ज़रा हट के लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ज़रा हट के लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

आप कैसे तोड़ते हैं रोटी?

ऐसी बहुत सारी चीज़ें है जो विदेशियों को स्थानीय लोगों से अलग करती हैं. ये बात मुझे हमेशा कौतूहल में डालती है कि किसी स्थिति में खुद को ढालने या उससे बचे रहने का फ़ैसला लोग कैसे करते हैं. और शायद दुनिया इसी प्रश्न पर विभाजित भी है. 

ये सही है कि कुछ विदेशी स्थानीय संस्कृति में ढलने से बचते हैं. मैंने अपनी यात्राओं के दौरान देखा है कि ब्रितानी और अमरीकी लोग तो स्थानीय संस्कृति में समा जाने के उद्देश्य से पहला क़दम तक नहीं उठाते. और इस बात का सबसे बड़ा संकेत ये है कि ये लोग अंग्रेज़ी बोलने वाले हिस्से में भी ज़ोर-ज़ोर से बोलते हैं. शायद सिंद्धात ये है कि इससे लोग उन्हें बेहतर ढंग से समझ लेंगे. और हां एक अन्य ब्रितानी बोझ जो इस ग्रह की बाक़ी प्राणियों पर लादा गया है वो है -अधेड़ मर्दों का दूसरों को सैंडल के साथ लंबे मौज़े पहनने पर मजबूर करना. आह! और फिर वो खान-पान की आदतें. 

मेरा मतलब आपने दिल्ली, रोम, मैक्सिको सिटी या सिडनी में कितने अमरीकियों को मैक्डोनाल्ड या केएफ़सी में देखा है? बहुतों को ना? लेकिन मुझे ये कहना पड़ेगा कि ब्रिटेन आने वाला एक औसत भारतीय पर्यटक भारतीय रेस्तरां ही खोजता है और पब में भी उसे भारतीय व्यंजन ही चाहिए होते हैं. व्यक्तिगत तौर में जिस जगह जाता हूं वहीं के खाने को अपना लेता हूं. और मुझे ये यात्रा का सबसे अच्छा पहलू लगता है. हां, इस आदत की वजह से आपकी प्लेट में नाइजीरिया में बैल के पैरों का शोरबा हो सकता है! 

खुद को दूसरी जगहों के खान-पान में ढालने में सबसे बड़ा सहायक होता है खाना मूंह तक पहुंचाने के स्थानीय तरीके के इस्तेमाल से. तो जनाब हाल के दिनों में मेरे सर पर रोटी तोड़ने की तकनीक में दक्ष होने का जुनून छाया है. क्योंकि भारत में लगभग हर विदेशी रोटी को दो हाथों से तोड़ता है, जैसे वो किसी कागज़ को फाड़ रहा हो. मैं तो यही कहूंगा कि मुझे ये तरीका काफी भद्दा लगता है लेकिन हो सकता है कि मैं ग़लत होऊं. बहरहाल मैं दिल्ली में अपने दफ़्तर के साथियों के खान-पान को देखता रहा हूं. और अब हम इस बारे में सार्वजनिक रूप से बात करते हैं. इसी के आधार पर मुझे लगता है कि रोटी एक हाथ से तोड़ने के कई तरीके हो सकते हैं. 

तो बीते शुक्रवार मेरा सामना एक, दो और तीन उंगलियों से रोटी तोड़ने के तरीके से हुआ. और हां एक आधुनिक तरीके से भी जिसमें छोटी उंगली के रोटी में धंसा दिया जाता है. अब बड़े ही सलीके से रोटी तोड़ने वाले एक सहयोगी का क़िस्सा. इनके बचपन की सबसे बड़ी टेंशन दरअसल रोटी तोड़ने का तरीका ही थी. इन जनाब को रोटी तोड़ने के लिए दोनों हाथों का इस्तेमाल करना भाता था लेकिन इनके पिताश्री उन्हें एक हाथ से रोटी तोड़ने वाला बनाने के प्रति दृढ़संकल्प थे. अब मैं कुछ ज्यादा ही जुनूनी दिख रहा होउंग लेकिन मुझे सलीके से, एक दुरुस्त आकार में तोड़ी गई रोटी देखना बहुत अच्छा लगता है. और मैं अब इसी की खोज में हूं - मैं रोटी को बेहतरीन ढंग से तोड़ने की किसी भी तकनीक या टिप का स्वीकार करने के लिए तैयार बैठा हूं. 

तो क्या है आपकी रोटी तोड़ने की बेहतरीन तकनीक?(नील करी,बीबीसी,29.11.12)

आगे चलें...

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

औषधि है 'सॉरी'

जीवन में अनेक प्रकार के तनावों के कारण हम जाने-अनजाने ऐसा व्यवहार कर बैठते हैं जिससे दूसरों की भावनाएं आहत होती हैं। भीड़ वाली जगहों पर अक्सर,कंधे या हाथ टकरा जाते हैं,पर कई लोग इसकी फ़िक्र नहीं करते। कुछ कदम चलने के बाद एक-दूसरे को टेढ़ी नज़रों से देखा और फिर चलते बने। ग़लती करने में कुछ भी ग़लत नहीं है। वस्तुतः,हमेशा कोई सही नहीं होता। मगर हममें से अधिकतर के लिए इसे स्वीकारना मुश्किल होता है कि हमने ग़लती की। कई बार,हम जानते हैं कि हमने जो किया,सही नहीं था। मगर मन खुद को सही ठहराने के सौ बहाने ढूंढ लेता है क्योंकि अगर अपने किसी व्यवहार से हमने बुरा महसूस किया,तो फिर सॉरी कहना होगा। सॉरी कहने का अर्थ ही इस बात को स्वीकारना है कि हमने ग़लती की। लेकिन अगर आप सॉरी चलताऊ अंदाज़ में कहते हैं जिसका मक़सद ख़ुद को अगली बार सुधारने से क़तई न हो(जिसकी ओर इस पोस्ट में संकेत किया गया है),तो हम न सिर्फ दूसरे का विश्वास खो देंगे,आत्म-विकास भी अवरूद्ध होगा।

आस्ट्रेलिया में तो बच्चों की शिक्षा पर दिए जाने वाले समय का एक बड़ा हिस्सा सॉरी का महत्व सिखाने में बीतता है। वहां अच्छी आदतों के लिए भी सॉरी कहने का चलन है। मसलन,यदि कोई बिल्कुल समय पर पहुंचे,तो कहेगाःI am sorry to be so punctual.सॉरी कहने से ज़्यादा ज़रूरी है उसे महसूस करना। किंतु,अगर आपने ग़लती की है तो सॉरी कहना ही चाहिए- अगर आप दिल से इसे न कहना चाहें,तब भी कहें क्योंकि आपके इस एक शब्द से तुरंत ही सामने वाले के घाव पर मरहम लग जाता है। सॉरी कहने का मतलब है कि आप अहं का त्याग कर रहे हैं और आपके लिए संबंधों की अहमियत है। सॉरी कहना अगर लोग जानते तो कितनी ही शादियां बचाई जा सकती थीं। इन्हीं तमाम पहलुओं पर,नई दुनिया के नायिका परिशिष्ट में 29 अगस्त,2012 को प्रकाशित संध्या रायचौधरी का आलेख(आशोधित रूप में) देखिएः

"सॉरी या माफ कीजिएगा, कहने के लिए बहुत आसान और सहज शब्द/ वाक्याँश हैं। हम कहना चाहते हैं, लेकिन कह नहीं पाते, क्योंकि जितना आसान इन्हें उच्चारना होता है, "कहना" उतना ही मुश्किल होता है । अपना सारा अहं भूलकर, मिटाकर ही इन्हें कहा जा सकता है, पर कह देने के बाद बहुत तरल और हल्का महसूस हुआ करता है। कहने को ये शब्द बहुत छोटे हैं, लेकिन माफी, सॉरी या प्लीज़ जैसे शब्द घावों को भरने का काम करते हैं। "अवर जर्नी टू वि़ज़्डम" जैसी किताब की लेखिका कैरोल आर्सबोर्न के अनुसार शर्म, बेइज्जती, माफी आदि पर सालों से शोध चल रहा है कि इन शब्दों में आखिर ऐसा कौन सा राज छुपा है जो अद्भुत तरीके से दूरियों को मिटा देता है।" कई बार इसके चमत्कारिक परिणाम देखे गए हैं क्योंकि यही वह शब्द है जिससे घृणा-चक्र टूटता है और जिसकी बदौलत कुछ एकदम ब्रांड-न्यू सामने आ सकता है।

प्लीज़ शब्द में है जादुई शक्ति
वास्तव में क्षमा माँग लेने के लिए भी साहस की जरूरत है। यह ईमानदारी भरा काम है, क्योंकि हमें यह स्वीकारने में कि हम गलत हैं, बहुत समय लगता है, बहुत सोचना पड़ता है और मन का द्वंद्व अनवरत चलता रहता है। लेकिन सॉरी कहने के बाद हमारे आपसी रिश्तों में नई उम्मीद जागती है। यह समर्पण का काम है क्योंकि यह आपको चीजों को बनाए रखने में मदद करता है और संबंधों को मजबूती प्रदान करता है। ब्रिटिश मनोचिकित्सक डेलिस अब्राम के अनुसार सॉरी कहना बेहद मुश्किल है। यह आपके अहम से जुड़ा होता है। आप गलत हैं और अपने व्यवहार के लिए शर्मिंदा हैं, यह अहसास आपको शर्मिंदगी से भर देता है। लेकिन सही मौका, सही समय, साहस और दिल से माँगी गई माफी आपको अपराधबोध से मुक्त कर राहत की साँस लौटाती है। बैंगलुरू के रिलेशनशिप एक्सपर्ट डॉ. बाबूजी राम, सॉरी को लेकर बहुत ही अच्छी व्याख्या करते हैं। उनके अनुसार जश्न के मौके हमेशा लोगों को करीब लाते हैं। माफी और सॉरी बोलने के लिए किसी खास आयोजन का समय सबसे अच्छा होता है। इसके लिए दीपावली, होली या नए साल का विशेष अवसर सबसे अच्छा मौका देता है, क्योंकि त्योहारों की खुशियों में आसानी से मतभेदों को भुलाया जा सकता है, एक-दूसरे के गले मिला जा सकता है । बाकी फिर हमारी संवेदनाएँ अपने आप जुड़ ही जाती हैं।

