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मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

विश्व स्वास्थ्य दिवस विशेषःवायरस को न करने दें इम्यून सिस्टम का लॉकडाउन


आज #World_Health_Day है और पूरी दुनिया गहरे स्वास्थ्य संकट से गुज़र रही है। 

कोरोना से फ़िलहाल मुक्ति मिल जाए, तो भी उसके लौटने की आशंका लंबे समय तक बनी रहेगी। 

वायरसजनित सभी रोग बाहर से आते हैं। बाहर से होने वाला हर संक्रमण हमारी कमज़ोर प्रतिरोधक क्षमता का परिणाम है। 

वायरस कृत्रिम हो कि प्राकृतिक, उपाय एक ही है- अपनी प्रतिरोधक क्षमता को बढाइए। प्रतिरोधक क्षमता मजबूत हो तो आप अन्य प्रकार के संक्रमण से भी मुक्त रह सकते हैं। जो संक्रमण से लड़ सकने में सक्षम है, वही स्वस्थ है। 

प्राणमुद्रा इम्यून सिस्टम को तो मज़बूत करती ही है,श्वास रोगों, तन-मन की दुर्बलता और थकान में भी लाभकारी है। 

कनिष्ठा, अनामिका और अंगूठे के शीर्ष को मिलाने और शेष दोनों उंगलियों को सीधा रखने से बनती है प्राणमुद्रा। इसका रोज़ाना 45 मिनट का अभ्यास 24 घंटे के लिए आपकी प्रतिरोधक क्षमता को बढा देता है। अधिक कर सकें तो और अच्छा। दोनों हाथों से करें। धीमी, लंबी, गहरी सांस के साथ इसके अभ्यास से लाभ जल्दी होगा। 

प्राणायाम और खासकर अनुलोम-विलोम का अभ्यास इसी मुद्रा में करना चाहिए। 

प्राण, अपान और ज्ञान मुद्राओं का प्रतिदिन उपयोग संपूर्ण स्वास्थ्यदायी है। ऊर्जावान बने रहने के इच्छुक लोग लॉकडाउन के बाद भी इन्हें जारी रख सकते हैं। 

प्रसिद्ध कैंसरविज्ञानी ओशो प्रशांत अमृत प्राणायाम का सुझाव देते हैंः 

5 मिनट या 100 बार, एक बार करें या भर दिन में।प्रेम से आराम से धीरे धीरे लंबी सांस लें जो नाभि और नाभि के नीचे हरा चक्र तक जाए।जब सांसे लें तो यह महसूस करें कि यह निकल रहा है नाभी क्षेत्र से।जब सांस छोड़ें तो महसूस करें कि सांस प्रवेश कर रहा है नाभी क्षेत्र से।यह चक्र ,वर्तुल नाभी क्षेत्र से निकलने और प्रवेश का अपने आप होता है। केवल उसे सहयोग दें,उसके प्रति अवेयर रहें। अद्भुत है यह।यह प्राणायाम वैश्विक कोरोना वायरस महामारी से बचने के लिए आवश्यक है।अभी इसका 7दिन तक आनंद लें।

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गुरुवार, 21 जून 2018

प्राणायामों के भी साइड-इफेक्ट होते हैं

योग क्या है?
विज्ञान बहिर्मुखी है, अध्यात्म अंतर्मुखी। पदार्थ को खंडित करते-करते विज्ञान
परमाणु बम तक पहुंच गया है। लेकिन अध्यात्म का ज़ोर जुड़ाव पर है। शरीर को
मन से, मन को हृदय से, हृदय को आत्मा से और आत्मा को अस्तित्व से जोड़ते-
जोड़ते वह पूरी सृष्टि को ही एक इकाई मानने पर ज़ोर देता है- वसुधैव कुटुंबकम!
मनुष्य भी कोई स्वतंत्र इकाई नहीं है,बल्कि परस्पर-निर्भर है। सभी प्राणियों की
परस्पर निर्भरता के बावजूद मनुष्य की श्रेष्ठता इसलिए है कि उसने अपना जीवन
श्रेष्ठ कर्मों को समर्पित किया है।

कर्म का आधार है- शरीर। योग के उच्चतर अनुभव भी उन्हीं को हो पाते हैं,
जिनका शरीर स्वस्थ है। इसलिए, पतंजलि के अष्टांगयोग की शुरुआत भी शरीर को
दुरुस्त रखने से ही होती है। आसन-व्यायाम, प्राणायाम, ध्यान और समाधि ऐसी
विधियां हैं जिन्हें आज़माकर आप भी अपने जीवन को भरपूर जी सकते हैं। लेकिन
यह भी ध्यान रहे कि इनमें से कोई भी रास्ता किसी अन्य यौगिक उपाय का
विकल्प नहीं है। हर विधि की अपनी विशेषता है और उसके मूल लाभ उसी के
अभ्यास से मिलते हैं। एक नज़र, अष्टांगयोग की मुख्य विशेषताओं परः

आसन-व्यायाम
अमूमन, लोग तमाम फायदे जानने के बावजूद, इनके अभ्यास से कतराते हैं।
इसकी मूल वज़ह है-शरीर का लचीला न रह जाना। जिन्होंने बचपन में कोई
योगाभ्यास नहीं किया है,वे सूक्ष्म यौगिक क्रियाओं तक ही सीमित रह जाते हैं।
इसलिए, बेहतर है कि हम अपने बच्चों में योग की आदत डालें। सर्वांगपुष्टि आसन
और पवनमुक्तासन समूह की क्रियाओं (पादांगुली, पादतल, पादपृष्ठ और गुल्फ
शक्तिवर्धक क्रिया से बच्चों के शरीर में नई ताज़गी आती है, आत्मविश्वास बढ़ता
है और उनकी मांसपेशियां मज़बूत होती हैं। युवा अगर रोज़ाना पांच राउंड सूर्य
नमस्कार कर सकें, तो इतना ही बहुत होगा उनके संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए।

महिलाओं के लिए पद्मासन, भुजंगासन, शशांकासन, चक्रासन,
शलभासन,विपरीतकरणी, उष्ट्रासन, मकरासन, पश्चिमोत्तानासन, गोमुखासन,
ताड़ासन, पादहस्तासन, त्रिकोणासन, मार्जरी आसन, सर्वांगासन और हस्तोत्तानासन
विशेष लाभकारी आसन हैं। इनसे वे मोटापा, कमरदर्द, कब्ज, गठिया, प्रदर,
हिस्टीरिया, अनिद्रा, निस्संतानता, वायुदोष, ल्यूकोरिया, सिरदर्द, गठिया और मधुमेह
तक से बच सकती हैं। निस्संतानता की स्थिति में वज्रासन, प्रजनन अँगों तथा
मासिक धर्म से जुड़े रोगों में चक्रासन, भुजंगासन, उष्ट्रासन और मार्जरी आसन,
और मंडूकासन तथा गर्भावस्था के शुरुआती दिनों में ताड़ासन अत्यन्त उपयोगी हैं।
पादहस्तासन और पद्मासन से महिलाओं के मुखमंडल की आभा बढ़ती है।
गोमुखासन और विपरीतकरणी से उऩके वक्षस्थल सुडौल होते हैं, त्रिकोणासन से
पेट के निचले हिस्से में जमा चर्बी कम होती है और कटिप्रदेश की सुंदरता बढ़ती है
तथा हस्तपादासन से बालों का झड़ना रुक जाता है। लम्बाई बढ़ाने में
पश्चिमोत्तानासन लाभकारी है।

ऐसे ही, बुजुर्गों के लिए हाई बीपी में सिद्धासन, पद्मासन, पवनमुक्तासन और
पश्चिमोत्तानासन बेहद फायदेमंद हैं। गठिया और वातरोग या जोड़ों के दर्द, कब्ज,
भूख न लगने में पवनमुक्तासन, पश्चिमोत्तानासन, शीर्षासन, गोमुखासन,
सर्वांगासन, पर्यंकासन, पद्मासन और वीरासन उपयोगी हैं। शवासन, उत्तानासन,
भस्त्रिका, योगनिद्रा, त्राटक आदि से कमज़ोर याद्दाश्त की समस्या दूर होगी। यदि
वे सूर्य नमस्कार, कूर्मासन और शशांकासन करें तो उन्हें अनिद्रा, निराशा, चिंता
और अटपटे विचारों से मुक्ति में मदद मिलेगी।

मुद्रा और बंध
मुद्राएं दोनों हाथों की उँगलियों को एक विशेष प्रकार से मोड़कर बनाई जाती हैं।
रोज़ाना केवल 45 मिनट अभ्यास से ये अविश्वसनीय परिणाम देती हैं। अधिक
उपयोगी मुद्राओं की संख्या 80 है किंतु उनमें भी 8 मुद्राएं प्रमुख हैं। ज्ञान मुद्रा
प्रायः सभी रोगों में लाभदायी है। प्राण मुद्रा से रक्त संचार ठीक रहता है और
कोमा तक से रोगी को बाहर निकालने का दावा किया जाता है। अपान मुद्रा कब्ज
दूर करती है और पाचन-शक्ति बढ़ाती है। वायु मुद्रा से जोड़ों के दर्द, गैस आदि की
समस्या से निज़ात मिलती है। सूर्य मुद्रा से मोटापा कम होता है और मधुमेह
नियंत्रित रहता है। आकाश मुद्रा से कान की समस्या और शून्य मुद्रा से चंचलता
दूर होती है। व्यान मुद्रा से उच्चरक्तचाप कुछ ही मिनटों में समाप्त हो जाता है।
इन्द्र मुद्रा (अंगूठे और कनिष्ठा के ऊपरी हिस्से मिले हुए, बाक़ी उंगलियां सीधी) से
त्वचा का रुखापन समाप्त हो जाता है और चेहरे की कांति बढ़ती है। सिरदर्द में
महाशीर्ष और माइग्रेन में पानमुद्रा बहुत कारगर है। खेचरी मुद्रा (जीभ को तालु से
लगाना) साधना की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है।
बंध में शरीर के आंतरिक अंगों को सांसों से बांधा जाता है। इऩसे हमारी ऊर्जा
ऊपर की ओर प्रवाहित होने लगती है और कुंडली जागरण संभव होता है। बंध
लगाने की क्षमता जितनी मजबूत होगी, प्राणायाम के लाभ उतने अधिक होंगे। बंध
मुख्य रूप से पांच प्रकार के हैं-मूलबंध, उड्डियान बंध, जालंधर बंध, महाबंध और
जिह्वा बंध। ये सब इन्द्रियों पर विजय पाने और ऊर्जा के उच्चतर अनुभव में
सहायक हैं।

प्राणायाम
प्राणायाम का अर्थ है-सांसों के नियंत्रण से स्वस्थ होने की कला। व्यायाम करने
वाले अगर प्राणायाम भी करें तो उनका लाभ कई गुना बढ़ जाता है। जिनके शरीर
लचीले नहीं रह गए हैं, वे भी व्यायाम के कई लाभ प्राणायाम से हासिल कर सकते
हैं। कुल चौरासी प्राणायाम हैं किंतु उनमें से 8 मुख्य हैं। कपालभाति और अनुलोम-
विलोम प्राणायाम अध्ययनरत और प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लोगों
के लिए उपयोगी हैं क्योंकि इनसे स्मरण-शक्ति बढ़ती है। भस्त्रिका से भी स्मृति
तेज़ होती है। अनुलोम-विलोम करने से, देर तक कम्प्यूटर पर काम करने के
नुकसान नहीं होते। बाह्य प्राणायाम से तनाव दूर होता है। योगनिद्रा और
नाड़ीशोधन प्राणायाम से मन शांत और प्रसन्नचित्त रहता है। भ्रामरी से मंचों पर
प्रदर्शन आसान हो जाता है। उद्गीत प्राणायाम से मन तनावमुक्त रहता है। प्रणव
प्राणायाम से एकाग्रता बढ़ती है। उच्च रक्तचाप में योगनिद्रा, चन्द्रभेदी, सीतली,
शीत्कारी, उज्जायी प्राणायाम और योगनिद्रा की बड़ी उपयोगिता है। अनुलोम-
विलोम, भस्त्रिका, नाड़ीशोधन, योगनिद्रा और सूर्यभेदी प्राणायाम से स्मृति-लोप की
समस्या दूर होती है। नाड़ीशोधन से श्वसन-तंत्र मज़बूत रहता है, फेफड़ों को पर्याप्त
ऑक्सीजन मिलता रहता है और सिरदर्द दूर होता है। गर्भाशय/डिम्ब ग्रंथियों को
स्वस्थ रखने और अवसाद दूर करने में उड्डियान बंध बड़ा प्रभावकारी है।

