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शुक्रवार, 10 मई 2013

आंतों का दुश्मन है इरिटेबल बाउल सिंड्रोम

इरिटेबल बाउल सिंड्रोम यानी आईबीएस आंतों की एक ऐसी बीमारी है जो मरीज़ की दिनचर्या में बाधा डालने लगती है। यह आंतों को डैमेज तो नहीं करती,मगर इसके लक्षण यह ज़रूर बताते हैं कि पेट के अंदर कुछ गड़बड़ चल रही है जिसे जल्द ही ठीक करने की ज़रूरत है। 

आईबीएस यानी आंतों में होने वाली अकड़न जिससे पेट में दर्द बना रहता है। इसे स्पैस्टिक कोलन, इरिटेबल कोलन, म्यूकस कोइलटिस जैसे नामों से भी जाना जाता है। इससे न केवल व्यक्ति को शारीरिक तकलीफ महसूस होती है, बल्कि उसकी पूरी जीवनशैली प्रभावित हो जाती है। यह आंतों को खराब तो नहीं करता लेकिन उसके संकेत देने लगता है। पुरुषों की तुलना में महिलाएं इस बीमारी से अधिक प्रभावित होती हैं। वैसे यह आंत या पेट के कैंसर के खतरे को नहीं बढ़ाता है लेकिन जीवन को अस्त-व्यस्त कर देता है। 

क्या हैं लक्षण 
-पेट में मरोड़ उठना 

-पेट में दर्द और सूजन 

-लगातार कब्जियत का बना रहना 

-बार-बार डायरिया जैसे लक्षण 

इसके कारण 
आईबीएस के सही कारणों का अब तक पता नहीं चला है। डॉक्टर्स मानते हैं कि संवेदनशील कोलन या कमजोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता के कारण यह समस्या पैदा हो सकती है। कई बार पेट में बैक्टीरियल इंफेक्शन के कारण भी आईबीएस हो सकता है। इसके कुछ खास कारण भी हैं जो अलग-अलग रोगियों में भिन्न हो सकते हैं- 
-कोलन का कमजोर मूवमेंट, जिससे मरोड़ के साथ काफी दर्द होता है। 

-कोलन में सेरोटोनिन की अनियंत्रित मात्रा, जिससे आंतों का मूवमेंट प्रभावित होता हैं।
 
-माइल्ड सेलिएक डिसीज के आंतों को डैमेज करने के कारण आईबीएस के लक्षण उभरने लगते हैं। 

संभव है इलाज 
आईबीएस का ऐसा कोई निश्चित इलाज नहीं है, लेकिन इसके लक्षणों से राहत जरूर मिलती है। इसके लिए कोई दवा आरंभ करने से पहले जीवनशैली में बदलाव की जरूरत होती है। इससे राहत पाने के लिए कुछ खास चीजों का ध्यान रखना भी जरूरी होता है। -रोजाना व्यायाम करें। -तनाव से बचें। -कैफीनयुक्त चीजें कम से कम लें। -खाना कम मात्रा में कई बार लें। -तले-भुने और स्पाइसी खाने से दूर रहें। -प्रोबायोटिक प्रोडक्ट्‌स लें जैसे दही आदि। 

कैसे होती है पहचान 
मरीज के लक्षणों के आधार पर आईबीएस का पता लगाना आसान होता है। कुछ खास प्रकार की डाइट का सुझाव दिया जाता है या फिर खाने में से कुछ चीजें कम कर दी जाती हैं, जिससे यह पता लगाया जा सके कि कहीं ये लक्षण किसी फूड एलर्जी के कारण तो नहीं है। स्टूल सैंपल के आधार पर इंफेक्शन का पता लगाया जाता है और ब्लड टेस्ट किया जा सकता है, जिससे यह पता लगाया जाता है कि रोगी एनिमिया से तो पीड़ित नहीं है। इसके आधार पर सेलिएक डिसीज यानी ग्लूटेन इनटोलरेंस का पता भी लगाया जाता है। इसकी जांच के लिए कोलनस्कॉपी की जाती है। इस टेस्ट के जरिए डॉक्टर कोलन की जांच करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर टिशू सैंपल लिए जाते हैं। इससे इस बात का पता लगाना आसान हो जाता है कि कहीं ये सारे लक्षण किसी और बीमारी के कारण तो नहीं है, जैसे कोलाइटिस या कोई अन्य क्रॉनिक डिसीज। मरीज की उम्र ५० वर्ष से अधिक है तो भी इस जांच की आवश्यकता पड़ती है।

इसके साथ जीवन 
आईबीएस के साथ जीना आसान तो नहीं होता क्योंकि इससे हमारी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होती है। लेकिन कुछ बातों को अमल में लाने से इसके साथ जीना भी आसान हो जाता है। वैसे दवाओं और सही तरीके से परहेज करने पर यह ठीक भी हो सकता है। टहलने और योग या ध्यान करने से काफी राहत मिलती है। पूरी नींद लेना इससे राहत के लिए काफी जरूरी है। एक्यूपंचर आदि भी लिया जा सकता है। 

विशेषज्ञ कहते हैं 
आमतौर पर आईबीएस तीन प्रकार का होता है, जिसमें रोगी को कब्जियत, डायरिया और दर्द की शिकायत रहती है। अब एक चौथे प्रकार के आईबीएस के लक्षण भी दिख रहे हैं, जिसमें इन तीनों के मिति लक्षण होते हैं। तलाभुने खाने, दूध और उससे बनी सामग्री से परहेज करें। तनाव से बचें(डॉ देवेंद्र सिंह, गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट, बिलासपुर का यह आलेख नई दुनिया के सेहत परिशिष्ट,मई प्रथमांक,2013 में प्रकाशित है)।

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गुरुवार, 10 मई 2012

कब्ज़ का प्राकृतिक उपचार

यदि आँतों में मल जमा हो जाए तो वह कब्ज़ में तब्दील हो जाता है। जमा हुए मल से छुटकारा पाने के लिए हर साल दुनिया भर में अरबों रुपयों की औषधियाँ खरीदी जाती हैं। जो वयस्क नियमित रूप से दिन में दो बार शौच के लिए नहीं जाते उनकी आँतों में मल सड़ने लगता है। भोजन में मैदे से बने पदार्थों का अधिक सेवन करना और रेशेदार फल अथवा सब्जियों से दूरी बनाए रखने से भी यह रोग होता है। जमे हुए मल के कारण विषाक्त पदार्थ शरीर में बढ़ने लगते हैं। 

ये कारण भी हो सकते है कब्ज़ के 
-खानपान में असंयम के कारण कब्ज़ रहने लगता है।

-भूख से अधिक भोजन का सेवन करना

-विपरीत प्रकृति के खाद्य पदार्थों का एक साथ सेवन करना

-रात्रि जागरण करना एवं समय पर भोजन नहीं करना 

- आँतों की कमज़ोरी (बीमारी के कारण)

