स्वास्थ्य समाचार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
स्वास्थ्य समाचार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

स्कूलों की कैंटीन से बीमारियां खरीद रहे हैं बच्चे

रख कर सोचते हैं कि स्कूल में आधी छुट्टी के समय उनका लाड़ला या लाड़ली शरीर के लिए जरूरी न्यूट्रीशन से भरपूर नाश्ता और लंच कर लेगा, उन्हें तुरंत सावधान हो जाना चाहिए। शहरों के निजी स्कूलों की कैंटीन में धड़ल्ले से बर्गर, पिज्जा, चिप्स व समोसे जैसा जंक फूड बिक रहा है।

छोटी उम्र में मोटापा, ब्लड प्रेशर, ह्दय रोग
यह तथ्य उद्योग संगठन एसोचैम के अध्ययन में सामने आया है। बच्चे अपनी पाकेट मनी से प्रतिमाह न केवल औसतन एक हजार रुपये तक इन पर खर्च करते है और छोटी उम्र में मोटापा, ब्लड प्रेशर, ह्दय रोग, डायबिटीज समेत कई बीमारियां को न्योता दे रहे हैं। प्रमुख उद्योग संगठन एसोसिएशन ऑफ चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एसोचैम) ने बच्चों की खान-पान की आदतों के बारे में अभिभावकों को आगाह करते हुए कहा है कि जंक फूड ऐसी बीमारियों की चपेट में आने की पहला कदम है। संगठन ने इस गंभीर मामले पर हाल में ही दिल्ली व एनसीआर के कुछ निजी स्कूलों पर एक अध्ययन कराया।

विद्यालय प्रशासन को भी सचेत होने की जरूरत
जिसके मुताबिक एक माह में 56 फीसदी छात्र 800 से एक हजार रुपये तक स्कूलों की कैंटीन में खर्च करते हैं। गंगा राम हॉस्पिटल के चेयरमैन डॉ. बी के राव का कहना है कि स्कूलों में बिकने वाले स्नैक्स और कोल्ड ड्रिंक्स स्वास्थ्य मानकों के अनुरूप होना जरूरी है जो बच्चों के स्वास्थ्य विकास में कारगर हों। उन्होंने कहा कि अभिभावकों के अलावा विद्यालय प्रशासन को भी इस बारे में सचेत होने की जरूरत है, ताकि वे जंक फूड की जगह स्वास्थ्य के लिए अच्छा खान-पान ही अपनी कैंटीन में परोसे। सर्वे में यह भी पाया गया कि जिन बच्चों के अभिभावक घर में कम खाना बनाते हैं उनके बच्चों में कैंटीन में खाने की आदत सर्वाधिक है(अमर उजाला,25.4.11)।

आगे चलें...

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

स्कूलों में अब 'पीरियड्स' की चिंता खत्म !

दिल्ली सरकार अपने स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियों को पीरियड्स के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले सैनेटिरी नैपकिन (पैड) मुफ्त में उपलब्ध कराने की योजना लागू करेगी।

दिल्ली सरकार के विश्वस्त सूत्रों ने बताया कि कई सर्वे के बाद यह बात सामने आई है कि शहर के गरीब परिवारों में लड़कियों व महिलाओं में पीरियड्स के दौरान जरूरी साफ सफाई नहीं किए जाने से उन्हें गंभीर बीमारियां हो रही हैं। उन्होंने बताया कि इस साफ-सफाई के अभाव में सर्वाइकल कैंसर तक होने का खतरा रहता है। लिहाजा जेंडर रिसोर्स सेंटर के माध्यम से शहर के गरीब इलाकों में महज १० रूपए में महिलाओं को पीरियड्स के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले पैड उपलब्ध कराए गए थे। महिलाओं ने बड़ी संख्या में इसका इस्तेमाल किया।

सूत्रों ने बताया कि इस अभियान को आगे बढ़ाने के लिए दिल्ली की स्वास्थ्य मंत्री प्रो. किरण वालिया की अगुवाई में गुヒवार को एक बैठक हुई। इसमें तय किया गया कि ज्यादा से से ज्यादा जेंडर रिसोर्स सेंटरों के माध्यम से इसे अन्य इलाकों में भी बेचा जाए। इसकी कीमत १० रूपए ही रखी जाएगी।

दिल्ली सरकार के विश्वस्त आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि इस अभियान के तहत पैड्स पर लगने वाले वैट को भी माफ कर दिया गया है। उन्होंने बताया कि अब शिक्षा विभाग ने इसी अभियान से खुद को जोड़ते हुए अपने सभी स्कूलों में मुफ्त में ये पैड उपलब्ध कराने का प्रस्ताव किया है।

उन्होंने बताया कि आम तौर पर सातवीं व उसके ऊपर की कक्षाओं में लड़कियों को इसकी जरूरत होती है। उनहोंने बताया कि शिक्षा विभाग को ये पैड १० रूपए में ही मिलेंगे लेकिन स्कूलों के मामले में होने वाले खर्च को वह वहन करेगा(नई दुनिया,दिल्ली,21.1.11)।

आगे चलें...

बुधवार, 19 जनवरी 2011

भारत में पहली बारःलकवाग्रस्त पशु का स्टेम सेल से सफल इलाज़

भारतीय पशु चिकित्सा संस्थान के वैज्ञानिकों ने स्टेम सेल थेरेपी से लकवाग्रस्त पशुओं का इलाज संभव कर दिखाया है। भारत में पशु चिकित्सा क्षेत्र में अपने तरीके का यह पहला अनुसंधान है। इस अनुसंधान को पशुओं के इलाज की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। साढ़े तीन साल के एक कुत्ते की रीढ़ गंभीर रूप से चोटिल होने से उसके पीछे के दोनों पांव लकवाग्रस्त हो गये थे। स्टेम सेल को पुनर्जीवित कर उसका उपचार किया गया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) से संबद्ध पशु चिकित्सा संस्थान के शल्य विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर तरु शर्मा और डॉक्टर अमर पाल इस अनुसंधान परियोजना पर काम कर रहे हैं। परियोजना को आईसीएआर व बायोटेक्नोलॉजी विभाग से वित्तीय मदद दी जा रही है। संस्थान के प्रबंधक डॉक्टर एमसी शर्मा ने बताया कि डेढ़ महीने के भीतर ही कुत्ता अपना भार पीछे के पांवों पर डालकर चलने लगा। जबकि इसी परियोजना के तहत दूसरा प्रयोग भी एक अन्य कुत्ते पर हो रहा था, जो पिछले साल भर से अधिक समय से कुल्हे की हड्डी टूटने से अधमरा सा हो गया था। इस पालतू कुत्ते के मालिक की सहमति से उस पर भी स्टेम सेल प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया गया। लगातार 11 महीने के इलाज के बाद उसमें पर्याप्त सुधार देखा गया। अब वह चलने-फिरने लायक हो गया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक केएमएल पाठक ने बताया कि पशु चिकित्सा के क्षेत्र में कई महत्त्‍‌वपूर्ण परियोजनाएं चल रही हैं, जिनमें स्टेम सेल प्रौद्योगिकी से उपचार प्रमुख है। पशु चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में यह मील का पत्थर साबित होगा(सुरेन्द्र प्रसाद सिंह,दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,19.1.11)।

आगे चलें...

