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सोमवार, 14 जुलाई 2014

क्लबफुट का इलाज़ आसान है और निःशुल्क भी

गर्भ के समय या पूर्व में मां ने स्टेरॉयड दवाओं का इस्तेमाल अधिक किया है तो इससे नवजात के पैर जन्म से टेढ़े हो सकते हैं जिसे क्लब फुट बीमारी कहा जाता है। जिसका बिना सर्जरी इलाज किया जा सकता है। बच्चे के पैरों का सामान्य विकास होने के इंतजार करने में अधिकतर माता पिता दो से तीन साल की उम्र में ही ऐसे बच्चों के इलाज के लिए डॉक्टर के पास पहुंचते हैं। जबकि जल्दी इलाज शुरू कर विकलांगता सही होने की संभावना अधिक रहती है। दिल्ली के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में इसका निःशुल्क इलाज किया जाता है, जहां अब तक 2100 बच्चों को ठीक किया जा चुका है। 


एम्स के आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. शाह आलम खान ने बताया जेनेटिक कारणों के अलावा अधिक स्टेरॉयड दवाओं का इस्तेमाल, खून की कमी या जुड़वा बच्चे होने की सूरत में गर्भ में नवजात के पैरों का सामान्य विकास नहीं हो पाता, जिसकी वजह से पैर विकृत या विकलांग हो जाते हैं। ऐसे बच्चों को जन्म के तुरंत बाद पहचाना जा सकता है, जिन अस्पतालों में क्लबफुट का इलाज उपलब्ध वह इसे जन्म के बाद ही शुरू कर देते हैं। जबकि विशेषज्ञों की सलाह पर क्लब फुट सोसाइटी से भी संपर्क कर इलाज कराया जा सकता है। 

चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय,दिल्ली के आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. अनिल अग्रवाल ने बताया कि इलाज के लिए टीनोटॉमी विधि से बच्चों को विशेष तरह का प्लास्टर चढ़ाया जाता है, इसके बाद विशेष जूतों की सहायता से पैरों को सही एंगल (40 डिग्री) दिया जाता है। पूरी तरह ठीक होने पर 10 से 12 साल का समय लगता है। एम्स सहित दिल्ली के सात सरकारी अस्पतालों में क्लब फुट का इलाज किया जाता है। क्योर इंटरनेशनल के डॉ. संतोष जार्ज ने बताया क्लबफुट के दिल्ली में बीते तीन साल में 2100 बच्चों का इलाज किया जा चुका है, जबकि अब तक देश भर में 4000 बच्चें सही हो चुके हैं। जबकि वर्ष 2008 से पहले ऐसे बच्चों को विकलांगों की श्रेणी में रखा जाता था। 

क्या है टीनोटॉमी 
बच्चों की एड़ी को सही एंगल देने के लिए टीनाटॉमी के बाद प्लास्टर चढ़ाया जाता है, इसके लिए डॉक्टर एड़ी में हल्का कट लगाते हैं, विकृत 90 डिग्री के एंगल के पैरों में टीनाटॉमी की जरूरत अधिक होती है। कई बार
बच्चों को एक पैर में विकलांगता की शिकायत होती है, जबकि कभी दोनों पैरों में विकलांगता होती है। टीनोटॉमी के बाद विशेष तरह के जूतों (स्पीन्ट) से विकृति को दूर करते हैं। प्रक्रिया में बच्चों की बोन ग्राफ्टिंग नहीं होती है।

कब कहां इलाज 
*चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय - बुधवार 
*दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल- सोमवार 
*महर्षि वाल्मिकी अस्पताल बावाना- गुरुवार 
*लेडी हार्डिग मेडिकल कॉलेज और कलावती सरन बाल चिकित्सालय- बुध व शुक्र 
*सेंट स्टीफेंस अस्पताल- शनिवार 
*सफदरजंग अस्पताल - सोमवार 

नोट- लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में भी क्लबफुट क्योर शुरू किया जा चुका है, सभी केन्द्रों पर बच्चों का निशुल्क इलाज किया जाता है। (हिंदुस्तान,दिल्ली,14 जुलाई,2014)।

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मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

बीएचयू की अल्ज़ाइमर, पार्किंसन और बुढ़ापा नियंत्रक दवाओं को मान्यता मिली

काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) को अल्ज़ाइमर की दवा बनाने का अमरीकी पेटेंट हासिल हुआ है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के आयुर्वेद विभाग को यह अमरीकी पेटेंट हासिल हुआ है।

अल्ज़ाइमर्स बुढ़ापे में होने वाली बीमारी है। इसमें यादाश्त चली जाती है। उम्र बढ़ने के साथ ही इसका दुष्प्रभाव भी बढ़ता जाता है। 