-चाय-कॉफी का अत्यधिक सेवन करना

-दोनों समय अधिक मसालेदार भोजन करना।

-शौच को अनावश्यक रोकना। 

लक्षण
-भूख न लगना

-पेट भारी रहना

-आलस्य भरा रहना

-जीभ पर मैले से पदार्थ का जमा हो जाना

-चिड़चिड़ापन एवं सिरदर्द बना रहना 

- मुँहासे एवं त्वचा रोग होना 

- भोजन के तत्काल बाद बार-बार शौच की हाजत होना, एक बार में मल साफ न होना। 

प्राकृतिक उपचार 
ठंडे पानी या मिट्टी की पट्टी ३० मिनट तक पेट पर रखें। ठंडे पानी से कटि स्नान करें। कुनकुने पानी में नींबू का रस डालकर एनिमा लगाया जा सकता है। रात को सोते समय ऊनी अथवा सूती कपड़े की पेट लपेट की जा सकती है। तीन दिन तक उपवास करें तथा दिन भर में चार बार कुनकुने पानी में नीबू का रस डालकर सेवन करें। नारंगी रंग का सूर्य तप्त पानी दिन में आधा-आधा कप तीन बार लें।

आहार सुबह का नाश्ता : 
नाश्ते में मौसमी फल तथा अंकुरित धान्य लें। नाश्ते के तीन-चार घंटे के बाद भोजन करें। आँवले को पानी में गुड़ के साथ उबालें। ठंडा होने पर बीज निकालकर मिक्सी में क्रश कर लें। इसे घूँट-घूँट पिएं।

लंच : 
दोपहर के भोजन से पहले १५०-२०० ग्राम सलाद खा लें। हरी एवं पत्तीदार उबली हुई सब्जियों का सेवन करें। इसमें मसाले अल्प मात्रा में डालें। यदि बिना मसाले के खा सकें तो उससे बेहतर परिणाम आएँगे। लंच में चोकर युक्त आटे से बनी रोटी खाएँ। दही अथवा छांछ ज़रूर लें। हरी चटनी भी ले सकते हैं।

शाम का नाश्ता : 
कब्ज़ दूर करने में रात्रिकालीन भोजन का त्याग बहुत असरकारक माना गया है। शाम को अन्न का त्याग करते हुए फलों का हल्का नाश्ता लें। इससे पेट हल्का रहेगा तथा कब्ज़ को आँतों से हटाने में मदद मिलेगी। एक गिलास फलों का रस अथवा सूप पिएँ। पपीता, अमरूद, सेब फल, खजूर, प्राकृतिक चाय, तुलसी चाय, या नींबू शिकंजी ली जा सकती है। डिनर से पहले सूप अवश्य पी लें। सब्ज़ियों सहित बनाए गए दलिए अथवा पुलाव का सेवन करें। हफ्ते में दो से तीन बार हरी पत्तीदार सब्ज़ियों का सेवन करें। सांभर और खट्टे रसम का रोज़ाना सेवन करें।

जल चिकित्सा करें 
सुबह उषःपान की आदत डालें। इसके लिए तांबे के बरतन में रात भर रखे हुए पानी के चार गिलास पिएं। सूखे आँवले का पावडर ३० ग्राम पानी में भिगोकर रात भर के लिए रख दें। सुबह छानकर पी लें। बेड टी पीने की आदत वालों को एक कटोरी पानी में नींबू का रस निचोड़कर पीना चाहिए। सफेद कद्दू (पेठे का कद्दू) का रस २०० मिली लीटर रोज़ लें। सूर्य नमस्कार एवं घर्षण से कब्ज़ दूर होता है। फास्ट फूड, मैदा, वनस्पति घी तथा नॉनवेज भोजन न करें। ये सभी कब्ज़ कारक माने गए हैं(डॉ. अमिता शाह,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल चतुर्थांक 2012)। 


कुछ अन्य उपायः 
- कच्चे पालक का रस पीते रहने से कब्ज कुछ ही दिनों में ठीक हो जाती है। 


- पालक, बथुए की सब्जी, चौलाई, मसूर की दाल और सुखे मेवे खाने से भी कब्ज दूर होती है। 


- एक कच्चा प्याज नियमित रूप से भोजन के साथ खाने से कब्ज नहीं होती। 


- कब्ज की शिकायत हो तो रात को सोने से पहले पपीता खाएं। 


- मुनक्का दूध में उबालकर लेने पर इस समस्या से राहत मिलती है। 


- गर्म दूध में दो चम्मच गुलाब का गुलकंद डालकर लेने से पेट साफ होता है। 


- सोने से पहले पचास ग्राम शहद दूध में या पानी मिलाकर पीएं। 


- छाछ में अजवाइन मिलाकर पीने से भी कब्ज दूर होती है। 


- खाली पेट सेब खाने से कब्ज का नाश होता है। 


- सोते समय एरण्ड का तेल दूध में मिलाकर पीने से कब्ज दूर होती है(दैनिक भास्कर,उज्जैन,5.5.12)।

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गुरुवार, 12 जनवरी 2012

अपच दूर करने के कुछ घरेलू नुस्ख़े

अपच पाचन तंत्र की अनियमितता के कारण होती है। यदि सभी पाचक रसायन (एंज़ाइम्स) अपना काम ठीक से न करें तो इससे अपच की समस्या हो जाती है जो बहुत ही असुविधाजनक होती है। गैस बनना, पेट में जलन, एसिडिटी ये सभी अपच के लक्षण होते हैं। इन्हें दूर करने के लिए कई घरेलू नुस्खों को अपना सकते हैं -

-खाने के बाद आधा गिलास अन्नानास का रस या कुछ टुकड़े लेने से अपच दूर होती है। अंगूर और संतरे जैसे फलों से भी पाचन संबंधी गड़बड़ियाँ दूर होती हैं।

-एसिडिडी और अपच की समस्या बनी रहती हो तो खाने से १५-२० मिनट पहले एक कप कुनकुने पानी में नींबू का रस और काला नमक मिलाकर पीयें।

-एक कप कुनकुने पानी में आधा चम्मच जीरा और एक चौथाई चम्मच सौंफ का पावडर मिलाकर पीयें।  


-अदरक के बारीक स्लाइस काटकर इस पर नमक बुरक कर मुँह में रखें। 


-एक बड़ा चम्मच धनिए के रस में एक चुटकी नमक डालकर लें। 


-एक चौथाई चम्मच अजवाइन को सेक कर इसमें एक चुटकी काला नमक मिलाएँ। मिश्रण को एक कप कुनकुने पानी के साथ पीएं। नुस्खा गैस की समस्या के लिए असरकारी है। 


-दो चम्मच शहद में एक चम्मच नींबू और एक चम्मच अदरक का रस एक कप कुनकुने पानी में मिलाकर पीएं। 


-एक चुटकी हींग को आधे कप कुनकुने पानी में मिलाकर पीने से गैस की समस्या दूर होती है। 


-एक चौथाई चम्मच सौंठ, एक चुटकी नमक और एक चुटकी हींग के मिश्रण को एक कप कुनकुने पानी के साथ लें। -एक बड़ा चम्मच पुदीने के रस में एक चुटकी सेंधा नमक मिला कर लें। 


-खाना हड़बड़ी में खाने से एसिडिटी की समस्या होती है,इसलिए धीरे-धीरे अच्छे से चबाकर खाएं। 


-यदि गैस की समस्या अक्सर रहती हो,तो उन चीज़ों से परहेज़ करें जिनसे गैस अधिक बनती है जैसे फूलगोभी,पत्तागोभी,छोले आदि(सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर 2011 पंचमांक)।

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सोमवार, 9 जनवरी 2012

इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोमःक्या साफ नहीं होता आपका पेट?

