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मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

क्या आपको भी ज्ञात-अज्ञात का भय सताता है?

पैनिक अटैक मन की दुनिया का मायावी मर्ज है। इसमें रुग्ण मन अचानक किसी अज्ञात या ज्ञात खौफ से भर जाता है, जबकि इसका कोई ठोस कारण नहीं नजर आता। अगले २०-३० मिनटों तक भय इतना गहराया रहता है कि सांस ऊपर की ऊपर, बदन पसीने से तर-बतर, सर चकराता हुआ और दिल सरपट दौड़ता हुआ मालूम देता है। 

पैनिक अटैक उठता है तो अपने आप शांत भी हो जाता है, लेकिन उसकी छाप मन पर इतनी गहरी पड़ती है कि आदमी डर के मारे घर से निकलना तक बंद कर देता है। समझदारी इसी में है कि पैनिक अटैक्स के जाल में उलझे रहने के बजाय किसी मनोचिकित्सक से सलाह लें। उपयुक्त दवाओं और काउंसलिंग की मदद से इस मर्ज को जीत पाना मुश्किल नहीं है। 

क्या मन का अचानक दहल उठना किसी गंभीर रोग का प्रतीक है? 

नहीं, यह पैनिक डिसऑर्डर का लक्षण है। इसमें अचानक बिना किसी चेतावनी के और बिना किसी तनावपूर्ण स्थिति के मन तीव्र अनजाने भय से घिर जाता है। चाहे यह दौरा कुछ मिनटों तक ही रहता है लेकिन मरीज सुध-बुध गंवा देता है। उसे लगता है जैसे कुछ अनिष्ट होने वाला है और डर के सदमे से तन-बदन पर भी गहरा असर पड़ता है। अचानक ही डर की तेज लहर सी उठती है जिसके कारण दम घुटने लगता है, दिल की धड़कनों की गति तेज हो जाती है, बदन कांपने लगता है, सर चकरा उठता है, पसीने के साथ उबकाई आने लगती हैं। पेट में खलबली मचने लगती है और छाती में दर्द उठ आ सकता है। कभी लगता है जैसे अंतिम समय आ गया है, कभी लगता है कि कहीं मैं पागल तो नहीं हो गया हूँ। १० मिनट में अटैक अपने चरम पर पहुंच जाता है, पर अगले २०-३० मिनट के भीतर जितने नाटकीय ढंग से शुरू हुआ था, उसी तरह शांत हो जाता है। मरीजों के ऐसे दौरे बार-बार होते रहते हैं।

क्या यह एक आम रोग है? 

हां, बहुत से लोगों को पैनिक अटैक्स उठते हैं लेकिन ज्यादातर लोग अपने मर्ज को छुपाते हैं। अधिकतर में यह समस्या युवा उम्र में शुरू होती है। पुरूषों के मुकाबले स्त्रियों में यह दुगनी दर से होता है। १८ प्रतिशत रोगियों के परिवार में दूसरे किसी सदस्य को भी यही विकार होता है।

इसका डायग्नोसिस कैसे करते हैं? 

पैनिक डिसऑर्डर के लक्षण इतने स्पष्ट एवं विशिष्ट होते हैं कि उन्हीं से इस की पुष्टि हो जाती है। यह दौरा कभी किसी भी पल पड़ सकता है। घर बैठे, सड़क पर गाड़ी चलाते हुए, या बाजार में शॉपिंग करते हुए। पहली बार जब यह अटैक होता है तो लगता है जैसे कोई चिकित्सकीय इमरजेंसी है और तुरंत अस्पताल पहुंचना जरूरी है। कई बार इमरजेंसी में पहुंचने तक दौरा शांत हो जाता है, पर कभी-कभी लक्षणों के कारण आनन-फानन में तरह-तरह के टेस्ट हो जाते हैं। अटैक समाप्त होने के बाद यकायक बहुत थकान महसूस होती है। नींद भी घेर सकती है। पैनिक अटैक्स की यह खासियत है कि ऐसे दौरे बार-बार होते रहते हैं। किसी को हर रोज, किसी को हफ्ते में एक बार, तो किसी को कभी-कभी महीनों के अंतराल से दौरा आता है। दौरा हुए पूरा महीना भी बीत जाए तब भी मन डरा रहता है कि कहीं दौरा दुबारा न पड़ जाए। कुछ लोग तो इसी डर से सार्वजनिक जगहों में जाना तक छोड़ देते हैं। कुछ घर में कैद होकर रह जाते हैं। कुछ पर डर इतना हावी हो जाता है कि वे डिप्रेशन में चले जाते हैं, आत्महत्या के विचार मन में घर करने लगते हैं। कई बार मदिरा या दूसरे नशों की लत लग जाती है। किसी-किसी के लिए भेड़िया आया, भेड़िया आया वाली कहानी सच हो जाती है और दिल सचमुच बीमार हो जाता है।

यह रोग किस कारण होता है? 

आकस्मिक अत्यधिक भय उत्पन्ना होने के लिए कई तत्व उतरदायी हो सकते हैं। इसमें कुछ जैविक होते हैं तो कुछ आनुवंशिक! लेकिन उनका अवचेतन दुनिया में बसे अंतर्द्वंदों से गहरा संबंध होता है। समय बीतने के साथ यह दौरे कुछ विशेष परिस्थितियों से इतने जुड़ जाते हैं कि उनसे सामना होते ही पैनिक अटैक का दौरा पड़ जाता है।

पैनिक अटैक्स का इलाज क्या है? 

समग्र उपचार के लिए दवा और मनोचिकित्सा दोनों की ही जरूरत होती है। पैनिक अटैक्स को रोकने में कई दवाएं प्रभावी साबित होती हैं। नींद की गोलियाँ या तनावशैथिल्य की गोलियाँ लेने से तात्कालिक लाभ मिलता है। नींद की अथवा मूड एलिवेटर जैसी गोलियां कुछ दिन तक लेने से उनकी लत लगने का जोखिम रहता है। ये दवाएँ बौद्धिक क्षमताओं पर भी बुरा असर दिखाती हैं। इसीलिए मनोरोगविशेषज्ञ पैनिक अटैक्स को रोकने के लिए सिलेक्टीव सेराटोनिन रिअपटेक इन्हीबिटर प्रयोग में लाते हैं। दवाएं ८०-९० प्रतिशत रोगियों में दौरों को रोकने में सफल सिद्ध होती हैं। जिन रोगियों का रोग बढ़ा हुआ होता है उनके उपचार में काउंसलिंग और बिहेवियर थैरेपी उपयोगी साबित होती है। जिन स्थितियों से डर लगता है, उनका सामना करने की ताकत विकसित करने में बिहेवियर थैरेपी का खास लाभ है। भीतर की मानसिक व्यग्रता मिटाने में विशेष रिलैक्सेशन व्यायाम, प्राणायाम और योग भी नितांत उपयोगी साबित होते हैं(डॉ.यतीश अग्रवाल,सेहत,नई दुनिया,सितम्बर 2012 द्वितीयांक)।

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गुरुवार, 20 सितंबर 2012

मिर्गीःप्रभाव और उपचार

एपिलेप्सी यानी मिर्गी लंबे समय तक बने रहने वाला रोग है। इस में समय-समय पर बार-बार दौरे होते रहते हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों में बौद्धिक और शारीरिक क्षमता पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता। चुनांचे यदि एपिलेप्सी या मिर्गी से घिरा व्यक्ति मेहनती और लगनशील है तो वह जीवन के हर शिखर को चूम सकता है। मिर्गी के होते हुए भी जीवन में सफल हो सकते हैं। इसके लिए दौरा पड़ने पर फर्स्ट एड की एबीसी जानना जितना जरूरी है, उतना ही दौरों पर रोक लगाने के लिए उपचार संबंधी बुनियादी नियमों की समझ रखना भी आवश्यक है। 

किसी को आपके सामने मिर्गी का दौरा पड़े तो घबराएँ नहीं, बल्कि उसकी मदद करें। लक्ष्य यह कि उसे दौरे के समय कम से कम नुकसान हो। दौरा दो-तीन मिनट में खुद ठंडा पड़ जाता है। उसे गिरता देखें तो जहाँ तक हो सके उसे बचाने की कोशिश करें। आसपास कोई तेज धार वाली चीज है तो उससे उसे बचाएँ। पास में नदी, तलाब या स्वीमिंग पुल हो, कहीं आग जल रही हो या दूसरा कोई संकट नजर आए तो उसकी रक्षा करें। दौरे के दौरान जीभ न कटे, इस उद्देश्य से कोई साफ कपड़ा जैसे कि रूमाल को गोल लपेट कर उसके दाँतों के बीच में रख दें, मगर उसका मुँह खोलने के लिए जोर-जबरदस्ती न करें। न ही चमड़ा सूँघाने की कोशिश करें। उससे कोई लाभ नहीं होता। 

दौरा ठंडा पड़ जाए तो व्यक्ति को एक करवट लिटा दें ताकि भीतर से निकली लार, रेशा, खून आदि अंदर साँस की नली में न जाने पाए। दौरे के दौरान उसके मुँह में पानी या कोई चीज न डालें। न उसे हिलाएँ-डुलाएँ, न ही पक़डकर दौरा रोकने की कोशिश करें। उसके आसपास भीड़ न लगाएँ। उस तक ताजा हवा पहुँचती रहे, यह जरूरी है। पर जब तक उसकी हालत में सुधर न आए, उसे अकेला न छोड़ें। दो-तीन मिनट में दौरा ठंडा न पड़े और झटके बार-बार आते दिखें तो तुरंत डॉक्टर की मदद लें।

उपचार 
मिर्गी का उपचार कई बातों को ध्यान में रखकर किया जाता है। पह१ली कोशिश यही होती है कि यदि कोई भौतिक कारण है तो उसे दूर किया जाए। जैसे कि, यदि मस्तिष्क में टीबी या कोई दूसरा संक्रमण (इन्फेक्शन) है, तो उसका इलाज किया जाए, ट्यूमर है तो उसका ऑपरेशन किया जाए, मस्तिष्क की कोई धमनी या शिरा फूल गई है तो उसे ठीक किया जाए। कई लोगों में इसी से दौरे पड़ने बंद हो जाते हैं। जिन लोगों में कोई निश्चित भौतिक कारण नहीं मिलता, उन्हें मिर्गी-रोधक दवाएँ दी जाती हैं ताकि दौरे रूक सकें। दौरों को रोकने के लिए कई प्रभावशाली दवाएँ हैं। रोग की किस्म, उग्रता और उसके वजन के मुताबिक एक या अधिक दवाएँ उपयुक्त मात्रा में देने से ७५ प्रतिशत मामलों में दौरे पड़ने बंद हो जाते हैं। कुल प्रयास यह होता है कि रोगी को उतनी ही दवा दी जाए, जिससे कि दौरे पड़ने बंद हो जाएँ और दवा का कोई दुष्प्राभाव न हो। 

यह फैसला एक अनुभवी डॉक्टर ही ले सकता है कि किसे किस दवा से लाभ पहुँचेगा, लेकिन नतीजे दवा शुरू करने के बाद ही स्पष्ट होते हैं। कई रोगियों में बार-बार दवाएँ जोड़नी-घटानी या दवा की मात्रा बढ़ानी-घटानी पड़ती है। दवा का असर बनाए रखने के लिए उसे सालों-साल नियम से लेना पड़ता है। यह सोचकर कि कोई अन्य व्यक्ति किसी दूसरी दवा से अधिक स्वस्थ रह पा रहा है, दवा में परिवर्तन लाना बिलकुल गलत है। दवा से कोई असंतोष हो, कोई साइड-इफैक्ट नजर आए, तो डॉक्टर को बताना चाहिए। डॉक्टर दवा में आवश्यक परिवर्तन सुझा सकता है। 

जिन्हें दौरे पड़ने बिलकुल बंद हो जाते हैं, उनमें से ५० प्रतिशत से अधिक रोगियों की दवा बंद हो जाती है और वे आगे भी मिर्गी से मुक्त रहते हैं। जिन रोगियों को पिछले तीन वर्षों में एक बार भी दौरा नहीं पड़ा होता, जिनके दौरे ही दवा से रुक जाते हैं, जिनका ईईजी सामान्य होता है, मस्तिष्क में कोई विकृति नहीं होती, उनमें दवा बंद करने की अच्छी संभावना होती है। मगर दवा बंद करने का फैसला डॉक्टर को ही लेना होता है। किसी भी रोगी की दवा एकदम बंद नहीं की जाती, बल्कि उसे धीरे-धीरे कम किया जाता है और तीन से छह महीनों में पूरी तरह रोका जाता है। जिन रोगियों को दवा लेने के बावजूद कभी-कभार दौरे पड़ते रहते हैं, उन्हें दवा ताउम्र लेनी पड़ सकती है(डॉ. यतीश अग्रवाल,सफदरजंग अस्पताल,दिल्ली का यह आलेख सेहत,नई दुनिया के सितम्बर 2012 प्रथमांक में प्रकाशित है)।

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मंगलवार, 18 सितंबर 2012

अवसाद और मस्तिष्क

अवसाद या लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव मस्तिष्क को सिकोड़ देता है। अमेरिका के येल युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने शोध अध्ययन में पाया है कि भावनात्मक परिवर्तनों से शरीर पर स्थाई एवं अस्थाई परिवर्तन होते हैं। मस्तिष्क का आकार भी इसी कारण घटता है। 

अवसाद से शरीर में कई रासायनिक परिवर्तन होते हैं। कुछ स्थाई होते हैं तथा कुछ अस्थाई। हाल ही में हुए शोधों से साबित हुआ है कि प्राचीन काल से सकारात्मक सोच रखने की सीख अच्छे स्वास्थ के लिए कितनी जरूरी है। मरीज खुद को तनाव, अवसाद और व्याकुलता से जितना नुकसान पहुँचा सकता है उतना कोई दूसरा नहीं। सकारात्मक विचारों से शरीर की कई ग्रंथियाँ अधिक सक्रिय होकर काम करने लगती हैं। हारमोन्स का यह प्रवाह शरीर को तरोताजा रखता है। नींद भरपूर आती है और जीवन के प्रति रुचि जाग्रत होती है। व्याकुलता, अवसाद और अनिद्रा किसी भी इंसान को ध्वस्त करने की हद तक पहुँचा देने वाले मानसिक रोगों की अवस्थाएँ हैं। इनमें यदि वातावरणजन्य रोग और शामिल हो जाएँ तो जिंदगी ही व्यर्थ लगने लगती है। हमारी सोच पर वातावरण का भी प्रभाव पड़ता है। 