आयुर्वेद विभाग के प्रमुख डॉ गोविंद प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि भारत में परंपरागत रूप से औषधीय गुणों वाले पौधौं से दवा बनाने का काम किया जाता रहा है। इन्हीं परंपरागत औषधियों को आधार बनाकर विभाग ने ब्राह्मी कल्प, वराही कल्प और अम्ल वेतक नाम से अल्ज़ाइमर, पार्किंसन और बुढ़ापे को कम करने वाली दवाएं विकसित की गई हैं। डॉ गोविंद के अनुसार इन तीनों दवाओं का अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की स्टैंडर्ड लैबोरेट्री में परीक्षण कर इन्हें प्रमाणित किया गया है। ब्राम्ही कल्प, वराही कल्प और अम्ल वेतक आयुर्वेदिक दवाओं का अमरीका की फ़ेडरल ड्रग एजेंसी (एफ़डीए) द्वारा मान्य प्रयोगशाला में परीक्षण भी किया गया। 

डॉ गोविंद ने बताया कि इन दवाओं के चिकित्सकीय परीक्षण के लिए चार संस्थानों को अधिकृत किया गया है। ये हैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू), एसआरएम यूनिवर्सिटी, आदेश यूनिवर्सिटी- भटिंडा और जिनोम फ़ाउंडेशन- हैदराबाद। इन चार संस्थानों ने चेन्नई के अरविंद रेमेडीज़ लिमिटेड के साथ इन तीनों दवाओं की ग्लोबल मार्केटिंग के लिए समझौता किया है। अरविंद रेमेडीज़ लिमिटेड अमरीका की फ़ेडरल ड्रग एजेंसी से अनुमति, प्रमाणन और प्रायोजन के साथ सभी ख़र्च वहन करने के लिए सहमत हो गई है। अरविंद रेमेडीज़ लिमिटेड बीएचयू और अन्य सहयोगी संगठनों में दवा के निर्माण के लिए धन उपलब्ध करवाएगी।

डॉ गोविंद कहते हैं कि ये दवाएं अल्ज़ाइमर, पार्किंसन और बुढ़ापे के असर को कम करने के अलावा अवसाद, अनिद्रा और स्मरण शक्ति के कमज़ोर होने पर प्रयोग में लाई जा सकती है। वो दावा करते हैं कि इन दवाओं के प्रयोग का शरीर पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा। डॉ गोविंद कहते हैं कि इन दवाओं के बाज़ार में आ जाने से इन बीमारियों के मरीज़ों और उनके परिजनों को काफ़ी राहत मिलेगी(मनीष कुमार मिश्रा,बीबीसी हिंदी,29 दिसम्बर,2013) 

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मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

सुर से सेहत

स्वस्थ हो या बीमार, शरीर संगीत पर प्रतिक्रिया करता है। म्यूजिक थैरेपी का सबसे खूबसूरत हिस्सा ये है कि इसके लिए चिकित्सक के प्रेस्क्रिप्शन की जरूरत भी नहीं। इस थैरेपी के तहत संगीत की स्वरलहरियां मरीज के शरीर को कई जटिल बीमारियों में राहत देती हैं। अब चिकित्सक भी इसे कॉम्प्लिमेंटरी थैरेपी की तरह अपना रहे हैं। 

हाल के सालों में किसी विशेष चिकित्सकीय मकसद तक पहुंचने के लिए मरीज को संगीत के करीब लाने का चलन बढ़ा है। इसमें संगीत का कोई खास पीस, या फिर कई बार मरीज की पसंद की कोई स्वरलहरी या धुन उसे नियत समय के लिए सुनाई जाती है। विभिन्न शोध भी इसकी पुष्टि कर चुके हैं कि म्यूजिक के पैसिव और एक्टिव फॉर्म गंभीर शारीरिक-मानसिक समस्याओं में मरीज को काफी राहत देते हैं। यही वजह है कि अब कन्वेंशनल इलाज के साथ म्यूजिक थैरेपी को तरजीह दी जा है। मरीज थैरेपिस्ट के साथ मिलकर अपनी जरूरतों और पसंद के आधार पर संगीत का चयन कर सकता है। हालांकि कई कारणों से शास्त्रीय संगीत को तरजीह दी जाती है। थैरेपी के लिए मरीज का संगीत की पृष्ठभूमि से होने की जरूरत नहीं है।  

इन बीमारियों में संगीत करता है मदद 
ऑस्टिस्टिक स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर, सेरिब्रल पाल्सी, लर्निंग डिफिकल्टी, डाउन-सिंड्रोम, कम्युनिकेशन प्रॉब्लम, मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम, न्यूरोलॉजिकल कंडीशन, सेक्सुअल एब्यूज, कैंसर और अन्य बड़ी बीमारियां, एचआईवी एड्‌स, एडिक्शन, जेरिआट्रिक केयर, सुनने में समस्या, गर्भवती स्त्री की देखभाल और डिलीवरी के दौरान की जटिलताएं घटाना आदि। सर्जरी के बाद की रिकवरी में म्यूजिक थैरेपी काफी सहायता करती है। 