यह एक आम समस्या है जो हर दस में से एक व्यक्ति को होती है। बार-बार टॉयलेट जाना या एक बार में पेट साफ नहीं होने को चिकित्सक इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम या आईबीएस कहते हैं। आमतौर पर २५ से ४५ की उम्र के लोगों में यह समस्या अधिक पाई जाती है। पुरुषों की तुलना में महिलाएँ इससे ज़्यादा प्रभावित होती हैं।

लक्षण...
-पेट दर्द होना, पेट फूलना और गैस बनना एवं मितली और उल्टी होना।

-इससे दस्त लग सकती है या फिर कब्ज़ हो सकती है। कभी-कभी ये दोनो समस्याएँ एक साथ भी हो सकती हैं। घबराहट, तनाव। कुछ लोग अवसादग्रस्त हो जाते हैं।

-इसके अलावा पीठ दर्द, थकान, सिर दर्द जैसी परेशानियाँ भी हो सकती हैं।

-आईबीएस से पीड़ित एक तिहाई लोगों को दस्त की समस्या होती है, अन्य एक तिहाई को कब्ज़ की शिकायत होती है और बाकी बचे मरीज़ इन दोनों ही समस्याओं से त्रस्त होते हैं। कभी पतले दस्त होने लगते हैं तो कभी पेट एक बार में साफ नहीं होता। हालाँकि आईबीएस का संबंध किसी जानलेवा बीमारी से तो नहीं है, फिर भी इससे व्यक्ति का जीवन काफी प्रभावित होता है।

सावधानियाँ... 
आईबीएस से बचने का कोई इलाज नहीं है लेकिन ये चीज़ें मददगार हो सकती हैं-
-दिनभर में क्या-क्या खाया? : एक डायरी बनाकर उसमें दिनभर में खाई गई चीज़ों को नोट करके रखें। इससे यह समझने में आसानी होगी कि कौनसी चीज़ खाने से लक्षण बढ़ जाते हैं। 

-खाना जब आँत में पहुँचता है तो इसमें सिकुड़न होने लगती है। खाना इसी तरह पूरी आँत से होकर बाहर निकलता है। खाने में वसा की मात्रा अधिक होने पर आँत में तेज़ी से सिकुड़न होने लगती है। इसलिए वसा की मात्रा कम करने से आईबीएस के लक्षणों में राहत मिल सकती है। 

-तली हुई चीज़ें और खाना पकाने के लिए तेल की मात्रा कम से कम कर दें। 

-फैटरहित दूध का इस्तेमाल करें। 

-खाने को तलने की बजाय भाप में पकाएँ या बेक कर लें। 

-एक बार में बहुत अधिक मात्रा में खाना खा लेने से परेशानी ब़ढ़ सकती है। 

-खाने को धीरे-धीरे अच्छे से चबाकर खाएँ। 

कारण
 इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम के लिए ज़िम्मेदार कारण स्पष्ट नहीं हैं इसीलिए इस समस्या से बचना काफी मुश्किल हो जाता है। लेकिन फिर भी कुछ चीज़ों से दूर रहने से समस्या कम हो सकती है। तनाव, समय पर खाना न खाना, असंतुलित आहार, भोजन में खाद्य रेशों की कमी होने पर समस्या ब़ढ़ सकती है, इसलिए इनसे दूर रहें। खाने की कुछ चीज़ें भी इसके लिए ज़िम्मेदार हो सकती हैं लेकिन यह हरेक व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकती हैं।  

निदान 
कुछ लोगों के पेट में संक्रमण होने पर भी आईबीएस जैसे लक्षण हो सकते हैं। इसीलिए इसके निदान के लिए चिकित्सक से संपर्क करें। यदि मलमार्ग से खून निकलता हो तो तुरंत चिकित्सक को दिखाएँ।

अन्य उपचार 
 पेट दर्द में राहत के लिए पिपरमिंट ऑइल का उपयोग किया जा सकता है। प्रोबायोटिक चीज़ें लेने से राहत मिल सकती है। इनमें मौजूद बैक्टीरिया से पाचन प्रक्रिया सुचारु होती है। दवाइयों के बजाय आहार में इन्हें शामिल करना बेहतर होता है। दही, छाछ, खमीर वाली चीज़ें जैसे ब्रेड आदि प्रोबायोटिक आहार होते हैं। अध्ययन बताते हैं कि इनसे पेट फूलने जैसे लक्षणों में राहत मिलती है।  

घुलनशील फाइबर 
 खाने में रेशे की मात्रा बढ़ाने से आईबीएस के लक्षणों में राहत मिल सकती है। घुलशील रेशे ज़्यादा फायदेमंद होते हैं। यह फलियों, आलू, सेवफल, संतरा, मौसंबी, ओट और जौ जैसी चीज़ों में मिलता है। अघुलशील रेशे कब्ज़ में फायदेमंद हो सकते हैं। यह चोकरयुक्त गेहूँ का आटा, अनाज, सीरियल और फलों व सब्ज़ियों के छिलकों से मिलता है।

चित्त रहे स्थिर 
 नींद की कमी तनाव का कारण बनती है इसलिए पूरी नींद ज़रूर लें। हफ्तेभर में कम से कम कुछ घंटे अपने लिए निकालें। सप्ताहभर बहुत ज़्यादा व्यस्त रहते हों तो तनावमुक्ति के लिए थैरेपी भी ले सकते हैं ताकि चित्त स्थिर रहे(डॉ. अश्मित चौधरी,सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर चतुर्थांक 2011)।

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शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

कब्ज दूर करें योग से

हमारी अधिकांश बीमारियों का कारण पेट के रोग होते हैं और पेट के रोगों में प्रमुख है कब्ज। दिल्ली जैसे महानगरों में तो कब्ज की समस्या और आम है, क्योंकि भागदौड़ और व्यस्तताओं से भरी दिनचर्या में अपने पेट का पूरा ख्याल नहीं रख पाते। योग की सहायता से कब्ज की समस्या से निजात पा सकते हैं।

हमारे शरीर में अधिकांश बीमारियों का कारण पेट के रोग होते हैं और पेट रोग का प्रमुख कारण कब्ज है। खासकर महानगरों की व्यस्त दिनचर्या में हम न तो समय पर खाना खा पाते हैं और न ही नित्यक्रियाओं का ध्यान रख पाते हैं।
कब्ज कारण
भोजन-समय की अनियमितता
सुबह-शाम शौच ठीक से ना होना
बासी भोजन का सेवन
धूम्रपान एवं मदिरा का सेवन
कम पानी पीना
रात्रि में जगना और सामान्य शारीरिक व्यायाम का अभाव
मिर्च-मसाले वाले भोजन का सेवन
गोस्त, फास्ट-फूड, मैदा आदि का सेवन

प्राकृतिक उपचार
कब्ज से ग्रसित व्यक्ति को अपने भोजन को बार-बार चबाकर खाना चाहिये। एकाग्रचित्त होकर खूब चबा-चबाकर खाने से मुंह का लार रस भली-भांति मिल जाता है, जो पाचन क्रिया में बहुत सहायक होता है। अधिक चबाकर खाने से दांतों, मसूढ़ों और चेहरे की मांसपेशियों का व्यायाम भी होता है। कब्ज से पीड़ित व्यक्ति को आहार में रेशों की मात्र वाली सब्जियों और फलों का सेवन करना चाहिए, जिससे मल निकासी आसान हो जाती है। सेब, दाल, सूप अथवा कांजी का प्रचुर मात्र में सेवन करना चाहिए। रात के भोजन के बाद टहलना लाभदायक है।