यदि आपको अपने ऑफिस बिल्डिंग की कलर स्कीम अच्छी नहीं लग रही है तो आप बेहद थकान महसूस करेंगे, आपके शरीर में फ्लू जैसे क्षण उभरने लगेंगे। मस्तिष्क पर धुंधलका छा जाएगा। आमतौर पर वातावरणजन्य रोगों में व्याकुलता, अवसाद और अनिद्रा प्रमुखता से उभरते हैं। अवसादग्रस्त होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। यह जीवनसाथी के विछोह से लेकर प्रिय कुत्ते के मर जाने तक किसी भी कारण से हो सकता है। यह अवस्था कुछ समय तक ही रहती है बाद में आप सामान्य हो जाते हैं। 

देर तक अवसादग्रस्त रहने पर शरीर में बेहद थकान, जीवन के प्रति अरुचि जैसे लक्षण उभरने लगते हैं। कई लोग अवसादग्रस्त या तनावग्रस्त होने पर अधिक खाने लगते हैं। उनकी मानसिक एकाग्रता नष्ट हो जाती है। वे भूलने लगते हैं। वे अनिर्णय की स्थिति में पहुँच जाते हैं। विचारों की स्पष्टता खत्म हो जाती है। सबसे पहले साँस पर ध्यान दें। अक्सर देखा गया है कि अवसादग्रस्त व्यक्ति भरपूर साँस नहीं लेता। उसके शरीर में ऑक्सीजन का स्तर कम रहता है। इससे मरीज को सिरदर्द और पेटदर्द की भी शिकायत होती है। कभी-कभी मरीज को चक्कर भी आ जाते हैं। चिंता, तनाव और अवसाद जब रोजमर्रा के जीवन में हस्तक्षेप करने लगें तब चिकित्सक की मदद लेना जरूरी होता है।

क्या है इलाज 
तनाव और अवसाद के इलाज के तौर पर वर्षों से प्राकृतिक तरीकों से दी जा रही चिकित्सा पर ही भरोसा किया जा सकता है। मरीज के व्यवहार और जीवनशैली से संबंधित कुछ तनाव बिंदुओं पर इलाज केंद्रित किया जाता है। व्यवहार में पूर्ण बदलाव के लिए इस तरह के १५ से २० सेशन की जरूरत होती है। मरीज के तनाव और अवसाद कारक बिंदुओं को चिन्हित कर उसकी नकारात्मक विचारधारा प्रक्रिया को रोकने की दिशा में काम किया जाता है। इसी के साथ मरीज में एक सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगता है। मरीज को अवसाद मुक्त करने वाली दवाओं के साथ मूड एलिवेटर्स दी जाती हैं। 

सिर्फ दवा काफी नहीं 
मरीज़ अकेले औषधियों से ठीक नहीं होते। उन्हें दवाओं के साथ बिहेवियरल थैरेपी भी दी जाती है। इसके अलावा,योग और मानसिक तनाव शैथिल्य की क्रियाएं भी कराई जाती हैं। 

अवसाद से निपटें इस तरह 
-अवसाद से निपटने का सबसे सरल और कारगर तरीका यह है कि एक गिलास उबलते पानी में गुलाब के फूल की पत्तियाँ मिलाएं। ठंडा करें और शक्कर मिलाकर पी जाएं।

-एक चुटकी जायफल का पावडर ताजे आंवले के रस में मिलाकर दिन में तीन बार पी लें।

-ग्रीन टी भी अवसाद दूर भगाने में मदद करती है। दिन कम से कम तीन कप ग्रीन टी पिएं। अवसाद से छुटकारा पाने का एक और उपाय यह है कि एक कप दूध के साथ एक सेबफल और शहद का सेवन करें। 

-गुनगुने पानी के टब में लगभग आधे घंटे के लिए शरीर को ढीला छोड़ दें। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हों तो नदी अथवा तालाब के पानी में तैरें। इससे अवसाद कम होगा। 

-सामान्य चाय के प्याले में एक-चौथाई चम्मच तुलसी की पत्तियां मिलाएं और दिन में दो कप लें। 

-एक कप उबलते पानी में दो हरी इलायची के दाने पीसकर मिला दें। शक्कर मिलाकर पी लें। 

-सूखे मेवे,पनीर,सेबफल का सिरका एक गिलास पानी के साथ लें। 

-कद्दू के बीज,गाजर का रस,सेबफल का रस,5-6 सूखी खुबानी को राई के दानों के साथ मिलाकर पीस लें और इसे पी लें(सेहत,नई दुनिया,सितम्बर प्रथमांक 2012)।

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मंगलवार, 28 अगस्त 2012

कई रोगों का इलाज़ हो रहा है फोटोथैरेपी से

फोटोथैरेपी त्वचा संबंधी परेशानियों में लाभकारी हो सकती हैं। अब विशेषज्ञ रोशनी का उपयोग विभिन्न रोगों के इलाज के लिए कर रहे हैं। इन दिनों स्ट्रोक, मुँह की दुर्गंध और कैंसर जैसे रोगों के इलाज के लिए भी रोशनी को उपयोग में लिया जा रहा है। शुरूआत में त्वचा रोग विशेषज्ञ लाइट थैरेपी का उपयोग सोराइसिस के इलाज के लिए करते थे। इसके बाद सर्दी के मौसम में होने वाले सीज़नल डिप्रेशन के उपचार के लिए भी इसका उपयोग किया गया। अब विभिन्न तकलीफों में राहत के लिए लाइटथैरेपी का इस्तेमाल किया जा रहा है।

कमर दर्द 
कमर दर्द से निजाद दिलाने के लिए चिकित्सक नीली रोशनी का उपयोग कर रहे हैं। सफेद रोशनी के बिखरने पर इसके सात अलग-अलग रंगों को देखा जा सकता है। नीली रोशनी बहुत शक्तिशाली होती है, यह ऊतकों को नुकसान पहुँचााए बिना शरीर पर प्रभाव डालती है। इसीलिए इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के उपचार के लिए किया जा रहा है। युनिवर्सिटी हॉस्पिटल ऑफ हेडिल्बर्ग के चिकित्सकों ने नीली रोशनी उत्सर्जित करने वाला पैच विकसित किया है। इस पैच को दर्द की मदद से चिकित्सक दर्द का उपचार कर रहे हैं। 

यह पद्धति शुरूआती अध्ययनों पर आधारित है जिनमें यह सामने आया था कि रोशनी से शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड का उत्पादन बढ़ता है। नाइट्रिक ऑक्साइड माँसपेशियों के तनाव को दूर करता है। इससे रक्त धमनियाँ चौड़ी हो जाती है जिससे रक्त संचार बेहतर होता है। हेडिल्बर्ग में पैच पर अध्ययन जारी है, नई ट्रायल में १४ दिनों में पैच का उपयोग ५ बार किया जाएगा। मरीज़ों को इसे हर बार आधे घंटे के लिए लगाया जाएगा। अमेरिका में रोशनी के ज़रिए ओस्टियोआर्थ्राइटिस के कारण घुटने में होने वाले दर्द का इलाज खोजा जा रहा है। एक अन्य शोध से सामने आया कि कंधे का दर्द दूर करने के लिए फोटोथैरेपी असरदार है, वो भी बिना किसी दुष्प्रभाव के।  

पेट के छाले 
पेट के छालों के इलाज के लिए एक ऐसा उपकरण मददगार हो सकता है जिसके ज़रिए पेट के अंदर तक नीली रोशनी पहुँचाई जा सके। इस रोशनी के प्रभाव से अल्सर के लिए ज़िम्मेदार बैक्टीरिया नष्ट होने लगते हैं। यह तकनीक पेट के कैंसर के इलाज में भी फायदेमंद हो सकती है। अध्ययन बताते हैं कि प्रभावित हिस्से पर एक घंटे से भी कम समय के लिए यदि नीली रोशनी डाली जाए तो यह हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने के लिए पर्याप्त होती है। ख़ास बात यह है कि इससे बैक्टीरिया तो नष्ट हो जाता है लेकिन शरीर के स्वस्थ ऊतकों पर कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है। यह नया उपकरण हाल ही में विकसित किया गया है और इसपर शोध-अध्ययन व ट्रायल जारी हैं। अमेरिका में हुए शोध बताते हैं कि इस इलाज के बाद बैक्टीरिया की संख्या में ९१ प्रतिशत तक की कमी देखी गई है।

मिर्गी 
मिर्गी के उपचार के लिए फोटोथैरेपी को विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। जिन मरीज़ों को मिर्गी-रोधी दवाओं से ख़ास फायदा नहीं होता है, उनके लिए फोटोथैरेपी फायदेमंद साबित हो सकती है। युनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में हुई एक ट्रायल में मिर्गी के मऱीजों को तीन महीने तक रोज़ ३० मिनिट के लिए लाइट-बॉक्स से एक्सपोज़ किया गया। इस लाइट बॉक्स से तेज़ सफेद रौशनी निकलती है। मिर्गी का यह उपचार पहले हुए शोध-अध्ययनों पर आधारित है जिससे यह पता चलता है कि जिन दिनों में बादल छाए रहते हैं, तब मरीज़ों को मिर्गी के दौरे अधिक पड़ते हैं। जिन दिनों में तेज़ धूप निकलती है, तब मरीज़ों को कम दौरे पड़ते हैं। कुछ वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि तेज़ रोशनी के प्रभाव से विटामिन-डी और मेलाटोनिन आदि का स्तर बढ़ जाता है जिससे दिम़ाग में दौरों को नियंत्रित करने वाले रसायन स्त्रावित होने लगते हैं।

घाव  
मधुमेह रोगियों के पैरों में बने गंभीर घाव, अधिक दबाव पड़ने पर बनने वाले घाव व अन्य प्रकार के गंभीर घावों के इलाज के लिए लाइट थैरेपी असरकारी है। स्टॉकहोम में हुए इस शोध अध्ययन के अनुसार लाल रोशनी और इंफ्रारेड रोशनी के कॉम्बिनेशन से घाव तेज़ी से भरते हैं। इससे प्रेशर अल्सर ५४ प्रति तेज़ी से ठीक हो गए थे। प्रेशर अल्सर का ९० प्रतिशत हिस्सा केवल ५ हफ्तों में ही भर गया था। जिन मरीज़ों को लाइट थैरेपी नहीं दी गई थी, उनमें घाव भरने के लिए ९ हफ्तों का समय लगा था। 

मुँह की दुर्गंध  
जेरूसलम की हीब्रू युनिवर्सिटी के डेंटल स्कूल के अध्ययनकर्ताओं ने एक शोध में पाया कि नीली रोशनी से मुँह की दुर्गंध को कम किया जा सकता है। दंत चिकित्सक अक्सर दाँतो को सफेद बनाने के लिए इन पर दो मिनिट तक नीली रोशनी डालते हैं। नीली रोशनी न सिर्फ दाँतों को सफेद बनाती है बल्कि थूक में मौजूद दुर्गंधकारी बैक्टीरिया भी इससे ख़त्म होते हैं। इसीलिए अब इसे मुँह की दुर्गंध के इलाज के रूप में देखा जा रहा है। अध्ययनकर्ताओं ने थूक के ५० नमूनों पर शोध कर पाया कि इनपर नीली रोशनी डालने पर दुर्गंध काफी कम हो जाती है। उन्होंने पाया कि रोशनी डालने के बाद थूक के नमूनों में दुर्गंधकारी बैक्टीरिया की संख्या काफी कम हो गई थी। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने शोध अध्ययन में पायाका कि नीली रोशनी से मसूड़ों में बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया को ख़त्म किया जा सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह रोशनी मुंह में होने वाले पेरियोडोन्टिस नामक संक्रमण से बचाव और उपचार के लिए भी असरकारी हो सकती है। इस संक्रमण से दांत और हड्डियां क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। 

शोध प्रमुख डॉ. निकोस सूकोज के अनुसार,रोशनी डालने पर मुंह में मौजूद कई नुकसानकारी बैक्टीरिया कुछ सेकेंड्स में ही ख़त्म हो जाते हैं। रोशनी से बैक्टीरिया का सुरक्षा-कवच नष्ट हो जाता है जिससे ये नष्ट होने लगते हैं। 

कैंसर का इलाज़ 
लाइट के उपयोग से कैंसर के इलाज के लिए एक विशेष प्रकार के ट्रीटमेंट का उपयोग किया जा रहा है, इसे फोटो-डायनामिक थैरेपी कहा जाता है। इसका सबसे अधिक उपयोग त्वचा कैंसर के इलाज के लिए किया जाता है। इस ट्रीटमेंट में रौशनी के साथ ही एक विशेष प्रकार के ड्रग का इस्तेमाल किया जाता है। यह ड्रग कैंसर की असामान्य कोशिकाओं को रोशनी के प्रति संवेदशील बनाता है। कैंसर के मरीज़ों को दिए जाने वाले इस ड्रग की विशेषता यह है कि इसे केवल कैंसर की कोशिकाएँ ही अवशोषित करती हैं। 

इसके बाद मरीज़ के प्रभावित हिस्से पर नीली रोशनी डाली जाती है। रोशनी के प्रभाव में कैंसर कोशिकाओं द्वारा अवशोषित यह ड्रग एक विशेष प्रकार की ऑक्सीजन उत्सर्जित करने लगता है, जिससे कैंसर की कोशिकाएँ मरने लगती हैं। यह ट्रीटमेंट ट्यूमर को सिकोड़ने और नष्ट करने के लिए प्रभावी है। शरीर के भीतरी हिस्सों में मौजूद कैंसर के लिए ऑप्टिक फाइबर द्वारा रोशनी को शरीर के अंदरूनी हिस्सों में भेजा जा सकता है(सेहत,नई दुनिया,अगस्त,2012 द्वितीयांक)।

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शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

गर्भावस्था के दौरान बुखार से हो सकता है बच्चे को ऑटिज़्म

हाल ही में हुए एक शोध के मुताबिक गर्भावस्था में माँ को बुखार आने से बच्चे को ऑटिज़्म (बाधित मानसिक विकास) होने का खतरा होता है। इसी के साथ बच्चा कई तरह से शारीरिक विकास में भी पिछड़ जाता है। यद्यपि अभी इसका कारण नहीं खोजा जा सका है कि बुखार की वजह से ऑटिज़्म का जोखिम होने के क्या कारण हैं लेकिन सभी गर्भवती महिलाओं को किसी कारण से बुखार आने पर घबराने की भी ज़रूरत नहीं है।

