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"ऐसा नहीं कहा जा सकता कि आप फलां तरीक़े से स्वस्थ हैं और वो अमुक तरीक़े से। आप या तो स्वस्थ हैं या बीमार । बीमारियां पचास तरह की होती हैं;स्वास्थ्य एक ही प्रकार का होता है"- ओशो
गुरुवार, 17 जनवरी 2013
आप कैसे तोड़ते हैं रोटी?
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गुरुवार, 30 अगस्त 2012
औषधि है 'सॉरी'
आस्ट्रेलिया में तो बच्चों की शिक्षा पर दिए जाने वाले समय का एक बड़ा हिस्सा सॉरी का महत्व सिखाने में बीतता है। वहां अच्छी आदतों के लिए भी सॉरी कहने का चलन है। मसलन,यदि कोई बिल्कुल समय पर पहुंचे,तो कहेगाःI am sorry to be so punctual.सॉरी कहने से ज़्यादा ज़रूरी है उसे महसूस करना। किंतु,अगर आपने ग़लती की है तो सॉरी कहना ही चाहिए- अगर आप दिल से इसे न कहना चाहें,तब भी कहें क्योंकि आपके इस एक शब्द से तुरंत ही सामने वाले के घाव पर मरहम लग जाता है। सॉरी कहने का मतलब है कि आप अहं का त्याग कर रहे हैं और आपके लिए संबंधों की अहमियत है। सॉरी कहना अगर लोग जानते तो कितनी ही शादियां बचाई जा सकती थीं। इन्हीं तमाम पहलुओं पर,नई दुनिया के नायिका परिशिष्ट में 29 अगस्त,2012 को प्रकाशित संध्या रायचौधरी का आलेख(आशोधित रूप में) देखिएः
"सॉरी या माफ कीजिएगा, कहने के लिए बहुत आसान और सहज शब्द/ वाक्याँश हैं। हम कहना चाहते हैं, लेकिन कह नहीं पाते, क्योंकि जितना आसान इन्हें उच्चारना होता है, "कहना" उतना ही मुश्किल होता है । अपना सारा अहं भूलकर, मिटाकर ही इन्हें कहा जा सकता है, पर कह देने के बाद बहुत तरल और हल्का महसूस हुआ करता है। कहने को ये शब्द बहुत छोटे हैं, लेकिन माफी, सॉरी या प्लीज़ जैसे शब्द घावों को भरने का काम करते हैं। "अवर जर्नी टू वि़ज़्डम" जैसी किताब की लेखिका कैरोल आर्सबोर्न के अनुसार शर्म, बेइज्जती, माफी आदि पर सालों से शोध चल रहा है कि इन शब्दों में आखिर ऐसा कौन सा राज छुपा है जो अद्भुत तरीके से दूरियों को मिटा देता है।" कई बार इसके चमत्कारिक परिणाम देखे गए हैं क्योंकि यही वह शब्द है जिससे घृणा-चक्र टूटता है और जिसकी बदौलत कुछ एकदम ब्रांड-न्यू सामने आ सकता है।
प्लीज़ शब्द में है जादुई शक्ति
वास्तव में क्षमा माँग लेने के लिए भी साहस की जरूरत है। यह ईमानदारी भरा काम है, क्योंकि हमें यह स्वीकारने में कि हम गलत हैं, बहुत समय लगता है, बहुत सोचना पड़ता है और मन का द्वंद्व अनवरत चलता रहता है। लेकिन सॉरी कहने के बाद हमारे आपसी रिश्तों में नई उम्मीद जागती है। यह समर्पण का काम है क्योंकि यह आपको चीजों को बनाए रखने में मदद करता है और संबंधों को मजबूती प्रदान करता है। ब्रिटिश मनोचिकित्सक डेलिस अब्राम के अनुसार सॉरी कहना बेहद मुश्किल है। यह आपके अहम से जुड़ा होता है। आप गलत हैं और अपने व्यवहार के लिए शर्मिंदा हैं, यह अहसास आपको शर्मिंदगी से भर देता है। लेकिन सही मौका, सही समय, साहस और दिल से माँगी गई माफी आपको अपराधबोध से मुक्त कर राहत की साँस लौटाती है। बैंगलुरू के रिलेशनशिप एक्सपर्ट डॉ. बाबूजी राम, सॉरी को लेकर बहुत ही अच्छी व्याख्या करते हैं। उनके अनुसार जश्न के मौके हमेशा लोगों को करीब लाते हैं। माफी और सॉरी बोलने के लिए किसी खास आयोजन का समय सबसे अच्छा होता है। इसके लिए दीपावली, होली या नए साल का विशेष अवसर सबसे अच्छा मौका देता है, क्योंकि त्योहारों की खुशियों में आसानी से मतभेदों को भुलाया जा सकता है, एक-दूसरे के गले मिला जा सकता है । बाकी फिर हमारी संवेदनाएँ अपने आप जुड़ ही जाती हैं।