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

सीएसए का कमाल, सीटी बजने से पहले पकेगी दाल

कानपुर के चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय (सीएसए) के वैज्ञानिक ने मसूर की नयी प्रजाति विकसित की है जो पचने में आसान है। पीले रंग की मसूर का दाना पुरानी प्रजाति के मुकाबले जहां दो गुनी उपज देगा वहीं फसल के तैयार होने में समय भी कम लगेगा। इतना ही नहीं नयी प्रजाति पकने में भी बहुत कम समय लेगी। कुकर की पहली सीटी बजने के भी पहले मसूर की दाल पक जायेगी।
सीएसए के दलहन विभाग ने अब तक 57 प्रजातियां रिलीज की हैं। उर्द, मसूर, मटर व मूंग की चार नयी प्रजातियां रिलीज होने की कगार पर हैं। सीएसए के अर्थ वनस्पति शास्त्रीय दलहन डॉ. एएस राठी ने बताया कि मसूर की बाहर से जो प्रजाति लाए थे वह भारतीय परिवेश में तैयार होने में 180 दिन लेती थीं। क्रास कराने के बाद मसूर की नयी प्रजाति केएलबीबी विकसित की है। जो 110 दिन में तैयार हो जायेगी। पीले रंग की मसूर की इस प्रजाति का दाना पुरानी प्रजाति की तुलना में दोगुने आकार का है जिससे नमकीन में इस प्रजाति की खास मांग होगी। खास बात यह है कि इसको पकाने में गैस भी कम खर्च होगी क्योंकि सीटी बजने के पहले यह कुकर में पक जायेगी। अब तक मसूर की नौ प्रजातियां विकसित कर चुके हैं।

कम समय में खेत पर तैयार होगा हरा उर्द
डॉ. राठी ने बताया कि हरे उर्द में रोग लग जाता था तो उपज 13 से 14 कुंतल प्रति हेक्टेयर आती थी। इसको तैयार होने में 110 में 140 दिन लगते थे। इस पर उर्द की प्रजाति शेखर विकसित की। यह प्रजाति पाचक है, खाने में इससे गैस नहीं बनती। जायद में यह 75 दिन में तैयार होती है। इसकी उपज 19 से 20 कुंतल प्रति हेक्टेयर है। उर्द की दस प्रजातियां विकसित की जा चुकी हैं।

जय व इंद्र : डॉ. राठी ने बताया कि मटर की प्रजाति जय और इंद्र से उपज 38 कुंतल प्रति हेक्टेयर है। यह 120 दिन में तैयार हो जाती है। चने की आठ प्रजातियां विकसित हुई हैं(दैनिक जागरण,कानपुर,29.12.2010)।

आगे चलें...

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

उत्तराखंड के बच्चों में बढ़ रही है विकलांगता

उत्तराखंड में पैदा होने वाला हर सातवां बच्चा किसी न किसी प्रकार की विकलांगता की चपेट में है। विकलांगता की गिरफ्त में आए मासूमों की संख्या सूबे में विकलांग पेंशन के लाभार्थियों से भी अधिक हो गई है। हर सातवीं कोख से पैदा होने वाली संतान में विकलांगता का ग्रहण नई चिंता व चुनौती का विषय है, लेकिन राज्य सरकार का अब तक इस ओर कोई ध्यान नहीं है। यह बात दीगर है कि केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने हालात की गंभीरता को महसूस किया है। मंत्रालय के अधीन कार्य करने वाला स्वायत्तशासी संस्थान राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (निपसिड) ने उत्तराखंड सरकार को कारगर कार्य योजना तैयार करने की सलाह के साथ केंद्र के वित्तीय सहयोग का भरोसा जताया है। निपसिड ने गत दिवस उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में तेरह राज्यों के बचपन बचाओ मुहिम से जुड़े विभागों और संगठनों की कार्यशाला आयोजित की। पांच दिन चलने वाली इस कार्यशाला में उत्तराखंड के समाज कल्याण विभाग के अधिकारी भी शामिल हुए। इस कार्यशाला में यह तथ्य सामने आया, जिसे सुन कर किसी भी राज्यवासी की पेशानी पर चिंता की लकीरें पड़ जाएंगी। ऐसा नहीं है कि यह आंकड़े कोई ढकी-छिपी चीज हों। सर्व शिक्षा अभियान के लिए सोशल एंड रूरल इंस्टीट्यूट द्वारा कराये गये आल इंडिया सर्वे के दौरान राज्य के यह आंकड़े सामने आये थे। प्रदेश के शिक्षा विभाग को इस स्थिति से अवगत भी करा दिया गया था, लेकिन बदहाल बचपन को बचाने व पुनर्वास करने के लिए न तो शिक्षा विभाग ने ही कुछ किया और नही समाज कल्याण विभाग गंभीर हुआ। हालांकि सरकार बदहाल बचपन बचाने व उनके पुनर्वास पर सालाना लाखों रुपये खर्च करती है, लेकिन ऐसे बच्चों के लिएपृथक से कोई योजना नहीं संचालित की जा सकी। विकलांग पेंशनर्स से ज्यादा संख्या है मासूमों की : राज्य में विकलांग पेंशन प्राप्त करने वाले कुल लाभार्थियों की संख्या 43,783 है। जबकि विभिन्न प्रकार की विकलांगता से ग्रसित बच्चों की संख्या 47,627 हो गई है। यह आंकड़े शून्य से 4 तथा 4 से 14 वर्ष के बच्चों के बीच कराये गये सर्वे में सामने आया है। उत्तराखंड में शोध की भी है जरूरत : राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (निपसिड) ने राज्य में तेजी से बढ़ती विकलांगों पर शोध की जरूरत पर बल दिया है। निपसिड का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में मासूमों के विकलांगता का शिकार होने की वैज्ञानिक वजह खोज कर उसके निराकरण की जरूरत है(दैनिक जागरण,हल्द्वानी,8.12.2010)।

आगे चलें...

रविवार, 28 नवंबर 2010

मध्यप्रदेशः1 जनवरी से शुरू हो सकती है स्वास्थ्य बीमा योजना

मध्य प्रदेशभर के गरीब मरीजों को बेहतर उपचार के लिए प्रस्तावित केन्द्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना अगले साल एक जनवरी से शुरू हो सकती है। सरकार ने इसकी तैयारियां पूरी कर ली हैं। कैबिनेट की हरी झंडी मिलने के बाद इसे लागू किया जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक स्वास्थ्य विभाग गरीबों को देश भर में मुफ्त इलाज दिलाने के लिए जल्द से जल्द यह योजना लागू करना चाहता है। यह योजना दीनदयाल अंत्योदय उपचार योजना की तर्ज पर लागू की जानी है, फर्क इतना है कि इससे गरीब मरीज पूरे देश में कहीं भी इलाज करा सकेंगे। प्रदेश में यह योजना शुरुआत में दो संभागों में लागू होगी, इसमें भोपाल व ग्वालियर संभाग शामिल हैं। सब ठीकठाक रहा तो बाद में यह योजना प्रदेश के अन्य संभागों में लागू की जा सकती है। इसका फायदा प्रदेश भर के गरीब परिवारों को मिलेगा। वे प्रदेश सहित देश में कहीं भी अपना इलाज करा सकेंगे। प्रति परिवार प्रतिवर्ष तीस हजार रुपए अधिक से अधिक बीमारी पर खर्च किए जा सकेंगे। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना देश के कई राज्यों में चल रही है, लेकिन प्रदेश में यह अभी तक शुरू नहीं हो सकी है। इसकी वजह यह कि यहां पर गरीब मरीजों के उपचार के लिए पहले से ही दीनदयाल अंत्योदय उपचार योजना चल रही है। इसके तहत प्रति परिवार प्रतिवर्ष सरकार बीस हजार रुपए तक खर्च कर रही है। इस योजना की खामी यह है कि बीपीएल मरीज केवल प्रदेश में ही इस योजना के तहत चिन्हित अस्पतालों में इलाज कराने के पात्र हैं। प्रदेश से बाहर के अस्पतालों में इलाज कराना उनके बूते की बात नहीं होती, क्योंकि यहां पर इलाज में खर्च काफी ज्यादा आता है। इस योजना के तहत प्रदेश सरकार किसी बीमा कंपनी के साथ करार करेगी, जिसमें बीमारियों व अन्य शर्ताें का उल्लेख होगा। बीपीएल मरीजों के इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों के साथ कुछ चुनिंदा निजी अस्पतालों को भी शामिल किया जाएगा। यह योजना गरीब परिवारों के लिए शुरू की जा रही है, लेकिन प्रदेश में कितने गरीब परिवार हैं, इस पर असमंजस की स्थिति है। केन्द्र के आंकड़ों में यह संख्या अलग है तो प्रदेश सरकार व अन्य एजेंसियों का आकलन अलग है(दैनिक जागरण,भोपाल,28.11.2010)।