प्राणायाम के लिए शरीर का स्थिर होना एकमात्र शर्त है। कोई भी प्राणायाम आंखें
बंद रखकर ही करें। प्राणायाम किसी भी समय किए जा सकते हैं किंतु सभी
प्राणायाम सबके लिए नहीं हैं। प्राणायाम अत्यन्त धीमी गति से किया जाना चाहिए
और इन्हें करते समय सांसों की आवाज़ बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। प्राणायामों के
भी साइड इफेक्ट्स हैं। हाई बीपी और दिमागी परेशानी वाले ऐसा कोई प्राणायाम
न करें जिनमें कुंभक लगाना पड़ता हो। सभी प्राणायाम सालोभर किए जाने योग्य
भी नहीं होते। कुछ प्राणायाम केवल ग्रीष्म ऋतु में करने चाहिए,जैसे-चन्द्रभेदी,
शीतली और शीतकारी प्राणायाम। ऐसे ही, भस्त्रिका और सूर्यभेदी प्राणायाम केवल
शीतकाल में किए जाने चाहिए।

ध्यान और समाधि
भूख, मैथुन और नींद की प्रवृत्ति तो पशुओं में भी होती है। मानव जीवन इतने से
संतुष्ट होने के लिए नहीं है। योग पाशविक वृत्तियों से ऊपर ले जाने की विधा है।
योग का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति को रोगमुक्त करना नहीं,बल्कि रोगमुक्त होने
से रोकना और शरीर से इतर, आत्मस्थ करना है। वही असली स्वास्थ्य है।

स्वास्थ्य शब्द स्वस्थ शब्द से बना है। स्वस्थ यानी जो अपने में स्थित हो गया।
इसका एक ही उपाय है- ध्यान। यह आपके मन को विचारों की भीड़ से निकालकर
निर्विचार अवस्था में ले आता है। इसका नियमित अभ्यास आपको जागरुकता से
भर देगा। इसी जागरुकता की अगली छलांग है-समाधि। ध्यान में तो आपको अपने
होने का एहसास बना रहेगा लेकिन समाधि में वह एहसास भी खो जाएगा और
आप बोधमात्र रह जाएंगे। इसी बोध से भीतर का मैं-पन यानी अहंकार धीरे-धीरे
विदा हो जाता है और अहंकार विदा होते ही,आपका अंतस प्रेम से भर जाएगा।
अहंकार का विसर्जन और प्रेम का अभ्युदय ही योग का चरम है। फिर यम,नियम,
ईश्वर प्रणिधान, प्रत्याहार, धारणा आदि स्वतः पीछे छूट जाते हैं।

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बुधवार, 3 जुलाई 2013

पसीना बहाना भी एक हुनर है

अपने शरीर को वांछित आकार देने की ख्वाहिश में लोग तमाम जतन कर रहे हैं। जिमनेजियम का चलन भी हाल के सालों में काफी बढ़ा है। हालांकि नियमित व्यायाम के बाद भी अपेक्षित परिमाण न मिलने की शिकायत आम है। कई बार कुछ परेशानियां भी हो जाती हैं इसलिए व्यायाम करते हुए कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है। 

सावधानी से बहाएं पसीना 
हाल में एक युवा अभिनेता अबीर गोस्वामी, जो प्यार का दर्द एवं क्राइम पैट्रोल जैसे लोकप्रिय सीरियल्स में काम करते थे, की व्यायाम करते हुए मौत हो गई। २०१२ में किसी स्वास्थ्यगत समस्या के कारण वे सर्जरी से भी गुजरे थे। चिकित्सकीय परामर्श के बिना कठोर शारीरिक श्रम उनकी मृत्यु का कारण बना। इस तरह के कई मामले हैं, जहां व्यायाम के दौरान निर्देशों का पालन न करना भारी पड़ा है। जिम में कसरत करते हुए चुनिंदा बातों पर अमल जरूरी है, साथ ही अगर आपको कोई स्वास्थ्यगत समस्या है तो चिकित्सक का परामर्श लेने के बाद ही व्यायाम करें। हेल्थ और न्यूट्रिशन के जानकार और लेखक जेम्स ए. पीटरसन का कहना है कि लोग हेल्दी बॉडी वेट मेंटेन करने के लिए जिम जाते हैं और समझते हैं कि मशीन के सामने खड़े होते ही वे सब कुछ हासिल कर लेंगे। 

पसीना बहाने से ही वजन कम नहीं होता। पसीना बहाने का मतलब है कि आपने पानी के वजन को कम किया है, यानी कोई लिक्विड लेने के साथ ही आप उतना ही वजन दोबारा हासिल कर लेते हैं। प्रायः लोगों को, जो लोग वजन घटाना चाहते हैं, पता ही नहीं होता कि व्यायाम की सही प्रणाली क्या है या मशीन का सही इस्तेमाल कैसे हो। हरेक की जरूरत के अनुसार एक अलग एक्सरसाइज प्लान भी होता है, जिसकी जानकारी जरूरी है। 

भेंट-मुलाकात नहीं, करें व्यायाम 
कई बार लोग जिम को मिलने-जुलने का अड्डा बना लेते हैं। ऐसा भी होता है कि दो मित्र एक ही वक्त पर जिम जाते हैं और बातें करते हुए वक्त बर्बाद करते हैं जो वस्तुतः व्यायाम के लिए तय था। बातों के दौरान वे कम एक्सरसाइज कर पाते हैं। वजन को लेकर गंभीर हों तो वर्क आउट पर फोकस करना जरूरी है। 

प्रोग्राम बदलें 
जिम में लगातार एक ही तरह की एक्सरसाइज से अपेक्षित परिणाम नहीं मिल, सकते। हो सकता है कि इससे शुरूआत में वज़न कम हो लेकिन अंततः बॉडी शेप में नहीं आएगी। उदाहरण के लिए,यदि आप एरोबिक एक्सरसाइज कर रहे हैं तो यह आपके मसल मास को मेंटेन करेगी और कैलोरी जलेगी। यदिआप स्ट्रेंथ ट्रेनिंग कर रहे हैं तो यह भी आपके मसल मास को तो मेंटेन करेगी लेकिन वेट कम नहीं होगा। इसलिए,यह ज़रूरी है कि आप मिक्स एक्सरसाइज प्रोग्राम का अनुसरण करें। 

स्पॉट रिडक्शन ट्रेनिंग गलत 
विशेषज्ञ कहते हैं कि खास स्पॉट जैसे पेट या भुजाएं बनाने की ही एक्सरसाइज से ओवरऑल रिजल्ट नहीं पाए जा सकते। यह बात ध्यान रखी जानी चाहिए कि शरीर जहां से वहां से,किसी भी हिस्से से फैट प्राप्त करता है,इसलिए आप कैलोरी के बहुत ही संतुलित ट्रेनिंग प्रोग्राम से जलाए जाने पर फोकस करें।

व्यायाम का सही तरीक़ा 
जिम में व्यायाम करते हुए इस बात का ख्याल रखा जाना चाहिए कि आप किसी मशीन का कैसा इस्तेमाल कर रहे हैं या किसी एक्सरसाइज को कितने सही ढंग से कर रहे हैं। ग़लत तकनीक से एक्सरसाइज करने के कारण चोट,मोट और अन्य तक़लीफें हो सकती हैं। बेहतर होगा कि किसी प्रोफेशनल ट्रेनर के साथ व्यायाम की शुरूआत करें। किसी एक्सरसाइज प्रोग्राम का अनुसरण करने की जल्दबाज़ी न करें,अन्यथा थकान हो सकती है। 

विशेषज्ञ की राय 
जिम शुरू करने से पहले विशेषज्ञ से कंसल्ट करना जरूरी है ताकि मसल कंडीशन के अनुसार व्यायाम किया जा सके। खासकर ३५ पार कार्डियक कंडीशन की जांच जरूरी है ताकि शारीरिक मेहनत उसी के ध्यान में रखते हुए किया जा सके। व्यायाम के मकसद के अनुसार भी एक्सपर्ट तय करते हैं कि किस तरह के व्यायाम किए जाने चाहिए ताकि अधिकतम लाभ हो, जैसे वजन बढ़ाना, वजन कम करना या टोन करने के लिए। -डॉ वरुण व्यास, वरिष्ठ फिजियोथैरेपिस्ट, इंदौरसेहत में प्रकाशित समस्त आलेख उच्च शिक्षित, योग्य एवं अनुभवी चिकित्सकों द्वारा लिखे जाते हैं, परंतु पाठक इनके आधार पर स्वयं अपनी चिकित्सा प्रारंभ न करें। इस संबंध में पत्रिका स्वयं को सारे विधिक दायित्वों से मुक्त करती है(इंदौर के डॉ. वरूण व्यास का यह आलेख नई दुनिया के सेहत परिशिष्ट,जून द्वितीयांक में प्रकाशित है)।

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बुधवार, 5 जून 2013

दौड़ें,कि चलें?

व्यायाम की दुनिया में आजकल दौड़ना लोकप्रिय है। बाकी दुनिया की ही तरह भारत में भी लंबी दौड़ लगाने वालों के संगठन बन गए हैं, जो हाफ मैराथन, मैराथन, सुपर मैराथन वगैरह आयोजित करते रहते हैं। दौड़ाकों को जरूरी मशविरा और सहायता देने वाले लोग भी काफी हैं। शायद आज की आधुनिक सुविधाओं व उपकरणों से भरी दुनिया में दौड़ना आदिम खुशी का प्रतीक बन गया है। इसके बरक्स पैदल चलना या टहलना हमेशा से सबसे ज्यादा लोकप्रिय व्यायाम रहा है। कुछ लोग रोज टहलते हैं, कुछ को बीच-बीच में खयाल आता है कि वजन बढ़ रहा है, तो वे कुछ दिन टहलते हैं और फिर छोड़ देते हैं। महात्मा गांधी रोज दस मील टहलते थे। सरदार पटेल के बारे में कहा जाता है कि वह राजा-नवाबों को सुबह की सैर पर ले जाते थे और आराम के आदी राजा-नवाब सैर खत्म होने से पहले ही सरदार पटेल की शर्तो पर भारत में विलय के लिए मान जाते थे। लेकिन सवाल यह है कि सेहत के लिहाज से क्या बेहतर है, दौड़ना या चलना? अगर दौड़कर या चलकर समान कैलोरी खर्च की जाए, तो किससे ज्यादा फायदा होगा? 

पिछले दिनों इस विषय पर कुछ अध्ययन हुए हैं। इन अध्ययनों से पता चलता है कि सेहत के लिहाज से दोनों ही बेहतरीन व्यायाम हैं, लेकिन दोनों के फायदे कुछ अलग-अलग हैं। दौड़कर या चलकर लगभग समान कैलोरी खर्च करने वाले दो समूहों की तुलनात्मक जांच से यह मालूम हुआ कि वजन घटाने और कम वजन बनाए रखने के लिहाज से दौड़ना ज्यादा अच्छा व्यायाम है। दौड़ने वालों की कमर की नाप और बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) चलने वालों से कहीं बेहतर साबित हुए। बाकी कई फायदे दोनों ही समूहों के लिए एक जैसे थे, लेकिन यह पाया गया कि दिल की सेहत के लिए चलने से ज्यादा फायदा होता है। यानी अगर आपका मुख्य जोर वजन घटाने पर है, तो दौड़िए और अगर दिल का मामला है, तो तेज चलना अच्छा है। दौड़ने से वजन ज्यादा घटने की कई वजहें हैं। एक महत्वपूर्ण वजह तो यह है कि दौड़ने से मेटाबॉलिज्म ज्यादा तेज होता है, इसलिए ऊर्जा ज्यादा खर्च होती है। एक सुझाव यह भी है कि चलने या दौड़ने से पहले कुछ दूसरे व्यायाम करने, मसलन भार उठाने से वजन ज्यादा घटता है, क्योंकि इससे मेटाबॉलिज्म और भी ज्यादा तेज हो जाता है। अध्ययन में एक चीज यह सामने आई, दौड़ने से पेट में एक एंजाइम पेप्टाइड वाई वाई ज्यादा बनता है। यह एंजाइम भूख पर नियंत्रण रखता है, इसलिए दौड़ने वालों की खुराक चलने वालों से कम होती है। यह देखा गया कि नियमित चलने वालों से अनियमित दौड़ने वालों का भी वजन कम रहा।

