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सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

धुएं के संग-संग फैलता है कैंसर

"सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है" यह चेतावनी सिगरेट के हर पैकेट पर लिखी होती है लेकिन धूम्रपान करने वाले इस पर ध्यान नहीं देते हैं। लेकिन इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आँकड़े बताते हैं कि धूम्रपान के कारण प्रति वर्ष दुनिया भर में लगभग ५० लाख लोगों की असामयिक मृत्यु हो जाती है। असल में इससे कहीं अधिक लोग धूम्रपान का शिकार बनते हैं। 

सिगरेट कई बीमारियों का कारण बनती है या फिर पहले से मौजूद रोग और भी खतरनाक रूप ले लेता है। इस सच्चाई के मद्देनजर यह कहना ग़लत नहीं होगा कि धूम्रपान अप्रत्यक्ष रूप से भी बहुत सारी असामयिक मौतों के लिए ज़िम्मेदार है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी मानना है कि स्वास्थ्य पर धूम्रपान के प्रभाव का सही-सही मूल्यांकन अभी तक नहीं किया जा सका है। संगठन इस बारे में आश्वस्त ज़रूर है कि धूम्रपान किसी भी अन्य बीमारी की अपेक्षा अधिक लोगों के मरने या असमर्थ हो जाने के लिए ज़िम्मेदार है। 

धूम्रपान की शुरुआत अक्सर ही इस भ्रम के साथ की जाती है कि इसका सेवन करने वाला अपेक्षाकृत अधिक तनावमुक्त महसूस करता है और इसके सहारे तनाव का बेहतर तरीके से सामना किया जा सकता है, लेकिन यह भ्रम के अलावा कुछ भी नहीं है। ऐसा सोचने या प्रचारित करने वाले यह नहीं जानते कि सिगरेट का निकोटिन तनावों से छुटकारा दिलाने के बजाय मन को उत्तेजित ही करता है। अक्सर युवावस्था में लोग इस लत के शिकार होते हैं और दो-चार सिगरेट पीने के साथ ही इसकी तलब लगनी शुरू हो जाती है। अनगिनत शोध यह बताते हैं कि धूम्रपान शरीर को किस तरह से बर्बाद कर डालता है। ब्रिटेन में हुए एक अध्ययन के अनुसार धूम्रपान न करने वालों के मुकाबले सिगरेट पीने वालों को ३०-४० साल की उम्र में हृदयाघाघात होने की आशंका पाँच गुना होती है। धूम्रपान से हृदय रोग का खतरा बढ़ता है और इससे हृदय व मस्तिष्क की धमनियों को नुकसान पहुँचने के कारण पक्षाघात का खतरा पैदा हो जाता है। जीवन पर्यंत धूम्रपान करने वालों की मृत्यु का संबंध किसी न किसी रूप में धूम्रपान से होने की आशंका होती है। 

इतना ही नहीं,इस तरह मरने वालों में से आधे मध्य आयु के ही होंगे। धूम्रपान से फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचता है। विशेषतौर पर इसलिए कि ये ऊतक धुएं से निकलने वाले ज़हर के सीधे निशाने पर होते हैं। इसी कारण फेफड़ों के कैंसर का बहुत अधिक खतरा होता है। अमरीका में हुए एक अध्ययन से पता चलता है कि धूम्रपान करने वालों को फेफड़े के कैंसर का खतरा 22 गुना अधिक होता है। धूम्रपान करने वाली महिलाओं में यह ख़तरा 12 गुना होता है। इसके अलावा,धूम्रपान मुख,गर्भाशय,यकृत,गुर्दा,ब्लैडर,पेट,ग्रीवा और ल्यूकीमिया जैसे कैंसरों का कारण भी बनता है। गर्भवती महिला के धूम्रपान करने से गर्भपात का खतरा रहता है और गर्भस्थ शिशु का विकास बाधित होने की आशंका होती है। उसे कई अन्य तरह की बीमारियां भी हो सकती हैं।  

माना जाता है कि धूम्रपान कैंसर और हृदयाघात का सबसे बड़ा कारण है। इससे कई अन्य तरह की परेशानियां भी पैदा होती हैं। अध्ययन बताते हैं कि सिगरेट पीने वाले विवाहित जोड़ों को माता-पिता बनने में परेशानी आ सकती है। यह अस्थमा की स्थिति को और भी बदतर बनाता है और अस्थमा की दवाओं को कारगर साबित नहीं होने देता। आंखों की रक्तवाहिकाएं संवेदनशील होती हैं जो धुएं की वजह से आसानी से नष्ट हो सकती हैं। इससे आंखों में ब्लडशॉट नज़र आने लगते हैं और खुजली शुरू हो जाती है। बहुत अधिक सिगरेट का सेवन करने वालों की दृष्टि भी धीरे-धीरे बिगड़ने लगती है। उनकी आंखों में मोतियाबिंद होने का ख़तरा बढ़ जाता है। सिगरेट पीने से दांतों और मसूड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचता है। मसूड़े फूलने लगते हैं,सांसों से बदबू आती है और दांत टूटने लगते हैं जिससे अल्सर का खतरा भी रहता है(डॉ. अमित अग्रवाल,सेहत,नई दुनिया,फरवरी द्वितीयांक 2012)।

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गुरुवार, 21 जुलाई 2011

कानून पर भारी धूम्रपान की लत

समाजचिंतक इस बात को लेकर बेहद चिंतित है कि न्यायालय के आदेशों के बावजूद देश के हर कोने में सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान निषेध नियमों का उल्लंघन हो रहा है। उच्चतम न्यायालय के आदेशानुसार, सार्वजनिक स्थल जैसे रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, अस्पताल और कोई भी सार्वजनिक जगह पर धूम्रपान नहीं किया जाएगा। ऐसा करने वाले के खिलाफ न केवल कानूनी कार्रवाई की जाएगी बल्कि उसे सजा के रूप में जुर्माना व जेल का भी प्रावधान है। लेकिन इस आदेश पर अमल करवाने में प्रशासन पूरी तरह नाकाम सिद्ध हुआ है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय, विश्व स्वास्थ्य संगठन और अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान की ओर से देश के २९ राज्यों में किए गए वैश्विक वयस्क तंबाकू सर्वेक्षण २००९-१० की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत के एक तिहाई वयस्क यानी २७.५ करोड़ की आबादी तंबाकू की लत की गिरफ्त में है। रिपोर्ट कहती है कि इनमें से ६.९ करोड़ लोग धूम्रपान करते हैं।

विश्वभर में धूम्रपान करने वालों में से १२ फीसदी भारतीय हैं। ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं कि धूम्रपान करने के संदर्भ में अगर वैश्विक स्तर की बात की जाए तो भारतीय महिलाओं का स्थान तीसरे पायदान पर है। भारत में धूम्रपान करने वाली ६२ फीसदी महिलाओं की मृत्यु ३० से ४९ वर्ष की आयु में होने की आशंका व्यक्त की गई है। जबकि धूम्रपान नहीं करने वाली महिलाओं में इस आंकड़े का प्रतिशत महज ३८ है। "भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद" के अनुसार भारत में २५-६९ वर्ष आयु वर्ग के लगभग ६ लाख मनुष्य प्रतिवर्ष धूम्रपान के कारण मृत्यु का शिकार होते हैं। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल लैनसेट में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक २००४ से अब तक १९२ देशों के आंकड़ों का अध्ययन करने पर शोधकर्ताओं ने पाया कि ४० प्रतिशत बच्चे और ३० प्रतिशत से अधिक धूम्रपान नहीं करने वाले पुरुष और महिलाएं सैकेंड हैंड या निष्क्रिय धूम्रपान के प्रभाव में आते हैं। धूम्रपान के घातक परिणामों को देखते हुए विश्वभर में धूम्रपान प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया पिछले कुछ दशकों के अनवरत जारी है। २००३ में विश्व स्वास्थ्य संगठन के सभी सदस्य देशों ने पूरी दुनिया में तंबाकू निषेध के लिए सर्वसम्मति से फ्रेमवर्क कन्वेंशन (संधि) को स्वीकार किया।

इसके तहत एक छह सूत्रीय एम-पावर पैकेज की घोषणा की गई। इस एम-पावर पैकेज में वैश्विक और देशों के स्तर पर धूम्रपान और उसके दुष्प्रभावों के संबंध में प्रभावी निगरानी तंत्र विकसित करने, कार्यस्थल और सार्वजनिक स्थलों में धूम्रपान करने वालों पर पाबंदी तो लगा दी है, पर यह कितनी कारगर सिद्ध हुई है वह जगजाहिर है। यह माना कि तंबाकू उद्योग से सरकार को भारी मात्रा में राजस्व मिलता है, परंतु देश की युवा पीढ़ी की कीमत पर आर्थिक मुनाफा क्या उचित है?(ऋतु सारस्वत,नई दुनिया,21.7.11)