आगे चलें...

बुधवार, 17 नवंबर 2010

सिकलसेल एनीमिया पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन रायपुर में 22 से

छत्तीसगढ़ में सिकलसेल एनीमिया पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा, जिसमें पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और कांगो गणतंत्र की प्रथम महिला एन्टोनिट्टे शामिल होंगे। आधिकारिक सूत्रों ने मंगलवार को बताया कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में इस महीने की 22 तारीख से सिकलसेल एनीमिया बीमारी पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा। छह दिनों तक चलने वाले इस सम्मेलन में देश के पूर्व राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम और अफ्रीकी देश कांगो गणतंत्र की प्रथम महिला एन्टोनिट्टे सस्साऊ को अति विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। यह सिकलसेल एनीमिया पर चौथा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन होगा। इसमें देश के विभिन्न राज्यों के दो सौ प्रतिनिधियों सहित विदेशों के भी करीब एक सौ प्रतिनिधि शामिल होंगे। रायपुर में होने वाले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से इस संबंध में केन्द्र सरकार को राष्ट्रीय नीति बनाने का सुझाव देते हुए एक आधार पत्र प्रस्तुत किया जाएगा तथा छत्तीसगढ़ में सिकलेसल की रोकथाम और इस बीमारी के इलाज के लिए राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा तैयार की जा रही तीन वर्षीय कार्य-योजना का शुभारंभ भी किया जाएगा। इस कार्य योजना में राज्य के 14 वर्ष से 18 वर्ष तक आयु समूह के सभी बच्चों और किशोरों के रक्त परीक्षण सहित गर्भवती माताओं के रक्त परीक्षण का भी प्रावधान रहेगा। सम्मेलन के दौरान स्थानीय जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से सम्बद्ध डाक्टर भीमराव अम्बेडकर अस्पताल रायपुर में सिकलसेल मरीजों के लिए एकल-खिड़की प्रणाली के तहत विशेष चिकित्सा प्रकोष्ठ का भी शुभारंभ किया जाएगा। इस प्रकोष्ठ में सिकलसेल एनीमिया की जांच और इस बीमारी के मरीजों के लिए हर जरूरी डॉक्टरी परीक्षण की व्यवस्था रहेगी, जिससे उन्हें परीक्षणों के लिए अलग-अलग क्लिनिकों में न जाना पड़े। उनके लिए 20 या 30 बिस्तरों का भी अलग से इंतजाम इस विशेष प्रकोष्ठ के अंतर्गत किया जाएगा। अधिकारियों ने बताया कि स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा विभाग तथा जवाहर लाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय रायपुर द्वारा आयोजित किए जा रहे इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस सहित दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील तथा अफ्रीकी देश कांगो, गेबॉन, कैमेरून तथा एशिया महाद्वीप से सऊदी अरब के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। उन्होंने बताया कि भारत के उड़ीसा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश, गुजरात आदि अनेक राज्यों के स्वास्थ्य विभाग के सचिव स्तरीय वरिष्ठ अधिकारी और विषय विशेषज्ञ भी सम्मेलन में शिरकत करेंगे। 22 नवम्बर से 27 नवम्बर तक चलने वाले इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के विभिन्न सत्रों का आयोजन मेडिकल कॉलेज तथा यहां के अन्य जगहों में भी किया जाएगा। अलग-अलग सत्रों में इस विषय पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विशेषज्ञों द्वारा अपने कई महत्वपूर्ण शोध पत्र भी प्रस्तुत किया जाएगा। प्रथम सत्र में सिकलसेल एनीमिया पर सरकारी नीति के बारे में भी एक वक्तव्य होगा, जिस पर सामूहिक चर्चा होगी। इसी तरह अन्य सत्रों में भी शोध पत्रों और आलेखों पर सामूहिक विचार-विमर्श किया जाएगा(दैनिक जागरण,रायपुर,17.11.2010)।

आगे चलें...

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

धड़ल्ले से बिक रही हैं रसायन वाली सब्जियां

बाजारों में खतरनाक रसायन वाली सब्जियां बिक रही हैं। गैरसरकारी संस्था कंस्यूमर वॉइस की स्टडी में प्रतिबंधित पांच तरह के रसायनों में से चार यहां की सब्जियों में मिले हैं। इन रसायनों के इस्तेमाल से ब्रेन व ब्लड कैंसर हो सकता है, किडनी और फेफड़े डैमेज हो सकते हैं, कई तरह की न्यूरोलॉजिकल समस्या, त्वचा की बीमारियां हो सकती हैं। यहां तक कि ये रसायन लिवर और हार्मोन के फंक्शन को भी डिस्टर्ब कर सकते हैं। संस्था ने 35 तरह की सब्जियों के 193 सैंपल जांच के लिए उठाए थे। इनमें क्लॉरडेन, एंट्रीन, हेप्टेकर, एथिल पैराथियान रसायन पाए गए। इतना ही नहीं, यूरोपियन स्टैंडर्ड के मुताबिक इनमें 45 तरह की अन्य कमियां भी पाई गईं। स्टडी के मुताबिक करेला और पालक में सबसे ज्यादा प्रतिबंधित पेस्टिसाइड पाए गए। सब्जियों के सैंपल दिल्ली, एनसीआर, कोलकाता और बेंगलुरु की होलसेल और रिटेल मार्केट से उठाए गए थे। इनमें आलू, कुंद्रू, टमाटर, ब्रॉकली, तोरई, लौकी, टिंडा, ककड़ी, परवल, मटर, करेला, पालक, प्याज, अरवी, चुकंदर, मेथी, कमल ककड़ी और गांठ गोभी जैसी सब्जियां शामिल की गई थीं। संस्था के पदाधिकारियों का कहना है कि सब्जियों व फलों में पेस्टिसाइड के मामले में यूरोपियन स्टैंडर्ड सबसे उपयुक्त होता है, मगर यहां की सरकारी एजेंसियों ने स्टैंडर्ड को पहले ही बहुत औसत रखा है, जो स्टैंडर्ड तय हैं उनका सही ढंग से पालन हो रहा है अथवा नहीं, इस बात की जांच करने का कोई सिस्टम नहीं है। यही वजह है कि मानकों का धड़ल्ले से उल्लंघन हो रहा है(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,2.11.2010)।

आगे चलें...

