्यादा आंका जबकि स्मूदीज और फलों के रस में चीनी की मात्रा का अनुमान वास्तविकता से कम लगाया। 

उन्होंने देखा कि कोला की श्रेणी में आने वाले ड्रिंक्स से लोगों को कैलरी की बहुत बड़ी मात्रा मिलती है। सर्वे में भाग लेने वालों से लोकप्रिय पेय पदार्थों में चीनी की मात्रा के बारे में अनुमान लगाने को कहा गया था। 

सर्वे के अनुसार ब्रिटेन में हर एक व्यक्ति प्रति सप्ताह शराब के अलावा अन्य पेय पदार्थों से 3,144 कैलरी लेता है। अर्थात् इस तरह से प्रतिदिन वह औसतन 450 कैलरी लेता है। 

सर्वे का कहना है कि ब्रिटेन के लोग यह कैलरी अपने भोजन के अलावा लेते हैं जिससे उनमें मोटापे की समस्या बढ़ रही है।

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शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

सब्ज़ियों के प्रकार और पोषक तत्व

आहार में सब्ज़ियाँ बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। जड़, तना, फल, फूल, पत्तियाँ आदि पेड़-पौधों के विभिन्न हिस्सों का उपयोग सब्जियों के रूप में किया जाता है। हर प्रकार की सब्जी में विभिन्न प्रकार के पोषक तत्व प्राप्त होते हैं-

छिलका 
सब्जी बनाते हुए अक्सर ही छिलका निकाल दिया जाता है। छिलकों में एंटीऑक्सीडेंट्स और फाइटोकेमिकल्स अधिक मात्रा में होते हैं। अतः संभव हो तो सब्जी बनाते हुए छिलके का उपयोग भी ज़रूर करें।

हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ 
इनमें विटामिन व खनिज अधिक मात्रा में होते हैं। लौह तत्व, विटामिन-ए, विटामिन-बी कॉम्प्लेक्स, विटामिन-सी, कैल्शियम और फाइबर अच्छी मात्रा में मिलता है।

फल वाली सब्ज़ियाँ 
इस वर्ग में टमाटर, गिलकी, लौकी, भिंडी आदि सब्ज़ियाँ शामिल हैं।

फूल, कली वाली सब्ज़ियाँ 
ब्रोकली (एक प्रकार की गोभी) हरे रंग व पत्तियों के समावेश के कारण फूलगोभी से भी अधिक पौष्टिक होती है। फूलगोभी की अपेक्षा इसकी पत्तियों में चार गुना अधिक कैल्शियम और दोगुना विटामिन-ए तथा राइबोफ्लेविन पाया जाता है। इसके अलावा,सुरजने की फली,कमल डंडी में भी विटामिन और खनिज अधिक मात्रा में मिलते हैं। 

कंदमूल 
आलू,अरबी,शकरकंद गराडू आदि सब्जियों में स्टार्च की मात्रा अधिक होती है। इसके अलावा,विटामिन-बी,ए और सी भी मिलता है। गाजर व शकरकंद में विटामिन-ए,कच्चे शलजम में विटामिन-सी,प्याज में आयरन,सल्फर तथा फॉस्फोरस और लहसुन में एंटी-ऑक्सीडेंट अधिक मात्रा में मिलते हैं। 

बीज वाली सब्जियां 
मटर,चने,बालोर व समस्त दालें इस वर्ग में आती हैं। हरी फलियों के बीज की अपेक्षा सूखे बीज वाली सब्जियां अधिक पौष्टिक होती हैं। इन सब्जियों में प्रोटीन अत्यधिक मात्रा में होता है(डॉ. संगीता मालू,सेहत,नई दुनिया,मार्च चतुर्थांक 2012)

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शनिवार, 31 मार्च 2012

बढ़ती गर्मी में प्यास की समस्या

चुभती-जलती गर्मियों के मौसम में ठंडक का एहसास पाने के लिए जरूरी है फलों और सब्जियों में पाए जाने वाले गुणी तत्वों और उनके सही इस्तेमाल के तरीके का ज्ञान हो। खासबात यह कि ये तमाम चीजें हमारी रसोई में होती ही हैं, लेकिन उनकी खूबियों से हम अनजान हैं।  

हमारी रसोई में ऐसी कई चीजें हैं, जिनकी खूबियों से हम शायद अनजान हैं। बरसों से आयुर्वेद हमें प्रकृति में मौजूद ऐसी चीजों से होने वाले फायदों के बारे में बताता रहा है, जिन्हें हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल तो करते हैं, लेकिन उनसे होने वाले बड़े फायदों के बारे में ज्यादा नहीं जानते। इसलिए गर्म मौसम में ठंडक का एहसास पाने के लिए जरूरी है फलों और सब्जियों में पाए जाने वाले गुणी तत्वों और उनके सही इस्तेमाल के तरीके का ज्ञान हो। एनडीएमसी के मुख्य आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. एस. के. मलिक बताते हैं कि गर्मियों के मौसम में हमारे शरीर का पानी तेजी से सूखता है। इसलिए इस मौसम में शरीर को अधिक मात्र में तरल तत्व की जरूरत पड़ती है। गला सूखना, मिचली आना, डायरिया, उल्टी, कब्ज, अत्यधिक या कम पसीना आना जैसी समस्याएं शरीर में पानी की कमी की वजह से होती हैं। इनसे निजात पाने के लिए जरूरी है कि हम अपने भोजन व खानपान में मौसमी फलों और ताजा हरी सब्जियों को ज्यादा तवज्जो दें। 

