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शुक्रवार, 3 जून 2011

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टःभारत के 95 हज़ार युवा एड्स की चपेट में

भारत को उन अफ्रीकी देशों की सूची में शामिल किया गया है जहां इस एचआइवी वायरस से संक्रमित सबसे अधिक युवा रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में इस वक्त 95 हजार किशोर इस जानलेवा वायरस की चपेट में हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट अपार्च्चुनिटी इन क्राइसिस : प्रीवेंटिंग एचआइवी फ्रॉम अर्ली अडोलेसेंस टू यंग एडल्टहुड में कहा गया है भारत में 10 से 19 वर्ष की आयु समूह वाली 46 हजार लड़कियां और 49 हजार लड़के एचआइवी से संक्रमित हैं। इसके मद्देनजर भारत को वर्ष 2009 में सबसे अधिक एचआइवी संक्रमित देशों की सूची में दसवें स्थान पर रखा गया है। इस सूची में एचआइवी संक्रमित दो लाख दस हजार लड़कियों और 82 हजार लड़कों के साथ दक्षिण अफ्रीका शीर्ष पर है जबकि नाइजीरिया दूसरे स्थान है जहां एक लाख 80 हजार लड़कियां और एक लाख लड़के संक्रमित हैं। इसके बाद केन्या का नंबर है। गुरुवार को जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे अधिक संक्रमित किशोर उप सहारा अफ्रीकी देशों में हैं जिनमें अधिकतर संख्या महिलाओं की है जिन्हें अपनी स्थिति के बारे में जानकारी ही नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, विश्वभर में एचआइवी से संक्रमित सभी युवाओं में 60 फीसदी से ज्यादा महिलाएं हैं। यूनीसेफ के कार्यकारी निदेशक एंथोन लेक ने कहा, अधिकतर युवा लोगों में एचआइवी संक्रमण का कारण लापरवाही है, छूट और उल्लंघन है जो परिवारों, समुदायों, सामाजिक और राजनीतिक अगुवाओं की जानकारी में रहते होता है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिदिन करीब 2500 लोग एचआइवी से संक्रमित हो जाते हैं। वर्ष 2009 में 15-24 साल के बीच की उम्र वाले संक्रमित युवाओं में 41 फीसदी नए संक्रमण वाले युवा थे। यह पहली बार है जब यूएन एजेंसियां वर्तमान आंकड़ों पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि एचआइवी का विस्तार युवा लोगों के बीच कुछ कम हुआ है। फिर भी युवा महिलाएं और किशोरियां जैविक संवेदनशीलता, सामाजिक असमानता और प्रतिरोध के कारण संक्रमण के सर्वाधिक खतरे का सामना कर रही हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में बड़े पैमाने पर यह बीमारी वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाओं द्वारा फैल रही है। देश में इस धंधे में लिप्त 4.9 फीसदी महिलाएं एचआइवी पॉजीटिव हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक विरोध से बाहर निकलकर यौन शिक्षा की दिशा में प्रगति कर रहा है(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,3.6.11)।

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बुधवार, 23 मार्च 2011

प्रोफेसर त्रिवेदी की क़िताब में हैं एड्स-नियंत्रक पौधों के ब्यौरे

यूं तो पहले भी दावा होता रहा है कि एड्स जैसी खतरनाक बीमारी के खिलाफ प्रकृति में मौजूद जड़ी-बूटियां कारगर हथियार हो सकती हैं। अब इस दावे को मजबूत वैज्ञानिक जमीन देने की कोशिश हो रही है। कुछ दिनों पूर्व मेडिसनल प्लांट शीर्षक से लिखी किताब में बाकायदा उन पेड़-पौधों का ब्योरा दिया गया है जो एड्स के इलाज में मदद कर सकते हैं। पुस्तक के लेखक हैं-बॉटनी विषय में सवा सौ से अधिक किताब लिखकर रिकार्ड बनाने वाले डीडीयू गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पी.सी. त्रिवेदी। राजस्थान विश्वविद्यालय में तैनाती केदौरान किताब लिखने वाले प्रो. त्रिवेदी ने अब एंटी एड्स प्लांट यानी कि वनस्पतियों को लेकर गोरखपुर में भी काम करना शुरू कर दिया है। विश्वविद्यालय की कार्यशालाओं व विशेषज्ञ व्याख्यानों में ऐसी वनस्पतियों ने अपनी जगह भी बनानी शुरू कर दी है।
एड्स के वायरस की वृद्धि को रोककर इम्युनिटी सिस्टम को सही करने के लिए अब आम दिनचर्या में इन वनस्पतियों के सेवन को बढ़ावा देने की योजना परवान चढ़ रही है। कहा जा रहा है कि सिंथेटिक दवाओं के विकल्प के रूप में इन वनस्पतियों से दवा व वैक्सीन बनाने का कार्य चल रहा है। इस कोशिश के कई चरणों के रिजल्ट भी बेहतर आने की बात कही जा रही है। जिससे उत्साहित होकर इन वनस्पतियों का आमतौर पर सेवन की वकालत शुरू की गयी है, ताकि मनुष्य केअंदर रिट्रो वायरस, जेनेटिक मैटेरियल पर कब्जा कर अपनी संख्या में वृद्धि न कर सके। चूंकि वायरस किसी भी कोशिका में जाकर जेनेटिक मैटेरियल को प्रभावित कर रोग प्रतिरोधक क्षमता समाप्त करने लगता है, ऐसे में एंटी रिट्रो वायरस के जरिए कोशिकाओं की सुरक्षा एकमात्र उपाय है।

किन वनस्पतियों से है उम्मीद
एंटी रिट्रो वायरस प्रापर्टी वाली वनस्पतियों में अश्वगंधा, एलोवेरा, हल्दी, जिनसिंग, मिलिविलो, काली तुलसी, लेमन ग्रास आदि को प्रमुखता दी गयी है। इन वनस्पतियों के गुण रसायनों के सहारे बनायी गयी सिंथेटिक दवाओं से कई गुना अधिक हैं। सिंथेटिक दवाओं के तमाम अवयव जहां शरीर से किन्हीं न किन्हीं रूप में बाहर हो जाते हैं, वहीं वनस्पतियां सौ फीसदी शरीर में एब्जार्व होती हैं और इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता है।

एंटी-एड्स प्लांट में हैं अपार संभावनाएं- प्रो. त्रिवेदी
इस संबंध में कुलपति प्रो. पीसी त्रिवेदी कहते हैं कि एंटी एड्स प्लांट केजरिए एड्स पर नियंत्रण की अपार संभावनाएं हैं। शोधों व अन्य प्रमाणों के आधार पर उन्होंने मेडिसनल प्लांट पुस्तक में एक चैप्टर में इन वनस्पतियों का उल्लेख किया है। शोध भी हो रहे हैं और कई फेज में रिजल्ट उत्साहजनक भी हैं। दवा व वैक्सीन तो अलग बात है, यदि इन वनस्पतियों का प्रयोग सामान्य रूप में ही किया जाय तो शरीर का डिफेंस सिस्टम बिगड़ने नहीं पाएगा। फिलहाल इन वनस्पतियों केप्रति यहां जागरूकता पैदा करने के प्रयास शुरू कर दिये गये हैं(अमर उजाला,गोरखपुर,23.3.11)।