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गुरुवार, 31 मार्च 2011

बच्चे और धूम्रपान

स्वस्थ एवं समृद्ध समाज के निर्माण के लिए बच्चों का पारिवारिक और मानसिक रूप से मजबूत होना बेहद जरूरी होता है। इसलिए आवश्यक हो जाता है कि समाज एवं राष्ट्र मिलजुल कर बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए उचित एवं अनुकूल वातावरण का निर्माण करें। अगर बच्चे स्वस्थ नहीं रहेंगे तो एक स्वस्थ व समृद्ध समाज के निर्माण की कल्पना मुश्किल है। सबसे गम्भीर चिंता का विषय है कि बच्चों में धूम्रपान की लत लगातार बढ़ती ही जा रही है। साथ ही सेकेंड हैंड स्मोकिंग के दुष्प्रभाव में आने से उनका स्वास्थ्य भी दांव पर लगता जा रहा है। यह ठीक है कि सरकार एवं स्वयंसेवी संस्थाएं सेकेंड हैंड स्मोकिंग के दुष्प्रभाव को कम करने एवं उस पर नियंतण्रलगाने के उद्देश्य से अनेक कार्यक्रम एवं प्रभावोत्पादक तरीके अपना रही हैं लेकिन जमीनी स्तर पर नतीजे बिल्कुल ही संतोषजनक नहीं हैं। सरकार द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करने वाले लोगों के खिलाफ कड़े कानून और अर्थदंड का प्रावधान किया गया है लेकिन इसके बावजूद सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान की प्रवृत्ति पर लगाम लगता नहीं दिख रहा है। नतीजा सबके सामने है। अब बच्चे भी धूम्रपान की ओर आकर्षित होने लगे हैं। आंकड़ों पर विश्वास किया जाए तो धूम्रपान विरोधी चलाए जा रहे अभियान के बावजूद भी बच्चों में धूम्रपान की लत बढ़ती ही जा रही है। देखा जाए तो बच्चों में धूम्रपान के प्रति बढ़ते आकर्षण की कई मुख्य वजहें हैं। मसलन पड़ोस का बिगड़ा वातावरण, फिल्मों के धूम्रपान वाले दृश्य, परिवार द्वारा बच्चों पर कम ध्यान दिया जाना, बुरी संगत का असर और स्कूलों में नैतिक शिक्षा का कमजोर पड़ता उद्देश्य इत्यादि लेकिन पिछले दिनों आई स्वीडिश नेशनल हेल्थ एण्ड वेल्फेयर बोर्ड और ब्लूमबर्ग फिलांथ्रोपिज की एक रिसर्च से साबित हुआ है कि बच्चों में धूम्रपान की लत पड़ने की एक और वजह उनका सेकेंड हैंड स्मोकिंग के प्रभाव में आना भी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सेकेंड हैंड स्मोकिंग के प्रभाव में आने से बच्चे धीरे-धीरे धूम्रपान के लती हो जाते हैं। धूम्रपान से होने वाले लाइलाज खतरों को छोड़ भी दिया जाए तो सिर्फ सेकेंड हैंड स्मोकिंग के दुष्प्रभाव से आज छ: लाख से अधिक लोग असामयिक मौत के शिकार हो रहे हैं। इन मरने वाले लोगों में तकरीबन दो लाख से अधिक बच्चे ही होते हैं। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल 'लैंसेट' में छपी एक रिपोर्ट पर विश्वास किया जाय तो स्मोकिंग न करने वाले 40 फीसद बच्चों और 30 फीसद से अधिक महिलाओं-पुरुषों पर सेकेंड हैंड स्मोकिंग का घातक प्रभाव पड़ता है। अप्रत्यक्ष धूम्रपान के कारण बच्चों में गम्भीर बीमारियां होती हैं; मसलन अस्थमा एवं फेफड़े का कैंसर। इसके अलावा भी अन्य गम्भीर बीमारियों के होने का खतरा बराबर बना रहता है। इनकी वजह से असमय मृत्यु की आशंका भी प्रबल हो जाती है। पिछले दिनों र्वल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन के टुबैको- फी इनिशिएटिव के प्रोग्रामर डा. एनेट ने सेकेंड हैंड स्मोकिंग को लेकर चिंता प्रकट की थी। दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका में सेकेंड हैंड स्मोकिंग का दुष्प्रभाव सर्वाधिक देखने को मिल रहा है। अशिक्षा, गरीबी और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव इसका मूल कारण हो सकता है। स्वीडिश रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन बच्चों के माता पिता धूम्रपान करते हैं उन बच्चों में निमोनिया और अस्थमा जैसी घातक बीमारियों की आशंका ज्यादा होती है। सवाल यह उठता है कि बच्चों को धूम्रपान की बढ़ती लत और सेकेंड हैंड स्मोकिंग के दुष्प्रभाव से आखिर कैसे बचाया जाय? इसके लिए ऐसे कारगर उपायों को अमल में लाने की जरूरत है जो न केवल बच्चों में धूम्रपान के प्रति बढ़ते आकर्षण को कम करे बल्कि उनके मन में भी यह भावना पैदा हो कि धूम्रपान एक सामाजिक बुराई है। धूम्रपान के खिलाफ सरकारी कार्यक्रमों एवं स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे जागरूकता अभियानों में स्कूलों एवं अन्य शिक्षण संस्थाओं को शामिल करके इस कार्यक्रम को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। धूम्रपान पर नियंतण्रस्थापित करने में स्कूलों की भूमिका निर्णायक एवं प्रभावी साबित हो सकती है बशत्रे वह इसे नैतिक शिक्षा के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए। स्कूलों में जागरूकता पैदा करने वाले कार्यक्रम अन्य संस्थाओं की अपेक्षा ज्यादा कारगर साबित होते हैं(अरविन्द जयतिलक,राष्ट्रीय सहारा,30.3.11)।

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गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

सिगरेट के पैकेटों पर छपेगा कैंसर का वीभत्स चित्र

बुधवार से सिगरेट, बीड़ी एवं तंबाकू उत्पादों के तमाम पैकेटों पर बिच्छू की जगह मुंह के कैंसर का दहला देने वाला चित्र छापने की अधिसूचना लागू हो गई। हालांकि यह अधिसूचना उन्हीं पैकेटों पर लागू होगी जिनका उत्पादन एक दिसंबर को या उसके बाद होगा। मतलब तंबाकू पीने या खाने वालों को पैकेटों पर यह चित्र बहुत दिनों तक नहीं दिखने वाला है। तंबाकू कंपनियों ने इस अधिसूचना को देखते हुए पहले ही भारी उत्पादन कर लिया है।

तंबाकू सेवन पर रोक लगाने के लिए सक्रिय संगठनों को आशंका है कि तंबाकू कंपनियों की लॉबी इस अधिसचूना को रद्द कराने की जुगत में लगी है। अगर ऐसा हुआ तो पैकेटों पर यह चित्र कभी नहीं दिख पाएगा। इस बीच तंबाकू के खिलाफ अभियान की अग्रणी संस्था वोलंटरी हेल्थ एसोसिएशन के कार्यकर्ताओं ने दिल्ली के तंबाकू के ५० रिटेल आउटलेट का दौरा किया। उन्हें कहीं भी पैकेट पर इस चित्र के साथ तंबाकू उत्पाद नहीं मिला। इस चित्र की स्वास्थ्य मंत्रालय की पहली अधिसूचना एक जून को ही लागू होनी थी, लेकिन १७ मई को स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक नई अधिसूचना के जरिए वह तिथि एक दिसंबर कर दी। आरोप है कि मंत्रालय ने तंबाकू लॉबी के दबाव में ऐसा किया। तंबाकू के खिलाफ अभियान से जुड़े संगठनों का मानना है कि इन छह महीनों में तंबाकू कंपनियों को भारी उत्पादन करने का मौका भी मिल गया। इन संगठनों को यह अंदेशा भी है कि तंबाकू लॉबी इस स्टॉक के खत्म होने तक मुंह में कैंसर वाले चित्र की अधिसूचना रद्द कराने में सफल हो जाएगी। वोलंटरी हेल्थ एसोसिएशन के प्रवक्ता बिनाय मैथ्यू ने कहा कि इस चित्र पर अभी भी तंबाकू लॉबी का साया मंडरा रहा है। उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय के कुछ अधिकारियों से यह संकेत मिल रहा है। मैथ्यू ने बताया एसोसिएशन को विभिन्न स्रोतों से यह पता चला है कि पिछले दिनों इस मसले पर गठित मंत्रिसमूह की बैठक में तंबाकू व्यापार को प्रभावित करने वाले वीभत्स चित्र को टालने का फैसला लिया गया(नई दुनिया,दिल्ली,2.12.2010)।  

इसी विषय पर आज नई दुनिया का ही संपादकीयः
घपलों-घोटालों और दलालों के अखिल भारतीय कर्कश कोलाहल के बीच काफी दिनों बाद एक अच्छी खबर सरकार की ओर से आई है। खबर यह है कि अब बाजार में बिकने वाले सिगरेट के सभी पैकेटों पर धूम्रपान के खिलाफ वैधानिक चेतावनी के साथ कैंसर से विकृत हुए मुंह वाले चित्र भी देखने को मिलेंगे। तंबाकू नियंत्रण से संबंधित सरकार की यह नीति हालांकि एक दिसंबर से लागू हो गई है लेकिन नई सचित्र चेतावनी छपे पैकेटों को बाजार तक आने में अभी कुछ दिन और लगेंगे। गौरतलब है कि खतरे की चेतावनियों से संबंधित तस्वीरों के जरिए तंबाकू से होने वाले नुकसान के खिलाफ अभियान चलाने वाले देशों में फिलहाल भारत सौवें नंबर है। भारत को यह स्थान संयुक्त राष्ट्र की "तंबाकू उत्पादों के पैकेटों पर स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियों के बारे में अंतरराष्ट्रीय स्थिति" नामक रिपोर्ट में मिला है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि भारत उन देशों में शुमार है जिन्होंने तंबाकू नियंत्रण से संबंधित अंतरराष्ट्रीय संधि (एफसीटीसी) पर दस्तखत किए हैं और तंबाकू उत्पादों पर सचित्र चेतावनी प्रदर्शित करने की मांग करने वाले देशों में भी २००३ तक भारत सबसे आगे था। लेकिन इस पर अमल करने के मामले में सौवें पायदान पर पहुंचने के बाद इस मामले में भारत सरकार की नींद टूटी। भारत में तंबाकू और उससे बने अन्य उत्पादों के इस्तेमाल से होने वाले रोगों के कारण प्रतिदिन लगभग ढाई हजार लोग मौत का शिकार हो जाते हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय का ही एक अध्ययन बताता है कि अपने देश में ४० फीसदी स्वास्थ्य समस्याएं तंबाकू उत्पादों की देन हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी तंबाकू जनित बीमारियों को भारत के लिए अगले दो दशक में टीबी और एड्स से बड़ा खतरा बता चुका है। भारत में अभी तक सिगरेट के पैकेटों पर आधे-अधूरे मन से छापी जाने वाली बेअसर तस्वीरों के मुकाबले बांग्लादेश, पाकिस्तान, मालदीव, उरुग्वे और थाईलैंड जैसे देशों ने अपने यहां इस मामले में ज्यादा सख्ती से नियम-कायदे लागू कर रखे हैं। मगर हमारी सरकार तंबाकू लॉबी के दबाव में कोई कारगर कदम उठाने में अब तक संकोच करती रही। कोई तीन साल पहले तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदॉस ने भी मंजूर किया था कि अनाप-शनाप मुनाफा कमा रहे तंबाकू उद्योग घरानों के साथ-साथ कई मुख्यमंत्री और लगभग डेढ़ सौ सांसद उन पर दबाव डाल रहे हैं कि तंबाकू उत्पादों के पैकेटों पर सचित्र चेतावनी छापने के लिए बनाए जाने वाले कानून को नरम रखा जाए। अपने नागरिकों की सेहत के लिए फिक्रमंद होना किसी भी लोक कल्याणकारी और जवाबदेह सरकार की प्राथमिकता में सबसे ऊपर होना चाहिए। सरकार ने कई दिनों की टाल-मटोल के बाद अगर इस मामले में अब जाकर अपनी जवाबदेही समझते हुए कोई कदम उठाया है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

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शनिवार, 27 नवंबर 2010

दूसरों के धुएं में हर साल जाती हैं 6 लाख जानें

अगर आपको लगता है कि स्मोकिंग न करने से आप इसके बुरे नतीजों से बच सकते हैं, तो आप गलत हैं। नई रिसर्च के मुताबिक दुनिया में हर साल सेकंड हैंड स्मोकिंग यानी आसपास मौजूद लोगों के स्मोकिंग करने से पड़ने वाले बुरे असर के कारण छह लाख लोगों की मौत हो जाती है। चिंताजनक बात यह भी है कि इन लोगों में 1 लाख 65 हजार से ज्यादा बच्चे होते हैं।