इस मौसम में मौसमी फलों का जूस सबसे अधिक उपयोगी रहता है। तरबूज, नींबू, नारियल, बेल, खरबूजा, कच्चा आम कुछ ऐसे फल हैं, जो हमें गर्मी से तो निजात दिलाते ही हैं, साथ ही कई बीमारियों से लड़ने की ताकत भी देते हैं। 

मौसमी फल हैं अमृत 
तरबूज 
-तरबूज एक ऐसा फल है जो दिखने में जितना बड़ा है, उससे होने वाले फायदे भी उतने ही बड़े हैं। 

-तरबूज में पानी की मात्रा सबसे अधिक होती है, जिस कारण यह शरीर में पानी की कमी को दूर करने में सर्वाधिक कारगर साबित होता है। इससे शरीर को तरावट भी मिलती है। 

-तरबूज को काले नमक के साथ खाने से हाजमा दुरुस्त रहता है। बार-बार गला सूखना और लू लगने जैसी समस्याओं से निजात मिलता है। 

साइड इफेक्ट 
इस फल को खाने के बाद कभी भी पानी न पीएं। इससे आप डायरिया जैसी बीमारी का शिकार हो सकते हैं। 

नींबू 
-यह हर मौसम में लाभकारी है। खासकर गर्मियों में तो नींबू का कोई मुकाबला नहीं। समस्या चाहे त्वचा संबंधी हो या स्वास्थ्य संबंधी, नींबू हर मर्ज की दवा है। 

-सुबह खाली पेट नींबू पानी पीने से दिनभर ताजगी बनी रहती है। लेकिन एक दिन में दो चम्मच से ज्यादा नींबू के रस का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि ज्यादा रस से एसिड बनता है। 

-नींबू वाली चाय पीने से खट्टी डकार और मिचली जैसी समस्याओं से राहत मिलती है। 

-कटे हुए सलाद पर काला नमक और नींबू निचोड़कर खाने से उसका स्वाद दोगुना हो जाता है। सेहत के लिए तो फायदेमंद है ही। 

-एक नींबू को सीधे काटकर उसमें चाकू से छेद करें। फिर उसमें अजवाइन भरकर तवे पर सेंक लें। इसे खाने से सेहत और -सौन्दर्य का डबल धमाका होगा। पेट साफ होगा और चेहरे पर चमक आएगी। 

साइड इफेक्ट 
लंबे समय से कटे हुए नींबू का प्रयोग न करें क्योंकि यह गैस बना सकता है और उल्टी आदि की समस्या भी हो सकती है। 

घरेलू और आयुर्वेदिक नुस्खे 

-बेल का शरबत पीने से शरीर का तापमान सामान्य रहता है। बेल के शरबत में दही, अजवाइन, नींबू और काला नमक मिलाकर पीने से इसका स्वाद तो बढ़ता ही है, आपका पेट भी साफ रहता है। 

-मुल्तानी मिट्टी को अच्छे से कूटकर एक गिलास साफ पानी में डालें। जब ये पूरी तरह गिलास की तली में बैठ जाए तो उस पानी को छानकर पीने से बार-बार गला सूखने की समस्या खत्म हो जाती है। इससे मुंह में चिकनाई और तरावट बनी रहती है। 

-गर्मियों में पनीर से परहेज करें। इसके बजाए छाछ, लस्सी, दही का सेवन करें। दही खाने से आंतों के संक्रमण से भी बचाव होता है। -इस मौसम में खीरा, कमल ककड़ी और टमाटर खाने से शरीर में जल की मात्र सामान्य रहती है। 

-गन्ने का रस गर्मी के मौसम में वरदान है। यह शरीर में ग्लुकोज और जल की मात्र को बनाए रखने का सबसे प्रभावकारी स्रोत है। कहते तो यहां तक हैं कि गर्मियों में रोज गन्ने का एक गिलास रस पीने से इस पूरे मौसम में डॉक्टर का मुंह नहीं देखना पड़ता। 

-सादा पानी ज्यादा न पीएं। इसके बजाए पानी में नमक मिलाकर या नींबू पानी पीएं। इससे पानी शरीर में ज्यादा देर तक रुकता है। 

-नारियल पानी से डायरिया जैसी बीमारी में राहत मिलती है। 

फ्रूट जूस स्मूदी 
5 से 10 मिनट में तैयार 
सामग्री 
1 कप बारीक कटी स्ट्रॉबेरी 
1 केला चार भागों में कटा हुआ 
2 आडू पीच 
1 कप संतरे, आडू और आम का जूस 
2 कप आईस 