गर्भवती महिलाओं को कई कारणों से बुखार आ सकता है लेकिन बुखार उतारने के लिए किए गए उपायों के कारण ऑटिज़्म का जोखिम भी जाता रहता है। यूएस सेंटर्स फॉर डिसीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक अमेरिका में हर ८८ वाँ बच्चा ऑटिज़्म का शिकार हो जाता है। ऑटिज़्म की समस्या से पीड़ित बच्चा सामाजिक व्यवहार एवं संप्रेषित करने में कमज़ोर होता है। वह दूसरों से संवाद स्थापित नहीं कर पाता। युनिवर्सिटी ऑफ केलिफोर्निया, अमेरिका के शोधकर्ता डेविस ने ११०० बच्चों की माताओं का अध्ययन किया जिन्हें गर्भधारण की अवधि में फ्लू हुआ था या किसी अन्य वजह से बुखार आया था। इनमें ऑटिज़म के शिकार बच्चों तथा सामान्य बच्चों की माताएंँ शामिल थीं। अध्ययन में यह भी जानकारी ली गई कि बुखार के इलाज के लिए कौन सी औषधियाँ ली गईं थीं। इस शोध अध्ययन के नतीजे जर्नल ऑफ ऑटिज़्म एंड डेवलपमेंटल डिस्आर्डर नामक पत्रिका में प्रकाशित हुए थे। 

नतीजों से प्राप्त नए आँकड़ों के मुताबिक जिन महिलाओं को गर्भधारण के दौरान बुखार आता है उनके बच्चों को ऑटिज़्म होने का जोखिम दो गुना हो जाता है। इसी के साथ अन्य शारीरिक विकास भी प्रभावित होता है। अध्ययन के नतीजों से यह भी मालूम हुआ है कि जिन महिलाओं ने बुखार उतारने की औषधियाँ ली थीं उनके बच्चे इस तरह के किसी जोखिम पर नहीं थे। 

एक अन्य शोधकर्ता ऑकलैंड कैलिफोर्निया के कैज़र पर्मानेंट्स नर्दन कैलिफिर्निया डिविजन ऑफ रिसर्च के डॉ. ओसनी ज़ेर्बो के मुताबिक इस अध्ययन से यह पुख्ता प्रमाण मिले हैं कि बुखार उतारने की औषधियाँ लेने वाली गर्भवती महिलाओं के बच्चों में ऑटिज़्म एवं शारीरिक विकास में पिछड़ने का जोखिम नहीं रहता। 

लॉस एंजेलेस में पीडियाट्रिक सर्विसेस की पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी की निदेशक डॉ.वाय.जेन तावयेव मानती हैं कि इस अध्ययन से ऑटिज़्म होने में बुखार की संभावित भूमिका पर प्रकाश डलता है। पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि गर्भवती महिलाएं बुखार होने पर घबरा जाएंँ। 

बुखार आने का अर्थ ही यही है कि शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली बैक्टेरिया और वायरसों को मार रही है। कई वैज्ञानिकों का मानना है कि अभी इस क्षेत्र में और शोध किए जाने की ज़रूरत है। ऑटिज़्म के लिए जिम्मेदार अन्य कारकों की भी खोज की जानी चाहिए(सेहत,नई दुनिया,जून तृतीयांक,2012)।

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शुक्रवार, 15 जून 2012

माइग्रेन का यौगिक उपचार

समय-समय पर उठने वाले इस अत्यंत तीव्र सरदर्र्द की विशेषता यह है कि दर्द आधे सिर में ही होता है तथा अक्सर इसके साथ उल्टियाँ और ठीक से दिखाई न देने की तकलीफें शामिल हैं। यह पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में अधिक होता है। माना जाता है कि माइग्रेन का दर्द स्वचालित तंत्रिकाओं के असंतुलन के कारण सिर में मौजूद रक्तनलिकाओं के फैलने से होता है। ये तंत्रिकाएँ नलिका का आकुंचन बनाए रखकर सिर के रक्त प्रवाह को नियंत्रित करती है। नलिकाओं के फैलने से उनकी भित्ति में स्थित पीड़ा संवेदी तंतु उत्तेजित हो दर्द उत्पन्न करते हैं। 

यह तथ्य अभी प्रमाणित नहीं हुआ है कि रोग अनुवांशिक है या व्यावहारात्मक विरासत है। सामान्यतः लगभग वयः संधि की उम्र से शुरू होकर मध्यवय के उत्तरार्द्ध तक माइग्रेन का दर्द समय-समय पर उठता रहता है। दर्द के दौर कुछ दिनों से लेकर कई महीनों तक के अंतराल से उठते हैं। अक्सर इनका संबंध भावनात्मक दबाव से अपूरित महत्वाकांक्षाओं या अनाभिव्यक्त लैंगिक समस्याओं से रहता है, जो चिढ़चिड़ापन व खीज उत्पन्न करते हैं।

सिर में दर्द एक बिन्दु से शुरू होकर धीरे-धीरे आधे सिर में (या कभी-कभी पूरे सिर में) फैल जाता है। दर्द अत्यंत तीव्र एवं प्रतिस्पंद करता हुआ महसूस होता है। व्यक्ति पसीने-पसीने होकर उल्टियाँ करने लगता है तथा प्रकाश एवं ध्वनि बर्दाश्त नहीं कर सकता। उसे अंधेरे शांत कमरे में बिस्तर पर पड़े रहना बेहतर लगता है। यह दौरा कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों तक चलता है तथा रोगी को लस्त एवं शक्तिहीन बना देता है।

तनावजन्य सरदर्द :
माइग्रेन एवं तनावजन्य सरदर्द दोनों ही मानसिक भावनात्मक तनाव से संबंधित हैं, अंतर इतना ही है कि माइग्रेन स्वसंचालित तंत्रिकाओं के मध्यम से तथा तनावजन्य सरदर्द कायिक तंत्रिकाओं के माध्यम से दर्द की अनुभूति उत्पन्न करता है। तनाव के कारण तंत्रिका तंतु सिर की त्वचा के नीचे की पतली मांसपेशियों को या ग्रीवा पृष्ठ की पेशियों को प्रेरित कर लगातार आकुंचित बनाए रहते हैं। इसके कारण उन पेशियों में दर्द की संवेदना उत्पन्न होती है। 

यौगिक उपचार
इन समस्याओं के निदान में मेडिकल साइंस की जो कमियाँ एवं खामियाँ हैं, यौगिक अभ्यास उन्हें दूर कर इलाज पद्धति को एक संपूर्णता प्रदान करते हैं। अक्सर सभी प्रकार के तनावजन्य और संवहनीय सरदर्द (माइग्रेन एवं पेशीय अतिसंकुचन सहित) मात्र यौगिक क्रियाओं द्वारा पूर्णतः उन्मूलित किए जा सकते हैं। आधुनिक शोधों से इस बात की पुष्टि होती है कि माइग्रेन के लक्षणों के प्रकट होने के कारणों या क्रियाविधि को समझना इतना सरल नहीं है। इसमें अनेक जटिल प्रक्रियाएँ शामिल हैं, जिनमें मस्तिष्क के रसायन एवं रक्त कणिकाओं से स्रावित होने वाले रसायन अन्योन्याश्रित तौर पर विकृत रूप से कार्य करने लगते हैं। 

सामान्य निरीक्षण से,आधुनिक शोधपत्रों से,लक्षणों से एवं आधुनिक चिकित्सा पद्धति की असफलता से यह बात स्पष्टतः साबित होती है कि इस मनोकायिक रोग की समुचित चिकित्सा एक अन्य स्तर से करने की आवश्यकता है जो शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक,प्राणिक और अन्य सूक्ष्म स्तरों तक इस विकृति को प्रभावित कर रोग को समूल नष्ट कर सके।। 

इस परिप्रेक्ष्य में,योग चिकित्सा इन सभी स्तरों को प्रभावित करने का एक सशक्त विकल्प बन कर हमारे सामने आती है।योग की क्रियाएं मस्तिष्क में सेरेटॉनिन-मेलेटॉनिन इत्यादि रसायनों के स्रवणचक्र को,उनकी मात्रा को एवं अनुपात को पुनर्व्यवस्थित करती हैं। वे व्यक्ति को संवेदनात्मक तौर पर अधिक संतुलित करती हैं। योग द्वारा प्राणशक्ति के प्रवाह के अवरोध दूर होते हैं और पूरे शरीर में प्राणों का संचार बेहतर तरीक़े से होना प्रारंभ हो जाता है। नेति एवं कुंजल माइग्रेन तथा अधिक सिरदर्द के उपचार हेतु दो आधारभूत हठयौगिक क्रियाएं हैं। यदि उनका अभ्यास माइग्रेन के दौर का पूर्वाभास होते ही कर लिया जाए,तो व्यक्ति को तुरंत आराम मिल जाता है। यह सर्वविदित है कि यदि माइग्रेन के रोगी को स्वतः उल्टियां हो जाएं तो लक्षण की तीव्रता घट जाती है। यह तथ्य इस बात की पुष्टि करता है कि कुंजल की कायो-मानसिक प्रतिक्रियाएं अनाभिव्यक्त तनावों को या भावनाओं को अचेतन मन से मुक्त करने में सक्षम है। रोग को जड़ से मिटाने केलिए इन क्रियाओं का दैनिक प्रातःकाल अभ्यास करना चाहिए। साथ ही,संलग्न अभ्यास क्रम का भी दो से तीन महीने तक अभ्यास करना चाहिए(स्वामी सत्यानंद सरस्वती का यह आलेख नई दुनिया के सेहत,जून द्वितीय,2012 परिशिष्ट में प्रकाशित है)। 


नोटःमाइग्रेन के संबंध में,इसी ब्लॉग पर पूर्व में प्रकाशित आलेख यहां हैं।

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बुधवार, 11 अप्रैल 2012

विश्व पार्किंसन दिवस विशेषःअवेयर रहना जरूरी है

आज का दिन वर्ल्ड पार्किंसन डे के तौर पर सेलिब्रेट किया जा रहा है। चूंकि इंडिया में पार्किंसन के 25 फीसदी मरीज 40 साल के कम उम्र के हैं, इसलिए इसे लेकर अवेयर रहना जरूरी है: 

पहली बार पार्किंसन को लेकर दुनिया तब अवेयर हुई थी, जब मशहूर बॉक्सर मोहम्मद अली इसकी गिरफ्त में आए थे। हालांकि अपने देश में अभी इसे लेकर लोग खास अवेयर नहीं हैं। 

आमतौर पर पार्किंसन 50-60 की उम्र के लोगों में ही होती है, लेकिन एम्स के डाटा के मुताबिक, इंडिया में 25 पर्सेंट लोगों में यह 40 की नीचे की उम्र में देखी गई है। 

अगर रास्ता चलते हुए आपको झटका-सा लगता है और आप अपना बैलेंस नहीं बना पाते। आप आराम से बैठे हैं और हाथों में स्टिफनेस महसूस करने लगते हैं या फिर अचानक ही आपकी आवाज भी धीमी होने लगती है, तो आपको फिक्रमंद होना चाहिए। ये लक्षण पार्किंसन के हो सकते हैं। 

जाहिर है, ऐसे में यंग एज के लोग डिप्रेस्ड फील करते हैं। हालांकि एक्सपर्ट्स की मानें तो, पार्किंसन में आदमी थोड़ा स्लो हो जाता है, लेकिन कोई डेंजरस कंडीशन नहीं बनती। मेडिकेशन और रेग्युलर एक्सरसाइज के साथ आराम से 15-20 साल कट जाते हैं। 

न करें देर 
एम्स के न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट में एडिशनल प्रफेसर डॉ. विनय गोयल बताते हैं कि यह स्पेशल डिजीज हजार में से किसी एक को ही हो सकता है। दरअसल, इसमें बॉडी को जितनी डोपामिन की जरूरत है, उससे कम बनने लगता है। इसकी वजह से 80 पर्सेंट सेल्स का जब लॉस हो जाता है, तब जाकर बीमारी का पहला सिंपटम दिखाई देता है। जाहिर है कि जब सिंपटम्स ही देर से पता लगेंगे, तो प्रॉब्लम आएगी ही। इस बारे में साइंटिस्ट अभी रिसर्च में लगे हुए हैं कि थोड़ा पहले ही बीमारी का पता लगाया जा सके। वैसे, फैमिली में किसी को यह डिजीज पहले से हो तो भी आपको सतर्क रहना चाहिए। 

मेदांता के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. आदित्य गुप्ता के मुताबिक, 'सबसे बड़ी प्रॉब्लम अवेयरनेस में कमी है। अक्सर फिजिशियन भी इस बारे में अवेयर नहीं होते। पेशंट जब किसी फिजिशियन के पास स्पीड के स्लो होने जैसी प्रॉब्लम लेकर जाते हैं, तो उन्हें विटामिंस सजेस्ट कर दिया जाता है। जबकि विटामिन और प्रोटीन की डोज इस बीमारी में दवाइयों के इफेक्ट को कम करता है। सच तो यह है कि जिस न्यूरॉलॉजिस्ट की पार्किंसन में एक्सपर्टाइज हो, वही आपको सही ट्रीटमेंट दे सकता है।' 

एक्सपर्ट के सामने एक बड़ी प्रॉब्लम यह है कि अपने देश में पेशंट ऑपरेशन के नाम पर पहले आयुर्वेद-होम्योपैथ वगैरह आजमाने लग जाते हैं। जब वे चलते-चलते गिरने लगते हैं, फ्रैक्चर होने लगते हैं, तब सर्जरी के लिए पहुंचते हैं। तब तक बहुत देर हो जाती है। 

यूनीक सिंपटम्स 
डॉ. गोयल बताते हैं कि अगर आप फिजिकली और मेंटली फिट हैं, तो पार्किंसन का सामना अच्छी तरह से कर सकते हैं। ऐसा देखा गया है कि, डिप्रेशन और एंग्जाइटी का भी इसमें निगेटिव रोल होता है। कई पेशंट्स में पार्किंसन के अटैक से पहले स्मेल सेंसेशन खत्म हो जाती है। ऐसा भी देखा गया है कि पार्किंसन के होने से 5-10 साल पहले लोगों में नींद में बहुत बड़बड़ाने या हाथ-पैर चलाने की कंप्लेन आ गई थी। 