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

फरीदाबादःनिजी अस्पताल में भी गरीबों का फ्री इलाज

अब प्राइवेट अस्पतालों में भी गरीब परिवारों का फ्री इलाज होगा। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) के तहत 28 हजार स्मार्ट कार्ड परिवार इस सुविधा का लाभ उठा सकेंगे। इस योजना के तहत फरीदाबाद के 25 सरकारी व प्राइवेट अस्पतालों के साथ टाईअप किया गया है। इनमें से किसी भी अस्पताल में स्मार्ट कार्ड धारक अपना और परिवार के चार सदस्यों का इलाज करा सकेंगे। चयनित अस्पतालों में 30 हजार रुपए तक का इलाज निशुल्क होगा। क्या है लक्ष्यः आरएसबीआई का लक्ष्य गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों को हेल्थ इंश्योरेंस करना है। इसके तहत बीपीएल परिवार को स्मार्ट कार्ड दिए जा रहे हैं। इस कार्ड से एक परिवार के पांच सदस्य अपना इलाज निशुल्क किसी भी सरकारी और गैर सरकारी अस्पताल में करा सकते हैं। एक कार्ड पर परिवार 30 हजार रुपए तक का इलाज एक साल में करा सकता है। पिछले साल इस योजना के तहत सिर्फ ५५ फीसदी ही लोगों को यह सुविधा मिल पाई थी। इस बार यह टारगेट 75 प्रतिशत का है। अभी तक 28 हजार परिवार लाभान्वितः सरकारी आंकड़ों के अनुसार जिले में 56858 बीपीएल कार्डधारक हैं। इनमें से फरीदाबाद रूरल में 6749 और बल्लभगढ़ में 4660 बीपीएल परिवार हैं। जबकि अर्बन क्षेत्र में 45449 परिवार गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले हैं। अभी तक स्कीम के तहत 28 हजार परिवार लाभान्वित हुए हैं। इन्हें स्मार्ट कार्ड दिया जा चुका है। आंकड़ों की तुलना में अभी यह लक्ष्य काफी कम है। आज हो रही है मीटिंगः स्कीम के तहत जिले के 25 सरकारी व गैर सरकारी अस्पतालों के साथ टाईअप हुआ है। यहां से कार्डधारक किसी भी अस्पताल में जाकर अपना इलाज करा सकता है। अभी इन अस्पतालों की सूची जारी नहीं की गई। आज इन अस्पतालों के प्रमुख अधिकारी व स्कीम के नोडल अधिकारी के बीच मीटिंग हो रही है। इसमें इन अस्पतालों को स्कीम के बारे में जानकारी दी जाएगी। उन्हें बताया जाएगा कि स्मार्ट कार्ड का कैसे और किस तरह प्रयोग किया जाएगा। क्या कहते हैं अधिकारीः आरबीएसवाई के नोडल अधिकारी डॉ. रवि विमल के अनुसार लक्ष्य अधिक से अधिक बीपीएल परिवारों को सुविधा का लाभ देना है। इसमें पार्षदों के सहयोग से काफी हद तक कामयाब भी हुए हैं। अभी तक 28 हजार परिवारों के स्मार्ट कार्ड बनाए गए हैं। उन्होंने कहा वार्ड वाइज कार्ड बनाने का कार्य पूरा हो चुका है, लेकिन सरकारी आंकड़ों की तुलना अभी काफी परिवार इस सुविधा से महरूम हैं। ऐसे परिवारों के लिए फिर से टीमों को स्मार्ट कार्ड बनाने के लिए भेजा जा रहा है(दैनिक भास्कर,फरीदाबाद,29.10.2010)।

आगे चलें...

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

आपका स्वास्थ्य और एज कैलकुलेटर

आपकी सही उम्र क्या है? आप अपनी उम्र से अधिक उम्र के दिखते हैं या कम उम्र के या उम्र के अनुरूप,जानने के लिए www.realage.com पर लॉगिन करें। इस वेबसाइट की सहायता से आप अपनी उम्र का कैलकुलेशन कर सकते हैं और खुद को युवा महसूस करने के लिए योजना बना सकते हैं।

www.healthstatus.com पर लॉगिन करें। इस वेब साइट की सहायता से आप स्वास्थ्य के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और यह भी सीख सकते हैं कि कौन-कौन सी आदतें आपकी स्वास्थ्य देखभाल पर आने वाले खर्चे कम कर सकती हैं और आपके जीवन को 10 से 15 वर्ष तक बढ़ा सकती हैं।

अधिक टिप्स के लिए देखें www.itips.desimartini.com

(हिंदुस्तान,दिल्ली,27.10.2010)


आगे चलें...

महामारियों से लड़ने के लिए योजना तैयार

पहले से मौजूद बीमारियों के अलावा स्वाइन फ्लू (एच1एन1) जैसी नई महामारियों से लड़ने के लिए तकनीकी महारत हासिल करने पर अब हमारे देश में भी खास तवज्जो दी जाएगी। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने गंभीर बीमारियों से बचाव और इनको काबू करने के लिए 382.41 करोड़ रुपये की लागत से एक महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है। इसके तहत मौजूदा राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) को अमेरिका के प्रसिद्ध रोग नियंत्रण केंद्र (सीडीसी, अटलांटा) की तर्ज पर विकसित किया जाना है। योजना आयोग से मंजूरी मिलने के बाद इसकी विस्तृत योजना स्वास्थ्य मंत्रालय ने तैयार कर ली है। इसे जल्दी ही आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीईए) की मंजूरी के लिए पेश किया जाएगा। स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक भारत में बीमारियों के बढ़ते दबाव को देखते हुए इससे लड़ने के लिए दोतरफा रणनीति की जरूरत महसूस की गई है। इसके तहत एक ओर जहां राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसे कार्यक्रम के जरिए आधारभूत स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत किया जा रहा है, वहीं तकनीकी और विशेषज्ञता के स्तर पर भी गंभीर तैयारियों की जरूरत देखी गई है। इसलिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने 382.41 करोड़ रुपये की लागत से राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र को आधुनिकतम संस्थान के तौर पर विकसित करने की योजना बनाई है। स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद चाहते हैं कि इसे मार्च, 2013 तक पूरा कर लिया जाए। योजना आयोग की मंजूरी मिलने के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत आने वाली कंपनी एचएससीसी ने इसकी विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार कर ली है। इस काम के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के अलावा अमेरिकी रोग नियंत्रण केंद्र से भी सलाह ली गई है। इसके तहत एनसीडीसी में पर्याप्त संख्या में आर्द्र और शुष्क प्रयोगशालाएं, बायोसेफ्टी लेवल दो और तीन की प्रयोगशालाएं बनाने के अलावा बड़ी संख्या में विशेषज्ञों को नियुक्त करने की योजना है। साथ ही, इसके जरिए मौजूदा और संभावित चुनौतियों से लड़ने के लिए जरूरी तकनीक हासिल करने पर जोर दिया जाएगा। देश भर में खासकर गंभीर बीमारियों से लड़ने के लिए यह केंद्र काफी मददगार हो सकता है। ऐसे मामलों में यह राज्य सरकारों और केंद्रीय एजेंसियों को सलाह और विशेषज्ञ मदद उपलब्ध कराता है। एनसीडीसी की शुरुआत 1909 में केंद्रीय मलेरिया ब्यूरो के तौर पर हुई थी। बाद में इसकी जिम्मेदारियां बढ़ती गई। अब यह राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र के तौर पर सभी तरह के संक्रामक और गैर संक्रामक बीमारियों से बचाव के उपाय और रणनीति के लिए काम करता है। पिछले साल व्यापक पैमाने पर फैले स्वाइन फ्लू के दौरान इसकी तकनीकी क्षमता का फायदा देश भर में मिल सका(मुकेश केजरीवाल,दैनिक जागरण,दिल्ली,28.10.2010)।

आगे चलें...