ब्रिटिश मेडिकल जर्नल लैंसेट में छपी यह रिपोर्ट 2004 से अब तक 192 देशों में स्टडी करके तैयार की गई है। इसके मुताबिक स्मोकिंग न करने वाले 40 प्रतिशत बच्चों और 30 प्रतिशत से अधिक महिला-पुरुषों पर सेकंड हैंड स्मोकिंग का असर पड़ता है। आंकड़ों की स्टडी से वैज्ञानिकों ने नतीजा निकाला कि अप्रत्यक्ष धूम्रपान के कारण करीब 3 लाख 79 हजार लोग दिल की बीमारियों, 1 लाख 65 हजार लोग सांस से जुड़ी बीमारियों, 36900 लोग अस्थमा और 21400 लोग फेफडे़ के कैंसर का शिकार होकर असमय मर जाते हैं।

यह रिसर्च स्वीडिश नैशनल हेल्थ एंड वेलफेयर बोर्ड और ब्लूमबर्ग फिलांथ्रोपीज ने करवाई है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) के टुबैको-फ्री इनिशिएटिव के प्रोग्रामर डॉ. एनेट और उनके सहयोगियों ने बताया कि यह रेकॉर्ड तंबाकू के वास्तविक दुष्प्रभावों को समझने में मददगार साबित होगा। अप्रत्यक्ष धूम्रपान से होने वाली इन मौतों को स्मोकिंग से होने वाली 51 लाख मौतों के आंकड़ों में जोड़ा जाना चाहिए।

स्मोकिंग के कारण बच्चों में होने वाले सांस संबंधी रोगों से डब्ल्यूएचओ बहुत चिंतित है। खासकर दक्षिण पूर्व एशिया और अफ्रीका में यह ट्रेंड ज्यादा नजर आ रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन बच्चों के पैरंट्स स्मोकिंग करते हैं, उन्हें निमोनिया, अस्थमा या ऐसी कई बीमारियां होने की संभावना ज्यादा होती है। उन बच्चों के फेफड़ों का विकास भी धीरे होता है। स्मोकिंग से दुनिया भर में हर साल 57 लाख से ज्यादा लोगों काल के गाल में समा जाते हैं(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,27.11.2010)।

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बुधवार, 3 नवंबर 2010

सिगरेट कंपनियों के दबाव में आ रही सरकार!

सरकार लोगों की सेहत को तरजीह देती है या सिगरेट कंपनियों के मुनाफे को, इस बात का फैसला बुधवार को होने वाली मंत्रिसमूह (जीओएम) की बैठक में हो जाएगा। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में होने वाली इस बैठक में तय किया जाएगा कि तंबाकू उत्पादों पर ज्यादा डरावनी और प्रभावकारी तस्वीरें छापी जाएं या नहीं। भारी मुनाफा कमाने वाली सिगरेट कंपनियों के दबाव में स्वास्थ्य मंत्रालय मई से ही इस फैसले को टालता आ रहा है। सिगरेट और दूसरे तंबाकू उत्पादों पर चेतावनी के तौर पर छपने वाले मौजूदा चित्र पर्याप्त प्रभावकारी नहीं हैं। इसलिए एक जून से ज्यादा स्पष्ट चित्र छापे जाने थे, लेकिन मार्च महीने में इस संबंध में अधिसूचना जारी होने के साथ ही सिगरेट कंपनियां जोरदार तरीके से सक्रिय हो गई। इसके बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने दबाव में आते हुए इस फैसले को टालते हुए इसे एक दिसंबर से लागू करने का फैसला किया। फिर दिसंबर नजदीक आता देख इसे विचार के लिए जीओएम के पास भेज दिया गया। सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद (पैकेजिंग और लेबलिंग) नियम में स्वास्थ्य मंत्रालय के पास यह अधिकार होने के बावजूद इसे जीओएम को भेजे जाने की जरूरत के बारे में पूछे जाने पर स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्रों ने इसके लिए वित्त मंत्रालय को जिम्मेदार ठहराया। इनके मुताबिक सिगरेट लॉबी के दबाव की वजह से ही वित्त मंत्रालय की ओर से इसे जीओएम के पास भेजने की सिफारिश की गई है। इस जीओएम में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के अलावा कृषि मंत्री शरद पवार भी शामिल हैं। सिगरेट कंपनियों का दबाव सरकार पर इस कदर है कि हमेशा तंबाकू से होने वाली बीमारियों की बात करने वाले स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद भी इस पर कोई सख्त फैसला लेने से डरते हैं। बल्कि इस साल 13 मई को हुई बैठक में आजाद ने साफ तौर पर कहा था कि यह फैसला हमेशा के लिए टाल दिया जाना चाहिए(दैनिक जागरण,दिल्ली,3.11.2010)।

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बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

तंबाकू और महिलाएं

महिलाएं तंबाकू की लत के भंवर में तेजी से फंसती जा रही हैं। ७२ हजार घरों में पूरे देश में किए गए अब तक के सबसे बड़े सर्वे में मिला यह तथ्य भारी चिंता में डालने वाला है कि तंबाकू की लत में फंसी महिलाओं की संख्या बढ़कर दोगुनी हो गई है। धुआं उड़ाने वालों की संख्या घटी है, वहीं तंबाकू चबाकर थूकने वालों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं पर तंबाकू का ज्यादा बुरा असर होता है। मंगलवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने यह रिपोर्ट जारी की। मंत्रालय की चीफ मेडिकल ऑफिसर एवं टुबैको कंट्रोल अभियान में बढ़ चढ़कर भाग लेने वाली डॉ. जगदीश कौर ने कहा कि यह बेहद चिंता की बात है कि देश की आधी आबादी में तंबाकू का सेवन इतनी तेजी से बढ़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार तंबाकू के लत की शिकार महिलाओं की सख्या पहले १०.८ प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर सीधे २० प्रतिशत हो गई है। हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल ने कहा कि महिलाओं में तंबाकू के लत के दो बड़े खतरे हैं। एक यह कि उनकी सुंदरता चली जाती है, दूसरे उन पर बांझ होने का जोखिम बढ़ जाता है। रिपोर्ट के अनुसार सार्वजनिक स्थलों पर किए गए स्मोकिंग नियंत्रण के प्रयास नहीं के बराबर प्रभावी हुए हैं। २९ प्रतिशत भारतीयों पर घर के बाहर सिगरेट के धुएं से प्रभावित होने का जोखिम मंडरा रहा है। इससे आधे लोगों को घर के भीतर यह खतरा है। इनमें महिलाएं एवं बच्चे शामिल हैं। स्मोकिंग करने वालों की तुलना में तंबाकू चबाने वालों की संख्या काफी अधिक हो गई है। स्मोकिंग करने वालों की संख्या १४ प्रतिशत है, वहीं गुटखा व खैनी जैसे पदार्थों का उपयोग करने वाले २६ प्रतिशत हो गए हैं। जो रिपोर्ट जारी की गई है उसका नाम - ग्लोबल अडल्ट टुबैको सर्वे (गैट्स)- इंडिया २०१० है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तत्वावधान में मुंबई स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पाप्युलेशन साइंसेज ने यह सर्वे १९ भाषाओं में किया है। हर साल पूरी दुनिया में ५५ लाख लोग तंबाकू के उपयोग से मौत के मुंह में चले जाते हैं। इनमें नौ लाख भारत के लोग होते हैं(नई दुनिया,दिल्ली,20.10.2010)।

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मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

भारत में हर दूसरे आदमी को तंबाकू की लत

हिंदुस्तान में लगभग हर दूसरा वयस्क पुरुष बीड़ी, सिगरेट या तंबाकू के नशे का गुलाम है। महिलाएं भी इस मामले में बहुत पीछे नहीं। वयस्क होने तक देश की 20 फीसदी औरतों को भी किसी न किसी रूप में तंबाकू के नशे की लत लग चुकी होती है। यह जानकारी सामने आई है भारत में तंबाकू उत्पादों के इस्तेमाल पर पहली बार हुए राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के इस सर्वेक्षण के मुताबिक देश की कुल वयस्क आबादी का 34.6 फीसदी तंबाकू सेवन करती है। इस रिपोर्ट के आधार पर स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने स्वास्थ्य कार्यक्रमों में कई गंभीर बदलावों की जरूरत बताई है। आजाद आज यह सर्वेक्षण देश के सामने पेश करने वाले हैं। भारत में पहली बार हुए इस व्यापक सर्वेक्षण में सामने आए आंकड़े बहुत चौंकाने वाले हैं। अंतरराष्ट्रीय वयस्क तंबाकू सर्वेक्षण, भारत (गेट्स, इंडिया) ने तंबाकू सेवन के लिहाज से लगाए जाने सभी अंदाजों को पीछे छोड़ते हुए बताया है कि देश की 34.6 फीसदी वयस्क आबादी बीड़ी, सिगरेट या तंबाकू की गुलाम है। वयस्क पुरुषों की बात करें तो 47.9 फीसदी को और वयस्क महिलाओं में 20.3 को यह लत है। इनमें बीड़ी-सिगरेट के धुंए का सेवन करने वालों के मुकाबले तंबाकू चबाने वालों की तादाद ज्यादा है। जहां 25.9 फीसदी लोग तंबाकू चबाने का शौक रखते हैं, वहीं 14 फीसदी इसके धुएं के गुलाम हैं। यही सर्वेक्षण बताता है कि तंबाकू का इस्तेमाल करने वालों को सुबह उठते ही इसकी तलब शुरू हो जाती है। तंबाकू उपयोग करने वालों में से 60.2 फीसदी सुबह उठने के आधे घंटे के अंदर ही इसकी पहली खुराक ले चुके होते हैं। तंबाकू के धुएं का नुकसान सिर्फ उन्हीं लोगों को नहीं हो रहा, जो इसका सेवन कर रहे हैं, बल्कि देश में 52.3 फीसदी वयस्क हिंदुस्तानियों को घर पर दूसरे द्वारापी गई बीड़ी-सिगरेट के धुएं का शिकार होना पड़ता है। 15 से 17 साल की उम्र के किशोरों में 9.6 फीसदी को तंबाकू के नशे की लत पाई गई है। इस रिपोर्ट के आने के बाद अब स्वास्थ्य मंत्री आजाद चाहते हैं कि पूरा मुल्क मिल कर तंबाकू के खिलाफ जंग शुरू कर दे। इस रिपोर्ट में ही स्वास्थ्य मंत्रालय ने सिफारिश की है कि तंबाकू की लत को और बढ़ने से रोकने और लोगों को यह आदत छोड़ने में मदद करने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ ही सूचना प्रसारण मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय सहित सभी प्रमुख मंत्रालय सहयोग करें। साथ ही राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत भी इसके लिए इंतजाम करने की वकालत इसमें की गई है। भारत में तंबाकू उत्पादों के इस्तेमाल से होने वाली बीमारियों से सालाना नौ लाख लोग मारे जाते हैं। टीबी से होने वाली 40 फीसदी मौतें तंबाकू उत्पादों की वजह से ही होती हैं(मुकेश केजरीवाल,दैनिक जागरण,19.10.2010)।

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सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