जहां तक दिल का मामला है, इसमें दौड़ने की अपेक्षा चलना इसलिए अधिक फायदेमंद होगा, क्योंकि दौड़ना ज्यादा कठिन व श्रमसाध्य व्यायाम है। जैसा कि पेशेवर खिलाड़ियों के साथ होता है कि शरीर पर बहुत ज्यादा जोर पड़ने की वजह से उन्हें कुछ नुकसान भी उठाने पड़ते हैं। सेहत के लिहाज से फायदेमंद व्यायाम वही होता है, जो न बहुत ज्यादा हो और न बहुत कम। यह भी देखने में आया है कि जो पेशेवर लंबी दूरी के धावक होते हैं, उनके दिल पर बुरा असर पड़ता है। इसका मतलब है कि दौड़ने से जो भी फायदा होता है, उसका कुछ अंश दिल पर पड़ने वाले जोर की वजह से कम हो जाता है। इसका मतलब यह कतई नहीं कि दौड़ना सेहत के लिए बुरा है, बस उतना फायदेमंद नहीं है, जितना चलना है। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि आपको मजा किसमें आता है। जिसमें भी मजा आता हो, वही कीजिए, जरूरी यह है कि व्यायाम कीजिए, थोड़ा-बहुत नफा-नुकसान तो चलता रहता है(संपादकीय,हिंदुस्तान,दिल्ली,02 जून,2013)।

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गुरुवार, 16 अगस्त 2012

हाइपर-एसिडिटी में उपयोगी है धनुरासन

आजकल एसिडिटी की शिकायत करने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। खाने-पीने का सही समय न होना और कई ऐसे कारण हैं जो आपको इस समस्या की ओर ले जाते हैं। कुछ उपाय करके आप इससे बचे रह सकते हैं। यह एक ऐसा उदर रोग है, जो आमाशय में अम्ल की मात्रा बढ़ जाने से उत्पन्न होता है। इस रोग में पाचक रस अनियंत्रित ढंग से बढ़ जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को अनेक परेशानियों से दो-चार होना पड़ता है। गलत जीवनशैली और फास्ट तथा जंक फूड के इस जमाने में लगभग हर व्यक्ति इस समस्या से पीड़ित नजर आता है। 

रोग के लक्षण 
पेट व छाती में जलन, खट्टी डकारें आना, पेट में दर्द, भारीपन, गैस की शिकायत, गले में जलन, कब्ज, अपच आदि। इस रोग का प्रमुख कारण हमारी गलत आदतें तथा मानसिक तनाव है। योग के नियमित अभ्यास से हम इस रोग के सभी प्रमुख कारण-आरामतलबी, व्यायाम की कमी, मानसिक तनाव तथा भोजन के असंतुलन पर नियंत्रण कर लेते हैं। हाइपर एसिडिटी को दूर करने में यौगिक क्रियाएं काफी फायदेमंद साबित होती हैं। 

आसन 
इसके समाधान हेतु धनुरासन, पवनमुक्तासन, वज्रासन, शशांकासन, मण्डूकासन, योगमुद्रा, भुजंगासन आदि बेहद कारगर हैं। पवनमुक्तासन के 10-12 चक्रों का प्रतिदिन अभ्यास करने मात्र से यह समस्या काफी हद तक दूर हो जाती है। 

धनुरासन की अभ्यास विधि 
पेट के बल जमीन पर लेट जाएं। दोनों पैरों को घुटने से मोड़ लें। घुटनों तथा पंजों के बीच में एक फुट की दूरी बनाएं। इसके बाद पैर के पंजे या अंगूठे को पकड़कर (हाथों से) सिर-धड़, जांघें तथा घुटनों को जमीन से यथासंभव ऊपर उठाएं। इसके पश्चात थोड़ी देर (आरामदायक समय तक) इस स्थिति में रुकें। फिर वापस पूर्व स्थिति में आएं। इसकी तीन-चार आवृत्तियों का अभ्यास करें।

सावधानियां 
हार्निया तथा अल्सर से पीड़ित लोग इसका अभ्यास न कर पवनमुक्तासन का अभ्यास करें। 

ध्यान की अभ्यास विधि 
पद्मासन, सिद्धासन, सुखासन या कुर्सी पर बैठकर रीढ़, गला व सिर को सीधा कर लें। आंखों को ढीली बन्द कर चेहरे को शिथिल कर लें। अब मन में उठने वाले विचारों का द्रष्टा बनने का प्रयास करें। धैर्यपूर्वक मन के विचारों पर ध्यान बनाए रखें। इस विधि का कुछ महीनों तक नियमित अभ्यास करने पर मन शान्त, निर्विचार हो जाता है। प्रतिदिन दस से पन्द्रह मिनट तक इसका अभ्यास करना चाहिए। इससे मन निद्र्वन्द्व तथा चिन्तारहित हो जाता है। 

आहार 
हल्का आहार लें। इसमें दलिया, चावल, जौ का सत्तू, उबली सब्जियां एवं मौसमी फल पर्याप्त मात्र में शामिल करें। तीखा, मसालेदार खाना, मिठाई, केक, मैदा, शराब, धूम्रपान, कॉफी तथा चाय से सख्त परहेज करें।

इन बातों का भी रखें ध्यान 
- भोजन खूब चबा-चबाकर खाएं। 
- अधिक समय तक खाली पेट न रहें। 
- नियमित रूप से समय पर खाएं। 
- सूर्योदय के पहले बिस्तर छोड़ दें तथा एक-दो गिलास पानी घूंट-घूंट कर पीकर शौच जाने की आदत डालें(कौशल कुमार,हिंदुस्तान,दिल्ली,16.8.12)।

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शुक्रवार, 22 जून 2012

योग से कीजिए स्वानुभूति

योग से व्यक्ति अपनी अंतर्निहित शक्तियों को संतुलित रूप से विकसित कर सकता है. साथ ही योग पूर्ण स्वानुभूति कराने के साधन भी प्रदान करता है. 

आज योग मात्र आश्रमों, साधु-संतों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पिछले कुछ दशकों में इसने हमारे दैनिक जीवन में अपना स्थान बना लिया है और दुनियाभर में इसके प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ी है तथा इसे स्वीकार भी किया है. 

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान सहित औषधि विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के विशेषज्ञों ने रोग निवारण, रोगों को कम करने और स्वास्थ्य के प्रति लोगों को प्रोत्साहित करने में इन विधियों की भूमिका की सराहना की है.

तनाव से मुक्ति 
-दरअसल, योग का अभ्यास मानसिक और शारीरिक विकारों अथवा रोगों से बचने और व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार लाने और तनावपूर्ण स्थितियों को सहने के लिए किया जाता है. 

-सबसे पहले ज़रूरी है कि हम अपनी श्वास के प्रति सजग हो जाएं. श्वास-प्रश्वास ऐसी प्रक्रिया है जो जन्म से लेकर मृत्यु तक इस शरीर से जुड़ी है. 

-मुख्यत: हमें श्वास-प्रश्वास की प्रक्रिया में सुधार लाना है. इसे हम दो भागों में बाँट सकते हैं. 

-पहला पूरक अर्थात श्वास लेना और दूसरा रेचक यानी श्वास छोड़ना. 

-योगाभ्यास करने से पहले मुख्य तौर पर सुनिश्चित कर लें कि आपका पेट खाली हो. भोजन करने के तीन घंटे बाद योगाभ्यास करना चाहिए. 

-अगर आपने नाश्ता या हल्का-फुल्का कुछ खाया है तो भी दो घंटे का अंतर ज़रूरी है. चाय आदि के आधे घंटे के बाद ज़रूर कुछ हल्का अभ्यास किया जा सकता है. 

-समय सुबह का हो तो बहुत बढिया, क्योंकि शौचादि से निवृत होने के बाद पेट खाली होता है तथा मन मस्तिष्क पूरी तरह शांत होते हैं. जो भी अभ्यास आप करेंगे, वे आपको शत-प्रतिशत लाभ देंगे. 

-कपड़े आपके ढीले-ढाले हों, मौसम के अनुकूल हों ताकि आप तनावमुक्त होकर योग का अभ्यास कर सकें. 

-साथ ही यह भी ख़्याल रखें कि वातावरण शांत हो, साफ-सुथरा हो, हवा शुद्ध और पर्याप्त हो. योगाभ्यास करने से पहले एक कंबल दोहरा कर बिछाएँ ताकि अभ्यास करने में असुविधा न हो. 

श्वास की सही विधि 
-ऐसा देखा गया है कि अधिकतर व्यक्ति जब सांस लेते हैं तो उनका पेट अंदर की ओर जाता है, लेकिन यह योग की दृष्टि से अलग है. 

-तो फिर सांस लेने की सही विधि क्या है:सबसे पहले किसी भी ध्यानात्मक स्थिति में अथवा पालथी लगाकर बैठें और दोनो हथेलियों को अपने घुटनों पर रखें. 

-ध्यान रहे, रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें. कमर, गर्दन सीधी रखें और धीरे से अपनी आंखें बंद कर लें. अपना पूरा ध्यान श्वास की गति की ओर लगाए रखें. धीरे-धीरे आपका मन पूरी तरह शांत हो जाएगा. 

-इसके बाद अपनी दाहिनी हथेली को नाभि पर रखें. धीरे-धीरे सांस भरें, पेट को बाहर की ओर लाएँ. हथेली के सहारे महसूस करें कि श्वास भरते हुए हथेली बाहर की ओर आ रही है. 

-इसी प्रकार श्वास छोड़ते हुए पेट को हथेली के सहारे अंदर की ओर ले जाएं. इस तरह आप श्वास की गति को महसूस कर पाएंगे. 

-अगर श्वास भरते हुए पेट अंदर की ओर जाए तो इस विधि से श्वास-प्रश्वास को ठीक कर सकते हैं. यानी हथेली के सहारे हम इसका अभ्यास कर सकते हैं. 

सुखासन 
-ध्यान रखें कि श्वास-प्रश्वास हमेशा नाक से ही करना चाहिए, न कि मुँह से और श्वास भरते हुए सिर्फ़ पेट फूले, ख़्याल रखें कि छाती न फूले. 

-शुरू में इसका अभ्यास 10-12 बार करें. यथाशक्ति के अनुसार अभ्यास को कम-ज़्यादा कर सकते हैं. 

-इसका अभ्यास कुर्सी आदि पर बैठकर भी किया जा सकता है बशर्ते रीढ़ की हड्डी सीधी हो. 

-कुछ दिन तक श्वास की इस सामान्य विधि को सीख लेने के बाद ही आप अगला अभ्यास सीखें. -आगे के अभ्यास में हम श्वास की पूरी प्रक्रिया सीखेंगे. 

-सामान्य अवस्था में पालथी लगाकर बैठने को सुखासन भी कहते हैं. रीढ़ की हड्डी, कमर तथा गर्दन को सीधा कर लें. 

-पूर्ण श्वास की विधि को हम यौगिक दृष्टिकोण से तीन भागों में बाँट सकते हैं. 

-सबसे पहले श्वास भरते हुए पेट फुलाएँ. इसके बाद छाती को भी फुलाएँ. अंत में कंधे तक श्वास भरें. इस अवस्था में कंधे भी सीधे हो जाएँगे. 

-ख़्याल रहे कि श्वास छोड़ते वक़्त सबसे पहले आपके कंधे ढीले होंगे. इसके बाद फेफड़ों से श्वास बाहर आएगी. अंत में श्वास छोड़ते हुए नाभि को अंदर की ओर ले जाएँ. 

-इस तरह यौगिक श्वास की प्रक्रिया पूरी होती है. यथाशक्ति अनुसार आप इसका अभ्यास पाँच से 10 मिनट तक कर सकते हैं(सिद्धार्थ प्रसाद,बीबीसी,1.3.2008. योग प्रशिक्षक श्री प्रसाद का विशेष कार्यक्रम आप हर शनिवार और रविवार सुन सकते हैं सुबह साढ़े छह बजे बीबीसी हिंदी सेवा के 'आज के दिन' कार्यक्रम में).

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गुरुवार, 21 जून 2012

झिझक मिटाएँ सिंहगर्जन आसन से

-व्यावहारिक रूप से आदमी में दो तरह की प्रवृत्ति होती हैं- अंतर्मुखी और बहिर्मुखी

-सिंहगर्जन आसन का नियमित अभ्यास अंतर्मुखी प्रतिभा वाले बच्चों के लिए विशेष रूप से लाभकारी हैं क्योंकि यह उनकी छुपी हुई प्रतिभाओं को सामने लाने में मददगार है. 