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बुधवार, 2 मार्च 2011

एड्स के पहले देशी टीके का टेस्ट सफल

भारत में विकसित किए जा रहे एचआईवी के टीके के मेडिकल टेस्ट का पहला चरण पूरा हो गया है। विशेषज्ञों को इस टेस्ट के बाद इसका कोई अतिरक्त प्रभाव (साइड इफेक्ट) नहीं मिला है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक डॉ. वीएम कटोच ने कहा है कि भारत में विकसित किए जा रहे एचआईवी के टीके के मेडिकल टेस्ट का पहला चरण दिसंबर 2010 में पूरा हो गया है। उन्होंने कहा कि हमें आशा है कि भारत में जितने भी प्रकार के एचआईवी विषाणु मिलते हैं, यह टीका उन सभी पर प्रभावी साबित होगा। परीक्षणों में कोई जल्दबाजी नहीं की गई है। थाईलैंड में ऐसे ही एक टीके का टेस्ट किया गया था, जो केवल 30 प्रतिशत प्रभावित रहा। हम चाहते हैं कि जो टीका बने, वह बहुत प्रभावी हो। 2008 में इंटरनेशनल एड्स वैक्सीन की पहल से इस दवा पर काम शुरू किया गया। ट्यूबरकुलासिस रिसर्च सेंटर, चेन्नई और नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ कॉलेरा और एंटरिक डिसीज, कोलकाता भी इस काम में सहयोग कर रहे हैं। देश में इस समय लगभग 25 से 30 लाख लोग एचआईवी से संक्रमित हैं। आईसीएमआर इस समय एचआईवी दवाओं के प्रति प्रतिरोधकता को दूर करने के तरीकों पर भी काम कर रहा है(राज एक्सप्रेस,दिल्ली,23.2.11)।

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बुधवार, 22 दिसंबर 2010

इलाहाबाद के 4000 एचआइवी पॉजिटिव लापता !

इलाहाबाद के करीब चार हजार एचआइवी पॉजिटिव व्यक्ति लापता हो गए हैं। ये कहां हैं और क्या कर रहे हैं, इसकी जानकारी किसी को नहीं है। चिन्ता यह भी है कि जाने-अनजाने ये लोग अपने संपर्क में रहने वाले अन्य लोगों को तो संक्रमित नहीं कर रहे। आइसीटीसी (इंटीग्रेटेड काउन्सिलिंग एंड टेस्टिंग सेन्टर) पर जांच में एचआइवी पॉजिटिव पाए गए इन लापता पीडि़तों को कायदे से इस समय एआरटी सेंटर पर इलाज के लिए दर्ज होना चाहिए था। उत्तर प्रदेश राज्य एड्स नियंत्रण सोसाइटी की रिपोर्टो में प्रदेश के सबसे संवेदनशील पांच जिलों में इलाहाबाद भी शामिल है। चार अन्य जिले इटावा, मऊ, बांदा आर देवरिया हैं। इलाहाबाद जिले के सौ से भी अधिक गांव अत्यंत जोखिम वाले घोषित किए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक जिले में 5852 लोग एचआइवी संक्रमित हैं जबकि मात्र 1579 लोगों को ही एआरटी सुविधा मुहैया कराई जा रही है। बाकी संक्रमित कहां व किस स्थिति में हैं, इस बात की जानकारी न तो सोसाइटी के पास है और न ही एड्स नियंत्रण से जुड़ी संस्थाओं के पास। संस्थाओं की मानें तो एचआइवी पीडि़तों में अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों से हैं। विडंबना है कि यहीं पर एड्स नियंत्रण की मुहिम अनियंत्रित हो रही है। 10 से 15 फीसदी पीडि़त ऐसे हैं जिन्हें ढज्ंढ पाना ही मुश्किल है। दरअसल,ये ऐसे हैं जो आइसीटीसी सेंटर पहुंचे तो, लेकिन इनमें से कई ने अपने संपर्क नंबर नहीं दिए तो कई ने नाम और पते ही फर्जी दर्ज करवा दिए। एआरटी सेंटर में जो भी इलाज करवा रहे हैं, अधिकांश शहर और सटे ग्रामीण क्षेत्रों के ही हैं। उत्तर प्रदेश राज्य एड्स नियंत्रण सोसाइटी की सलाहकार डॉ. संगीता पांडे का कहना है कि यह जागरूकता का ही असर है कि जो आइसीटीसी पर इतने ग्रामीण जांच के लिए पहुंचे। जहां तक एआरटी सेंटर तक इन्हें पहुंचाने की बात है तो इनकी स्थिति को देखते हुए ही इन्हें रेफर किया जाता है। वहीं, आइसीटीसी के एक चिकित्सक बताते हैं कि सेंटर पर केवल काउंसिलिंग और जांच का ही काम होता है। जांच में एचआइवी पॉजिटिव पाए गए पीडि़तों को आगे के इलाज के लिए तुरंत एआरटी सेंटर रेफर कर दिया जाता है क्योंकि सरकार से दवाओं का फंड एआरटी को ही जारी होता है। इलाहाबाद में एकमात्र एआरटी सेंटर एसआरएन अस्पताल में स्थापित है। उधर नैनी जेल में एचआइवी पोजिटिव बंदियों की जांच के लिए एक सेल स्थापित किया गया है। जो ऐसे बंदियों की पहचान कर उनकी देखरेख व खानपान के साथ ही दवाओं की व्यवस्था करता है। साथ ही बंदियों पर नजर रखता है। पिछले कुछ सालों से नैनी जेल के कुछ बंदियों में भी एचआइवी के लक्षण पाये गए हैं जिसके बाद यहां भी बीमारी पर रोकथाम की कवायद शुरू कर दी गई है(अमित पांडेय,दैनिक जागरण,इलाहाबाद,22.12.2010)।

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सोमवार, 6 दिसंबर 2010

एचआईवी से बचाव के लिए गोली

एचआईवी/एड्स के इन्फेक्शन से बचाव के लिए अब काउंसलिंग और कॉन्डम के साथ - साथ पिल का विकल्प भी उपलब्ध हो गया है। हाल ही में हुई स्टडी के मुताबिक , एंटीरेट्रोवायरल कीमोप्रॉफीलेक्सिस दवा एचआईवी वायरस को फैलने से रोक सकती है। अगर रिस्क ग्रुप को पहले ही यह दवा दे दी जाए , तो उसमें संक्रमण का खतरा 44 फीसदी तक कम हो जाएगा।

डॉक्टरों का कहना है कि यह तरीका एचआईवी पीड़ितों के साथ काम करने वालों और असुरक्षित ब्लड ट्रांसफ्यूजन के मामले में काफी अच्छा साबित हो सकता है। न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में छपी रिपोर्ट के मुताबिक , स्टडी में शामिल जिन पुरुषों ने कॉन्डम के साथ इस पिल का इस्तेमाल किया था , उनमें सिर्फ कॉन्डम का इस्तेमाल करने वाले ग्रुप के मुकाबले इन्फेक्शन काफी कम पाया गया। महिलाओं को इन्फेक्शन से बचाने के लिए मार्केट में आई जेल के मुकाबले यह पिल ज्यादा असरदार पाई गई , क्योंकि उससे इन्फेक्शन का खतरा 39 फीसदी तक कम होता है और पिल से 44 फीसदी तक।

अपोलो हॉस्पिटल के एक्सपर्ट डॉ . नलिन नाग के मुताबिक, ‘दवा इन्फेक्शन के रिस्क से पहले लेना शुरू करना होता है और सात दिन तक लेना होता है , जबकि हाल ही में आई पोस्ट एक्सपोजर प्रोफिलेक्सिस 28 दिन तक इस्तेमाल करनी होती है।’ बकौल नलिन, ‘पोस्ट एक्सपोजर प्रोफिलेक्सिस ड्रग्स के मामले में जागरूकता कार्यक्रम चलाने की जरूरत है , ताकि रेप की शिकार और स्वास्थ्यकर्मियों को इसे देकर उन्हें बीमारी के खतरे से बचाया जा सके। ’