कनाडाई लेखिका मारग्रेट लॉरेंस के अनुसार विदेशों में प्लीज शब्द को जादुई शब्द के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। ब्रिटेन में लोग एक दिन में आठ बार सॉरी बोलते हैं यानी साल में लगभग २९२० बार और जीवन भर में लगभग ३० लाख बार सॉरी बोलते हैं। कई बार तो उनकी गलती नहीं भी होती है फिर भी वे सॉरी कहकर सामने वाले को एक पल में हक्का-बक्का कर देते हैं।
रिश्ते में आ जाती है मिठास
"सॉरी" बोलना भी एक कला है जो हर किसी को नहीं आती। हमें पता ही नहीं होता कि सॉरी बोलें तो कैसे? हम कई बार सॉरी बोलते हुए काफी असहज महसूस करते हैं। लेकिन सॉरी बोलने से आत्मा तो पवित्र होती ही है, साथ ही मन की पीड़ा भी दूर हो जाती है। सॉरी बोलने का सही तरीका आपके जीवन में आने वाली अनेक कठिनाइयों को दूर कर सकता है जिससे काफी हद तक रिश्तों में आई कड़वाहट कम हो सकती है। हम सॉरी बोलने से केवल इसलिए कतराते हैं कि कहीं हम गलत साबित न हो जाएँ, लेकिन ऐसा नहीं है। जब हम सॉरी बोलते हैं तो वास्तव में हम महानता की ओर बढ़ते हैं।
छोटों से माफी माँगने में कैसी शर्म?
कई माता-पिता सोचते हैं कि बच्चों से माफी मांगने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि वे बड़े हैं और इसलिए वे जैसा चाहें,बच्चों के साथ बर्ताव कर सकते हैं। स्थिति का सामना करना तब कठिन हो जाता है जब बड़ों को छोटों के सामने अपनी गलती स्वीकार करना पड़ती है या उन्हें सॉरी बोलना पड़ता है, क्योंकि इसमें अहम आड़े आ जाता है। लेकिन हमारा सॉरी बोलना उन्हें ज़िंदगी में एक बड़ी सीख दे जाता है और भविष्य में उन्हें यह बात हमेशा स्मरण रहती है कि जब हमसे इतना बड़ा व्यक्ति सॉरी कह सकता है तो हम क्यों नहीं? मगर बच्चों से सम्मान पाने के लिए उन्हें सम्मान देना ज़रूरी है।
औषधि की तरह है
पाकिस्तानी लेखिका नाजिया ने अपनी किताब "अनसैड वर्ड्स हेल्प यू एंड योर लव" की भूमिका में सर्वप्रथम अपना ही उदाहरण दिया है कि सॉरी शब्द कहना हमें हमारी माँ रोज स्कूल जाने से पहले सिखाती थी। मां का कहना होता था कि अपनी ग़लती हो तो सॉरी कहना बहुत ज़रूरी है लेकिन अपनी ग़लती न भी हो तो सॉरी कहने से तुम्हारी इज्ज़त ही बढ़ेगी। इसलिए,जब कभी असावधानीवश मैं कुर्सी,टेबल या दरवाज़े से टकराती थी तो अपनी कुहनी या घुटने मसलते हुए उन बेज़ुबान चीज़ों को भी सॉरी बोलती थी। एक और उदाहरण नाज़िया ने अपनी क़िताब में दिया है कि जब भी उनकी अंग्रेज़ी की टीचर ब्लॉकबोर्ड पर चॉक से कुछ लिखती थीं और चॉक से घिसटने की आवाज़ होती थी जो बड़ी ख़राब लगती थी और अनायास ध्यान प्रश्न से हट जाता था,तब वो टीचर अपना सिर पीछे घुमाती थीं और चॉक को हमें दिखाकर सॉरी बोलती थीं। हालांकि इसमें गलती उनकी नहीं थी,लेकिन उनकी मिठास भरी सॉरी बहुत असर करती थी। वास्तव में,साहस के साथ माफी मांगने में समय ज़रूर लगता है,लेकिन यह औषधि का काम भी करती है और जीवन-पर्यन्त हमें रिलैक्स किए रहती है"।