कनाडाई लेखिका मारग्रेट लॉरेंस के अनुसार विदेशों में प्लीज शब्द को जादुई शब्द के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। ब्रिटेन में लोग एक दिन में आठ बार सॉरी बोलते हैं यानी साल में लगभग २९२० बार और जीवन भर में लगभग ३० लाख बार सॉरी बोलते हैं। कई बार तो उनकी गलती नहीं भी होती है फिर भी वे सॉरी कहकर सामने वाले को एक पल में हक्का-बक्का कर देते हैं।

रिश्ते में आ जाती है मिठास 
"सॉरी" बोलना भी एक कला है जो हर किसी को नहीं आती। हमें पता ही नहीं होता कि सॉरी बोलें तो कैसे? हम कई बार सॉरी बोलते हुए काफी असहज महसूस करते हैं। लेकिन सॉरी बोलने से आत्मा तो पवित्र होती ही है, साथ ही मन की पीड़ा भी दूर हो जाती है। सॉरी बोलने का सही तरीका आपके जीवन में आने वाली अनेक कठिनाइयों को दूर कर सकता है जिससे काफी हद तक रिश्तों में आई कड़वाहट कम हो सकती है। हम सॉरी बोलने से केवल इसलिए कतराते हैं कि कहीं हम गलत साबित न हो जाएँ, लेकिन ऐसा नहीं है। जब हम सॉरी बोलते हैं तो वास्तव में हम महानता की ओर बढ़ते हैं। 

छोटों से माफी माँगने में कैसी शर्म? 
कई माता-पिता सोचते हैं कि बच्चों से माफी मांगने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि वे बड़े हैं और इसलिए वे जैसा चाहें,बच्चों के साथ बर्ताव कर सकते हैं। स्थिति का सामना करना तब कठिन हो जाता है जब बड़ों को छोटों के सामने अपनी गलती स्वीकार करना पड़ती है या उन्हें सॉरी बोलना पड़ता है, क्योंकि इसमें अहम आड़े आ जाता है। लेकिन हमारा सॉरी बोलना उन्हें ज़िंदगी में एक बड़ी सीख दे जाता है और भविष्य में उन्हें यह बात हमेशा स्मरण रहती है कि जब हमसे इतना बड़ा व्यक्ति सॉरी कह सकता है तो हम क्यों नहीं? मगर बच्चों से सम्मान पाने के लिए उन्हें सम्मान देना ज़रूरी है। 

औषधि की तरह है 
पाकिस्तानी लेखिका नाजिया ने अपनी किताब "अनसैड वर्ड्स हेल्प यू एंड योर लव" की भूमिका में सर्वप्रथम अपना ही उदाहरण दिया है कि सॉरी शब्द कहना हमें हमारी माँ रोज स्कूल जाने से पहले सिखाती थी। मां का कहना होता था कि अपनी ग़लती हो तो सॉरी कहना बहुत ज़रूरी है लेकिन अपनी ग़लती न भी हो तो सॉरी कहने से तुम्हारी इज्ज़त ही बढ़ेगी। इसलिए,जब कभी असावधानीवश मैं कुर्सी,टेबल या दरवाज़े से टकराती थी तो अपनी कुहनी या घुटने मसलते हुए उन बेज़ुबान चीज़ों को भी सॉरी बोलती थी। एक और उदाहरण नाज़िया ने अपनी क़िताब में दिया है कि जब भी उनकी अंग्रेज़ी की टीचर ब्लॉकबोर्ड पर चॉक से कुछ लिखती थीं और चॉक से घिसटने की आवाज़ होती थी जो बड़ी ख़राब लगती थी और अनायास ध्यान प्रश्न से हट जाता था,तब वो टीचर अपना सिर पीछे घुमाती थीं और चॉक को हमें दिखाकर सॉरी बोलती थीं। हालांकि इसमें गलती उनकी नहीं थी,लेकिन उनकी मिठास भरी सॉरी बहुत असर करती थी। वास्तव में,साहस के साथ माफी मांगने में समय ज़रूर लगता है,लेकिन यह औषधि का काम भी करती है और जीवन-पर्यन्त हमें रिलैक्स किए रहती है"। 

ध्यान रहे कि सॉरी कहना आपकी हार नहीं है। उल्टा,यह इस बात का प्रतीक है कि आप ज़िम्मेदारी ले रहे हैं। इसलिए, इसकी पहल करने में भी संकोच नहीं होना चाहिए। करके देखिए,आप तुरंत बेहतर महसूस करने लगेंगे।

आगे चलें...

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

कहाँ ग़ायब हुआ स्वाद मुँह का?

बुजुर्ग अक्सर शिकायत करते हैं कि उनके मुँह का स्वाद ग़ायब हो गया है। उन्हें अब किसी व्यंजन में स्वाद महसूस नहीं होता। बढ़ती उम्र के साथ कुछ बुजुर्ग मरीज़ों में रसना इंद्रियों के शिथिल होने के साथ घ्राणशक्ति भी क्षीण हो जाती है। इसकी वजह से उनकी भूख भी कम हो जाती है और वज़न घट जाता है। 

मुँह का स्वाद खत्म होने के कई कारण हैं। उम्र बढ़ने के साथ शरीर के अन्य अवयवों की तरह स्वादग्रंथियाँ भी शिथिल होने लगती हैं। जिस तीव्रता के साथ बचपन अथवा युवावस्था में गंध अथवा स्वाद का एहसास होता है, उतनी तीव्रता से बुजुर्गावस्था में नहीं महसूस होता। युवावस्था में स्वादग्रंथियों में आई खराबी को ठीक किया जा सकता है, जबकि बढ़ी उम्र में ऐसा करना मुश्किल होता है। कई बुजुर्ग चाय, कॉफी और नाश्ते के सहारे दिन भर निकाल देते हैं। इसी के चलते जल्दी ही उनका वज़न भी घट जाता है।

शिथिल इंद्रियाँ 
जब किसी बुजुर्ग के मुँह का स्वाद ग़ायब होता है तो उसमें सूँघने की क्षमता में कमी का बड़ा हाथ होता है। सूँघने की क्षमता नाक की अंदरूनी सेहत के प्रभावित होने की वजह से कम हो जाती है। इसके लिए असाध्य स्थिति में पहुँच चुका जुकाम और लंबे समय से चली आ रही नाक की दूसरी बीमारियाँ जिम्मेदार हैं। बहुत कम मामलों में नाक की नाड़ी की ख़राबी से सूंघने की क्षमता घटती है। मरीज़ों में दिमाग़ी पक्षपात के कारण उनकी सूंघने की क्षमता कम हो जाती है,जिसकी वज़ह से मुंहका स्वाद भी खराब हो जाता है। 

मुंह की स्वच्छता तथा दंतरोग 
शरीर में हुई किसी भी बीमारी की वज़ह से यदि मुंह सूखने की समस्या होती है तब भी मुह का स्वाद जाता रहता है। स्वाद महसूस होने के लिए मुंह में थूक अथवा लार का होना निहायत ज़रूरी है। भोजन एवं पेय में उपस्थित रसायनों की वज़ह से स्वाद ग्रंथियों की सक्रियता बनी रहती है। मुंहस सूखा होने पर रसायन क्वाद ग्रंथियों तक नहीं पहुंच पाता है। मुंह में हो रही किसी भी तरह की जलन से स्वाद ग्रंथियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। ढीले अथवा खराब फिटिंग वाले कृत्रिम दांतों के साथ सड़े हुए मसूड़े भी स्वाद ग्रंथियों को निष्क्रिय करने में सक्षम होते हैं। धूम्रपान से भी स्वाद ग्रंथियों की संवेदनशीलता ख़त्म हो जाती है(डॉ. अनिल भदौरिया,सेहत,नई दुनिया,मार्च चतुर्थांक 2012)।

आगे चलें...