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

फरीदाबादः 'मेंसुअल हाइजीन' अभियान में आशा वर्कर्स और टीचर्स करेंगी मदद

गांवों में चलने वाले 'मेंसुअल हाइजीन' अभियान में किशोरियों तक पहुंचने के लिए जिला स्वास्थ्य विभाग ने आशा वर्कर्स और स्कूल टीचर्स को चुना है। विभाग का कहना है कि आशा वर्कर्स उसी गांव की बहू और बेटी हैं और टीचर्स किसी अन्य के मुकाबले लड़कियों से ज्यादा आसानी से और बेहतर तरीके से बात कर सकती हैं। गौरतलब है कि जिले के ग्रामीण अंचल में किशोरियों को मासिक धर्म के समय होने वाली परेशानियों को ध्यान में रखकर हरियाणा स्वास्थ्य विभाग 'मेंसुअल हाइजीन' नाम से एक अभियान चला रहा है। इसमें विभाग की योजना किशोरियों को 10 रुपये में सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने की है। इस योजना में आशा वर्कर्स को शामिल करने का मुख्य कारण है कि ये उसी गांव की बहू-बेटियां हैं और गांव की हर लड़की को निजी तौर पर जानती हैं। उनके और स्वास्थ्य विभाग के बीच पुल का काम करती हैं। लड़कियों की परेशानियों को स्वास्थ्य विभाग तक और विभाग की योजनाओं को उन तक आसानी से पहुंचा सकती हैं। गांवों के स्कूलों में पढ़ाने वाली टीचर्स भी विभाग की इस योजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। हरियाणा स्वास्थ्य विभाग सैनिटरी नैपकिन बनाने का काम किसी सेल्फ हेल्प गु्रप को सौंपना चाहता है, ताकि इस काम से उन्हें भी कुछ फायदा हो सके। पंचकुला में इस काम को दो सेल्फ हेल्प ग्रुप कर रहे हैं। इसके बाद ये सेल्फ हेल्प ग्रुप नैपकिन की सप्लाई पीसीएच सेंटर को देंगे। यहां वे आरसीएच सेंटर पर और आरसीएच सेंटर से एरिया की एएनएम उनसे सैनिटरी नैपकिन लेकर आशा वर्कर और टीचरों को देंगी। इन्हें ये साढ़े 7 रुपये में दिए जाएंगे। आगे ये लड़कियों को 10 रुपये में इन्हें देंगी। इसके अलावा, जो भी अतिरिक्त खर्च आएगा, उसे एनआरएचएम के बजट में से पे किया जाएगा। इस योजना के तहत विभाग आशा वर्कर्स और टीचर्स को भी फायदा देना चाहता है, ताकि वे अधिक से अधिक लड़कियों तक पहुंच सकें। इस योजना से संबंधित अधिकारी जिला डिप्टी सिविल सर्जन डॉक्टर अनूप ने बताया कि सभी आरसीएच और पीसीएच सेंटर के एसएमओ, एलएचवी और एमओ को टे्रेनिंग दे दी गई है। उन्होंने बताया कि 15 अक्टूबर तक एएनएम और आशा को ट्रेनिंग देने का काम भी पूरा हो जाएगा। फिलहाल सैनिटरी नैपकिन बनाने का काम किसे दिया जाए, इस पर बात अटकी हुई है। यह फैसला हो जाने के बाद योजना को शुरू कर दिया जाएगा(नवभारत टाइम्स,फरीदाबाद,9.10.2010)।

आगे चलें...

सोमवार, 6 सितंबर 2010

आ गया मां और बच्चे की सेहत का गारंटी कार्ड!

देखने में यह भले ही एक और सरकारी दस्तावेज लगे, लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय इसे मां और बच्चे की सेहत का गारंटी कार्ड बता रहा है। जच्चा-बच्चा रक्षा कार्ड नाम का यह दस्तावेज ही अब बच्चे का जन्म प्रमाणपत्र भी होगा और मां व बच्चे का टीकाकरण कार्ड भी। साथ ही गर्भवती मां और तीन साल तक के बच्चे को सेहत संबंधी सभी जरूरी सुविधाएं दिलाने का जरिया भी यही बनेगा। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर दिए जाने वाले मौजूदा जच्चा-बच्चा कार्ड के मुकाबले इसे बहुत बड़ी पहल बताते हुए स्वास्थ्य सचिव सुजाता के. राव कहती हैं, यह जननी और नवजात का अधिकार पत्र है। गर्भवती महिला के स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने का इंतजार करने की बजाय इसे हर जच्चा तक खुद पहुंचाने की योजना बनाई गई है। इसके लिए देश भर में 10,79,000 आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और 7,31,000 आशा कार्यकर्ताओं का सहारा लिया जाएगा। इसे स्वास्थ्य अधिकार पत्र कहने के पीछे उनका तर्क है कि चाहे जांच हों या दूसरी सुविधाएं, जब एक बार सरकारी दस्तावेज में उन्हें इनके बारे में बताया जा रहा है तो निश्चित तौर पर वे इन पर दावा कर सकेंगी। फिर चाहे गर्भवती महिला सरकारी स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे या फिर प्राइवेट अस्पताल। इससे स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करवाने वालों को भी आसानी होगी क्योंकि इसमें मां और बच्चे की सेहत का संपूर्ण रिकॉर्ड दर्ज होगा। यह जच्चा-बच्चा को मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं का एक तरह से मानकीकरण है। टीकाकरण की सारी तारीखें तो इसमें होंगी ही, अब हर महिला को पता होगा कि रक्तचाप, मधुमेह, हीमोग्लोबिन, ब्लड ग्रुप और वजन की कितनी बार जांच होनी चाहिए। आयरन और फोलिक एसिड की सौ दिन की गोलियां जरूर मिलनी चाहिए। यह एक तरह से स्वास्थ्य ढांचे की बेहतरी और क्वालिटी गारंटी के लिए हर नागरिक को निगरानी के लिए प्रेरित करेगा। हिंदी, अंग्रेजी सहित सभी भारतीय भाषाओं में तैयार किए गए इस कार्ड में बच्चे के जन्म के सभी जरूरी ब्योरों के साथ ही जन्म पंजीकरण संख्या भी शामिल की गई है। यह बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र का काम भी करेगा। इसी तरह इसमें चित्र के जरिए बच्चे के विकास की हर अवस्था को विस्तार से समझाया गया है। उस दौरान मां क्या कर सकती है और बच्चे में क्या-क्या बदलाव और विकास दिखाई देने चाहिए, इसकी जानकारी दी गई है। इसमें बच्चे के तीन साल तक के विकास का एक ग्राफ है, जिसमें हर महीने बच्चे के सेहत संबंधी आंकड़े डाल कर लगातार यह समझा जा सकता है कि उसका पर्याप्त विकास हो रहा है या नहीं(मुकेश केजरीवाल,दैनिक जागरण,दिल्ली,6.9.2010)।

आगे चलें...