रात में सोने से पहले तांबे के किसी बरतन में पानी रखें। प्रात:काल शौच जाने से पहले इस पानी को पीएं। पेट में कब्ज नहीं रहेगी। दिन-भर में कम से कम 15 से 18 गिलास पानी पीएं। हमेशा भूख से थोड़ी कम मात्र में भोजन लेना चाहिए। भोजन के एक घंटे बाद तक पानी नहीं पीना चाहिए।
 
योगाभ्यास और कब्ज निवारण
कहा जाता है कि ‘काया राखे धरण और पूंजी राखे व्यवहार’। अर्थात जिस व्यक्ति का शरीर रूपी मंदिर स्वस्थ रहेगा तो वह अपने ही काम नहीं, बल्कि परोपकार व सेवा भावना भी कर सकेगा। योगाभ्यास में कुछ आसनों और मुद्रा के माध्यम से हम इस रोग से मुक्ति पा सकते हैं। इनमें प्रमुख हैं- अग्निसार क्रिया, मयूरासन, वज्रासन, सुप्तपवनमुक्तासन, पश्चिमोत्तान आसन, धनुरासन, मत्स्यासन, कूर्मासन, चक्रासन, योग मुद्रा। प्रस्तुत है
 
अग्निसार क्रिया व मयूरासन की विधि-
अग्निसार क्रिया विधि: पद्मासन या सुखासन की स्थिति में या फिर खड़े होकर भी अग्निसार क्रिया की जा सकती है। अपने दोनों हाथ घुटनों पर रखें और सांस छोड़कर पेट अन्दर खींचें और उसे तेजी से 8-10 बार छोड़ें व पिचकाएं। फिर यथासंभव अपनी क्षमता अनुसार जब तक आप सांस रोककर यह क्रिया कर सकते हैं करें, उसके बाद सांस लें। और फिर सारा श्वास बाहर निकालकर पेट को अन्दर-बाहर खींचें। शुरू-शुरू में अभ्यास 4 से 5 बार करना चाहिए।
लाभ: इस क्रिया के द्वारा मंदाग्नि दूर होकर जठराग्नि प्रदीप्त होती है। कब्ज के लिए यह रामबाण है। पेट का कड़ापन, वायु, गोला और तिल्ली में लाभदायक है। मासिक संबंधी विकार दूर होते हैं और मोटापे के लिए लाभदायक है।
विशेष: इसको करने की जल्दबाजी न करें। यह क्रिया हमेशा खाली पेट करनी चाहिए। हृदय रोग और हाई ब्लड प्रेशर के रोगियों के लिए यह वजिर्त है।
मयूरासन विधि: इसमें शरीर की आकृति मोर जैसी हो जाती है। भूमि पर आसन बिछाकर सर्वप्रथम वज्रासन लगाइए। जांघों और नितम्बों को उठाते हुए आगे की ओर झुकिये। दोनों हाथों एवं घुटनों के बल मयूर की आकृति में आएं। हथेलियां व पंजों और दोनों कोहनियों को नाभि से लगाते हुए दोनों टांगों को भूमि से ऊपर उठाइये। टांगों को पीछे की ओर तानिये, शरीर का भार बाहों और कोहनियों पर डालते हुए धरती के समान्तर शरीर को उठाइये। शुरू में यह आसन एक बार ही करें। धीरे-धीरे क्षमता के अनुसार बढ़ाएं।
लाभ: पेट के रोग, कृमि और कब्ज के लिए यह रामबाण है और हृदय और छाती, अमाशय एवं आंतों के लिए लाभप्रद है।
विशेष: वृद्ध एवं कमजोर स्त्रियों के लिए यह वजिर्त है। यह एक कठिन आसन है। इसे करने के लिए अभ्यास की जरूरत है। जल्दबाजी ना करें(सुनील सिंह,हिंदुस्तान,दिल्ली,4.8.11)।

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बुधवार, 23 मार्च 2011

खाना ही नहीं,पचाना भी ज़रूरी

खाने को लेकर लोगों की रूचि में पिछले पांच साल में खास बदलाव आया है। थाली में पौष्टिक आहार की जगह रेडीमेड आटे की रोटी, संरक्षित फल व सब्जियां, हाई कैलोरी युक्त चावल और अधिक वसा युक्त तेल का प्रयोग बढ़ गया है। हल्के भोजन की जगह गरिष्ठ व जंक फूड ने खाना न पचने की समस्या को आम बना दिया है।

लेकिन खाने की पसंद बदलने के साथ ही पेट की गड़बड़ियां भी बढ़ी हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी हाल ही में भारत में बढ़ती पेट संबंधी परेशानियों को गंभीर बताया है।

विशेषज्ञों की मानें तो खाने के स्वाद व जायके को लेकर तो लोग फिक्रमंद हुए हैं, लेकिन उसे पचाने को लेकर भी जागरूक होना जरूरी है। इसकी वजह से पाचन संबंधी परेशानी प्रत्येक दस में से तीसरे व्यक्ति को हो रही है। होली व दिवाली जैसे त्यौहार में यह परेशानी बढ़कर चार गुना तक हो जाती है। इसलिए सावधानी से त्यौहार के व्यंजनों का मजा लें।

बड़ों के साथ ही बच्चे भी परेशान
ऑल इंडिया पीडियाट्रिक एसोसिएशन के अध्ययन के अनुसार खाने की आदत बच्चों के स्वास्थ्य को भी तेजी से बदल रही है। लिवर कमजोर होना, सिलिएक व क्रानिक एनीमिया ऐसी बीमारियां हैं तो काफी हद तक खाना न पचने से ताल्लुक रखती है।

मूल चंद अस्पताल के पीडियाट्रिशियन डॉ. शेखर वशिष्ठ कहते हैं कि दो साल से पांच साल के बीच बच्चों में लिवर कमजोर होने की शिकायत देखी जा रही है। इस उम्र में बच्चों के विकास के साथ ही सही आहार भी जरूरी है, लिवर कमजोर होने से पाचन क्रिया तेजी से बाधित होती है और उम्र के अनुसार लंबाई नहीं बढ़ पाती।

इस स्थिति में विशेष रूप से ऐसा खाना दिया जाना चाहिए जिससे बच्चा आसानी से पचा लें। इसमें फुल ग्रेन आटे के साथ हरी सब्जियों को सही बताया गया है। ध्यान रखा जाए कि बाजार के फ्री फ्लोर आटे को पचने के लिए अधिक कारगर नहीं माना गया है। फ्रूट जूस, जैम, जैली, मुरब्बा व आचार आदि खाद्य पदार्थ, जिसमें प्रिजर्वेटिव्स का इस्तेमाल किया जाता है, परहेज रखें।

समझें, पाचन संबंधी साधारण दिक्कतें
कोलाइटिस : पेट में नियमित दर्द और पेचिश की समस्या कोलाइटिस का लक्षण हो सकती है। आंतों में जख्म के कारण खाना कुछ भी खाया जाए वह पच नहीं पाता। कोलाइटिस को हालांकि दवाओं से ठीक किया जा सकता है, बावजूद इसके पेट में दर्द व भूख न लगने की शिकायत को हल्के में न लें।

