सोमवार, 31 मई 2010

हुक्का पीने वाले कोई ग़लतफ़हमी न पालें

हुक्का या शीशा लाउंज इन दिनों युवाओं में बहुत लोकप्रिय है। देश के किसी भी अप मार्केट या बड़े मॉल के शीशा लाउंज में युवाओं की भीड़ देखी जा सकती है। हाल के वर्षों में हुक्का बार की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। छोटे-छोटे शहरों में भी हुक्के का जाल तेजी से फैल रहा है। धूम्रपान चाहे किसी भी रूप में किया गया हो,धूम्रपान करने वाला व्यक्ति सिर्फ 15 फीसदी धुंआ ग्रहण करता है और 85 फीसदी धुंआ बाहर छोडता है जो उसके सम्पर्क में आने वाले लोगों के लिए घातक है। सार्वजनिक स्थलों और खासकर अस्पताल परिसरों में धूम्रपान इसी कारण निषिद्ध किया गया है कि यहां वैसी ही बीमारी के कारण कमजोर प्रतिरक्षी तंत्र वाले लोग मौजूद होते हैं। भारत में सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान के कारण अन्य व्यक्तियों के प्रभावित होने की दर 40 फीसदी से अधिक है। कई बार तो 10 से 20 मिनट में ही अन्य व्यक्ति पर इसका प्रभाव नजर आने लगता है और उनमें ह्रदय की धडकनें और ब्लड प्रेशर बढने जैसे लक्षण देखे जाते हैं।
नए शोध के मुताबिक हुक्का का सेवन सिगरेट जितना ही हानिकारक हो सकता है। यह धारणा गलत है कि हुक्का में भरे पानी से धुआं गुजरने के कारण इसमें मिले प्रदूषक तत्व अलग हो जाते हैं। अमरीकन लंग एसोसिएशन (एएलए) ने हुक्का के हानिकारक पहलुओं पर पहली बार गहन शोध किया है। एएलए द्वारा इस वर्ष मार्च में जारी रिपोर्ट के अनुसार,यह धारणा गलत है कि पानी से धुएं के गुजरने से प्रदूषक तत्व छन जाते हैं और फेफड़ों को नुकसान नहीं पहुंचता। एक शोधकर्ता ने कहा कि मुख, फेफड़ा और ब्लड कैंसर एवं हुक्का सेवन के बीच रिश्ते की पुष्टि हो चुकी है। हुक्का सिगरेट की तरह ही मुख, फेफड़ा और ब्लड कैंसर का वाहक है। इसके अलावा यह हृदय रोग और धमनियों में थक्के जमने की समस्या की भी वजह बन सकता है। एएलए के राष्ट्रीय नीति प्रबंधक थॉमस कार का कहना है कि हुक्का के बारे में कई तरह की गलत धारणाएं हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि हुक्का में भी स्वास्थ्य के लिए घातक तत्व तम्बाकू का इस्तेमाल किया जाता है। इससे पहले के शोध निष्कर्षों से भी इसकी पुष्टि हो चुकी है कि 40 से 50 मिनट तक हुक्का पीने से ही शरीर में निकोटिन की मात्रा में 250 फीसदी की बढ़ोतरी हो जाती है। उन्होंने कहा कि चूंकि लोग इससे कहीं अधिक लम्बे समय तक हुक्का का सेवन करते हैं, जाहिर है कि उनके शरीर में निकोटिन की मात्रा इससे कहीं अधिक होती होगी। शरीर में इतना निकोटिन 100 सिगरेट के सेवन से पैदा होने वाले निकोटिन के बराबर है। इसके अलावा हुक्के में भरे जाने वाले चारकोल से कई तरह के खतरनाक रासायनिक तत्व पैदा होते हैं, जो स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं। चारकोल के जलने से कार्बन मोनोऑक्साइड और कुछ दूसरे जहरीले तत्व पैदा होते हैं। इसी क्रम में पढिए मधुमेह और हृदय रोग चिकित्सा विशेषज्ञ डाक्टर योगेश शाह का आलेख जो नई दुनिया के सेहत परिशिष्ट,मई द्वितीय अंक में प्रकाशित हुआ हैः "हुक्का या शीशा लाउंज इन दिनों युवाओं में बहुत लोकप्रिय