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

सरकार बांटेगी सैनिटरी नैपकिन

*अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 150 जिलों की किशोरियों को मुफ्त में केंद्र देगा यह सुविधा *इससे नवजात शिशु मृत्यु दर और मातृत्व मृत्यु दर में कमी लायी जा सकेगी सार्थक पहल
नवजात शिशु मृत्यु दर और मातृत्व मृत्यु दर में कमी लाने के लिए सरकार देश भर के चिकित्सकों को तैयार कर रही है। इसके साथ ही केन्द्र ने अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करने के लिए देश के करीब 150 जिलों की किशोर लड़कियों को सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने की योजना बनायी है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नबी आजाद ने सोमवार को यहां ’वैश्विक मानसिक स्वास्थ्य सम्मेलन‘ का उद्घाटन करते हुए कहा कि सामान्य डाक्टरों को आपातकालीन सेवाओं में जीवन रक्षक कौशल के साथ शामिल होने के लिए तैयार किया जा रहा है। इनकी सेवाओं से नवजात शिशु मृत्यु दर और मातृत्व मृत्यु दर में कमी लायी जा सकेगी। उन्होंने बताया कि जननी सुरक्षा योजना मातृत्व मृत्यु दर में कमी लाने के उद्देश्य से बनायी गयी थी पिछले वित्तीय वर्ष के दौरान 10 लाख से अधिक गर्भवती महिलाओं को इसका लाभ मिला है। आजाद ने कहा कि इस कार्यक्र म को अमल में लाने के लिए वर्तमान में सात लाख महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को देश के विभिन्न भागों में तैनात किया जा चुका है। सरकार इस योजना पर मोटी रकम खर्च कर चुकी है। स्वास्थ्य मंत्री ने देश में किशोरवय में गर्भावस्था की घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार की घटनाओं से देश में नवजात शिशु मृत्यु और मातृत्व मृत्यु दर में वृद्धि होती है। उन्होंने इस मुद्दे पर सम्मेलन में बहस करने का आह्वान करते हुए कहा कि वे तरीके निकाले जाने चाहिए जिससे हम किशोर वर्ग को अच्छी से अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करा सकें। आजाद ने कहा कि देश में ऐसे 150 जिलों की पहचान कर ली गयी है जहां अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करने के लिए किशोर लड़कियों को सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराये जाएंगे। सरकार प्राइमरी स्वास्थ्य केंद्रों और पंचायत स्तर पर भी महिलाओं को गर्भनिरोधक उपलब्ध कराएगी। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि सरकार ने देश में कम स्वास्थ्य मानक वाले 264 ऐसे जिलों की पहचान कर ली है। ऐसे जिलों को स्वास्थ्य अवसंरचना और स्वास्थ्य कार्यकताओं के कौशल उन्नयन के निर्माण में अतिरिक्त समर्थन दिया जा रहा है । उन्होंने कहा कि अतिरिक्त प्रोत्साहन के रूप में 40 प्रतिशत अतिरिक्त राशि उपलब्ध करा कर इन स्थानों पर सेवारत डाक्टरों को बढ़ाया जाएगा। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने इस अवसर पर स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले सार्वजनिक व्यय में तीन गुना वृद्धि का समर्थन किया जो वर्तमान समय में सकल घरेलू उत्पाद का केवल 1.2 प्रतिशत है(राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,31.8.2010)।

आगे चलें...

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

छत्तीसगढ़ःकटे होंठों पर खिलेगी मुस्कान

छत्तीसगढ़ के आदिम जाति और अनुसूचित जाति विकास विभाग द्वारा समाज सेवी संस्था 'स्माइल ट्रेन' के सहयोग से छत्तीसगढ़ में कटे-फटे होठों और विकृत तालुओं से परेशान लोगों के चेहरों पर आपरेशन के जरिए मुस्कान लाने की एक बड़ी योजना की शुरूआत की गयी है। ऑपरेशन मुस्कान के तहत इस योजना में अब तक राज्य के एक हजार 400 से ज्यादा लोगों को नि:शुल्क प्लास्टिक सर्जरी के जरिए एक नया हॅस-मुख जीवन दिया जा चुका है, जिनमें एक बड़ी संख्या आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों की भी है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने गुरुवार की शाम यहां प्लास्टिक कॉस्मेटिक सर्जरी के विशेषज्ञ डॉ. सुनील कालड़ा के अस्पताल में ऐसे अनेक बच्चों से मुलाकात की, जिनके चेहरों पर 'ऑपरेशन मुस्कान' के जरिए बहुत जल्द एक नयी मुस्कान खिलने वाली है। आदिम जाति और अनुसूचित जाति विकास विभाग की ओर से इन बच्चों को यहां डॉ. सुनील कालड़ा के नर्सिंग होम में दाखिल कराया गया था। डॉ. कालड़ा ने बच्चों की प्लास्टिक सर्जरी की। ऑपरेशन के बाद ये बच्चे नर्सिंग होम में स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने इन बच्चों को अपना आशीर्वाद प्रदान किया और उन्हें फल वितरित किए और फूल भेंटकर अपनी शुभकामनाएं दी। डॉ. रमन सिंह ने उनके अभिभावकों से भी मुलाकात की। आदिम जाति और अनुसूचित जाति विकास विभाग के मंत्री केदार कश्यप, जगदलपुर नगर निगम के महापौर श्री किरण देव तथा आदिम जाति और अनुसूचित जाति विकास विभाग के सचिव आर.पी. मण्डल भी इस मौके पर उपस्थित थे। मुख्यमंत्री ने योजना के तहत सेवा भावना से ऑपरेशन कर रहे डॉ. कालड़ा और उनकी टीम के सदस्यों से भी मुलाकात की और उन्हें भी शुभकामनाएं दी। समाज सेवी संस्था 'द स्माइल ट्रेन' के प्रतिनिधि ने इस मौके पर बताया कि ऐसे प्रत्येक ऑपरेशन पर 15 हजार से 20 हजार रूपए तक खर्च आता है, लेकिन उनकी संस्था द्वारा ऐसे प्रत्येक आपरेशन के लिए दस हजार रूपए की धनराशि डॉ. सुनील कालड़ा को दी जा रही है। शेष राशि की रियायत नर्सिंग होम की ओर से दी गयी है। राज्य शासन के आदिम जाति और अनुसूचित जाति विकास विभाग द्वारा प्रदेश के प्रत्येक जिले में ऑपेरशन योग्य बच्चों की पहचान करने के बाद उन्हें उनके अभिभावकों के साथ राजधानी रायपुर तक लाने और घर वापसी का खर्च दिया जा रहा है। विभाग द्वारा उनकी भोजन व्यवस्था भी की जा रही है। योजना में बच्चों के अभिभावकों को ऑपरेशन के लिए अपनी ओर से कोई राशि खर्च नहीं करनी पड़ रही है। मुख्यमंत्री को अधिकारियों ने बताया कि आज इस नर्सिंग होम में ऑपरेशन के लिए 67 लोगों का पंजीयन किया गया, जिनमें छह माह से लेकर 50 वर्ष तक आयु समूह के बच्चे और वयस्क शामिल हैं। अधिकारियों ने बताया कि बस्तर जिले के 24, उत्तर बस्तर (कांकेर) जिले के 11, रायपुर जिले के 10, कबीरधाम (कवर्धा) जिले के 09, महासमुन्द जिले के 08 और दुर्ग जिले के 05 लोगों का आज पंजीयन किया गया। इनमें 50 बच्चे और शेष 17 बड़ी उम्र के लोग सम्मिलित हैं। प्रदेश में ऑपरेशन मुस्कान के तहत सभी 18 जिलों में लोगों को लाभान्वित किया गया है। सर्वाधिक 169 ऑपरेशन सरगुजा जिले के लोगों के हुए हैं। राजनांदगांव जिले के 150, रायगढ़ जिले के 140, बस्तर जिले के 125, जांजगीर-चांपा जिले के 123, उत्तर बस्तर (कांकेर) जिले के 110, कोरबा जिले के 107, रायपुर जिले के 103, महासमुन्द जिले के 102, कोरिया जिले के 98, धमतरी जिले के 71, बिलासपुर जिले के 63 और दुर्ग जिले के 51 मरीजों को इस योजना से फायदा मिला है। इनके अलावा कबीरधाम (कवर्धा) जिले के 33, जशपुर जिले के 30 तथा दक्षिण बस्तर (दंतेवाड़ा), नारायणपुर और बीजापुर जिलों में से प्रत्येक के 20 मरीजों के नि:शुल्क आपरेशन इस योजना के तहत किए जा चुके हैं(छत्तीसगढ़ न्यूज अपडेट डॉटकॉम,27.8.2010)।

