स्त्री-रोग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
स्त्री-रोग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

रजोनिवृत्ति और हारमोन रिप्लेसमेंट थैरेपी

रजोनिवृत्ति की ओर बढ़ रही महिलाओं की मुख्य चिंता यह रहती है कि वे हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी कराएँ या नहीं। रजोनिवृत्ति के बाद इस्ट्रोजेन, टेस्टॉस्टेरॉन और प्रोजेस्ट्रोन जैसे हारमोन का स्तर बनाए रखने के लिए महिलाओं को रोजाना हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी दी जाती है। स्त्रीरोग विशेषज्ञ मरीज देखने के बाद ही तय करती हैं कि मरीज को पैच लगाना है या क्रीम से ही काम चल सकता है। 

अक्सर यह प्रश्न पूछा जाता है कि एक उम्र के बाद महिलाओं को ही हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी क्यों करवाना पड़ती है। इसका उत्तर यह है कि महिलाओं के शरीर में रजोनिवृत्ति की शुरूआत होते ही ये हारमोन बनना कम होने लगता है। एक समय बाद इनका उत्पादन पूरी तरह बंद हो जाता है। इनकी अनुपस्थिति में महिलाओं को हॉट फ्लेशेस आते हैं। रात को सोते समय चेहरा और धड़ पसीने-पसीने हो जाता है। अनिद्रा की समस्या होती है तथा मूड स्विंग होने लगते हैं। योनि शुष्क हो जाती है। इन सब लक्षणों के चलते महिला के जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होने लगती है। सभी महिलाओं को हारमोन रिप्लेसमेंट की जरूरत होती है ऐसा भी नहीं है।

रजोनिवृत्ति के लक्षणों का असर कम करने के लिए क्या करें? 
हॉट फ्लेशेस, रात को सोते समय पसीने में भीग जाना, अनिद्रा, शुष्क योनि एवं यौनेच्छा में कमी को दूर करने के लिए महिलाएं जीवनशैली में परिवर्तन कर सकती हैं। नियमित एक्सरसाइज, स्वास्थप्रद भोजन तथा तनाव शैथिल्य के लिए योग एवं ध्यान से मदद मिलती है। इसके अलावा जिन महिलाओं को हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी सूट नहीं करती है उन्हें अवसाद दूर करने वाली औषधियाँ लेने की सलाह भी चिकित्सक दे सकते हैं।

क्या सोयाबीन के प्रयोग की वैकल्पिक चिकित्सा फायदेमंद होगी? 
अध्ययन बताते हैं कि प्राकृतिक चिकित्सा का रजोनिवृत्ति के लक्षणों पर बहुत फायदेमंद नहीं होती। सोयाबीन से हॉट फ्लेशेस एवं पसीना आने जैसे लक्षणों कुछ फायदा तो होता है लेकिन जो महिलाएं हारमोन से संबंधित स्तन, गर्भाशय एवं अंडाशय कैंसर के जोखिम पर हैं उनके लिए यह घातक भी साबित होता है। 

क्या मेरी हारमोन थेरेपी के लिए यह सही वक्त है? 
यह तथ्यों पर निर्धारित होता है कि हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी आपके लिए सर्वश्रेष्ठ विकल्प है या नहीं। इसमें उम्र सबसे महत्वपूर्ण बिंदु होता है। यह स्त्रीरोग विशेषज्ञ तय करेंगे कि क्या आपका गर्भाशय निकालना ठीक रहेगा या नहीं। या कि आपके परिवार में स्तनकैंसर की हिस्ट्री है या नहीं। इन सब तथ्यों पर विचार के बाद ही तय किया जाता है कि महिला को हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी देना है या नहीं।

क्या जोखिम हैं 
हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी दो धारी तलवार पर चलने जैसा है। कई महिलाओं में इस थेरेपी से स्तनकैंसर, दौरे पड़ने तथा खून के थक्के जमने का जोखिम होता है। यदि केवल इस्ट्रोजेन नामक हारमोन की खुराक ही दी जा रही हो तो स्तनकैंसर का जोखिम भी कम रहता है। कुल मिलाकर इस थेरेपी के नुकसान एवं फायदों को पूरी तरह तौलकर ही शुरूआत की जाती है।

क्या हैं फायदे 
इस्ट्रोजेन रिप्लेसमेंट से रजोनिवृत्ति के दौरान हॉट फ्लेशेस तथा योनि शुष्कता की समस्या से राहत मिल सकती है। इसी के साथ महिला को बड़ी आँत के कैंसर का जोखिम भी कम होता है। उम्र के साथ नज़र कमजोर होने तथा हड्डियों के क्षरण की भी रोकथाम हो सकती है।

कितनी अवधि तक लें 
अधिकाँश महिलाओं को न्यूनतम खुराक को अल्पतम समय के लिए देना ही पर्याप्त होता है। ऐसे भी प्रमाण मिले हैं कि थेरेपी लेने के पाँच साल बाद भी स्तन कैंसर, खून के थक्के बनना जैसी समस्याएँ सिर उठाती हैं। 

क्या थैरेपी लेना बंद करने पर समस्या फिर उठेगी? 
हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी लेना बंद करने के बाद पहले वाले लक्षण पुनः आ जाते हैं। कुछ महीनों तक धीरे-धीरे कम होने वाली खुराक के जरिए इनसे छुटकारा पाया जा सकता है। 

अस्थि-क्षरण रोकने के लिए क्या करें? 
इस्ट्रोजेन थेरेपी से अस्थिक्षरण को रोकने में मदद मिलती है लेकिन हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी केवल अस्थिक्षरण को ठीक करने या इसे रोकने के लिए इस्तेमाल नहीं की जाती है। हड्डियों का स्वास्थ ठीक रखने के और भी कई वैकल्पिक उपाए मौजूद हैं। वजन उठाने वाली कसरतों के साथ भरपूर कैल्शियम तथा विटामिन डी युक्त आहार से फायदा होता है(सेहत,नई दुनिया,सितम्बर 2012 द्वितीयांक)।

आगे चलें...

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

वज़न घटाएं,हॉट फ्लैशेज से बचें

लो फैट डायट और प्रचूर मात्रा में फल व सब्जियाँ व अंकुरित साबुत अनाज लेकर महिलाएँ फॉट फ्लेशेज़ की समस्या से निजात पा सकती हैं। आहार में यह सभी चीज़ें शामिल करने से सभी आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त हो जाते हैं और फैट कम होने के कारण मोटापे की आशंका भी कम होती है। ताज़ा शोध-अध्ययन से पता चला है कि यह रजोनिवृत्ति के समय दिखाई देने वाले अप्रिय लक्षणों और फॉट फ्लेशेज़ से बचने का कारगर उपाय हो सकता है। 

लोफैट आहार लेने के बाद मोटी महिलाओं का वज़न घट गया, जिससे उन्हें पहले की तरह हॉट फ्लेशेज़ और नाइट स्वेट की परेशानी नहीं होती थी। नॉर्दन कैलिफोर्निया के रिसर्च डिविज़न में हुई इस रिसर्च में यह बात सामने आई। यहाँ की सीनियर साइंटिस्ट और रिसर्चर डॉ. बेटी कान के अनुसार डायट में इन सभी बातों का ध्यान रखने पर उन महिलाओं को भी फायदा हुआ, जिनके वज़न में कोई कमी नहीं आई थी। इन्हें रजोनिवृत्ति के समय काफी कम तकलीफें पेश आई थीं। सबसे कम तकलीफें उन महिलाओं को हुई थी जो लंबे समय से इस डायट को फॉलो कर रही थीं जिससे उनका वज़न भी घटा था। जर्नल मेनोपॉज़ में यह शोध प्रकाशित हो चुका है। डॉ. कान के मुताबिक रजोनिवृत्ति के आसपास करीब ८० प्रतिशत महिलाओं को अचानक गर्मी लगने और पसीने छूटने जैसी परेशानियाँ पेश आती हैं। इनमें से लगभग आधी महिलाओं को यह लक्षण गंभीर रूप से महसूस करती हैं। अन्य को हल्के या फिर कुछ अधिक लक्षण महसूस होते हैं। 

एक अन्य अध्ययन में विशेषज्ञों ने पाया कि जिन महिलाओं का शरीर भारी, बॉडी-मास इंडेक्स अधिक या फिर फैट का प्रतिशत अधिक था उन्हें रजोनिवृत्ति के समय अधिक परेशानियाँ पेश आती हैं। अध्ययन में ४९,००० महिलाएँ शामिल हुई थीं, जिनमें से ४० प्रतिशत लो फैट डायट ले रही थीं। बाकी ६० प्रतिशत महिलाओं को तुलनात्मक अध्ययन के लिए शामिल किया गया था। रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में हृदय रोग, फ्रैक्चर, स्तन कैंसर और कोलोन कैंसर जैसी बीमारियों में लो फैट डायट के प्रभावों का अध्ययन करना इस शोध का मुख्य उद्देश्य था। डॉ. कान और उनकी टीम ने १७,००० से भी अधिक महिलाओं पर अध्ययन को केंद्रित किया था। शोध शुरू होने के समय इनकी उम्र ५० से ७९ वर्ष थी। इनमें से कोई भी महिला हारमोन थैरेपी पर नहीं थी। 

