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मंगलवार, 1 मई 2012

स्प्लीन की चोट

डायफ्राम के नीचे शरीर के बांये हिस्से में स्थित स्प्लीन बहुत ही नाज़ुक अंग होता है। यह झिल्लीनुमा आवरण से ढ़ंका होता है। शरीर में स्प्लीन की स्थिति और इसके नर्म होने के कारण यह बहुत ही कमज़ोर होता है और आसानी से क्षतिग्रस्त हो सकता है। 

एक्सिडेंट से पेट के हिस्से में चोंट लगना, स्पोर्टस इंजुरी और हाथापाई, हमला आदि स्प्लीन के फटने के आम कारणों में से है। स्प्लीन के फटने पर इसके अंदर मौजूद सभी ऊतक व रक्त बाहर की ओर बहने लगते हैं जैसे कि किसी टमाटर को मसलने पर होता है। यह स्थिति बहुत गंभीर ही होती है। स्प्लीन का फटना एक दर्दनाक स्थिति होती है। ऐसे में इसका खून पेट के अंदर बहने लगता है और यही दर्द, जलन और कमज़ोरी का कारण बनता है।

स्प्लीन की चोंट से पीड़ित मरीज़ों को अक्सर बांये कंधे में दर्द मसहूस होता है। दरअसल स्प्लीन के फटने पर खून निकलकर डायफ्राम तक पहुंच जाता है। डायफ्राम के संवेदनशील होने के कारण मरीज़ को बांये कंधे में दर्द महसूस होता है। स्प्लीन के फटने पर यदि खून धीरे धीरे बहता है,तो लक्षण एकदम सामने नहीं आते। शरीर में खून की कमी होने तक इसके लक्षण दिखाई नहीं देते। रक्तचाप में कमी,उनींदापन,धुंधलापन,भ्रम और बेहोशी इसके लक्षणों में शामिल हैं। दरअसल,खून की कमी से हृदय और मस्तिष्क में ऑक्सीजन की आपूर्ति ठीक से नहीं हो पाती है और तभी ये लक्षण सामने आने लगते हैं। एकाएक खून बहने पर,व्यक्ति अचानक बेहोश हो सकता है। 

इलाज 
स्प्लीन के फटने पर इलाज न मिलने पर यह जानलेवा साबित हो सकता है। यह एक आपातकालीन स्थिति होती है जिसमें तुरंत मेडिकल व सर्जिकल ट्रीटमेंट मिलना अत्यावश्क है। इलाज के लिए इंट्रावीनस ड्रिप के ज़रिए मरीज़ को तुरंत द्रव चढ़ाए जाते हैं और चोंट के कारण बह रहे खून को रोकने के लिए इमरजेंसी सर्जरी की जाती है। यदि स्प्लीन अधिक नहीं फटा हो तो सर्जन स्प्लीन की मरम्मत भी कर सकता है। हालाँकि अधिकतर मामलों में सर्जरी करके पूरे स्प्लीन को निकालना पड़ता है। इस सर्जरी को स्पीनेक्टॉमी कहते हैं।

सर्जरी के बाद 
शरीर को विभन्न संक्रमणों से बचाने में स्प्लीन बहुत ही महत्पूर्ण भूमिका निभाता है। यह न्यूमोकोकस नामक बैक्टीरिया को शरीर से बाहर निकालता है। इसलिए स्प्लीनेक्टॉमी करा चुके मरीज़ों को संक्रमण के बचने की ओर विशेष ध्यान देना ज़रुरी होता है। ऐसे लोगों को न्यूमोकॉकल संक्रमण से बचने के लिए टीकाकरण ज़रुर करवाना चाहिए।(डॉ. विक्रम राठौर,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल तृतीयांक 2012)

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शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

घुटने की चोट में क्या करें?