आगे चलें...

खेल के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं तैयार

राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति का कहना है कि खेल के दौरान खिलाडि़यों, दर्शकों और आने वाले सभी मेहमानों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करने के लिए हम तैयार हैं। बृहस्पतिवार को राष्ट्रमंडल खेल सचिवालय में पत्रकारों से बातचीत के दौरान समिति ने अपनी तैयारियों का ब्यौरा पेश किया। समिति का कहना है कि खेल के दौरान खिलाडि़यों, मेहमानों और दर्शकों के लिए अति आधुनिक सुविधा मुहैया कराने की व्यवस्था की गई है। इसके तहत अस्पताल, खेल गांव में पॉली क्लीनिक, सभी स्टेडियम, प्रतियोगिता स्थल तथा ट्रेनिंग सेंटर में मेडिकल सेंटर बनाए गए हैं। यही नहीं दर्शकों के लिए प्रतियोगिता स्थल व प्रगति मैदान में बनाए गए मुख्य प्रेस सेंटर में फ‌र्स्ट एड की व्यवस्था की गई है। अस्पतालों में जीबी पंत, एम्स ट्रामा सेंटर, राममनोहर लोहिया की मुख्य भूमिका होगी, जो खेल के लिए पूरी तरह तैयार हैं। खेल गांव में बन रहा पॉली क्लीनिक सात सितंबर तक आयोजन समिति को सौंप दिया जाएगा, जबकि स्टेडियम में मेडिकल सेंटर बन कर तैयार है। खेल को सफल बनाने और स्वास्थ्य सुविधा के लिए कुल 1882 सदस्यों की एक टीम बनाई गई है, जिसमें 386 डाक्टर, 262 नर्स, आईएसआईसी, जामिया यूनिवर्सिटी और जीजीडी यूनिवर्सिटी से103 फीजियोथेरेपी, केरल से 95 मसाज थेरेपिस्ट तथा 179 मेडिकल स्टूडेंट ओर वॉलेंटियर्स को लगाया गया है। सुविधा के लिए 64 एंबुलेंस, 857 स्टाफ होंगे, जो एंबुलेंस के साथ साथ फस्ट एड के लिए तैयार रहेंगे। पॉली क्लीनिक खेल गांव के रेजिडेंशियल जोन में बनाया गया है जिसे अति आधुनिक सुविधाओं से लैस किया गया है। यहां 24 घंटे इमरजेंसी, मेडिसीन, इमरजेंसी डेंटल, जनरल सर्जरी, आर्थोपेडिक्स, ईएनटी आदि की सुविधाएं उपलब्ध रहेंगी। सभी जगहों में मेडिकल इक्वीपमेंट सेटअप कर दिया गया है। खेल के उदघाटन व समापन समारोह के लिए जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में स्पेशल व्यवस्था की गई है। कार्यक्रम में भाग लेने वाले कलाकार और दर्शकों के लिए भी पूरी व्यवस्था की गई है। खेल में इलाज के लिए चयनित सभी डाक्टरों को बेसिक लाइफ स्पोर्ट, एडवांस्ड कार्डिएक लाइफ स्पोर्ट और एडवांस्ड ट्रामा लाइफ स्पोर्ट ट्रेनिंग एम्स और आरएमएल में दिया गया है। इसके अलावा गैर प्रतियोगिता स्थल, होटलों में सुबह शाम दो घंटे के लिए डाक्टर और नर्स का दौरा होगा, जबकि चौबीस घंटे ऑन काल डाक्टर तैनात रहेंगे। नोएडा रोड रेस नोएडा प्रशासन द्वारा कवर किया जाएगा, इसके लिए फोर्टिस नोएडा को तैयार किया गया है(दैनिक जागरण,दिल्ली,27.8.2010)।

आगे चलें...

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

दिल्लीःआइस क्यूब के रूप में बिक रहा है धीमा जहर

अगर आप अपने घर में इस्तेमाल के लिए बाजार से आइस क्यूब खरीद रहे हैं तो सावधान। बाजार में बिकने वाली आइस क्यूब आपको किडनी व कैंसर जैसी घातक बीमारी का शिकार बना सकती है। यह खुलासा खाद्य एवं आपूर्ति विभाग ने अपनी एक विशेष रिपोर्ट में किया है। दरअसल इन दिनों राजधानी में बहुत सी जगहों पर स्वच्छ जल के बजाए हानिकारक तत्वों से युक्त बोरिंग के पानी से आइस क्यूब तैयार की जा रही है, जोकि स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है। विभाग की इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हुए पूर्वी जिला प्रशासन ने पटपड़गंज इलाके में चल रही एक आइस क्यूब की फैक्टरी को सील कर दिया है। वहीं, कई अन्य जगहों पर बर्फ के सैंपल लेकर उन्हें जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा है। जिला खाद्य एवं आपूर्ति विभाग ने जुलाई के महीने में बाजार में बिकने वाली आइस क्यूब के कुछ सैंपल लेकर उन्हें जांच के लिए भेजा था। जांच रिपोर्ट में पाया गया है कि मार्केट में बिकने वाली आइस क्यूब स्वच्छ जल से नहीं, बल्कि बोरिंग करके जमीन से निकाले हुए पानी से तैयार की गई है। यह पानी पीने लायक नहीं होता। इस तरह के पानी में कुछ ऐसे हानिकारक तत्व मिले होते हैं, जिनके सेवन से पेट संबंधी, किडनी व कैंसर जैसी बीमारियां मनुष्य के शरीर में होने लगती हैं। इस रिपोर्ट के आने के बाद पूर्वी जिला उपायुक्त एसएस घोंक्रोकता ने एसडीएम गांधी नगर डीपी सिंह, एसडीएम हुकम सिंह और एसडीएम उषा चतुर्वेदी को क्षेत्र में बिकने वाली आइस क्यूब के सैंपल भरने और बोरिंग के पानी से आइस क्यूब तैयार करने वाले लोगों की फैक्टरी सील करने के निर्देश जारी किए हैं। इस संबंध में एसडीएम उषा चतुर्वेदी की टीम ने पटपड़गंज इलाके में चल रही एक आइस क्यूब फैक्टरी पर छापा मारा और कर्मचारियों को बोरिंग के पानी से आइस क्यूब तैयार करते पकड़ा। एसडीएम ने तुरंत कार्रवाई करते हुए उक्त फैक्टरी को सील कर दिया है(पवन कुमार,दैनिक जागरण,पूर्वी दिल्ली,24.8.2010)।

आगे चलें...