फैटी लिवर : फैटी लिवर हालांकि लिवर की बीमारी है, लेकिन इसका सीधा ताल्लुक पेट से हैं। लिवर के एक प्हस्से में सूजन बढ़ने से लिवर खाने-पचाने में सहायक द्रव्य का स्नव नहीं हो पाता। ऐसे में मोटापा बढ़ने व जलन की समस्या आम बात है। अधिक मांसाहारी व एल्कोहल सेवन फैटी लिवर का कारक माना जाता है।

एसिडिटी व कब्ज : मसालों का थोड़ा भी अधिक प्रयोग कुछ लोगों में एसिडिटी व जलन संबंधी दिक्कत पैदा करता है। दरअसल प्रत्येक व्यक्ति का शरीर व अमाश्य पाचन संबंधी क्रिया पर अलग-अलग प्रतिक्रिया करता है। अनसैचुरेटेड फैट के साथ अधिक मसाले एसिडिटी का कारण हो सकते हैं। जिनसे बचने के लिए अधिक पानी व नींबू पानी कारगर है। यदि कब्ज की शिकायत है तो खाने में तरल चीजों को अधिक शामिल करें। लंबे समय तक कब्ज अन्य बीमारियों को जन्म दे सकती है।

डिहाइड्रेशन- बासी या मिलावटी चीज खाने से बार-बार उल्टी की समस्या हो सकती है। इस स्थिति में तेजी से शरीर में पानी का स्तर गिर जाता है। डिहाइड्रेशन से बचने के लिए शुद्ध और हाइजीन चीजों का ही सेवन करें।


हेल्थ टिप्स
त्यौहार के दिनों के लिए कुछ खास 
-मैदे से बनी हुई चीजें पाचन क्रिया को तेजी से प्रभावित करती हैं, क्योंकि मैदा फाइबर पदार्थ नहीं इसलिए आमाश्य में पहुंच कर इसे पचने में अधिक समय लगता है। इसलिए त्यौहार में मैदे से बनी चीजों का कम से कम प्रयोग करें।

-खाने की चीजों में यदि रंग का प्रयोग किया गया है तो वाकिफ हो जाएं कि इन रंगों को खाद्य एवं प्रसंस्करण विभाग ने स्वीकृति दी है या नहीं। इस समय खाने के केवल छह रंग खाद्य सामग्रियों में मिलाए जा सकते हैं।

-नमकीन व दालमोठ में इस्तेमाल किया गया तेल अनसैचुरेटेड व मार्फीन युक्त हो सकता है। कोशिश करें कि घर में ही नमकीन तैयार करें, यदि बाजार से लाएं तो यह ओमेगा थ्री आयल से ही बनी हुई हों।

-दूध या दूध से बनीं चीजें भी तुरंत पाचन क्रिया को प्रभावित करती हैं। दही, मठ्ठा, खोया या पनीर का प्रयोग करते हुए इसके बेहतर होने की गारंटी अवश्य लें।

खाना पचाने के कुछ नुख्से
-पेट की रहती है गड़बड़ी तो पानी का अधिक सेवन करें 
-खाने से पहले या बाद में सौंफ या अजवाइन है बेहतर 
-काला नमक व मेथी भी की जा सकती है खाना पचाने के लिए प्रयोग 
-भोजन करने के बाद 10 से 15 मिनट टहलना हो सकता है बेहतर 
-खाते समय टीवी देखना या अखबार पढ़ना भी ठीक नहीं।
(निशि भाट,हिंदुस्तान,दिल्ली,15.3.11)

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शनिवार, 1 जनवरी 2011

बदहजमी या गैस में "सुप्त पादांगुष्टासन"

असाधारण जीवन और खान-पान की वजह से आज अधिकांश लोगों को पेट संबंधी कई रोग घेर लेते हैं। सामान्यत: कब्ज, अपच, बदहजमी, गैस जैसी समस्याएं बहुत से लोगों को रहती है। इन सभी समस्याओं से निजात पाने का चमत्कारिक उपाय है सुप्त पादांगुष्टासन। इस आसन को प्रतिदिन करने से यह सभी समस्याएं आपसे हमेशा दूर रहेंगी।

आसन की विधि
समतल स्थान पर कंबल बिछाकर सीधे लेट जाएं। सांस सामान्य रखें। अब दाएं पैर को ऊपर की उठाएं। दाएं हाथ से पैर को पकड़कर खींचे। इस दौरान सांस बाहर निकालें। कुछ देर इसी अवस्था में रहें। फिर धीरे-धीरे पैर को छोड़कर पुन: प्रारंभिक अवस्था में आ जाएं। तत्पश्चात बाएं पैर को ऊपर उठाएं और बाएं हाथ से पैर पकड़कर खींचें। थोड़ी देर बार पैर छोड़कर पुन: प्रारंभिक अवस्था में आए जाएं।

आसन के लिए सावधानी
इस आसन में प्रारंभ में परेशानी हो सकती है। अत: नियमित अभ्यास से आप इसे अच्छे से कर सकेंगे। पैर का ज्यादा ना खिंचें।

आसन के लाभ
इस आसन के नियमित अभ्यास से पेट संबंधी कई समस्याओं से निजात मिल जाती है। नाभि को ठीक करने के लिये यह आसन काफी लाभदायक है। साथ ही गैस, पेट दर्द, कब्ज, अतिसार, दुर्बलता एवं आलस्य ये स्वत: ही दूर हो जाते हैं। आमाशय, अग्नाशय एवं आंतों के लिए यह आसन त्वरित लाभ पहुंचाने वाला हैं(दैनिक भास्कर,उज्जैन,30.12.2010)।

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सोमवार, 20 दिसंबर 2010

कब्ज और एसीडिटी में "सेतुबंध" आसन

आज अधिकांश लोगों को पेट से जुड़ी कई छोटी-छोटी समस्याएं परेशान करती हैं। इस समस्याओं में पेट दर्द एक आम बात है। असंतुलित खाने की वजह से किसी को भी पेट संबंधी कई बीमारियां हो जाती हैं, जैसे कब्ज, एसीडीटी, समय पर भूख ना लगना, आंत संबंधी बीमारियां, कमर दर्द इत्यादि। यदि आप भी इन सभी बीमारियों से परेशान हैं तो नियमित रूप से सेतुबंध आसन करें। आसन निश्चित ही आपका एक नई ऊर्जा प्रदान करेगा और इन बीमारियों में राहत देगा।