हर सुर का अलग-अलग असर 
संगीत के सारे अंग जैसे ताल, धुन और वॉल्यूम शरीर पर अलग-अलग तरह से असर करते हैं। एक मिनट में लगभग ६० से ७० बीट्‌स की ताल को सबसे ज्यादा आरामदायक माना गया है क्योंकि ये दिल की धड़कन से समानता रखती है। इससे एक पेस तेज होना तनाव का कारक होता है, जबकि धीमा होना सस्पेंस पैदा करता है। इसी तरह से संगीत का वॉल्यूम ज्यादा होना भी तनाव बढ़ाता है, जबकि कम वॉल्यूम मस्तिष्क को आराम देता है। शरीर की जरूरत के मुताबिक थैरेपी सेशन प्लान किया जाता है, जो हर दिन से लेकर कुछ दिनों के अंतराल पर भी हो सकता है। एक सेशन आधे से एक घंटे तक चलता है। रोगी की दशा और थैरेपी से हो रहे लाभों के मद्देनजर सेशन्स बढ़ाए या घटाए जाते हैं। पैसिव म्यूजिक थैरेपी गर्भवती स्त्री, दिल के मरीज या बिहैवियरल समस्याओं में दी जाती है। वहीं एक्टिव म्यूजिक थैरेपी न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के अलावा उन बच्चों को दी जाती है, जिन्हें बोलने में समस्या है। इसके अलावा हाइपर-एक्टिव बच्चों में एकाग्रता लाने के लिए इसकी मदद ली जा सकती है।

संगीतमय इलाज़ 
मर्ज के अनुसार इस थैरेपी का पैटर्न, प्रोग्राम और ड्‌यूरेशन बदलता है। किसी खास भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक या शारीरिक समस्या से जूझ रहा व्यक्ति जब थैरेपिस्ट से संपर्क करता है तो जरूरी है कि वो अपने लक्षणों और जरूरतों पर खुलकर बात करे। इसके बाद थैरेपिस्ट प्रभावित व्यक्ति की इमोशनल वेल-बीइंग, शारीरिक स्वास्थ्य, संवाद की क्षमता आदि संगीत पर उसकी प्रतिक्रिया के जरिए जांचता है। अब इस प्रतिक्रिया (म्यूजिकल रेस्पॉन्स) के आधार पर खास प्रोग्राम डिजाइन किया जाता है। 

इसमें संगीत सुनना, गीत या धुन का विश्लेषण करना, गाना कंपोज करना, धुन तैयार करना आदि शामिल हो सकते हैं। म्यूजिक थैरेपिस्ट मरीज को जरूरी निर्देश देता है। व्यक्ति संगीत सेशन्स के दौरान अपने दिमाग में उभर रही छवियों पर बात कर सकता है। अपना पसंदीदा संगीत सुन सकता है। गा या बेसिक वाद्ययंत्र बजा सकता है। हल्का-फुल्का नृत्य कर सकता है। कोई धुन तैयार कर सकता है या फिर बोल लिख उनपर चर्चा कर सकता है। कुछ सेशन्स समान जरूरतों वाले मरीजों के समूह में तो कुछ व्यक्तिगत भी होते हैं। सामूहिक सेशन के दौरान लोग बैकग्राउंड संगीत के साथ आराम कर सकते हैं तो मिलकर कोई परफॉर्मेंस भी दे सकते हैं।

संगीत की जानकारी ज़रूरी नहीं 
म्यूजिक थैरेपी मरीज की सामाजिक, भावनात्मक, शैक्षिक और शारीरिक जरूरतों के मद्देनजर संगीत का व्यवस्थित प्रस्तुतीकरण है। संगीत की आवृति मस्तिष्क और फिर शरीर को प्रभावित करती है, जिससे संबंधित जरूरत की भी पूर्ति होती है। जैसे मरीज का चिकित्सक द्वारा दी जा रही दवाइयों के इन्ग्रेडिएंट्‌स जानना जरूरी नहीं, ठीक वैसे ही म्यूजिक थैरेपी के लिए संगीत की जानकारी जरूरी नहीं। शुद्ध यूनिवर्सल क्लासिकल म्यूजिक, खासकर जिसमें शब्द न हों, कारगर साबित होता है। संगीत स्वस्थ व्यक्तियों के लिए चमत्कारी भी साबित हो चुका है इसलिए बहुत से लोग स्वास्थ्य बरकरार रखने के लिए भी म्यूजिक थैरेपी लेने लगे हैं। तनाव, अवसाद, अनिद्रा, माइग्रेन, डर और दर्द घटाने में इसका उपयोग होता है। यह बच्चों में एकाग्रता और याददाश्त बढ़ाने में मददगार है। गर्भवती महिलाओं को शुरुआत में थैरेपी देना न सिर्फ नार्मल डिलीवरी की संभावना बढ़ाता है, बल्कि भ्रूण के विकास में भी सहायक होता है। आने वाले शिशु में कॉग्निटिव पहलुओं के अलावा सौंदर्यबोध का भी विकास होता है। कुछ ही थैरेपी सेशन्स के भीतर मरीज खुद में सकारात्मक बदलाव महसूस कर सकता है। 