ऐसे बनाएं 
एक बड़े मिक्सी जार में स्ट्रोबेरी, केले और आडू को मिलाकर बारीक मिश्रण बनाएं। फिर संतरे, आडू, आम का जूस और आईस मिलाकर जूसर में मिक्स कर लें। आपकी ठंडी ठंडी ‘फ्रूट जूस स्मूदी‘ तैयार है। 

क्या मिलेगा 
कैलोरी प्रति कप: 118 कोलेस्ट्रोल: 6 एमजी टोटल फैट: 0.1 ग्राम 

फायदे 
-विटामिन और स्वाद से भरपूर 

-दिल स्वस्थ रखे और चेहरे की सुंदरता बढ़ाए 

स्टार बेचते कुछ हों.. पर, पीते क्या हैं 
आजकल हर विज्ञापन में कोई न कोई फिल्म स्टार जरूर होता है। खासकर कोल्ड ड्रिंक्स के विज्ञापनों में तो बड़े से बड़ा स्टार देखा जा सकता है। हम अपने पसंदीदा फिल्म स्टार की हर पसंद को फॉलो भी करते हैं। इसलिए उन्हें कोई ड्रिंक पीते देख अक्सर हम भी उसे पसंद करने लगते हैं। लेकिन आपको यह जानकर ताज्जुब हो सकता है कि आपके प्रिय स्टार जिन ड्रिक्स को बेचते दिखाई देते हैं, उन्हें खुद नहीं पीते(भारती शांडिल्य,हिंदुस्तान,दिल्ली,28.3.12)।

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शुक्रवार, 30 मार्च 2012

खान-पान और प्रतिरोधक क्षमता

बदलते मौसम में हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, जिससे बीमारियों का हमला शुरू हो जाता है। लेकिन अगर आप अपनी इस क्षमता को थोड़ा मजबूत कर लें तो आप बन जाएंगे रॉकस्टार, यानी चट्टान से मजबूत.. इतने स्वस्थ कि बीमारी आपसे मीलों दूर रहने में अपनी खैर समझे। ऐसा कैसे करें, यही बता रहे हैं प्रसन्न प्रांजलः 

 बदलता मौसम कई मौसमी बीमारियों को साथ लेकर आता है। यह हम सभी जानते हैं। फिर भी हम बीमार हो जाते हैं। आप अक्सर सोचते हैं कि काश कोई ऐसा उपाय होता कि हम बीमार ही नहीं होते। आपको पता है कि आप बीमार क्यों होते हैं? दरअसल बीमार होने के पीछे सबसे प्रमुख कारण है आपके शरीर के रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) का कमजोर होना। जैसे ही आपका इम्यून सिस्टम कमजोर होता है यह रोगों का डटकर सामना नहीं कर पाता और इस स्थिति में आप बीमार हो जाते हैं। अगर आप अपनी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर ही न होने दें, तो बीमार होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। आज हम आपसे कुछ ऐसी चीजों पर बात करते हैं, जिन्हें अपने भोजन में शामिल कर आप अपने इम्यून सिस्टम को मजबूत बना सकते हैं और हमेशा स्वस्थ रह सकते हैं। 

लहसुन 
हर रसोई में पाया जाने वाला लहसुन बड़े काम का है। लहसुन के लाभदायक गुणों का उल्लेख हमारे आयुर्वेद और पुराणों में भी है और आज भी डॉक्टर इसकी खूबियों के मुरीद हैं। बीएल कपूर हॉस्पिटल के डॉ. आंचल अग्रवाल के अनुसार लहसुन में सल्फर पाया जाता है जो रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का काम करता है। यह एंटिबायोटिक्स का काम करता है और कई बीमारियों से बचाने में मदद करता है। 

मशरूम 
मशरूम सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है। डायटीशियन सुषमा कुमारी के अनुसार अच्छे स्वास्थ्य के लिए मशरूम का सेवन बेहद जरूरी है। मशरूम व्हाइट ब्लड सेल (डब्ल्यूबीसी) को बढ़ाने का काम करता है। डब्ल्यूबीसी हमारे लिए बेहद जरूरी है। हमारे शरीर में प्लेटलेट्स बनाने और इम्यून सिस्टम बढ़ाने का काम डब्ल्यूबीसी ही करता है। इसलिए नियमित रूप से मशरूम का सेवन करें। 

गाजर 
केआरवी हेल्थकेयर की एमडी ड़ॉ. रिदवाना सनम के अनुसार गाजर में विटामिन ए पाया जाता है। यह आपके शरीर में विटामिन ए की कमी को पूरा करता है और इंफेक्शन आदि से लड़ने में मदद करता है। साथ ही साथ आपके शरीर को हमेशा तरोताजा रखने का काम भी करता है। 