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सोमवार, 9 अप्रैल 2012
कहाँ ग़ायब हुआ स्वाद मुँह का?
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शुक्रवार, 19 अगस्त 2011
"ॐ" ध्वनि का महत्व
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बुधवार, 30 मार्च 2011
हर बड़े मैच के बाद पत्नियां होती हैं ज़्यादती की शिकार
इसी अखबार में संदीप देव की रिपोर्ट कहती है कि भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच का फीवर पुरूषों को बेकाबू कर सकता है। हार-जीत, दोनों की उत्तेजना को संभालने में असमर्थ पति पत्नियों के साथ ज्यादती कर सकते हैं। मनोचिकित्सकों की मानें तो हाई वोल्टेज क्रिकेट और फुटबॉल मैच में अपनी टीम की खार से खिन्न पति कई बार घरेलू और सेक्सुअल हिंसा का सहारा लेते हैं। मनोचिकित्सकों की पत्नियों को सलाह है कि वे एक दिन उन्हें झेल लें, नहीं तो कईयों के दांपत्य जीवन में खलल पैदा हो सकता है।
अपराध के मामले में दिल्ली पुलिस को सहयोग करने वाले प्रसिद्घ अपराध मनोचिकित्सक डॉ. रजत मित्रा के अनुसार भारत-पाकिस्तान जैसे हाई वोल्टेज मैच में बॉल-दर-बॉल लोगों का जुनून और उनकी उत्तेजना ब़ढ़ती चली जाती है। कुछ लोग अपनी उत्तेजना को संभाल नहीं पाते और क्रोधवश बेकाबू हो जाते हैं। ऐसे क्रोधी इंसान दो रास्ता अख्तियार करते हैं। एक रास्ता खुद को नुकसान पहुंचाने, जैसे आत्महत्या करने, लंबे समय तक खामोश रहने और लोगों से कटकर रहने का होता है। दूसरा रास्ता क्षणिक अपराध की ओर मु़ड़ जाता है। इस अपराध में चीजों की तो़ड़-फो़ड़, मारपीट, जुआ व शराब का लंबे समय तक लत से लेकर घरेलू और सेक्सुअल हिंसा तक शामिल है।
डॉ. रजत मित्रा के अनुसार फुटबॉल वर्ल्डकप-२०१० के दौरान उच्च व मध्यम उच्च वर्ग की कई महिलाएं हिंसा की शिकार होकर आई थी। खेल के दौरान अपनी टीम की हार पर ऐसी महिलाओं के पतियों ने अपने क्रोध को निकालने के लिए या तो उनके साथ हिंसक व्यवहार किया था या फिर उनके साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाया था।
डॉ. मित्रा के मुताबिक उत्तेजना की अवस्था में गुस्सा तो ब़ढ़ ही जाता है, सेक्सुअल हार्मोन भी ब़ढ़ जाता है। पीड़ित व्यक्ति इन दोनों से मुक्त होने के लिए हिंसा और सेक्स का सहारा लेता है। हालांकि बाद में ऐसे पुरूषों को पछतावा होता है, लेकिन उनकी महिला साथी को इससे बाहर आने में करीब दो सप्ताह लग जाता है।
डॉ. मित्रा के अनुसार पिछले क्रिकेट वर्ल्ड कप के दौरान मेरे पास ऐसे तीन केस आए थे, जिन्होंने भारत के नॉकआउट राउंड में बाहर होने पर आत्महत्या की कोशिश की थी। डॉ. मित्रा की सलाह है कि लोग क्रिकेट को खेल की तरह लें, खेल देखने के दौरान ड्रिंक न करें, बेवजह दूसरे से बहस न करें और यदि उन्हें दुख या गुस्सा आ रहा है तो बातचीत कर उसे बाहर निकाल दें।