ट्रीटमेंट 
पार्किंसन की डायग्नोसिस हर जगह नहीं हो सकती। इसे आप न्यूरोलॉजिस्ट से ही करा सकते हैं। जितनी जल्दी आपका ट्रीटमेंट शुरू हो जाए, असर भी उसी के हिसाब से होता है। हां, ट्रीटमेंट के दौरान दवाइयों में लापरवाही बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। इस दौरान मेडिटेशन वगैरह भी रिलैक्स रखती हैं(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,11.4.11)।

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मंगलवार, 20 मार्च 2012

माइग्रेनःकारण और निवारण

मर्मांतक पीड़ा पहुँचाने वाले सिरदर्द को सभी माइग्रेन के नाम से जानते हैं। शरीर की पूरी शक्ति निचोड़ लेने वाले इस सिरदर्द को जल्दी पहचान लेने से इससे जल्दी छुटकारा मिल सकता है। ताकतवर दर्द निवारक दवाएँ भी इस पर असर नहीं करतीं। अधिकांश मरीजों को आराम करने पर ही दर्द से छुटकारा मिलता है।

माइग्रेन तीन प्रकार का होता हैः
सामान्य माइग्रेन- फोनोफोबिया और फोटोफोबिया के साथ इस तरह के दर्द में मरीज़ को चमकाली रोशनी का एक गोला-सा दिखाई पड़ता है। मरीज को किसी भी तरह की रोशनी से नफरत हो जाती है।

क्लासिक माइग्रेन- इसमें रंगीन गोला दिखाई पड़ता है, जिगजैग़ पैटर्न में चटख रंगीन चमचमाती रोशनियाँ दिखाई पड़ती हैं या दृष्टि क्षेत्र में एक छिद्र दिखाई पड़ता है जिसे ब्लाइंड स्पॉट कहते हैं।

जटिल माइग्रेन- मस्तिष्क के ठीक से काम न करने से की वजह से सिरदर्द होता है। 

लगभग ४०-६० प्रतिशत माइग्रेन अटैक चेतावनी के लक्षण देकर आते हैं, जैसे नींद-सी लगी रहना, चिड़चिड़ापन, थकान, अवसाद या उन्माद, उबासी और मिठाई या नमकीन चीज़ें खाने की इच्छा। ये लक्षण कई दिन रहते हैं। मरीज़ और उसके परिवार वालों को इन चेतावनियों पर गंभीरता से निगाह रखनी चाहिए। उन्हें यह पहचानना होगा की माइग्रेन का अटैक होने को है और उन्हें चिकित्सक के पास जाना चाहिए। 

माइग्रेन अटैक की चेतावनियों को पहचानना बहुत महत्वपूर्ण है। समय पर कदम उठा लेने से इस हमले से बचा जा सकता है। इस हमले से बचाव के लिए पेनकिलर जैसे आइबुप्रोफेन की मदद ली जाती है, जो कि सब जगह आसानी से उपलब्ध रहती है। इस प्रकार की दवाओं से तुरंत आराम मिलता है। कभी-कभी इस अटैक का असर इतना गंभीर होता है कि कऱीब २४ घंटे भी रह सकता है। मरीज़ को अहसास होता है कि वह ताकत से खाली हो गया है। उसे हल्का सिरदर्द रह सकता है और वह रोशनी व आवाज़ के प्रति संवेदनशील हो जाता है। इस मर्ज़ की वजह से लोगों का जीना दूभर हो जाता है। वे इस अटैक से बच नहीं पाते और उन्हें दवाएँ लेनी पड़ती हैं। अक्सर माइग्रेन का ठीक से उपचार नहीं किया जाता, जिसकी वजह से यह ज़िंदगी को बुरी तरह प्रभावित करता है। इसका इलाज ही एकमात्र उपाय है। 

अटैकः क्या करें 
अपना मुँह ठंडे पानी से धोएँ और फिर एक अँधेरे कमरे में आराम करें। नींद पूरी लें। अपनी आँखों पर ज़्यादा ज़ोर न डालें। पर्याप्त पानी पियें। कुछ समय के अंतराल पर नियमित रूप से थोड़ा-थोड़ा भोजन करें। एक बार में पेट भर न खाएँ।  

कारण 
माइग्रेन का सटीक कारण अज्ञात है फिर भी कुछ कारणों को ज़िम्मेदार माना जाता है। रक्त वाहिकाओं के आकार में परिवर्तन और दिमाग़ में न्यूरोट्रांस्मिटर रसायनों के स्तर में परिवर्तन होना इन कारणों में शामिल है। दिमाग़ में सिरोटोनिन नामक रसायन होता है, जिसका स्तर कम होने पर रक्त वाहिकाएँ चौड़ी हो जाती हैं। यही माइग्रेन के तेज़ दर्द का कारण होता है। ऐसी कई चीज़ें हैं जो माइग्रेन के अटैक का कारण बन सकती हैं। इन कारणों को ट्रिगर कहते हैं। थकान, तनाव, निर्जलीकरण, हारमोन के स्तरों में परिवर्तन, समय पर खाना नहीं खाना या भूखे रहना ट्रिगर की तरह काम कर सकते हैं। इसके अलावा खाने या पीने की कुछ चीज़ें चीज़, चॉकलेट, चाय, कॉफी या शराब भी दर्द का कारण हो सकते हैं।(डॉ. ईश आनंद,सेहत,नई दुनिया,मार्च,2012 द्वितीयांक)

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रविवार, 18 मार्च 2012

सेरेब्रल पालसी:जितनी जल्दी पहचान,उतनी जल्दी समाधान

उसकी उमर के सारे बच्चे बोलने लगे हैं, लेकिन वह एक ही शब्द पर अटक जाता है! उसकी गर्दन एक दिशा में टिकती ही नहीं! हर चीज उसके हाथ से गिर जाती है! ज्यादातर मां-बाप इन इशारों को नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि ये सेरेब्रल पालसी के संकेत भी हो सकते हैं। एक ऐसी मानसिक विकलांगता, जिसका पता जितनी जल्दी चलेगा, उसका इलाज उतना आसान होगा। अरशाना अजमत का आलेखः 

एक्सपर्ट का मानना है कि बच्चे की पैदाइश के कुछ वक्त बाद से ही पता चल जाता है कि वह सामान्य बच्चों जैसा है या उनसे अलग है। जरूरत है तो बस उसके व्यवहार को गौर से देखकर उन निशानियों को समझने की, जिनसे बच्चे के स्पेशल होने का पता चलता है। अगर वक्त रहते बच्चे की बाबत ये जानकारी हासिल कर ली जाए तो उसका इलाज और विकास काफी आसान हो जाता है। आइए जानें कि क्या हैं ये निशानियां.. 

पैदाइश से एक साल की उमर तक 
ध्यान से देखें कि क्या आपका बच्चा अपने सिर को नियंत्रित रख पाता है या नहीं। अगर वह आसानी से सिर घुमा लेता है तो उसके सामान्य होने के चांस अधिक हैं, लेकिन अगर सिर घुमाते समय उसका सिर लुढ़क जाता है या एक ही दिशा में वह लगातार घूरता रहता है तो उसके स्पेशल होने की संभावना हो सकती है। इसी तरह से उसकी मुट्ठी में अपनी उंगली पकड़ाने की कोशिश करें। अगर वह मुट्ठी बंद कर लेता है तो मतलब वह आपको रिस्पॉन्स कर रहा है, जो सामान्य होने की निशानी है। लेकिन अगर वह आपकी उंगली पर रिस्पॉन्स नहीं करता तो आप मनोवैज्ञानिक से संपर्क कर सकते हैं। जब बच्चा बैठने लगे तो देखें कि वह खुद से सीधा होकर बैठ पाता है या उसे सहारे की जरूरत पड़ती है। शुरुआत में सहारा लगाने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन अगर आपके बच्चे में सीधा बैठने की आदत पनपे ही नहीं तो चिंता करने की बात हो सकती है। उसे बार-बार आवाज दें और समझों कि आपकी आवाज पर गर्दन घुमाने, आंख चलाने जैसे रिस्पॉन्स दे रहा है या नहीं। अगर बच्चा रिस्पॉन्स देता है तो वह सामान्य है, अगर नहीं तो उसके स्पेशल होने की संभावना हो सकती है। 

एक साल से दो साल की उमर तक 
इस उमर में बच्चे की मसल्स को ध्यान से देखिए। उसके सारे अंग एक समान हैं या नहीं। जब वह चीजों को पकड़ता है तो उसकी पकड़ मजबूत होती है या चीजें आसानी से उसके हाथ से छूट जाती हैं। मसल्स की कमजोरी सेलेब्रल पालसी की शुरुआती निशानी हो सकती है। इसे नजरंदाज न करें। कई बार मसल्स में कड़ापन भी आ जाता है, जो सामान्य होने की निशानी नहीं है। बच्चे के दोनों पैरों को आपस में क्रॉस करिए और देखिए कि वह सामान्य महसूस करता है या उससे दर्द होता है या फिर ऐसा करना मुमकिन नहीं हो पाता। अगर पैर क्रॉस करने में कोई समस्या आती है तो यह भी सेलेब्रल पालसी की निशानी हो सकती है। 

दो साल से चार साल की उमर तक 
यह वह उमर होती है, जब सेलेब्रल पालसी की निशानियों को समझना सबसे आसान होता है। एक्सपर्ट मानते हैं कि इस उमर में सबसे आसानी से पता चल जाता है कि बच्चा सामान्य है या स्पेशल। सबसे सरल निशानी यह है कि बच्चे की भाव-भंगिमाएं फोकस्ड रहती हैं या वह उनका गैर जरूरी इस्तेमाल करता है। वह भी ऐसा इस्तेमाल, जिससे कोई स्पष्ट संदेश नहीं निकलता। इसी तरह से उसकी बातचीत को ध्यान से सुनिए। क्या वह अपनी बात साफ शब्दों में कह पाता है या हकलाता है या एक ही शब्द को कई बार बोलता है। बोलते-बोलते चुप हो जाता है या पूरी बात आसानी से कह लेता है। अगर बोलने में उसे कोई भी समस्या है तो एक बार एक्सपर्ट की सलाह ले लेनी चाहिए। ये भी सेलेब्रल पालसी की निशानियां हो सकती हैं। एक दूसरी निशानी बच्चों की खुराक से जुड़ी है। अगर वह चीजों को आसानी से चबा लेता है और निगल लेता है तो सामान्य है। अगर उसे चबाने या निगलने में परेशानी होती है तो उसे समस्या हो सकती है। 

थेरेपी करती है मदद 
दिल्ली में कई सरकारी और प्राइवेट सेंटर हैं, जहां सेरेब्रल पालसी को नियंत्रण में करने के लिए थेरेपी दी जाती है। कई स्वयं सेवी संस्थाएं भी ये काम अपने स्तर पर करती हैं। अमूमन सारे ही सेंटर तीन तरह की थेरेपी देते हैं। सबसे पहले फिजिकल थेरेपी दी जाती है, जिसमें कोशिश की जाती है कि एक्सरसाइज और खास तरह की जीवन शैली की मदद से बच्चे की मसल्स विकसित की जाएं। ज्यादातर मामलों में ये थेरेपी कारगर होती है और बच्चा चीजों को पकड़ने, बिना किसी सहारे के चलने या बैठने जैसी क्रियाएं काफी हद तक खुद से करने लगता है। हां, कई बार बच्चे को चलने के लिए वॉकर या ऐसे किसी दूसरे सामान की जरूरत पड़ती है। इसके बाद बच्चे को स्पीच थेरेपी दी जाती है। स्पीच थेरेपी में बच्चे के चेहरे और गले की मसल्स की एक्सरसाइज कराई जाती है, जिससे बच्चे को बोलने और संवाद बनाने में आसानी हो जाती है। इसके बाद एक्सपर्ट बच्चे को कु़छ दवाइयां भी देते हैं, जिससे वो सहज महसूस करता है। 

सावधानी बरतें 
जनरल फिजिशियन का चयन करते वक्त सबसे ज्यादा सावधानी की दरकार है। अगर बच्चे को गलत दवा दे दी गई तो उसे नुकसान भी हो सकता है। कई बार जनरल फिजिशियन बच्चे को बोटोक्स का इंजेक्शन देकर उसकी नसों को शून्य कर देते हैं, जिससे बच्चे को थोड़ी राहत मिलती है। इस ट्रीटमेंट के लिए दो से तीन एक्सपर्ट की सलाह लें और इसके बाद ही बच्चे को इंजेक्शन दिलाएं। कई बार कुछ जनरल फिजिशयन बच्चे की सजर्री कराने की सलाह देते हैं। याद रखें कि सजर्री काफी गंभीर मामलों में की जाती है और उसमें भी आराम मिलने की संभावना 5 प्रतिशत ही होती है। इसलिए सोचकर ही फैसला करें। 

मिथ और सच 
मिथ: सेरेब्रल पालसी में सुनाई देने की ताकत कम होती है। 
सच: कुछ लोगों में ऐसा होता है, सबमें नहीं। 

मिथ: सेरेब्रल पालसी के शिकार लोग कोई काम नहीं कर सकते, इसलिए उनका करियर जीरो होता है। 
सच: कई कंपनियों में सेरेब्रल पालसी के मरीज काम कर रहे हैं और उनकी कार्यक्षमता काफी ज्यादा आंकी गई है। 

मिथ: सेरेब्रल पालसी दवा या सजर्री से ठीक हो जाती है। 
सच: दवा या सजर्री कुछ समय के लिए मरीज को राहत तो दिलाती है, पर पूरी तरह से सेरेब्रल पालसी को ठीक नहीं कर पाती। 

मिथ: सेरेब्रल पालसी के मरीज बच्चों को खेल-कूद से दूर रखना चाहिए, इससे उन्हें नुकसान हो सकता है। सच: सेरेब्रल पालसी के बच्चे घुड़सवारी से लेकर टेनिस या क्रिकेट जैसा कोई खेल आसानी से खेल सकते हैं। 

दिल्ली में सेरेब्रल पालसी 

जागरूकता का अभाव 
डॉक्टरी जुबान में बात करें तो यह ऐसी बीमारी है, जिसमें शरीर में कई तरह के डिसऑर्डर होते हैं। इन डिसऑर्डर का असर दिमाग और नर्वस सिस्टम पर पड़ता है, जिससे शरीर से संतुलन खत्म हो जाता है। साथ ही शरीर से जुड़ी संवेदनाएं जैसे बोलने, सुनने और खाने पर भी इसका असर पड़ता है। इन लक्षणों को जितनी जल्दी पहचान लिया जाए, इलाज में उतनी आसानी होती है। डॉक्टर मानते हैं कि अमूमन दिल्ली के मध्यम वर्गीय लोग इस बीमारी के बाबत जागरूक नहीं हैं, जिससे समस्या होती है। 

लड़कों में ज्यादा 
दिल्ली शहर में इस बीमारी के अच्छे खासे रोगी हैं। खास तौर से नए जन्म लेने वाले बच्चे इसका शिकार बन रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार, अगर रोज 250 बच्चों का जन्म होता है तो उनमें से एक इस रोग का शिकार होता है। गौर करने लायक बात यह है कि दिल्ली में यह बीमारी लड़कियों के मुकाबले लड़कों में ज्यादा होती है। 

स्पेशल स्कूल 
दिल्ली में बड़ी संख्या में स्पेशल स्कूल चलते हैं, जहां इन बच्चों को थेरेपी दी जाती है। इसके अलावा कई बड़े एनजीओ, जैसे आस्था और उड़ान भी इन बच्चों के लिए काम करते हैं। सहारा नहीं, साथ दीजिए! 