लो फैट डायट लेने वाली महिलाएं केवल 20प्रतिशत कैलोरी फैट के ज़रिए प्राप्त कर रही थीं। ये फलों और सब्ज़ियों के 5 सर्विंग और साबुत अनाज के 6 सर्विंग रोज़ाना ले रही थीं। इन सभी महिलाओं ने रजोनिवृत्ति के समय पेश आने वाले लक्षणों के बारे में बताया कि उन्हें क्या-क्या लक्षण महसूस हुए,यह कितनी बार और किस तीव्रता से सामने आए।

लक्षण
-हल्के लक्षण, जिनसे दिन ब दिन की गतिविधियाँ प्रभावित नहीं होती।

-कुछ अधिक, जिससे दैनिक जीवन थोड़ा बहुत प्रभावित होता है।

-गंभीर लक्षण, जिनके कारण महिलाएँ अपने रोज़मर्रा के कार्य भी नहीं कर पाती थी। 

क्या आया सामने? 
शोध के शुरूआत में २६ प्रतिशत महिलाओं को हॉट फ्लेशेज़ की समस्या होती थी। इन्हें हल्के लक्षण महसूस होते थे। २७ प्रतिशत को नाइट स्वेट के हल्के लक्षण महसूस होते थे। जिन महिलाओं ने लो फैट डायट फॉलो की, उनका वज़न घटने की संभावना ३ गुना अधिक थी।

इसके विपरीत लो फैट डायट नहीं लेने वाली महिलाओं में वज़न बढ़ने की आशंका २ गुना अधिक थी। एक साल से लो फैट डायट ले रही महिलाओं में रजोनिवृत्ति के कारण होने वाली समस्याएं कम होने की संभावना कहीं अधिक पाई गई। 

जिन महिलाओं को थोड़े अधिक या गंभीर लक्षण महसूस होते थे,वे 22 पाउंड वज़न घटाकर इन तक़लीफों को काफी कम कर पाईं थीं। जिन महिलाओं को हलके लक्षण महसूस होते थे,उन्हें केवल 10 पाउंड वज़न घटाकर ही इन लक्षणों से निज़ात मिल गई थी। 

अध्ययन में एक आश्चर्यजनक बात यह सामने आई कि लो-फैट डायट ले रही उन महिलाओं को भी फ़ायदा हुआ जिनके वज़न में कोई कमी नहीं आई थी या फिर जिनका वज़न कम होने की बजाए थोड़ा बढ़ गया था। डॉ. कान ने इस अध्ययन में पाया कि आहार में परिवर्तन के ज़रिए वज़न घटाकर रजोनिवृत्ति के कारण होने वाली परेशानियों को कम किया जा सकता है और इनसे निज़ात भी पाई जा सकती है(सेहत,नई दुनिया,अगस्त,2011 तृतीयांक)

आगे चलें...

बुधवार, 6 जून 2012

बढ़ता वज़न और अनियमित मासिक है ख़तरनाक

अगर आपका वेट लगातार बढ़ रहा है या पीरियड्स रेग्युलर नहीं हो रहे, तो तुरंत अलर्ट हो जाएं। यह पीसीओएस डिजीज हो सकती है। इसमें जहां महिलाओं में कंसीव करने की पावर कम होती जाती है, वहीं कैंसर होने के चांस भी कई बढ़ जाते हैं। जानते हैं इसके बारे में : 

अगर आपकी बॉडी और फेस के बालों की लेंथ अचानक बढ़ने लगी है या वेट बढ़ रहा है, तो इसे हल्के से न लें। दरअसल, ये पीसीओएस डिजीज (पॉलीसाइटिस ओवेरियन सिंड्रोम) हो सकती है। बता दें कि पीसीओएस एक ऐसी डिजीज है जिससे कैंसर होने के चांस 10 फीसदी बढ़ जाते हैं। यही नहीं, इससे कंसीव न करने के चांस भी 70 पर्सेंट बढ़ जाते हैं। गौरतलब है कि इसमें पीरियड्स भी रेग्युलर नहीं होते। 

आईवीएफ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह प्रॉब्लम 80 प्रतिशत हॉर्माेन से जुड़ी हुई है और 20 प्रतिशत हेरिडिटी से। इसमें महिला की ओवरी में एक हार्ड लेयर डेवलप हो जाती है जिससे ओवेल्यूशन नहीं हो पाता। नतीजतन बॉडी में एंड्रोजेन और एलएच हॉर्माेन का लेवल बढ़ने लगता है। इसी वजह से कंसीव करने में दिक्कत आती है। आईवीएफ एक्सपर्ट आंचल कहती हैं, 'पीसीओएस की प्रॉब्लम होने पर पीरियड रेग्युलर नहीं होते और बॉडी फैट बढ़ता जाता है। इसमें एक समय बाद बीमारी पर कंट्रोल पाना खासा मुश्किल होता है, जिससे कई महिलाएं मेंटल टेंशन में आ जाती हैं।' 

कैंसर का खतरा 
अगर इस पर प्रॉब्लम समय रहते कंट्रोल ना किया जाए, तो कैंसर की चपेट में भी आ सकती हैं। आईवीएफ एक्सपर्ट नीरा कहती हैं कि पीसीओएस की प्रॉब्लम से जूझ रही महिलाओं की ओवरी में हार्मोन सामान्य से अधिक बनते हैं। इसकी वजह से अंडाणु सिस्ट या गांठ में तब्दील हो जाता है और कई बार कैंसर का रूप भी ले लेती है। वहीं, आंचल बताती हैं कि ये सिस्ट छोटी-छोटी थैलीनुमा शेप में होती हैं, जिनमें लिक्विड भरा होता है। इनका शेप धीरे- धीरे बढ़ता जाता है। 

पीरियड रेग्युलर नहीं 
न महिलाओं में यह बीमारी ज्यादा जल्दी अटैक करती है , जिनमें पीरियड्स रेग्युलर नहीं रहते। फेस , स्टमक और फिंगर्स जैसी जगहों पर अधिक बाल आने लगते हैं। इसके अलावा , स्किन ऑयली होती जाती है , बाल गिरने लगते हैं और फेस पर दाग धब्बे और मुंहासे हो जाते हैं। अगर समय रहते केयरफुल होकर न चला जाए , तो बच्चा न होना , शुगर और हाई कॉलेस्ट्रॉल की प्रॉब्लम हो सकती है। 

युवा भी चपेट में 
3 से 5 फीसदी युवा लड़कियों में यह बीमारी पाई जाती है , तो महिलाओं में इसका प्रतिशत 8 से 10 है। बच्चा न होने की यह खास वजह होती है। 16 से 25 वर्ष की युवतियां इसकी ज्यादा चपेट में हैं। डॉ . आंचल बताती हैं कि आमतौर पर यह प्रॉब्लम महिलाओं में 16 साल से लेकर 45 साल तक असर डालती है। 

इलाज है आसान 
पीसीओएस के इलाज के लिए कई दवाएं हैं। ऑपरेशन से भी सिस्ट निकाल कर बाहर किया जा सकता है। लेकिन अगर रुटीन ठीक रखा जाए , तो इस प्रॉब्लम से कई काफी हद तक छुटकारा खुद - ब - खुद मिल जाता है। वैसे , इस बीमारी की खास वजह फैट है। दरअसल , फैट बढ़ने से एस्ट्रोजन हॉर्मोन की क्वांटिटी में तेजी से इजाफा होता है जो ओवरी में सिस्ट बनाने के लिए जिम्मेदार माना जाता है। 

बॉडी में दिखें चेंज 
- बॉडी व फेस पर बालों का बढ़ना 
- स्किन प्रॉब्लम्स मसलन , दाग 
- धब्बे , मुंहासे और ब्राउन धब्बे होना। 
- पीरियड्स रेग्युलर न होना 
- कंसीव न कर पाना। 

ध्यान दें इन पर 
- जरूरी है रेग्युलर एक्सरसाइज 
- वेट को कंट्रोल करें 
- स्ट्रेस से दूर रहें 
- रुटीन को मैनेज करें 
- आईवीएफ कंसल्टेंट से एडवाइस लें(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,6.6.12)

आगे चलें...

सोमवार, 14 मई 2012

महिलाओं के मानसिक तनाव से जुड़ा है उनका हृदय-रोग

पैन्सिल्वेनिया अमेरिका में पैन स्टेट्स कॉलेज ऑफ मेडिसिन में हुए एक शोध अध्ययन से मालूम हुआ है कि तनाव ग्रस्त होने पर महिलाओं में हृदय की ओर रक्त का प्रवाह नहीं बढ़ता है। इसी शोध अध्ययन से पता चला है कि महिलाओं के हृदय को मानसिक तनाव का सामना करना पुरुषों के मुकाबले अधिक मुश्किल हो सकता है। 

अध्ययन के दौरान महिलाओं और पुरुषों को गणित का एक कठिन सवाल हल करने के लिए दिया गया। जैसा कि सोचा गया था, सवाल को हल करते हुए सभी का रक्तचाप और दिल धड़कने की गति दोनों बढ़ गए थे। आमतौर पर दिल धड़कने की गति और रक्तचाप के बढ़ने पर हृदय की ओर रक्त का संचार बढ़ जाता है। इससे हृदय को अधिक कार्य करने में मदद मिलती है। शोध के दौरान सभी महिलाएँ और पुरुष तनाव में काम कर रहे थे, उनके हृदय पर भी कार्यभार बढ़ गया था। इस दौरान पुरुषों की तरह महिलाओं के हृदय की ओर रक्त का प्रवाह नहीं बढ़ा था। जाहिर है कि रक्त का प्रवाह कम होने से जोखिम अधिक हो जाता है। इससे पता चलता है कि भावनात्मक तौर पर परेशान होने से महिलाओं में हृदय की समस्या होने की आशंका अधिक होती है।