चुकंदर 
चुकंदर हमारे शरीर के लिए उतना ही जरूरी है जितना कि गाजर या मशरूम। चुकंदर हमारे शरीर में रक्त को बढ़ाने का काम करता है। रेड ब्लड सेल (आरबीसी) को बढ़ाने में चुकंदर काफी मदद करता है। आरबीसी की वजह से ही हमारे खून का रंग लाल होता है। आरबीसी के बगैर मानव जिन्दा नहीं रह सकता है। इस आरबीसी को संतुलित रखना बेहद जरूरी है। 

हरी सब्जियां 
हरी सब्जियों के बगैर आपका आहार संतुलित हो ही नहीं सकता। हरी सब्जियां तो ऐसा रामबाण हैं जो हर मौसम, हर पल, हर दिन आपके स्वास्थ्य को बेहतर बनाती और तरोताजा रखती हैं। हरी सब्जियों में कई तरह के विटामिन और प्रोटीन पाए जाते हैं। ये सभी रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और आपको स्वस्थ रखने का काम करते हैं। अपने भोजन की थाली में हरी सब्जियों को ज्यादा सें ज्यादा जगह दें। ताजा हरी सब्जियों का ही इस्तेमाल करें। 

मौसमी फल 
मौसमी फल के बगैर आप स्वस्थ रहने के बारे में सोच भी नहीं सकते। जितना जरूरी आपके लिए चावल-दाल और रोटी है, उससे कई गुणा ज्यादा जरूरी हैं मौसमी फल। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के सहायक महासचिव डॉ. रवि मलिक के अनुसार, इस मौसम में गहरे रंग वाले फल नियमित रूप से खाना चाहिए। संतरा, पपीता, अमरूद, सेब, अंगूर, अनार आदि फलों में कई तरह के विटामिन और एन्टी ऑक्सीडेंट पाए जाते हैं जो आपके शरीर के लिए बेहद जरूरी है। 

दही 
डायटीशियन सुषमा के अनुसार दही में लैक्टोबैसिल्स नामक बैक्टीरिया पाया जाता है जो हमारे शरीर के लिए बेहद लाभदायक है। यह आपके खाने को पचाने का काम करता है। स्वस्थ रहने के लिए यह बेहद जरूरी है कि आपका खाना सही तरह से पच जाए। जब भोजन का उचित प्रकार से पाचन होगा, तभी यह आपके शरीर के लिए फायदेमंद होगा। ऐसे में जरूरी है कि आप अपने भोजन को डाइजेस्ट करने और शरीर के लिए लाभदायक बैक्टीरिया लैक्टोबिसल्स को बढ़ाने के लिए दही का सेवन करें। 

स्वच्छ पानी 
डॉ. रवि मलिक के अनुसार स्वस्थ शरीर के लिए स्वच्छ पानी अतिआवश्यक है। पानी की वजह से कई तरह के संक्रमण और बीमारियों का सामना करना पड़ता है। गंदा पानी शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को कम कर देता है। इसलिए हमेशा स्वच्छ पानी ही पिएं और ज्यादा से ज्यादा पानी पीने की कोशिश करें। प्रतिदिन कम से कम 5 से 6 लीटर पानी निश्चित ही पिएं। 

इन्हें न खाएं तो बेहतर 

ज्यादा मीठा 
कुछ मीठा हो जाए.. ये तो चलता है, लेकिन ज्यादा मीठा खाना ठीक नहीं। ज्यादा मीठा खाने से आपके शरीर में इंसुलिन की मात्र बढ़ जाएगी जो इम्यून सिस्टम को प्रभावित कर सकती है। कोल्ड ड्रिंक, जैम, मिठाई आदि कम से कम खाएं। 

फास्ट फूड 
पिज्जा, बर्गर जैसे फास्ट फूड का ज्यादा सेवन आपके शरीर के लिए ठीक नहीं है। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है और मोटापे की आशंका अत्यधिक रहती है। 

ज्यादा तेल-मसाले 
कभी भी ज्यादा तेल-मसाले न खाएं। यह कभी भी आपको हेल्दी नहीं बनाते, बल्कि आपके सेहत का नुकसान ही करते हैं(हिंदुस्तान,दिल्ली,28.3.12)।

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बुधवार, 28 मार्च 2012

नवरात्र और जूस

इन दिनों नवरात्र चल रहे हैं। आपमें से कई लोगों का व्रत होगा। इस मौके पर जूस तो आप लेंगी ही। तो क्यों न इस बार सिंपल जूस की जगह आप ट्राई करें जूस थेरपी। व्रत का व्रत और बॉडी भी फिट। 

कुछ इस तरह : 
फलों का रस न केवल न्यूट्रिशंस देता है , बल्कि कई बीमारियों को आने से भी रोकता है। इसलिए जूस पीना बेहद जरूरी है। खासतौर से इस समय जब नवरात्र चल रहे हैं , जूस थेरपी आपके लिए कई तरह के फायदेमंद हो सकती है। दरअसल , व्रत और साथ में जूस थेरपी आपकी पूरी बॉडी को रिफ्रेश कर देगी। 

क्या हैं फायदे 
- जूस में मिनरल्स , पोटैशियम , कैल्शियम , ऐंटि ऑक्सिडेंट्स , कैरोटिन और विटामिन सी की क्वॉन्टिटी बहुत ज्यादा होती है। 