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

"ॐ" ध्वनि का महत्व

"ॐ" की ध्वनि सर्वप्रिय है। सभी को अच्छी लगती है। यह भाषाओं की जन्मदात्री है। ब्रह्म का सारा निर्माण ही इस ध्वनि के आधार पर हुआ है। योगियों के लिए यह ध्वनि ईश्वर का प्रतीक है। अनाहत नाद, जिसमें हम कानों पर उँगलियाँ रखकर सुन सकते हैं, ठीक से समझ लेने पर वहाँ पर इस ध्वनि को प्रतिदिन किसी भी समय सुना जा सकता है। आज के वैज्ञानिक युग में वैज्ञानिक प्रयोग सिद्ध कर रहे हैं कि मानव द्वारा उच्चारित ध्वनियों का प्रभाव उसकी सम्पूर्ण बनावट पर, शरीर के सभी अंगों पर कितना सही और कितना अधिक पड़ता है। ध्वनि द्वारा जो वायु गले से लेकर फेफड़े तक पहुँचती है, उसमें फेफड़े के अंतिम भाग, जिसको एल्व्यूलस कहते हैं, में कम्पन शुरू हो जाता है। इससे वहाँ की दूषित वायु बाहर निकलती है और प्राणवायु वहाँ पहुँचती है। "ॐ" की ध्वनि हमारे सभी सूक्ष्म अंगों पर पहुँच कर उनकी अच्छी तरह से मालिश करती है। जिस प्रकार संगीत की ध्वनियाँ मस्तिष्क पर अपना प्रभाव डालती हैं, उसी प्रकार "ॐ" की ध्वनि उच्चारित करने पर उसका प्रभाव मस्तिष्क पर पड़ता है। उसके उच्चारण मात्र से ही सभी प्रकार की आंतरिक भय की भावना तथा मस्तिष्क की कमजोरी दूर भाग जाती है। इसके उच्चारण को सुनकर यह समझना कठिन नहीं रहता कि साधक की साधना किस स्तर की है। स्पष्ट और सही उच्चारण मस्तिष्क की स्वतंत्रता तथा अच्छे स्वास्थ्य का आभास करा देते हैं। हमारे मस्तिष्क में सोचने की क्रिया सतत चलती रहती है। काल्पनिक चित्र हमारे बुद्धि पटल पर बनते-बिगड़ते रहते हैं और ये हमारी शारीरिक, मानसिक थकावट के मुख्य कारण हैं। जब हमारा मन शांत हो जाता है और विचारशून्य स्थिति में आता है तभी हमें सच्चा आराम एवं मानसिक शांति महसूस होती है। मन में चलने वाले वाक्यों और चित्रों की सतत धड़-धड़ाती हुई पनचक्की जब तक शांत नहीं होती, तब तक हमारी थकावट, परेशानी तथा मानसिक बोझ कभी कम नहीं हो सकता है और इसे कम करने के लिए "ॐ" की ध्वनि ही एकमात्र सही उपाय है। दिनभर की थकावट एवं तनाव की स्थिति के बाद शाम को यदि इस ध्वनि का जाप कर लिया जाए तो सभी परेशानी एवं खोई हुई ऊर्जा की पूर्ति शीघ्र हो जाती है। "ॐ" के उच्चारण से हमारे मस्तिष्क के आंतरिक अंगों को शक्ति प्राप्त होती है। कमजोर मस्तिष्क वाले भी इस ध्वनि का उच्चारण कर मानसिक शांति एवं बुद्धि की प्रखरता प्राप्त कर सकते हैं। मन ही मन इसका उच्चारण करना भी काफी लाभदायक होता है(डॉ. के.सी. खरे,सेहत,नई दुनिया,अगस्त तृतीयांक 2011)।

आगे चलें...

बुधवार, 30 मार्च 2011

हर बड़े मैच के बाद पत्नियां होती हैं ज़्यादती की शिकार

भारत-पाकिस्तान मैच के दौरान आप न तो चिप्स लेकर बैठें, न कोल्ड ड्रिंक का मजा लें और शराब से तो बिल्कुल ही दूर रहें। ये कहना है राजधानी के जाने-माने डॉक्टरों का। बड़े-बड़े स्क्रीन वॉल होटल, मॉल और कार्यालय वातानुकूलित हैं तो हाईवोल्टेज मैच में आप निर्जलीकरण के शिकार हो सकते हैं।

इस संबंध में आज नई दुनिया ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के मनोचिकित्सक डॉ. राजेश सागर के हवाले से छापा है कि ऐसे बड़े मैच के दौरान लोग चिंता के शिकार हो जाते हैं। राममनोहर लोहिया अस्पताल के मनोविज्ञान विभाग की प्रमुख डॉ. एसएन देशपांडे के अनुसार मन विचलित होने पर ध्यान, योग व सकारात्मक शारीरिक क्रिया द्वारा उस पर काबू पाया जा सकता है। हार्टकेयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल के अनुसार दिल के मरीज इतने उत्तेजित न हों कि उनका ब्लडप्रेशर व पल्स रेट बढ़ जाए। मूलचंद अस्पताल के गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी के डॉ.एसके ठाकुर के अनुसार मैच के दौरान किसी भी हाल में जंक फूड व अल्कोहल लेने से बचें।

इसी अखबार में संदीप देव की रिपोर्ट कहती है कि भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच का फीवर पुरूषों को बेकाबू कर सकता है। हार-जीत, दोनों की उत्तेजना को संभालने में असमर्थ पति पत्नियों के साथ ज्यादती कर सकते हैं। मनोचिकित्सकों की मानें तो हाई वोल्टेज क्रिकेट और फुटबॉल मैच में अपनी टीम की खार से खिन्न पति कई बार घरेलू और सेक्सुअल हिंसा का सहारा लेते हैं। मनोचिकित्सकों की पत्नियों को सलाह है कि वे एक दिन उन्हें झेल लें, नहीं तो कईयों के दांपत्य जीवन में खलल पैदा हो सकता है।

अपराध के मामले में दिल्ली पुलिस को सहयोग करने वाले प्रसिद्घ अपराध मनोचिकित्सक डॉ. रजत मित्रा के अनुसार भारत-पाकिस्तान जैसे हाई वोल्टेज मैच में बॉल-दर-बॉल लोगों का जुनून और उनकी उत्तेजना ब़ढ़ती चली जाती है। कुछ लोग अपनी उत्तेजना को संभाल नहीं पाते और क्रोधवश बेकाबू हो जाते हैं। ऐसे क्रोधी इंसान दो रास्ता अख्तियार करते हैं। एक रास्ता खुद को नुकसान पहुंचाने, जैसे आत्महत्या करने, लंबे समय तक खामोश रहने और लोगों से कटकर रहने का होता है। दूसरा रास्ता क्षणिक अपराध की ओर मु़ड़ जाता है। इस अपराध में चीजों की तो़ड़-फो़ड़, मारपीट, जुआ व शराब का लंबे समय तक लत से लेकर घरेलू और सेक्सुअल हिंसा तक शामिल है।

डॉ. रजत मित्रा के अनुसार फुटबॉल वर्ल्डकप-२०१० के दौरान उच्च व मध्यम उच्च वर्ग की कई महिलाएं हिंसा की शिकार होकर आई थी। खेल के दौरान अपनी टीम की हार पर ऐसी महिलाओं के पतियों ने अपने क्रोध को निकालने के लिए या तो उनके साथ हिंसक व्यवहार किया था या फिर उनके साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाया था। 


डॉ. मित्रा के मुताबिक उत्तेजना की अवस्था में गुस्सा तो ब़ढ़ ही जाता है, सेक्सुअल हार्मोन भी ब़ढ़ जाता है। पीड़ित व्यक्ति इन दोनों से मुक्त होने के लिए हिंसा और सेक्स का सहारा लेता है। हालांकि बाद में ऐसे पुरूषों को पछतावा होता है, लेकिन उनकी महिला साथी को इससे बाहर आने में करीब दो सप्ताह लग जाता है।

डॉ. मित्रा के अनुसार पिछले क्रिकेट वर्ल्ड कप के दौरान मेरे पास ऐसे तीन केस आए थे, जिन्होंने भारत के नॉकआउट राउंड में बाहर होने पर आत्महत्या की कोशिश की थी। डॉ. मित्रा की सलाह है कि लोग क्रिकेट को खेल की तरह लें, खेल देखने के दौरान ड्रिंक न करें, बेवजह दूसरे से बहस न करें और यदि उन्हें दुख या गुस्सा आ रहा है तो बातचीत कर उसे बाहर निकाल दें।

आगे चलें...

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

शर्माना कहीं रोग न बन जाए

हर कोई शरमाता है। यहां तक कि बेशर्म कहे जाने वाले लोग भी शरमाते हैं। रोचक बात है कि शरमाना मानव जाति का एक महत्वपूर्ण लक्षण है। शर्म या लज्जा को स्त्री का जेवर कहा गया है। शरमाते पुरुष भी हैं। निश्चित ही यह मानव भावनाओं में एक है जो चेहरे पर प्रकट होती है।  सो हर कोई शरमाता है, मगर जरूरत से ज्यादा शरमाना भाव की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक गंभीर रोग है।
एक लम्बे समय तक इसे सहज शारीरिक क्रिया माना गया तो कई महत्वपूर्ण और रोचक गुत्थियां खुलीं। शर्म से जुड़े तथ्यों ने ही इसे रोग की श्रेणी में ला खड़ा किया और नाम दिया गया एरोथ्रोफोबिया। स्नायुतंत्र से संबंधित शर्म मस्तिष्क के निचले भाग हाइपोथैलमस द्वारा प्रभावित होती है। जब कोई शरमाता है तो हाइपोथैलमस हरकत में आ जाता है। यही निर्देश रक्त वाहिकाओं तक जा पहुंचता है, परिणामस्वरूप रक्त वाहिकाएं फैलने या सिकुड़ने लगती हैं। यह स्थिति चेहरे पर भाव परिवर्तन लाती है। इससे आंखों की पलकें विशेष अंदाज में उठने-गिरने लगती हैं। इसके अलावा, गालों के उभार पर एक थिरकन पैदा हो जाती है। इसी कारण चेहरे पर लालिमा आ जाती है। अंग्रेजी में इसे ब्लश करना कहा जाता है। सामान्य तौर पर यह सब क्षणिक होता है,मगर रोग की स्थिति में यह देर तक रहता है और बार-बार होता है।
रोगी इसमें आंतरिक आनंद की अनुभूति करता है,सो बार-बार शरमाना चाहता है और रोग बढ़ता जाता है। शरम के लक्षण शरीर में चेहरे पर ही नहीं, कई अन्य रूपों में भी देखे जा सकते हैं। मसलन,शरम की स्थिति में लड़कियां आंखें झुकाए पैर के अंगूठ से धरती या फिर फर्श को कुरेदने लगती हैं, बेवजह आंचल संवारने लगती हैं, उंगली पर दुपट्टा लपेटने लगती हैं। होठों पर उंगली रखना या फिर मुंह से उंगली दबा लेना भी शरम के लक्षण हैं। यही नहीं, शर्मसार होती लड़कियां अपना चेहरा भी छिपा लेती हैं। इस कृत्य से वह अपनी शर्म छुपाती नजर आती हैं, मगर हकीकत में यह शर्म को और उभारना है। चेहरे पर आई शर्म छिपाने से नहीं छिपती है बल्कि इस बात का स्पष्ट करती है कि शर्म का अतिरेक है, लाख छिपाने पर भी नहीं छिपेगा। कुछ बच्चे तो शरमाने के साथ ही भागने और छिपने लगते हैं। यह एक मस्तिष्क से जुड़ी प्रक्रिया है जो एक तरह से शरीर की गतिविधि को असामान्य बना देता है। शरमाने वाला स्वयं नहीं जान पाता है कि क्या हो गया। कहना न होगा कि वह इस दशा में अपने शरीर से अपन नियंत्रण खो बैठता है। मगर यह बार-बार होता रहे तो शरीर में ठहराव खत्म होने लगता है,अजीबो-गरीब विकृतियां पैदा हो जाती हैं(दुर्गेश शर्मा,हिंदुस्तान,दिल्ली,21.2.11)।

आगे चलें...