एड्स चिकित्सा केंद्रों में मिलेगी बीड़ी-सिगरेट से मुक्ति

सुनकर थोड़ा अटपटा लग सकता है, पर यह सच होने वाला है। बहुत जल्द बीड़ी सिगरेट जैसे बुरी आदतों का उपचार एड्स चिकित्सा केंद्रों (एआरटी सेंटर) में शुरू होने वाला है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि देश के सभी एआरटी सेंटरों में तंबाकू रोकथाम अभियान को शामिल करने का खाका तैयार कर लिया गया है। सूत्रों का कहना है कि तंबाकू रोकथाम के इस नए अभियान के लिए देश में मौजूद सभी एआरटी सेंटरों में तैनात डाक्टरों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस वक्त पूरे देश में करीब 369 एआरटी सेंटर में एचआईवी एड्स की रोकथाम और उपचार की सुविधा उपलब्ध है। इन सभी केंद्रों के लिए सरकार और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की ओर से करोड़ों रुपए आवंटित किए जाते हैं। पर उपचार के नाम पर किसी भी केंद्र में नाम मात्र के ही मरीज पहुंच रहे हैं। ऐसे में संसाधनों का सौ फीसदी उपयोग नहीं हो पा रहा है। अधिकारी का कहना है कि इन सभी एआरटी सेंटरों में धूम्रपान रोकने संबंधी योजना भी शुरू कर दी जाए तो इन केंद्रों में काम भी पूरा रहेगा और संसाधनों का सही इस्तेमाल भी हो सकेगा। एक अन्य अधिकारी का कहना है कि धूम्रपान छुडाने के अभियान को एआरटी सेंटरों से जोड़ने पर एड्स के मरीजों की भी संख्या केंद्रों में बढ़ेगी। अधिकारी का तर्क है कि ज्यादातर एचआईवी एड्स के मरीज एआरटी सेंटरों में उपचार कराने या जांच कराने के लिए जाने से हिचकते हैं क्योंकि उन्हे अन्य लोगों द्वारा देख लेने का डर बना रहता है। यदि इस केंद्र में तंबाकू रोकथाम भी जुड़ जाता है तो ज्यादातर लोग बेहिचक अपनी जांच या इलाज कराने के लिए एआरटी सेंटरों में आएंगे(प्रदीप सुरीन,दैनिक भास्कर,दिल्ली,18.10.2010)।

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रविवार, 12 सितंबर 2010

दिल्ली :अस्पताल-कॉलेज में भी धुआं

राष्ट्रमंडल खेलों से पहले दिल्ली सरकार शहर में धूम्रपान को लेकर एक सर्वे करा रही है। इसके तहत सेंट स्टीफंस अस्पताल के विशषज्ञ शहर के अस्पतालों, स्कूल-कॉलेजों, रेस्तरां सहित अन्य सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट-बीड़ी पीने वालों का पता लगा रहे हैं। दिल्ली सरकार ने धूम्रपान को लेकर नया सर्वे, जॉन हापकिंस विश्वविद्यालय की उस ताजा रिपोर्ट के बाद शुरू कराया है जिसमें कहा गया है कि दिल्ली के अस्पतालों व स्कूल कॉलेजों में जमकर धूम्रपान किया जा रहा है। नईदुनिया के पास उपलब्ध इस रिपोर्ट की प्रति के मुताबिक दिल्ली विश्वविद्यालय कैम्पस के तीन कॉलेजों व एक स्कूल में निकोटिन की मौजूदगी का पता लगाने के लिए लगाए गए २३ मॉनिटरों में लगभग ९१ प्रतिशत में निकोटिन पाया गया। दिल्ली सरकार के विश्वस्त सूत्रों ने बताया कि वर्ष २००८ में दिल्ली में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर पाबंदी लगाए जाने के बाद वस्तुस्थिति का पता लगाने के लिए वर्ष २००९ में सरकार ने जॉन हापकिन्स विश्वविद्यालय के सहयोग से राजधानी के अस्पतालों, स्कूल-कॉलेजों, तीन सितारा होटलों व रेस्तरां सहित अन्य स्थानों पर १३८ एयर मॉनिटर लगाए थे। रिपोर्ट के मुताबिक ३३ इमारतों में रखे गए १११ मॉनिटरों का अध्ययन किया गया। बाकी के २७ मॉनिटरों में से ११ खराब पाए गए तथा १६ में कोई आंकड़ा ही नहीं आ पाया था। होटलों व रेस्तरां में लगाए गए सभी ३३ मॉनिटरों में निकोटिन पाया गया। इसकी मात्रा ०.०१यूजी/एम३ से १.९२यूजी/एम३ तक पाई गई। हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ब्राजील, कोस्टा रिका, पेरू, चेन्नई व अहमदाबाद शहरों में किए गए ऐसे ही अध्ययन की तुलना में दिल्ली में किए गए अध्ययन में निकोटिन की मात्रा अपेक्षाकृत कम पाई गई। स्कूल-कॉलेजों के मामले में कहा गया कि जहां तक अधिकतम निकोटिन की मात्रा का सवाल है, तो यह दिल्ली मे बाकी शहरों के मुकाबले ज्यादा पाई गई। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकारी इमारतों तथा दिल्ली सरकार व दिल्ली नगर निगम के अस्पतालों में किए गए अध्ययन में भी निकोटिन की मात्रा पाई गई है। कुछ महीनों पहले आई इस रिपोर्ट से साफ है कि राजधानी में धूम्रपान पर पाबंदी के बावजूद लोग सरेआम धुआं उड़ा रहे हैं। महत्वपूर्ण यह है कि यह पाबंदी उन लोगों को ध्यान में रखकर लगाई गई थी, जो खुद धूम्रपान नहीं करते लेकिन धूम्रपान करने वालों की वजह से निकोटिन के प्रभाव में आ जाते हैं। जाहिर है धूम्रपान करने वालों की संख्या ज्यादा होने से लोगों को दिक्कत हो रही होगी। दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग में धूम्रपान की रोकथाम के लिए बनाए गए प्रकोष्ठ के प्रमुख डॉ. वशिष्ठ ने इस रिपोर्ट के बारे में पूछने पर कहा कि यह सही है कि सार्वजनिक स्थानों पर निकोटिन की मात्रा पाई गई है। लेकिन उन्होंने दलील दी कि चाहे स्कूल-कॉलेज हों अथवा अस्पताल, कई बार देखा यह गया है कि चौकीदार वगैरह रात के समय में बीड़ी-सिगरेट पीते हैं और मॉनिटर में इन्हीं लोगों द्वारा उड़ाया गया धुआं दर्ज हुआ होगा। डॉ. वशिष्ठ ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग अब शहर में धूम्रपान पर पाबंदी की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए सेंट स्टीफंस कॉलेज के कम्युनिटी हेल्थ विभाग के सहयोग से सर्वे करा रहा है। इंटरनेशनल यूनियन अगेंस्ट लंग एंड टीबी डिजिज की निगरानी में किए जा रहे इस सर्वे में शहर के तमाम रेस्तराओं, होटलों, स्कूल-कॉलेजों, अस्पतालों आदि में धूम्रपान को लेकर जानकारी जुटाई जा रही है। इसकी रिपोर्ट अगले दस से पन्द्रह दिनों में आ जाने की संभावना है। दिल्ली में धूम्रपान की पाबंदी के बाद से अक्टूबर २००८ से अगस्त २०१० के बीच १ लाख ३२ हजार, ३०३ सार्वजनिक स्थलों पर छापा मारकर २४ हजार, ६८६ धूम्रपान करने वालों तथा २६२६ वेंडरों से २१ लाख, ९९ हजार, ४४ ヒपए का जुर्माना वसूल चुकी है(अजय पांडेय,नई दुनिया,दिल्ली संस्करण,११.९.२०१०)।

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शनिवार, 31 जुलाई 2010

मेडिको कर रहे हैं धूम्रपान। लेंगे धूम्रपान छुड़ाने की ट्रेनिंग

आज के दैनिक जागरण के दिल्ली संस्करण में प्रकाशित एक सर्वे रिपोर्ट कहती है कि देशभर के मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने वाले 11.6 प्रतिशत छात्र धूम्रपान करते हैं। इसका खुलासा इंडिया ग्लोबल हेल्थ प्रोफेशनल द्वारा देशभर के साढ़े तीन हजार मेडिकल छात्रों के बीच अध्ययन के बाद किया गया है। धूम्रपान के बढ़ते चलन को देखते हुए वॉलंट्री हेल्थ आर्गेनाइजेशन (वीएचओ) ने टोबैको कंट्रोल को स्कूल और मेडिकल एजुकेशन का हिस्सा बनाने का सुझाव दिया है। शुक्रवार को आयोजित प्रेस वार्ता में संस्था के एक्सपर्ट डॉ. एलएम. नाथ ने बताया कि मेडिकल के तीसरे वर्ष के साढ़े तीन हजार छात्रोंके बीच किए इंडिया ग्लोबल हेल्थ प्रोफेशनल स्टडी सर्वे के मुताबिक 11.6 प्रतिशत छात्र धूम्रपान करते हैं,जबकि 5.4 प्रतिशत दूसरे तंबाकू उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं। इनमें 91 पर्सेट यह मानते हैं कि हेल्थ प्रोफेशनल्स को टबैको कंट्रोल की ट्रेनिंग मिलनी चाहिए। एक अन्य स्टडी में यह पाया गया है कि हेल्थ प्रोफेशनल मरीजों को इस बारे में जागरूक करना चाहते हैं, मगर उन्हें खुद इसकी सही जानकारी नहीं होती है। ऐसे में इसे नॉन कम्युनिकेबल डिजीज का हिस्सा मानकर मेडिकल पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए।
इसी अखबार के भोपाल संस्करण में छपी खबर के मुताबिक़, जल्दी ही मेडिकल छात्रों को डॉक्टरी की पढ़ाई के दौरान तंबाकू की लत छुड़ाने के गुर भी सिखाए जा सकते हैं ताकि वे अपने पास आने वाले मरीजों का इलाज करने के साथ ही उनकी बीड़ी-सिगरेट-गुटखा की आदत भी छुड़ा सकें। इस संबंध में सामने आए एक अध्ययन के बाद मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ने कहा है कि वह जल्दी ही इस पर विचार करेगा। एमसीआई की कमान संभाल रहे डॉक्टरों के पैनल में शामिल डॉ. रंजीत रायचौधरी ने शुक्रवार को इस बारे में कहा, निश्चय ही यह बेहद अच्छा प्रस्ताव है। मेडिकल पाठ्यक्रम में इसे शामिल किए जाने से छात्र न सिर्फ बेहतर डॉक्टर साबित हो सकेंगे, बल्कि इसका फायदा खुद उन्हें भी हो सकेगा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि पाठ्यक्रम में इसे शामिल किए जाने का फैसला एमसीआई के पूरे बोर्ड को करना है। रायचौधरी ने यह बात मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में तंबाकू उत्पादों के खतरे के बारे में जागरुकता के स्तर पर किए गए एक अध्ययन पर चर्चा के दौरान कही। प्रो. ललित एम नाथ और डॉ. जेनिफर लोबो ने इस विषय पर किए अपने अध्ययन के आधार पर सिफारिश की है कि मेडिकल के सभी स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में तंबाकू लत छुड़ाने की तकनीक को शामिल किया जाए। इससे पहले मेडिकल कॉलेजों के अध्यापकों को इस बारे में प्रशिक्षित किया जाए और व्यवहारिक अध्ययन के लिए सभी कॉलेजों में तंबाकू छुड़ाने की क्लीनिक भी शुरू किए जाएं। वोलंटरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया (वीएचएआई) की ओर से करवाए गए इस अध्ययन में कहा गया है कि सिर्फ एलोपैथी के ही नहीं बल्कि आयुर्वेद, होम्योपैथ, यूनानी और सिद्ध जैसी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के पाठ्यक्रमों में भी विस्तार से पढ़ाया जाना जरूरी है कि तंबाकू उत्पाद के सेवन का क्या नुकसान है। साथ ही अगर कोई व्यक्ति इसे छोड़ना चाहता है तो उसे क्या करना होगा। इतना ही नहीं इसे स्कूली पाठ्यक्रम में भी प्राथमिक स्तर से ही शामिल किया जाना चाहिए।