आसन की विधि:
समतल स्थान पर कंबल या अन्य कपड़ा बिछाकर पीठ के बल लेट जाएं। दोनो हाथ सीधे और शरीर के पास और हथेलियों को जमीन की ओर रखें। दोनो पैरों के घुटनों को ऊपर की ओर उठाएं ताकि पैर के तलवे जमीन से लग जाए। अब सांस भरें, कुछ पल के लिए सांस रोकें और धीरे-धीरे कमर को भी जमीन से ऊपर उठाएं। कमर को इतना ऊपर उठाए कि छाती ठुड्डी से स्पर्श करने लगे। साथ ही बाजुओं को कोहनी से मोड़कर हथेलियों को कमर के नीचे लगा लें। अब इस अवस्था में कमर और शरीर का भार आपकी कलाइयों और हथेलियों पर आ जाएगा। सांस सामान्य कर लें। वैसे तो इस आसन में इतना कर लेना पर्याप्त है परंतु अत्यधिक लाभ के लिए दोनो पैरों को आगे की ओर सरकाते जाएं ताकि घुटने सीधे हो जाएं और पैर का तलवा जमीन से लग जाए। दोनो पैरों को आपस में मिलाकर रखें। कुछ देर इसी अवस्था रुकें और फिर धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए हाथ सीधे कर कमर को नीचे कर लें। पैरों को भी सीधा कर कुछ देर शवासन में विश्राम करें। इसे व्यावहारिक रूप में यहां देखा जा सकता है
सावधानियां
- आसन को पूर्ण नियंत्रण के साथ किया जाना चाहिए। ध्यान रहें शरीर को किसी प्रकार का झटका ना लगे।
- अगर आपकी कमर, हथेली और कलाई पर अत्यधिक भार महसूस हो तो पहले भुजंगासन, शलभासन और पूर्वोत्तानासन का अभ्यास एक-दो महीने तक करें।
- जिन्हें पहले से अधिक कमर-दर्द, स्लिप डिस्क या अल्सर की समस्या हो, वे सेतुबंधासन का अभ्यास न करें या योग शिक्षक की देखरेख में ही अभ्यास करें।

आसन के लाभ
- आसन रीढ़ की सभी कोशिकाओं को अपने सही स्थान पर स्थापित करने में सहायक है।
- ये आसन कमर दर्द को दूर करने में भी सहायक है. पेट के सभी अंग जैसे लीवर, पेनक्रियाज और आंतों में खिंचाव आता है. कब्ज की समस्या दूर होती है और भूख भी समय पर और खुलकर लगती है(दैनिक भास्कर,उज्जैन,19.12.2010)।