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

सेक्स प्रॉब्लम पर पत्नियां हुईं बोल्ड

वो दिन लद गए, जब महिलाएं पति की यौन अक्षमता को अपनी किस्मत मानकर चुप बैठ जाती थी। वे इस बारे में किसी से चर्चा करने की बजाय अंदर ही अंदर घुटती रहती थी। अब ऐसा नहीं है। महिलाएं इस मामले में बोल्ड हो चुकी हैं। अब वे खुद पति को इलाज करने के लिए डाक्टर के पास ले जा रही हैं और इलाज के विकल्पों पर चर्चा भी करती हैं। डीएमसी अस्पताल में एंड्रोलोजी एंड रिप्रोडक्टिव मेडिसन कांफ्रेंस में पहुंचे डाक्टर मानते हैं कि देश की राजधानी दिल्ली से लेकर राजस्थान, चंडीगढ़, खड़गपुर व पंजाब के छोटे शहरों तक में महिलाएं बोल्डनेस दिखा रही हैं।

आईआईटी खड़गपुर के डा.एसके गुहा के मुताबिक अब यौन अक्षमता की शिकायत लेकर पति के साथ पत्नी भी आती है और वह डाक्टर के साथ होने वाली चर्चा में भाग भी लेती हैं। बल्कि ज्यादातर महिलाएं पहले अकेली आकर डाक्टर से इलाज के विकल्प पूछती हैं, उसके बाद वे अपने पति को मनाकर डाक्टर के पास लेकर आती हैं। डा.गुहा बताते हैं कि हाल ही में उनकी एक विवाहित लेडी स्टूडेंट की मां उनके पास आई और उसने बताया कि उसकी बेटी के पति में यौन अक्षमता है। उसने बिना किसी झिझक उनसे इलाज के विकल्प भी पूछें।

पीजीआई चंडीगढ़ के यूरोलोजी विभाग के डाक्टर एसके सिंह के मुताबिक महिलाओं में मेडिकल साइंस के प्रति जागरूकता भी इसकी वजह है। वे अब अपने पति से चर्चा करती हैं कि जब मेडिकल साइंस में उनकी यौन अक्षमता का हल है, तो वह क्यों उसे छुपाकर अंदर ही अंदर घुट रहा है।

यूनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान के सेंटर फॉर एडवांस स्टडी के प्रोफेसर एनके लोहिया के मुताबिक बच्च न होने पर प्राथमिक तौर पर मान लिया जाता है कि महिला में ही कोई नुक्स होगा। इसलिए सबसे पहले महिला के ही सभी टेस्ट कराए जाते हैं और पुरुष आखिर में अपने टेस्ट कराता है। लेकिन अब महिलाएं शुरुआती दौर में ही अपने पति को भी टेस्ट कराने के लिए तैयार करती हैं। नेशनल इंस्टीटच्यूट आफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर के डिपार्टमेंट ऑफ रिप्रोडक्टिव बायोमेडिसन के डा.एमएम मिसरो बताते हैं कि महिलाओं में झिझक घटी है। उनके यहां इलाज के दौरान महिलाएं गायनाकोलोजिस्ट से चर्चा कर देती हैं कि उनका पति सेक्सुअल डिसआर्डर से पीड़ित है। पति और पत्नी दोनों से चर्चा के बाद ही यौन अक्षमता का इलाज कारगर तरीके से शुरू किया जा सकता है(विपन जंड,दैनिक भास्कर,लुधियाना,20.2.11)।

आगे चलें...

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

प्रेम और स्वास्थ्य

प्रेम की ताक़त से किसी की पीड़ा का दूर होना कोई शायराना बात नहीं बल्कि वैज्ञानिक आधार पर सिद्ध हो चुकी सच्चाई है। अगर आप प्यार में हैं तो आपका मन ही नहीं तन भी चंगा हो सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रेम संबंधों में डूबे लोगों का रक्तचाप सामान्य हो जाता है। अवसाद कम या दूर हो जाता है। और अगर कोई चोट लगी है तो वह जख्म तक जल्दी भर जाते हैं। यानी प्यार अब हर मर्ज की दवा न सही लेकिन सेहत सुधारने का सटीक नुस्खा जरूर है। 
वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार ब्रिघम यंग यूनिवर्सिटी के जूलियाने हॉल्ट-लुंस्टाड के अध्ययन के अनुसार लोगों के मधुर संबंध उन्हें तनाव से मुकाबला करने की ताकत देते हैं। साथ ही उनका रुझान सकारात्मक पहलुओं की ओर होने के नाते वह अपनी सेहत को लेकर काफी सजग हो जाते हैं। इसलिए भावनात्मक संबल का होना सेहत के लिए बहुत लाभदायक है। अध्ययन के अनुसार जिनका वैवाहिक जीवन खुशहाल है उनका रक्तचाप अविवाहित लोगों की अपेक्षा कम ही रहता है। लेकिन जिनका वैवाहिक जीवन खुशहाल नहीं है उन्हें अन्य समूहों के मुकाबले उनका रक्तचाप अधिक रहता है। इसलिए जहां तक ब्लड प्रेशर का सवाल है आप एक दुखदायी शादी के मुकाबले अकेले होने की स्थिति में बेहतर महसूस करेंगे। वैज्ञानिक अध्ययन में यह बात साबित हो चुकी है कि जब आप अपने पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका से बहुत प्यार करते हैं तो अपना खूब ख्याल रखते हैं। अपनी सेहत को लेकर भी सजग रहते हैं। 
प्यार में खुशहाल लोग न ज्यादा धूम्रपान करते हैं और ना ही शराब आदि का अधिक सेवन करते हैं। रूमानी रिश्ते में प्रेमी जोड़े अपना ही नहीं एक-दूसरे का भी पूरा ध्यान रखते हैं और एक-दूसरे को सेहत का ख्याल रखने के लिए प्रेरित करते हैं। प्रेम संबंध में लोग मानसिक रूप से भी स्वस्थ होते हैं। उन्हें जिंदगी में नए मायने नजर आने लगते हैं और उन्हें अपना जीवन सार्थक लगने लगता है। पूर्णता का यह सुखद अहसास उन्हें बुरे से बुरे हालात में भी संभाले रखता है। 
इस अध्ययन के लिए न्यूयार्क की स्टोनबर्ग यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्री ऑथर अरोन ने ऐसी प्रेमी जोड़ों के दिमाग का एफएमआरआई स्कैन किया जिनका हाल ही में प्यार शुरू हुआ, जिनका प्रेम संबंध लंबे समय से चला आ रहा है और जिनको हाल ही में प्यार में हार मिली है। इस अध्ययन में अरोन ने पाया कि प्यार का अहसास दिमाग के डोपामाइन-पुरस्कार प्रणाली को विकसित और संचालित कर देता है। डोपामाइन एक शक्तिशाली न्यूरो ट्रांसमीटर है जो लोगों को खुशी का अहसास कराता है और भरपूर प्रेरणा देता है। इसके अलावा चैपल हिल की नार्थ कोरोनिया यूनिवर्सिटी के अध्ययन के अनुसार यह भी पाया गया कि गले लगाने और हाथ थामने से शरीर में ऑक्सीटोसिन हारमोन का अधिक स्राव होता है। यह हारमोन शरीर को थकाने और अवसादग्रस्त करने वाले हारमोनों को कम करता है। यह रक्तचाप को नियंत्रित कर कम करता है। मूड सही करता है और दर्द सहने की ताकत भी देता है। 
अगर आप प्यार में होने से खुशहाल हैं तो आपकी सेहत के लिए इसके और भी फायदे हैं। यानी आपकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाएगी और रोजमर्रा की सर्दी-जुकाम की शिकायतें भी दूर हो जाएंगी। पिट्सबर्ग की मैलन यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार खुशी और उत्साह की सकारात्मक भावनाओं के चलते इंसान अधिक सहज और सुरक्षित महसूस करता है। इतना ही नहीं ऐसे समय में उसे सर्दी आदि की तकलीफ भी नाममात्र को ही होती है। खुशहाल शादी में शरीर पर लगी कोई भी चोट अपेक्षाकृत जल्दी ठीक हो जाती है। 2005 में की गई ओहियो यूनिवर्सिटी के अध्ययन के अनुसार जो प्रेमी जोड़े आपस में तीस मिनट तक प्रेमपूर्वक बात करते हैं और एक-दूसरे का सहारा बनते हैं उनके जख्म भरने में अपेक्षाकृत एक दिन कम लगता है(दैनिक जागरण,दिल्ली,वैलेंटाईन डे,2011)।

आगे चलें...