-आदमी का लिंग या उम्र सिंहगर्जन आसन से होने वाले फ़ायदों में दीवार नहीं बनती. 

-इस आसन में चुप नहीं रहते बल्कि आसन करते हुए शेर की तरह दहाड़ते हैं और इसका मनोवैज्ञानिक असर यह होता है कि हम मानसिक तौर पर मज़बूत होते जाते हैं. 

-चुनौतियों को स्वीकार करने के साथ ही फ़ैसले लेने में अपने विवेक के प्रयोग तक पर इसका असर होता है. 

-सिंहगर्जन आसन शारीरिक रोगों को दूर तो भगाता ही है, आपकी मानसिक क्षमता को भी संतुलित एवं संयमित करता है. 

आसन की विधि 
-सिंहगर्जन आसन करने के लिए पहले वज्रासन में बैठिए, उसी तरह जैसे नमाज़ पढ़ने के लिए घुटनों को मोड़कर बैठते हैं. 

-दोनों घुटनों के बीच डेढ़ फुट का अंतर रखिए. 

-दोनों हथेलियों को घुटनों के बीच ज़मीन पर इस प्रकार रखें कि अंगुलियों का रुख़ पीछे की ओर रहे. 

-सिर को पीछे की ओर झुकाएँ, आँखें खोलकर रखें. पूरे शरीर को ढीला और शिथिल करें. 
-मुँह बंद रखिए, नाक से गहरी लंबी साँस लें. तत्पश्चात मुँह खोलिए, पूरी जीभ बाहर निकालिए. 

-अब धीरे-धीरे साँस बाहर निकालते हुए शेर की तरह 'दहाड़ें'...हा..अअ..हा..आआ. इस तरह. 

-आवाज़ बिल्कुल साफ़ और स्पष्ट होनी चाहिए. 

-ऐसा करने के अंत में मुँह बंद कर लें और नाक से साँस लें. 

-इस प्रकार एक क्रम पूरा हुआ. रोज 5 बार इस क्रिया को दोहराना चाहिए. 

सिंहगर्जन के फ़ायदे 
-यह आसन मानसिक क्षमता को भी संतुलित एवं संयमित करता है 

-सिंहगर्जन आसन के अभ्यास से आपकी आवाज़ स्पष्ट और दमदार होगी. 

-हकलाने और नर्वस रहने वाले लोगों के साथ ही शर्मीले और अंतर्मुखी प्रतिभा वाले अगर सिंहगर्जन का नियमित अभ्यास करें तो वे बहिर्मुखी प्रतिभा वाले बन जाएँगे. 

-वे रोज़मर्रा के तनाव और चुनौतियों का सहजता से मुक़ाबला कर सकेंगे क्योंकि चुनौतियों पर विजय पाने वाला ही असल में 'जंगल का राजा' होता है. 

-इस आसन को करने से गले के रोग नहीं होंगे क्योंकि यह गले की थॉयराइड ग्रंथि से निकलने वाले स्राव को भी संयमित और नियमित करता है. 

-इसलिए जीवन को तनावरहित बनाने के लिए सिंहगर्जन आसान का अभ्यास बच्चे, बड़े, बुजुर्ग सभी करें. 

इसका ध्यान रखें... 
नाक से साँस लेना है और मुँह खोलकर दहाड़ते हुए साँस छोड़ना चाहिए ताकि गले में भी इसका कंपन महसूस हो. शेर की तरह दहाड़ते हुए अर्थात हा...आआ... की आवाज़ निकालते हुए अपना पूरा ध्यान गले पर तथा आवाज़ से उत्पन्न कंपन की ओर लगाकर रखना चाहिए. 

-शरीर को थोड़ा आगे की ओर झुकाएँ ताकि उसका भार पूरी बाजू पर आए((सिद्धार्थ प्रसाद,बीबीसी डॉट कॉम,17.6.12. योग प्रशिक्षक सिद्धार्थ जी का कार्यक्रम आप हर शनिवार और रविवार सुन सकते हैं सुबह साढ़े छह बजे बीबीसी हिंदी सेवा के 'आज के दिन' कार्यक्रम में.).

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बुधवार, 13 जून 2012

दो दिन काफी है बाक़ी पाँच के लिए

कई बार योग और ध्यान के लिए समय निकालना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में यदि सप्ताह के अंतिम दो दिन भी आप एक-एक घंटे यौगिक क्रियाओं तथा यौगिक दिनचर्या का अभ्यास करें तो चमत्कारिक लाभ पा सकते हैं। 

कामकाजी पुरुष अपने ऑफिस या व्यावसायिक एवं पारिवारिक उत्तरदायित्वों में इस तरह उलझे होते हैं कि स्वयं अपने शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए समय ही नहीं निकाल पाते हैं। भौतिक सुख-सुविधाओं के प्रति अधिक आकर्षण, महात्वाकांक्षाएं, एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ की जीवनशैली ने आज लोगों को और अधिक व्यस्त, स्वार्थी तथा एकांगी बना दिया है। इस जीवन शैली ने मानसिक तनाव, कुंठा, निराशा, अवसाद, असंतुष्टि तथा निराशा के साथ-साथ हाइपरटेंशन, हृदय रोग, मधुमेह, आर्थराइटिस तथा अस्थमा आदि अनेक शारीरिक रोगों की सौगात दी है। योग ऐसे लोगों के जीवन में नई आशा की किरण लाता है। ऐसे लोग यदि सप्ताह के अंतिम दो दिन एक घंटे यौगिक क्रियाओं का अभ्यास करें तथा यौगिक दिनचर्या का अभ्यास करें, तो चमत्कारिक लाभ मिलता है। ऐसी ही कुछ यौगिक क्रियाओं की जानकारी यहां दी जा रही है। 

आसन 
इनके अभ्यास से एक तो शरीर की मांसपेशियों, नसों एवं स्नायुओं का व्यायाम होता है। दूसरा, सप्ताह भर के मानसिक तनाव के कारण शरीर के स्नायुओं पर पड़ने वाले कुप्रभाव को दूर करने में मदद मिलती है। जिन्हें कोई गंभीर बीमारी नहीं हैं वे जानुशिरासन, सुप्तवज्रासन, उष्ट्रासन, लोलासन, शलभासन, सर्वागासन, नौकासन तथा धनुरासन के दो चक्रों का अभ्यास करें। 

धनुरासन की अभ्यास विधि 
पेट के बल जमीन पर सीधा लेट जाइए। अब दोनों पैरों को घुटने से मोड़िए, हाथों से पैर के टखनों या अंगूठों को पकड़िए। तत्पश्चात हाथों के सहारे पैरों के घुटने, जांघ तथा धड़ के ऊपरी भाग को यथासंभव उठाइए। श्वास-प्रश्वास सामान्य रखते हुए आरामदायक अवधि तक रुकिए। इसके पश्चात वापस पूर्व स्थिति में आइए। इसके दो चक्रों से 5 चक्रों का अभ्यास कीजिए। 

सावधानी 
जिन्हें कोलाइरिस, हर्निया या हाइड्रोसील हो, वे इसका अभ्यास न करें। 

प्राणायाम 
नाड़ियों को शांत करने, सम्पूर्ण शरीर में प्राणशक्ति के यथेष्ट संचारण एवं ग्रंथियों के असंतुलन को दूर करने हेतु प्राणायाम का अभ्यास रामबाण का कार्य करता है। इस हेतु सर्वोत्तम प्राणायाम- कपाल भाति, नाड़ीशोधन, उज्जायी तथा ओम है। इनका अभ्यास आधे घंटे तक करें।

ध्यान 
मानसिक तनाव, भावनात्मक असंतुलन तथा नाड़ीय तनावों को दूर करने में ध्यान से श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है। यदि प्रतिदिन दस मिनट नियमित रूप से योगनिद्रा एवं ध्यान का अभ्यास किया जाए तो मन एवं भावनाओं पर नियंत्रण, तनाव के शमन तथा जीवन को सुखमय बनाने में मदद मिलती है। 

विशेष 
-ऐसे लोगों को प्रतिदिन आधा घंटा प्रात:काल या सायंकाल खुली हवा में टहलना चाहिए। 

-खाने-पीने, सोने-जागने, टहलने, व्यायाम करने या अन्य सभी कार्य करने की एक निश्चित दिनचर्या बनानी चाहिए। 

-ऑफिस में कुर्सी पर रीढ़ सीधा करके बैठने तथा अपनी श्वास-प्रश्वास को गहरी बनाए रखने का अधिक से अधिक अभ्यास करना चाहिए। 

-ऑफिस का कार्य ऑफिस में और घर का कार्य घर में करने की आदत डालनी चाहिए। ऑफिस से घर पहुंचने पर परिवार में एकाकार होकर खूब हँसी तथा प्रसन्नता का माहौल बनाना चाहिए। 

-ऑफिस में कुर्सी पर बैठकर ही प्रतिदिन 5 मिनट के लिए दोपहर में योग निद्रा का अभ्यास करना चाहिए। 

-सप्ताह के अंतिम दो दिनों में से अपना कुछ समय सेवा कार्य में देना चाहिए। साथ ही कुछ अच्छी पुस्तकों का स्वाध्याय करना चाहिए(हिंदुस्तान,दिल्ली,6.6.12)।

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गुरुवार, 24 मई 2012

मज़बूत मांसपेशियों के लिए योग

भागदौड़ तथा तनाव भरी जीवन शैली ने हमारे शरीर के जिस तंत्र को सबसे अधिक प्रभावित किया है वह है नाड़ी तंत्र। इसकी कमजोरी से हमारी सोचने की शक्ति, मस्तिष्क, हृदय, शारीरिक ताप, पाचन तंत्र, किडनी, वजन बढ़ने लगता है। योग के नियमित अभ्यास से व्यक्ति जीवन शैली के खतरों से बच सकता है। इसके अभ्यास से व्यक्ति मन एवं भावनाओं पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर सभी रोगों का सहजता से निदान कर लेता है। इसके लिए प्रमुख यौगिक क्रियाएं निम्न हैं: 

आसन: 
यह नाड़ियों स्नायुओं के तनाव और कड़ेपन को दूर कर शरीर को स्वस्थ बनाता है। इस हेतु सबसे उपयुक्त आसन है- पवनमुक्तासन, मकरआसन, हलासन तथा सर्वागासन। दो-तीन माह के बाद अभ्यास में अपनी क्षमतानुसार नौकासन, मेरुवक्रासन, अर्धमत्स्येन्द्रासन, भूनमनासन, भुजंगासन तथा धनुरासन आदि जोड़ दें। यहां मर्करासन के अभ्यास कि विधि का वर्णन प्रस्तुत है: 

मर्करासन की विधि 
अवस्था-1 
-पीठ के बल लेट जाइए। दोनों हाथों को कंधों की सिधाई में शरीर के अगल-बगल फैला दीजिए। 
-दोनों पैरों को घुटनों से मोड़कर पंजों को जमीन पर रखिए। अब दोनों घुटनों को दांयी ओर जमीन पर ले जाइए तथा सिर को बांयी ओर घुमाइए। 
-थोड़ी देर इस स्थिति में रुककर वापस पूर्व स्थिति में आइए। यही क्रिया दूसरी ओर भी कीजिए। इसकी पांच आवृत्तियों का अभ्यास कीजिए। 

अवस्था-2 
अवस्था 1 के प्रथम निर्देश का यथावत पालन करते हुए दांये पैर को घुटने से मोड़कर इसके तलवे को बांये पैर की जांघ पर रखिए। इस पैर के घुटने को बांयी ओर जमीन पर ले जाइए तथा सिर को दांयी ओर घुमाइए। इस अवस्था में आरमदेह अवधि तक रुककर वापस पूर्व स्थिति में आइए और यही क्रिया दूसरी ओर भी कीजिए। इसकी जांच आवृत्तियों का ठीक तरह अभ्यास कीजिए। 

अवस्था-3 
अवस्था-1 के प्रथम निर्देश का यथावत पालन करते हुए दायें पैर को 90 डिग्री तक ऊपर उठाकर बांये हाथ की ओर ले आइए तथा सिर को दांयी ओर ले जाइए। इस स्थिति में आरामदायक अवधि तक रुककर वापस स्थिति में आइए तथा यही क्रिया दूसरी ओर कीजिए। 

प्राणायाम 
नाड़ी को सशक्त करने के लिए सर्वश्रेष्ठ प्राणायाम है- नाड़ीशोधन तथा उज्जायी। जिन्हें हृदय रोग तथा उच्च रक्तचाप की शिकायत न हो वे अभ्यास में कपालभाति जोड़ सकते हैं। लगभग पांच से दस मिनट तक इसका अभ्यास प्रतिदिन करें। 