मानसिक तनाव और हृदय 
शोधकर्ताओं ने गणित की यह समस्या ९ पुरुषों और ८ महिलाओं को दी। ये सभी स्वस्थ थे और सभी की उम्र २० वर्ष के आसपास थी। इन सभी का रक्तचाप और दिल की धड़कन की गति नापी गई थी। हृदय की मांसपेशियों की ओर रक्त की आपूर्ति नापने के लिए विशेष अल्ट्रासाउंड का उपयोग किया गया। शोध के दौरान, इसके पहले और बाद में हुए परिवर्तनों को नापा गया था। 

मानसिक तनाव को बढ़ाने के लिए शोधकर्ताओं ने उन्हें फटाफट समस्या हल करने के लिए कहा। उत्तर सही होने पर भी उन्होंने कई बार इसे ग़लत बताया। सवाल हल करने से पहले महिलाओं और पुरुषों में तीनों जाँचों का परिणाम एक जैसा ही था। एक बार तनाव बढ़ जाने के बाद पुरुषों के हृदय की ओर रक्त का प्रवाह बढ़ जाता था वहीं महिलाओं में ऐसा नहीं हुआ। 

शोधकर्ताओं का मानना है कि तनाव सभी के लिए हानिकारक है, इससे दूर रहने के प्रयास सभी को करने चाहिए लेकिन महिलाओं के इस संबंध में अधिक सर्तक रहने की ज़रुरत है। जो महिलाएँ तनावपूर्ण स्थिति में हृदय संबंधी समस्या के लक्षण महसूस करती हैं उन्हें इस बारे में चिकित्सक से परामर्श ज़रुर लेना चाहिए। 

ये करें तनाव-मुक्ति के लिए 

-तनाव हर व्यक्ति के लिए नुकसानप्रद होता है, विशेषकर गर्भवती महिलाओं के लिए ये बेहद हानकारक है क्योंकि इससे उसके साथ ही भ्रूण पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। तनाव को नियंत्रित न करने पर महिला को उच्च रक्तचाप, अपच या रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने जैसी समस्या हो सकती है। फलस्वरुप गर्भस्थ शिशु गंभीर रुप से प्रभावित हो सकता है।

-पौष्टिक आहार लें। थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बार-बार खाएँ। यह रक्त में शर्करा का स्तर नियंत्रित करने में सहायक होता है।

-समय-समय पर पानी पीते रहें ताकि निर्जलीकरण न हो।

-नियमित व्यायाम करें। व्यायाम से दिमाग़ में तनाव को कम करने वाले रसायन स्रावित होते हैं। योग,ध्यान या फिर मन को सुकून देने वाली कोई और गतिविधि केरं। 

-पसंदीदा खुशबुओं के साथ अरोमा बाथ लेने से राहत मिल सकती है। 

-रचनात्मक कार्यों में समय बिताना तनाव-मुक्ति के सबसे बढ़िया उपायों में से है। इस दौरान आपका दिमाग़ नई रचना की ओर केंद्रित होता है.इसलिए परेशानी से दूर हट जाता है। इन कार्यों को करते हुए दिमाग़ का हल खोजने वाला हिस्सा सक्रिय हो जाता है। भले ही आपका ध्यान इस ओर न हो,लेकिन आपका दिमाग़ समस्य का हल खोज रहा होता है। यानी,आपका तनाव अपने आप कम हो जाता है(सेहत,नई दुनिया,मई द्वितीयांक 2012)।

आगे चलें...

बुधवार, 2 मई 2012

मासिक चक्र की समस्या का यौगिक उपचार

यह आवश्यक है कि कभी भी अत्यधिक ज़ोर पड़ने वाला कार्य न किया जाए, परंतु सावधानी को छोड़कर अन्य कोई कारण नहीं है कि महिलाएँ मासिक धर्म के दौरान अभ्यास बंद कर दें। 

सूर्य नमस्कार 
इससे प्राणशक्ति का स्तर ऊपर उठेगा और स्नायविक अंतःस्रावी क्रियाओं में संतुलन आएगा। अपनी क्षमतानुसार धीरे-धीरे बढ़ाकर बारह चक्रों तक अभ्यास कीजिए।

आसन 
श्रोणि प्रदेश से ऊर्जा अवरोधों को दूर करने का सबसे प्रभावी उपाय है शक्ति बंध समूह के आसन, इसके अलावा वज्रासन समूह से वज्रासन, उष्ट्रासन, मार्जारि आसन, व्याघ्रासन, शशांकासन, सुप्त वज्रासन, शशांक भुजंगासन। पीछे झुकने वाले आसन जैसे-भुजंगासन, शलभासन, धनुरासन, चक्रासन, कंधरासन, ग्रीवासन।

अन्य अभ्यास
-पश्चिमोत्तासन, मत्स्यासन, ताड़ासन, अर्धमत्स्येन्द्रासन, उत्थानासन, पाद हस्तासन, हनुमानासन। सिर नीचे करके किए जाने वाले आसन करना विशेष लाभदायी है, क्योंकि उनसे प्रजनन अंगों से रक्त का प्रवाह उल्टी दिशा में होता है एवं अवरोधक मलों का निष्कासन होता है। साथ ही पीयूष ग्रंथि पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। परंतु इन आसनों को मासिक धर्म के दौरान नहीं करना चाहिए।

प्राणायाम 
नाड़ी शोधन, उज्जायी एवं भ्रामरी प्राणासन रजःकाल के साथ जुड़े सरदर्द, माइग्रेन तथा तनावपूर्ण परिस्थितियों को दूर करने के लिए प्रभावकारी हैं। प्राणायाम द्वारा अतीन्द्रिय स्तरों तक से तनाव दूर हो जाते हैं और मानसिक शांति मिलती है। अंग उतरने एवं गर्भाशय मुखशोथ (सरविसाइटिस) के लिए नाड़ी शोधन प्राणायाम की तृतीय अवस्था, जिसमें मूलबंध एवं जालंधर बंध का अभ्यास किया जाता है, सर्वाधिक प्रभावकारी है। भस्त्रिका प्राणायाम द्वारा जीवनीशक्ति बढ़ती है एवं विषाक्त तत्व साफ होते हैं। इसको अनार्तव (एम्नोरोह्य) एवं कष्टार्तव (डिसमेनोरोह्य) के लिए अनुशंसित किया जाता है। 

मुद्रा एवं बंध 
विपरीतकरणी मुद्रा, पाशिनी मुद्रा एवं योग मुद्रा का अभ्यास यहाँ पर उचित होगा। अश्विनी मुद्रा, मूलबंध एवं सहजोली मुद्रा द्वारा निचले अंगों में से ऊर्जा उत्पन्ना होती है। वे संबंधित तंत्रिकाओं को उत्तेजित करती हैं तथा प्रजनन-निष्कासन प्रणाली के अंगों को सुचारू बनाती है। मासिक धर्म के पूर्व के तनाव को कम करने के लिए महामुद्रा एवं महाबेध मुद्रा विशेष लाभकारी हैं क्योंकि उनसे शरीर में प्राणशक्ति का संचार एवं वितरण नियंत्रित होता है और शारीरिक-मानसिक और भावनात्मक स्थिरता आती है।  

षट्क्रिया 
जल नेति का अभ्यास प्रतिदिन करना चाहिए। कुंजल एवं लघु शंखप्रक्षालन हफ्ते में दो बार या जैसी आवश्यकता हो। याद रखिए, कब्ज़ से श्रोणिप्रदेश में संकुलता (कंजेशन) बढ़ती है, जिससे दर्द एवं ऐंठन बदतर हो जाते हैं। इस प्रदेश के अंगों से संबंधित रोगों में कब्ज़ को दूर करना इलाज का आवश्यक एवं प्राथमिक अवयव है। 

शिथिलीकरण 
योग निद्रा एक अति महत्वपूर्ण अभ्यास है। विशेषतः मासिक धर्म शुरू होने के पहले बढ़ती हुई तनाव की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए। इससे मानसिक तनाव, निराशा, चिड़चिड़ापन एवं भारीपन दूर होते हैं। यदि संपूर्ण अभ्यास के लिए पर्याप्त समय न हो तो श्वासन में लेटकर पेट में श्वास गिनने का अभ्यास किया जा सकता है।

ध्यान 
सिद्धयोनि आसन में बैठकर ध्यान का कोई भी अभ्यास यथा-अजपाजप, अन्तमौन, चिदाकाश धारणा, मंत्र जाप या नाद योग।  

सम्पूर्ण संतुलित शाकाहारी भोजन 
रसंपूर्ण संतुलित शाकाहारी भोजन सभी महिलाओं के लिए उपयुक्त होता है। मासिक धर्म से पूर्व के दिनों में अत्यंत हल्का भोजन, जिसमें मसाले, तेल, एवं दूध न्यूनतम मात्रा में हों लेने की विशेष अनुशंसा की जाती है। कई स्त्रियों का अनुभव है कि उनकी पीड़ा और अतिस्राव की मात्रा में पचास प्रतिशत से भी अधिक लाभ मात्र भोजन में परिवर्तन कर देने से महसूस हुआ है। भोजन हल्का, शुद्ध, सात्विक, शाकाहारी हो, जिसमें फल, अनाज एवं हल्की उबाली हुई सब्जियाँ प्रचुरता में होनी चाहिए। मासिकधर्म के पूर्व दिनों में यह अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। चाय, कॉफी, उत्तेजक मादक पदार्थ, अप्राकृतिक रूप से प्रोसेस्ड फूड बिलकुल बंद कर दें।यह आवश्यक है कि कभी भी अत्यधिक ज़ोर पड़ने वाला कार्य न किया जाए, परंतु सावधानी को छोड़कर अन्य कोई कारण नहीं है कि महिलाएँ मासिक धर्म के दौरान अभ्यास बंद कर दें(स्वामी सत्यानंद सरस्वती,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल 2012 तृतीयांक)।

आगे चलें...