- फलों के रस में विटामिंस , न्यूट्रिशंस और नेचरल स्वीटनेस होती है। इसलिए कैलरीज का प्रतिशत बहुत कम होता है। 

- जूस शरीर के इम्यून सिस्टम को ठीक बनाए रखता है। 

- हेक्टिक लाइफ को फ्रेश कर देता है। 

- जूस फास्टिंग ( व्रत के दौरान जूस पीना ) से पाचन ठीक बना रहता है। 

- जूस ब्लड शुगर लेवल को बैलंस करता है। 

- आप थकान फील नहीं करते और दिनभर एनर्जेटिक बने रहते हैं। 

- बॉडी से हानिकारक तत्वों को बाहर कर शरीर को रिलैक्स कर देता है। 

जूस थेरपी कैसे अपनाएं 
जूस थेरपी लेने से पहले मेंटली प्रिपेयर होना जरूरी है। पूरे दिन पांच से छह बार अलग - अलग तरह के जूस पीएं। सबसे पहले दो गिलास नीबू पानी पीएं। उसके बाद कोई फ्रूट जूस लें। ऑरेंज जूस , टमाटर , गाजर और चुकंदर का जूस मिक्स कर पीएं। दोपहर में तरबूज का जूस पीना ज्यादा फायदेमंद होता है। शाम को संतरा , सेब और अंगूर का जूस मिक्स करके पीएं। इस डाइट में फेरबदल करती रहें। आप जूस में पालक , बथुआ , खीरा जैसी चीजें भी जोड़ सकती हैं। 

जूस के फायदे 
चुकंदर का जूस : 
ये ब्लड को प्यूरिफाई करता है। इसमें मौजूद तत्व स्टमक को क्लीन रखते हैं। गाजर का जूस : गाजर के जूस में मौजूद ' विटामिन ए ' लीवर के लिए बहुत अच्छा है। यह वजन कम करने , आंखों की रोशनी तेज करने और कैंसर से बचाने में मदद करता है। 

पालक का जूस : 
रोज दो बार पालक का जूस पीने से ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल में रहता है। 

टमाटर का जूस : 
यह हार्ट से जुड़ी बीमारी की रोकथाम में मदद करता है। 

खीरे का जूस : 
यह जॉइंट्स की बीमारियों से बचाए रखता है। इसेमें पोटैशियम की मात्रा बहुत होती है , जिससे किडनी फिट रहती है। इसके अलावा , हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करता है और स्किन से जुड़ी बीमारियों को दूर करता है। 

चेरी जूस : 
चेरी जूस में विटामिन सी और पोटैशियम की मात्रा बहुत ज्यादा है। यह एनीमिया जैसी बीमारी से दूर रखता है। 

नीबू रस : 
यह वजन कम करता है। यही नहीं , बॉडी के दूषित पदार्थों को बाहर करता है और डायरिया से बचाता है। पपीता का जूस : यह पाचन से जुड़ी बीमारियों को ठीक करता है। 

अंगूर का जूस : 
ब्लड प्रेशर कम करता है। ब्लड शुगर लेवल को मेंटेन रखता है। तो हो जाएं तैयार , नवरात्र व्रत को एक नए अंदाज में रखने के लिए। (सुपर्णा सिंह के ये टिप्स नवभारत टाइम्स,दिल्ली संस्करण में 26.3.12 को प्रकाशित हैं)

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मंगलवार, 27 मार्च 2012

भोजन करते समय पानी पीना चाहिए या नहीं?

माना जाता है कि पानी हमारे शरीर को तरोताजा रखता है। स्वस्थ रहना है तो ईश्वर की इस देन का भरपूर आनंद उठायें। पानी पीने से पाचन तंत्र प्राकृतिक रूप से ठीक रहता है। सुबह उठने पर एक गिलास पानी पीने से पेट साफ रहता है, साथ ही इससे आपको कब्ज की परेशानी नहीं होती। साथ ही त्वचा भी चमकने लगती है। ये तो सभी जानते हैं कि पानी सबसे उत्तम पेय है लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि भोजन करते समय बीच-बीच में पानी पीते रहना चाहिए जबकि कुछ लोग कहते हैं कि नहीं पीना चाहिए। 

लेकिन अगर आयुर्वेद की माने तो खाने के साथ पानी पीने से बचना चाहिए। खाना लंबे समय तक पेट में रहेगा तो शरीर को पोषण ज्यादा मिलेगा। अगर पानी ज्यादा लेंगे तो खाना फौरन नीचे चला जाएगा। खाने के समय पानी पीने से यह पेट की सतह पर ही सोख लिया जाता है। यह क्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि पेट में पाचन के लिए जरूरी द्रव्य गाढ़े न हो जाएं कि वे खाने का पाचन कर पाए। 