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मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011
शर्माना कहीं रोग न बन जाए
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रविवार, 20 फ़रवरी 2011
सेक्स प्रॉब्लम पर पत्नियां हुईं बोल्ड
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मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011
प्रेम और स्वास्थ्य
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सोमवार, 14 फ़रवरी 2011
प्यार की फिजिक्स और केमिस्ट्री
इस ब्रह्मांड में कुछ भी फिजिक्स और केमेस्ट्री के नियमों से बाहर नहीं है, प्यार भी। मदन के तीर की नोक अगर फिनाइलइथेलामाइन के मारक रस में न डूबी होती वह असरहीन साबित होता। ऑक्सीटोसीन हारमोन न होता तो रोमियो-जूलिएट अथवा हीर-राँझा जैसे किस्से मशहूर ही नहीं हुए होते। इन रसायनों के अणुओं की जमावट पर हुई नई खोजों ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों को उत्तेजित कर रखा है। बीते जमाने के कीमियागर जिस तरह "प्रेम रसायन" के शर्तिया नुस्खे दिया करते थे, अब वैसा करना संभव हो सकेगा। अब इन रसायनों को औषधियों के रूप में बनाना आसान होता जा रहा है। हो सकता है कि कल बाजार में ऐसे कैप्सूल मिलने लगें जिसे खाने या खिलाने के बाद किसी को भी अपने प्रेमपाश में बाँधा जा सकता है। प्रकृति से छेड़छाड़ के भयावह पहलुओं से सीधे नज़रें न मिलाते हुए यदि गौर करें तो इन औषधियों से दुनिया कितनी रंगीन हो सकेगी। मानसिक रोगियों के लिए इस तरह की दवा वरदान साबित हो सकती है लेकिन क्या जिन लोगों के मस्तिष्क में रासायनिक गड़बड़ियां हों वे "ठीक" किये जा सकते हैं? क्या सभी कुछ चंद रसायनों या हार्मोन्स की वजह से हो रहा है? शायद हां,या नहीं भी,क्योंकि आज हम भी ठीक से नहीं जानते कि किशोरावस्था के आवेग में क्यों किसी से प्रेम हो जाता है। संभवतः,यह प्रेम की वह पहली अवस्था है जब किसी से असहनीय प्रेम हो जाता है। प्लूटोनिक लव जैसी कोई अवस्था इसी दौर में पैदा होती है और स्वतः खत्म हो जाती है। हम यह आज तक नहीं जान पाए हैं कि जिसके प्रेम में हम पागल हुए जा रहे हैं,उसके मस्तिष्क में भी वैसे ही रासायनिक परिवर्तन हो रहे हैं या नहीं। एकतरफा प्रेम के लिए कौन सा रसायन जिम्मेदार है? प्रेम रसायन की अवधारणा कई प्रश्नों के उत्तर नहीं दे पातीःमसलन,वे कौन से रसायन हैं जिनके दम पर पालक ताउम्र अपने बच्चों से प्रेम करते रहते हैं? प्रेम,क्रोध,वासना,घृणा आदि भावनाएं आती-जाती रहती हैं। जिनसे कभी हम प्रेम करते थे,उन्हीं से हमेशा के लिए या कुछ समय के लिए नफरत क्यों करने लगते हैं? रसायन हमारे जीवन को नियंत्रित नहीं कर सकते। किसी के लिए हम अपने दिल के दरवाजे खोलें या नहीं,यह विकल्प हमारे पास हमेशा मौजूद रहता है। विकल्प होने की यही स्वतंत्रता हमें इंसान बनाती है। विवेक ही है जो हमें भावनाओं के तूफानी दौर में संतुलित रखता है। केमिकल रिएक्शन तो दिमाग में आती-जाती रहती है(संपादकीय,सेहत,नई दुनिया,फरवरी द्वितीयांक 2011)।आगे चलें...