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

पेल्विक पेनःकहीं कैंसर तो नहीं?

महिलाओं में काफी कॉमन हो चुकी पेल्विक पेन की प्रॉब्लम को हल्के में कतई न लें। गौरतलब है कि पेल्विक पेन कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का लक्षण भी हो सकता है। जानते हैं , इस बारे में : 

आजकल महिलाओं में पेल्विक पेन की प्रॉब्लम काफी कॉमन हो गई है। इस सिचुएशन को हल्के में लेने की बजाय तुरंत सीरियस हो जाना चाहिए , क्योंकि यह प्रीमेंसट्रुअल सिंड्रोम और सीरियस कंडिशन में सर्वाइकल कैंसर तक की निशानी हो सकती है। दरअसल , पेल्विक पेन की असल वजह का पता लगाना काफी मुश्किल होता है और इसी वजह से यह सीरियस प्रॉब्लम में भी कंवर्ट हो सकता है। 

पेल्विक पेन यानी ऐसा दर्द , जो नाभि के नीचे पेट के किसी भी हिस्से में हो सकता है। यह रुक - रुककर या लगातार भी हो सकता है। अक्सर देखने में आता है कि महिलाएं इस तरह के दर्द को सीरियसली नहीं लेतीं। लेकिन अगर आपको इसके साथ बहुत ज्यादा वैजाइनल ब्लीडिंग , लोअर बैक पेन और वैजाइनल डिस्चार्ज हो रहा है , तो आपको सावधान हो जाना चाहिए। दरअसल , इनकी मदद से आपको पेल्विक पेन की असल वजह का पता लग सकता है। 

अपोलो हॉस्पिटल में कैंसर सर्जन डॉ . राजिंदर कौर सग्गू कहती हैं , ' अपने डॉक्टर को पेल्विक पेन की असल वजह पता लगाने में मदद करने के लिए आपको इस चीज का रेकॉर्ड रखना चाहिए कि आपको यह दर्द कब उठता है , उस वक्त आप क्या कर रही होती हैं और क्या करने से ठीक यह ठीक हो जाता है। खुद को किसी भी तरह के कैंसर से बचाने के लिए आपको विभिन्न प्रकार के कैंसर और उनके लक्षणों की जानकारी होनी चाहिए। ' 

डॉक्टर सग्गू की मानें , तो इन लक्षणों पर नजर रखकर आप अपने डॉक्टर से इनके बारे में डिस्कस कर सकती हैं। इस तरह आपको अपनी बीमारी को शुरुआती स्टेज में पकड़ने में मदद मिलेग और आप डॉक्टर को आसानी से बता पाएंगी कि आपको क्या प्रॉब्लम है। साथ ही , आप अपनी बॉडी में होने वाले चेंज को लेकर भी सावधान रहेंगी। 

गौरतलब है कि पेल्विक पेन गायनेकॉलजिकल कैंसर का लक्षण तो हो ही सकता है। इसके अलावा , यह और भी कई बीमारियों का इंडिकेशन हो सकता है। हो सकता है कि आपको कैंसर की बजाय यूरिनरी इंफेक्शन , किडनी स्टोन , फाइब्राइड ट्यूमर्स या दूसरी किसी बीमारी की वजह से पेल्विक पेन हो रहा हो। 

दरअसल , गायनेकॉलजिकल कैंसर की शुरुआती स्टेज में किसी तरह के लक्षण नजर नहीं आते। लेकिन अगर आपको पेल्विक पेन , पेनफुल इंटरकोर्स , पीरियड के दौरान ब्लीडिंग , इंटरकोर्स के बाद ब्लीडिंग , मेनोपॉज के बाद ब्लीडिंग , हैवी डिस्चार्ज या वैजाइनल डिस्चार्ज जैसी प्रॉब्लम हैं , तो आपको तुरंत अपने डॉक्टर से कॉन्टैक्ट करना चाहिए। ध्यान रखें , शुरुआती चेकअप और ट्रीटमेंट से बड़ी परेशानी से बच सकती हैं(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,1.4.12)।

आगे चलें...

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

यूटराइन फाइब्रॉइड का उपचार

यूटराइन फाइब्रॉइड महिलाओं के यूटरस से जुड़ी बीमारी है। यह एक तरह का गैर कैंसरस ट्यूमर है, जो तकरीबन 50 फीसदी महिलाओं को उनके जीवन में कभी न कभी हो ही जाता है। एक्सपर्ट्स से बात करके हम इसके कारणों, लक्षण और इलाज के तरीकों के बारे में बता रहे हैं : 

यूटराइन फाइब्रॉइड गर्भाशय का गैर कैंसरस ट्यूमर है। इसे गर्भाशय की रसौली भी कहा जाता है। गर्भाशय की मांसपेशियों में छोटी-छोटी गोलाकार गांठें बनती हैं, जो किसी महिला में कम बढ़ती हैं और किसी में ज्यादा। यह मटर के दाने के बराबर भी हो सकती हैं और किसी-किसी महिला में यह बढ़ कर फुटबॉल जैसा आकार भी ले सकती हैं। 

कई मामलों में इसका औसत वजन 1 से 2 किग्रा. या इससे भी ज्यादा हो जाता है। कई बार यह बहुत बड़ी होकर भी जान को खतरा नहीं पहुंचाती, जबकि कई बार कम साइज की होकर भी जानलेवा हो सकती हैं।

तकरीबन 50 फीसदी महिलाओं को उनके जीवन में कभी न कभी यूटराइन फाइब्रॉइड्स होता है, लेकिन ज्यादातर महिलाओं को इसका पता ही नहीं चलता क्योंकि शुरुआती तौर पर इसका कोई लक्षण नजर नहीं आता। दो तिहाई मामले ऐसे होते हैं, जिनमें इसका कोई लक्षण सामने नहीं आता। डिलिवरी से पहले होने वाले अल्ट्रासाउंड या किसी और जांच में इसका पता चल जाता है। कुछ महिलाओं में रसौली छिपी रहती है और जांच से ही पकड़ में आती है। छोटी रसौलियां बहुत पाई जाती हैं। अगर यह साइज में बहुत बड़ी हो जाएं तो महिलाओं को बार-बार मिसकैरिज होने लगते हैं और गर्भ ठहरने करने में दिक्कत होती है। 

यूटराइन फाइब्रॉइड के बारे में कहा जाता है कि इसके शरीर में होने के बाद भी कई महिलाओं को न तो इससे कोई दिक्कत होती है और न इसका कोई लक्षण दिखाई देता है। कुछ केसों में ऐसे फाइब्रॉइड को बिना इलाज के भी छोड़ा जा सकता है लेकिन कुछ मामलों में अगर फाइब्रॉइड कोई लक्षण नहीं दिखा रहा है तो भी उसे निकलवाना जरूरी है। यह कितनी तेज गति से बढ़ रहा है, इस पर ध्यान रखना भी जरूरी है क्योंकि ऐसा फाइब्रॉइड कैंसरस भी हो सकता है, हालांकि इसकी आशंका बहुत कम होती है। कुल यूटराइन फाइब्रॉइड के आधा फीसदी से भी कम केस कैंसरस होते हैं। सिर्फ अल्ट्रासाउंड या एमआरआई कराने से इसका फर्क पता नहीं चलता है। 

लक्षण 
-यूटराइन फाइब्रॉइड हो सकते हैं अगर इनमें से कुछ लक्षण हैं: 

-पीरियड्स के दौरान भारी मात्रा में ब्लीडिंग 

-पीरियड्स स्वाभाविक तीन-चार दिन न होकर आठ-दस दिनों तक चलते हैं। 

-पीरियड्स के दौरान पेट के नीचे के हिस्से में दर्द महसूस होता है। 

-पीरियड्स खत्म होने के बाद भी बीच-बीच में प्राइवेट पार्ट से खून आने की शिकायत होती है। 

-ज्यादा ब्लीडिंग की वजह से शरीर में खून की कमी हो जाती है। लापरवाही बरती जाए तो एनीमिया भी हो सकता है। 

-शरीर में कमजोरी महसूस होती है। 

-प्राइवेट पार्ट से बदबूदार डिस्चार्ज होने लगता है (रसौली में इन्फेक्शन होने पर ऐसा होता है)। 

-कभी पेट में अचानक दर्द उठता है, जो रसौली के भीतर घूमने से होता है। 

-रसौली के बढ़ने से बड़ी आंत व मलाशय पर भार पड़ता है, इससे कब्ज होती है। 

-मूत्राशय पर दबाव बढ़ता है तो पेशाब रुक-रुककर होता है और बार-बार जाना पड़ता है। 

-गर्भधारण में बाधा पड़ती है। गर्भ ठहरने पर गर्भपात भी हो जाता है। 

किस उम्र में 
यूटराइन फाइब्रॉइड अक्सर बच्चे पैदा कर सकने वाली उम्र में होता है यानी आमतौर पर 20 साल की उम्र हो जाने के बाद ही यह बीमारी होती है। 