ध्यान एवं शिथिलीकरण 
मानसिक तनाव, चिंता, अवसाद आदि नाड़ी तंत्र की रुग्णता के सबसे प्रमुख कारण है। ध्यान एवं शिथिलीकरण क्रिया इन समस्याओं को दूर करने की बेजोड़ तकनीक है। यदि नियमित रूप से दस-पन्द्रह मिनट तक इसका अभ्यास किया जाए तो व्यक्ति विभिन्न परेशानियों से बच सकता है। 

आहार 
सादा, संतुलित और प्राकृतिक आहार लें। मौसमी फल और सब्जियों का भरपूर मात्र में सेवन करें। चोकर सहित आटे का प्रयोग करें(कौशल कुमार,हिंदुस्तान,दिल्ली,16.5.12)।

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सोमवार, 21 मई 2012

एक प्रकार का ध्यान है टहलना

टहलना एक श्रेष्ठ व्यायाम है। इससे हृदय शक्तिशाली होता है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है। रक्तचाप सामान्य हाता है और दिल का दौरा पड़ने की आशंका कम होती है। हानिकारक कॉलेस्ट्रॉल कम होता है। शरीर के जोड़ों व माँसपेशी में शक्ति आती है।  

टहलने से शरीर की अनावश्यक कैलोरी जल जाती है व मोटापा आसानी से नियंत्रित हो जाता हैं व वजन पर नियंत्रण हो जाता है व शरीर सुड़ौल व तेजस्वी हो जाता है। जैसे-जैसे युवा अवस्था खत्म होकर प्रौढ़ावस्था आती है तो हड्डियों में कमजोरी आने लगती है। यदि नियमित रूप से टहला जाए तो हड्डियों में मजबूती आती है। ३० मिनट नियमित रूप से टहलने से न पर्याप्त कैल्शियमयुक्त आहार लेने से अस्थिक्षण की आशंका कम हो जाती है।  

श्रेष्ठ स्वास्थ्य पाने के लिए आवश्यक है कि टहलने का तरीका व वातावरण सही होना चाहिए। टहलने का श्रेष्ट समय प्रातःकाल सूर्योदय के पूर्व ही है। प्रातःकाल वातावरण में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन होती है व वातावरण बहुत ही कम प्रदूषित होने की वजह से श्वसन प्रणाली को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन प्राप्त होती है। प्रातःकाल टहलने से हृदय को सर्वाधिक लाभ प्राप्त होता है। हृदय बहुत ही तेज गति से चलता हैं और शरीर के समस्त अंगों को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजनित रक्त प्राप्त होता है। रक्त संचार बढ़ने से रक्तचाप ही नियंत्रित नहीं होता है वरन नियमित रूप से लंबे समय तक टहलने से कॉलेस्ट्रॉल भी नियंत्रित होता है। इससे संपूर्ण शरीर की कार्यक्षमता में भी वृद्धि होती है साथ ही रक्त में ऑक्सीजन परिवहन की क्षमता में भी वृद्धि होती है।  

स्वस्थ त्वचा 
जो व्यक्ति त्वचा संबंधी अनेक परेशानियों का सामना करते है उनके लिए पैदल टहलना श्रेष्ठ व्यायाम है क्योंकि प्रातःकाल टहलने से शरीर के रोम छिद्रों को पर्याप्त मात्रा में प्रदूषण से मुक्त ऑक्सीजन मिलने से उनकी कार्यक्षमता में अपार वृद्धि होती है व उनकी कार्यक्षमता में वृद्धि होने से शरीर से पर्याप्त मात्रा में विषाक्त पसीने का निष्कासन होता है जिससे त्वचा में निखार आता है। साथ ही प्रातःकाल की गुनगुनी धूप से शरीर को पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी प्राप्त होता है।

एक प्रकार का ध्यान है टहलना 
अकेले प्रातःकाल टहलना एक प्रकार के ध्यान का अभ्यास है। जीवन की भागदौड़ व तनाव की अवस्था में जीवन से जब आनंद समाप्त हो जाता है तब टहलना मन को तनाव मुक्त होकर ऊर्जा प्राप्त करता है। अनावश्यक मानसिक विकारों से मुक्ति मिलती है। दिनभर मन प्रसन्ना व ऊर्जा का अनुभव कर सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। इससे त्वचा की ऑक्सीजन की क्षमता बढ़ने से शरीर सहनशील बनता है, अतः नियमित रूप से टहलने वालों को थकने की चिंता नहीं करनी चाहिए। टहलने से मन खुश रहता हैं व मन प्रसन्नाता से भर जाता हैं और मानसिक अवसाद कम हो जाता है। 

टहलने का सही तरीका 
टहलने के पूर्व वार्म अप अवश्य कर लेना चाहिए जिससे शरीर लयबद्ध तरीके से टहलने के लाभ प्राप्त कर सके। प्रायः टहलने वाले प्रारंभ में ही टहलने की गति को बहुत तेज कर देते हैं जिससे लाभ के स्थान पर हानि होने की संभावना हो जाती है व टहलने वाला व्यक्ति जल्दी थक जाता है, अतः प्रारंभ के २-३ मिनट धीमी गति से टहलना चाहिए, बाद में कुछ मिनटों के लिए अपनी क्षमतानुसार तेज गति से चलना चाहिए। यदि थम जाते है तो तुरंत गति को धीमा कर दें और यदि ज्यादा थम जाते है तो कुछ देर विश्राम भी कर सकते है। नियमित रूप से ३० मिनट तक पैदल चलना चाहिए। एक घंटे में ३-५ किलोमीटर तक चलना चाहिए। पैदल चलते समय पहले एड़ी को जमीन पर रखे फिर पंजों को रखे इस प्रकार से टहलने से पर्याप्त लाभ मिलेगा।टहलते हुए कुल्हों को बारी-बारी से आगे व पीछे करना चाहिए। टहलते समय धड़ को सीधा रखना चाहिए व हाथॅं को व हाथों की गति आगे व पीछे करना चाहिए। सिर और गर्दन को सीधा रखना चाहिए। दृष्टि सामने की ओर होना चाहिए। यदि प्रातःकाल के अतिरिक्त यदि टहलते है तो खाली पेट ही टहलना चाहिए। भोजन करने के १ घंटे बाद धीमी गति से टहला जा सकता है। भोजन के तुरंत बाद कभी भी नहीं टहलना चाहिए।

सही जूतों का चुनाव 
जूते पहनकर ही टहलना चाहिए। इसके साथ ही प्रायः यह देखा गया है कि पैदल टहलते समय कई व्यक्ति बिना खषल के जूतों से टहलते है जिससे वे ठीक प्रकार से टहल नहीं पाते है और स्पोर्ट्‌स जूते नहीं पहनने की वजह से उनके घुटने घीसने का भी भय रहता है व पैरों, कुल्हों, जोड़ों व पीठ पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। क्योंकि जब हम सख्त सतह पर टहलते है तो जूते नहीं पहनने की वजह से घुटनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सही तरह से टहलने के लिए जूतों का चुनाव आवश्यक है। जूते मोटे तलवे वाले होना चाहिए। सही तरह के जूतों को पहनकर टहलने से संपूर्ण लाभ तो मिलते तो है ही साथ लयबद्ध तरीके से टहलना हो जाता है। किसी प्रकार का रोग होने पर टहलना प्रारंभ करने से पूर्व अपने चिकित्सक से सलाह अवश्य लेना चाहिए(डॉ. जगदीश जोशी,सेहत,नई दुनिया,मई द्वितीयांक 2012)।

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शनिवार, 12 मई 2012

कसरत के साथ डाइटिंग है घातक

नियमित आहार और डायटिंग के बाद भी वज़न कम नहीं कर पा रहे हैं? कहीं आपकी ही कुछ आदतें तो इन प्रयासों पर पानी नहीं फेर रही। कसरत का पूरा फ़ायदा उठाने और वज़न कम करने के लिए यह समझना बहुत ज़रुरी है कि ये प्रक्रिया जिम तक ही सीमित नहीं होती। दिनभर की सभी गतिविधियों को सक्रियता से करें। स्वास्थप्रद आहार लें और एक ही हफ्ते में १० किलो वज़न कम करने के लिए अत्यधिक व्यायाम या फिर भूखे मरने जैसे अत्याचार खुद पर कभी भी न करें। 

गिनते हैं हर कैलोरी? 
अपने खाने का एक-एक निवाला सोच-समझ कर लेते हैं और जब कैलोरी गिनने की बात आती है तो आप किसी कैलक्युलेटर से कम नहीं। खाना खाते हुए आपका उद्येश्य पेट भरने के बजाय कैलोरी गिनना ही होता है। पेट भरे न भरे निर्धारित कैलोरी पूरी होते ही आपका भोजन हो जाता है। इस तरह मानव कैलक्युलेटर बनने और भूखे रहने के बाद भी वज़न कम न हो सके तो इतनी मशक्कत का क्या फ़ायदा? 

अक्सर कहते हैं कि खाने के पहले सोचना चाहिए क्योंकि बिना साचे-समझे कुछ भी खा लेने की आदत से वज़न बढ़ने की आशंका रहती है। वज़न कम करने के लिए कैलोरी का मोटा-मोटा हिसाब रखना भी ठीक है लेकिन ग़लती तब होती है जब व्यक्ति एक-एक कैलोरी गिनने के चक्कर में लग जाता है। 

विशेषज्ञों का मानना है कि वज़न कम करने के इच्छुक अक्सर यही ग़लती करते हैं। इस तरह कैलोरी गिनने से अक्सर पेट नहीं भर पाता है और हर समय भूख लगती रहती है। ऐसे में दिमाग़ तक पोषण की कमी के संकेत पहुँचने लगते हैं और भूख बढ़ जाती है। बेहतर यही होगा कि भोजन में धीरे-धीरे परिवर्तन किए जाएँ। हर समय भूख बनी रहने से शरीर फैट को जलाने के बजाय इसे इकठ्ठा करने लग जाता है। 

विशेषज्ञों का मानना है कि भूखे रहने से,खासकर कसरत के बाद कुछ भी न खाने से शरीर में फैट इकट्ठा होने लगता है और मांसपेशियां बनने की बजाए टूटने लगती हैं। मांसपेशियों से शरीर को आकार मिलता है। भूखे रहने से पानी और इसमें घुलनशील विटामिन्स की कमी होने लगती है। इससे चयापचय दर हृदय की मासपेशियां और रक्त में शर्करा का स्तर प्रभावित होने लगता है। 

यानी,कसरत करने का शरीर को जो फायदा होने वाला था,वो आपके भूखे रहने के कारण नुक़सान में बदल जाता है। इसके विपरीत,आप सोचते हैं कि कसरत और डायटिंग दोनों कर रहे हैं तो वज़न झटपट कम हो जाएगा। इस तरह से वज़न कई बार घट भी जाता है लेकिन यह स्वास्थ्य के लिए बहुत नुकसानदेह होता है। इससे शरीर क़मज़ोर होता है। अब ज़रा याद कीजिए कि आपने वज़न घटाने की कोशिशें क्यों शुरू कीं? सेहत की खातिर ही न? तो अब भूखे रहने की बजाय उचित आहार लेने की ओर ध्यान दें। वज़न कर करने की बजाय अतिरिक्त चर्बी से निज़ात पाने के लिए प्रयास करें। 

थोड़े-थोड़े समय के अंतराल से कुछ न कुछ खाते रहें। कार्बोहाइड्रेट,प्रोटीन,विटामिन,मिनरल,फाइबर और फैट,संतुलित आहार के इन सभी घटकों को अपने आहार में ज़रूर शामिल करें। किसी भी घटक से परहेज़ न करें। बल्कि,सभी को उचित मात्रा में नियमित रूप से लें। 

कसरत करें मन लगा कर 
व्यायाम करते हुए इसे ध्यानपूर्वक करना ज़रुरी है। ध्यान कहीं और होने से चोट लगने का जोखिम होता है और चोट के कारण आपको कुछ दिनों तक व्यायाम रोकना पड़ सकता है। भले ही आप शारीरिक कसरत कर रहे हों लेकिन इसका मतलब यह नहीं है दिमाग़ का इसमें कोई काम ही नहीं है। शरीर और दिमाग़ के सही तालमेल से ही आप उचित ढ़ंग से व्यायाम कर पाएँगे। व्यायाम करते हुए ध्यान कहीं और होने से आपकी तकनीक, पॉश्चर और इंटेंसिटी प्रभावित होती है। इस तरह से कसरत का पूरा लाभ नहीं मिलता है। वही व्यायाम करें जिसमें आपका मन लगता हो। जिम में कसरत पसंद न हो तो वहाँ अनमने ढ़ंग से व्यायाम करने से बेहतर है कि आप अपने लिए कोई अन्य विकल्प चुनें और इसे पूरे मनोयोग से करें(डॉ. संजीव नाईक,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल 2012 चतुर्थांक)।