हार्ट केयर फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ . के . के . अग्रवाल कहते हैं कि एचआईवी / एड्स कंट्रोल के मामले में ये दवाएं साल की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं। उनका कहना है कि प्री - एक्सपोजर प्रोफिलेक्सिस ड्रग्स एक्सिडेंट आदि के शिकार उन मरीजों को जीवनदान दिला सकती है , जो ग्रामीण इलाकों के अस्पतालों में पहुंचते हैं। उन्हें ब्लड की जरूरत होती है , लेकिन हॉस्पिटल में ब्लड जांच सुविधा न होने की वजह से डोनर उपलब्ध होने के बावजूद खून नहीं चढ़ाया जा सकता है। ऐसे में , मरीज को अगर एक्सपोजर प्रोफिलेक्सिस देकर उसके ब्लड ग्रुप वाले डोनर का ब्लड सीधे चढ़ा दिया जाए तो उसकी जान बच सकती है(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,6.12.2010)।

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बुधवार, 1 दिसंबर 2010

विश्व एड्स दिवस विशेषःसंवेदना का मरहम ज़रूरी

करीब बीस वर्ष पहले पहचान में आई बीमारी एचआईवी/एड्स से इंसानों की जितनी मौतें हुई, उतनी आज तक के ज्ञात मानव इतिहास में किसी भी बीमारी से समूचे विश्व में एक साथ मौतें नहीं हुई है। पांच करोड़ 30 लाख से अधिक लोग इस भयावह बीमारी से संक्रमित हो चुके हैं और अभी तक इस बीमारी से एक करोड़ 88 लाख लोग मौत के मुंह में समा चुके हैं। आज तक 130 लाख बच्चे इस बीमारी के चलते अनाथ हो चुके हैं, क्योंकि उनके माता-पिता दोनों ही इसी बीमारी के चलते मर चुके हैं। दुर्भाग्य से ये सभी आंकड़े हर दिन तेजी से बढ़ रहे हैं। विश्व भर के नेता इस बीमारी का जल्दी पता लगाने, प्रभावी व अचूक उपचार करने, इससे बचने और पीडि़तों की देखभाल करने जैसी बातों को सभी के लिए मानव अधिकारों की सूची में शामिल करने की अपील कर रहे हैं।

दुनिया अब जान चुकी है कि एड्स जैसी महामारी से लड़ने के लिए मानव अधिकारों की सुरक्षा करना मूलभूत अधिकारों के तहत बेहद जरूरी है। मानव अधिकारों की अवहेलना से सेक्स वर्करों और नशेडि़यों के बीच यह बीमारी बेहद गंभीर खतरा बनकर मौजूद रहती है। वैसे इस दिशा में एचआईवी और एड्स नियंत्रण के प्रशंसनीय कार्य हुए हैं और हो भी रहे हैं, लेकिन एचआईवी और एड्स के नियंत्रण का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए और प्रयत्न करने की जरूरत है। अन्यथा,हर वर्ष लाखों लोग इसी तरह एचआईवी बीमारी से संक्रमित होते रहेंगे और यह पूरी दुनिया में तेजी से फैलती रहेगी। लांछन और कलंक एचआईवी एड्स ने मानव जाति को समानांतर रूप से विभाजित कर दिया है। वैज्ञानिक जगत इस बीमारी की रोकथाम और इलाज की खोज करने में अपना सिर खपा रह है।

पूरी दुनिया में सभी स्थानीय सरकारें एचआईवी एड्स से बचे रहने के बारे में जागरूकता अभियान छेड़े हुए हैं। सभी सरकारें, स्वयंसेवी संस्थाए, सामाजिक कार्यकर्ता और स्वयंसेवक आम लोगों को यह बताने में अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं कि यह बीमारी छुआछूत से नहीं फैलती और इससे पीडि़तों के साथ सद्भावना से पेश आना चाहिए। लेकिन इसके ठीक उलट लोग एड्स से पीडि़त व्यक्ति को घृणा से देखते हैं और उससे दूरी बना लेते हैं। एचआईवी से संक्रमित व्यक्ति का राज खुलने पर उसके माथे पर कलंक का टीका लग जाता है। यह कलंक इस बीमारी से भी बड़ा होता है और पीडि़त को घोर निराशा का जीवन जीते हुए अपने मूलभूत अधिकारों और मौत के अंतिम क्षण तक एक अच्छी जिंदगी जीने से वंचित होना पड़ता है। बीमारी से दूरी, बीमार से नहीं दि कोलीशन फॉर इलिमिनेसन ऑफ एड्स रिलेटेड स्टिग्मा (सीईएएस) का कहना है कि अब वक्त आ गया है कि हम सभी एचआईवी एड्स को कलंक के रूप में प्रचारित करने की अपनी सोच और आचरण में बदलाव लाने के लिए चर्चा सत्र शुरू करें। हमें एचआईवी एड्स से जुडी हर चर्चा, प्रतिबंधात्मक उपाय और शोध का कार्य करते रहने के दौरान इससे जुड़े कलंक को खत्म करने के मुद्दे को भी शामिल करना चाहिए।

आज हमें एचआईवी एड्स पर कुछ अलग चर्चा करने की जरूरत महसूस होने लगी है और पूरी दुनिया के शोधार्थी, समुदाय, नेतागण और अन्य सभी इस विषय को प्रमुखता दें। विश्व एड्स दिवस सभी लोगों, समूहों, नेताओं समेत सभी को यह सुनहरा मौका दे रहा है कि वे एड्स पीडि़तों पर लगे कलंक के टीके को पोंछने और उनके मानव अधिकारों की रक्षा के लिए निर्णायक कार्य करें। कलंक की यह आंधी बड़ी तेजी से फैल रही है और समाज को दो भागों में बांट रही है। अत: विश्व एड्स दिवस के अवसर पर एड्स पीडि़तों के साथ हो रहे भेदभाव को जड़ से मिटाने के लिए बहुत ही बड़े स्तर पर कार्य करने का वक्त आ गया है। जीने का अधिकार इस वर्ष के लिए ह्यूमन राइट्स एंड एक्सेस टु ट्रीटमेंट यानी मानव अधिकार और इलाज तक की पहुंच के नाम से स्लोगन बनाया गया है। इसके तहत सभी पीडि़तों को इलाज की सुविधा देने, उनकी सुरक्षा और देखभाल करने जैसे लक्ष्यों को पूरा करने की योजनाएं बनी हैं। इस स्लोगन के मध्यम से पूरी दुनिया के सभी देशों को बताया जाएगा कि वे इस रोग से पीडि़तों के इलाज और सामान्य जीवन जीने में बाधक बने कानूनों को सुधारें और नए कानून बनाएं।