दिनचर्या हो म्यूजिकल 
म्यूजिक थैरेपी कई तरह की बीमारियों में कॉम्प्लिमेंटरी थैरेपी की तरह मरीज को राहत देती है। पेन-मैनेजमेंट में कारगर है। साथ ही इसे रुटीन में भी शामिल किया जा सकता है। संगीत तनाव घटाकर शारीरिक रिलेक्सेशन में मदद करता है। खासकर "स्ट्रेस रिलीफ एक्टिविटीज" जैसे योग, व्यायाम, स्नान के दौरान संगीत सुनना तनाव घटाकर आसपास को सकारात्मक ऊर्जा से भरने में मददगार साबित हो चुका है। हालांकि विभिन्न गतिविधियों के दौरान संगीत के अलग-अलग फॉर्म फायदेमंद होते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर आप अनिद्रा के शिकार हैं और आपको फास्ट म्यूजिक पसंद है तो कम से कम सोते वक्त इसे अवॉइड करना ही बेहतर है। यानी हर समस्या के अनुसार बेस्ट म्यूजिक और सुनने की स्ट्रेटजी एक सी नहीं रहती(डॉ. टी. मैथिली,सेहत,नई दुनिया,फरवरी द्वितीयांक 2013)।

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बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

वज़न,माइग्रेन,उच्च-रक्तचाप और डायरिया के लक्षणों पर ग़ौर करें

अक्सर यह देखा जाता है कि किसी मरीज की बीमारी, मुख्य समस्या न होकर किसी अन्य बीमारी का लक्षण मात्र होती है। इसे ‘शेडो डिजीज’ भी कहा जाता है। माइग्रेन और दिल की बीमारी का सम्बन्ध इसका उदाहरण है। आइए जानते हैं ऐसी कुछ बीमारियों के बारे में, जो किसी अन्य गंभीर बीमारी का इशारा भर हो सकती हैं-

वजन कम होना 
किस ओर है इशारा-डायबिटीज, कैंसर, लिवर या थॉयराइड संबंधी समस्या का लक्षण अचानक आपका वजन बहुत कम हो गया है। आप कहेंगे वजन कम होना तो अच्छी बात है। लेकिन, कम समय में ही बहुत ज्यादा वजन कम होना चिंता का विषय है। यह किसी अन्य बीमारी का संकेत हो सकता है। इसे नजरअंदाज न करें। डॉक्टर से संपर्क करें और अपने वजन के अचानक कम होने का कारण जानें। अचानक वजन कम होने के पीछे डायबिटीज और लिवर की समस्या हो सकती है। यह भी हो सकता है कि आपको थॉयराइड या कैंसर की परेशानी हो। तो, ऐसे में देर करने की बिलकुल जरूरत नहीं। 

कैसे करें बचाव 
अपनी जांच करवाएं और डॉक्टरी सलाह के आधार पर अपनी जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव लाएं। संतुलित आहार लें, नियमित व्यायाम करें। 

माइग्रेन 
किस ओर है इशारा- स्ट्रोक और हार्ट अटैक का खतरा कामकाजी भागदौड़ में माइग्रेन को अक्सर आम तकलीफ मान लिया जाता है। इसके लिए कोई भी आम दर्द निवारक गोली खाकर हम मान लेते हैं कि समस्या का समाधान हो गया, जबकि ऐसा है नहीं। अगर आपको नियमित तौर पर माइग्रेन का अटैक आता रहता है तो इसे हल्के में लेने की गलती न करें। इस सिर दर्द के तार हृदय संबंधी रोग का इशारा हो सकते हैं।

कैसे करें बचाव 
हालांकि, अभी तक माइग्रेन से दिल पर पड़ने वाले असर को रोकने के संबंध में ज्यादा कामयाबी नहीं मिल पायी है। लेकिन, आप अपने दिल को स्वस्थ रखने का प्रयास जरूर कर सकते हैं। साथ ही आपको चाहिए कि आप अपने आहार में आवश्यक बदलाव लाएं। व्यायाम भी काफी मदद कर सकता है। शराब, धूम्रपान से तौबा करना ही आपके लिए मुफीद रहेगा। इससे न सिर्फ दिल तंदुरुस्त रहेगा, बल्कि आप अन्य कई तकलीफों से भी बचे रहेंगे।