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रविवार, 6 मई 2012

गर्दन और कंधों के दर्द का इलाज़ आसन और प्राणायाम से

गर्दन में स्थित रीढ़ की हड्डियों में लंबे समय तक कड़ापन रहने, उनके जोड़ों में घिसावट होने या उनकी नसों के दबने के कारण बेहद तकलीफ होती है। इस बीमारी को सर्वाईकल स्पौण्डिलाइटिस कहा जाता है। इसमें गर्दन एवं कंधों में दर्द तथा जकड़न के साथ-साथ सिर में पीड़ा तथा तनाव बना रहता है। 

आधुनिक चिकित्सा में सर्वाइकल स्पौण्डिलाइटिस का इलाज फिजियोथेरेपी तथा दर्द निवारक गोलियां हैं। इनसे तात्कालिक आराम तो मिल जाता है, किंतु यह केवल अस्थायी उपचार है। योग इस समस्या का स्थाई समाधान है, क्योंकि यह इस बीमारी को जड़ से ठीक कर देता है। लेकिन जब रोगी को चलने-फिरने में दिक्कत आने लगे तो एलोपैथिक दवाएं, फिजियोथेरेपी तथा आराम ही करना चाहिए। इस स्थिति में यौगिक क्रियाओं का अभ्यास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह स्थिति रोग की गंभीर स्थिति होती है। आराम आते ही इससे पूरी तरह मुक्ति के लिए किसी कुशल मार्गदर्शक की निगरानी में यौगिक क्रियाओं का अभ्यास प्रारम्भ कर देना चाहिए। 

सूक्ष्म व्यायाम रामबाण 
सीधा बैठकर चेहरे को धीरे-धीरे दाएं कंधे की ओर ले जाएं। इसके बाद चेहरे को धीरे-धीरे सामने की ओर लाकर बाएं कंधे की ओर ले जाएं। इस क्रिया को प्रारम्भ में 5-7 बार करें। धीरे-धीरे बढ़ाकर इसे 15-20 बार तक करें। अब सिर को पीछे की ओर झुकाएं। सिर को आगे की ओर झुकाना इस रोग में वजिर्त है। इसके पश्चात सिर को दाएं-बाएं कंधे की ओर झुकाएं। यह क्रिया भी धीरे-धीरे 15 से 20 बार तक करें। 

सीधा बैठकर या खड़े होकर दोनों हाथों की हथेलियों को आपस में गूंथें। इसके बाद हथेलियों को सिर के पीछे मेडुला पर रखें। अब हथेलियों से सिर को तथा सिर से हथेलियों को एक-दूसरे की विपरीत दिशा में पूरे जोर से इस प्रकार दबाएं कि सिर थोड़ा भी आगे या पीछे न झुकने पाए। इसके पश्चात् हथेलियों को माथे पर रखकर इसी प्रकार का विपरीत दबाव दीजिए। ये क्रियाएं 8 से 10 बार करें। अब दाईं हथेली को दाएं गाल पर रखकर एक-दूसरे के विपरीत दबाव डालिए। यही क्रिया बाएं गाल से भी करें। इन्हें भी 8 से 10 बार करें। 

सीधा खड़ा होकर दोनों हाथों को घड़ी की सुई की दिशा में तथा इसके बाद घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में 10 से 15 बार गोल-गोल घुमाएं। इसके पश्चात् दोनों हाथों को कंधे की ऊंचाई तक अगल-बगल उठाकर उन्हें कोहनी से मोड़ लें। इस स्थिति में हाथों को 10 से 15 बार वृत्ताकार घुमाएं। इसके पश्चात् वापस पूर्व स्थिति में आएं। 

आसन 
एक-दो सप्ताह तक उपरोक्त क्रियाओं का अभ्यास करने के बाद अपने अभ्यास में आसनों को जोड़ देना चाहिए। इसके लिए वज्रासन, मत्स्यासन, सुप्त वज्रासन, कुक्कुरासन, मकरासन, धनुरासन, अर्धमत्स्येन्द्रासन तथा भुजंगासन बहुत उपयोगी हैं। 

मत्स्यासन की अभ्यास विधि 
पीठ के बल लेट जाएं। अब अपनी कुहनियों के सहारे सिर तथा धड़ के भाग को जमीन पर रखें। इस स्थिति में पीठ का ऊपरी हिस्सा तथा गर्दन जमीन से ऊपर उठ जाते हैं। हाथों को सीधा कर पेट पर रख लें। इस स्थिति में जितनी देर आसानी से रुक सकते हैं रुकें। उसके बाद वापस पूर्व स्थिति में आ जाएं। 

प्राणायाम 
रोग की गंभीर स्थिति में झटके वाले किसी भी प्राणायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिए। इस रोग में नाड़ियों को शांत तथा स्थिर करने के लिए नाड़ीशोधन, उज्जयी एवं भ्रामरी प्राणायाम बहुत लाभकारी है। 

भ्रामरी प्राणायाम की अभ्यास विधि 
पद्मासन, सिद्धासन, सुखासन में या कुर्सी पर रीढ़ व सिर को सीधा कर बैठ जाएं। दोनों हाथों को जमीन से ऊपर उठाकर अंगूठे या किसी अन्य अंगुली से कान को बंद कर लें। एक गहरी श्वास अंदर लेकर नाक या गले से भौंरे के गुंजार जैसी आवाज तब तक निकालें, जब तक पूरी श्वास बाहर न निकल जाए। यह भ्रामरी की एक आवृत्ति है। इसकी 15 से 20 आवृत्ति का अभ्यास कीजिए। 

ध्यान एवं योग निद्रा 
रीढ़ की हड्डी की बीमारी में ध्यान और योग निद्रा का अभ्यास बहुत लाभकारी है। इस स्थिति में शरीर को पूरी क्रिया के दौरान बिल्कुल स्थिर रखते हुए अपनी सहज श्वास-प्रश्वास पर मन को एकाग्र करना चाहिए। इसका अभ्यास आरामदायक अवधि तक करें। 

इन बातों का भी रखें ध्यान 
इसमें गर्दन में पट्टा बांधना बहुत ही लाभकारी होता है कड़े बिछावन पर सोना चाहिए ताकि रीढ़ की हड्डी ठीक रहे। वजन नहीं उठाना चाहिए और न ही सिर झुकाकर काम करना चाहिए(कौशल कुमार,हिंदुस्तान,दिल्ली,19.4.12)।

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शनिवार, 5 मई 2012

स्लिप डिस्क से छुटकारे के लिए आसन

आजकल पीठ दर्द एवं कमर दर्द को बहुत ही सामान्य बीमारी माना जाने लगा है। लेकिन एक समय बाद यह दर्द बढ़ता जाता है और स्लिप डिस्क की बीमारी में बदल जाता है। योगासन इस बीमारी से पूरी तरह मुक्ति दिलाता है। 

जब कमर की रीढ़ की हड्डी के चारों ओर सहारा देने वाली मांसपेशियां लंबे समय तक कठोर एवं असुविधाजनक स्थिति के कारण संकुचित हो जाती हैं, तब उस स्थान में ऐंठन और दर्द प्रारम्भ हो जाता है। कभी अचानक ज्यादा भार पड़ने के कारण रीढ़ की हड्डी के बीच की गद्दी (डिस्क) में दरार पड़ जाती है या वह टूट जाती है तो उसे स्लिप डिस्क की बीमारी कहते हैं। यह बीमारी उन्हीं लोगों को होती है जो परिश्रम नहीं करते और कुर्सी पर बैठने वाला कार्य ही करते हैं। इस रोग का प्रमुख कारण रीढ़ की हड्डियों, नसों एवं लिगमेंट में अपर्याप्त लचीलापन तथा तनाव को माना गया है। 

योग में इलाज 
इस बीमारी का योग में बहुत ही सरल, प्रभावशाली तथा स्थायी इलाज है। ऐसे रोगी भी कुछ सप्ताह के सरल यौगिक अभ्यास से इस रोग से पूर्णतया मुक्त हो गए जिन्हें डॉक्टर ने ऑपरेशन की सलाह दे दी थी। 

दर्द तेज हो तो 
यदि स्लिप डिस्क का दर्द तीव्र हो, तो कड़े बिछावन पर लेटकर कमर को कुछ दिनों तक हिलाना-डुलाना बिल्कुल बंद कर देना चाहिए। जब तक हड्डी की डिस्क ठीक न हो जाए और सूजन कम न हो जाए, बिस्तर पर पूर्ण विश्रम करना चाहिए। दर्द और सूजन वाली जगह पर बारी-बारी से गर्म और ठंडी पट्टी देते रहने से जल्दी आराम मिल जाता है। कुछ समय तक फिजियोथिरेपी का अभ्यास करना भी लाभकारी होता है। 

क्रियाएं और आसन 
जब चलने-फिरने लायक हो जाए तो इन यौगिक क्रियाओं का अभ्यास करना चाहिए। प्रारम्भ में ज्योतिष्टकासन और मत्स्य क्रीड़ासन में विश्रम करना सीखना चाहिए। इसके पश्चात् मकरासन का अभ्यास करना चाहिए। मकरासन का अभ्यास पांच-सात बार करें। जब यह आसन अच्छी तरह होने लगे तो क्रमश: अर्धशलभासन, सरल भुजंगासन, सरल धनुरासन, भुजंगासन, शलभासन, वज्रासन तथा अर्धमत्स्येन्द्रासन का अभ्यास करना चाहिए। प्रत्येक आसन को पांच-पांच बार करने के पश्चात् अद्दासन में आराम करना चाहिए। 

अर्धशलभासन की अभ्यास विधि 
पेट के बल जमीन पर लेट जाएं। सिर को ठुड्डी के बल जमीन पर रखें। दोनों हथेलियों को जांघों के नीचे जमीन पर रखें। अब दाएं पैर को जमीन से ऊपर उठाएं। पैर बिल्कुल सीधा ही ऊपर उठाएं। लगभग 5 सेकेंड तक इस स्थिति में रुकने के बाद वापस पूर्व स्थिति में आएं। यही क्रिया बाएं पैर से भी करें। प्रारम्भ में इसकी तीन आवृत्तियों का अभ्यास करें। धीरे-धीरे आवृत्तियों को 25 से 30 बार तक बढ़ाएं। जब आप इसकी 25 से 30 आवृत्तियों के अभ्यास करने की स्थिति पार कर लेते हैं तो आपको दोनों पैरों को एक साथ उठाने का अभ्यास प्रारम्भ कर देना चाहिए। 

शिथिलीकरण 
इस रोग में आपको सामान्यतया कुछ दिन बिस्तर पर बिताना पड़ता है। इसलिए यदि इस समय शिथिलीकरण का अभ्यास कर लिया जाए तो रोग बहुत जल्दी ठीक हो जाता है। यह दर्द से ध्यान हटाता है तथा मानसिक तनाव को कम करता है। यह नाड़ियों को बहुत शांत एवं शिथिल कर आत्मविश्वास भी बढ़ाता है। 

भोजन 
प्रारम्भ में हल्का भोजन लेना चाहिए। सब्जियों का रस या सूप सर्वोत्तम है। इसके बाद खिचड़ी लेनी चाहिए। बिस्तर पर पड़े रहने से रोगी को कब्ज हो जाया करता है। ये आहार कब्ज दूर करते हैं। जैसे-जैसे रोग अच्छा होता जाए, चावल, दाल, सब्जी एवं रोटी खायी जा सकती है। ऐसे भोजन जिससे कब्ज होती है या जो गरिष्ठ होते हैं, नहीं लेने चाहिए। इनमें मांस, पनीर, तेल में तली वस्तुएं आदि शामिल हैं। अण्डा, दूध, घी आदि प्रोटीनयुक्त चीजें भी नहीं लेनी चाहिए। 