हम 21वीं सदी में हैं। विचारों से लेकर रहन-सहन तक आधुनिक। लेकिन बात जब आती है विकलांग लोगों की, तो सोच परंपरागत हो जाती है। संवेदनशील लोग दया या सहारे की डोज देकर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन बराबरी का हक या सम्मान देने वाली बानगी कम ही दिखती है। और अगर गलती से हमें कोई ऐसा शख्स दिख जाए, जो मानसिक रूप से विकलांग है तब तो हम उसे काबिल या बुद्धिमान ही मानने से इंकार कर देते हैं। यों भी हममें से ज्यादातर लोग केवल उसकी विकलांगता को देख, समझ या महसूस कर पाते हैं, जो हमें सामने-सामने दिखती है, जबकि कई ऐसी विकलांगताएं हैं, जिनसे लोग जूझते हैं, मगर हमें उनका पता तक नहीं होता। 

हर विकलांगता जन्म से नहीं 
बीएलके अस्पताल के डॉ. ईश्वर के अनुसार, ‘एक शिशु स्पीना बीफिडा के साथ पैदा हो सकता है, जिससे उसे चलने में दिक्कत आ सकती है। किसी कार दुर्घटना में बच्चे को सिर पर चोट लग सकती है, जिससे उसके सोचने व याद रखने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। एक वयस्क को किसी प्रकार की मानसिक बीमारी हो सकती है, जिससे उसकी रोजमर्रा की जिंदगी पर खराब असर पड़ सकता है।’ इनमें से ज्यादातर विकलांगता ऐसी हैं, जो जन्म से नहीं होतीं, बल्कि कुछ हादसे या शरीर में किसी चीज की कमी इनका शिकार बनाते हैं। मसलन ब्रेन डिसेबिलिटी, जो दिमाग में चोट लगने से होती है। वर्ल्ड ब्रेन सेंटर के न्यूरोसाइकिएट्रिस्ट विभाग के डायरेक्टर डॉ. नीलेश तिवारी मानते हैं कि कई बार यह चोट मामूली या गंभीर दोनों तरह की होती है। इसी तरह से कई लोग लर्निग डिसेबिलिटी का शिकार होते हैं। डिस्लेक्सिया के शिकार लोगों को सीखने और पढ़ने में दिक्कत आती है, लेकिन सही इलाज से वे ठीक हो सकते हैं। डॉ. आभा कश्यप बताती हैं कि ऐसे बच्चे या वयस्क चीजों को अलग ढंग से देखते, सुनते व समझते हैं, जिस कारण उनके लिए नई चीजों को समझना काफी मुश्किल होता है। हालांकि ये सारे लोग अगर समाज का साथ पा लें तो इनके लिए आगे बढ़ना मुश्किल नहीं होता। (सुमन बाजपेयी,हिंदुस्तान,दिल्ली,14.3.12)

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रविवार, 12 फ़रवरी 2012

क्या आप भी नींद में जगते और काम में सोते हैं ?

शहरों के ज्यादातर लोगों की यह आम समस्या है। लेकिन इसे मामूली समझने की गलती न करें, यह स्लीपिंग डिसऑर्डर भी हो सकता है। इसके प्रति लापरवाही बरतना कितना खतरनाक हो सकता है, बहुत से लोगों को इसका अंदाजा भी नहीं है।

हाल ही में अभिनेता शाहरुख खान ने कहा कि उन्हें सिर्फ चार घंटे की नींद मिल पाती है। यह खबर देखकर शायद आप भी सोचने लगे होंगे कि कई बार आप भी तो इससे ज्यादा नहीं सो पाते। लेकिन शायद आप इस बात पर ध्यान नहीं गया होगा कि नींद की कमी के कारण आपके स्वभाव में क्या कुछ बदलाव आया है। पर यह खतरे की पहली घंटी है। अगर आप नहीं चेते तो यह समस्या कुछ अर्से बाद बड़ी बीमारी का रूप धारण कर सकती है जिसे स्लीपिंग डिसऑर्डर कहा जाता है। 

ये समस्या अब सिर्फ सेलिब्रिटीज या बड़े अधिकारियों तक ही सीमित नहीं रही बल्कि आज दिल्ली और ऐसे तमाम बड़े महानगरों में काम का दबाव और जल्द से जल्द आगे बढ़ने की होड़ ने आम आदमी तक में स्लीपिंग डिसऑर्डर के लक्षण दिखने लगे हैं। यह समस्या दिल्ली में भी अधिकांश कामकाजी लोगों की समस्या बनती जा रही है। आजकल की जीवनशैली और व्यस्त दिनचर्या में किसी के पास भरपूर नींद लेने का वक्त नही है। डॉक्टरों के अनुसार, अच्छी सेहत के लिए कम-से-कम आठ घंटे की नींद जरूरी है, लेकिन एक सर्वे के अनुसार केवल 93 प्रतिशत भारतीय पूरे आठ घंटे की जरूरी नींद ले पाते हैं। लेकिन दिल्ली में यह प्रतिशत लगभग 50-50 है। यानी लगभग 50 प्रतिशत लोग नींद पूरी नहीं ले पाते हैं और ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। सर्वे में यह भी पता चला कि नींद की कमी के चलते लगभग 60 प्रतिशत लोग सही तरीके से काम नहीं कर पाते हैं। इनमें से 11 प्रतिशत लोग कार्यस्थल पर भी सोते हुए मिलते हैं। 

अच्छी नींद हमारे जीवन का अहम हिस्सा है। आपने खुद महसूस किया होगा कि जब आप चैन की भरपूर नींद पूरी करके जागते हैं तो खुद को तरोताजा और स्फूर्ति भरा महसूस करते हैं। नींद हमारे थके हुए शरीर ही नहीं, मस्तिष्क को भी नई ऊर्जा से भर देती है। चिकित्सकों का मानना है कि रात में जागकर अपना काम पूरा करने वाले लोग अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करते हैं। ऐसे लोग अक्सर चिड़चिड़े हो जाते हैं जिससे उनकी कार्यशैली और जीवन पर बुरा असर पड़ता है। कम सोने वाले लोग अक्सर नींद न आने की समस्या से भी जूझते हैं जो खतरे की घंटी होती है। इस लिए इसकी अनदेखी बिल्कुल भी नहीं करनी चाहिए। 

क्या है स्लीपिंग डिसऑर्डर 
पिछले कुछ सालों में स्लीपिंग डिसऑर्डर के कई मामले सामने आए हैं। यह कई तरीके का हो सकता है। जैसे बिस्तर पर जाने के काफी देर बाद नींद आना, दिन में नींद के झटके आते रहना, रात में ज्यादा सपने आना, बार-बार नींद का टूटना, मुंह सूखना, पानी पीने या पेशाब के लिए बार-बार उठना, खर्राटे लेना, रातों में टांगों का छटपटाना, नींद में चलना आदि। 

अक्सर नींद को लोग थकावट या फिर दिमागी तनाव से जोड़ कर देखते हैं और अच्छी नींद लेने के लिए खुद ही कोई नींद की गोली खा लेते हैं। इस तरह बिना कारण जाने नींद की गोलियां लेने से बीमारी और बढ़ सकती है। हो सकता है कि नींद न आने के सिर्फ ये कारण न हों। कई बार कार्य करने के घंटों में फेरबदल होने से भी नींद नहीं आती। जिन लोगों की गर्दन छोटी होती है, जबड़ा छोटा होता है, चेहरा बेहद पतला या लंबा होता है, उन लोगों को सोते समय सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। इस कारण ऐसे लोगों में खर्राटे की समस्या देखने को मिलती है। 

कई बार टांगों में नसें फड़कती हैं। ऐसे व्यक्ति की टांगों में छटपटाहट होती है जिस कारण वह अच्छी नींद नही ले पाता। इसी तरह कई लोगों को नींद से ज्यादा सपने आने लगते हैं। नींद में सपनों का बीस प्रतिशत होना सामान्य बात मानी जाती है, लेकिन जब सपने इससे ज्यादा आने लगे, तो यह स्थिति समस्या बन जाती है। इसी तरह कई लोगों की नींद थोड़ा झटका आने पर टूट जाती है। अगर कोई नींद में चलने लगे या असामान्य हरकतें करने लगे, तब यह समझ लेना चाहिए कि यह स्लीपिंग डिसऑर्डर है। परिणाम भयानक हो सकते हैं।  

रॉकलैंड अस्पताल के सीनियर कंसल्टेंट (साइक्लोजिस्ट) डॉ एस सुदर्शन का कहना है कि नींद न आने या ज्यादा आने के और भी कई कारण हो सकते हैं, जैसे तनाव या किसी भी तरह का दर्द। इनकी जांच करवाए बिना कोई दवा नहीं खानी चाहिए। 

सुनने मे समस्याएं छोटी-छोटी जरूर लगती हैं, लेकिन इन्हीं असामान्यताओं के कारण कई बार रात को सोते समय हार्ट अटैक आ जाता है। अचानक सांस रुक जाती है.. और कभी तो नींद में चलते हुए व्यक्ति अपराध तक कर सकता है। 8 घंटे की नींद बहुत जरूरी है 50 प्रतिशत लोग दिल्ली में नींद पूरी नहीं ले पाते 60 प्रतिशत लोग सही तरीके से काम नहीं कर पाते 11 प्रतिशत लोग कार्यस्थल पर सोते हुए पाए जाते हैं। 

विशेषज्ञों की सुनते हैं 
बीमारी लाइलाज नहीं 

-नींद न आना सौभाग्य से लाइलाज बीमारी नहीं है। 

-खुद की डाइट जांचना, सोने का माहौल देखना, समय, व्यक्तिगत आदत, जीवनशैली और तात्कालिक एकाग्रता। इन सब बातों में तालमेल बिठाकर अच्छी नींद ली जा सकती है। 

 -दोपहर के बाद कॉफी का एकाध प्याला लेना बुरा नहीं है, लेकिन सोने से पहले ऐसा न करें। 

-धूम्रपान भी अच्छी नींद की राह में रोड़ा अटकाने वाली वस्तु है। 

-सोने से पहले कुछ तरल पदार्थ ले सकते हैं जैसे जूस, दूध आदि। -नियमित एक्सरसाइज अच्छी नींद के लिए जरूरी है। 

-सोते समय तकिया ऊंचा न लें और मुलायम गद्दे पर ही सोयें- डॉ आर पी सिंह, सीनियर कंसलटेंट, इंटर्नल मेडिसन रॉकलैंड अस्पताल 

नींद की बायलॉजिकल घड़ी 
कई लोग रातभर करवट बदलते रहते हैं, जिसे एक तरह का साइकेट्रिक डिसऑर्डर माना जाता है। इंसोमेनिया (नींद न आने की बीमारी) और ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपीनिया दो बीमारियां हैं, जिनमें नींद हमसे कोसों दूर भागती है। दोनों ही स्थितियों का इलाज न होने पर परेशानियां हो सकती हैं। हर व्यक्ति के शरीर में नींद की बायलोजिकल घड़ी होती है जो नींद के समय का ध्यान रखती है। जब ये घड़ी असंतुलित हो जाती है तो बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। जब बच्चे पूरी रात जाग कर पढ़ते हैं तो उनकी ये क्लॉक डिस्टर्ब हो जाती है। मानसिक विकास पर गलत प्रभाव पड़ता है। वे चिड़चिड़े हो जाते हैं। मनमानी करने लगते हैं और लोगों से कटे-कटे रहने लगते हैं। साथ ही उसकी स्मरण शक्ति पर भी इसका बुरा असर पड़ता है। डॉ. अरुणा ब्रूटा, मनोचिकित्सक 

युवाओं में साइड इफेक्ट 
आजकल कारपोरेट वर्ल्ड का जमाना है जिसने रातों को छोटा कर दिया है। काम के घंटे बढ़ गए हैं जिससे देर रात तक लोग ऑफिस में काम करते नजर आते हैं। इस कारण मस्तिष्क को आराम नहीं मिल पाता और मस्तिष्क पर हर वक्त एक दबाव-सा बना रहता है। इस कारण आज के युवा स्लीपिंग डिसऑर्डर का तेजी से शिकार हो रहे हैं। यही वजह है कि युवाओं के बीच हिंसा और आक्रोश बढ़ रहा है। कार्यालय की राजनीति और विवाहेत्तर संबंधों का एक महत्वपूर्ण कारण भी स्लीपिंग डिसऑर्डर ही है। इस कारण युवाओं की सोचने की क्षमता कम हो रही है और एल्कोहल, स्मोकिंग, हुक्का जैसे एडिक्शन व रोड रेज बढ़ रहे हैं(मृदुला भारद्वाज,हिंदुस्तान,दिल्ली,25.1.12)।

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शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

ऑटिज़्म के लक्षण 3 साल के पहले ही दिखने लगते हैं

ऑटिज़्म एक अवस्था है, जिसमें मस्तिष्क का विकास प्रभावित होता है। इस समस्या से ग्रसित बच्चा अपने वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता। यह मूल रूप से संवाद स्थापित नहीं करने की वजह से होता है। इससे बच्चा अपने आसपास मौजूद वस्तुओं और लोगों के साथ अर्थपूर्ण संवाद स्थापित करने में असमर्थ रहता है। वह अभिव्यक्ति के लिए एक ही तरह के शब्दों को दोहराता है और एक जैसा व्यवहार ही करता है। 