उच्च रक्तचाप 
किस ओर है इशारा- कहीं आपको डायबिटीज तो नहीं ऐसा जरूरी नहीं है कि हर डायबिटीज वाले मरीज को हाई ब्लड प्रेशर हो या हर बीपी वाले मरीज को डायबिटीज हो। लेकिन उच्च रक्त चाप वाले मरीज को डायबिटीज होने की आशंका अधिक होती है। मौजूदा जीवनशैली में हाई ब्लड प्रेशर लोगों में तेजी से आम समस्या बनता जा रहा है। इस बीमारी की मुख्य वजह हमारी बिगड़ी हुई जीवनशैली ही है। भोजन को लेकर अनियमितता बरतना, नींद पूरी न होना आदि ही इस बीमारी की मुख्य वजहें हैं। 

कैसे करें बचाव 
उच्च रक्तचाप की शिकायत है तो फौरन डायबिटीज की भी जांच करवाएं। आप डायबिटीज या उसके प्रभावों को जीवनशैली में जरूरी बदलाव लाकर कम कर सकते हैं। 

डायरिया 
किस ओर है इशारा- कहीं पित्ताशय की बीमारी तो नहीं अगर आप लंबे समय से दस्त से परेशान हैं तो आपको फौरन अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। हो सकता है कि आप पूरी तरह स्वस्थ हों, लेकिन यह भी हो सकता है कि यह कैंसर या पित्ताशय से जुड़ी किसी बीमारी के कारण हो। 

कैसे करें बचाव 
साफ-सुथरी जगह पर ही भोजन करें। अल्कोहल और धूम्रपान के सेवन से दूर रहें। सेहतमंद जीवनशैली अपनाएं(सरोज मल्होत्रा,हिंदुस्तान,नई दिल्ली,31.1.2013)।

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बुधवार, 30 जनवरी 2013

इलाज़ के लिए ई-मदद

एम्पावर्ड, इनफार्म्ड और इंगेज्ड- ये कुछ गुण हैं ई-पेशेंट्‌स के। बीते तीन-चार सालों के भीतर एक नई ऑनलाइन बिरादरी तेजी से बढ़ी है, जो किसी खास मेडिकल कंडीशन के बारे में जानकारियां इकट्ठी करने के लिए इंटरनेट खंगाल रही है। इन्होंने पेशेंट कम्युनिटीज भी बना रखी हैं, जिसमें वे एक-दूसरे की वर्चुअल मदद नॉन-प्रोफेशनल ढंग से करते हैं। 

स्वास्थ्य से संबंधित ज्यादा से ज्यादा जानकारियां एकत्र करने के लिए मरीज अब सिर्फ चिकित्सकों पर निर्भर नहीं, बल्कि वे हेल्थ-कंज्यूमर के रूप में इंटरनेट की मदद ले रहे हैं। इंटरनेट कंज्यूमर्स की इस श्रेणी में मरीज खुद अपनी बीमारी के बारे में पढ़ रहा और चिकित्सक से इसकी चर्चा कर रहा है। इसके अलावा मरीज के दोस्त, परिचित, रिश्तेदार यानी ई-केयरगिवर भी इस श्रेणी में शामिल हैं, जो स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां इंटरनेट से ले रही हैं। कई तरह की बीमारियों की जानकारियां एक क्लिक पर उपलब्ध हैं और सपोर्ट ग्रुप भी बने हुए हैं। इसमें एडिक्शन, एड्‌स, एल्जाइमर्स, स्लीप डिसऑर्डर, डाइबिटीज और कैंसर से लेकर मानसिक स्वास्थ्य की विभिन्ना अवस्थाएं भी शामिल हैं। 

इस तरह की ऑनलाइन हेल्थ रिसर्च से मुख्यतः दो तरह के बदलाव दिख रहे हैं, बेहतर स्वास्थ्यगत जानकारियां व सुविधाएं और चिकित्सकों के साथ अलग तरह का संबंध, हालांकि जरूरी नहीं कि ये संबंध सकारात्मक ही हों। कई चिकित्सक जानकार मरीज को सकारात्मक ढंग से लेते हैं और मानते हैं कि इससे वे डॉक्टर को अपनी तरह से सपोर्ट ही कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ चिकित्सक इससे इत्तेफाक नहीं रखते।