घुटने की चोट सिर्फ खिलाड़ियों को ही नहीं, बल्कि शारीरिक तौर पर सक्रिय रहने वाले किसी भी व्यक्ति को लग सकती है। अक्सर घुटने की चोटों को नज़रअंदाज़ किया जाता है। लंबे समय तक इलाज न किया जाए तो समस्या गंभीर हो जाती है। 

घुटने के जोड़ में जाँघ और पैरों की हड्डी के बीच मेनिस्कस नामक लचीला गद्देनुमा पदार्थ होता जो चलते या दौड़ते समय दोनों हड्डियों को एक-दूसरे से टकराने नहीं देता। घुटने की चोटों में सबसे अधिक मेनिस्कस ही क्षतिग्रस्त होता है। मेनिस्कस आमतौर पर खेलकूद जैसी सघन गतिविधियों के दौरान ही फट जाता है। कई बार मोटरसाइकल अथवा दो पहिया वाहन चलाने के दौरान हुई दुर्घटना में भी घुटना क्षतिग्रस्त हो जाता है। उम्रदराज़ होने पर मेनिस्कन घिसने लगता है। 

पुरुषों में घुटने की सबसे आम समस्या कौन सी है? मेनिस्कस फटना पुरुषों के घुटने की एक समस्या है। यह एक गद्देदार तश्तरीनुमा कुशन होता है जो घुटने को स्थिरता प्रदान करता है।

इसमें चोट कैसे लगती है? 
मेनिस्कस में आगे या पीछे की ओर झुकने अथवा तेजी से मुड़ जाने के कारण चोट लगती है। ऊँकड़ु बैठने के दौरान भी यह क्षतिग्रस्त हो सकता है।

घुटने की चोट की गंभीरता कैसे पता चल सकती है? 
मेनिस्कस फटने के अधिकांश मरीज घुटने में एक खुजलाहट महसूस करते हैं। आमतौर पर इस तरह की चोटों में सूजन आ जाती है। घुटने का जोड़ एकाएक लॉक भी हो जाता है। 

चोट लगने पर क्या करें? 
 यदि आपको यह आशंका है कि आप ऐसी किसी चोट के शिकार हैं तो तुरंत चिकित्सक की मदद लेना चाहिए। इस तरह की चोट में आराम करना श्रेयस्कर होता है। कई बार मेनिस्कस टिश्यू जोड़ में फँस जाता है जिससे घुटना लॉक हो जाने जैसा एहसास होता है।

घुटने की चोट का इलाज क्या है? 
मेनिस्कस की चोट को आमतौर पर ऑर्थ्रोस्कोपिक सर्जरी से ठीक किया जाता है। सर्जरी के दौरान घुटने के जोड़ में छोटे-छोटे छेद किए जाते हैं जिससे होकर सर्जरी का औजार शरीर के अंदर प्रविष्ट कराया जाता है। फटे हुए मेनिस्कस में से अस्थिर टिश्यू को काटकर निकाला जाता है। कई बार फटे हुए मेनिस्कस को टाँके लगाकर पुनः सिल दिया जाता है। ओपन सर्जरी में बड़ा चीरा लगाया जाता है जिससे कई तरह की परेशानियाँ भी बढ़ जाती हैं। इन दिनों नई तकनीक से घुटने की चोट का इलाज किया जाता है जिससे मरीज न्यूनतम समय में काम पर लौट जाता है।

ठीक होने में कितना समय लगता है? 
 सामान्य रिसेक्शन सर्जरी के बाद दो दिन में ही मरीज बैसाखी के सहारे चल सकता है। पूर्णतः ठीक होने में चार से छः हफ्ते का समय लगता है। कई मरीजों को अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है।

चोट की क्या गंभीर स्थिति हो सकती है? 
मेनिस्कस प्रकृति द्वारा दिया गया शॉक एब्जार्बर है। इसे काटकर निकालने से ऑर्थराइटिस की समस्या उभरने का जोखिम है। जहाँ तक संभव हो क्षतिग्रस्त ऊतकों की रिपेयरिंग करना ठीक होता है(डॉ. कमल वैद,सेहत,नई दुनिया,नवम्बर तृतीयांक 2011)।

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