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

प्यार की फिजिक्स और केमिस्ट्री

वैलेंटाईन डे स्पेशल
इस ब्रह्मांड में कुछ भी फिजिक्स और केमेस्ट्री के नियमों से बाहर नहीं है, प्यार भी। मदन के तीर की नोक अगर फिनाइलइथेलामाइन के मारक रस में न डूबी होती वह असरहीन साबित होता। ऑक्सीटोसीन हारमोन न होता तो रोमियो-जूलिएट अथवा हीर-राँझा जैसे किस्से मशहूर ही नहीं हुए होते। इन रसायनों के अणुओं की जमावट पर हुई नई खोजों ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों को उत्तेजित कर रखा है। बीते जमाने के कीमियागर जिस तरह "प्रेम रसायन" के शर्तिया नुस्खे दिया करते थे, अब वैसा करना संभव हो सकेगा। अब इन रसायनों को औषधियों के रूप में बनाना आसान होता जा रहा है। हो सकता है कि कल बाजार में ऐसे कैप्सूल मिलने लगें जिसे खाने या खिलाने के बाद किसी को भी अपने प्रेमपाश में बाँधा जा सकता है। प्रकृति से छेड़छाड़ के भयावह पहलुओं से सीधे नज़रें न मिलाते हुए यदि गौर करें तो इन औषधियों से दुनिया कितनी रंगीन हो सकेगी। मानसिक रोगियों के लिए इस तरह की दवा वरदान साबित हो सकती है लेकिन क्या जिन लोगों के मस्तिष्क में रासायनिक गड़बड़ियां हों वे "ठीक" किये जा सकते हैं? क्या सभी कुछ चंद रसायनों या हार्मोन्स की वजह से हो रहा है? शायद हां,या नहीं भी,क्योंकि आज हम भी ठीक से नहीं जानते कि किशोरावस्था के आवेग में क्यों किसी से प्रेम हो जाता है। संभवतः,यह प्रेम की वह पहली अवस्था है जब किसी से असहनीय प्रेम हो जाता है। प्लूटोनिक लव जैसी कोई अवस्था इसी दौर में पैदा होती है और स्वतः खत्म हो जाती है। हम यह आज तक नहीं जान पाए हैं कि जिसके प्रेम में हम पागल हुए जा रहे हैं,उसके मस्तिष्क में भी वैसे ही रासायनिक परिवर्तन हो रहे हैं या नहीं। एकतरफा प्रेम के लिए कौन सा रसायन जिम्मेदार है? प्रेम रसायन की अवधारणा कई प्रश्नों के उत्तर नहीं दे पातीःमसलन,वे कौन से रसायन हैं जिनके दम पर पालक ताउम्र अपने बच्चों से प्रेम करते रहते हैं? प्रेम,क्रोध,वासना,घृणा आदि भावनाएं आती-जाती रहती हैं। जिनसे कभी हम प्रेम करते थे,उन्हीं से हमेशा के लिए या कुछ समय के लिए नफरत क्यों करने लगते हैं? रसायन हमारे जीवन को नियंत्रित नहीं कर सकते। किसी के लिए हम अपने दिल के दरवाजे खोलें या नहीं,यह विकल्प हमारे पास हमेशा मौजूद रहता है। विकल्प होने की यही स्वतंत्रता हमें इंसान बनाती है। विवेक ही है जो हमें भावनाओं के तूफानी दौर में संतुलित रखता है। केमिकल रिएक्शन तो दिमाग में आती-जाती रहती है(संपादकीय,सेहत,नई दुनिया,फरवरी द्वितीयांक 2011)।
यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही एक अजीब सा अहसास होने लगता है। कोई प्यारा सा हमउम्र अच्छा लगने लगता है, कोई हमें देखे यह भावना उठने लगती है। कोई चाहने लगे तो पेट में तितलियाँ उड़ने लगती हैं। यह अहसास प्रकृति की अनुपम भावना है जो किशोरावस्था से शुरू होकर जीवन पर्यंत बनी रहती है। इस अवस्था में शरीर में स्थायी परिवर्तन होते हैं। हारमोन्स का प्रबल वेग भावनात्मक स्तर पर अनेक झंझावत खड़े कर देता है। प्यार, संवेदना, लगाव, वासना, घृणा और अलगाव की विभिन्न भावनाएँ कमोबेश सभी के जीवन में आती हैं। यह सब क्या है? क्यों होता है? क्या प्यार की भी कोई केमेस्ट्री है? चिकित्सा विज्ञान मानता है कि मानव शरीर प्रकृति की एक जटिलतम संरचना है। इसे नियंत्रित करने के लिए स्नायु तंत्र (नर्वस-सिस्टम) का एक बड़ा संजाल भी है जो स्पर्श, दाब, दर्द की संवेदना को त्वचा से मस्तिष्क तक पहुँचाता है। किशोरावस्था में विशिष्ट रासायनिक तत्व निकलते हैं जो स्नायुतंत्र द्वारा शरीर के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचते हैं। इन्हीं में शामिल प्यार के कई रसायन भी हैं जो उम्र के विभिन्न पड़ावों पर इसकी तीव्रता या कमी का निर्धारण करते हैं। प्यार की तीन अवस्थाएँ हैं।

आकर्षण

वासना की तीव्रतर उत्कंठा के बाद आकर्षण या प्रेम का चिरस्थायी दौर प्रारंभ होता है जो व्यक्ति में अनिद्रा, भूख न लगना, अच्छा न लगना, प्रेमी को तकते रहना, यादों में खोए रहना, लगातार बातें करते रहना, दिन में सपने देखना, पढ़ने या किसी काम में मन न लगना जैसे लक्षणों से पीड़ित कर देता है। इस अवस्था में डोपामिन, नॉर-एपिनेफ्रिन तथा फिनाइल-इथाइल-एमाइन नामक हारमोन रक्त में शामिल होते हैं। डोपामिन को "आनंद का रसायन" भी कहा जाता है क्योंकि यह "परम सुख की भावना" उत्पन्न करता है। नॉर-एपिनेफ्रिन नामक रसायन उत्तेजना का कारक है जो प्यार में पड़ने पर आपकी हृदय गति को भी तेज कर देता है। डोपामिन और नॉर-एपिनेफ्रिन मन को उल्लास से भर देते हैं। इन्हीं हारमोनों से इंसान को प्यार में ऊर्जा मिलती है। वह अनिद्रा का शिकार होता है।प्रेमी को देखने या मिलने की अनिवार्य लालसा प्रबल होती जाती है। वह सारा ध्यान प्रेमी पर केंद्रित करता है। इसके अतिरिक्त डोपामिन एक अत्यंत महत्वपूर्ण हार्मोन "ऑक्सीटोसिन" के स्राव को भी उत्तेजित करता है। जिसे "लाड़ का रसायन" (स्पर्श) कहा जाता है। यही ऑक्सीटोसिन प्रेम में आलिंगन, शारीरिक स्पर्श, हाथ में हाथ थामे रहना, सटकर सोना, प्रेम से दबाना जैसी निकटता की तमाम घटनाओं को संचालित और नियंत्रित करता है। इसे "निकटता का रसायन" भी कहते हैं। 

एक और रसायन फिनाइल-इथाइल-एमाइन आपको प्रेमी से मिलने के लिए उद्यत करता है। साथ ही यह प्यार में पड़ने पर सातवें आसमान के ऊपर होने की संतुष्टिदायक भावना भी प्रदान करता है। इसी रसायन के बलबूते पर प्रेमी-प्रेमिका रात भर बातें करते रहते हैं। नॉर-एपिनेफ्रिन इस अवस्था में एड्रीनेलिन का उत्पादन करता है जो प्रेमी के आकर्षण में रक्तचाप बढ़ाता है। हथेली में पसीने छुड़वा देता है, दिल की धड़कन बढ़ा देता है। शरीर में कंपकंपी भर देता है और कुछ कर गुजरने की आवश्यक हिम्मत भी देता है,ताकि आप जोखिम उठाकर भी अपने प्रेमी को मिलने चल पड़ें। मिट्टी के कच्चे घड़े पर उफनती नदी पारकर मिलने जाने जैसा दुस्साहस इसी हारमोन के कारण आता है। फिनाईल इथाइल एमीन नामक एक और हार्मोन है जिसका स्राव भी मस्तिष्क से ही प्यार की सरलतम घटनाओं के कारण होने लगता है। नज़रें मिलाना,हाथ से हाथ का स्पर्श होना,भावनाओं का उन्माद उत्पन्न होना वगैरह इसी के कारण संभव है। चॉकलेट में फिनाइल इथाइल एमीन या प्यार के रसायन की प्रचुर मात्रा उपस्थित रहती है,इसलिए वेलेंटाईन को प्रेमी चॉकलेट उपहार देते हैं। इसी प्रकार,फूलों का गुलदस्ता भी एक विशिष्ट शारीरिक सुगंध फेरमोन को प्रदर्शित करने का संकेत है। गुलदस्ता एक तरह से इजहारे मोहब्बत का ही प्रतीक है।

वासना/तीव्र लालसा
इस अवस्था में विपरीत लिंगी को देखकर वासना का एक भाव उत्पन्न होता है जो दो तरह के हार्मोन से नियंत्रित होता है। पुरुषों में"टेस्टोस्टेरोन" तथा महिलाओं में "इस्ट्रोजेन" होते हैं। वासना या लालसा का दौर क्षणिक होता है। 

लगाव/अनुराग/आसक्ति
प्यार की इस अवस्था में प्रीति-अनुराग बढ़कर उस स्तर पर पहुँच जाती है कि प्रेमी संग साथ रहने को बाध्य हो जाते हैं। उन्हें किसी अन्य का साथ अच्छा नहीं लगता और "एक में लागी लगन" का भाव स्थापित हो जाता है। इस अवस्था का रसायन है ऑक्सीटोसिन तथा वेसोप्रेसिन। ऑक्सीटोसिन जहाँ "निकटता का हार्मोन" है, वहीं वेसोप्रेसिन प्रेमियों के मध्य लंबे समय तक संबंधों के कायम रखने में अपनी भूमिका निभाता है। वेसोप्रेसिन को "जुड़ाव का रसायन" कहा जाता है । 

शरीर में इन हार्मोन्स तथा रसायनों का आवश्यक स्तर बना रहने से आपसी संबंधों में उष्णता कायम रहती है। शरीर में स्वाभाविक रूप से किशोरावस्था, यौवनावस्था या विवाह के तुरंत पूर्व व बाद में इन रसायनों व हार्मोनस्‌ का उच्च स्तर कायम रहता है। उम्र ढलते-ढलते इनका स्तर घटने लगता है और विरक्ति, विवाहेतर संबंध जैसी प्राकृतिक भूल/गलती घटित हो जाती है। प्यार और यौन-इच्छा की भावना एक साथ जीवन के साथ चलती है। इसीलिए कहा गया है कि प्यार, कमर के ऊपर है और यौनेच्छा कमर के नीचे किंतु दोनों का ही नियंत्रण मस्तिष्क से ही होता है। प्यार अंधा है, प्यार नशा है या प्यार शुद्ध कविता है इसकी विभिन्न व्याख्याएँ उपलब्ध हैं लेकिन इस भावना के महत्व को जीव-रसायन से समझाकर कम नहीं किया जा सकता। प्यार एक शुद्ध रासायनिक कविता है जो प्रेमी को ऊर्जावान, निडर और साहसी बना देती है ताकि वह अपने प्रियतम को प्राप्त कर सके(डॉ. अनिल भदौरिया,सेहत,नई दुनिया,फरवरी,द्वितीयांक 2011)।

आगे चलें...