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शनिवार, 6 नवंबर 2010

कब्ज़

सुबह सवेरे अच्छे से पेट साफ होना, हेल्थी होने की सबसे बड़ी निशानी है। मगर खान-पान में अनियमितता, भागदौड़ भरा जीवन और इसके चलते पैदा हुआ तनाव, हर सुबह मोशन की जंग लड़वाता है। कब्ज से सिर्फ बूढ़े ही नहीं जवान भी परेशान रहते हैं। मगर थोड़ी सी सावधानी से इस पर काबू पाया जा सकता है। विशेषज्ञों से बात कर नरेश तनेजा बता रहे हैं कब्ज दूर करने के उपाय :
आंतों की गतिशीलता कम होना या पाचन शक्ति कम होने से खाना सही ढंग से हजम नहीं होता और पचकर बचा हुआ अंश बड़ी आंत में समय पर नहीं पहुंच पाता। खाया गया भोजन सबसे पहले आमाशय या पेट में जाता है। वहां से पाचक रसों के साथ मिलकर छोटी आंत में चला जाता है, जहां उसका अन्य तत्वों के साथ पूर्ण पाचन होता है। पाचन के पूरा हो जाने के बाद यहां से आवश्यक रस या तत्व लीवर से होते हुए शरीर के अन्य अंगों की ओर चले जाते हैं, जबकि बचा हुआ बेकार पदार्थ बड़ी आंत की ओर खिसक जाता है। यह बचा हुआ पदार्थ बड़ी आंत के रास्ते मलमूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकलता है। लेकिन अगर पाचन कमजोर है तो बचा हुआ पदार्थ सही समय पर बड़ी आंत में नहीं पहुंच पाता। नतीजतन जब सुबह मलत्याग की कोशिश होती है, तो पेट ठीक से साफ नहीं होता। इसी को कब्ज कहते हैं।
आयुर्वेद
आयुर्वेद के अनुसार शरीर में वात के बढ़ने से कब्ज होती है। खान-पान की गलत आदतें, जितनी भूख लगी है, उससे ज्यादा खाना, मीट और ऐसे ही मुश्किल से पचने वाली भारी अन्न पदार्थों को खाना और फल-सब्जियां-सलाद कम खाने से कब्ज होती है। नींद पूरी न होना, तनाव-भय-चिंता या शोक आदि से भावनात्मक दबाव पैदा होता है, जिससे मल त्याग के रास्ते में रुकावट पैदा होने और आंतों में विषाक्त तत्व जमा होने के अलावा नर्वस सिस्टम ज्यादा उत्तेजित रहने के कारण भी कब्ज बन जाती है। नशीली दवाएं व स्मोकिंग भी कब्ज का कारण है।
कैसे पहचानें कब्ज
अगर रोजाना ढंग से पेट साफ नहीं होता।
हमेशा ऐसा लगता रहे कि पेट से मल पूरी तरह से बाहर नहीं निकला है।
बार-बार टॉइलेट जाएं, मगर फिर भी मोशन आने का अंदेशा बना रहे। इसे सीधे तौर पर कब्ज नहीं कहा जाता, मगर यह कब्ज का ही एक रूप यानी उदर विकार ( पेट साफ न होने की बीमार) है।
कब्ज के लक्षण
गैस बनना, पेट में हवा भरना, पेट में दर्द या भारीपन, सिरदर्द, भूख में कमी, जीभ पर अन्न कणों का जमा होना या मुंह का स्वाद बिगड़ना। चक्कर आना, टांगों में दर्द होना, बुखार, नींद-सी छाई रहना और धड़कन का बढ़ जाना।
कब्ज के कारण
नाभि का ऊपर की तरफ खिसक जाना।
बहुत ज्यादा मानसिक तनाव में रहना।
तला-भुना, मसालेदार गरिष्ठ भोजन करना।
एलोपैथिक दवाओं का ज्यादा सेवन करना।
खाने का समय नियमित न होना।
टॉइलेट जाने की जरूरत महसूस होने पर भी तमाम वजहों से उसे टालते रहना।
अधिक सेक्स करने की वजह से नाभि अपनी जगह से खिसक जाती है, इसकी वजह से शरीर कमजोर होने से तमाम विकार उत्पन्न हो जाते हैं। इस वजह से कब्ज भी हो जाता है।
स्मोकिंग या तंबाकू के दूसरे तरीकों से सेवन के कारण। नशीली दवाओं के सेवन से।
कोल्ड ड्रिंक या शराब जरूरत से ज्यादा पीने की वजह से।
जितनी भूख लगी है, उससे कम खाना खाना।
आयुर्वेद में कब्ज का इलाज
हिमालय ड्रग्स की हर्बोलेक्स की दो गोली, रात को गुनगुने पानी से।
गंधर्व हरीतकी चूर्ण आधा से एक चम्मच, रात को गुनगुने पानी से।
स्वादिष्ट विरेचन चूर्ण आधा से एक चम्मच, रात को गुनगुने पानी से।
त्रिवृत्त चूर्ण आधा से एक चम्मच, रात को गुनगुने पानी से।
सेज कंपनी का त्रिफला सीरप दो चम्मच पानी के साथ। शुगर के पेशंट्स के लिए इस दवा का इस्तेमाल न करें।
सीगल कंपनी का फिगोलेक्स सीरप दो चम्मच, रात को पानी के साथ।
सॉफ्टोवैक पाउडर एक से दो चम्मच। यह दवा ईसबगोल का ही एक रूप है। शुगर पेशंट्स के लिए यह पाउडर सॉफ्टोवैक-एसएफ या शुगर फ्री के नाम से आता है।
त्रिफगोल एक चम्मच पाउडर, रात को पानी से।
बिल्वादि चूर्ण एक चम्मच, गुनगुने पानी से।
केस्टॅर ऑयल (अरंड का तेल) दो छोटे चम्मच। इसमें थोड़ा सा गुनगुना पानी या दूध मिला लें।
आरोग्यवधिर्नी वटी दो-दो गोली सुबह-शाम पानी से।
गुलकंद एक-एक चम्मच सुबह-शाम दूध से।
पंचसकार चूर्ण एक चम्मच रात के समय।
नोट - इनमें से कोई एक उपाय करें।
ऐलोपैथी
क्या है कब्ज
अगर शौच जाने पर निकलने वाला मल सख्त हो या उसके निकलने में बहुत जोर लगाना पड़े या मल की प्रकृति सामान्य न हो, तो उसे कब्ज कहते हैं।
कब्ज के कारण
कई ऐसी बमारियां हैं, जिनकी वजह से कब्ज की बीमारी हो जाती है। मसलन रसौली ( आंत में गांठ) की बीमारी की वजह से कब्ज हो जाता है। इसी तरह किसी वजह से आंत में रुकावट आने की वजह से भी कब्ज हो जाता है। ऐसे मामलों में डॉक्टर से सलाह करें। ज्यादातर मामलों में ऑपरेशन किया जाता है।
अगर किसी को हाल ही में कब्ज शुरू हुआ है, पेट में तेज दर्द होता हैया पेट बुरी तरह फूल जाता है। उल्टियां आ रही हैं या फिर मोशन के दौरान ब्लड आ रहा है, तो फौरन डॉक्टर से सलाह लें।
लगातार पेनकिलर्स या नॉरकोटिस, एनलजेसिक या दर्द निवारक दवाएं खाने वाले भी कब्ज का शिकार हो जाते हैं। यदि ऐसी दवाओं को रोक दिया जाए तो कब्ज ठीक हो जाएगी।
हॉरमोंस की प्रॉब्लम, थाइरॉयड या शुगर से भी कब्ज हो जाती है।
पारकिन्सन्स, पैरालिसिस से ग्रस्त या बिस्तर पर लेटे रोगियों को भी कब्ज हो जाती है।
क्या है इलाज
अगर कब्ज से दूर रहना है, तो छोटी मोटी शारीरिक परेशानियों में फौरन दवा खाने की आदत से बचें। मतलब यह है कि कम से दवाइयां खाएं।
खानपान का ध्यान रखें। हरी और रेशेदार सब्जियां और लिक्विड मसलन, दूध, फलों का रस, शिकंजी आदि का सेवन करें।
रेग्युलर एक्सर्साइज करें। अगर वजन सही अनुपात में है और बॉडी फिट है, तो कब्ज की आशंका कम ही रहती है।
कब्ज की दवाओं के सहारे पेट साफ करने की आदत सही नहीं है। लंबे समय तक इन दवाओं को खाने से अंतडि़यों में सूजन आ जाती है। इन दवाओं की आदत भी पड़ जाती है।
दूध-दही या पानी के साथ रात के समय ईसबगोल की भूसी दो चम्मच लें।
अगर ऊपर बताए उपाय करने पर भी कब्ज से आराम नहीं मिल रहा है, तो कुछ दिनों के लिए लेक्टोलॉज 15 एमएम की गोली ले सकते हैं।
डॉक्टर मनोवैज्ञानिक सलाह और ट्रेनिंग के जरिए भी कब्ज के रोगियों का इलाज करते हैं।
योग के जरिए कब्ज का इलाज
कपालभाति प्राणायाम धीरे-धीरे एक बार में जितना कर सकें। ऐसे तीन से चार राउंड करने की सलाह दी जाती है। इसे करते समय आंखें बंद रखें और ध्यान पेट पर लगाएं। मन में यह भाव लाएं कि आंतों की क्रियाशीलता बढ़ रही है और कब्ज दूर हो रहा है।
अग्निसार क्रिया, उर्ध्व हस्तोत्तानासन, पवनमुक्तासन, भुजंगासन, मंडूकासन और भस्त्रिका प्राणायाम।
धनुरासन, उत्तानपाद, पश्चिमोत्तानासन, मत्स्यासन भी कब्ज दूर करने में सहायक होते हैं।
कोई भी आसन तीन से चार बार कर सकते हैं। मगर गोल्डन रूल यही है कि योग अपनी शक्ति और सार्मथ्य के हिसाब से ही करें, जबरन नहीं।