ध्यान दें 
इस रोग में केवल पीठ को पीछे झुकाने वाले आसन करने चाहिए। आगे झुकने वाले आसनों का अभ्यास तब तक नहीं करना चाहिए जब तक योग विशेषज्ञ इसके लिए अनुमति न दे दे। कुर्सी पर ज्यादा देर तक बैठने वाले लोग योगासनों का अभ्यास आज से ही शुरू कर दें। वजनी चीजें घुटनों को मोड़कर सावधानी से ही उठाएं। 

शिथिलीकरण अभ्यास की विधि 
पेट के बल (मकरासन) में या पीठ के बल (शवासन) में लेट जाएं। चेहरे को पूर्णतया शिथिल कर दें तथा शरीर के सभी अंगों को पूरी तरह ढीला छोड़ दें। अब अपने दाएं पैर पर मन को एकाग्र कर उसे नितंब से लेकर अंगुलियों तक पूरी तरह से ढीला करें। ठीक इसी प्रकार बाएं पैर को भी ढीला करें। इसके बाद दाएं हाथ को कंधों से लेकर अंगुलियों तक खूब ढीला करें। फिर, यही क्रिया बाएं हाथ से भी करें। इसके पश्चात् पीठ, पेट, सीना, गला तथा चेहरे पर मन को बारी-बारी से एकाग्र करते हुए ढीला करें। यह क्रिया आरामदायक अवधि तक की जा सकती है(कौशल कुमार,हिंदुस्तान,दिल्ली,25.4.12)।

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बुधवार, 2 मई 2012

मासिक चक्र की समस्या का यौगिक उपचार

यह आवश्यक है कि कभी भी अत्यधिक ज़ोर पड़ने वाला कार्य न किया जाए, परंतु सावधानी को छोड़कर अन्य कोई कारण नहीं है कि महिलाएँ मासिक धर्म के दौरान अभ्यास बंद कर दें। 

सूर्य नमस्कार 
इससे प्राणशक्ति का स्तर ऊपर उठेगा और स्नायविक अंतःस्रावी क्रियाओं में संतुलन आएगा। अपनी क्षमतानुसार धीरे-धीरे बढ़ाकर बारह चक्रों तक अभ्यास कीजिए।

आसन 
श्रोणि प्रदेश से ऊर्जा अवरोधों को दूर करने का सबसे प्रभावी उपाय है शक्ति बंध समूह के आसन, इसके अलावा वज्रासन समूह से वज्रासन, उष्ट्रासन, मार्जारि आसन, व्याघ्रासन, शशांकासन, सुप्त वज्रासन, शशांक भुजंगासन। पीछे झुकने वाले आसन जैसे-भुजंगासन, शलभासन, धनुरासन, चक्रासन, कंधरासन, ग्रीवासन।

अन्य अभ्यास
-पश्चिमोत्तासन, मत्स्यासन, ताड़ासन, अर्धमत्स्येन्द्रासन, उत्थानासन, पाद हस्तासन, हनुमानासन। सिर नीचे करके किए जाने वाले आसन करना विशेष लाभदायी है, क्योंकि उनसे प्रजनन अंगों से रक्त का प्रवाह उल्टी दिशा में होता है एवं अवरोधक मलों का निष्कासन होता है। साथ ही पीयूष ग्रंथि पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। परंतु इन आसनों को मासिक धर्म के दौरान नहीं करना चाहिए।

प्राणायाम 
नाड़ी शोधन, उज्जायी एवं भ्रामरी प्राणासन रजःकाल के साथ जुड़े सरदर्द, माइग्रेन तथा तनावपूर्ण परिस्थितियों को दूर करने के लिए प्रभावकारी हैं। प्राणायाम द्वारा अतीन्द्रिय स्तरों तक से तनाव दूर हो जाते हैं और मानसिक शांति मिलती है। अंग उतरने एवं गर्भाशय मुखशोथ (सरविसाइटिस) के लिए नाड़ी शोधन प्राणायाम की तृतीय अवस्था, जिसमें मूलबंध एवं जालंधर बंध का अभ्यास किया जाता है, सर्वाधिक प्रभावकारी है। भस्त्रिका प्राणायाम द्वारा जीवनीशक्ति बढ़ती है एवं विषाक्त तत्व साफ होते हैं। इसको अनार्तव (एम्नोरोह्य) एवं कष्टार्तव (डिसमेनोरोह्य) के लिए अनुशंसित किया जाता है। 

मुद्रा एवं बंध 
विपरीतकरणी मुद्रा, पाशिनी मुद्रा एवं योग मुद्रा का अभ्यास यहाँ पर उचित होगा। अश्विनी मुद्रा, मूलबंध एवं सहजोली मुद्रा द्वारा निचले अंगों में से ऊर्जा उत्पन्ना होती है। वे संबंधित तंत्रिकाओं को उत्तेजित करती हैं तथा प्रजनन-निष्कासन प्रणाली के अंगों को सुचारू बनाती है। मासिक धर्म के पूर्व के तनाव को कम करने के लिए महामुद्रा एवं महाबेध मुद्रा विशेष लाभकारी हैं क्योंकि उनसे शरीर में प्राणशक्ति का संचार एवं वितरण नियंत्रित होता है और शारीरिक-मानसिक और भावनात्मक स्थिरता आती है।  

षट्क्रिया 
जल नेति का अभ्यास प्रतिदिन करना चाहिए। कुंजल एवं लघु शंखप्रक्षालन हफ्ते में दो बार या जैसी आवश्यकता हो। याद रखिए, कब्ज़ से श्रोणिप्रदेश में संकुलता (कंजेशन) बढ़ती है, जिससे दर्द एवं ऐंठन बदतर हो जाते हैं। इस प्रदेश के अंगों से संबंधित रोगों में कब्ज़ को दूर करना इलाज का आवश्यक एवं प्राथमिक अवयव है। 

शिथिलीकरण 
योग निद्रा एक अति महत्वपूर्ण अभ्यास है। विशेषतः मासिक धर्म शुरू होने के पहले बढ़ती हुई तनाव की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए। इससे मानसिक तनाव, निराशा, चिड़चिड़ापन एवं भारीपन दूर होते हैं। यदि संपूर्ण अभ्यास के लिए पर्याप्त समय न हो तो श्वासन में लेटकर पेट में श्वास गिनने का अभ्यास किया जा सकता है।

ध्यान 
सिद्धयोनि आसन में बैठकर ध्यान का कोई भी अभ्यास यथा-अजपाजप, अन्तमौन, चिदाकाश धारणा, मंत्र जाप या नाद योग।  

सम्पूर्ण संतुलित शाकाहारी भोजन 
रसंपूर्ण संतुलित शाकाहारी भोजन सभी महिलाओं के लिए उपयुक्त होता है। मासिक धर्म से पूर्व के दिनों में अत्यंत हल्का भोजन, जिसमें मसाले, तेल, एवं दूध न्यूनतम मात्रा में हों लेने की विशेष अनुशंसा की जाती है। कई स्त्रियों का अनुभव है कि उनकी पीड़ा और अतिस्राव की मात्रा में पचास प्रतिशत से भी अधिक लाभ मात्र भोजन में परिवर्तन कर देने से महसूस हुआ है। भोजन हल्का, शुद्ध, सात्विक, शाकाहारी हो, जिसमें फल, अनाज एवं हल्की उबाली हुई सब्जियाँ प्रचुरता में होनी चाहिए। मासिकधर्म के पूर्व दिनों में यह अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। चाय, कॉफी, उत्तेजक मादक पदार्थ, अप्राकृतिक रूप से प्रोसेस्ड फूड बिलकुल बंद कर दें।यह आवश्यक है कि कभी भी अत्यधिक ज़ोर पड़ने वाला कार्य न किया जाए, परंतु सावधानी को छोड़कर अन्य कोई कारण नहीं है कि महिलाएँ मासिक धर्म के दौरान अभ्यास बंद कर दें(स्वामी सत्यानंद सरस्वती,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल 2012 तृतीयांक)।

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मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

गर्मियों में भी करें कसरत

नियमित कसरतों का महत्व कभी कम नहीं होता। आमतौर पर महिलाओं को यह भ्रम होता है कि वे दिन भर ख़ूब काम करती हैं, इसलिए उन्हें कसरत की जरूरत नहीं, लेकिन यह सच नहीं है। नियमित कसरतों का महत्व कभी कम नहीं होता। गर्मियों की छुट्टियाँ गृहणियों के लिए काफी व्यस्तता लाती हैं। व्यस्तता के बीच से निकाले गए १० मिनटों की सख्त कसरतें फिट रखने के लिए पर्याप्त हैं। इसे दिन भर के रूटीन में शामिल किया जा सकता है, अलग से समय निकालने की जरूरत नहीं होती। 

कामकाजी महिलाओं के लिए कसरत के लिए वक्त निकालना मुश्किल होता है गृहणियों के लिए भी कोई आसान नहीं होता। यह भ्रम है कि गृहणियाँ घर की सुख सुविधाओं के बीच आराम करती हैं, इसलिए वे कसरत के लिए आसानी से समय निकाल सकती हैं। सच तो यह है कि नियमित कसरत करने के लिए महिलाओं को खुद समय निकालना होता है। सेहत से समझौता उन्हीं के लिए घातक हो सकता है। गृहणियों के लिए गर्मियों की छुट्टियों में रूटीन काम का बोझ पहले से अधिक हो जाता है। 

सक्रिय रहें

-किराने की दुकान अथवा सब्जी की दुकान तक बार-बार पैदल जाने की आदत डालें। जरूरी नहीं कि आप पूरी खरीददारी एक दिन में ही कर डालें। आप चाहें तो खरीददारी टुकड़ों में भी कर सकती हैं। इससे यह फायदा होगा कि आप हल्के वजन के कैरी बैग रोज या एक दिन छोड़कर उठाकर लाने लगेंगी। इससे जो कसरत होगी वह आपके लिए फायदेमंद साबित होगी। यदि यह संभव न हो तो अलसुबह पैदल सैर पर घूमने निकलना भी किसी नियामत से कम नहीं है।

-घर पर रहते हुए भी अधिक सक्रिय किस तरह रह सकती हैं उस उपाय को खोजें। किसी भी काम को बोझा समझकर न करें। कसरत करने की इच्छाशक्ति विकसित करें। 

-महरी के काम में हाथ बँटाने से भी आपकी अच्छी-खासी कसरत हो सकती है। बगीचे में माली के साथ भी मशक्कतक की जा सकती है। यदि संभव हो तो घर की छत पर कसरत करने के कुछ उपकरण लगाए जा सकते हैं जिनमें वॉकर या स्थिर साइकल कारगर हो सकते हैं। 

-घरेलू महिलाएं अपने व्यस्त जीवन में यदि दो घंटे एक्स्ट्रा जोड़ना चाहती हैं तो सबसे अच्छा उपाय है जल्दी उठना। यदि आप 7.30 बजे तक उठती हैं तो कुछ दिनों के लिए 7 बजे उठने की कोशिश करें। आप देखेंगी कि आपको काम में जुटने के लिए 30 मिनट एक्स्ट्रा मिल गए। इसी तरह,यदि आप 6 बजे उठने लगें तो आपके पास 1 घंटा और 30 मिनट अतिरिक्त होंगे। 

-टीवी के सामने बैठने के समय में कटौती कर दें। इससे आपके पास शाम की कसरत के लिए समय निकल सकता है। आप खुद के लिए हर दिन कुछ समय अवश्य निकालें। नियमित कोई न कोई कसरत ज़रूर करें। इससे आप चुस्त और दुरूस्त रहेंगी। 

ऑफिस, घर और बच्चे 
-कामकाजी महिलाओं को नौकरी के साथ-साथ माँ बनने की अहम जिम्मेदारी भी निभाना पड़ती है। ऑफिस और घर के बीच तालमेल बैठाने में अतिरिक्त कवायद हो जाती है। थकान के कारण इस तरह की महिलाएँ नियमित कसरत से जी चुराने लगती हैं। उनके ये विकल्प भी हैं-

-बच्चों के साथ खूब खेलें। उन्हें स्वीमिंग पूल ले जाएँ या फिर बगीचे में दौड़ भाग करें। इतनी कसरत कर लें कि थक जाएँ। संयुक्त परिवार में रहती हो तो आप किसी को बच्चा सौंपकर कसरत करने बाहर निकल सकती हैं।

-यदि आपका बच्चा स्कूल जाने की उम्र का हो तो आप उसे पैदल स्कूल तक छोड़ने के लिए समय निकाल सकती हैं। इससे बच्चे में भी नियमित कसरत के प्रति रुझान पैदा होगा आप भी अधिक सक्रिय रह सकेंगी(डॉ. शैफाली ओझा,सेहत,नई दुनिया,मार्च चतुर्थांक 2012)।