ऑनलाइन सपोर्ट 
बीमारियों के अनुसार इनकी अलग-अलग कम्युनिटीज बनी हुई हैं। बीमारी की प्रकृति के अनुसार मरीज या केयरगिवर ही इन्हें बनाते हैं ताकि किसी खास मर्ज से जुड़ी नए शोध, फाइंडिंग्स या सुविधाओं की जानकारियों का आदान-प्रदान कर सकें। कम्युनिटी में लोग जुड़ते हैं और एक-दूसरे की मदद भी करते हैं। फिजिकल इलनेस के अलावा बहुत सी कम्युनिटीज मानसिक स्वास्थ्य पर भी केंद्रित हैं। 

इसके फायदे 
मरीज और केयरगिवर स्वीकार करते हैं कि ऑनलाइन हेल्थ कम्युनिटीज के कारण उनके स्वास्थ्य पर कई तरह से सकारात्मक असर हुआ है। इसमें सबसे बड़ा फायदा वे गिनाते हैं कि इंटरनेट की मदद से स्वास्थ्य के बारे में अपनी उत्सुकताएं वे शांत कर पा रहे हैं। खासकर ऐसी स्थिति में जब डॉक्टर्स मरीज को बहुत कम समय देते हैं, इंटरनेट और हेल्थ कम्युनिटीज में वे अपने बहुत से सवालों के जवाब ढूंढ पा रहे हैं। 

एक्टिव हुए मरीज 
यदि मरीज और उसका परिवार इंटरनेट फ्रैंडली हैं और साथ ही वे अस्पताल स्टाफ और प्रबंधन से भी उम्मीद करने लगे हैं कि वे भी नेट-फ्रैंडली हों। अस्पतालों की वेबसाइट का प्रबंधन देखकर भी ये ई-मरीज अपने लिए अस्पताल चुन रहे हैं। तकनीक के जरिए ऐसा होना एक मेडिकल क्रांति के रूप में भी देखा जा रहा है। पार्टिसिपेटरी मेडिसिन को मेडिकल केयर के खास मॉडल के रूप में तवज्जो दी रही है यानी इसमें मरीज की भूमिका पैसिव न होकर एक्टिव है। इसमें मरीज किसी रोग के ट्रीटमेंट को बेहतर और सफल बनाने में चिकित्सक की मदद करता है। 

कनेक्शन बनाएं,मदद पाएं 
ऑनलाइन सपोर्ट ग्रुप के जरिए किसी क्रॉनिक इलनेस से गुजर रहे मरीज आपस में अपनी समस्याएं और जानकारियां शेयर करते हैं। खासकर सोशल साइट्‌स पर ऐसी कम्युनिटीज की सफलता का अंदाजा इसमें शामिल हो रहे लोगों को देखकर सहज ही लगाया जा सकता है। इसकी मदद से मरीज अपने जैसे लोगों से बातचीत करते हुए खुद को बेहतर महसूस करता है। किसी खास हेल्थ कनसर्न को लेकर यह ग्रुप कोई भी बना सकता है। कई बार मरीज खुद के बारे में बात करते हुए नर्वस हो सकते हैं, ऐसे में शुरुआत सुनने से करें। धीरे-धीरे अपने अनुभव बांटे लेकिन याद रखें कि सपोर्ट ग्रुप किसी मेडिकल केयर का विकल्प नहीं है।

कुछ विशेष असर 
१. बीमारी से इलाज से जुड़े निर्णय में चिकित्सक के साथ एक्टिव पार्टिसिपेशन 
२. पढ़कर या दूसरे मरीजों के अनुभवों के आधार पर स्वास्थ्य की देखभाल 
३. लक्षणों के आधार पर चिकित्सकों से सवाल और सेकंड ओपिनियन लेना 

ऐसी कुछ कम्युनिटीज बनाने का आधार 

-किसी बीमारी विशेष पर केंद्रित 
-मरीजों पर केंद्रित 
-बीमारी की खास अवस्था पर 
-सपोर्ट ग्रुप्स पर आधारित 

जुड़ने के फ़ायदे 
ये न सिर्फ देश, बल्कि दुनियाभर में फैले होते हैं इसलिए इसमें एक ही बीमारी के सारे लक्षण, विविध अनुभव और विभिन्न चिकित्सकों के इलाज का विवरण ग्रुप में बांटते हैं। इसमें शामिल हुए मरीज जो पहले अपने अनुभवों की यूनीकनेस के कारण खुद को आइसोलेट महूसस करते हैं, वे अनुभवों का मिलान कर पाते हैं, जो उन्हें मनोवैज्ञानिक राहत देता है। समूह के चुनिंदा फायदों में अनुभव शेयर करना, एक-दूसरे को भावनात्मक सहारा देना, अकेलापन, तनाव और अवसाद कम होना, कोपिंग स्किल और सेंस ऑफ एडजस्टमेंट में बढ़ोत्तरी, इलाज के विकल्पों के बारे में प्रैक्टिकल सलाह मिलना और रिसोर्सेज, चिकित्सकों और अल्टरनेटिव विकल्पों की तुलनात्मक स्टडी का मौका आदि शामिल हैं। 