ज्यादातर महिलाओं में यह 30 से 45 साल की उम्र के बीच देखा जाता है। 

कुछ महिलाओं में मीनोपॉज के बाद ही यह सामने आता है, पर उसकी बुनियाद पहले पड़ चुकी होती है। वैसे, मीनोपॉज के बाद जब शरीर में एस्ट्रोजन का लेवल कम होने जगता है तो ये अपने आप सिकुड़ने लगते हैं। 

ये हैं वजहें 
महिलाओं में यूटराइन फाइब्रॉइड क्यों होता है, इसके पीछे कोई खास वजहें नहीं हैं। फिर भी ऐसा माना जाता है कि जिनेटिक असंगतता, वैस्कुलर सिस्टम (ब्लड वेसल) की गड़बड़ी जैसी कुछ बातें हैं जो इसके बनने में बड़ा रोल निभाती हैं। 

अगर परिवार में किसी को यूटराइन फाइब्रॉइड है, तो इसके होने की आशंका बढ़ जाती है। 

10 साल की उम्र से पहले पीरियड्स शुरू होना, शराब खासकर बीयर का सेवन, गर्भाशय में होने वाला कोई भी इन्फेक्शन और हाई ब्लडप्रेशर के कारण भी यूटराइन फाइब्रॉइड्स होने का रिस्क बढ़ जाता है। 

शरीर में जब एस्ट्रोजन की मात्रा बढ़ती है, तो फाइब्रॉइड्स होने का रिस्क बढ़ जाता है। प्रेग्नेंसी के दौरान इस हॉर्मोन की मात्रा बढ़ती है। 

जो महिलाएं गर्भनिरोधक गोलियां ले रही हैं, उनमें भी एस्ट्रोजन का लेवल बढ़ता है, लेकिन इन गोलियों में प्रोजेस्ट्रॉन भी होता है और यह हॉर्मोन यूटराइन फाइब्रॉइड के रिस्क को कम करता है। ऐसे में माना जा सकता है कि गर्भनिरोधक गोलियां लेने से यूटराइन फाइब्रॉइड होने का रिस्क नहीं बढ़ता। मोटी महिलाओं में भी यूटराइन फाइब्रॉइड होने के चांस सामान्य महिलाओं के मुकाबले दो से तीन गुने हो सकते हैं। 

क्या करें कि हो ही न 
जो महिलाएं रोजाना 40 मिनट वॉक करती हैं, उन्हें फाइब्रॉइड होने का रिस्क काफी कम हो जाता है। 

इसके अलावा मौसमी फल और सब्जियां लगातार लेती रहें और फास्ट फूड से बचें। हेल्दी लाइफस्टाइल इस स्थिति से बचने में मददगार है। 

तेज दर्द हो तो क्या करें 
अगर पीरियड्स के दौरान दर्द और ब्लीडिंग बहुत ज्यादा हो रही है तो अपने डॉक्टर से फौरन मिलें। इस बीच ये काम कर सकती हैं : 

ज्यादा से ज्यादा आराम करें। 

ऐसा खाना खाएं जो आयरन से भरपूर हो। पालक में खूब आयरन होता है। 

पेट की गर्म पानी की बोतल से सिकाई करें। 

प्रेग्नेंसी और फाइब्रॉइड 
जिन महिलाओं को फाइब्रॉइड होते हैं, उन्हें प्रेग्नेंट होने में और अगर प्रेग्नेंट हो जाएं तो डिलिवरी होने में दिक्कत हो सकती है, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है। कई महिलाओं को नॉर्मल प्रेग्नेंसी भी होती है। अगर महिला को फाइब्रॉइड हैं तो डिलिवरी के वक्त सिजेरियन ऑपरेशन होने की संभावना बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। इसके अलावा डिलिवरी से पहले ही यूटरस की दीवार से प्लेसेंटा टूट सकता है। ऐसे में फीटस को भरपूर ऑक्सिज`न नहीं मिल पाती। साथ ही वक्त से पहले डिलिवरी की समस्या भी हो सकती है। 

ये हैं इलाज के तरीके 
होम्योपैथी 
यूटराइन फाइब्रॉइड्स में आमतौर पर जो भी ट्यूमर होते हैं, वे गैर कैंसरस होते हैं इसलिए फौरी सर्जरी की जरूरत नहीं होती। ऐसे में होम्योपैथी के जरिए पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। होम्योपैथिक इलाज के दौरान डॉक्टर महिला का लगातार अल्ट्रासाउंड कराकर देखते हैं और उसी प्रोग्रेस के आधार पर इलाज आगे बढ़ता है। चार से छह महीने के इलाज में मरीज को ठीक किया जा सकता है। ये कुछ दवाएं हैं जो आमतौर पर दी जाती हैं। बिना डॉक्टरी सलाह के कोई भी दवा नहीं लेनी है। 

कॉन्स्टिट्यूशनल (मरीज के स्वभाव और बनावट के आधार पर)

Calcaria carb. : यूटराइन फाइब्रॉइड से पीड़ित उन महिलाओं को दी जाती है, जो गोरी और मोटी हैं। इन्हें पसीना ज्यादा आता है और सर्दी भी ज्यादा लगती है। 

Pulsatilla : जिन महिलाओं को रोना जल्दी आता है। सांत्वना दें तो अच्छा लगता है, उन्हें ये दवा दी जाती है।  

Sepia : उन महिलाओं को दी जाती है जो पतली-दुबली हैं और चेहरे पर निशान हैं। इनमें इमोशन नहीं होते और प्यास कम लगती है। 

Phosphorus : यह दवा उन महिलाओं को दी जाती है जो लंबी और गोरी हैं। इन्हें ठंडी चीजें बहुत पसंद हैं और ये मिलनसार होती हैं। 

Natrum Mur : यह दवा उन मरीजों को देते हैं, जिनकी मन:स्थिति दुखी होती है। इन्हें गर्मी ज्यादा लगती है और प्यास भी खूब लगती है। 

एलोपैथी दवाएं 
अगर फाइब्रॉइड बेहद छोटे हैं और किसी दिक्कत को नहीं बढ़ा रहे हैं तो फौरन किसी इलाज की जरूरत नहीं होती। अगर साइज बढ़ रहा है तो दवाओं से इलाज किया जाता है, लेकिन दवाओं से इसका परमानेंट इलाज संभव नहीं है। दवाओं से फाइब्रॉइड्स सिकुड़ जाते हैं और कुछ समय के लिए ही आराम मिलता है। वैसे भी दवाओं को छह महीने से ज्यादा नहीं दिया जाता क्योंकि इसके साइड इफेक्ट्स होते हैं। फाइब्रॉइड की वजह से अगर यूटरस का साइज 12 हफ्ते के गर्भ जितना हो गया है, तो फौरन इलाज शुरू किया जाता है। 

सर्जरी अगर दवाओं से चीजें काबू न हो रही हों या फाइब्रॉइड का साइज ज्यादा बढ़ गया हो तो डॉक्टर सर्जरी की सलाह देते हैं। 

मायोमेक्टमी: 
ऐसी महिलाओं के लिए मायोमेक्टमी सर्जरी कराने की सलाह दी जाती है। इसमें फाइब्रॉइड को निकाल दिया जाता है और गर्भाशय को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। एब्डॉमिनल मायोमेक्टमी में एब्डॉमेन में चीरा लगाकर फाइब्रॉइड को निकाला जाता है। इस सर्जरी के तीन दिन बाद महिला घर जा सकती है। इसके बाद नॉर्मल काम पर लौटने में आमतौर पर चार हफ्ते का वक्त लग सकता है। 

फायदे: फाइब्रॉइड के इलाज का यह परंपरागत तरीका है और दुनिया भर में सबसे ज्यादा सर्जरी इसी तरीके से की जाती हैं। यूटरस बना रहता है। 

नुकसान: इस सर्जरी को कराने के बाद इस बात के 25 फीसदी चांस हैं कि सर्जरी के 10 साल के भीतर नए फाइब्रॉइड बन जाएं। 

हिस्टरेक्टमी: 
इस तरीके में यूटरस को ही निकाल दिया जाता है 

किसके लिए: 
यह सर्जरी ऐसी महिलाओं को कराने की सलाह दी जाती है, जिनका परिवार पूरा हो चुका है और जिनकी आगे बच्चा पैदा करने की प्लानिंग नहीं है। फाइब्रॉइड ज्यादा बढ़ चुके हैं और परेशानी ज्यादा है, तो इसे कराने की सलाह देते हैं। 

फायदे: गारंटी है फाइब्रॉइड दोबारा नहीं होंगे। 

नुकसान : यूटरस निकल जाने के बाद शरीर में हॉर्मोनल असंतुलन हो सकता है। शरीर में खालीपन लग सकता है और कमर दर्द की समस्या भी हो सकती है। डॉ. शारदा जैन के मुताबिक, यूके और यूएस जैसे तमाम देशों में ऐसे नियम बनाए गए हैं जिनके मुताबिक डॉक्टरों को हिस्टरेक्टमी के ऑप्शन पर तभी जाना चाहिए, जब बेहद जरूरी हो। अपने देश में ऐसा कोई नियम नहीं है। लोगों को खुद समझना चाहिए कि इस सर्जरी के लिए काफी अनुभव और स्किल जरूरत होती है इसलिए अपने सर्जन का चयन पूरी सावधानी के साथ करें।