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

पीलिया और देसी नुस्खा

वायरल हैपेटाइटिस या जोन्डिस को साधारण लोग पीलिया के नाम से जानते हैं। यह रोग बहुत ही सूक्ष्‍म विषाणु(वाइरस) से होता है। शुरू में जब रोग धीमी गति से व मामूली होता है तब इसके लक्षण दिखाई नहीं पडते हैं, परन्‍तु जब यह उग्र रूप धारण कर लेता है तो रोगी की आंखे व नाखून पीले दिखाई देने लगते हैं, लोग इसे पीलिया कहते हैं। जिन वाइरस से यह होता है उसके आधार पर मुख्‍यतः पीलिया तीन प्रकार का होता है वायरल हैपेटाइटिस ए, वायरल हैपेटाइटिस बी तथा वायरल हैपेटाइटिस नान-ए व नान-बी। रोग का प्रसार कैसे? यह रोग ज्‍यादातर ऐसे स्‍थानो पर होता है जहॉं के लोग व्‍यक्तिगत व वातावरणीय सफाई पर कम ध्‍यान देते हैं अथवा बिल्‍कुल ध्‍यान नहीं देते। भीड-भाड वाले इलाकों में भी यह ज्‍यादा होता है। वायरल हैपटाइटिस बी किसी भी मौसम में हो सकता है। वायरल हैपटाइटिस ए तथा नाए व नान बी एक व्‍यक्ति से दूसरे व्‍यक्ति के नजदीकी सम्‍पर्क से होता है। ये वायरस रोगी के मल में होतें है पीलिया रोग से पीडित व्‍यक्ति के मल से, दूषित जल, दूध अथवा भोजन द्वारा इसका प्रसार होता है। ऐसा हो सकता है कि कुछ रोगियों की आंख, नाखून या शरीर आदि पीले नही दिख रहे हों परन्‍तु यदि वे इस रोग से ग्रस्‍त हो तो अन्‍य रोगियो की तरह ही रोग को फैला सकते हैं। वायरल हैपटाइटिस बी खून व खून व खून से निर्मित प्रदार्थो के आदान प्रदान एवं यौन क्रिया द्वारा फैलता है। इसमें वह व्‍यक्ति हो देता है उसे भी रोगी बना देता है। यहॉं खून देने वाला रोगी व्‍यक्ति रोग वाहक बन जाता है। बिना उबाली सुई और सिरेंज से इन्‍जेक्‍शन लगाने पर भी यह रोग फैल सकता है। पीलिया रोग से ग्रस्‍त व्‍यक्ति वायरस, निरोग मनुष्‍य के शरीर में प्रत्‍यक्ष रूप से अंगुलियों से और अप्रत्‍यक्ष रूप से रोगी के मल से या मक्खियों द्वारा पहूंच जाते हैं। इससे स्‍वस्‍थ्‍य मनुष्‍य भी रोग ग्रस्‍त हो जाता है। रोग कहॉं और कब? ए प्रकार का पीलिया तथा नान ए व नान बी पीलिया सारे संसार में पाया जाता है। भारत में भी इस रोग की महामारी के रूप में फैलने की घटनायें प्रकाश में आई हैं। हालांकि यह रोग वर्ष में कभी भी हो सकता है परन्‍तु अगस्‍त, सितम्‍बर व अक्‍टूबर महिनों में लोग इस रोग के अधिक शिकार होते हैं। सर्दी शुरू होने पर इसके प्रसार में कमी आ जाती है। रोग के लक्षण:- ए प्रकार के पीलिया और नान ए व नान बी तरह के पीलिया रोग की छूत लगने के तीन से छः सप्‍ताह के बाद ही रोग के लक्षण प्रकट होते हैं। बी प्रकार के पीलिया (वायरल हैपेटाइटिस) के रोग की छूत के छः सप्‍ताह बाद ही रोग के लक्षण प्रकट होते हैं। पीलिया रोग के कारण - *रोगी को बुखार रहना। *भूख न लगना। *चिकनाई वाले भोजन से अरूचि। *जी मिचलाना और कभी कभी उल्टियॉं होना। *सिर में दर्द होना। *सिर के दाहिने भाग में दर्द रहना। *आंख व नाखून का रंग पीला होना। *पेशाब पीला आना। *अत्‍यधिक कमजोरी और थका थका सा लगना रोग किसे हो सकता है? यह रोग किसी भी अवस्‍था के व्‍यक्ति को हो सकता है। हॉं, रोग की उग्रता रोगी की अवस्‍था पर जरूर निर्भर करती है। गर्भवती महिला पर इस रोग के लक्षण बहुत ही उग्र होते हैं और उन्‍हे यह ज्‍यादा समय तक कष्‍ट देता है। इसी प्रकार नवजात शिशुओं में भी यह बहुत उग्र होता है तथा जानलेवा भी हो सकता है। बी प्रकार का वायरल हैपेटाइटिस व्‍यावसायिक खून देने वाले व्‍यक्तियों से खून प्राप्‍त करने वाले व्‍यक्तियों को और मादक दवाओं का सेवन करने वाले एवं अनजान व्‍यक्ति से यौन सम्‍बन्‍धों द्वारा लोगों को ज्‍यादा होता है। रोग की जटिलताऍं:- ज्‍यादातार लोगों पर इस रोग का आक्रमण साधारण ही होता है। परन्‍तु कभी-कभी रोग की भीषणता के कारण कठिन लीवर (यकृत) दोष उत्‍पन्‍न हो जाता है। बी प्रकार का पीलिया (वायरल हैपेटाइटिस) ज्‍यादा गम्‍भीर होता है इसमें जटिलताएं अधिक होती है। इसकी मृत्‍यु दर भी अधिक होती है। उपचार:- *रोगी को शीघ्र ही डॉक्‍टर के पास जाकर परामर्श लेना चाहिये। *बिस्‍तर पर आराम करना चाहिये घूमना, फिरना नहीं चाहिये। *लगातार जॉंच कराते रहना चाहिए। *डॉक्‍टर की सलाह से भोजन में प्रोटिन और कार्बोज वाले प्रदार्थो का सेवन करना चाहिये। *नीबू, संतरे तथा अन्‍य फलों का रस भी इस रोग में गुणकारी होता है। *वसा युक्‍त गरिष्‍ठ भोजन का सेवन इसमें हानिकारक है। *चॉवल, दलिया, खिचडी, थूली, उबले आलू, शकरकंदी, चीनी, ग्‍लूकोज, गुड, चीकू, पपीता, छाछ, मूली आदि कार्बोहाडेट वाले प्रदार्थ हैं इनका सेवन करना चाहिये। रोग की रोकथाम एवं बचाव *पीलिया रोग के प्रकोप से बचने के लिये कुछ साधारण बातों का ध्‍यान रखना जरूरी हैः- *खाना बनाने, परोसने, खाने से पहले व बाद में और शौच जाने के बाद में हाथ साबुन से अच्‍छी तरह धोना चाहिए। *भोजन जालीदार अलमारी या ढक्‍कन से ढक कर रखना चाहिये, ताकि मक्खियों व धूल से बचाया जा सकें। *ताजा व शुद्व गर्म भोजन करें दूध व पानी उबाल कर काम में लें। *पीने के लिये पानी नल, हैण्‍डपम्‍प या आदर्श कुओं को ही काम में लें तथा मल, मूत्र, कूडा करकट सही स्‍थान पर गढ्ढा खोदकर दबाना या जला देना चाहिये। *गंदे, सडे, गले व कटे हुये फल नहीं खायें धूल पडी या मक्खियॉं बैठी मिठाईयॉं का सेवन नहीं करें। *स्‍वच्‍छ शौचालय का प्रयोग करें यदि शौचालय में शौच नहीं जाकर बाहर ही जाना पडे तो आवासीय बस्‍ती से दूर ही जायें तथा शौच के बाद मिट्टी डाल दें। *रोगी बच्‍चों को डॉक्‍टर जब तक यह न बता दें कि ये रोग मुक्‍त हो चूके है स्‍कूल या बाहरी नहीं जाने दे। *इन्‍जेक्‍शन लगाते समय सिरेन्‍ज व सूई को 20 मिनट तक उबाल कर ही काम में लें अन्‍यथा ये रोग फैलाने में सहायक हो सकती है। *रक्‍त देने वाले व्‍यक्तियों की पूरी तरह जॉंच करने से बी प्रकार के पीलिया रोग के रोगवाहक का पता लग सकता है। *अनजान व्‍यक्ति से यौन सम्‍पर्क से भी बी प्रकार का पीलिया हो सकता है। *यदि आपके क्षेत्र में किसी परिवार में रोग के लक्षण वाला व्‍यक्ति हो तो उसे डॉक्‍टर के पास जाने की सलाह दें। *क्षेत्र में व्‍यक्तिगत सफाई व तातावरणीय स्‍वच्‍छता के बारे में बताये तथा पंचायत आदि से कूडा, कचरा, मल, मूत्र आदि के निष्‍कासन का इन्‍तजाम कराने का प्रयास करें। *रोगी की देखभाल ठीक हो, ऐसा परिवार के सदस्‍यों को समझायें। *रोगी की सेवा करने वाले को समझायें कि हाथ अच्‍छी तरह धोकर ही सब काम करें। *स्‍वास्‍थ्‍या कार्यकर्ता सीरिंज व सुई 20 मिनिट तक उबाल कर अथवा डिसपोजेबल काम में लें। *रोगी का रक्‍त लेते समय व सर्जरी करते समय दस्‍ताने पहनें व रक्‍त के सम्‍पर्क में आने वाले औजारों को अच्‍छी तरह उबालें। *रक्‍त व सम्‍बन्धित शारीरिक द्रव्‍य प्रदार्थो पर कीटाणुनाशक डाल कर ही उन्‍हे उपयुक्‍त स्‍थान पर फेंके अथवा नष्‍ट करें। यह तो रही राजस्थान सरकार के चिकित्सा,स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग द्वारा दी गई बुनियादी जानकारी। अमूमन, पीलिया के रोगी को अपना खानपान बहुत नियंत्रित रखना पड़ता है और चित्त अवस्था में अधिकतम विश्राम की सलाह दी जाती है। आज दैनिक भास्कर के जालंधर संस्करण में सुखविंदर पिरदी ने अपनी रिपोर्ट में एक ऐसे शख्स का ज़िक्र किया है,जो देसी तरीक़े से इसके इलाज़ का दावा करता है। यद्यपि रिपोर्ट में कई व्यक्तियों के ठीक होने का हवाला भी दिया गया है,यह कहना मुश्किल है कि यह विधि प्रामाणिक है या नहीं। पूरी रिपोर्ट आप भी पढ़िएः
जालंधर के गांव दूहड़े के निवासी परविंदर सिंह एक ऐसे शख्स है जो पीलिए जैसी घातक बीमारी का देसी नुस्खे से मुफ्त इलाज कर हजारों मरीजों को ठीक कर चुके है। पेशे से ड्राइवर परविंदर का दावा है कि उनके द्वारा किए इलाज के बाद मरीज कुछ दिनों में बिलकुल ठीक-ठाक हो जाता है।
ऐसे किया जाता है इलाज
परविंदर न जादू मंत्र या न ही जड़ी बूटी से इलाज करता है। इलाज के लिए सिर्फ दो अखबारों से मोमबत्ती की सहायता से ढ़ाई से तीन फीट लंबी कोण बनाई जाती है। कोण मरीज के कान पर रख कर चारों तरफ कपड़ा रख घुमाया जाता है। बाद में उपरी सिरे पर कोण को आग लगा दी जाती है। करीब 15 मिनट कोण जलकर मरीज के कान से पांच इंच तक आ जाती है। तब कोण कान से हटा ली जाती है।
इसके बाद मरीज के कान पर बड़ी मात्रा में पीलिए की परत अपने-आप जम जाती है। मरीज को तीन दिन में दो बार इस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है और पीलिया जड़ से खत्म हो जाता है। इलाज करवा चुके सर्बजीत भट्टी, दीपक कश्यप, बलबीर सिंह, कमलजीत साबी, रामपाल, इकबाल सिंह ने बताया कि इलाज के दौरान कोई तकलीफ नहीं होती। लोगों ने बताया कि यह जरूरी नहीं इलाज के लिए परविंदर के घर जाना पड़ता है। यहां मरीज मिले परविंदर वहीं अखबार का कोण बनाकर इलाज शुरू कर देता है।
परविंदर ने बताया कि करीब 20 साल पहले जब ड्राइवरी सीख रहा था तब उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में एक ढाबे पर खाना खाने के लिए रुकते थे। वहां एक संन्यासी इसी नुस्खे से मरीज का इलाज कर रहा था। बहुत मिन्नतें करने पर सन्यासी ने शर्त रखी कि इलाज के लिए किसी से पैसा नहीं लेगा, तभी नुस्खा सिखाएगा। शर्त पर अमल करते हुए तब से परविंदर नुस्खे से मुफ्त इलाज करते हैं।