कई लोग ऐसे बच्चों को मंदबुद्धि समझ लेते हैं। मंदबुद्धि एवं ऑटिस्टिक बच्चों के बीच का अंतर लक्षणों को समझने से स्पष्ट हो सकता है। ऑटिज़्म ग्रस्त बच्चों में तीन साल की उम्र के पहले ही लक्षण दिखाई देने लगते हैं। इन बच्चों का विकास शुरुआत में सामान्य बच्चों की तरह ही होता है, लेकिन धीरे-धीरे ऑटिज़्म के लक्षण विकसित होने लगते हैं।

लक्षण

-इससे ग्रस्त बच्चे संप्रेषण या संवाद स्थापित नहीं कर पाते।

-वह एक ही प्रकार की अर्थहीन शारीरिक क्रिया बार-बार दोहराते हैं, जैसे डिब्बों को एक के ऊपर एक रखकर जमाते रहना।  

 -परिणामस्वरूप बच्चा सामान्य जीवन जीने के लिए आवश्यक सामाजिक व्यवहार एवं वार्तालाप के कौशल को विकसित नहीं कर पाता। इस प्रकार आत्मनिर्भर न बन पाने की वजह से वह अपने दैनिक कार्यों के लिए दूसरों पर आश्रित रहता है। 

ऑटिज्म ग्रसित बच्चे 


ऐसे बच्चे आई कॉन्टेक्ट नहीं कर पाते। वे न तो लोगों की ओर ध्यान केंद्रित कर पाते हैं,न ही मुस्कुराते हैं और न ही आवाज़ के प्रति कोई प्रतिक्रिया देते हैं। उम्र के साथ बढ़ने पर भी ये बच्चे सामाजिक समझ को प्रदर्शित नहीं करते,जैसे-हंसने,डांटने,डराने एवं नाम पुकारे जाने पर कोई अर्थपूर्ण प्रतिक्रिया नहीं दे पाते। परिणामस्वरूप,एक ही प्रकार के शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। ये बच्चे एकाग्रचित्त भी नहीं हो पाते,अतः,शैक्षणिक विकास अवरूद्ध होता है। 


कारण
दिमाग़ द्वारा सूचनाओं को प्रोसेस करने की प्रक्रिया ऑटिज़्म के कारण प्रभावित होती है। तंत्रिकाएँ आपस में जुड़कर मस्तिष्क तक जानकारी को पहुँचाते हैं। ऑटिज़्म में इस प्रक्रिया में परिवर्तन आ जाता है। इसका सटीक कारण फिलहाल अज्ञात है। जीन्स में होने वाले परिवर्तन संभावित कारणों में शामिल हैं। ऑटिज़्म का एक मज़बूत आनुवांशिक आधार होता है। ऐसा नहीं है कि इन बच्चों का दिमाग़ काम ही नहीं करता। ऑटिज़्म ग्रसित बच्चों का दिमाग़ अलग तरह से काम करता है। इनके दिमाग़ का कुछ हिस्सा सामान्य से भी अधिक कार्य करता है। इसीलिए ये असाधारण रूप से चीज़ों को ध्यान में रख सकते हैं और पूरी बारीकी के साथ ड्रॉइंग भी बना लेते हैं।

इलाज
चूँकि ऑटिज़्म का कारण अस्पष्ट है, इसलिए इसका इलाज या बचाव भी नहीं है। ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चे का जीवन सरल बनाने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं। यदि बच्चे में इसका शुरुआत में ही पता चल जाए और तभी से विशेष ध्यान दिया जाए तो उसकी हालत में कुछ सुधार हो सकता है। हालाँकि यह सब एक हद तक ही मददगार होते हैं, स्थिति के प्रबंधन के लिए प्रोफेशनल्स की मदद ली जा सकती है। शिक्षण की विशेष पद्घति, संवाद, भाषा और व्यवहार से जुड़ी समस्याओं के लिए विशेष देखभाल ज़रूरी है। ऑटिज़्म के लक्षणों में अवसाद या दौरे भी शामिल हो सकते हैं, इन लक्षणों के लिए दवाएँ दी जा सकती हैं। हालाँकि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है, लेकिन कुछ बच्चे बड़े होने पर ठीक भी हुए हैं। इससे प्रभावित अधिकतर बच्चे वयस्क होने के बाद भी दूसरों पर निर्भर रहते हैं। कम ही आत्मनिर्भर होने में सफल हो पाते हैं(डॉ. वीएस पाल,सेहत,नई दुनिया,फरवरी प्रथमांक 2012)।

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बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

जानिए कब रहती है आशंका ब्रेन स्ट्रोक की

दिल्ली की तेज रफ्तार जिंदगी में घड़ी की सुइयों संग कदमताल करती दिनचर्या, तनाव, समय पर न खाना और पूरी नींद न लेना कई जानलेवा बीमारियों की वजह बनती जा रही है। इन्हीं जानलेवा बीमारियों में से एक है ‘ब्रेन स्ट्रोक’। 

ब्रेन स्ट्रोक यानी आज के समय की एक जानलेवा बीमारी। हार्ट अटैक, कैंसर, डायबिटीज जैसी बीमारियों को जितनी गंभीरता से लिया जाता है, इस बीमारी को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता, जबकि उम्रदराज लोग ही नहीं, युवा भी तेजी से इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। 

ब्रेन स्ट्रोक 
‘ब्रेन स्ट्रोक’ में मस्तिष्क की कोशिकाएं अचानक मृत हो जाती हैं। यह मस्तिष्क में ब्लड क्लॉट बनने, ब्लीडिंग होने या रक्त संचरण के सुचारु रूप से न होने के कारण हो सकता है। रक्त संचरण में रुकावट आने के कुछ ही मिनट में मस्तिष्क की कोशिकाएं मृत होने लगती हैं क्योंकि उन्हें ऑक्सीजन की सप्लाई रुक जाती है। जब मस्तिष्क को रक्त पहुंचाने वाली नलिकाएं फट जाती हैं, तो इसे ‘ब्रेन स्ट्रोक’ कहते हैं। इस कारण लकवा, याददाश्त जाने की समस्या, बोलने में असमर्थता जैसी स्थिति आ सकती है। कई बार ‘ब्रेन स्ट्रोक’ जानलेवा भी हो सकता है। इसे ब्रेन अटैक भी कहा जाता है। 

लक्षण 
इसके लक्षण अलग-अलग होते हैं। कई मामलों में तो मरीज को पता ही नहीं चलता कि वह ब्रेन स्ट्रोक का शिकार हुआ है। इन्हीं लक्षणों के आधार पर डॉक्टर पता लगाते हैं कि स्ट्रोक के कारण मस्तिष्क का कौन-सा भाग क्षतिग्रस्त हुआ है। अक्सर इसके लक्षण अचानक दिखाई देते हैं। इनमें प्रमुख हैं- 

-मांसपेशियों का विकृत हो जाना। 
-हाथों और पैरों में कमजोरी महसूस होना। 
-सिर में तेज दर्द होना। 
-देखने में परेशानी। 
-याद्दाश्त कमजोर हो जाना। 

कारण 
सीनियर न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. रजनीश कुमार कहते हैं, ‘मस्तिष्क को रक्त पहुंचाने वाली नालिकाओं के क्षतिग्रस्त होने के कारण या उनके फट जाने के कारण ब्रेन अटैक होता है। इन नलिकाओं के क्षतिग्रस्त होने का मुख्य कारण ‘आर्टियो स्क्लेरोसिस’ है। इसके कारण नलिकाओं की दीवारों में वसा, संयोजी उत्तकों, क्लॉट, कैल्शियम या अन्य पदार्थो का जमाव हो जाता है। इस कारण नलिकाएं सिकुड़ जाती हैं। उनके द्वारा होने वाले रक्त संचरण में रुकावट आता है या रक्त कोशिकाओं की दीवार कमजोर हो जाती है।’ 

बचने के उपाय 
यूं तो पोषक खाद्य पदार्थों का सेवन सभी के लिए जरूरी है, लेकिन विशेष रूप से उनके लिए बहुत जरूरी है जो स्ट्रोक से पीड़ित हैं। पोषक भोजन खाने से न सिर्फ मस्तिष्क की क्षतिग्रस्त हुई कोशिकाओं की मरम्मत होती है बल्कि भविष्य में स्ट्रोक की आशंका भी कम हो जाती है। ऐसा भोजन लें जिसमें नमक, कॉलेस्ट्रॉल, ट्रांस फैट और सेचुरेटेड फैट की मात्र कम हो और एंटी ऑक्सीडेंट, विटामिन ई, सी और ए की मात्र अधिक हो। साबुत अनाज, फलियां, सूखे मेवों और ब्राउन राइस का सेवन करें। जामुन, गाजर और गहरी हरी पत्तेदार सब्जियों में एंडीऑक्सीडेंट की मात्र बहुत अधिक होती है। 

सर्दियां बढ़ा देती हैं खतरा 
हार्ट फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. के. के. अग्रवाल कहते हैं, ‘जिन्हें ब्लडप्रेशर की शिकायत है, सर्दियों में सुबह के समय उनका ब्लडप्रेशर खतरनाक स्तर तक बढ़ जाता है। इससे ब्रेन स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे लोगों को इस मौसम में खास ख्याल रखना चाहिए।’ 

किन्हें है अधिक खतरा 
-डायबिटीज टाइप-2 के मरीजों में इसका खतरा अधिक बढ़ जाता है। 


-हाई ब्लप्रेशर और हाइपर टेंशन के मरीज भी इसकी चपेट में जल्दी आ जाते हैं। 

-मोटापा ब्रेन अटैक का एक प्रमुख कारण बन सकता है। 

-धूम्रपान, शराब और गर्भ निरोधक गोलियों का सेवन ब्रेन अटैक को निमंत्रण देने वाले कारक माने जाते हैं। 

-बढ़ता कोलेस्ट्रॉल का स्तर और घटती शारीरिक निष्क्रियता भी इसकी वजह बन सकती है। 

उपचार 
लक्षण नजर आते ही मरीज को तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए। प्राथमिक स्तर पर इसके उपचार में रक्त संचरण को सुचारु और सामान्य करने की कोशिश की जाती है ताकि मस्तिष्क की कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त होने से बचाया जा सके। डॉ. कुमार कहते हैं, ‘कई अत्याधुनिक अस्पतालों में थ्रोम्बोलिसिस के अलावा एक और उपचार उपलब्ध है जिसे सोनो थ्रोम्बोलिसिस कहते हैं। यह मस्तिष्क में मौजूद ब्लड क्लॉट को नष्ट करने का एक अल्ट्रासाउंड तरीका है। इस उपचार में केवल दो घंटे लगते हैं। इसीलिए स्ट्रोक अटैक के तीन घंटे के भीतर मरीज को जो उपचार उपलब्ध कराया जाता है उसे ‘गोल्डन पीरियड’ कहते हैं(शमीम खान,हिंदुस्तान,दिल्ली,1.2.12)।

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रविवार, 29 जनवरी 2012

मिजाज और व्यवहार में बदलाव है बाइपोलर डिसऑर्डर का लक्षण

क्या आपके मिजाज में अचानक बदलाव आ जाता है? क्या आप अचानक खुश और दूसरे ही पल दुखी हो जाते हैं? तो फिर आप बाइपोलर डिसऑर्डर के शिकार हो सकते हैं। 

गिरकर हौसला मत खोना, ठोकरें ही चलना सिखाती हैं।’ आज की पीढ़ी को शायद इसी सीख की सबसे ज्यादा जरूरत है, क्योंकि धैर्य की कमी के कारण अत्यधिक खुशी या गम उन्हें तनाव की ऐसी जिंदगी में ले जाता है, जहां से उबर पाना बहुत मुश्किल होता है। लेकिन अब सावधान हो जाएं, क्योंकि व्यक्ति के मिजाज और व्यवहार में बदलाव महज तनाव नहीं है। यह ‘बाइपोलर डिसऑर्डर’ के लक्षण हो सकते हैं। 

व्यवहार में बड़ा परिवर्तन, जैसे कई बातों को लेकर बहुत तनाव में रहना या फिर अचानक आत्मविश्वास का बहुत बढ़ जाना, मानो व्यक्ति का अपने मिजाज और व्यवहार पर कोई नियंत्रण ही न रह गया हो। यह बाइपोलर डिसऑर्डर नाम का मनोरोग हो सकता है। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसमें पीड़ित व्यक्ति के व्यवहार में तेजी से परिवर्तन आता है। कार्यस्थल, समाज या परिवार में किसी व्यक्ति के व्यवहार में तेजी से आए बदलाव को जानना और समझना बहुत ही आवश्यक है। 

अनुमान है कि देश में लगभग एक फीसदी लोग इस बीमारी के शिकार है। महिला और पुरुष ही नहीं, बल्कि बच्चे भी इसकी पहुंच से बाहर नहीं है। आमतौर पर 20 वर्ष की आयु में इस बीमारी की शुरुआत होती है, लेकिन अब 14 वर्ष से अधिक आयु के बच्चों में भी इसके लक्षण देखे जा सकते हैं। इस बीमारी से बचने के लिए व्यक्ति का नजरिया और आत्मविश्वास बहुत अहम भूमिका निभाते हैं। आप किस तरह खुद को संभालते और ढालते हैं, यही इस बीमारी को आपसे दूर रखने में मदद करता है। 

व्यवहार में परिवर्तन को काफी समय तक न समझ पाने के कारण अक्सर इस बीमारी की पहचान नहीं हो पाती और व्यक्ति इससे वर्षों तक पीड़ित रहता है। नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले लोगों में भी यह बीमारी पाई जाती है। इसके अलावा मौसम में बदलाव भी इस बीमारी में बड़ा अहम रोल अदा करता है। सर्दी और पतझड़ के मौसम में इस बीमारी से पीड़ित लोगों में तनाव के लक्षण देखे जा सकते हैं। 