लैप्रोस्कोपिक : मायोमेक्टमी और हिस्टरेक्टमी दोनों ही लैप्रोस्कोपिक (छोटे सुराख से) तरीके से भी की जा सकती हैं। इस प्रक्रिया से सर्जरी करने के बाद ठीक होने का समय कम हो जाता है। लेकिन दोनों ही इनवेसिव तरीके तो हैं ही जिनमें एनैस्थिसिया और सर्जरी के बाद की कुछ जटिलताओं की संभावना हमेशा रहती है।

यूटराइन आर्टरी इम्बोलाइजेशन : इसमें कुछ बेहद छोटे पार्टिकल ब्लड वेसल्स के माध्यम से इंजेक्ट किए जाते हैं। ये पार्टिकल उन आर्टरीज को ब्लॉक कर देते हैं जो फाइब्रॉइड्स को ब्लड की सप्लाई करती हैं। जब फाइब्रॉइड्स को ब्लड की सप्लाई बंद हो जाती है तो वे खुद-ब-खुद सिकुड़ने लगते हैं। 

किसके लिए : 
जिन महिलाओं में फाइब्रॉइड का साइज काफी बड़ा है, उनमेंइस तरीके का इस्तेमाल कर सकते हैं। 

फायदे : इस तरीके से इलाज के बाद महिला के अंदर लक्षण खत्म हो जाते हैं। 

नुकसान : फाइब्रॉइड खत्म नहीं होते। उनका आकार कम हो जाता है। 

हाईफू (नॉन इनवेसिव मैथड) : 
फिलिप्स का सोनालेव एमआर एचआईएफयू सिस्टम यूटराइन फाइब्रॉइड के इलाज को ज्यादा आसान और सटीक बनाता है। इसमें न तो किसी सर्जरी की जरूरत होती है और न ही कोई रेडिएशन का खतरा। 

बिना एनैस्थिसिया के दाग-निशान से मुक्त इलाज मिलता है। इसमें सेफ और फोकस्ड अल्ट्रासाउंड वेव्स की मदद से शरीर के भीतर बीमार टिश्यू को नष्ट कर दिया जाता है। सर्जरी की प्रक्रिया में कुल तीन घंटे का वक्त लगता है। मरीज उसी दिन अस्पताल से घर जा सकता है और वापस काम पर लौटने में भी उसे ज्यादा दिन नहीं लगते। जबकि इलाज के वर्तमान तरीके में सर्जरी की जाती है और काम पर लौटने में 10 दिन तक का वक्त लग जाता है। महिला प्रेग्नेंट है तो यह नहीं की जाती। यह तकनीक मुंबई के दो सेंटरों के अलावा अपोलो (दिल्ली, हैदराबाद और चेन्नै) में उपलब्ध है। इसमें खर्च उतना ही आता है, जितना परंपरागत तरीके से।

सर्जरी का खर्च : 
सर्जरी में आमतौर पर 50 हजार से एक लाख रुपये तक खर्च आता है, जो निर्भर है इस बात पर कि किस अस्पताल में यह ऑपरेशन करा रहे हैं और कौन सा ऑपरेशन करा रहे हैं। 

आयुर्वेद और योग 
यूटराइन फाइब्रॉइड के कई मामले ऐसे होते हैं जिन्हें आयुर्वेद और योग की मदद से ठीक किया जा सकता है। डॉक्टर पूरी जांच करने के बाद यह बताते हैं कि उसका फाइब्रॉइड आयुर्वेदिक इलाज से ठीक हो सकता है या उसे सर्जरी के लिए जाना चाहिए। 

किसके लिए: 
अगर फाइब्रॉइड इस स्थिति में है कि उसका इलाज बिना सर्जरी हो सके तो आयुर्वेद में इसके लिए पंचकर्म (पत्र पिंड चिकित्सा) की जाती है। इसमें शरीर का प्यूरिफिकेशन किया जाता है। डेढ़ घंटे की एक सिटिंग होती है और ऐसी कुल मिलाकर 10 सिटिंग लेनी पड़ती हैं। इसके बाद महीने में एक बार बुलाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान आयुर्वेद दवाएं भी खाने को दी जाती हैं। 

खर्च : 
एक सिटिंग का खर्च 500 से 600 रुपये आता है। 

यौगिक क्रियाएं : 
किसी महिला को यूटराइन फाइब्रॉइड होने का मतलब है कि उसके यौन अंग पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं इसलिए महिला को यौनांग से संबंधित कुछ यौगिक पोश्चर और एक्सरसाइज भी बताई जाती हैं, जिन्हें करने से इसमें फायदा मिलता है। कुछ यौगिक क्रियाएं और प्राणायाम भी हैं जिन्हें किया जा सकता है। इनमें खास हैं प्राण मुद्रा जिसे सुबह-शाम 20-20 मिनट के लिए कर लेना चाहिए। शवासन, गोरक्षासन और जानुशीर्षासन भी काफी फायदेमंद हैं। भ्रामरी और उज्जयी प्राणायाम भी कर सकते हैं। सभी यौगिक क्रियाओं को किसी योग्य योग गुरु से सीखकर ही करना चाहिए। 

फायदा : आयुर्वेद और योग से इलाज का एक बड़ा फायदा यह होता है कि एक बार ठीक हो जाने के बाद सिस्ट दोबारा नहीं होता, जबकि सर्जिकल तरीके से इसे रिमूव कराने से सिस्ट दोबारा होने का अंदेशा बना रहता है। इसके अलावा आयुर्वेदिक तरीके से इलाज के दौरान न तो कोई दर्द होता है और न इसका कोई साइड इफेक्ट है। 

सीमाएं : बढ़े हुए मामलों में जहां यह तरीका कारगर नहीं होता, वहां इसके बाद सर्जरी का तरीका भी अपनाया जा सकता है। 
(एक्सपर्ट्स पैनल डॉ. शारदा जैन, डायरेक्टर, लाइफ केयर सेंटर डॉ. उर्वशी प्रसाद झा, गाइनिकॉलजिस्ट, फोर्टिस हॉस्पिटल डॉ. सुशील वत्स, सीनियर होम्योपैथ योगी डॉ. अमृत राज, योग एंड आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. नीलम अग्रवाल, आयुर्वेदाचार्य स्त्री रोग विशेषज्ञ, आरोग्यधाम(नवभारत टाइम्स,15.1.12)

आगे चलें...

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

अनियंत्रित मूत्र-त्याग का यौगिक उपचार

यह शब्द उस अवस्था के लिए प्रयुक्त किया जाता है, जब मूत्राशय से मूत्र अपने आप बाहर निकल जाता है और इसे नियंत्रित करना मुश्किल होता है। कभी भी हँसने, खाँसने या ऐसी कोई क्रिया, जिससे पेट पर दबाव पड़ता हो या तनाव पड़ता हो तो थोड़ा सा मूत्र बाहर निकल जाता है। यह समस्या अनेक स्त्रियों को परेशान करती है और अपने आप में एक शर्म तथा तनाव उत्पन्न करने वाली परिस्थिति बन जाती है।

अधिकांशतः अनेक बच्चों को जन्म देने वाली माताएँ जो शिशु के जन्म के बाद अपने शरीर को पुनर्गठित करने पर विशेष ध्यान नहीं देती हैं, इस समस्या से परेशान होती हैं। उम्र अधिक होने पर जो ढीलापन आता है, उससे भी ऐसा हो सकता है। शिशु को जन्म देने के दौरान नीचे के अंगों पर बहुत खिंचाव पड़ता है, विशेषकर मूत्राशय एवं मूत्र नली तथा उससे संबंधित तंतु एवं मांसपेशियों पर। फलस्वरूप मूत्र नियंत्रण प्रणाली में दोष उत्पन्न हो जाते हैं। यदि इन अंगों को पुनः पूर्वावस्था में लाने का कोई प्रयास नहीं किया जाए तो वे ढीले ही रह जाते हैं। तदुपरांत कई महीनों तक मूत्र नियंत्रण संभव नहीं हो पाता। जो स्त्रियाँ शिशु जन्म के पूर्व तथा पश्चात्‌ योगाभ्यास करती हैं, वे बहुत शीघ्र मूत्र नियंत्रण एवं श्रोणी प्रदेश के अंगों की सुचारू क्रियाशीलता पुर्नप्राप्त कर लेती हैं,परंतु जो अपने अंगों की कसावट को पुनः सुगठित करने का कोई सजग प्रयास नहीं करतीं, उनमें यह सभी विकृतियाँ रह जाती हैं। योगाभ्यास से शरीर विन्यास एवं सौंदर्य तो सुरक्षित रहता ही है, साथ ही शिशु जन्म से होने वाली क्षति भी बहुत कम होती है। जो क्षति होती है, वो भी शीघ्र सुधर जाती है।

परंतु एक चेतावनी उन स्त्रियों के लिए है, जो शिशु जन्म के तुरंत बाद से ही अपने अंगों को पुर्नव्यवस्थित करने तथा शरीर विन्यास को सुघड़ बनाने हेतु योगाभ्यास अपनाने के लिए आतुर हों, उन्हें यह सलाह दी जाती है कि शिशु जन्म के तुरंत बाद से ही आसन करना प्रारंभ न कर दें, खासकर किसी दक्ष प्रशिक्षक के निर्देशन के। यह प्रतिबंध प्रसव के चालीस दिन पश्चात तक मानना चाहिए, ताकि प्रारंभिक क्षतिपूर्ति प्राकृतिक रूप से पूर्ण हो जाए और प्रसवोपरांत अतिरिक्त प्रवाह का खतरा कम हो जाए। शिथिलीकरण, ध्यान व मृदु प्राणायाम के कुछ अभ्यास तो निश्चित रूप से प्रसव के तुरंत बाद से प्रारंभ किए जा सकते हैं।