लेकिन खूब सारे पानी पीने के कारण यह द्रव्य पेट में मौजूद भोजन से भी अधिक गाढ़ा हो चुका होता है, ऐसे में भोजन पचाने के लिए पेट में गैस्ट्रिक जूस बनना शुरु हो जाता है। परिणामस्वरूप भोजन नहीं पचता और सीने में जलन होती है।अगर पीना ही है तो थोड़ा पिएं और गुनगुना या नॉर्मल पानी पिएं। बहुत ठंडा पानी पीने से बचना चाहिए। पानी में अजवाइन या जीरा डालकर उबाल लें। यह खाना पचाने में मदद करता है। खाने से आधा घंटा पहले या एक घंटा बाद गिलास भर पानी पीना अच्छा है(दैनिक भास्कर,उज्जैन,26.3.12)।

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सोमवार, 26 मार्च 2012

खानपानःक्या अच्छा,क्या बुरा

खाते तो सभी हैं। कुछ जीभ (स्वाद) के लिए खाते हैं तो कुछ पेट (भरने) के लिए। खाने के ये दोनों ही अंदाज गलत हैं। खाना सेहत के लिहाज से खाना चाहिए। इसके लिए यह जानना जरूरी है कि कौन-सी चीजें या फूड आइटम हमारी सेहत के दोस्त हैं और कौन-से दुश्मन। एक्सपर्ट्स से बात करके टॉप 10 सबसे अच्छे और टॉप 10 सबसे खराब फूड/फूड आइटम्स के बारे में जानकारी दे रही हैं प्रियंका सिंह : 

गुड फूड 
ग्रीन टी 
ऐंटि ऑक्सिडेंट से भरपूर ग्रीन टी इम्यून सिस्टम मजबूत बनाती है। निकोटिन और कैफीन न होने से शरीर पर बुरा असर नहीं। ऑर्टरीज के डैमेज को रोककर हार्ट अटैक की आशंका कम करती है। ग्रीन टी अलर्टनेस बढ़ाती है और मूड बेहतर करती है। कॉलेस्ट्रोल और कैंसर सेल्स की ग्रोथ को कम करती है। ऑर्थराइटस के मरीजों के लिए बढ़िया। वजन कम करने में भी मददगार। 

मल्टिग्रेन ब्रेड 
 कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट, मल्टी-विटामिन और फाइबर अच्छी मात्रा में। कॉलेस्ट्रॉल और हाइपरटेंशन को कम करती है। लो ग्लाइसिमिक इंडेक्स, यानी यह धीरे-धीरे ग्लूकोज में तब्दील होता है। इससे लंबे समय तक पेट भरा होने का अहसास होता है। जरूरी फैटी एसिड्स भरपूर। दिल, शुगर, हाइपरटेंशन और बीपी के मरीजों के लिए काफी फायदेमंद। 

ब्रोकली 
ऐंटि-ऑक्सिडेंट से भरपूर। एक छोटे फूल में करीब 175 ग्राम विटामिन-के होता है, जो हड्डियां मजबूत करता है और खून के बहाव को रोकने (ब्लड क्लॉटिंग) में मदद करता है। फाइबर, आयरन, विटामिन-सी और फॉलिक एसिड का भी अच्छा सोर्स, जो दिल की बीमारियों से बचाने में रोल निभाता है। शरीर से जहरीले तत्वों (टॉक्सिंस) को ब्रोकली निकालती है। ऑर्गनिक होने से न्यूट्रिशन वैल्यू काफी अच्छी। ब्रोकली आमतौर पर कच्ची या अधपकी खाई जाती है। 

ओट्स 
कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट और फाइबर खूब होते हैं। सारे जरूरी माइक्रो-न्यूटिएशन भी मिलते हैं। दिल और शुगर के मरीजों को खासतौर पर इन्हें खाने की सलाह दी जाती है। ये ट्राइग्लाइसराइड और कॉलेस्ट्रोल को कम करते हैं और शुगर लेवल को कंट्रोल में रखते हैं। कम कैलरी होने की वजह से वजन कम करने के इच्छुक लोगों के भी असरदार। 

दही 
बैक्टीरिया का सबसे अच्छा सोर्स। प्रोटीन और कैल्शियम भरपूर, जो हड्डियों को मजबूत करता है, मसल्स बनाता है, बाल और स्किन की भी हिफाजत करता है। पाचन के लिए बहुत असरदार। पेट की बीमारियों (डायरिया, कब्ज आदि) और इन्फेक्शन से निबटने में मददगार। ऐंटिबायॉटिक दवाओं से गुड बैक्टीरिया मर जाते हैं। दही गुड बैक्टीरिया बनाकर उनकी भरपाई करता है। बड़ी आंत (लार्ज इंटस्टाइन) के लिए खासतौर पर गुणकारी। नमक या चीनी के बिना खाना बेहतर। 