शुक्रवार, 20 अगस्त 2010
पीलिया और देसी नुस्खा
जालंधर के गांव दूहड़े के निवासी परविंदर सिंह एक ऐसे शख्स है जो पीलिए जैसी घातक बीमारी का देसी नुस्खे से मुफ्त इलाज कर हजारों मरीजों को ठीक कर चुके है। पेशे से ड्राइवर परविंदर का दावा है कि उनके द्वारा किए इलाज के बाद मरीज कुछ दिनों में बिलकुल ठीक-ठाक हो जाता है।
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सोमवार, 22 मार्च 2010
शादी के बाद कमर की साइज
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गुरुवार, 18 मार्च 2010
दिल्ली के रेस्तरां मे नवरात्र की थाली
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इधर खुले मे शौच और उधर मंगल पर बसने की तमन्ना
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बुधवार, 17 फ़रवरी 2010
सोमवार, 15 फ़रवरी 2010
गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010
डाक्टर पर आरोप लगाने से पहले......
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शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010
सरकारी अस्पताल में पांच रुपए में बना पाएंगे खाना
क्या है सांझा चूल्हा
दरअसल, पेट्रोलियम मंत्रालय ने अस्पतालों, रैन बसेरों और धर्मशालाओं मंे सिलेंडर और गैस चूल्हे देकर ऐसी रसोई बनाने का कार्य शुरू किया है, जहां कोई भी एक निश्चित रकम देकर एक निश्चित अवधि के लिए उनका उपयोग कर सकता है। सूत्रों के मुताबिक, पेट्रोलियम राज्य मंत्री जितिन प्रसाद हाल ही में किसी सरकारी अस्पताल गए थे। वहां उन्होंने देखा कि लोग स्टोव पर खाना पका रहे हैं। उन्होंने बताया गया कि ये लोग दूर-दराज से आए हैं। इनके पास इतने पैसे नहीं है कि अपने व बीमार के लिए हर दिन बाजार से खाना खरीद पाएं। इसकी वजह से वे ऐसा कर रहे हैं। उन्हें यह भी बताया गया कि मिट्टी के तेल के लिए ऐसे लोगों को खासा भटकना पड़ता है और दुकानदारों से महंगी दर पर खरीदारी करनी पड़ती है। इसके बाद उन्होंने अस्पतालों में ऐसे चूल्हों को स्थापित करने की सलाह अधिकारियों को दी। सूत्रों के मुताबिक, पेट्रोलियम राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने इस योजना की पहल की है। इस समय दिल्ली के एम्स में ऐसा ही एक चूल्हा चल रहा है।
(दैनिक भास्कर,दिल्ली संस्करण,5.2.10 में संतोष ठाकुर की रिपोर्ट)
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