सोमवार, 23 अगस्त 2010

अब घुटना प्रत्यारोपण में नहीं लगेंगे घंटों

नई तकनीक कस्टम मेड जिग्स ने नी रिप्लेसमेंट (घुटना प्रत्यारोपण) सर्जरी में आनेवाली कई दिक्कतों को आसान बना दिया है। इससे न केवल सर्जरी के दौरान समय का बचाव होगा, बल्कि मरीज भी जल्द सामान्य हो जाता है और आसपास की हड्डियों में होने वाले खतरे भी कम हो जाएगी। करेंट कंसेप्ट इन ऑर्थोप्लास्टी विषय पर एम्स में चल रहे दो-दिवसीय सेमिनार में पहली बार इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। सीनियर ऑर्थोपेडिक सर्जन डा. राजेश मल्होत्रा ने बताया कि अब तक घुटने रिप्लेसमेंट करने के लिए फुल साइज का ज्वाइंट मंगाया जाता है और ऑपरेशन थिएटर में ही सर्जरी के वक्त उसे काट -छांट कर मरीज के साइज का बनाकर लगाया जाता है। ऐसे में ऑपरेशन में कई घंटे लग जाते हैं और ज्वाइंट का साइज परफेक्ट नहीं होने से आसपास की हड्डियों को भी नुकसान पहुंचाता है। इससे दोबारा रिप्लेसमेंट की नौबत आने तक आसपास की हड्डियां काफी ज्यादा घिस चुकी होती हैं और ऑपरेशन के लिए डोनेटेड बोन की ज्यादा जरूरत होती है। मगर नई तकनीक ने ये सारी दिक्कतें दूर कर दी हैं। डाक्टर का कहना है कि कस्टम मेड जिग्स घुटने के लिए उम्मीद की नई किरण है। इसमें मरीज के घुटने का एमआरआई स्कैन करके अमेरिका भेजा जाता है और उसके आधार पर नायलॉन की कटिंग करके ब्लॉक तैयार किया जाता है। यह इस्तेमाल के लिए पूरी तरह से तैयार होता है और सीधा इसे अलाइनमेंट के साथ फिट कर दिया जाता है। इसमें सर्जरी का खर्च 20-25 हजार रुपये बढ़ जाने की उम्मीद है। इस मौके पर इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के महानिदेशक डा. वीएम कटोच ने बताया कि हड्डियों की बीमारियों के बारे में लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से जल्द ही नेशनल बोन डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम शुरू किया जाएगा। इसके लिए आईसीएमआर ने प्रपोजल तैयार कर लिया है। हड्डियों की बीमारियों के बारे में ज्यादा रिसर्च करने और ज्वाइंट रिप्लेसमेंट की नई-नई तकनीक वाले मैटीरियल बनाने के लिए भारतीय कंपनियों को प्रमोट करने की भी जरूरत है। मगर ज्यादातर डाक्टरों की यह मानसिकता बन चुकी है कि यहां के प्रोडक्ट की गुणवत्ता अच्छी नहीं है(दैनिक जागरण,दिल्ली,23.8.2010)।

आगे चलें...

शनिवार, 21 अगस्त 2010

गोरखपुर और बस्ती में 70 लाख बच्चों को लगेंगे जेई के टीके

गोरखपुर व बस्ती मंडल में जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) व एईएस की रोकथाम के लिए केंद्र सरकार 75 लाख डोज जेई वैक्सीन उपलब्ध करायेगी। माह अंत तक आने वाली वैक्सीन के टीके इन दोनों मंडलों के 15 वर्ष तक के 70 लाख बच्चों को नवंबर में लगाये जायेंगे। सूबे में स्वाइन फ्लू पर प्रभावी रोकथाम के लिए भी राज्य सरकार ने तमाम निर्देश दिये हैं। कहा गया है कि स्वाइन फ्लू से प्रभावित साधारण लक्षण वाले रोगियों के घर दवायें पहुंचायी जायें। स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार मिश्रा ने शुक्रवार को राज्य के सभी अपर निदेशकों व मुख्य चिकित्सा अधिकारियों के साथ वीडियो कान्फ्रेंसिंग की। मंत्री ने सूबे में स्वाइन फ्लू (इन्फ्लूजा-ए एच-1 एन-1) रोग के प्रभावी नियंत्रण की तैयारियों की समीक्षा करते हुए निर्देश दिया कि सभी जिलों में नियंत्रण कक्ष हर समय क्रियाशील रहें। रैपिड रिस्पांस टीम एंबुलेंस के साथ उपलब्ध रहे व जिला चिकित्सालयों में 10 बेड वाला आईसोलेशन वार्ड सुनिश्चित किया जाये(दैनिक जागरण,लखनऊ,21.8.2010)।

आगे चलें...

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

बिहारःअगले महीने से अधिकतर टेस्ट फ्री

पहली सितंबर से प्रदेश के सभी मेडिकल कालेज अस्पतालों में मरीजों को किसी भी प्रकार की क्लीनिकल जांच कराने पर फीस नहीं देनी होगी। उन्हें एमआरआई और सीटी स्कैन छोड़कर हर प्रकार की जांच की मुफ्त सुविधा उपलब्ध करायी जाएगी। अब तक यह सुविधा जिला अस्पतालों तक ही सीमित थी। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधा बेहतर बनाने के लिए प्रत्येक राजस्व गांव को दस हजार की राशि उपलब्ध करायी जाएगी। प्रधान स्वास्थ्य सचिव सीके मिश्रा और राज्य स्वास्थ्य समिति के कार्यकारी निदेशक संजय कुमार की उपस्थिति में स्वास्थ्य मंत्री नंदकिशोर यादव ने गुरुवार को संवाददाता सम्मेलन में कहा कि पहले हर प्रकार के रेडियोलोजिकल एवं पैथोलोजिकल जांच की मुफ्त सुविधा प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र से लेकर जिला अस्पताल तक उपलब्ध थी। अब यह सुविधा सभी मेडिकल कालेज अस्पतालों में भी पहली सितंबर से उपलब्ध रहेगी। कुछ जांच को आउटसोर्स किया गया था। तकनीकी कारणों से ये सभी जांच 10 सितंबर से मुफ्त हो पाएंगे। यह सुविधा बीपीएल एवं एपीएल सभी के लिए उपलब्ध रहेगी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत प्रत्येक राजस्व गांव में ग्रामीण स्वास्थ्य एवं स्वच्छता समिति के गठन की अवधारणा है। पंचायत स्तर पर ये समिति बनायी गयी है, और उन्हें उनके अधीन पड़ने वाले प्रत्येक राजस्व गांव के लिए सालाना दस हजार की राशि मुहैया करायी जा रही है। उद्देश्य है कि गांव के स्तर पर ही बीमार का इलाज करा दिया जाए। गंभीर बीमारी के मामले में समिति उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र या जिला अस्पताल रेफर करेगी। समिति का सचिव एएनएम को बनाया जाएगा। समिति गांवों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता अभियान भी चलाएगी। समिति के संचालन के लिए गाइडलाइन तैयार कर लिया गया है(दैनिक जागरण,पटना,20.8.2010)।

आगे चलें...