मानव अधिकार सभी के लिए मूलभूत अधिकार के रूप में है। एड्स से पीडि़त लोगों के साथ हो रहे भेदभाव, उन्हें परेशान करने और सताने जैसी प्रथाओं को रोकना होगा। पूरी दुनिया में यह एक कड़वा सच है कि इससे पीडि़त लोगों को कलंकित घोषित कर दिया जाता है, जो नौकरी पर हैं, उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ती है। स्कूलों से बच्चों को निकाल दिया जाता है। यहां तक कि इससे पीडि़त लोगों को इलाज कराने तक के मूलभूत अधिकार से वंचित कर दिया जाता है। कई बार अस्पताल और डॉक्टर-नर्स आदि एड्स पीडि़तों का इलाज करने से मन कर देते हैं। भारत में भयावहता अपने देश में वर्ष 1986 में एड्स के पहले मरीज का पता चला था। तब से अब तक देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एचआईवी संक्रमित लोगों का फैलाव हो चुका है। वैसे एचआईवी संक्रमित मरीजों का अनुपात अपने देश में कम ही रहा है। हां, दक्षिण भारत और सुदूर उत्तर-पूर्व के राज्यों में इन मरीजों की संख्या कुछ अधिक है। एचआईवी से ग्रस्त मरीजों की अधिकता महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश व कर्नाटक तथा उत्तर-पूर्व में मणिपुर व नागालैंड में है। अगस्त 2006 में राष्ट्रीय स्तर पर जारी एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार एड्स से पीडि़त कुल मरीजों में से 90 फीसदी मरीज देश के सभी 38 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में पाए गए थे। भारत में एड्स बीमारी को किसी और की समस्या के रूप में देखा जाता है। इससे पीडि़त लोगों की जीवनशैली व उनके चरित्र को संदेह की नजर से देखा जाता है। 

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि कई बार इस बीमारी से मरने वाले व्यक्ति का अंतिम संस्कार तक करने से इनकार कर दिया गया है। एचआईवी एड्स के संक्रमण के मुद्दे पर महाराष्ट्र और देश के अन्य राज्यों के बीच तुलना करना आज जरूरी हो गया है। महाराष्ट्र में यह बीमारी एक गंभीर समस्या बन चुकी है। इस राज्य में 7.50 लाख मरीज एचआईवी से ग्रस्त हैं और इस बाबत महाराष्ट्र देश में दूसरे नंबर पर है। नई जानकारी के अनुसार राज्य में इस समय सेक्स आधारित सभी मरीजों में 18.4 फीसदी मरीज एचआईवी के और 1.8 फीसदी मरीज एएनसी के थे। वर्ष 2004 में जारी आकड़ों के मुताबिक 93,650 लोग एचआईवी पॉजिटिव पाए गए थे, जबकि 2010 में यह आंकड़ा 11,53810 जा पहुचा है(उमा श्रीराम,दैनिक जागरण,1.12.2010)।

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सोमवार, 15 नवंबर 2010

मध्यप्रदेशः14 साल में 45 गुना बढ़े एड्स रोगी

मध्य प्रदेश में एड्स रोगियों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है और पिछले 14 सालों के आंकड़ों पर नजर डालें तो प्रदेश में इनकी संख्या में 45 गुना से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। मध्य प्रदेश राज्य एड्स नियंत्रण समिति सूत्रों के अनुसार 1996 में प्रदेश में एड्स रोगियों की संख्या मात्र 96 थी, जबकि 2009 में यह संख्या बढ़कर 4449 तक जा पहुंची है। प्रदेश में हर साल एड्स रोगियों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। मध्य प्रदेश में एड्स का पहला मामला 1988 में प्रकाश में आया था। प्रदेश में सेक्स वर्कर, समलैंगिंक जोड़ों और ट्रक चालकों के बीच जहां एड्स रोगियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है वहीं राज्य के 25 से 35 वर्ष के युवाओं में एड्स फैलना सबसे अधिक चिंता का विषय बन गया है। आज के चकाचौंध भरे जमाने में युवा शादी पूर्व यौन संबंधों के चलते तेजी से इस बीमारी का शिकार हो रहे हैं। प्रदेश में लगभग हर साल एड्स रोगियों की संख्या में इजाफा हो रहा है तथा टीकमगढ़ और उमरिया ऐसे पिछडे़ जिले हैं जहां इस साल नए दस एड्स रोगियों का पता लगा है। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश में 2008 में प्रदेश में जहां एड्स रोगियों की संख्या 3407 थी, वहीं 2009 में यह संख्या 4449 तक पहुंच गई और इस साल सितंबर तक प्रदेश में एड्स रोगियों की संख्या का आंकड़ा 3415 रिकार्ड किया गया। 2009 में सर्वाधिक 977 रोगी इंदौर में पाए गए जबकि राजधानी भोपाल का नंबर दूसरा रहा जहां एड्स रोगियों की संख्या 613 है। इसके अलावा जबलपुर में 423, उज्जैन में 294, ग्वालियर में 235, रीवा में 196, मंदसौर में 181 तथा बुरहानपुर में 151 एड्स रोगी पाए गए। इसी प्रकार इस साल सितंबर तक प्रदेश में एड्स रागियों की संख्या इंदौर में 667, भोपाल में 372, जबलपुर में 311, उज्जैन में 228, ग्वालियर में 122, रीवा में 265, मंदसौर में 142 और बुरहानपुर में 105 रिकार्ड की गई है(दैनिक जागरण,दिल्ली,15.11.2010)।

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शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

हिमाचलःएचआईवी की जांच अब घर पर ही कराने की सुविधा

हिमाचलवासियों को एचआईवी टेस्ट करवाने के लिए अब घर पर ही खून जांच की सुविधा मिलेगी। राज्य एड्स कंट्रोल सोसाइटी की मोबाइल वैन में इस सुविधा को जोड़ दिया गया है। इसका सीधा लाभ उन लोगों को मिलेगा, जो स्वेच्छा से एचआईवी जांच करवाना तो चाहते हैं, लेकिन अस्पतालों तक नहीं जा पाते। एमपीडब्ल्यू फील्ड से जांच करवाने वाले लोगों का डॉटा एकत्र करके फील्ड से जांच करवाने वाले लोगों का डाटा एकत्र करके जिला एड्स कंट्रोल अधिकारी को देंगे। उसके बाद टेस्टिंग सुविधा उनके गांव पहुंच जाएगी। यही नहीं मोबाइल जागरूकता वैन में टेस्ट करने से संबंधित उपकरण और काउंसलर भी हैं, जो लोगों की मौके पर ही काउंसलिंग भी करेंगे। नादौन और भोरंज में इसी माह इन दिनों मोबाइल वैन हमीरपुर में हैं। इस समय जिले के सुजानपुर टौणीदेवी और बड़सर में इंटीग्रेटिड काउंसलिंग एंड टेस्टिंग (आईसीटीसी) केंद्र सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध है। लेकिन नादौन और भोरंज में यह सुविधा न होने से लोगों को हमीरपुर एआरटी सेंटर पर टेस्टिंग काउंसलिंग के लिए निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन इस माह इन दिनों क्षेत्रों में मोबाइल टीम यह सुविधा प्रदान करेगी। यहां लोग स्वेच्छा से एचआईवी रक्त जांच करवा सकेंगे, वहीं उनकी काउंसलिंग भी हो सकेगी। यदि कोई पॉजीटिव पाया जाता है, तो उसे शीघ्र ही अगली चिकित्सीय सुविधा भी मिल सकेगी। दोनों क्षेत्रों में पहले नादौन और फिर भोरंज में सात-सात दिनों के लिए यह सुविधा होगी। एआरटी सेंटर हमीरपुर से मिले आंकड़ों के मुताबिक युवा वर्ग में स्वेच्छा से एचआईवी टेस्ट करवाने वालों का ग्राफ ज्यादा बढ़ रहा है। पिछले दिनों सुजानपुर में ही अकेले 75 युवा-युवतियों ने स्वेच्छा से एचआईवी जांच करवाई। हमीरपुर में हर सप्ताह 200 से 300 तक युवा आ रहे हैं, जो कॉलेज गोइंग हैं(दैनिक भास्कर,हमीरपुर,2.10.2010)।