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सोमवार, 26 जुलाई 2010

राष्ट्रमंडल खेलःस्मोकर डाक्टरों को नहीं मिलेगा इलाज़ का मौक़ा

कॉमनवेल्थ गेम्स के मद्देनजर स्वास्थ्य विभाग ने फरमान जारी किया है कि गेम्स के दौरान खिलाड़ियों व पर्यटकों के इलाज के लिए उन स्वास्थ्यकर्मियों और चिकित्सकों को वरीयता दी जाएगी जो धूम्रपान नही करते है। जो धूोपान करना छोड़ देंगे वे भी यह मौका पा सकते है। इसके लिए अब तक ऐसे 102 डॉक्टरों व 245 पैरामेडिकल स्टाफ की टीम तैयार कर ली गई है। पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट को धूम्रपान करने वाले डॉक्टरों व अन्य पैरामेडिकल स्टाफ की काउंसलिंग की जिम्मेदारी दी गई है। धूोपान नहीं करने वालों को ही गेम्स में चोटिल खिलाड़ियों के करीब जाने दिया जाएगा। कैट्स एम्बुलेस कर्मियों को भी इसे अपनाना होगा। कॉमनवेल्थ गेम्स हेल्थ कमेटी के नोडल अधिकारी डा. परवीन कुमार ने कहा कि अब तक जिन देशों में कॉमनवेल्थ गेम्स संपन्न हो चुके है वहां पर धूम्रपान निषेध कानून का सख्ती से पालन किया गया था। एक प्रतिष्ठित संस्था द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण का हवाला देते हुए डा. कुमार ने कहा कि मुंबई में 90.26 फीसद जबकि दिल्ली में 89.76 फीसद युवाओं ने ऐसे माहौल में अपनी खेल प्रतिभा का प्रदर्शन करना पसंद करने की बात कही है जहां धूम्रपान न किया जाता हो। आम जनता के धूोपान करने पर सरकार भले ही अंकुश न लगा पाए लेकिन खिलाड़ियों को इमरजेंसी सेवाएं देने वाले डॉक्टर व अन्य स्टाफ के मामले में ऐसा किया जा सकता है। इस ऐतिहासिक अवसर की अहमियत को समझ कर ज्यादातर स्वास्थ्यकर्मी स्वास्थ्य मंत्रालय के सुझावों के त्वरित पालन के लिए उत्सुक है। इसका संदेश दुनिया भर में जाएगा कि यहां चिकित्सीय सेवाएं देने वाले धूम्रपान नही करते है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तम्बाकू सेवन के दुष्प्रभावों के प्रति जनता को जागरूक करने के लिए 31 मई को हर साल नो टोबैको डे मनाने की घोषणा पहले से ही कर रखी है। संकल्प के अध्यक्ष मेजर (डा.) गुलशन गर्ग ने कहा कि दुनिया भर में दस वयस्क लोगों में से एक मौत का कारण तंबाकू होता है। संभवत: यही कारण है कि स्पोर्ट्स में रुचि रखने वाले इन स्वास्थ्य विरोधी वस्तुओं से परहेज करते है। स्वास्थ्य मंत्री प्रो. किरन वालिया ने कहा कि हमें उम्मीद है मंत्रालय के इस कदम की सराहना दुनिया भर में होगी(राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,26.7.2010)।

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सोमवार, 31 मई 2010

हुक्का पीने वाले कोई ग़लतफ़हमी न पालें

हुक्का या शीशा लाउंज इन दिनों युवाओं में बहुत लोकप्रिय है। देश के किसी भी अप मार्केट या बड़े मॉल के शीशा लाउंज में युवाओं की भीड़ देखी जा सकती है। हाल के वर्षों में हुक्का बार की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। छोटे-छोटे शहरों में भी हुक्के का जाल तेजी से फैल रहा है। धूम्रपान चाहे किसी भी रूप में किया गया हो,धूम्रपान करने वाला व्यक्ति सिर्फ 15 फीसदी धुंआ ग्रहण करता है और 85 फीसदी धुंआ बाहर छोडता है जो उसके सम्पर्क में आने वाले लोगों के लिए घातक है। सार्वजनिक स्थलों और खासकर अस्पताल परिसरों में धूम्रपान इसी कारण निषिद्ध किया गया है कि यहां वैसी ही बीमारी के कारण कमजोर प्रतिरक्षी तंत्र वाले लोग मौजूद होते हैं। भारत में सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान के कारण अन्य व्यक्तियों के प्रभावित होने की दर 40 फीसदी से अधिक है। कई बार तो 10 से 20 मिनट में ही अन्य व्यक्ति पर इसका प्रभाव नजर आने लगता है और उनमें ह्रदय की धडकनें और ब्लड प्रेशर बढने जैसे लक्षण देखे जाते हैं।
नए शोध के मुताबिक हुक्का का सेवन सिगरेट जितना ही हानिकारक हो सकता है। यह धारणा गलत है कि हुक्का में भरे पानी से धुआं गुजरने के कारण इसमें मिले प्रदूषक तत्व अलग हो जाते हैं। अमरीकन लंग एसोसिएशन (एएलए) ने हुक्का के हानिकारक पहलुओं पर पहली बार गहन शोध किया है। एएलए द्वारा इस वर्ष मार्च में जारी रिपोर्ट के अनुसार,यह धारणा गलत है कि पानी से धुएं के गुजरने से प्रदूषक तत्व छन जाते हैं और फेफड़ों को नुकसान नहीं पहुंचता। एक शोधकर्ता ने कहा कि मुख, फेफड़ा और ब्लड कैंसर एवं हुक्का सेवन के बीच रिश्ते की पुष्टि हो चुकी है। हुक्का सिगरेट की तरह ही मुख, फेफड़ा और ब्लड कैंसर का वाहक है। इसके अलावा यह हृदय रोग और धमनियों में थक्के जमने की समस्या की भी वजह बन सकता है। एएलए के राष्ट्रीय नीति प्रबंधक थॉमस कार का कहना है कि हुक्का के बारे में कई तरह की गलत धारणाएं हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि हुक्का में भी स्वास्थ्य के लिए घातक तत्व तम्बाकू का इस्तेमाल किया जाता है। इससे पहले के शोध निष्कर्षों से भी इसकी पुष्टि हो चुकी है कि 40 से 50 मिनट तक हुक्का पीने से ही शरीर में निकोटिन की मात्रा में 250 फीसदी की बढ़ोतरी हो जाती है। उन्होंने कहा कि चूंकि लोग इससे कहीं अधिक लम्बे समय तक हुक्का का सेवन करते हैं, जाहिर है कि उनके शरीर में निकोटिन की मात्रा इससे कहीं अधिक होती होगी। शरीर में इतना निकोटिन 100 सिगरेट के सेवन से पैदा होने वाले निकोटिन के बराबर है। इसके अलावा हुक्के में भरे जाने वाले चारकोल से कई तरह के खतरनाक रासायनिक तत्व पैदा होते हैं, जो स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं। चारकोल के जलने से कार्बन मोनोऑक्साइड और कुछ दूसरे जहरीले तत्व पैदा होते हैं। इसी क्रम में पढिए मधुमेह और हृदय रोग चिकित्सा विशेषज्ञ डाक्टर योगेश शाह का आलेख जो नई दुनिया के सेहत परिशिष्ट,मई द्वितीय अंक में प्रकाशित हुआ हैः "हुक्का या शीशा लाउंज इन दिनों युवाओं में बहुत लोकप्रिय है। देश के किसी भी अप मार्केट या बड़े मॉल के शीशा लाउंज में युवाओं की भीड़ देखी जा सकती है। विडंबना यह है कि युवा लड़कियाँ भी इस झुंड में हुक्के के कश लगाती नजर आती हैं। हुक्के के इन दीवानों में से शायद ही किसी को पता होगा कि इसका धुआँ सिगरेट या बीड़ी के धुएँ से अधिक घातक है। हुक्के से खींचा गया तंबाकू का धुआं पानी से होता हुआ एक लंबे होज पाइप के जरिए फेफड़ों तक पहुँचता है। पानी के बरतन से होते हुए आने के कारण ही यह एक आम भ्रांति है कि हुक्के का धुआँ हानिकारक नहीं होता। सच यह है कि हुक्के से निकलने वाला धुआँ सिगरेट या बीड़ी के धुएँ से अधिक घातक होता है। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कराए गए एक अध्ययन से सामने आया है। हुक्के का एक सेशन आमतौर पर ४० मिनट का या इससे अधिक समय का हो सकता है। इस समयावधि में दोस्तों के झुंड में बैहुक्के से खींचा गया तंबाकू का धुआं पानी से होता हुआ एक लंबे होज पाइप के जरिए फेफड़ों तक पहुँचता है। पानी के बरतन से होते हुए आने के कारण ही यह एक आम भ्रांति है कि हुक्के का धुआँ हानिकारक नहीं होता। सच यह है कि हुक्के से निकलने वाला धुआँ सिगरेट या बीड़ी के धुएँ से अधिक घातक होता है। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कराए गए एक अध्ययन से सामने आया है। हुक्के का एक सेशन आमतौर पर ४० मिनट का या इससे अधिक समय का हो सकता है। इस समयावधि में दोस्तों के झुंड में बैठा हुआ युवा ५० से २०० बार तक कश खींच सकता है, जो कि उसके दोस्तों की संख्या पर निर्भर है। अध्ययन से यह बात भी सामने आई है कि हुक्के के एक सेशन में १०० से २०० सिगरेट के बराबर धुआँ शरीर में पहुँचा सकता है। भारतीय उपमहाद्वीप में हुक्के का चलन काफी पुराना है। पाकिस्तान में २००८ में हुक्के के घातक प्रभावों को लेकर एक अध्ययन हुआ था जिससे मालूम हुआ कि जो लोग अर्से से हुक्के का उपयोग कर रहे थे उनके मसूड़े दूसरों की बनिस्बत तेजी से खराब हो रहे थे। इसी तरह पंजाब, राजस्थान और हरियाणा में जो गुड़गुड़ीनुमा छोटा हुक्का प्रचलित है जिसका पाइप लचीला न होकर सीधा और सख्त होता है, उससे फेफड़ों का कैंसर होने की आशंका पाँच गुना अधिक होती है। पानी धुएँ को फिल्टर नहीं करता तंबाकू के धुएँ में ४००० तरह के जहरीले रसायन होते हैं। पानी से भरे बरतन से गुजरने के कारण यह मान लिया जाता है कि तंबाकू का धुआँ फिल्टर हो चुका है। दरअसल हुक्के का पाइप लंबा होता है तथा धुआँ ठंडा हो चुका होता है।"