ऑलिव ऑइल 
ओमेगा-3 से भरपूर। 70 फीसदी तक मोनोसैचुरेटिड फैट के साथ-साथ ऐंटि-ऑक्सिडेंट और जरूरी फैटी एसिड भी खूब। ये तमाम चीजें दिल के लिए बहुत बढ़िया होती हैं। बैड कॉलेस्ट्रोल को कम कर गुड कॉलेस्ट्रॉल बढ़ाता है। ऐंटि-ऑक्सिडेंट भी खूब होते हैं। इसे लो टेम्परेचर कुकिंग के लिए यूज करना चाहिए। सलाद की ड्रेसिंग आदि के लिए यूज कर सकते हैं लेकिन हाई-कैलरी होती हैं। एक चम्मच में करीब 120 कैलरी, जो कि मक्खन लगी एक ब्रेड के बराबर हैं। कम मात्रा में खाएं। 

बेरी 
सभी तरह की बेरी (ब्लूबेरी, स्ट्रॉबेरी और ब्लैकबेरी) ऐंटि-ऑक्सिडेंट की बढि़या सोर्स होती हैं। ब्लूबेरी के ऑप्शन के लिए जामुन और ब्लैकबेरी के लिए काले अंगूर खा सकते हैं। ये दिल की बीमारी और कैंसर की आशंका को कम करती हैं। बेरी ऐंटि एजिंग होती हैं और शॉर्ट टर्म मेमरी लॉस को सुधारती हैं। यूरिनरी ट्रैक इन्फेक्शन (यूटीआई) को रोकती हैं। आधा कप रोजाना खानी चाहिए। बेरी जितनी डार्क, उतनी बेहतर होती हैं। शरीर में बैक्टीरिया को जमा होने से रोकती हैं। 

लहसुन 
 लहसुन में एंथोजैक्सिन होता है, जो कॉलेस्ट्रॉल कम करता है। इम्यूनिटी बढ़ाता है और ब्लड प्रेशर को मेंटेन करता है। पेट के कैंसर को रोकने में मददगार। लहसुन को छीलकर करीब 15 मिनट के लिए छोड़ दें। इसके बाद खाएं। ज्यादा फायदा मिलेगा। लहसुन को चबाकर खाना बेहतर है। दो कलियां रोजाना खाना चाहिए।

बादाम/अखरोट 
प्रोटीन, फाइबर और ओमेगा 3 के बढ़िया सोर्स। ट्रांस-फैट्स काफी कम होते हैं। बैड कॉलेस्ट्रॉल को कम कर गुड कॉलेस्ट्रॉल बढ़ाते हैं। दोनों को मिलाकर खा सकते हैं। एक दिन में 10 बादाम या पांच अखरोट या 7-8 बादाम और दो-तीन अखरोट साथ ले सकते हैं। दिल के मरीजों को 4-5 बादाम और एक-दो अखरोट से ज्यादा नहीं लेना चाहिए। गर्मियों में बादाम को भिगोकर खाना बेहतर। इसे छिलके समेत खाना चाहिए। ज्यादा खाने पर कब्ज हो सकती है। 

फिश 
सभी तरह की फिश में विटामिन, मिनरल, प्रोटीन अच्छी मात्रा में मिलते हैं, लेकिन समुद्री पानी की फिश (ट्यूना, साल्मन और मैकेरल) सबसे बढि़या मानी जाती हैं। इनमें खूब सारा गुड प्रोटीन, ओमेगा 3 और सभी जरूरी अमिनो एसिड होते हैं। ओमेगा 3 दिल की बीमारियों की आशंका कम करता है। अचानक होनेवाले हार्ट अटैक को रोकने में मददगार। डिप्रेशन दूर करती है। विटामिन डी का अच्छा सोर्स, जो हड्डियों, बाल, नाखून के लिए फायदेमंद। 

बैड फूड 
पिज़्ज़ा 
रिफाइंड प्रोडक्ट, जो मैदा और क्रीम से बनता है। ग्लूकोज, कॉलेस्ट्रॉल और ट्रांस फैट काफी ज्यादा। एक छोटे-से पिज्जा में 500-600 कैलरी। 

बर्गर 
मैदा, टिक्की, मियोनीज आदि यानी फैट, स्टार्च और कॉलेस्ट्रॉल का भंडार। एक बर्गर में करीब 450 कैलरी, यानी एक बार के पूरे खाने से भी ज्यादा। 

नूडल्स 
मैदे के बने नूडल्स रिफाइन फूड की कैटिगरी में आते हैं। स्टार्च भी खूब होता है। इनमें खास न्यूट्रिशन वैल्यू नहीं होती। मोटापा बढ़ैते है। आटेवाले नूडल्स और सूजी वाली मैक्रोनी कम बेहतर। एक कटोरी में करीब 200-250 कैलरी। 

सॉफ्ट ड्रिंक 
सॉफ्ट ड्रिंक्स में खाली कैलरी होती हैं, जिनकी कोई न्यूट्रिशन वैल्यू नहीं होती। कार्बोनेटिड डिंक होने की वजह से कैल्शियम और विटामिन-डी सोखने की क्षमता पर बुरा असर, जिससे हडिड्यों कमजोर होती हैं। 250 मिली में करीब 110 कैलरी। 

आइसक्रीम 
क्रीम और आर्टिफिशल कलर होते हैं। सोडियम भी खूब होता है। साथ में प्रिजर्वेटिव का भी इस्तेमाल। कॉलेस्ट्रॉल और मोटापे को बुलावा। एक छोटे कप में करीब 250-300 कैलरी। 