तनाव के लक्षणों में दुखी रहना, ऊर्जा में कमी, इच्छा में कमी, आत्मविश्वास में कमी, मरने की इच्छा करना और नाउम्मीद होना शामिल है। गर्मी और वसंत के महीने में उन्माद के संकेत पाए जाते हैं। उन्माद के लक्षणों में बहुत अधिक खुशी, नींद की जरूरत घटना, बहुत अधिक बोलना, जोखिम लेना, अति आत्मविश्वास होना, बहुत अधिक खर्च करना आदि शामिल है। डॉक्टरों का कहना है कि इस मर्ज से निपटने के लिए तनाव के प्रबंधन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके अलावा मरीज को अपनी नींद का समय तय रखना चाहिए और नशीले पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए। इस बीमारी में आत्मविश्वास बनाए रखना और खुद पर नियंत्रण भी जरूरी होता है। साथ ही उन्हें दवा, मनोवैज्ञानिक इलाज और परिवार की काउंसलिंग आदि महत्वपूर्ण बातों का भी ख्याल रखना चाहए। इस बीमारी में दवाओं का सेवन लंबे समय तक करना पड़ता है। ये बीमारी अधिकतर अनुवांशिक होती है। कई बार मस्तिष्क में रसायनों का असंतुलन या कुछ ऐसी घटनाएं और अपर्याप्त सामाजिक सहायता भी इस बीमारी का कारण बन सकती है। अब जब भी आप अपने मिजाज में उतार-चढ़ाव महसूस करें, बिना लापरवाही बरते इसकी जांच कराएं या फिर फैसला न कर पाने की स्थिति में डॉक्टर की सलाह अवश्य लें। थोड़ी सी भी लापरवाही आगे चलकर बड़ी समस्या का सबब बन सकती है(हिंदुस्तान,दिल्ली,18.1.11)।

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रविवार, 25 दिसंबर 2011

शरीर ही नहीं, दिमाग को भी चाहिए खुराक

शरीर को सुंदर और स्वस्थ बनाए रखने के लिए हम न जाने कितने जतन करते हैं। लेकिन जिस दिमाग के बलबूते हम कहां से कहां पहुंच जाते हैं, उसकी तरफ इतनी बेरुखी क्यों? क्या अपने दिमाग को शार्प बनाने के लिए आप कुछ खास करती हैं? अगर जवाब न में है, तो आज से ही इन बातों पर अमल करना शुरू करें। बता रही हैं प्रीति सेठः 

यह तो हम सभी जानते हैं कि शरीर को फिट रखने के लिए अच्छी डाइट और एक्सरसाइज बेहद जरूरी है। लेकिन अपने दिमाग को फिट और तेज रखने के लिए आप क्या करती हैं? दिमाग को तेज रखने के लिए भी कुछ खास खुराक की जरूरत होती है, जिन्हें अपनी डाइट में शामिल कर आप अपने दिमाग को तेज बना सकती हैं। 

जानें ब्रेन की सही डाइट को 
ओमेगा थ्री फैटी एसिड्स को डाइट में शामिल करें। यह टूना, सॉलमन और अन्य मछलियों से मिलता है। कुछ सूखे मेवे और तेल में भी ओमेगा थ्री होता है। 

कोलाइन याददाश्त को बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण न्यूट्रीयंट्स है। यह मछली, अंडे, सूखे मेवे और सोयाबीन में मिलता है। इससे एसिटोकोलाइन का निर्माण होता है, जो याददाश्त बढ़ाने में मददगार होता है। विटामिन बी और विटामिन सी मस्तिष्क के विकास में विशेष भूमिका निभाते हैं। विटामिन बी युक्त आहार को अपनी डाइट में शामिल करने से आपका आई क्यू बढ़ेगा। 

पाइरोग्लूटामेट एक जरूरी अमीनो एसिड है, जो याददाश्त के साथ ध्यान केंद्रित करने में भी मदद करता है। यह डेयरी प्रोडक्ट्स, मछली, फल और हरी सब्जियों में मिलता है। 

फॉस्फैटीडायसराइन नाम का केमिकल तनाव से दूर रहने में मदद करता है। ग्लूटामाइन नाम का केमिकल भी मस्तिष्क के विकास के लिए जरूरी है। यह एक तरह का अमिनो एसिड है, जिसकी मदद से मस्तिष्क सही तरीके से काम करता है। इसके अलावा यह आपके मस्तिष्क और शरीर को ऊर्जा से भी भर देगा। हेल्दी और फिट शरीर के लिए आपने आज तक कई बार यह सलाह सुनी या पढ़ी होगी कि ढेर सारा पानी पियो। पर क्या आपको पता है कि तेज दिमाग के लिए भी ढेर सारा पानी पीना जरूरी है। हर दिन कम-से-कम आठ गिलास पानी पिएं, इससे दिमाग तेज होगा। 

करें ये दिमागी कसरत 
क्रॉसवर्ड, पजल्स, इससे आप अपनी मेमोरी को तेज कर सकेंगी। सप्ताह में दो घंटे मेमोरी गेम्स और पजल्स खेलने से याददाश्त तेज होती है। नंबर पजल को आप ऑनलाइन विभिन्न वेबसाइट्स पर या अखबार या मैगजीन में हल कर सकती हैं। मेमोरी के साथ ये रीजनिंग स्किल भी बढ़ाती हैं। कुछ नया सीखें। नया सीखने की आदत और उसे जारी रखना याददाश्त को बेहतर रखने में मदद करता है, भले ही वह कोई म्यूजिकल इंस्ट्रुमेंट क्यों न हो। वोकेबलरी, हर रोज एक नया शब्द सीखकर अपनी वोकेबसरी को मजबूत करें। नए और ज्यादा शब्दों को जान उनका इस्तेमाल भी करें। स्पीड डायल, खास टेलीफोन नंबरों को याद करने की कोशिश करें। 

एक्सरसाइज करें 
एक्सरसाइज शरीर के लिए ही नहीं, दिमाग के लिए भी जरूरी है। एक्सरसाइज से दिल की धड़कन तेज होती है, जिससे खून बिना रुकावट के तेजी से शरीर में दौड़ता है। इस तरह दिमाग को ऊर्जा पहुंचाने वाला कीमती ईंधन और ऑक्सीजन दिमाग के कोने-कोने तक पहुंचाता है। सप्ताह में तीन बार एक्सरसाइज जरूर करें। यदि आप अपने दिमाग को दुरुस्त रखना चाहती हैं तो इन तीन बातों को हमेशा याद रखें। सही डाइट लें, पूरा आराम करें और नियमित व्यायाम करें। अगर आपका शरीर स्वस्थ रहेगा, तभी दिमाग भी तेज होगा(हिंदुस्तान,दिल्ली,22.12.11)।

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शनिवार, 24 दिसंबर 2011

खुश रहकर ही बचा जा सकता है मनोरोग से

तथाकथित आधुनिक जीवनशैली ने हमें जो यादगार ‘उपहार’ दिए हैं उनमें मानसिक रोग प्रमुख है। बड़े शहरों में तो स्थिति और भी भयावह है। दिल्ली के एम्स, विमहंस, आरएमएल, जीबी पंत और इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड अप्लायड साइंसेज अस्पतालों की ओपीडी में रोज पांच से छह हजार मनोरोगियों का उपचार होता है। शमीन खान बता रही हैं कि जीवन को कैसे रखें संतुलित और दुरुस्तः

दिल्ली में रिश्तों के बीच दूरिया इतनी बढ़ गई हैं कि आज पड़ोसी भी एक दूसरे को नहीं पहचानते। इस एकाकीपन से पैदा हुआ तनाव लोगों की जिंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है। हमारे मस्तिष्क और शरीर को इसकी कीमत कई बीमारियों के रूप में चुकानी पड़ रही है। खासकर जीवनशैली और आदतों से जुड़ी डिप्रेशन, एनजाइटी, मेनिया आदि तेजी से पैर पसार रहे हैं। आइए जानें, इन बीमारियों से बचाव के उपाय। 

सिजोफ्रेनिया 
यह एक जटिल मानसिक रोग है। पुष्पांजलि अस्पताल के कंसल्टेंट मनोचिकित्सक डॉ. अजय निहलानी कहते हैं, ‘इसमें रोगी के लिए वास्तविक और अवास्तविक चीजों में भेद करना मुश्किल हो जाता है। तर्क करने की क्षमता समाप्त हो जाती है। कई मरीजों को अजीब तरह की आवाजें सुनाई देने लगती हैं। वह कई तरह के भ्रम में जीने लगता है। इसके मरीज अक्सर अल्जाइमर्स और डिमेंशिया से भी पीड़ित होते हैं।’ इसका प्रमुख कारण एकाकीपन, बेरोजगारी, गरीबी और नशीली दवाओं का सेवन होता है। बच्चे की अधिक पिटाई भी आगे चलकर इस बीमारी का का कारण बन सकती है। 

अल्जाइमर 
पारस अस्पताल के वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट, डॉ. रजनीश कुमार के अनुसार, ‘यह घातक मानसिक रोग है। इसमें मस्तिष्क की कोशिकाओं का आपस में संपर्क खत्म हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप मस्तिष्क की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं। यह 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में पाया जाने वाला सबसे सामान्य मस्तिष्क रोग है।’ 

पार्किंसन 
यह एक न्यूरोडिजनरेटिव बीमारी है। हमारे शरीर की गति डोपामिन रसायन द्वारा नियंत्रित होती है। वह रसायन मस्तिष्क की विभिन्न तंत्रिकाओं के बीच संदेशवाहक का काम करता है। जब डोपामिन बनाने वाली कोशिकाएं मृत हो जाती हैं तो पर्किसन के लक्षण प्रकट होते हैं। इसमें हाथ पैरों में कंपकपी, शरीर का संतुलन बिगड़ना, मांसपेशियों का कड़क होना तथा अत्यधिक थकान होना आम बात हो जाती है। बाद में मरीज गहरे डिप्रेशन में चला जाता है। 

मेनिया 
मेनिया अर्थात उन्माद रोग एक गंभीर मनोरोग है। इसमें रोगी अत्यंत उत्तेजित या हिंसक हो जाता है। तनाव इस रोग में ट्रिगर का काम करता है। यह एक खतरनाक मानसिक अवस्था है, जिसमें व्यक्ति इतना सक्रिय और उत्तेजित हो जाता है कि उसका वास्तविकता से संपर्क टूट जाता है। 

कारण 
मशहूर मनोवैज्ञानिक अरुणा ब्रूटा कहती हैं, ‘अनुवांशिकी कारणों के अलावा सामाजिक और पर्यावरणीय कारक भी मानसिक स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जो माता-पिता अपने करियर और महत्वाकांक्षाओं के कारण बच्चों को वक्त नहीं दे पाते, जो बच्चे गरीबी में पले-बढ़े होते हैं, जिनकी मां बचपन में मर जाती हैं या पिता शराब पीकर बच्चों की पिटाई करते हैं उनमें मानसिक रोग होने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।’ डॉ. रजनीश कुमार के अनुसार, ‘सिर में लगी घातक चोट, संक्रमण, तनाव, अनिद्रा और डिप्रेशन भी व्यक्ति को मानसिक रोगी बना सकता है। लंबे समय तक चलने वाले तनाव से मस्तिष्क की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है। तनाव के कारण शरीर में कई हार्मोन स्नवित होते हैं जिनमें से कार्टीसोल भी एक है। वह मस्तिष्क को नई सूचनाएं ग्रहण करने और पहले से मस्तिष्क में इकट्ठी सूचना को याद करने में रुकावट डालता है।’ 

क्या है उपचार 
डॉ. ब्रूटा कहती हैं, ‘हमारे देश में मानसिक रोगों के प्रति जागरूकता का अभाव है। 90 प्रतिशत रोगी तो उपचार के लिए कभी अस्पताल ही नहीं जाते। कई मामलों में यदि रोग का पता चल भी जाता है तो मरीज और उसके परिवार वाले खामोशी से सहते रहते हैं। कहां से सहायता प्राप्त की जाए, यह भी नहीं जानते। अगर मरीज को सही समय पर उचित इलाज उपलब्ध कराया जाए तो कई मानसिक रोगों का पूरी तरह इलाज संभव है।’ 

फार्मेकोथेरेपी 
दवाओं से किसी मानसिक रोग के उपचार को फार्मेकोथेरेपी कहते हैं। कई आधुनिक दवाएं बहुत अच्छी हैं जिनसे मस्तिष्क को स्थिर कर रोगी का इलाज किया जाता है। साइकोथेरेपी सामान्यत: साइकोथेरेपी का उपयोग मानसिक रोगों या भावनात्मक आघातों केलिए किया जाता है। इसमें मरीज से विस्तार से बातचीत कर उसकी मानसिक अवस्था का अध्ययन किया जाता है और रोग के कारणों का पता लगाया जाता है। इस थेरेपी के द्वारा रोगी को परिस्थितियों से तालमेल बिठाने और खुद को स्वीकार करने में मदद की जाती है। बिहेवियर थेरेपी यह थेरेपी इस अवधारणा पर आधारित है कि सामान्य और असामान्य दोनों बर्ताव ही सीखे जा सकते हैं। यह बिहेवियर डिसॉर्डर को ठीक करने की पद्धति है। इसमें रोगी के बर्ताव का निरीक्षण किया जाता है और उसके लक्षणों पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। यह पद्धति डिप्रेशन, उत्तेजना, भय, उन्माद रोग में मददगार साबित होती है। 

हमारे विशेषज्ञः डॉ. अजय निहलानी कंसल्टेंट, मनोचिकित्सा विभाग, पुष्पांजलि अस्पताल डॉ. रजनीश कुमार वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट, पारस अस्पताल डॉ. विशाल छाबड़ा वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ, विमहंस अस्पताल डॉ. अरुणा ब्रूटा जानीमानी मनोवैज्ञानिक 

दिमाग को ऐसे रखें दुरस्त 
नए शोधों ने यह साबित किया है कि मस्तिष्क भी मांसपेशियों के समान ही कार्य करता है। जितना ज्यादा आप इसका इस्तेमाल करेंगे उतना ही यह शक्तिशाली होगा। वर्ग पहेलियां हल करना मस्तिष्क को चुस्त-दुरस्त रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

व्यायाम से दिमाग में ऑक्सीजन का प्रवाह बढ़ जाता है जिससे तनाव घटाने में मदद मिलती है। मानसिक शक्ति बढ़ती है और याददाश्त मजबूत होती है। योग मानसिक रोगों, उत्तेजना और भूलने की बीमारी में मददगार साबित होते हैं। योगासन शरीर के विभिन्न अंगों में समन्वय स्थापित करने और ध्यान केंद्रित करने में मदद करते हैं। शरीर में 200 से अधिक न्यूरोट्रांसमीटर (नर्व सिग्नल) होते हैं। इनकी उपयुक्त कार्यप्रणाली के लिए मस्तिष्क को कुछ जरूरी तत्वों की जरूरत पड़ती है। इनमें अच्छी क्वालिटी की वसा और प्रोटीन वाले डाइट प्रमुख होते हैं। 

बातें अपनाएं 
1. निश्चित दिनचर्या: अपनी दिनचर्या को निश्चित बनाएं। अगर आपका काम अनियमित दिनचर्या वाला है तो दिनचर्या पर ध्यान देना और जरूरी है। अनियमित दिनचर्या से तनाव बढ़ने की आशंका बढ़ जाती है।

2.अच्छा समय बिताएं: अपनों के साथ अच्छा समय बिताएं। आउटिंग पर जा सकते हैं, साथ खाना खाएं, बच्चों के साथ खेलें। 

3.थोड़ा समय अपने लिए भी जरूरी है: कम-से-कम 15-20 मिनट समय अपने लिए निकालें। इस समय का उपयोग व्यायाम, योग, प्राणायाम और अपनी किसी हॉबी के लिए करना चाहिए। 

4. ईष्या, द्वेष और क्रोध से दूर रहें: ये तीनों दोष शरीर के कई विकार पैदा करते हैं। ये आपके अंदर बुरी भावनाओं को बढ़ावा देते हैं जिससे अंतत: तनाव और आपके दिमाग पर दबाव बढ़ता है। 

5.आदर व स्नेह: दूसरों के प्रति आदर व स्नेह का भाव रखें। इससे आपको आदर व स्नेह मिलेगा और खुशी का अहसास होगा। डॉ. विशाल छाबड़ा, वरिष्ठ मनोचिकित्सक, विमहंस(शमीन खान,हिंदुस्तान,दिल्ली,21.12.11)।  


डाक्टर अनवर जमाल जी ने अपने ब्लॉग पर इस विषय की अच्छी व्याख्या की है।

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शनिवार, 3 दिसंबर 2011

क्या आपका बच्चा भी नींद में बिस्तर गीला करता है?