जिन्हें मूत्राशय की गड़बड़ियाँ होती रहती हैं या पूर्व में मूत्र प्रणाली का संक्रमण हो चुका हो, उन्हें योगाभ्यास के साथ-साथ पानी अधिक मात्रा में पीना चाहिए (प्रतिदिन ६-१० गिलास), ताकि मूत्र प्रणाली की धुलाई होती रहे। यौन क्रिया के तुरंत बाद मूत्राशय खाली कर लेने से संक्रामक कीटाणु भीतर प्रवेश करने से पहले ही धुल जाएँगे। पहले से ही कमजोर अंग प्रणाली में अधिकांशतः संक्रमणों का प्रवेश इसी प्रक्रिया के दौरान होता है। हरसिंगार के पत्ते का रस भी इसमें बहुत लाभकारी होता है। सौभाग्य से योग एकमात्र ऐसी प्रणाली है जो गुर्दों के ठप होने और जीवन को खतरा होने से पहले ही ह्रासीय प्रक्रिया को रोककर स्वास्थ्य प्रदायी हो सकती है। इन रोगों के यौगिक उपचार का लक्ष्य है संपूर्ण मूत्र प्रजनन प्रणाली एवं संबंधित क्षेत्रों में जो प्राणशक्ति की कमी है, उसे परिपूरित करना। जब यह प्राणशक्ति सुचारू रूप से प्रवाहित होने लगेगी तो संक्रमण इस क्षेत्र में पैर जमा ही नहीं सकेगा तथा संपूर्ण शरीर का स्वास्थ्य सुदृढ़ बनेगा व प्रतिरोध क्षमता भी बेहतर होगी(नई दुनिया,जुलाई प्रथमांक,2011 से साभार)।

आगे चलें...

शनिवार, 2 जुलाई 2011

महिलाएँ ज़रूर कराएँ पेप स्मीयर

यह परीक्षण सर्विक्स (गर्भाशय के मुँह) की स्वस्थ स्थिति का पता लगाने के लिए किया जाता है। सामान्यतः महिलाओं में गर्भाशय की कोशिकाएँ सामान्य एवं स्वस्थ पाई जाती हैं लेकिन कभी-कभी ये कोशिकाएँ असामान्य दिखाई देती हैं, जो कि गर्भाशय के मुँह के कैंसर की उपस्थिति को दर्शाती हैं।

महिलाओं के लिए सर्वाइकल स्मीयर परीक्षण की जरूरत क्यों है?

इस परीक्षण के द्वारा सर्विक्स कैंसर (गर्भाशय के मुँह के कैंसर) के बारे में प्रारंभिक स्थिति में ही पता लगाया जा सकता है। सर्विक्स के स्वस्थ या अस्वस्थ होने का पता इसी परीक्षण द्वारा लगाया जा सकता है। यह परीक्षण २० वर्ष से लेकर ६५ वर्ष तक की महिलाओं का किया जाता है।

सर्विक्स क्या है?

गर्भाशय के निचले भाग को सर्विक्स कहा जाता है। गर्भाशय के निचले भाग में कोशिकाओं की आकृति कभी-कभी बदल जाती है और असाधारण हो जाती है।

क्या यह परीक्षण तकलीफदायक है?

नहीं। परंतु यदि आप तनाव में हो तो कभी-कभी तकलीफ हो सकती है। यदि महसूस कर रहे हों तो गहरी साँस लेकर तनाव दूर कर सकते हैं।

क्या परीक्षण के लिए अस्पताल में भर्ती होना आवश्यक है?

इस परीक्षण में केवल ५ से १० मिनट का समय लगता है। बाह्य रोग विभाग द्वारा यह परीक्षण किया जाता है। भर्ती होने की आवश्यकता नहीं है।

परीक्षण के पूर्व क्या कुछ करना जरूरी है?


मासिक धर्म के दौरान यह टेस्ट नहीं किया जाता है। पीरियड के पूर्व या बाद में इसे कभी भी किया जा सकता है। यौन संबंध ४८ घंटे पूर्व किसी से न किया हो अथवा योनि में कोई गोली या दवा न रखें।

परीक्षण रिपोर्ट

परीक्षण की रिपोर्ट २४ से ४८ घंटे में दी जाती है।

पुनः परीक्षण कब?

- परिणाम संतोषजनक नहीं होने पर या

- पुनः स्मीयर लेना हो या

- असाधारण परिणाम आया हो तो

- प्रत्येक तीन वर्ष बाद

- पुनः परीक्षण कराया जाना चाहिए।

महिलाओं के लिए सर्वाइकल स्मीयर परीक्षण का महत्व

- सर्वाइकल स्मीयर परीक्षण करवा लेने से समय पर कैंसर होने की पहचान हो जाती है व इलाज संभव हो जाता है।

- दस में से एक महिला के सर्विक्स सेल असाधारण पाए जाते हैं और उन्हें पुनः परीक्षण के लिए बुलाया जा सकता है।

- इस परीक्षण से समय पर मरीज को कैंसर, इन्फेक्शन आदि का पता लग जाता है जिससे उसका उचित इलाज किया जा सकता है।

- कैंसर की एडवांस स्थिति में पहुँच जाने पर ऑपरेशन संभव नहीं रहता। रेडियोथैरेपी, कीमोथैरेपी कराना पड़ती, जो अत्यंत खर्चीली होती है तथा समय भी अधिक लगता है।

- वर्तमान में इस कैंसर से बचाव का वैक्सीन उपलब्ध है(डॉ. विजयसेन यशलाहा,सेहत,नई दुनिया,जून 2011 चतुर्थांक)।

आगे चलें...

सोमवार, 13 जून 2011

रजोनिवृत्ति और हॉट फ्लैशेज

हॉट फ्लेशेज महिलाओं के शरीर में होने वाले हारमोनल परिवर्तनों का सूचक होते हैं। यह समस्या रजोनिवृत्ति के आसपास महिलाओं में आमतौर पर देखी जाती हैं। शरीर के ऊपरी हिस्से में अचानक से गर्मी महसूस होने लगती है। हॉट फ्लेशेज में कुछ देर के लिए असहज रूप से गर्मी लगने लगती है। 

रजोनिवृत्ति के बाद शरीर में इस्ट्रोजन नामक हारमोन का निर्माण कम मात्रा में एवं अनियमित हो जाता है। यही हॉट फ्लेशेज का कारण होता है। एशियाई महिलाओं में हॉट फ्लेशेज की आवृत्ति कम होती है। इसका श्रेय उनके खान-पान को दिया जाता है, जो फाइटो-इस्ट्रोजन्स (वनस्पति इस्ट्रोजन) से भरपूर होता है। कम उम्र की वे महिलाएँ, जिनमें शल्य चिकित्साजन्य रजोनिवृत्ति होती है, उन्हें हॉट फ्लेशेज की समस्या ज्यादा सताती है। ऐसी महिलाओं में यह परेशानी रजोनिवृत्ति की सामान्य उम्र आने तक बनी रहती है।

हॉट फ्लेशेज में अचानक ही तेज गर्मी लगने लगती है, जिससे पसीना आता है और कई बार दिल की धड़कन भी तेज हो जाती है। हर आवृत्ति पर यह स्थिति २ से १० मिनट तक रहती है। हॉट फ्लेशेज की शुरुआत चेहरे पर गर्मी महसूस होने के साथ होती है। इसका पैटर्न हर किसी में अलग-अलग होता है। हो सकता है कि चेहरे के साथ सीने में भी गर्मी लगने लगे या फिर चेहरे और सीने में होने वाला गर्मी का एहसास पूरे शरीर में ही महसूस होने लगे। अंदर से गर्मी लगने के साथ त्वचा पर लालपन दिखाई देता है, छूने पर त्वचा गरम भी गलती है। इसी वजह से इस स्थिति को "हॉट फ्लश" नाम दिया गया है।

कुछ महिलाएँ हफ्ते में कभी-कभी हॉट फ्लेशेज महसूस करती हैं तो कुछ एक ही दिन में कई बार, इसकी आवृत्ति समय बीतने के साथ कम होने लगती है। रजोनिवृत्ति के पहले या इसके बाद की स्थिति में ही ज्यादातर हॉट फ्लेशेज आने की शुरुआत होती है। कभी-कभी रजोनिवृत्ति शुरू होने के कई सालों पहले से ही हॉट फ्लेशेज आने लगते हैं और रजोनिवृत्ति के कई सालों बाद तक आते रहते हैं। कुछ महिलाएँ ऐसी भी होती हैं, जिन्हें कभी हॉट फ्लेशेज की समस्या होती ही नहीं है, वहीं कुछ को यह काफी हल्के और अनियमित रूप से आते हैं।

इलाज...
-चाय और कॉफी जैसे गर्म तासीर वाले पेय पदार्थ बिलकुल बंद कर दें या कम से कम मात्रा में लें।
-तेज मिर्च-मसाले वाला खाना, चॉकलेट और अल्कोहल से दूर रहें।
-गरम वातावरण में न रहें।
-सूत से बने हल्के और आरामदायक कपड़े पहनें। सिंथेटिक और तंग फिटिंग वाले कपड़े नहीं पहनें।
-ठंडे पानी से नहाएँ।
-एक मिनट में ६-८ बार गहरी व लंबी साँस लें।

व्यायामः पैदल चलने, तैरने और साइकलिंग जैसे व्यायाम प्रतिदिन कम से कम ३० मिनट के लिए जरूर करें।
-कुछ देर आराम करने के लिए संगीत सुनें या ध्यान-योग करें।
-खानपान में परिवर्तन से भी हॉट फ्लेशेज में राहत मिल सकती है। सोया उत्पादों को आहार में शामिल करने के कई फायदे हैं, जिनमें हॉट फ्लेशेज और रजोनिवृत्ति के अन्य कष्टकर लक्षणों से बचाव भी शामिल हैं।
-यह सब करने के बाद भी यदि हॉट फ्लेशेज और नाइट स्वेट आना बंद न हो या थोड़ी सी भी राहत न मिले तो चिकित्सक से परामर्श लें(नई दुनिया,जून प्रथमांक 2011)।

आगे चलें...