आलू टिक्की 
 आलू और स्टार्च से भरपूर, साथ ही डीप फ्राई। कॉलेस्ट्रॉल और सैचुरेटिड फैट काफी ज्यादा। मीठी चटनी में खूब शुगर। कुल मिलाकर सेहत के लिए नुकसानदेह। एक प्लेट (दो टिक्कियां ) में करीब 400 कैलरी। पकौड़ा/

समोसा 
आलू, मसाले, तेल... इनका कॉम्बिनेशन, उस वक्त और खतरनाक हो जाता है, जब बार-बार एक ही तेल में इन्हें तला जाता है। इससे ट्रांस फैटी एसिड्स बन जाते हैं। एक प्लेट पकौड़े या दो समोसे में करीब 300-350 कैलरी। मार्केट की बजाय घर पर बने बेहतर। 

चिप्स 
एम्पटी यानी खाली कैलरी (जिनका कोई फायदा नहीं) का भंडार। बैड फैट काफी ज्यादा, यानी हार्ट की बीमारियों के साथ-साथ मोटापे को भी बुलावा। सोडियम भी काफी ज्यादा, जोकि शरीर में पानी रोक लेता है। 100 ग्रा में 250-300 कैलरी। 

छोले-भठूरे 
तीखे मसाले से भरपूर छोले और साथ में मैदा के भठूरे। स्टार्च की तादाद ज्यादा। डीप फ्राई होने से सैचुरेटिड फैट भी खूब। मोटापे के साथ-साथ एसिडिटी को भी न्योता। एक प्लेट (छोले और दो भठूरे) में करीब 450 कैलरी। 

डिब्बाबंद फूड 
तमाम कैन्ड या डिब्बाबंद खानों में प्रिजर्वेटिव, शुगर और सोडियम काफी ज्यादा होता है। इनमें न्यूट्रिशन कम होते हैं और कई बार ये जहरीले (टॉक्सिक) भी हो जाते हैं। कैलरी फूड आइटम के अनुसार। 

ये भी बढि़या 
वेजिटेबल/फ्रूट सलाद 
टमाटर, तरबूज, चेरी, स्टॉबेरी, सेब आदि में लाइकोपिन नामक ऐंटि-ऑक्सिडेंट सबसे ज्यादा मिलता है। यह स्किन के लिए बहुत अच्छा होता है, हार्ट अटैक से बचाता है, सेल्स डैमेज और न्यूरो बीमारियों को रोकता है। हरी सब्जियों में फाइबर और ऐंटि-ऑक्सिडेंट भरपूर होते हैं। 

सोयाबीन 
कॉलेस्ट्रोल कम करता है। एनर्जी फूड है और शाकाहारी लोगों में प्रोटीन का सबसे बढ़िया सोर्स है। महिलाओं में मीनोपॉज स्टेज में बहुत असरदार। 

डार्क चॉकलेट 
ब्लडप्रेशर को कंट्रोल करती है। ऐंटि-ऑक्सिडेंट खूब होते हैं। चॉकलेट जितनी डार्क, उतनी बेहतर होती है। इनमें शुगर और फैट कंटेंट भी कम होता है। 

अलसी के बीज 
मोनोसैचुरेडिट फैट ज्यादा होने की वजह से कॉलेस्ट्रोल लेवल कम करता है। ओमेगा 3 का भी अच्छा सोर्स, खासकर शाकाहारी लोगों के लिए। 

ऐंटि-ऑक्सिडेंट का रोल 
इम्यूनिटी बढ़ाते हैं बीपी कंट्रोल में रखते हैं बुढ़ापे की रफ्तार को कम करते हैं सेल्स को डैमेज होने से रोकते हैं मेमरी और कंसन्ट्रेशन बढ़ाते हैं दिल की बीमारियों की आशंका घटाते हैं कैंसर की आशंका को कम करते हैं।

ओमेगा 3 
कॉलेस्ट्रोल कम करता है दिल की सेहत को दुरुस्त रखता है इम्यूनिटी बढ़ाता है ब्लड क्लॉटिंग में मदद करता है डिप्रेशन कम करता है मेमरी तेज करता है ।

नोट: खाने की इन सभी चीजों को पूरी तरह छोड़ना मुमकिन नहीं है। बेहतर है कि आप लिमिट में खाएं। हफ्ते में इनमें से एक-दो चीजें खा सकते हैं। इसी तरह खाते वक्त क्वांटिटी का भी ध्यान रखें। कम मात्रा में खाने से नुकसान काफी कम हो जाता है। 

एक्सर्पट्स पैनलः  डॉ. रितिका समादार, रीजनल हेड, डाइटेटिक्स, मैक्स हेल्थकेयर, शिखा, सीनियर डायटीशियन जयपुर गोल्डन हॉस्पिटल,शिवानी पासी, डायटीशियन, श्रीबालाजी ऐक्शन मेडिकल इंस्टिट्यूट(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,18.3.12)

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