ग्रुप ज्वाइन करने से पहले 
हर ग्रुप के अपने फायदे और नुकसान हैं इसलिए किसी सपोर्ट ग्रुप से जुड़ते वक्त एडमिन से कुछ सवाल करें, जैसे- 
१. क्या इसका कोई मीटिंग शेड्‌यूल है 
२. क्या अनौपचारिक मुलाकात (वर्चुअल) संभव है 
३. क्या ग्रुप से कोई प्रोफेशनल भी जुड़ा हुआ है 
४. क्या ग्रुप की बातचीत गोपनीय है 
५. क्या यह किसी खास सांस्कृतिक जरूरत को भी पूरा करता है 
६. अपनी पर्सनल जानकारियां जैसे नाम, पता आदि यहां शेयर न करें 
७. किसी उत्पाद या चिकित्सा के विज्ञापन से सावधान रहें 

ऐसे खोजें सपोर्ट ग्रुपः 
१. ग्रुप की खोज में चिकित्सक, नर्स, बीमारी पर काम कर रहे सोशल वर्कर या मनोवैज्ञानिक की मदद लें। 
२. इंटरनेट, कोई हेल्थ-जर्नल खंगालें या कम्युनिटी सेंटर पर संपर्क करें। 
३. दूसरों से बातचीत करके जानें कि कोई और इसी अवस्था में तो नहीं 
४. रोग या उसकी किसी अवस्था पर काम कर रहे स्टेट या नेशनल ऑर्गेनाइजेशन की वेबसाइट देखें। 
५. सामान्यतः चैट रूम, ब्लॉग या सोशल नेटवर्किंग साइट्‌स पर सपोर्ट ग्रुप्स की जानकारी मिल जाती है।

सपोर्ट ग्रुप के फ़ायदे 
ई-मदद लेने वाले मरीज आमतौर पर जानते हैं कि हम क्या कह रहे हैं या मरीज किस हालत में है। ऐसे में उनका रवैया इलाज में सहयोग ही करता है। ऐसा कम ही मामलों में देखा गया है कि जानकारियों के साथ वे आक्रामक हो जाएं या चिकित्सक पर हावी होने का प्रयास करें। हालांकि कई बार ऐसा भी होता है कि वे पढ़कर खुद ही कोई इलाज सजेस्ट करने लगें, तब उन्हें कनविंस करना मुश्किल होता है। मरीज या केयरगिवर का सपोर्ट ग्रुप से जुड़ना बहुत ही फायदेमंद है। लांग-टर्म इलनेस में कई बार छोटी-छोटी बातों के लिए चिकित्सक से संपर्क कठिन होता है। ऐसे में सपोर्ट ग्रुप के अनुभवी सदस्य काफी मददगार साबित होते हैं(डॉ. राकेश शुक्ला,सेहत,नई दुनिया,जनवरी द्वितीयांक 2013)।

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सोमवार, 31 दिसंबर 2012

इस साल की महत्वपूर्ण चिकित्सीय उपलब्धियां

पता चली आँतों में कैंसर की वजह 
ब्रितानी शोधकर्ताओं का मानना है कि उन्होंने कुछ लोगों में आनुवांशिक रूप से आंत का कैंसर होने की वजह का पता लगा लिया है. 

शोधकर्ताओं ने ऐसे दो जीन खोज निकाले हैं जो माता-पिता से उनके बच्चों तक पहुंचते हैं जो ट्यूमर होने का खतरा बढ़ा देते हैं. ये शोध 'नेचर जेनेटिक्स' नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ है जिसमें ऐसे 20 लोगों के डीएनए का विश्लेषण किया गया जिनके आंतों का कैंसर वंशानुगत रूप से मिला है. 

इस शोध की मदद से ऐसे टेस्ट को विकसित किया जा सकता है जो किसी व्यक्ति में आंत के कैंसर की आशंका समय रहते जता सकता है.अध्ययन में शामिल हैम्पशयर के जोए वीगेंड नामक एक व्यक्ति को आंत के कैंसर के बारे में तब पता जब वे 28 वर्ष के थे. इसकी वजह से उनके मलाशय का ज्यादातर हिस्सा निकालना पड़ा.प्रोफेसर इयान टॉमलिन्सन कहते हैं कि इस तरह के लोगों को नियमित रूप से अपनी जांच कराने की जरूरत है. कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर रिचर्ड हॉलस्टन कहते हैं कि इस शोध के नतीजे बेहद अहम हैं जिनसे आंतों के कैंसर की वजह पर रोशनी पड़ती है. 