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

दस फीसदी महिलाएं पॉलिसिस्टिक ओवरी की शिकार

लगभग दस प्रतिशत महिलाएं स्टेन लेवेंथल सिंड्रोम या पॉलिसिस्टिक ओवरी डिसीज की चपेट आ रही हैं। इसका समय पर इलाज न होने से बांझपन होने के अलावा एंडोमेट्रियल कैंसर या कार्डिक की बीमारी भी हो सकती है। यह कहना है मुम्बई की विशेषज्ञ डा. अनी बीआर गांधी का। उन्होंने लखनऊ में चिकित्सा विविद्यालय के ह्वाइट हाल में आयोजित सतत चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम में,किशोरावस्था के दौरान होने वाली दिक्कतों के निदान पर चर्चा की गयी। डा. अनी ने कहा कि अगर लगातार उच्चचाप रहता हो, मुंहासे ज्यादा हो रहे हों, टाइप-टू की स्टेज में डायबिटीज में जल्दी पहुंच गया हो। इसके अलावा सिर के बाल खासकर माथे पर पतले हो रहे हों तो डाक्टर से तुरंत जांच कराना चाहिए। इस बीमारी में मोटापा शरीर के मध्य भाग में तेजी से बढ़ता है। उन्होंने कहा कि विशेषज्ञ डाक्टर की सलाह से दवाओं, आहार व व्यायाम से उपचार किया जा सकता है। परन्तु समय पर इलाज न होने से बांझपन हो सकता है और कारणों का पता भी जल्दी नही चल पाता। उन्होंने कहा कि ज्यादातर किशोरावस्था में ज्यादातर दिक्कतों के बारे में अभिभावकों से चर्चा नहीं कर पाते और समस्या तेजी से बढ़ती जाती है। उन्होंने कहा कि इसके लिए डाक्टरों से सलाह लेनी चाहिए। क्वीन मेरी अस्पताल की वरिष्ठ डाक्टर एसपी जायसवार ने बताया कि किशोरावस्था में होने वाली दिक्कतों के लिए उनके यहां विशेष क्लीनिक चलायी जाती है। इसमें विशेषज्ञ डाक्टरों के द्वारा किशोरियों को सलाह दी जाती है और इलाज किया जाता है। कार्यक्रम में कु लपति डा.डीके गुप्ता ने कहा कि सही समय पर जानकारी होने से कई गंभीर बीमारियों व भ्रामक जानकारियों से बचा जा सकता है(राष्ट्रीय सहारा,लखनऊ,23.4.11)।

आगे चलें...

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

ल्यूकोरिया में योग

अधिकतर महिलाएं ल्यूकोरिया जैसे-श्वेतप्रदर,सफेद पानी जैसी बीमारियो से जुझती रहती हैं, लेकिन शर्म से किसी को बताती नहीं और इस बीमारी को पालती रहती हैं। यह रोग महिलाओं को काफी नुकसान पहुंचाता है। इस बीमारी से छुटकारा पाने के लिए पथ्य करने के साथ-साथ योगाभ्यास का नियमित अभ्यास रोगी को रोग से छुटकारा देने के साथ आकर्षक और सुन्दर भी बनाता है।
यह वो बीमारी है जिससे भरी जवानी में महिलायें बूढ़ी और कमजोर नजर आने लगती हैं। श्वेतप्रदर सफेद पानी, व्हाइट डिस्चार्ज या ल्यूकोरिया महिलाओं की एक आम बीमारी है जिसमें कभी सफेद तो कभी मटमैला या पीला टाइप का दुर्गन्ध द्रव्य योनि से निरन्तर निकलता रहता है जो कई दिनों एवं महीनों तक जारी रहता है । इसे ल्यूकोरिया या श्वेतप्रदर रोग क हते हैं। योनि की भीतरी झिल्ली, गर्भाशय मुख या गर्भाशय से निकलने वाले मांस से धोवन की तरह, कभी योनि में खुजली और जलन पैदा करने वाला, दुर्गन्धयुक्त सफेद पानी के बहते रहने से अक्सर रोगी निर्बल, उदास और परेशान रहती हैं और शर्म के मारे रोग के बारे में किसी को कुछ बताना नहीं चाहती। श्वेतप्रदर के निरन्तर स्त्राव से महिलाएं धीरे -धीरे क मजोर और निढाल हो जाती हैं और भरी जवानी में बूढ़ी नजर आने लगती हैं। रोग उत्पत्ति के कारण अत्यधिक आलस्य भरी जीवन-यापन अर्थात शारीरिक श्रम कम करना, हर वक्त लेटे रहने की आदत, उत्तेजक पदार्थो का अधिक सेवन जैसे मांस, मछली, अंडा, शराब, चाय, काफी, तेल, मिर्च, खट्टी तथा चटपटी चाट आदि बार-बार तथा थोड़ी-थोड़ी देर बाद खाते रहने की आदत, कामोत्तेजक और अश्लील साहित्य, सिनेमा तथा मनोरंजन के साधनों में अधिक रूचि, अत्यधिक सहवास, मासिक धर्म की अनियमितता, छोटी उम्र में गर्भ धारण करना या बार-बार गर्भपात होना, भीतरी योनि में फोड़ा, फुन्सी या रसूली का होना अथवा ट्राइकोमोनास वेजाइनल या फंगस जीवाणु की उपस्थिति होने आदि से ल्यूकोरिया हो सकता है । लक्षण: श्वेतप्रदर में रोगी के हाथ पैर, पिंडलियां, घुटनों और पैर की हड्डियों में काफी दर्द होता है , पेड़ू में भारीपन, शरीर टूटना, कमर दर्द, सिर दर्द, स्मरण शक्ति में कमी, या चक्कर आना, हाथ-पैरों में जलन, योनि का गीला रहना, योनि में खुजली या जलन होना, शरीर में कमजोरी, कैल्शियम की कमी, योनिगंध, योनिशूल, खून की कमी, चेहरे का पीला पड़ना, आंखों का काला होना, चेहरा धंस जाना भूख न लगना, सिर के बाल अत्यधिक मात्रा में झरना ,आंखों का दिनों दिन रोशनी कम होना, कब्जियत बना रहना, बार-बार मूत्र आना, किसी काम में मन न लगना, उत्साहहीनता, चिड़चिड़ापन आदि होना ल्यूकोरिया के लक्षण होते हैं । यौगिक क्रिया: प्राणायाम ओम प्राणायाम 21 बार, क पालभाति 5 मिनट, अणुलोम-विलोम5 मिनट, भ्रामरी प्राणायाम 5 बार। आसन : वज्रासन, शशांकासन, भुजंगासन, अर्धशलमासन,धनुरासन, पश्चिमोत्तोनासन, कन्धरासन। बन्ध : मुलबन्ध का विशेषरूप से अभ्यास इस बीमारी में काफी लाभदायक होता है । मुद्रा : अश्विनी मुद्रा, सहजोली मुद्रा, विपरित क रणी मुद्रा और क्रमवार से धीरे धीरे सूर्य नमस्कार का अभ्यास। अंतत: यथाशक्ति शारीरिक श्रम करें , दिन में सोना बंद करें , आसन, प्रणायाम और प्रात: खुली हवा में प्रत्येक दिन टहलने का दैनिक कार्यक्रम बनायें। क्रोध, चिन्ता, शोक , भय से दूर रहें । सदैव प्रफुल्लित रहें । आहार : सभी हरी शाक -सब्जियां, सूप, खिचड़ी, दलिया, चोकरयुक्त आंटे की रोटी, फल में केला, अंगूर , सेव, नारंगी, अनार, आवंला, पपीता, चीकू , मौसमी, पुराना शाली चावल,चावल का धोवन तथा मांड़ , दूध, शक्कर, घी, मक्खन, छाछ, अरहर और मूंग की दाल, अंकुरित मूंग, मोठ आदि का समुचित प्रयोग करें। स्वच्छतापालन, ध्यान, सत्संग और स्वाध्याय का अभ्यास। अपथ्य : तेज मिर्च मसालेदार पदार्थ, तेल में तले पदार्थ, गुड़ , खटाई, अरबी, बैगन, अधिक सहवास, रात में जागना, उत्तेजक साहित्य, चाय, काफी,अधिक टीवी, संगीत-मजाक से बचे। पथ्य का पालन करते हुए योगाभ्यास के नियमित अभ्यास से कुछ ही दिनों में रोग से तो छुटकारा मिलेगा ही साथ ही साथ आकर्षक और सुन्दर भी आप दिखेंगी-डा. नन्द कुमार झा, योग व प्राकृतिक चिकित्सक(हिंदुस्तान,पटना,20.8.2010)

आगे चलें...