आगे चलें...

सोमवार, 22 मार्च 2010

शादी के बाद कमर की साइज

शादी करने के बाद लोगों की जिंदगी में कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं। वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पाया है कि शादी के बाद पुरूषों और महिलाओं के वजन में इजाफा होता है। उनके अनुसार पुरूषों में शादी के बाद अविवाहित पुरूषों की तुलना में पेट का घेरा बढने के चांस जहां तीन गुना ज्यादा होते हैं, वहीं शादीशुदा महिलाओं में कुंवारी लडकियों की अपेक्षा ऎसा होने की संभावना लगभग दोगुनी अधिक होती है।

हैलेनिक मेडिकल एसोसिएशन फॉर ओबेसिटी के निष्कर्षो में सामने आया है कि शादीशुदा युगलों में एबडोमिनल ओबेसिटी के मामले सेहत से जुडी सबसे बडी चुनौती के रूप में सामने आते हैं। इस अध्ययन में 20 से 70 आयुवर्ग के 17341 लोगों को शामिल किया गया। एसोसिएशन के प्रेसीडेंट डिमिट्रिस कायॉर्टसिस ने इसके परिणामों का जिक्र करते हुए मजाकिया अंदाज में कहा कि यदि आप  किसी को शादी के अवसर पर उपहार का चयन करने में असमंजस अनुभव कर रहे हों, तो स्लिमिंग कोर्स पर विचार करना आपकी इस दुविधा को आसान बना सकता है।

एक्सरसाइज कम, आराम ज्यादा
शोधकर्ताओं के अनुसार विवाहित पुरूषों और महिलाओं में कमर के इर्द-गिर्द वजन बढने के मामले ज्यादा सामने आते हैं। इसके पीछे अहम कारण उनकी जीवनशैली को माना जा सकता है। अक्सर देखने को मिलता है कि कपल्स कई घंटे टेलीविजन कार्यक्रमों को देखने में बिताते हैं। वे कई बार देर तक खाना खाते भी देखे जाते हैं। परिणाम यह होता है कि उनका वजन बढने लगता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि एक्टिव सेक्स लाइफ का अभाव भी बढते वजन के पीछे  विशेष वजह हो सकता है। एथेंस में हुई कॉन्फे्रंस के दौरान ओबेसिटी एक्सपर्ट प्रोफेसर कायॉर्टसिस ने बताया कि शादी के बाद पुरूषों और महिलाओं का एक्सरसाइज के लिए रूझान कम ही पाया जाता है। उन्होंने कहा कि जब तक किसी की शादी नहीं होती है, तब तक अच्छे जीवनसाथी की तलाश को ध्यान में रखते हुए लडके और लडकियां अपने को फिट बनाने की कवायद में मशगूल रहते हैं। लेकिन शादी के बाद वे एक्सरसाइज और संतुलित खान-पान में रूचि नहीं दिखाते। हालांकि उन्होंने शादीशुदा जिंदगी के सकारात्मक पक्षों की ओर भी ध्यान खींचा। उन्होंने बताया कि यदि आपके अपने साथी से रिश्ते काफी मजबूत और खुशहाल हैं, तो इससे तनाव में निश्चित रूप से कमी देखने को मिलती है।
(राजस्थान पत्रिका,22 मार्च,2010)

आगे चलें...

क्या बनना चाहेंगे आपः साढे तीन साल में डाक्टर या चार साल में नर्स?


आगे चलें...