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शनिवार, 4 सितंबर 2010

हरियाणाःएचआईवी के 120 मामले। फरीदाबाद हाई रिस्क एरिया घोषित

एचआईवी/एड्स के मामलों में हरियाणा में फरीदाबाद को हाई रिस्क एरिया घोषित किया गया है। वर्ष 2010 में एचआईवी/एड्स के रिकॉर्ड तोड़ 120 मामले दर्ज किए गए हैं।
अगस्त में एचआईवी पॉजिटिव के 16 नए मामले सामने आए हैं। इनमें से 11 पुरुष और 5 महिलाएं हैं। इनमें से पांच टीबी के पेशेंट भी हैं। तमाम दावों के बीच जिले में लगातार एचआईवी/एड्स का ग्राफ बढ़ रहा है। जागरूकता के नाम पर नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (नाको) और हरियाणा एड्स कंट्रोल सोसायटी (हैक्स) करोड़ों रुपए खर्च कर रही है, लेकिन नतीजे कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।
फजीहत से बचने के लिए अधिकारियों का तर्क है कि जागरूकता आ रही है, तभी लोग एचआईवी की जांच के लिए आगे बढ़ रहे हैं। एचआईवी/एड्स को लेकर लोगों में जागरूकता आ रही है तो मामले घटने की बजाय लगातार बढ़ क्यों रहे हैं? इस प्रश्न पर अधिकारी चुप्पी साध लेते हैं। डब्ल्यूएचओ अलर्ट डब्ल्यूएचओ की कंसल्टेंट डॉ. सुधी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए शुक्रवार को बीके अस्पताल में एचआईवी काउंसलर और प्रमुख टीबी अधिकारी के साथ बैठक की और जागरूकता अभियान को और प्रभावी बनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जितने भी मामले पॉजिटिव पाए जाते हैं उन्हें सही ढंग से जांच और एआरटी के लिए रेफर किया जाए। जितने भी टीबी के पेशेंट हों उनकी भी प्रॉपर तरीके से जांच हो और उन्हें एचआईवी जांच के लिए भी भेजा जाए। लगातार बढ़ रहे हैं मामले कई वर्षो की तुलना में वर्ष 2009 में एचआईवी के 153 मामले दर्ज हुए थे। सरकारी अस्पताल के आंकड़ों के तहत इस साल अब तक 120 मामले सामने आए हैं। इनमें से जनवरी में आठ, फरवरी में 13, मार्च में 17, अप्रैल में 15, मई में 11, जून में 10, जुलाई में 30 और अगस्त में 16 मामले आए हैं। क्या कहते हैं अधिकारी डिप्टी सीएमओ डॉ. अशोक गुप्ता का कहना है कि हर वर्ग के लोगों को एचआईवी/एड्स फैलने के कारण व बचाव के बारे में जानकारी होनी चाहिए। जागरूकता इस लाइलाज बीमारी को रोकने का एकमात्र विकल्प है। आईसीटीसी सेंटर आकर इस खतरनाक बीमारी के बारे जानकारी लेनी चाहिए। गेम्स में गंभीर हो सकते हैं हालात जिले में एचआईवी/एड्स को लेकर स्थिति गंभीर बनी हुई है। ऐसे में कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर स्वास्थ्य विभाग की धड़कनें तेज हो गई हैं। विभाग का मानना कि गेम्स में सेक्स वर्कर्स का जाल बढ़ेगा। ऐसे में पीड़ितों की संख्या में इजाफा होने की आशंका है। इस समस्या से निपटने के लिए विभाग ने अपने स्तर पर विकल्प तलाश लिया है। रेडक्रॉस की ओर से टारगेट इंटरवेंशन प्रोजेक्ट पर काम किया जा रहा है। इनमें रजिस्टर्ड सेक्स वर्कर्स को इस लाइलाज बीमारी के बचाव के बारे में जानकारी दी जाएगी। गौर करने वाली बात यह है कि फरीदाबाद में करीब ढाई हजार सेक्स वर्कर्स ही रजिस्टर्ड हैं जबकि ऑफ द रिकॉर्ड इनकी संख्या बहुत अधिक है।

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सोमवार, 30 अगस्त 2010

एड्स पीड़ित महिलाओं से भेदभाव पर मिले कड़ा दंड

सबसे खतरनाक संक्रामक बीमारी एड्स ने अब पूरे देश में पांव पसार लिए हैं। इसकी चपेट में आने वाली महिलाओं व बच्चों की स्थिति इस बीमारी से पीडि़त पुरुषों से ज्यादा खराब है। उन्हें न सिर्फ सामाजिक भेदभाव का शिकार होना पड़ रहा है, बल्कि उनके लिए किए जाने वाले सरकारी सुधार कार्यक्रम भी नाकाफी हैं। एचआईवी/एड्स पीडि़त महिलाओं की स्थिति का अध्ययन करने वाली संसदीय समिति ने इस बारे में जल्द से जल्द विधेयक संसद में पेश करने और उसमें एचआईवी/एड्स पीडि़तों के साथ भेदभाव करने वालों के खिलाफ कड़े दंड का प्रावधान करने को कहा है। संसद की महिलाओं को शक्तियां प्रदान करने संबंधी समिति ने एचआईवी/एड्स पीडि़त महिलाओं को सामाजिक भेदभाव से बचाने के लिए कुछ कड़ी सिफारिशें की हैं। अपनी सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश में कहा है कि एचआईवी एड्स से पीडि़त महिलाओं के साथ यदि कोई व्यक्ति या संस्था भेदभाव करता है तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए। समिति ने इस बारे में सरकार द्वारा लाए जाने वाले विधेयक में देरी करने पर भी गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि इसमें देरी नहीं करनी चाहिए। एचआईवी/एड्स पीडि़त महिलाओं को बदनामी व भेदभाव से बचाने के लिए यह कदम उठाना जरूरी है। इस विधेयक में विवाहों का अनिवार्य पंजीकरण, विवाह से पहले एचआईवी से जुड़े आईडीयू, एचआईवी पीडि़त गर्भवती महिलाओं का कल्याण व महिलाओं का उत्पीड़न रोकने संबंधी प्रावधान है किए जाने हैं। गौरतलब है कि साल 2008-09 में इस बीमारी ने देश के उन दो केंद्र शासित प्रदेशों को भी अपने चपेट में ले लिया है जो इससे पहले तक इस बीमारी से बचे हुए थे। इनमें अंडमान द्वीप समूह व दादरा नगर हवेली शामिल हैं, जहां इस अवधि में क्रमश: 35 व 73 मामले सामने आए हैं। संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस बारे में गंभीर चिंता व्यक्त की है। समिति ने कहा है कि इस बीमारी से पीडि़त महिलाओं की स्थिति पीडि़त पुरुषों से ज्यादा खराब है। समिति ने इस बारे में उनके उपचार, बचाव व उनको सामाजिक रूप से पीडि़त होने से बचाने के लिए दर्जन भर से ज्यादा सिफारिशें की है। इनमें एचआईवी ग्रस्त सभी बच्चों को एआरटी (एंटी रेट्रोवायरल उपचार) उपलब्ध कराना और सामुदायिक देखभाल केंद्रों की संख्या बढ़ाना शामिल है। 2008 के अनुसार देश में एचआईवी ग्रस्त बच्चों की संख्या 94 हजार है, जिनमें एआरटी केवल 19 हजार 182 बच्चों को दिया जा रहा है।(रामनारायण श्रीवास्तव,दैनिक जागरण,दिल्ली,30.8.2010)।