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तम्बाकू और आपकी आंखें

आज अंतरराष्ट्रीय तंबाकू निषेध दिवस है। लोग पहले शौक से और बाद में आदतन तंबाकू का सेवन करने लगते हैं। तंबाकू के व्यसन से मुक्ति के लिए संसद ने सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद (विज्ञापन का प्रतिबंध और व्यापार तथा वाणिज्य उत्पादन, प्रदाय और वितरण का विनियमन) अधिनियम, 2003 (सीओपीटीए) बनाया गया है जो 2 अक्टूबर 2008 से पूरे देश में लागू है। इसे कार्यरूप देने में प्रशासन कितना कामयाब हुआ है,इस बारे में कुछ न कहना ही अच्छा। छोटे-छोटे बच्चे तम्बाकू उत्पाद बेचते जहां-तहां दिख जाएंगे। इन पर न तो शासन की नजर है और न ही सामाजिक संगठनों की। उल्टा,सभी जगहों पर "स्मोकिंग जोन" बनाए जा रहे हैं ताकि धूम्रपान करने वालों को और आसानी हो। नतीज़ा-नशा करने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि। गुटखा और सिगरेट के रैपर व पैकेट पर जो चेतावनी छपती है, उससे लगता नहीं कि लोगों में कोई जागरुकता फैली है। बहरहाल,तम्बाकू उत्पादों के सेवन से मुख कैंसर की बात तो सब जानते ही हैं, मगर इंदौर में चोइथराम नेत्रालय के निदेशक डाक्टर प्रतीप व्यास,नई दुनिया के सेहत परिशिष्ट,मई द्वितीय में बता रहे हैं कि इनका आंखों पर क्या असर पड़ता हैः
तंबाकू पूरे शरीर के साथ आँखों पर भी विपरीत असर डालती है। धूम्रपान करने वालों की आँखों में जलन से लेकर अंधत्व तक कोई भी समस्या खड़ी हो सकती है। उच्च रक्तचाप और मधुमेह से पीड़ितों को तो धूम्रपान से तौबा कर ही लेना चाहिए, क्योंकि इससे रक्त में निकोटिन का स्तर बढ़ जाता है, जो रेटीना के लिए घातक होता है। धूम्रपान करने का अर्थ है शरीर को अंदर से खोखला करना। तंबाकू के हानिकारक दुष्प्रभावों की जड़ निकोटिन है, क्योंकि इसमें मौजूद कई ऑक्सीडेंट्स आँखों को नुकसान पहुँचाने के लिए जिम्मेदार हैं। धूम्रपान करने वालों के परिजनों को भी यह जोखिम हमेशा बना रहता है। कई बार धूम्रपान नहीं करने वालों की आँखें सिगरेट या बीड़ी के गुल से जल जाती हैं। आँखों की सतह पर धूम्रपान का प्रभाव धूम्रपान करने वालों की आँखों को तंबाकू के जहरीले धुएँ में मौजूद रसायनों से कंजक्टिवा के ग्लोबलेट सेल्स क्षतिग्रस्त हो सकते हैं, जिनसे आँख की सतह पर नमी बनी रहती है। इसी तरह धुएँ में मौजूद कारबन पार्टीकल्स पलकों पर जमा हो सकते हैं, इससे भी आँखों की नमी और गीलापन खत्म हो सकता है। आँखों का गीलापन या नमी खत्म होने से आँखें शुष्क हो सकती हैं, जिससे हमेशा किरकिराहट का अहसास बना रह सकता है। हमेशा यह लगेगा कि आँख में कोई कचरा चला गया है। लंबे समय तक शुष्क बने रहने से नजर धुँधला भी सकती है। चूने की थैली से गई आंखें जो लोग जर्दा या तंबाकू मसलकर खाते हैं वे साथ में चूने का पाउच भी रखते हैं। आमतौर पर गीला चूना पॉलीथिन के बैग में रखा जाता है ताकि गर्मियों के मौसम में सूख न जाए। लापरवाही से छोड़ी गई इस सफेद थैली को छोटे बच्चे अक्सर खेल-खेल में उठा लेते हैं और दबाकर देखते हैं। दबाते ही चूना सीधा आँख में चला जाता है। चूना आँखों की सतह को क्षतिग्रस्त कर देता है। अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि कई बच्चों की आँखें इसी वजह से हमेशा के लिए खराब हो चुकी हैं। तंबाकू का एक साइड इफेक्ट यह भी है। धूम्रपान से आँखों की अन्य समस्याएँ मोतियाबिंद : देश-विदेश में हुए कई अध्ययनों से पता चला है कि तंबाकू का सेवन करने वालों में मोतियाबिंद दूसरों के मुकाबले ज्यादा जल्दी घर कर लेता है। इसी तरह न्यूक्लियर और पोस्टियर पोलर किस्म के कैटरेक्ट भी इन्हीं लोगों को छोटी उम्र से ही होने लगते हैं। काला मोतिया : काला मोतिया के मामलों में हुए कई अध्ययन सुझाते हैं कि तंबाकू के सेवन से इंट्रा ऑक्यूलर प्रेशर बढ़ता है, जिन्हें कालामोतिया है और वे बूँद की दवा डालते हैं उन्हें इंट्रा ऑक्यूलर प्रेशर को नियंत्रित रखने में दूसरों के मुकाबले अधिक समस्या आती है। उम्र आधारित मेक्यूलर डिजनरेशन : कई अध्ययनों से पता चला है कि धूम्रपान-तंबाकू का सेवन करने वालों को दूसरों के मुकाबले उम्र आधारित मेक्यूलर डिजनरेशन का जोखिम दुगुना रहता है। एम्बलायोपिया और ऑप्टिक न्यूरोपैथी : तंबाकू सेवन का सबसे बुरा नतीजा है एम्बलायोपिया और ऑप्टिक न्यूरोपैथी। तंबाकू में मौजूद निकोटिन रेटीना और ऑप्टिक नर्व के सेलों पर घातक प्रभाव छोड़ते हैं। दृष्टि के लिए रेटीना और ऑप्टिक नर्व महत्वपूर्ण होती है। लंबे समय तक तंबाकू के सेवन के आँखों को अपूरणीय क्षति हो सकती है। थायरॉयड, मधुमेह और उच्च रक्तचाप : *इन बीमारियों से ग्रस्त मरीजों को तंबाकू का किसी भी रूप में सेवन घातक साबित होता है। इससे रक्त में निकोटिन और ऑक्सीडेंट्स का स्तर बढ़ जाता है। *टॉक्सीक एम्बलायोपिक व ऑप्टिक न्यूरोपैथी जैसी बीमारियाँ पैदा हो सकती हैं।

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क्विटोबैक

बिरलावेद ने वर्षों तक अपने शोध के बाद एक ऐसा प्राकृतिक उत्पाद "क्विटोबैक" तैयार किया है जो तंबाकू का उपयोग छ़ुडाने में प्रभावशाली ढंग से मदद करता है। इसके साथ ही निकोटिन रिप्लेसमेंट थेरेपी (निकोटिन हटाने का इलाज) का सशक्त विकल्प भी है। "क्विटोबैक" निकोटिनरहित शत-प्रतिशत आयुर्वेदिक गोली है जो तंबाकू सेवन और धूम्रपान छुड़ाने में सहायक है। यह गोली सभी मानकीकृत जड़ी-बूटियों के प्रभावशाली रसों का निचोड़ है, जिसे आसानी से चबाई जाने वाली गोली के रूप में बनाया गया है।
इससे न केवल धूम्रपान करने और गुटखा चबाने की लत पर अंकुश लगता है वरन इन आदतों को छुड़ाने के बाद पैदा होने वाले शारीरिक लक्षणों और समस्याओं पर भी काबू पाया जा सकता है। इसके अलावा इसके ताकतवर एंटीऑक्सीडेंट्स (ऑक्सीकरणरोधी) द्वारा महत्वपूर्ण अवयवों को धूम्रपान से होने वाले अत्यधिक नुकसान से सुरक्षा भी की जाती है।
"क्विटोबैक" गोली में लवंग, यस्तिमधु, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, अमलाकी, इला, अदरक, पीपली, खदिर और तुलसी के शक्तिशाली रस मिलाए जाते हैं। लवंग में पाए जाने वाले सक्रिय तत्व निकोटिन के उपापचय (मेटाबॉलिज्म) को बढ़ाते हैं, जिससे निकोटिन को कोटिनाइन में बदलने में मदद मिलती है। यह निकोटिन का ऐसा उपापचयी होता है जो पेशाब के जरिए शरीर से बाहर निकल जाता है। इसके परिणामस्वरूप धूम्रपान की तलब और इसके बाद के लक्षणों को कम किया जा सकता है।
गोली में डाले गए ब्राह्मी, शंखपुष्पी तनाव कम करते हैं और यस्तिमधु भी तनावरोधक का काम करती है। यह न्यूरोप्रोटेक्टर के तौर पर काम करती है। आंवला एक सक्षम एंटीऑक्सीडेंट का काम करता है और शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को होने वाले मूलभूत नुकसानों से बचाता है। एंटीऑक्सीडेंटल काम के अलावा आंवला एंटीटिश्यूजिव कम करता है ताकि धूम्रपान से पैदा होने वाली खांसी की तीव्रता कम की जा सके । इलायची और लवंग मुंह का स्वास्थ्य बेहतर बनाने का काम करते हैं और मुंह में पाए जाने वाले और रोगों को पैदा करने वाले विषाणुओं, पी-जिंजीवैलिस और पी-इंटरमीडिया समाप्त करते हैं।
"क्विटोबैक" में मौजूद इलायची और खदिर मुंह की दुर्गंध दूर करते हैं और मुंह को स्वच्छ रखने के साथ-साथ मसूड़े भी मजबूत बनाते हैं। इन गोलियों को सभी दवा की दुकानों से प्राप्त किया जा सकता है। इसे हर रोज दो या तीन बार चबाकर खाने की सलाह दी जाती है। जब किसी व्यक्ति को धूम्रपान करने या तंबाकू चबाने की ज्यादा इच्छा होती है तो ऐसे लोग प्रतिदिन छह गोलियां तक ले सकते हैं। इस गोली का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें निकोटिन नहीं होता इसलिए न तो इसकी इच्छा होती है और न इसे खाने की आदत पड़ती है। इस गोली के कोई दुष्प्रभाव भी नहीं होते और न अन्य दवाओं के लेने से इस पर कोई प्रभाव पड़ता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि जिस व्यक्ति को धूम्रपान या तंबाकू खाने की लत पर काबू पाना हो तो उसे दृढ़ इच्छाशक्ति भी रखनी होगी और लगातार इस बात पर ध्यान रखना होगा कि वह किस तरह इन बुरी आदतों से बचा रहे। यदि इन बातों को लगातार ध्यान में रखा जाता है तो इलाज बहुत असरकारी और तेजी से लाभ देता है। इसके अलावा धूम्रपान और तंबाकू छोड़ने का लाभ यह होता है कि व्यक्ति अधिक स्वस्थ होता है और उसमें बेहतर आत्मसम्मान का भाव होता है। उसमें तनाव की मात्रा कम होती है और वह अपने परिवार, बच्चों के लिए बेहतर उदाहरण होता है। एक बुराई से मुक्ति मिलती है और साथ ही लोगों का पैसा भी बचता है(जयवंत किरकिरे,नई दुनिया,दिल्ली,31.5.2010)।

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शनिवार, 29 मई 2010

आप कितने इच्छुक हैं सिगरेट छोड़ने के?