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शनिवार, 7 अप्रैल 2012

अपच,वज़न घटने और रक्ताल्पता का यौगिक उपचार

इस योग कार्यक्रम का प्रारूप उन सभी व्यक्तियों की सहायता के लिए बनाया गया है, जो कमजोर पाचन शक्ति, भूख न लगने, वज़न घटने, अकारणीय रक्त अल्पता से प्रभावित हैं।

आसन 
शुरुआत पवन मुक्तासन भाग-१ समूह से करें। जब इसमें निपुणता हासिल हो जाए तो भाग-२ समूह का अभ्यास करें। इनको विशेषतः पाचन शक्ति को सुदृढ़ बनाने के लिए अभिरूपित किया गया है। इनसे शक्ति जागृत होगी और कमजोरी व मानसिक कमजोरी जाती रहेगा। 

दो हफ्तों के बाद अपने कार्यक्रम को बदल कर उसमें शक्तिबंध समूह एवं वज्रासन समूह के आसनों का समावेश करें, जैसे शशांकासन, शशांकभुजंगासन, मार्जारी आसन तथा पर्वतासन आदि। इनके अभ्यास से निम्न चक्रों एवं ऊर्जा बिन्दुओं के अवरोध दूर होंगे तथा ऊर्जा यहाँ से उर्ध्वगामी हो मध्य पाचक अंगों तक पहुँचेगी, जहाँ पर अवशोषण तथा पोषण की गड़बड़ी हो रही है, तथा रोग निवारक शक्ति प्रदान करेगी। सूर्य नमस्कार प्रारंभ कर संख्या बढ़ाते हुए १० चक्र तक ले जाएँ। फिर शवासन में पूर्ण विश्राम करें तथा उदर श्वसन के प्रति सजगता विकसित करें। 

अंततः पाँच प्रमुख आसनों का अभ्यास करें, जो पाचन प्रक्रिया को उत्तेजित करते हैं तथा "समान वायु" को निपेक्षित करते हैं। ये आसन हैं- पश्चिमोत्तासन, हलासन, चक्रासन, अर्धमत्स्येंद्रसान तथा मयूरासन। आसन की अंतिम अवस्था में अपनी चेतना को शक्तिशाली रूप से पाचन अग्नि के मूल स्थान, अर्थात मणिपुर पर केंद्रित करें। प्रत्येक भोजन के पश्चात वज्रसान में १० मिनट तक बैठें व अपनी चेतना को पाचन प्रक्रिया पर केंद्रित करें और उसे बढ़ाने की कोशिश करें। 

प्राणायाम
नाड़ी शोधन प्राणायाम (प्रथम अवस्था) का अभ्यास ५ चक्रों से प्रारंभ करें। दोनों नासिकाओं में श्वास के प्रवाह को बराबर रूप से संतुलित करें। दो हफ्ते के बाद द्वितीय अवस्था (एकांतर नासिका श्वसन) का अभ्यास १५ चक्रों से प्रारंभ करें। श्वसन पर पूर्ण नियंत्रण विकसित करने की कोशिश करें, जिसमें श्वास को शांत एवं सूक्ष्म रहना चाहिए। पूरक एवं रेचक में १:२ का अनुपात बनाए रखने का प्रयास करते रहें। यह अभ्यास एक महीने तक करें। उसके बाद तृतीय अवस्था का अभ्यास अंतर्कुंक एवं जालंधर बंध के साथ प्रारंभ करें। अभ्यास का लक्ष्य 1:4:2 का अनुपात होना चाहिए,मगर अनावश्यक ज़ोर न लगाएं। किसी जानकार के निर्देशन में सीखें। 

अंत में नाड़ीशोधन प्राणायाम के चतुर्थ चरण में आएं जिसमें अंतर्कुंभक,जालंधर बंध,उड्डियान बंध,मूलबंध तथा बाह्य कुंभक(महाबंध) को भी जोड़ें। आपका लक्ष्य 1:4:2:2 अनुपात तक पहुंचना चाहिए। यह अभ्यास पाचन क्रिया को तीव्र बनाने में प्रभावकारी होगा। इससे प्राण शक्ति और जठराग्नि का उद्दीपन होगा। अंतर्बाह्य कुंभक के साथ भस्त्रिका प्राणायाम का अभ्यास भी जोड़ें तथा इसमें दक्षता प्राप्त करने का प्रयास करें। अभ्यास के दौरान उठते-गिरते श्वास पटल(डायाफ्राम) पर अवधान रखिए। कल्पना कीजिए कि वह धौंकनी की तरह गतिशील हो क्षुधाग्नि को प्रज्ज्वलित कर रहा है। 50-50 श्वास-प्रश्वास के तीन चक्रों तक अभ्यास कीजिए।

उपवास 
यदा कदा जब आपको बहुत भूख लग रही हो तो उसे नकारते हुए अगले भोजन तक कुछ नहीं खाएँ। यह उन मनोवैज्ञानिक अवरोधों को दूर करने का सबसे प्रभावशाली उपाय है, जो आपकी भूख का दमन किए हुए थे।

भोजन सादा शाकाहारी हो..
भोजन के प्रति अपने नखरों को त्याग दें। भोजन ग्रहण करते समय जो भी आप कर रहे हैं, उसकी सतत चेतना को अक्षुण्ण रखें। चेतन रूप से भूख की संवेदना को महसूस कर उसे बनाए रखें, अपने मन को इस बात की सजगता से इधर-उधर फिसलने न दें। जो भी भोजन आप कर रहे हैं, अपना ध्यान उसी पर केंद्रित रखें एवं सजग रहें कि यह धरती माता की देन है। भोजन को दैवीय प्रसाद जान आनंदपूर्वक ग्रहण करें। सादा शाकाहारी भोजन ग्रहण करें। बाजार में मिलने वाले रंग-बिरंगे एवं चटपटे भोजन के प्रति अभिरुचि अर्थहीन है। भोजन की पोषकता पर ध्यान दें, न कि उसके बाह्य स्वरूप और क्षणिक स्वादानुभूति पर(स्वामी सत्यानंद सरस्वती का यह आलेख बिहार योग विद्यालय,मुंगेर के सौजन्य से सेहत,नई दुनिया,मार्च चतुर्थांक 2012 में प्रकाशित है)।

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गुरुवार, 22 मार्च 2012

वज्रासनःकब करें,कब नहीं

भोजन के बाद यदि खाना व्यवस्थित ढंग से पच जाए तो शरीर की असंख्य बीमारियां स्वत: ही नष्ट हो जाती हैं। इसके विपरित यदि किसी व्यक्ति को पाचन से संबंधी कोई परेशानी है तो उसे कई प्रकार के रोग होने की पूरी संभावनाएं रहती हैं। भोजन पचाने और पाचन तंत्र को व्यवस्थित रखने के लिए एक सबसे अच्छा योगासन बताया गया है। वह आसन है वज्रासन। 

वज्रासन ऐसा आसन है जो भोजन के बाद भी किया जा सकता है। इस आसन का सबसे बड़ा लाभ यही है कि खाना पचाने में ये मददगार है। नियमित रूप से वज्रासन किया जाए तो व्यक्ति पूर्णत: स्वस्थ बना रह सकता है।

वज्रासन की विधि- 
खाने के बाद कुछ देर विश्राम करें। फिर किसी शांत एवं समतल स्थान पर कंबल या अन्य कोई आसन बिछाएं। इसके बाद घुटनों को मोड़कर इस तरह से बैठें कि पैरों के पंजे पीछे की ओर हो जाएं और नितंब दोनों एडिय़ों के बीच में आ जाएं। दोनों पैरों के अंगूठे आपस में मिलाकर रखें। एडिय़ों में अंतर भी बनाए रखें। दोनों हाथों को घुटनों पर रखें। पीछे की ओर न झुकें और शरीर सीधा रखें। अब हाथों को और शरीर को ढीला छोड़ दें। कुछ देर के लिए अपनी आंखें बंद करें और ध्यान सांस की ओर रखें। इस अवस्था में कुछ देर बैठे रहें। ऐसा प्रतिदिन भोजन के बाद किया जाना चाहिए।

बीबीसी की साईट पर सिद्धार्थ प्रसाद ने भी यही सुझाव दिया हैः
-इसे करने में शुरुआती दिक्कत हो सकती है लेकिन नियमित अभ्यास से आसान हो जाएगा इस आसन में घुटनों को मोड़कर इस तरह से बैठते हैं कि नितंब दोनों एड़ियों के बीच में आ जाएं, दोनों पैरों के अंगूठे आपस में मिले रहें और एड़ियों में अंतर भी बना रहे.

-दोनों हाथों को घुटनों पर रखें. पीछे की ओर ज़्यादा न झुकें. शरीर को सीधा रखें ताकि संतुलन बना रहे.

-हाथों और शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ दें और कुछ देर के लिए अपनी आँखें बंद कर लें.

-अपना ध्यान साँस की तरफ़ बनाए रखें. धीरे-धीरे आपका मन भी शांत हो जाएगा.

-इस आसन में पाँच मिनट तक बैठना चाहिए, ख़ासकर भोजन के बाद. 

वज्रासन किसे नहीं करना चाहिए- 
वे जिनके घुटने कमजोर हैं। जिन्हें गठिया रोग है। जिन्हें हड्डियों से संबंधित कोई बीमारी हो, ऐसे लोग वज्रासन न करें। किसी योग चिकित्सक से संपर्क किया जा सकता है। 

वज्रासन से रक्त का संचार नाभि केंद्र की ओर रहता है जिससे पाचन तंत्र व्यवस्थित होता है और पेट की कई बीमारियां ठीक हो जाती हैं। यह आसन महिलाओं के लिए भी लाभदायक है। इस आसन से महिलाओं की मासिक धर्म की अनियमितता दूर हो सकती है। आसन के संबंध में किसी योग विशेषज्ञ से भी सलाह लेनी चाहिए(दैनिक भास्कर,उज्जैन,21.3.12)। 


वज्रासन अकेला ऐसा आसन है, जिसे भोजन करने के बाद किया जा सकता है, ख़ासकर दोपहर के भोजन के बाद. 


-वज्रासन से पाचन तंत्र मज़बूत होता है और उससे संबंधित रोग भी धीरे-धीरे ठीक हो जाते हैं. -यह ध्यानात्मक आसन भी है. इसमें कुछ समय तक अपनी सुविधानुसार बैठना चाहिए. 


-जो लोग अधिक देर तक पैर मोड़कर नहीं बैठ सकते वे वज्रासन की स्थिति में बैठकर कुछ देर तक विश्राम कर सकते हैं. 


सिद्धार्थ प्रसाद के कुछ अन्य ख़ास टिप्सः 


-नया-नया अभ्यास करने वालों को घुटनों, जंघों और टखनों में इतना खिंचाव आएगा कि वे इस आसन को करने से घबराएँगे. लेकिन धीरे-धीरे कुछ समय बाद ऐसे लोग भी आसानी से वज्रासन करने लगते हैं. 


 -इस आसन से पाचन तंत्र सुगम रहता है और पेट की दूसरी बीमारियाँ भी दूर होती हैं शुरुआत में एक छोटा तकिया या छोटा कंबल मोड़कर अपने नितंबों और पैरों के बीच में रखना चाहिए. 


 -इससे घुटनों और टखनों पर दबाव नहीं पड़ेगा और आसन करना आसान हो जाएगा. 


-इस आसन को सबसे पहले 10 सेकेंड करें, फिर 20 सेकेंड तक बढ़ाएँ. कुछ दिन तक लगातार अभ्यास करने पर आप एक मिनट तक वज्रासन करने लगेंगे. 


-वज्रासान में अगर पैरों या टखनों में अधिक खिंचाव और तनाव हो रहा हो तो दोनों पैरों को सामने की ओर फैलाकर बैठें और पैरों को बारी-बारी से घुटने से ऊपर नीचे हिलाएं. 


-कुछ समय में ही आप इस तरह के दबाव से आज़ाद पाएँगे. 


-जिनके घुटने कमज़ोर हों, जिन्हें गठिया हो या फिर जिनकी हड्डियां कमज़ोर हों, वे लोग वज्रासन न करें.


वज्रासन के फ़ायदे 
-वज्रासन से रक्त का संचार नाभि केंद्र की ओर रहता है. इससे पाचन शक्ति बढ़ती है और पेट से संबंधित रोग भी दूर होने लगते हैं. 


-महिलाओं के लिए भी वज्रासन उपयोगी है. इससे मासिक धर्म की समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है.

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