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बुधवार, 25 अगस्त 2010

एचआईवी उपचार में आयुर्वेद बाधकःनाको

आयुर्वेद एवं अन्य अल्टरनेटिव चिकित्सकीय पद्धतियों के एड्स को जड़ से समाप्त करने के दावे को नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गेनाइजेशन (नाको) ने अपने निर्देशों में पूर्णत: खारिज कर दिया है। पब्लिक अवेयरनेस फार हेल्थपुल अप्रोच फार लिविंग (पहल) के चिकित्सा निदेशक डा. दिवाकर तेजस्वी ने नाको के निर्देशों से सहमति जताते हुए कहा कि इन पद्धतियों के दावों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इसके विपरीत आयुर्वेदिक एवं अन्य पद्धतियों की दवाएं एंटी वायरल थेरेपी(एआरटी)व दूसरी दवाओं के प्रभाव को भी कम कर देती हैं। ऐसे में एड्स के वायरस बनने की गति भी तेज हो जाती है। डा. दिवाकर ने कहा कि इस बाबत भारतीय चिकित्सा शोध परिषद द्वारा जारी निर्देशों का भी पालन किया जाना चाहिए(दैनिक जागरण,पटना,25.8.2010)

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मंगलवार, 24 अगस्त 2010

प्रोफेसर आर.के.सिंह खोज सकते हैं एड्स का इलाज़

उम्मीद जगी है कि एचआईवी (ह्यूमन इम्युनो वायरस) संक्रमित लोगों के लिए कारगर दवा तैयार कर ली जाएगी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो.आर के सिंह ने ऐसे 9 यौगिक खोज निकाले हैं जो एड्स की संभावना को न सिर्फ कम करेंगे बल्कि इसे पनपने से भी रोकेंगे। एड्स अब तक लाइलाज बीमारी है। दुनिया में लगभग 35 मिलियन लोग इसकी चपेट में हैं। सिर्फ भारत में ही 2.5 मिलियन लोग एड्स पीडि़त हैं। तमाम अनुसंधान के बाद भी वैज्ञानिक इस बीमारी की काट नहीं ढूंढ पाये। अब जाकर एक राहत भरी खबर मिली है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. आरके सिंह ने एड्स के इलाज की दिशा में कुछ बेहतर परिणाम हासिल किए हैं। उन्होंने ऐसे 9 यौगिक खोजे हैं जो एचआईवी संक्रमण को रोकने में कारगर हैं। इसे चिकित्सा जगत में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। क्या है अनुसंधान और उसके नतीजे इविवि के रसायन विज्ञान विभाग में इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी नई दिल्ली के सहयोग से यह प्रोजेक्ट लगभग चार वर्षो से चल रहा है। अब तक लगभग 100 यौगिकों को खोजा गया और उनपर अध्ययन किया गया। इनमें से तीस को परीक्षण के लिए दिल्ली के नेशनल इन्स्टीट्यूट आफ इम्युनोलॉजी, नेशनल एड्स रिसर्च इन्स्टीट्यूट पुणे और बेल्जियम की प्रयोगशालाओं में भेजा गया। जांच के बाद 9 ऐसे यौगिक चिह्नित किये गए जो एड्स के वायरस एचआईवी को नष्ट करने में कारगर साबित हुए। इस दौरान यह भी पता चला कि नये खोजे गए यौगिक शरीर पर किसी अन्य प्रकार का दुष्प्रभाव नहीं डालते हैं। इतना ही नहीं, इनकी मदद से जिन दवाओं को विकसित किया जाएगा उनमें लागत भी कम आएगी। खोजे गए मॉलीक्यूल शरीर में ऐसी परिस्थितियां भी विकसित करेंगे जिससे प्रतिरोधक क्षमता का विकास हो। आगे का अध्ययन पोलैंड में एचआईवी पर कार्य कर रहे प्रो.आरके सिंह बताते हैं कि आगे का अध्ययन इन्स्टीट्यूट आफ बायोकेमेस्ट्री एंड फिजिक्स पोलैंड में होगा। इसमें वहां के प्रो.डी सुगर भी मदद करेंगे। इंसा (इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी नई दिल्ली) की तरफ से प्रो.सिंह को छह माह के लिए पोलैंड भेजा जा रहा है(अमलेन्दु त्रिपाठी,दैनिक जागरण,इलाहाबाद,24.8.2010)।

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शनिवार, 21 अगस्त 2010

पहली बार बनी एड्स की मनोवैज्ञानिक टेस्ट किट

हिसार के गुरु जंभेश्वर यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (जीजेयू) के एप्लाइड साइकॉलाजी डिपार्टमेंट ने ऐसी प्रश्नावली तैयार की है, जो एड्स और एचआईवी के बारे में देश के युवा मन को टटोलेगी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के 2400 युवाओं से बातचीत कर तीन साल में तैयार की गई बीस प्रश्नों की सूची सितंबर में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी), नेशनल एड्स कंट्रोल सोसायटी ऑफ इंडिया (नाको) और हरियाणा एड्स कंट्रोल सोसायटी (एचएसीएस) को भेजी जाएगी। देश में पहली बार ‘एचआईवी रिस्क परसेप्शन क्वेश्चनेयर नाम से इस तरह का मनोवैज्ञानिक टेस्ट किट तैयार की गई है। प्रश्नावली तैयार करने वाले डॉ. संदीप राणा और रिसर्च फैलो डॉ. सुनील सैनी की मानें तो किसी बीमारी का सबसे आसान इलाज उसके मनोवैज्ञानिक कारण पर पकड़ बना लेना है। यह प्रश्नावली यही काम करेगी। मन की बात जानेंगे यूजीसी, नाको और एचएसीएस, इस टेस्ट किट के जरिए देश के युवाओं के मन में एचआईवी और एड्स से संबंधित पल रही सोच का पता लगा सकेंगी। वैसे यह किट भी यूजीसी के प्रायोजित पांच लाख 86 हजार की शोध परियोजना ‘बिहेवियरल मॉडिफिकेशन फॉर एचआईवी—एड्स अमंग एडल्ट्स’ के तहत तैयार की गई है। इस प्रोजेक्ट पर मई 2007 में काम शुरू किया गया था। डॉ. राणा इस प्रोजेक्ट के प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर हैं, जबकि डॉ. सुनील सैनी प्रोजेक्ट फैलो। डॉ. सैनी ने बताया कि यह टेस्ट किट एचआईवी और एड्स के क्षेत्र में कार्य कर रही सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के लिए भी मददगार साबित होगी। इसे तैयार करने में भी नाको सहित कई संस्थाओं की मदद ली गई थी। इस कोश्चनेयर को तैयार करने से पहले एचएसीएस की मदद से 23 एड्स रोगियों से भी संपर्क किया गया और उनके मनोविज्ञान को टटोलने की कोशिश की गई। कारगर साबित होगी टेस्ट किट प्रोजेक्ट के प्रिंसिपल इंवेस्टिगेटर डॉ. संदीप राणा का कहना है कि टेस्ट किट युवाओं के मन में एचआईवी और एड्स के प्रति पल रही सोच को पकड़ेगी। ऐसे युवाओं की कमी नहीं है जो मान बैठे हैं कि उन्हें एड्स नहीं हो सकता, हालांकि वे इसके सभी कारणों को नहीं जानते। ऐसे युवाओं की सोच समझकर उसमें बदलाव करने की जरूरत है। सोच में बदलाव होगा, तो व्यवहार भी बदलेगा और एड्स जैसी घातक बीमारी से युवाओं को बचाया जा सकेगा। प्रश्नावली का विमोचन जीजेयू में एड्स के प्रति युवाओं की सोच मापने वाली टेस्ट किट का शुक्रवार को विमोचन भी कर दिया गया।