विश्व स्वास्थ्य संगठन प्रतिवर्ष यह माह तंबाकू निषेध अभियान माह के रूप में मनाता है। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी यह माह यों ही गुज़र गया। कहीं से कोई विशेष पहल इस दिशा में होती नहीं दिखी। ख़ैर, जहां अमेरिका और यूरोप के लोगों में सिगरेट छोड़ने की दर ४० प्रतिशत है वहीं भारत में यह दर सिर्फ दो प्रतिशत है । भारत के लोग एक्स स्मोकर कहलाना पसंद नहीं करते जबकि अमेरिका में इससे गर्व महसूस किया जाता है । एक ताजा अध्ययन के मुताबिक भारत में सिगरेट छोड़ने की दर हर राज्यों में अलग-अलग है । जहां केरल में ७ प्रतिशत लोग सिगरेट पीना छोड़ कर एक्स स्मोकर कहलाना पसंद करते हैं वहीं दिल्ली में किसी को ऐसा कहलाना पसंद नहीं है । एक प्रतिशत से भी कम लोग दिल्ली में सिगरेट छोड़ पाते हैं। यह अध्ययन नेशनल इंस्टिच्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस फॉर ग्लोबल हेल्थ रिसर्च ने जारी किया है ।
अध्ययन के मुताबिक सिगरेट के गिरफ्त में शिकार लोगों में जीवन की प्रत्याशा एक साल कम हो जाती है । अध्ययन में यह भी कहा गया है कि १९९९ में २० से २४ साल के युवाओं में जहां सिगरेट पीने वालों की दर १३ प्रतिशत तक बढ़ी थी वहीं २००६ में यह संख्या २६ प्रतिशत तक हो गई ।
निकोटिन ऐसा पदार्थ है, जो शरीर के लिए सिर्फ हानिकारक ही होता है। यह एक तथ्य है कि तंबाकू में चार हजार से अधिक हानिकारक रसायन होते हैं, इनमें से १८ से अधिक कैंसर कारक माने जाते हैं। हालांकि भारत में सिगरेट पीना लोग देर से शुरू करते हैं लेकिन जब बात इसे छोड़ने की आती है तो इस मामले में भारतीय बहुत पीछे हैं । अक्सर तंबाकू या सिगरेट छोड़ने के लिए आग्रह किया जाता है, लेकिन इस पर बात नहीं की जाती है कि इसे कैसे छोड़ें। नई दुनिया के मई द्वितीय अंक में,नॉर्दर्न रेलवे सेंट्रल हॉस्पीटल,दिल्ली के डॉ. अनिल कुमार शर्मा ने कुछ उपाय सुझाए हैं-
यूँ तो किसी भी लत को छोड़ना आसान नहीं होता, लेकिन ठान लेने के बाद कोई काम मुश्किल भी नहीं होता। सिगरेट या बीड़ी की लत को छोड़ने के लिए केवल एक सख्त इरादे की जरूरत होती है। चीनी कहावत है कि हजारों मील का लंबा सफर एक कदम से शुरू होता है। सिगरेट-बीड़ी छोड़ने की राह में आपको सिर्फ ६ कदम उठाने हैं और मंजिल आपके सामने होगी।
पहला कदम : इरादा करें
यदि आप पहले भी सिगरेट या बीड़ी छोड़ने के कई असफल प्रयास कर चुके हैं तब भी तंबाकू मुक्त जीवन की ओर एक और कदम उठाया जा सकता है। इसलिएएक और ताजा प्रयास करें।एक सर्वे के मुताबिक हर दिन एक करोड़ से भी अधिक लोग धूम्रपान छोड़ने की कोशिश करते हैं।इनमें से ३ प्रतिशत सफल हो जाते हैं। आप इस विश्वास के साथ प्रयास करें कि आप भी इन्हीं तीन प्रतिशत सफल लोगों में से एक हैं।
दूसरा कदम : छोड़ने की तैयारी
तंबाकू छोड़ने की योजना और तैयारी में ही इसकी सफलता का राज छिपा है। वास्तविक रूप से तंबाकू छोड़ने से पहले मस्तिष्क और शरीर को तैयार करना जरूरी है। अपने व्यक्तिगत लक्ष्य तय करें। लत हमेशा पीछा करती रहती है। तंबाकू की चाहत का मुकाबला करें। निकोटिन में लत पैदा करने वाला रसायन होता है। इस लत को छोड़ना भले ही मुश्किल हो, लेकिन असंभव बिलकुल नहीं है। धूम्रपान मुक्ति के क्षेत्र में काम कर रहे चिकित्सकों की टिप्स पर ध्यान दें। उन्हें समझें और अमल करें।
तीसरा कदम : छोड़ने हेतु टिप्स
भले ही आपको यह पता न हो कि तंबाकू छोड़ने की शुरुआत कहाँ से करें, लेकिन अगर आप प्रतिबद्ध हैं तो निश्चित ही ऐसा कर सकेंगे। सबसे पहले अपनी जीवनशैली में आवश्यक परिवर्तन ले आएँ। नशामुक्ति केंद्र के चिकित्सकों से संपर्क करें। ऐसे दोस्तों के बीच रहें, जो धूम्रपान से परहेज करते हों। परिवारजनों के आग्रह का सम्मान करें।
चौथा कदम : औषधियों का लें सहारा
धूम्रपान छोड़ने के लिए निकोटिन रिप्लेसमेंट थैरेपी, साइकोलॉजिकल थैरेपी, निकोटिन नैजल स्प्रे, निकोटिन की चूसने की गोलियाँ, निकोटिन गम और धूम्रपान छुड़ाने की गोलियाँ चिकित्सक की सलाह से लें। अपनी मर्जी से या फिर किसी दोस्त अथवा रिश्तेदार के सुझाव पर औषधि का सेवन करने में जोखिम हो सकता है।
पाँचवाँ कदम : हमेशा के लिए त्याग करें
निकोटिन की चाहत रह-रहकर पीछा करती है। इसलिएयदि एक बार छोड़ दें तो हमेशा के लिएतंबाकू मुक्त रहें। कई लोग छोड़ने के बाद "केवल एक कश" पीने का लालच कर लेते हैं। कुछ लोग पूरी तरह छोड़ कर फिर से पीने लगते हैं। छोड़ने के बाद तीन महीने जोखिम भरे होते हैं।
निकोटिन की चाहत रह-रहकर पीछा करती है। इसलिए,यदि एक बार छोड़ दें तो हमेशा के लिएतंबाकू मुक्त रहें। कई लोग छोड़ने के बाद "केवल एक कश" पीने का लालच कर लेते हैं। कुछ लोग पूरी तरह छोड़ कर फिर से पीने लगते हैं। छोड़ने के बाद तीन महीने जोखिम भरे होते हैं।धूम्रपान छोड़ने के लिए निकोटिन रिप्लेसमेंट थैरेपी, साइकोलॉजिकल थैरेपी, निकोटिन नैजल स्प्रे, निकोटिन की चूसने की गोलियाँ, निकोटिन गम और धूम्रपान छुड़ाने की गोलियाँ चिकित्सक की सलाह से लें। अपनी मर्जी से या फिर किसी दोस्त अथवा रिश्तेदार के सुझाव पर औषधि का सेवन करने में जोखिम हो सकता है।भले ही आपको यह पता न हो कि तंबाकू छोड़ने की शुरुआत कहाँ से करें, लेकिन अगर आप प्रतिबद्ध हैं तो निश्चित ही ऐसा कर सकेंगे। सबसे पहले अपनी जीवनशैली में आवश्यक परिवर्तन ले आएँ। नशामुक्ति केंद्र के चिकित्सकों से संपर्क करें। ऐसे दोस्तों के बीच रहें, जो धूम्रपान से परहेज करते हों। परिवारजनों के आग्रह का सम्मान करें।तंबाकू छोड़ने की योजना और तैयारी में ही इसकी सफलता का राज छिपा है। वास्तविक रूप से तंबाकू छोड़ने से पहले मस्तिष्क और शरीर को तैयार करना जरूरी है। अपने व्यक्तिगत लक्ष्य तय करें। लत हमेशा पीछा करती रहती है। तंबाकू की चाहत का मुकाबला करें। निकोटिन में लत पैदा करने वाला रसायन होता है। इस लत को छोड़ना भले ही मुश्किल हो, लेकिन असंभव बिलकुल नहीं है। धूम्रपान मुक्ति के क्षेत्र में काम कर रहे चिकित्सकों की टिप्स पर ध्यान दें। उन्हें समझें और अमल करें।यदि आप पहले भी सिगरेट या बीड़ी छोड़ने के कई असफल प्रयास कर चुके हैं तब भी तंबाकू मुक्त जीवन की ओर एक और कदम उठाया जा सकता है। इसलिएएक और ताजा प्रयास करें। एक सर्वे के मुताबिक हर दिन एक करोड़ से भी अधिक लोग धूम्रपान छोड़ने की कोशिश करते हैं।इनमें से ३ प्रतिशत सफल हो जाते हैं। आप इस विश्वास के साथ प्रयास करें कि आप भी इन्हीं तीन प्रतिशत सफल लोगों में से एक हैं।तंबाकू के प्रभावों पर सालों तक किएगएअध्ययनों से सामने आया है कि इसके कारणलोग बीमार होकर मर जाते हैं। धूम्रपान न सिर्फ आप पर, बल्कि पूरे परिवार पर हमला करता है। परिवार के जो सदस्य आपके आसपास रहते हैं, वे भी आपके धूम्रपान के कारण परोक्ष रूप से इससे होने वाले नुकसान के भागीदार बन जाते हैं। धूम्रपान के कारण चेहरे का नूर समाप्त हो जाता है। दाँत खराब होने लगते हैं। तंबाकू के दुष्प्रभावों को जानने से इसके प्रति विरक्ति का भाव पैदा होगा। कुछ समय पहले खबर आई थी कि सरकार 1 जून से सिगरेट के पैकेट पर मुख कैंसर के भयावह चित्र लगाने जा रही है। तस्वीर कैसी होगी,यह तो दो दिन बाद ही पता चल पाएगा मगर कल्पना मात्र से ही सिहरन पैदा होती है। क्या आप चाहेंगे कि आपका मुख वैसा दिखे?