है। देश के किसी भी अप मार्केट या बड़े मॉल के शीशा लाउंज में युवाओं की भीड़ देखी जा सकती है। विडंबना यह है कि युवा लड़कियाँ भी इस झुंड में हुक्के के कश लगाती नजर आती हैं। हुक्के के इन दीवानों में से शायद ही किसी को पता होगा कि इसका धुआँ सिगरेट या बीड़ी के धुएँ से अधिक घातक है। हुक्के से खींचा गया तंबाकू का धुआं पानी से होता हुआ एक लंबे होज पाइप के जरिए फेफड़ों तक पहुँचता है। पानी के बरतन से होते हुए आने के कारण ही यह एक आम भ्रांति है कि हुक्के का धुआँ हानिकारक नहीं होता। सच यह है कि हुक्के से निकलने वाला धुआँ सिगरेट या बीड़ी के धुएँ से अधिक घातक होता है। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कराए गए एक अध्ययन से सामने आया है। हुक्के का एक सेशन आमतौर पर ४० मिनट का या इससे अधिक समय का हो सकता है। इस समयावधि में दोस्तों के झुंड में बैहुक्के से खींचा गया तंबाकू का धुआं पानी से होता हुआ एक लंबे होज पाइप के जरिए फेफड़ों तक पहुँचता है। पानी के बरतन से होते हुए आने के कारण ही यह एक आम भ्रांति है कि हुक्के का धुआँ हानिकारक नहीं होता। सच यह है कि हुक्के से निकलने वाला धुआँ सिगरेट या बीड़ी के धुएँ से अधिक घातक होता है। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कराए गए एक अध्ययन से सामने आया है। हुक्के का एक सेशन आमतौर पर ४० मिनट का या इससे अधिक समय का हो सकता है। इस समयावधि में दोस्तों के झुंड में बैठा हुआ युवा ५० से २०० बार तक कश खींच सकता है, जो कि उसके दोस्तों की संख्या पर निर्भर है। अध्ययन से यह बात भी सामने आई है कि हुक्के के एक सेशन में १०० से २०० सिगरेट के बराबर धुआँ शरीर में पहुँचा सकता है। भारतीय उपमहाद्वीप में हुक्के का चलन काफी पुराना है। पाकिस्तान में २००८ में हुक्के के घातक प्रभावों को लेकर एक अध्ययन हुआ था जिससे मालूम हुआ कि जो लोग अर्से से हुक्के का उपयोग कर रहे थे उनके मसूड़े दूसरों की बनिस्बत तेजी से खराब हो रहे थे। इसी तरह पंजाब, राजस्थान और हरियाणा में जो गुड़गुड़ीनुमा छोटा हुक्का प्रचलित है जिसका पाइप लचीला न होकर सीधा और सख्त होता है, उससे फेफड़ों का कैंसर होने की आशंका पाँच गुना अधिक होती है। पानी धुएँ को फिल्टर नहीं करता तंबाकू के धुएँ में ४००० तरह के जहरीले रसायन होते हैं। पानी से भरे बरतन से गुजरने के कारण यह मान लिया जाता है कि तंबाकू का धुआँ फिल्टर हो चुका है। दरअसल हुक्के का पाइप लंबा होता है तथा धुआँ ठंडा हो चुका होता है।"

4 टिप्‍पणियां:

  1. यह फैशन की मार है
    जिससे पीड़ित युवा संसार है ।
    पहले धुआं उड़ाने में मज़ा आता है
    फिर एक दिन दम ही जुदा हो जाता है ।

    विश्व धूम्रपान रहित दिवस पर सार्थक लेख ।

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  2. बहुत ही उम्दा और सार्थक प्रस्तुती जो सही मायने में ब्लॉग लेखन को सार्थकता प्रदान कर रही है |

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  3. महत्वपूर्ण जानकारी

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  4. तंबाकु के बजाय हम औषधी इस्तमाल करे तो?

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