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गुरुवार, 5 अगस्त 2010

हिमाचलःटीबी पॉजीटिव पर होगा एचआईवी टेस्ट

एड्स और टीबी कार्यक्रम समन्वय के साथ चलेंगे। टीबी पॉजीटिव पाए जाने वाले मरीज का एचआईवी टेस्ट होगा। नाको की नई गाइडलाइन के तहत जिला क्षय रोग अधिकारी व जिला एड्स कार्यक्रम अधिकारियों को इसके लिए प्रशिक्षण दिया जाएगा। योजना को सफल बनाने के लिए हर जिले के दोनों कार्यक्रम अधिकारियों को दिशा-निर्देश जारी हो गए हैं। इससे मरीजों को एक बारगी ही टेस्ट सुविधा मिल जाने से बीमारी का जल्द पता चल सकेगा और उनका समय पर ही उपचार भी शुरू हो सकेगा। एचआईवी पॉजीटिव मरीजों में टीबी होने की ज्यादा आशंका रहती है। भूख की कमी, तेजी से वजन में कमी, खांसी के लक्षण दोनों बीमारियों में पाए जाते हैं। हालांकि इस समय गर्भवती महिलाएं स्वेच्छा से एचआईवी टेस्ट करवाने को ज्यादा संख्या में पहुंच रही हैं। एआरटी सेंटर हमीरपुर के आंकड़ों के अनुसान पांच हजार के करीब गर्भवती महिलाओं ने स्वेच्छा से एचआईवी टेस्ट करवाया है। इनमें करीब एक दर्जन गर्भवती महिलाओं को एचआईवी पॉजीटिव पाया गया। जिला एड्स कार्यक्रम अधिकारी डॉ. आरके अग्निहोत्री का कहना है कि समय पर बीमारी का पता चलने पर जहां स्वास्थ्य विभाग ने उनकी डिलीवरी देख-रेख में करवाई, वहीं उनके जन्म लेने वाले बच्चों को भी नई जिंदगी मिली है। अब एड्स व टीबी कार्यक्रम एक साथ चलने से नए मरीजों का जल्दी ही पता चल सकेगा। इससे शीघ्र उपचार शुरू हो सकेगा और मरीज जल्द मौत की गिरफ्त में जाने से बच सकेंगे। इसी माह प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत इसी माह शिमला में नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन के तहत दिल्ली के विशेषज्ञ सभी जिलों के क्षय रोग अधिकारियों व एड्स कंट्रोल अधिकारियों को जानकारियां और प्रशिक्षण देंगे। उसके बाद यह अधिकारी पैरा मेडिकल स्टाफ व अन्य कर्मियों को ट्रेनिंग देंगे। टीवी और एड्स कंट्रोल कार्यक्रमों में समन्वय के साथ काम होगा। टीबी पॉजीटिव का एचआईवी टेस्ट भी होगा। छह अगस्त को शिमला में ट्रेनिंग रखी गई है। डॉ. सुलक्षणा पुरी, निदेशक एड्स कंट्रोल सोसाइटी(अश्वनी वालिया,दैनिक भास्कर,हमीरपुर,5.8.2010)

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रविवार, 1 अगस्त 2010

पंजाबःएचआईवी का संक्रमण रोकेगा ओएसटी सैल

इंजेक्शन के माध्यम से ड्रग लेने वाले नशेड़ियों से एचआईवी के संक्रमण का खतरा सबसे ज्यादा है। इस पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र सरकार ने पंजाब के पांच जिलों में ओएसटी (ओरल सब्सिट्यूशन थेरेपी) सैल की स्थापना की है। यह सैल जिलों में शुरू होगा। सैल में एक डाक्टर सहित एक काउंसलर, दो स्टाफ नर्स और एक डाटा एंट्री आपरेटर होंगे। इस सेल को अगस्त माह के अंतिम सप्ताह से शुरू कर दिया जाएगा। इससे पहले स्टाफ को एक सप्ताह की ट्रेनिंग पर पीजीआई चंडीगढ़ भेजा जाएगा। सिविल अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेडेंट डा. चंद्रमोहन ने बताया कि इंजेक्शन से ड्रग लेने वाले नशेड़ी एक ही सीरिंज का प्रयोग करते है जिससे एचआईवी संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। एनजीओ के माध्यम से इंजेक्शन से ड्रग लेने वाले लोगों को चिन्हित कर भेजा जाएगा। यहां उनकी कांउसिलिंग करके ड्रग लिये जाने की मात्रा के अनुपात में उन्हें गोलियां दी जाएंगी। सिविल अस्पताल में इसके लिए एक अलग चैम्बर लगभग तैयार हो चुका है। सिविल अस्पताल के मनोचिकित्सक डा. अमन सूद को ओएसटी सेल का नोडल अफसर नियुक्त किया गया है। उन्होंने बताया कि नेशनल एड्स कंट्रोल सोसाइटी और स्टेट एड्स कंट्रोल सोसाइटी की मदद से इस योजना को अमलीजामा पहनाया जा रहा है। इससे एचआईवी के संक्रमण को काफी हद तक रोकने में सफलता मिलेगी। उद्देश्य ओएसटी सैल का पहला उद्देश्य मरीजों को इंजेक्शन से नशा करने की लत से छुटकारा दिलाना है और फिर काउंसलिंग करके उनकी नशे की आदत छुड़वाने का प्रयास किया जाएगा। कहां-कहां अमृतसर, बटाला, लुधियाना, तरनतारन और जालंधर(अखंड प्रताप सिंह,दैनिक भास्कर,जालंधर,1.8.2010)

