गुरुवार, 18 मार्च 2010

इधर खुले मे शौच और उधर मंगल पर बसने की तमन्ना

शौचालय सभ्यता के विकास का हिस्सा रहे हैं। यह विकास की न्यूनतम शर्त भी मानी जा सकती है। मगर आज पढिए दो अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्ट परनई दुनिया का संपादकीयजो इकाई और दहाई अंकों की विकास दर के दावे की पोल खोलता हैः
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) तथा संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि हिंदुस्तान ऐसे देशों का सरगना है जहां खुले में लोग शौच जाते हैं क्योंकि उन्हें शौचालय की सामान्य सुविधाएं हासिल नहीं हैं। दुनिया में जितने लोग खुले में शौच जाते हैं उनमें से ५८ प्रतिशत भारतीय हैं। गांवों में तो यह प्रतिशत बढ़कर ६९ तक हो जाता है। २००८ के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में आज भी एक अरब दस करोड़ लोग खुले में शौच करते हैं। इनमें से सबसे ज्यादा ४४ प्रतिशत दक्षिण एशियाई देशों में हैं। भारत में ये ६४ करोड़ हैं। दुनिया के कुल ११ देशों में ८१ प्रतिशत आबादी शौच की उचित सुविधा से वंचित है जिनमें भारत और उसके चार पड़ोसी देश चीन, पाकिस्तान, नेपाल तथा बांग्लादेश भी शामिल हैं। वैसे भारत के बाद इस मामले में इंडोनेशिया तथा चीन का नंबर आता है लेकिन इन दोनों देशों में ऐसे लोगों की संख्या भारत की तुलना में बहुत कम है। इंडोनेशिया में ५.८ करोड़ हैं तथा चीन में पांच करोड़। जाहिर है कि खुले में शौच जाने की अपनी स्वास्थ्यगत गंभीर समस्याएं हैं जिनमें दस्त लगना (डायरिया होना) तथा अंतड़ी संबंधी रोग होना शामिल है। खासतौर पर हमारे जैसे देश में स्त्रियों के लिए यह समस्या अधिक विकट है जो खुले में हर समय शौच नहीं जा सकतीं। उन्हें जबर्दस्ती अपने शरीर पर अत्याचार करना पड़ता है जिससे औरतें कई गंभीर बीमारियों की शिकार हो जाती हैं। हमारे शहरों की हालत गांवों से वैसे काफी ठीक है मगर शहरी आबादी का वह हिस्सा- जो झुग्गी-झोपड़ियों में रहता है- इस सामान्य, मानवीय सुविधा से वंचित है। अनुमान है कि शहरों के १८ प्रतिशत लोग इन वंचितों में शामिल हैं। फिर हमारे ज्यादातर शहरों-कस्बों में सार्वजनिक शौचालयों की देखभाल इतनी खराब है कि चाहकर भी उनका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अनेक सार्वजनिक स्थलों पर तो स्त्रियों के लिए ऐसी नाममात्र की सुविधा तक नहीं है। अभी तक संसद भवन में ऐसी सुविधा नहीं थी महिला सांसदों-कर्मियों के लिए। ६० साल के बाद इस जरूरत की पूर्ति पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार कर रही हैं। हम वैश्वीकरण पर, नई अर्थव्यवस्था पर, आर्थिक प्रगति की दर पर गौरव करते हैं मगर हमारे यहां साफ-सुथरे शौचालयों का घरों तथा सार्वजनिक स्थलों में भयानक अभाव है।
(नोटः इस पोस्ट की चर्चा श्री महेंद्र मिश्र जी ने समयचक्र ब्लॉग पर की है जिसे यहां देखा जा सकता है)

1 टिप्पणी:

  1. खुले में शौच से समस्यायें पैदा नहीं होतीं. महिलाओं के लिये वाकई में दिक्कत है. सर पर मैला ढ़ोने से किसी को दिक्कत महसूस नहीं होती. धिक्कार है कि अभी भी मानव के मलमूत्र को सर पर ढ़ोया जा रहा है.

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