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शुक्रवार, 28 मई 2010

दम मारती महिलाएं,बेदम होता गर्भस्थ

कहीं तो हम पुरुषों की नशामुक्ति के लिए महिलाओं को संगठित होकर आंदोलनरत देखते हैं,तो कहीं स्वयं महिलाएं कश लगाती दिखती हैं। हाल के वर्षों में महिलाओं में धूम्रपान की लत बढी है। खासकर कामकाजी महिलाएं तनाव में हैं इससे मुक्ति के लिए धूम्रपान का शिकार हो रही हैं। कई बार शौकिया तौर पर की गई शुरूआत भी लत बन जाती है। महिलाएं महिलाओं में धूम्रपान के कारण परिवार पर पड़ने वाले असर की चर्चा डॉक्टर शरद थोरा और डाक्टर संदीप जैन ने नई दुनिया के मई द्वितीय अंक में की है जिसे आज इंटरनेशनल डे ऑफ एक्शन फॉर वीमन्स हेल्थ पर आप पाठकों के लिए प्रस्तुत किया जा रहा हैः
अरे जनाब कहीं और जाकर शौक फरमाइए और अपना धुआँ भी साथ लेते जाइए। आप तो मजबूर हैं, अपने आपसे लाचार हैं, हम पर तो रहम खाइए। खुदा के लिए खुद के बच्चों का न सही, हमारा तो ख्याल कीजिए। ऐसी बातें अक्सर बसों व ट्रेनों में सुनाई पडती हैं। आज देश में कई लोगों को यह पता चल चुका है कि तंबाकू का दूसरों पर कितना बुरा असर होता है। किसी बंद जगह जैसे कि बस, ट्रेन, कार, एयरपोर्ट, हॉटेल, कार्यालय, कारखाना या कहीं भी कोई भी धूम्रपान कर रहा हो तो वातावरण में जो धुआँ छोड़ा जाता है वह लोगों के फेफड़ों तक पहुँच जाता है। इसे पैसिव स्मोकिंग या परोक्ष धूम्रपान कहते हैं। बच्चों पर इसका बहुत बुरा असर पड़ता है। धूम्रपान करने वाला भले ही फिल्टर से छानते हुए धुआँ अंदर ले रहा हो, लेकिन जो लोग उसके आसपास होते हैं, वे बिना छने धुएँ को फेफड़ों में खींचने के लिए विवश हैं। सिगरेट से निकले धुएं में ३ गुना निकोटिन, ३ गुना टार व पचास गुना अधिक अमोनिया होता है, जो अधिक नुकसानदेह होता है। सार्वजनिक स्थलों पर पैसिव स्मोकिंग की वजह से हर साल दो लाख से अधिक लोग तंबाकू जनित बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं, जिन्होंने जीवन में कभी धूम्रपान नहीं किया हो। प्रदूषण की वजह से बच्चों में अस्थमा की बीमारी बढ़ रही है। जिन घरों में कोई सदस्य धूम्रपान करता है, उनमें रहने वाले बच्चों को दूसरों के मुकाबले फेफड़े के रोग होने की आशंका अधिक होती है। ऐसे बच्चे सर्दी, खांसी व साँस की तकलीफों से ग्रसित रहते हैं। जिन घरों में धूम्रपान आम होता है, उन घरों के बच्चे न चाहते हुए भी जन्म से ही 'धूम्रपान' की ज्यादतियों के शिकार हो जाते हैं। पेसिव स्मोकिंग या सेकंड हैंड स्मोकिंग भी उतनी ही समस्याएँ पैदा करती हैं जितनी किसी धूम्रपान करने वाले को हो सकती है। बच्चों में यह समस्या और गंभीर इसलिए हो जाती है, क्योंकि उनका विकास हो रहा होता है। साथ ही उनकी साँस लेने की गति भी वयस्कों से अधिक होती है। विकसित देशों में हर छठी मौत सिगरेट के कारण होती है। महिलाओं में सिगरेट पीने के बढ़ते चलन के कारण यह आँकड़ा और बढ़ सकता है। कोई वयस्क एक मिनट में लगभग १६ बार सांस लेता है, जबकि बच्चों में इसकी गति अधिक होती है। पाँच साल का एक सामान्य बच्चा एक मिनट में २० बार साँस लेता है। किन्हीं विशेष परिस्थितियों में यह गति बढ़कर ६० बार प्रति मिनट तक हो सकती है। जाहिर है कि जिन घरों में सिगरेट या बीड़ी का धुआँ रह-रहकर उठता है उन घरों के बच्चे तंबाकू के धुएँ में ही साँस लेते हुए बड़े होते हैं। चूँकि वे वयस्कों से अधिक तेज गति से साँस लेते हैं इसलिए उनके फेफड़ों में भी वयस्कों के मुकाबले अधिक धुआँ जाता है। धुएँ के साथ जहरीले पदार्थ भी उसी मात्रा में दाखिल होते हैं। देश के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं में बीड़ी पीना बहुत सामान्य है। इसी तरह शहरी भद्र समाज की आधुनिक महिलाओं में यहाँ तक कि लड़कियों में सिगरेट पीना फैशन बनता जा रहा है। गर्भधारण की अवधि में सिगरेट या बीड़ी पीने वाली महिलाओं को कम वजन के बच्चे पैदा होते हैं। ऐसे बच्चों की रोग प्रतिरोधक शक्ति कम होती है तथा वे जल्दी किसी बीमारी से घिर जाते हैं। ऐसे बच्चों को दिमागी लकवे की शिकायत हो सकती है साथ ही सीखने में असमर्थता की भी समस्या होती है। सिगरेट या बीड़ी के धुएं का बच्चे की श्वास-प्रश्वास प्रणाली पर इतना विपरीत प्रभाव पड़ता है कि वे अस्थमा के भी शिकार हो जाते हैं। यदि बच्चे पहले से ही अस्थमा का शिकार हैं तो उसकी स्थिति सिगरेट के धुएं से और बिगड़ सकती है। उसे अस्थमा के अनियंत्रित दौरे भी पड़ सकते हैं। सेकेंड हैंड स्मोकिंग के कारण हर साल अस्थमा के नए बाल रोगियों की संख्या बढ़ जाती है। धूम्रपान का धुआँ बच्चों में निमोनिया या पल्मोनरी ब्रोंकाइटिस अर्थात साँस के साथ उठने वाली खाँसी की समस्या पैदा कर सकता है। कौन सी समस्याएं पैदा हो सकती हैः -बच्चों के मध्यकरण में अधिक पानी भर सकता है। उनमें सुनने अथवा बोलने की समस्या पैदा हो सकती है। -धूम्रपान के धुएँ में पलने वाले बच्चों के फेफड़े कम क्षमता से काम करते हैं। इसी वजह से उनकी रोग प्रतिरोधक प्रणाली भी कमजोर होती है। वे युवावस्था में दूसरों के मुकाबले कम तगड़े होते हैं। -बच्चों का सामान्य विकास अवरुद्ध हो जाता है। उनका वजन और ऊँचाई दूसरों के मुकाबले कम होती है। -जिन्होंने जीवन में कभी भी धूम्रपान नहीं किया हो उन्हें पेसिव स्मोकिंग के कारण फेफड़ों के कैंसर होने का २०-३० प्रतिशत जोखिम होता है। -बीसवीं सदी के अंत तक सिगरेट पीने के कारण ६ करोड़ २० लाख लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं। विकसित देशों में हर छठी मौत सिगरेट के कारण होती है। महिलाओं में सिगरेट पीने के बढ़ते चलन के कारण यह आँकड़ा और बढ़ सकता है। धूम्रपान की लत आपके साथ परिवार को भी जहरीले धुएँ का जहर दे देती है। यूं तो हर बुरी आदत का परिणाम पूरे परिवार को सम्मिलित रूप से भुगतना पड़ता है, लेकिन धूम्रपान की सजा आने वाली पीढ़ियाँ तक भुगतती हैं। परिवार के मुखिया या किसी सदस्य के धूम्रपान का असर गर्भस्थ शिशु पर भी पड़ता है। गर्भस्थ शिशु परोक्ष धूम्रपान का शिकार है और इसकी वजह से जन्म के समय उसका वजन कम रह सकता है। उसका मस्तिष्क अविकसित भी रह सकता है। धूम्रपान करने वाला भी जानता है कि शरीर को तंबाकू से कोई फायदा नहीं होता, लेकिन लत हर सवाल का माकूल जवाब ढूँढ लेती है। विकसित देशों में सिगरेट से होने वाले नुकसानों पर शोध हुए हैं, लेकिन हमारे देश में बीड़ी के दुष्प्रभावों पर अब तक कोई गंभीर शोध नहीं हुए हैं। बीड़ी बनाने वालों से लेकर पीने वालों तक सभी के परिवार इसका खामियाजा भुगतते हैं। बीड़ी बनाने का काम परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता है, बच्चे इस काम में अहम भूमिका निभाते हैं। बचपन से ही वह वज्रासन की तर्ज पर बैठकर बीड़ी बनाना सीख जाता है। तंबाकू से भरा सूपड़ा उसकी गोदी में रखा रहता है। परिवार भी उसे प्रोत्साहित करता है, क्योंकि छोटी-नाजुक उँगलियों से बीड़ी के धागे की गठान आसानी से और जल्दी लग जाती है। कई बार तो बच्चों का "प्रॉडक्शन" वयस्कों से अधिक निकल आता है। जो परिवार जितनी अधिक बीड़ियाँ बनाकर देगा, उसे भुगतान भी उसी हिसाब से मिलेगा। यही वजह है कि परिवार का हर सदस्य बीड़ी उत्पादन में अपना योगदान देता है। तंबाकू की धाँस पूरे घर में उड़ती रहती है। गर्भवती महिलाएँ भी इसी माहौल में साँस लेती हैं। हमारे देश में तंबाकू का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। पुर्तगालियों के साथ तंबाकू देश के पश्चिमी तट पर पहुँची थी। आज कोने-कोने में इसके चाहने वाले मौजूद हैं। राजस्व की आवक को देखते हुए केंद्र से लेकर प्रदेश तक की कोई भी सरकार तंबाकू की फसल पर कोई रोक नहीं लगाना चाहतीं। बुंदेलखंड और बघेलखंड में बीड़ी उद्योग बरसों से फल-फूल रहा है। बीड़ी बनाने वालों की आर्थिक स्थिति में पीढ़ियों से कोई सुधार नहीं आया है। बीड़ी निर्माताओं की लॉबी इन इलाकों में आधुनिक उद्योग धंधे नहीं पनपने देना चाहती। लोगों को जीविका के दूसरे विकल्प मिलने लगेंगे तो बीड़ी उद्योग को सस्ते और बंधुआ मजदूर कहाँ से मिलेंगे?

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