सात-आठ साल की उम्र के बच्चों के माता-पिता अक्सर इस बात से परेशान रहते हैं कि उनका बच्चा नींद में पेशाब कर देता है। यह एक मानसिक समस्या है जिसका निश्चित तौर पर इलाज किया जा सकता है। आमतौर पर उम्र बढ़ने के साथ यह समस्या अपने आप ठीक भी हो जाती है। 

सामान्यतः यह एक मानसिक बीमारी है, जिसमें बच्चे के पेशाब की थैली के निद्रा के समय सिकुड़ने से मूत्र प्रवाह हो जाता है। जिसे रात को होने वाला मूत्रीय असंयम या नाक्चुर एन्यूरेसिस भी कहा जाता है। यह समस्या मूल रूप से मस्तिष्क में न्यूरो हारमोन, न्यूरो केमिकल एवं न्यूरो ट्रांसमीटर के आंतरिक असंतुलन से होती है।

अगर उचित समय पर इसका इलाज न किया जाए तो वयस्क अवस्था तक भी यही स्थिति बनी रहती है। रात को बिस्तर गीला करने की समस्या के कई कारण हैं। यदि समय पर इलाज न कराया जाए तो बच्चे में आत्मग्लानि एवं हीनभावना पैदा होने लगती है और उसका व्यवहार असामान्य होने लगता है। यहाँ तक कि कई केसेस में विवाह के बाद भी यह समस्या बनी रहती है। समय पर इलाज न होने से यह काफी तकलीफदायक एवं क्लिष्ट हो जाता है। 

करीब १ प्रतिशत लोगों में आमतौर पर मूत्रीय असंयम पाया जाता है। उम्र ०-१ वर्ष में यह करीब ८०-९० प्रतिशत बच्चों में होता है एवं एक वर्ष के बाद धीरे-धीरे नियंत्रित होता है, लेकिन ३ साल की उम्र के पश्चात यह समस्या अपने आप समाप्त हो जाती है। 

अगर इस उम्र के बाद भी समस्या बरकरार रहे तो इसका इलाज शीघ्र किसी मानसिक चिकित्सक के पास करवाना चाहिए। इसके प्रमुख कारण अत्यधिक ईर्ष्या, तनाव, माता-पिता का आपस में झगड़ा, बड़े बच्चों का अत्यधिक लगाव आदि है। मस्तिष्क की अपरिपक्वता भी एक कारण है। मस्तिष्क में हारमोन का न बनना या कम बनने से यह बीमारी अधिक जटिल होती है। पुरूषों में यह रोग अधिक पाया जाता है। स्त्रियों में यह रोग कम,लेकिन काफी जटिल होता है। कई बार गर्भाशय में खराबी होने से यह बीमारी देखी जाती है। बच्चों में कई बार पेट में कीड़े होने के कारण भी बिस्तर गीला करने की समस्या उत्पन्न हो सकती है। 

उपचार 
कारण के अनुरूप इलाज किया जाता है, लेकिन आवश्यक बिंदु याद रखें। बच्चों को सोने से पहले अधिक पानी न पीने दें। चाय, कॉफी एवं ज्यूस न दें। पेशाब कर के सुलाएँ । रात में एक या दो बार उठाकर मूत्रत्याग करवाएँ(डॉ. अभय जैन,सेहत,नई दुनिया,नवम्बर चतुर्थांक 2011)।

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शनिवार, 5 नवंबर 2011

अल्जाइमरः सचेत रहने से ही होगा बचाव

भूलने की बीमारी के सामान्य रूप को अल्जाइमर कहा जाता है। नवम्बर महीने को इस बीमारी के प्रति जागरूकता महीने के रूप में मनाया जाता है। इस लाइलाज बीमारी के प्रति अधिक से अधिक जागरूकता फैलाकर ही हम अपना बचाव कर सकते हैं। अनुजा भट्ट बता रही हैं क्या है अल्जाइमर और कैसे हम इसकी चपेट में आने से बच सकते हैं-

चीजों को रख कर भूल जाना या बात करते करते रुक जाना और फिर सोचना कि आप क्या बात कर रहे थे जैसी गतिविधियों को उम्र बढ़ने के सामान्य लक्षणों के तौर पर रेखांकित किया जा सकता है। लेकिन जब किसी को अपना नाम न याद आ रहा हो या अपने बच्चों को पहचानने में दिक्कत हो रही हो तो समझिये कि खतरे की घंटी बज चुकी है। यह याददाश्त को प्रभावित करने वाली एक मानसिक गड़बड़ी है, जिसे डिमेंशिया कहा जाता है। अल्जाइमर इसी मानसिक गड़बड़ी का सबसे सामान्य रूप है। 

अल्जाइमर 60 साल साल या उससे अधिक उम्र के लोगों में हो सकता है। कम उम्र के लोगों में अमूमन यह नहीं होता है। भारत में 37 लाख लोग डिमेंशिया के शिकार हैं और इनमें से 90 फीसदी अल्जाइमर से पीड़ित हैं। इस बीमारी का अनुवांशिक नाता होने के कारण दुनिया के लोगों में यह आस जगी है कि इस बीमारी पर अब नियंत्रण कर पाना संभव हो सकेगा। सोलह साल में पहली बार इस रोग से संबंधित जीन के बारे में जानकारी मिली है और इस शोध ने वैज्ञानिकों को उन सिद्धांतों पर फिर से सोचने को प्रेरित किया है कि यह रोग कैसे पनपता है। 

अल्जाइमर स्मृति खो देने वाली मानसिक बीमारी है जिसमें एक स्थिति ऐसी आती है कि मरीज खुद को भी पहचान पाने में असमर्थ हो जाते हैं। अपना स्वयं का नित्यकर्म आदि कर पाना भी इनके लिए मुश्किल हो जाता है। लेकिन ऐसे मरीजों और इस गंभीर मर्ज से परेशान लोगों के लिए एक खुशखबरी है। ब्रिटेन के शोधकर्ताओं ने अल्जाइमर रोग से संबंधित दो प्रमुख जीन्स को खोज निकाला है। 

ये जीन्स सोलह हजार डीएनए नमूनों पर चिह्न्ति किए गए थे और ये कोलेस्ट्रॉल के विघटन के लिए जाने जाते हैं। उम्मीद की जा रही है कि इस रोग के अनुवांशिक अध्ययन के जरिए इसके इलाज के नए रास्ते खुलेंगे। उम्मीद की जा रही है कि इस खोज से परंपरागत दवाओं के माध्यम से इस रोग के इलाज के नए रास्ते खुलेंगे। दवाओं के बाजार में उतरने से मरीजों को काफी राहत मिलेगी। अल्जाइमर की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इसका अब तक कोई इलाज नहीं है। फिलहाल लक्षण की पहचान हो जाए तो दवाओं की मदद से इस समस्या को बढ़ने से रोका जा सकता है। हालांकि दुनिया भर में इसके इलाज की खोज के लिए दवाएं विकसित करने की कोशिश हो रही है। 

इसके लक्षण 
छोटी-छोटी चीजें जैसे चाबियां, रिमोट, गैस पर दूध इत्यादि रखकर भूल जाना घर का नंबर या रास्ता भूल जाना नींद न आना, भूख का ध्यान न रहना, खाना भूल जाना हर समय तनाव में रहना, कुछ न कुछ सोचते रहना, चिड़चिड़ा होना, बात-बात पर गुस्सा होना इत्यादि इसके लक्षण हैं 

बचने के उपाय 
नियमित तौर पर व्यायाम करने से याददाश्त बढ़ सकती है। यही नहीं, वे अधिक दिनों तक भूलने की बीमारी का शिकार होने से भी बच सकते हैं हल्दी के औषधीय गुणों में डिमेंशिया बीमारी से निजात दिलाने की ताकत होती है खानपान पर विशेष ध्यान दें। ग्रीन टी, मछली, टमाटर, इत्यादि को अपने खानपान में शामिल करें हरी सब्जियों और अंगूर आदि फलों को अपने आहार में प्रमुखता से शामिल करें प्रतिदिन थोड़ी मात्र में अखरोट का सेवन अवश्य करें शहद को हर रोज किसी न किसी रूप में लेने से याददाश्त अच्छी रहती है पका कद्दू हफ्ते में एक बार अवश्य खाएं, यह याददाश्त बढ़ाने का अच्छा उपाय है 

कुछ सरल उपाय 
पुरानी बात याद करने की कोशिश कीजिए हिसाब-किताब जुबानी जोड़ने-घटाने की कोशिश कीजिए 

सावधानियां 
रोगी को घर से अकेले न निकलने दें बात-बात पर रोगी से बहस न करें रोगी को अकेलापन या बीमार महसूस न होने दें रोगी को दिनभर व्यस्त रखें(अनुराधा गोयल,हिंदुस्तान,दिल्ली,3.10.11)।

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बुधवार, 2 नवंबर 2011

मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए आप कितने प्रयासरत हैं?

स्वस्थ रहने का अर्थ है- व्यक्ति शारीरिक और मानसिक दोनो रूप से स्वस्थ रहे। विश्वभर में मानसिक बीमारियों से पीड़ित लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जो कि चिंता का विषय है। ऐसे में इन समस्याओं से निपटने और बचने के तरीकों की जानकारी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।  

बढ़ रहा है मानसिक रोग 
आँकड़ों के अनुसार विश्व की १२ प्रतिशत आबादी मानसिक बीमारियों की शिकार है। दुनियाभर में हर चार में से एक व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के मानसिक रोग से प्रभावित होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वर्ष २००२ में दुनियाभर के करीब साढ़े पंद्रह करोड़ लोग अवसाद के शिकार हुए थे। अवसाद यानी व्यक्ति का गंभीर रूप से उदास हो जाना। यह एक प्रकार का मानसिक रोग है, जिससे व्यक्ति का जीवन काफी प्रभावित होता है। अवसाद, शिज़ोफ्रेनिया और बायपोलर डिऑर्डर के मामले विश्व भर में अनियंत्रित रूप से बढ़ रहे हैं। लेकिन कई लोग समाज में मज़ाक का पात्र बनने के डर से मानसिक रोग से पीड़ित होने की बात को स्वीकारना ही नहीं चाहते हैं। इसी वजह से वे मनोचिकित्सक से संपर्क करने में भी हिचकिचाते हैं और इलाज न होने के कारण रोग के शिकंजे से बाहर निकलना उनके लिए और मुश्किल हो जाता है। डॉक्टर के पास वे तब पहुँचते हैं जब मामला काफी बिगड़ चुका होता है। 

मानसिक रोगों के इलाज के लिए शुरुआत में चिकित्सक से संपर्क कर लें तो इनसे उबरना संभव है। उलझी हुई जीवनशैली अपना रहे लोग मानसिक रोगों की चपेट में आसानी से आ जाते हैं। अपने मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखना एक बहुत ही संवेदनशील विषय है, इसलिए स्थिति बिगड़ने या जीवन को खत्म करने की कगार पर पहुँचने से पहले हल निकलना बहुत ज़रूरी है। यही कारण है कि आज मानसिक रोगों से प्रभावित होने वालों की संख्या तेज़ी से बढ़ती जा रही है। विभिन्ना माध्यमों से लोगों को अपनी मानसिक तकलीफों के बारे में बेझिझक बताने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।  

शिज़ोफ्रेनिया और मिर्गी अन्य कारणों में शामिल हैं। अचानक हुई शारीरिक अक्षम्यता व अन्य बीमारियाँ भी मानसिक रोगों का कारण हो सकती हैं। अध्ययन में प्रसवोत्तर अवसाद की दर ११ प्रतिशत पाई गई,जिसके पीछे आय कम होना,लड़की का जन्म,गर्भावस्था के समय हुआ हादसा या दाम्पत्य जीवन की परेशानियां जिम्मेदार थे। ऐसे मामलों को परिवार के हर सदस्यों के प्यार,सहयोग,काउंसिलिंग और मदद के जरिए कम किया जा सकता है। इसके अलावा,कई सेलेब्रिटी भी मानसिक रूप से टूट कर अवसादग्रस्त हो जाते हैं। जाहिर है,इसके लिए उनका उथल-पुथल भरा जीवन और रोज़ का मानसिक संत्रास होता है। इससे यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि अवसाद या मानसिक रोग केवल गरीबों को या रईसों को ही प्रभावित करते हैं। यह किसी को भी जकड़ सकते हैं। इसलिए,हरेक को मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। आखिर,स्वस्थ दिमाग के बल पर ही बेहतर जीवन संभव है(डॉ. सुनील मित्तल,सेहत,नई दुनिया,अक्टूबर तृतीयांक 2011)। 
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शाम सात बजे जानिएः


बिहार में क्या है आयुर्वेद का हाल

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