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सोमवार, 26 जुलाई 2010

एड्स नहीं रहा लाइलाज़

दुनिया भर में महामारी के रूप में प्रचारित किया जा रहा एड्स अब लाइलाज नहीं रहा। बुद्ध की धरती के एक आयुर्वेदिक डाक्टर ने इसकी दवा खोज निकाली है।
८२ हर्बल पौधों के मिश्रण से तैयार सीरप और एक कैपसूल के मार्फत १९ महीने में एड्स को जड़ से ठीक करने का दावा करने वाले इस डाक्टर की दवा को इसी साल मई में पेटेंट भी मिल गया है। इसका पेटेंट नंबर २४०४२२ है। पेटेंट मिल जाने से डाक्टर के न केवल हौसले बुलंद हैं बल्कि उनके दावे भी पुख्ता साबित हुए हैं।
कुशीनगर जिले के लक्ष्मीगंज बाजार में विश्व आयुर्वेद शोध एवं अनुसंधान केंद्र चलाने वाले डाक्टर संतोष पांडेय की यहां तक की यात्रा बेहद चुनौती भरी रही है। वह बताते हैं, "१९९९ में ही यह दवा मैंने बना ली थी। १९ जुलाई २००४ को पेटेंट के लिए आवेदन किया था। आवेदन पत्र संख्या १३३०१ बीईएल-२००४ था। पर मेरी बात कोई सुनने को ही तैयार नहीं था। हमने तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से संपर्क साधा।
उन्होंने २३ सितंबर को इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन एंड होम्योपैथिक को तत्काल हस्तक्षेप करके दवा का परीक्षण और पेटेंट करने को कहा।" संतोष बताते हैं कि पेटेंट की प्रक्रिया में उनके लाखों रुपए स्वाहा हो गए। १२ वकीलों का भारी-भरकम पैनल लगाना पड़ा। चेन्नई में आटोमोबाइल इंजीनियर की पढ़ाई करने वाले संतोष अपनी धुन के पक्के थे। वह कुछ नया कर दिखाना चाहते थे।
नतीजतन, उन्होंने दिल्ली में नौकरी के दौरान पार्टटाइम आयुर्वेद रत्न का कोर्स किया। वह बताते हैं कि आयुर्वेद के लिए खाक छानी। ३२ लोगों को अपना गुरु बनाया। बीमार लोगों को देखकर मन पसीज उठता था। नतीजतन, आटोमोबाइल छोड़ डाक्टरी की ओर रुख किया।
पेटेंट मिलने के बाद "नईदुनिया" से बातचीत के दौरान डाक्टर संतोष के हौसले बनते हैं। वह एड्स को लेकर तमाम सरकारी दावों को खारिज करते हैं। मसलन, उनका कहना है कि कंडोम लगाकर सेक्स करने का सरकारी दावा एड्स को रोकने में सिर्फ तीस फीसदी कामयाब होता है।
उनके मुताबिक चुंबन से भी एड्स होता है। उन्होंने कहा कि भारत में तमाम लोग पान मसाला, पान, तंबाकू और सिगरेट आदि खाते-पीते हैं। नतीजतन मुंह में घाव और तमाम बीमारियां होती हैं। डीप किस के दौरान इनके मार्फत भी एड्स फैलता है।
डाक्टर संतोष भारत में एचआईवी के लिए किए जा रहे टेस्ट को भी बेमानी बताते हैं। उनके मुताबिक एड्स की जांच के लिए एलिजा, आईएफए और एसयूडीएस टेस्ट होता है। लेकिन विकसित देशों में इस परीक्षण का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि चेचक, खसरा, हेपेटाइटिस, कुष्ठ रोग और टीबी के लिए जिम्मेदार जीवाणु इतने प्रभावित होते हैं कि इन बीमारियों के दौरान किए गए टेस्ट में भी ७० फीसदी पॉजिटिव नतीजे आते हैं।
यही नहीं, गामालो गुलीन से संक्रमित रोगी एचआईवी पॉजिटिव परिणाम देते हैं। साधारण सर्दी-जुकाम या फ्लू में भी शरीर में एंटी बाडी बनने लगती है। वैज्ञानिक वायरल लोड को भी एचआईवी का कारण मानते हैं। परंतु एचआईवी साइटोट्राक्सिक नहीं है। यानी कोषिकाओं को नष्ट नहीं करता। फिर वायरल लोड की संभावना कहां है।
बाद में जांच के लिए पीसीआर टेस्ट लाया गया जिसमें खून का ऐसा नमूना लिया जाता है जिससे डीएनए और आरएनए खोजे जा सकें। भारत में एड्स के लिए इसे पर्याप्त माना जाता है। पर नोबेल वैज्ञानिक डा.कैरी म्युलिस इसे एड्स की जांच के लिए अपर्याप्त बताते हैं।
संतोष बताते हैं कि पीसीआर केवल जीन को रेखांकित करता है। इन्होंने कई ऐसे नमूने इकट्ठा किए हैं जिसमें एचआईवी निगेटिव पाए गए स्वस्थ व्यक्तियों में भी वायरल लोड मिला है। संतोष के दावे पर भरोसा करें तो उन्होंने अब तक चार एड्स रोगियों को पूरी तरह से ठीक किया है।
जिले के बगहा खुर्द निवासी इस डाक्टर के पास इस समय एड्स के ४२ मरीज हैं। एड्स मरीजों का यह मुफ्त इलाज भी करते हैं। उन्होंने बताया कि ठीक हुए मरीजों को लेकर एआरटी सेंटर पर जांच भी कराकर दिखा चुका हूं(नई दुनिया,दिल्ली संस्करण,26.7.2010 में लखनऊ से योगेश मिश्र की रिपोर्ट)।

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शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

एड्स के चंगुल में हरियाणा के युवा

हरियाणा में कम उम्र के युवाओं में एड्स तेजी से फैलता जा रहा है। युवाओं को इस जानलेवा बीमारी के चक्रव्यूह से निकालने के लिए हरियाणा एड्स कंट्रोल सोसायटी ने सभी छह विवि और 71 नए कालेजों में रेड रिबन क्लब स्थापित करने का निर्णय लिया है। विवि को एड्स नियंत्रण की गतिविधियां संचालित करने के लिए 50 हजार तथा महाविद्यालय को नौ हजार रुपये वार्षिक प्रदान किए जाएंगे। जिंदगी जिंदाबाद के नारे के साथ राज्य में दो मोबाइल वैन के जरिए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) और दक्षिण हरियाणा के आधा दर्जन जिलों में युवाओं को एड्स से बचाव की जानकारी दी जाएगी। यह मोबाइल वैन पंचायत चुनाव की आचार संहिता खत्म होते ही घूमना आरंभ कर देंगी। हरियाणा में इस समय 14 हजार एड्स रोगी हैं, जबकि 42 हजार लोगों के इसकी गिरफ्त में होने की आशंका है। 2008-10 के बीच तीन सालों में कम उम्र के युवाओं में एड्स के केस काफी मात्रा में बढ़े हैं। 14 वर्ष की आयु के 408 एचआईवी पॉजिटिव केस सामने आए हैं, जबकि 15 से 20 साल की आयु के 900 किशोरों को एड्स है। राज्य में 14 से 18 साल की आयु के एचआईवी पॉजिटिव किशोरों की संख्या तीन हजार के आसपास है। अफसरों का मानना है कि जागरूकता अभियान में तेजी लाकर किशोरों को एड्स के खतरों से वाकिफ कराया जाएगा। अभी तक मात्र 100 कालेजों में रेड रिबन क्लब कार्यरत थे। अब सभी विश्वविद्यालयों व कालेजों को भी जागरूकता अभियान से जोड़ा जा रहा है। यह कार्य इसी शिक्षण सत्र में पूरा कर लिया जाएगा। राज्य के 3329 स्कूलों में रेड रिबन क्लब संचालित हैं। प्रत्येक स्कूल को एक हजार रुपये की आर्थिक मदद दी जा रही है, लेकिन अध्यापकों को एससीईआरटी गुड़गांव से विशेष प्रशिक्षण दिलाकर किशोरों को जागरूक बनाने की कवायद भी चल रही है। इस कार्य पर 33 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। हरियाणा एड्स कंट्रोल सोसायटी के अतिरिक्त परियोजना निदेशक डा. राकेश चौधरी के अनुसार, राज्य में एड्स फैलने का 80 फीसदी कारण असुरक्षित यौन संबंध हैं जबकि चार फीसदी केस रक्त प्रत्यारोपण, तीन प्रतिशत संक्रमण और 13 प्रतिशत नशे की वजह से एड्स होता है। हरियाणा में एड्स रोगियों की संख्या पूरे देश का 0.2 प्रतिशत है। एड्स कंट्रोल सोसायटी के संयुक्त निदेशक (आईएमसी) रामकुमार शर्मा ने बताया कि भिवानी में सबसे अधिक एड्स के केस हैं, लेकिन वहां अधिकतर मामले बाहरी खून चढ़ाने की वजह से हैं। उन्होंने बताया कि जागरूकता के लिए सोसायटी के साथ 10 नए एनजीओ को जोड़ा गया है। अब इनकी संख्या 42 हो गई है। राज्य के 6167 साक्षर महिला समूहों के सहयोग से प्रत्येक पखवाड़े जागरूकता गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। इसकी एवज में प्रत्येक समूह को सालाना 10 हजार रुपये की आर्थिक मदद दी जाएगी। उनके अनुसार स्कूलों में शिक्षकों के साथ अब सोसायटी का काउंसलर भी विजिट करेगा, ताकि वह किशोरों के सवालों का बखूबी जवाब दे सके(अनुराग अग्रवाल,दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,2.7.2010)।

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शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

रविवार, 24 जनवरी 2010

एड्स जांच प्रयोगशाला पटना और मुजफ्फरपुर मे

(हिंदुस्तान,पटना,23.1.10)
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