गुरुवार, 18 मार्च 2010

दिल्ली के रेस्तरां मे नवरात्र की थाली

भक्ति पर आस्था रखने वालों के लिए नवरात्र व्रत साल में दो बार आता है और हर बार शहर के रेस्तरां इसके लिए कुछ विशेष तैयारी करते हैं । इस बार भी कुछ खास इंतजाम किए गए हैं।
व्रत का खाना होता ही इतना लजीज है कि जिसने व्रत नहीं भी रखा, उसे भी यह खाना देख मुंह में पानी आ जाता है । मन कहता है कि काश उसने भी व्रत रखा होता। यूं तो खाने-पीने के मामले में दिल्ली का कोई जवाब नहीं, पर किसी खास अवसर के लिए दिल्ली के रेस्तरां हमेशा ही तैयार रहते हैं । मौका हो नवरात्र जैसे अवसर का तो रेस्तरां भला पीछे कैसे रहेंगे। भक्ति पर आस्था रखने वालों के लिए यह व्रत साल में दो बार आता है और हर बार रेस्तरां इसके लिए कुछ विशेष तैयारी करते हैं । वैसे ऐसा माना जाता है कि व्रत के दिनों में भूख अधिक लगने लगती है और रोजमर्रा के मुकाबले व्रत के दिनों में खाया भी अधिक जाता है । इसी को ध्यान में रखते हुए कई रेस्तरां में खास व्रत की थाली रखी गई है । यूं तो बाजार में व्रत के खाने का बहुत सामान उपलब्ध है लेकिन रेस्तरां की बात ही अलग है । चलिए अगर आपका इन नवरात्रों में घर में खाना बनाने का मन न करे और व्रत के समय आप कुछ खास खाना चाहें तो बताते हैं आपको कुछ रेस्तरां की व्रत की थाली के बारे में ।
रेस्तरां जेपी सिद्धार्थ और जेपी वसंत कॉन्टीनेंटल में नवरात्र के दिनों में खास थाली का इंतजाम किया गया है । २४ मार्च तक चलने वाले इन नवरात्रों में इस रेस्तरां की थाली में शामिल हैं शकरकंदी की चाट, आलू रसेदार, कच्चे केले के कोफ्ते, व्रत के चावल, खीरे का रायता, कुट्टू की पूड़ी, कुट्टू के पकौड़े, साबूदाने की टिक्की, व्रत के पापड़, मखाने की खीर। इसके अलावा पनीर मखानी, पालक पनीर, पालक आलू, भिंडी मसाला, जीरा आलू, सीताफल की सब्जी, दाल तड़के वाली । थाली की कीमत रहेगी ८५० रुपए । समय सुबह १२ बजे से ३ बजे तक । इंडिया हैबिटेट सेंटर के फूड कोर्ट में भी आप २३ मार्च तक नवरात्र के खाने का मजा उठा सकते हैं। यहां की नवरात्र थाली में शामिल है कुट्टू की रोटी या पूड़ी , दही वाले आलू, खीरा-टमाटर रायता, केसर की खीर, पापड़ । थाली की कीमत है एक व्यक्ति के लिए १२० रुपए । आप चाहें तो संपर्क भी कर सकते हैं ०११४३६६३१५६।
साउथ एक्सटेंशन-२, लेवल-३ की गारमेंट गैलरी में भी नवरात्र के लिए खास थाली रखी गई है जिसमें कुट्टू की रोटी, सिंघाड़े की पूड़ी, आलू का रायता, साबूदाने की खीर आदि बहुत कुछ शामिल है। थाली की कीमत है २५० रुपए । समय दोपहर १२ बजे से रात १२ बजे तक ।
होटल क्लैरिजिस के ढाबा रेस्तरां में भी नवरात्र की खास थाली में शामिल है काजू और गोभी की सब्जी, पनीर, साबूदाने की खीर, कुट्टू की पूड़ी, ड्राई फ्रूट आदि। कीमत दो व्यक्तियों के लिए १ हजार रुपए । समय दोपहर १२.३० से २.३० और शाम ७.३० से ११.४५ तक ।
(पूजा डबास,मेट्रो रंग,नई दुनिया,दिल्ली,18.3.2010)

आगे चलें...

इधर खुले मे शौच और उधर मंगल पर बसने की तमन्ना

शौचालय सभ्यता के विकास का हिस्सा रहे हैं। यह विकास की न्यूनतम शर्त भी मानी जा सकती है। मगर आज पढिए दो अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्ट परनई दुनिया का संपादकीयजो इकाई और दहाई अंकों की विकास दर के दावे की पोल खोलता हैः
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) तथा संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि हिंदुस्तान ऐसे देशों का सरगना है जहां खुले में लोग शौच जाते हैं क्योंकि उन्हें शौचालय की सामान्य सुविधाएं हासिल नहीं हैं। दुनिया में जितने लोग खुले में शौच जाते हैं उनमें से ५८ प्रतिशत भारतीय हैं। गांवों में तो यह प्रतिशत बढ़कर ६९ तक हो जाता है। २००८ के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में आज भी एक अरब दस करोड़ लोग खुले में शौच करते हैं। इनमें से सबसे ज्यादा ४४ प्रतिशत दक्षिण एशियाई देशों में हैं। भारत में ये ६४ करोड़ हैं। दुनिया के कुल ११ देशों में ८१ प्रतिशत आबादी शौच की उचित सुविधा से वंचित है जिनमें भारत और उसके चार पड़ोसी देश चीन, पाकिस्तान, नेपाल तथा बांग्लादेश भी शामिल हैं। वैसे भारत के बाद इस मामले में इंडोनेशिया तथा चीन का नंबर आता है लेकिन इन दोनों देशों में ऐसे लोगों की संख्या भारत की तुलना में बहुत कम है। इंडोनेशिया में ५.८ करोड़ हैं तथा चीन में पांच करोड़। जाहिर है कि खुले में शौच जाने की अपनी स्वास्थ्यगत गंभीर समस्याएं हैं जिनमें दस्त लगना (डायरिया होना) तथा अंतड़ी संबंधी रोग होना शामिल है। खासतौर पर हमारे जैसे देश में स्त्रियों के लिए यह समस्या अधिक विकट है जो खुले में हर समय शौच नहीं जा सकतीं। उन्हें जबर्दस्ती अपने शरीर पर अत्याचार करना पड़ता है जिससे औरतें कई गंभीर बीमारियों की शिकार हो जाती हैं। हमारे शहरों की हालत गांवों से वैसे काफी ठीक है मगर शहरी आबादी का वह हिस्सा- जो झुग्गी-झोपड़ियों में रहता है- इस सामान्य, मानवीय सुविधा से वंचित है। अनुमान है कि शहरों के १८ प्रतिशत लोग इन वंचितों में शामिल हैं। फिर हमारे ज्यादातर शहरों-कस्बों में सार्वजनिक शौचालयों की देखभाल इतनी खराब है कि चाहकर भी उनका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अनेक सार्वजनिक स्थलों पर तो स्त्रियों के लिए ऐसी नाममात्र की सुविधा तक नहीं है। अभी तक संसद भवन में ऐसी सुविधा नहीं थी महिला सांसदों-कर्मियों के लिए। ६० साल के बाद इस जरूरत की पूर्ति पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार कर रही हैं। हम वैश्वीकरण पर, नई अर्थव्यवस्था पर, आर्थिक प्रगति की दर पर गौरव करते हैं मगर हमारे यहां साफ-सुथरे शौचालयों का घरों तथा सार्वजनिक स्थलों में भयानक अभाव है।
(नोटः इस पोस्ट की चर्चा श्री महेंद्र मिश्र जी ने समयचक्र ब्लॉग पर की है जिसे यहां देखा जा सकता है)

आगे चलें...

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

गिफ्ट बंद,नकदी चालू


आगे चलें...

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

ट्रेन में प्रसूति आरक्षण

(हिंदुस्तान,पटना,15.2.10)
आगे चलें...

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

डाक्टर पर आरोप लगाने से पहले......

ख़ासकर मरीज की मौत के बाद,डॉक्टर पर लापरवाही बरतने के बढ़ते आरोपों में से कई पूर्वाग्रहग्रस्त साबित हुए हैं। इसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि ठोस सबूत हों,तभी ऐसे आरोप लगाए जाने चाहिए। देखिए इस विषय पर आज के नई दुनिया,दिल्ली संस्करण में प्रकाशित रिपोर्टः
आगे चलें...

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

सरकारी अस्पताल में पांच रुपए में बना पाएंगे खाना

सरकारी अस्पतालों में स्थापित किए जाने वाले ‘सांझा-चूल्हा’ का इस्तेमाल करने के लिए लोगों को पांच रुपए प्रति घंटा का भुगतान करना पड़ सकता है। पेट्रोलियम मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, अस्पताल में गरीब लोग दूर-दराज के इलाकों से इलाज के लिए आते हैं। ऐसे में उनके लिए बाजार से महंगा खाना खरीदना काफी मुश्किल होता है। इसे ध्यान में रखकर मंत्रालय सरकारी अस्पतालों में लगाए जाने वाले सांझा-चूल्हों में खाना बनाने के लिए पांच रुपए प्रति घंटा की दर तय करने पर विचार कर रहा है।

क्या है सांझा चूल्हा

दरअसल, पेट्रोलियम मंत्रालय ने अस्पतालों, रैन बसेरों और धर्मशालाओं मंे सिलेंडर और गैस चूल्हे देकर ऐसी रसोई बनाने का कार्य शुरू किया है, जहां कोई भी एक निश्चित रकम देकर एक निश्चित अवधि के लिए उनका उपयोग कर सकता है। सूत्रों के मुताबिक, पेट्रोलियम राज्य मंत्री जितिन प्रसाद हाल ही में किसी सरकारी अस्पताल गए थे। वहां उन्होंने देखा कि लोग स्टोव पर खाना पका रहे हैं। उन्होंने बताया गया कि ये लोग दूर-दराज से आए हैं। इनके पास इतने पैसे नहीं है कि अपने व बीमार के लिए हर दिन बाजार से खाना खरीद पाएं। इसकी वजह से वे ऐसा कर रहे हैं। उन्हें यह भी बताया गया कि मिट्टी के तेल के लिए ऐसे लोगों को खासा भटकना पड़ता है और दुकानदारों से महंगी दर पर खरीदारी करनी पड़ती है। इसके बाद उन्होंने अस्पतालों में ऐसे चूल्हों को स्थापित करने की सलाह अधिकारियों को दी। सूत्रों के मुताबिक, पेट्रोलियम राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने इस योजना की पहल की है। इस समय दिल्ली के एम्स में ऐसा ही एक चूल्हा चल रहा है।

(दैनिक भास्कर,दिल्ली संस्करण,5.2.10 में संतोष ठाकुर की रिपोर्ट)


आगे चलें...

सुपर हंड्रेड

आज कई समाचारपत्रों में लंदन से जारी खबर के हवाले से कहा गया है कि एक ऐसी गोली बनाई जा रही है, जो आपको 100 साल से अधिक समय तक स्वस्थ रख सकेगा। कुछ समय पहले तीन जीन्स खोजे गए थे। इनमें से दो जीन्स दिल की बीमारी व स्ट्रोक होने से बचाते हैं, वहीं तीसरा जीन्स डायबिटीज के खतरे को कम करता है। यह गोली इन तीन जीन्स जैसा प्रभाव पैदा करेगी। गोली का परीक्षण तीन साल बाद शुरू हो जाएगा। इसी विषय पर आज नईदुनिया के दिल्ली संस्करण में प्रकाशित यह संपादकीय पढिएः-

आगे चलें...

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

सेहत के लिए चाहिए गाय नहीं,भैंस का दूध

(हिंदुस्तान,पटना,4.2.10)
आगे चलें...