दो-तीन दिन में एक बार गुनगुने पानी की एनीमा लें।
कुछ दिनों के अंतराल पर लघु शंखप्रक्षालन करते रहें।
क्या होता है लघु शंखप्रक्षालन-
सुबह खाली पेट नमक मिला गुनगुना पानी पीकर कुछ विशेष आसन करने होते हैं। उसके बाद मोशन के जरिए पेट की सफाई होने लगती है।
मुद्रा विज्ञान के जरिए इलाज
अपान मुद्रा को एक से पचीस मिनट तक रोजाना करें।
हॉम्योपैथी
हॉम्योपैथी किसी भी बीमारी के मूल कारणों को दूर करने पर जोर देती है। कब्ज की अलग-अलग वजहों के लिए हॉम्योपैथी में अलग-अलग दवाएं हैं-
डाइट चार्ट
कब्ज की सबसे बड़ी वजह होती है खान-पान की अनियमितता। अगर हमें पता हो कि कौन सी चीजें खाने से पेट अच्छे ढंग से साफ होता है और कौन सी चीजों से कब्ज होता है, तो खानपान के सहारे ही इस बीमारी से दूर रहा जा सकता है।
खाएं
फल - मौसमी, संतरा, नाशपाती, तरबूज, खरबूजा, आड़ू, अन्ननास, कीनू, सरदा, आम, शरीफा, अमरूद, पपीता व रसभरी, थोड़ा-बहुत अनार। यानी मुख्य रूप से रेशेदार फल ही लें।
सब्जियां - रसे वाले या दूसरी सब्जियों में मिलाकर बनाए गए आलू, बंदगोभी, फूलगोभी, मटर, सभी प्रकार की फलियां, शिमला मिर्च, तोरी, टिंडा, लौकी, परमल, गाजर, थोड़ी बहुत मेथी, मूली, खीरा , ककड़ी, कद्दू- पेठा, पालक, नींबू व सरसों। कब्ज के लिए बथुआ खास तौर पर अच्छा होता है।
दालें - उड़द की छोड़कर सभी साबुत यानी छिलके वाली दालें।
अनाज- रोटी बनाने के लिए गेंहूं के आटे में काले चने का आटा या चोकर मिलाकर आटा गूंदें। पांच किलोग्राम आटे में में ढाई सौ ग्राम चोकर मिला लें।
चावल कम खाएं।
क्रीम निकला हुआ यानी टोंड दूध ही पीएं।
कोल्ड ड्रिंक के रूप में शर्बत, शिकंजी, नींबू पानी या लस्सी को प्राथमिकता दें।
जमकर पानी पिएं।
परहेज करें
फल- चीकू, केला, सेब, अंगूर, शरीफा, लीची।
सब्जियां -अरबी, भिंडी, कचालू, रतालू, बैंगन, जिमीकंद, चुकंदर।
दालें -राजमा, सफेद छोले, साबुत उड़द, चने, सोयाबीन, लोबिया (खास तौर पर रात के वक्त इन्हें खाने से परहेज करें)
मीट, अंडा व मछली कब्ज करती हैं। इन्हें दूसरी सब्जियों के साथ मिलाकर खाएं।
जूस के बजाय साबुत फल खाएं।
पनीर, मक्खन व घी से बचें। पनीर को पालक के साथ खा सकते हैं।
मलाई वाला दूध।
ध्यान दें
फास्ट फूड, जंक फूड यानी मैदे आदि से बनी चीजों से परहेज करें।
सॉफ्ट ड्रिंक, शराब और सिगरेट-तंबाकू से दूर रहें।
लाइफ स्टाइल में सुधार लाएं। दवाओं पर निर्भर न रहें।
पपीता खाएं। कब्ज के रोगियों को इस गूदेदार फल से बहुत लाभ मिलता है।
किशमिश या मुनक्के के बीज निकालकर 5 से 10 दाने रोजाना भिगोकर खायें। अगर भिगोकर खाने में सहूलियत नहीं, तो ऐसे ही खा लें। मुनक्का दूध के साथ भी ले सकते हैं।
जिन्हें कब्ज की शिकायत है, वे सेब और अनार न खाएं। इन फलों से कब्ज बढ़ता है। गैस बनने की वजह से भी कब्ज की शिकायत होती है। इसलिए ऐसी चीजों से परहेज करें, जिनसे गैस बनती है।
स्मोकिंग से मोशन बनने का मिथ
कुछ लोग मोशन के वक्त बीड़ी-सिगरेट या गुटखे आदि की तलब की बात करते हैं। उनका कहना होता है कि इसके बिना पेट साफ ही नहीं होता। कुछ लोग टॉइलेट जाते समय अखबार साथ लेकर जाते हैं। ऐक्सपर्ट्स का कहना है कि निकोटीन को किसी भी फॉर्म में लेने का पेट साफ करने से कोई संबंध नहीं है। सिर्फ यह दिमाग का भ्रम है। जरूरत अपनी विल पॉवर को मजबूत करने की है। शुरुआत में कुछ दिक्कत लग सकती है। ऐसे में गर्म पानी पिएं। धीमे-धीमे आदत छूट जाएगी।
अखबार की आदत भी ठीक नहीं है। इससे टॉइलेट में ध्यान बंटा रहता है, जिससे पेट साफ नहीं हो पाता। शौच के समय ध्यान को पेट पर रखें और भाव रखें कि अंदर रुका हुआ मल बाहर आ रहा है। जोर न लगाएं, इससे बवासीर हो सकती है। टॉइलेट में ज्यादा वक्त तक बैठे रहने से भी पेट साफ होने का कोई संबंध नहीं है।
शुगर पेशंट को अकसर हाजमा खराब रहने और कब्ज की शिकायत होती है। शुगर पेशंट्स की आंत पर शुगर की वजह से असर पड़ता है। आंतों में मल का मूवमेंट स्लो हो जाता है। इसी वजह से कब्ज हो जाता है। शुगर के रोग निम्न तरीके अपना सकते हैं-
सबसे पहले शुगर को कंट्रोल में करें।
खाने में फाइबर यानी रेशेदार चीजों की मात्रा बढ़ाएं।
आटे में चोकर मिलाकर रोटियां बनवाएं।
ईसबगोल की भूसी शाम को छह बजे के आसपास पानी से लें लें। ईसबगोल का असर होने में 10-12 घंटे लग जाते हैं, इसलिए शाम को छह बजे के करीब लेंगे तो सुबह समय से मोशन हो सकेगा। जब कब्ज ठीक हो जाए, तो यह प्रयोग बंद कर दें। ईसबगोली की भूसी का दूध के साथ सेवन न करें।
सुबह उठकर गुनगुना पानी पिएं।
रोजाना टहलने जरूर जाएं। खास तौर पर सुबह के समय।
रोजाना दो सौ ग्राम कोई भी रेशेदार फल मसलन, पपीता जरूर खाएं।
शुगर के रोगी चीकू, केले, नारियल, आम व भुट्टा न खाएं।
सब्जियों में पत्ते वाली सब्जियां, फलियां व सलाद लें। हरी सब्जियां ज्यादा खाएं।
दलिया खाएं।
दूध में ओटमील या जई का आटा मिलाकर खाएं।
त्रिफला व ईसबगोल की भूसी दो चम्मच मिलाकर शाम को लें।
हॉम्योपैथी के मुताबिक शुगर वालों के लिए कब्ज का इलाज-
जैलसीमियम-30, केल्केरिया कार्ब-30, इंसुलिनम-30, सिलिशिया-30 या पैराफिन-30 में से कोई एक दवा, दिन में तीन-चार बार पानी से लें। इस इलाज के साथ शुगर के लिए ली जा रही एलोपैथिक दवाएं भी जारी रखें। इस बारे में डॉक्टर से सलाह करना ठीक रहेगा।
कब्ज का घरेलू इलाज
बच्चों में कब्ज के लिए बड़ी हरड़ को पानी में घिसकर दो चम्मच पिलाएं। इसमें चीनी भी मिला सकते हैं।
बच्चों की गुदा में थोड़ा सा सरसों या नारियल का तेल लगाने से उनकी कब्ज खुल जाती है।
बड़ों को सनाय के पत्ते, सौंफ, छोटी हरड़, काला नमक व पिपली बराबर मात्रा में मिलाकर एक चम्मच के बराबर फंकी रात में गुनगुने पानी से लें।
छोटी हरड़ का चूर्ण तीन से पांच ग्राम तक रात को पानी से लें। बहुत ज्यादा कब्ज हो तो एक बार दिन में भी ले सकते हैं।
रात को सोते वक्त एक चम्मच आंवला चूर्ण गुनगुने पानी से लें।
रात को सोते वक्त एक चम्मच त्रिफला (हरड़, बहेड़ा व आंवला का मिक्स)चूर्ण गुनगुने पानी से लें।
सुबह उठकर खाली पेट गुनगुना पानी पीएं।
खाना खाने के बाद एक कप गरम पानी पीएं।
रात को सोते समय गरम दूध लें। सदिर्यों में इसमें बादाम रोग डाल लें।
दूध में दो-चार मुनक्के के दाने उबालकर रात को लें।
ईसबगोल की भूसी दूध के साथ फंकी लें।
पूरी नींद लें।
ऐक्सपर्ट पैनल
डॉ. भीम भट्ट, सीनियर आयुर्वेदिक चिकित्सक व एचओडी, आयुर्वेद विभाग, होली फैमिली हॉस्पिटल
आचार्य विक्रमादित्य, मुद्रा, योग व आयुवेर्दिक विशेषज्ञ
डॉ. सुशील वत्स, हॉम्योपैथी
समीना तारिक, डाइटीशियन
डॉ. ए. के. झींगन, चेअरमन दिल्ली डायबिटिक रिसर्च सेंटर
डॉ. अजय कुमार, सीनियर कन्सल्टेंट गेस्ट्रोएंट्रॉलजी विभाग-अपोलो हॉस्पिटल
गंगा दादू, एक्यूप्रेशर व एक्यूपंक्चर विशेषज्ञ
योग गुरु, डॉक्टर सुरक्षित गोस्वामी
(नवभारत टाइम्स,9 अगस्त,2009)

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