लेकिन कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट की ही डॉक्टर जूलिन का मानना है कि कैंसर के मरीजों के लिए ये एक और पहेली ही है. वे कहती हैं कि इस शोध की मदद से चिकित्सक उन परिवारों के लोगों को बचा सकते हैं जिनमें आंत का कैंसर आनुवांशिक रूप से होता रहा है, लेकिन इसके लिए कैंसर के बारे में समय रहते पता चलना बेहद जरूरी है(बीबीसी,26.12.12). 

बांझपन का इलाज 
इस वर्ष हुए एक प्रयोग के तहत चूहे और ह्यूमन ओवरीज से ऊगोनियल स्टेम सेल अलग की गईं जो मैच्योर ऊसाइट्स में बदलने की क्षमता रखती हैं। इस प्रयोग को इनफर्टिलिटी के इलाज की दिशा में महत्वपूर्ण माइलस्टोन माना जा रहा है। 

एचआईवी पर प्रहार 
पहली बार जेनेटिक इंजीनियरिंग से स्टेम सेल बनाए गए, जो एचआईवी पर प्रहार करते हैं। पशुमॉडल में जीवित ऊतकों में वाइरस को नियंत्रित करने में ये सेल प्रभावी रहे हैं। यह प्रयोग यूनिवसिर्टी ऑफ लॉस एंजलस के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया। आशा है एचआईवी प्रभावित लोगों को बीमारी से राहत मिल सकेगी। 

मिलेगी रोशनी 
साल की शुरुआत में "द लैंसेट" में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया एंड लॉस एंजलस की ओर से प्रकाशित एक लेख के अनुसार दो दृष्टिहीन महिलाओं की देख सकने की क्षमता में काफी विकास देखा गया, जब उन्हें स्टेम सेल के रेटिनल इंजेक्शन दिए गए(सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर,2012 द्वितीयांक)। 

भ्रूणों के लिए जीनोम सिक्वेंसिंग : 
सिएटल में युनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के अनुसंधानकर्ताओं ने जून में मां के रक्त में तैरने वाले डीएनए के टुकड़े का इस्तेमाल कर एक पूर्ण भ्रूण सम्बंधित जीनोम की सफल सिक्वेंसिंग की घोषणा की। पूर्व की तकनीकों के विपरीत यह पूरी तरह गैरआक्रामक है और आने वाले शिशु को इससे कोई खतरा नहीं पैदा होता। वैज्ञानिकों ने कहा कि यह परीक्षण मात्र पांच वर्षों में चिकित्सकीय उपयोग के लिए उपलब्ध हो सकता है। इससे गर्भ में पल रहे शिशु की सेहत का बेहतर देखरेख किया जा सकता है(हिंदुस्तान,दिल्ली,26.1212)।

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गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

रोग की पहचान के लिए वेगाटेस्ट

वेगाटेस्ट एक कंप्यूटराइज्ड इलेक्ट्रो डर्मल स्क्रीनिंग (सीईडीएस) मशीन है। मूलतः एक्युपंक्चर के सिद्घांत पर काम करने वाली यह मशीन विभिन्ना रोगों के कारण और उनका उपचार भी सुझाती है। एक बैंक मैनेजर को एकाएक दोनों लोअर लिंब्स में कमजोरी की शिकायत हुई। समस्या बढ़ने पर कई तरह के उपचार के बाद वेगाटेस्ट के जरिए जांच में सामने आया कि लिंब्स में कमजोरी का कारण मस्कुलर है, जिसकी वजह मर्करी टॉक्सिसिटी है। परीक्षण के दौरान पाया गया कि मरीज के दांतों में मर्करी फिलिंग्स हैं और चिकित्सक ने इसे हटाने की सलाह दी। कुछ समय बाद मरीज को गंभीर किडनी और लीवर इंफेक्शन की समस्या हुई, जिसकी वजह पुनः मर्करी इनटाक्सिकेशन पाई गई, जो कि मरीज के दांतों से मर्करी फिलिंग्स न हटाने की वजह से हुई। इसी तरह के कई अन्य केस हैं, जिसमें एक्युपंक्चर के सिद्घांत पर काम करने वाली मशीन रोग की पहचान और उसका निदान सुझाती है। इस मशीन की सहायता से एक एक्युपंक्चर पाइंट से ३,००० से भी ज्यादा एलर्जी टेस्ट किए जा सकते हैं। इस तरह से फंक्शनल गड़बड़ियों को जांचते हुए वेगाटेस्ट यह भी बताता है कि कौन सी थैरेपी मरीज के लिए सबसे बेहतर हो सकती है।

क्रानिक बीमारियों के कई कारण हैं, जिसमें बैक्टीरियल, फंगल, वाइरल के अलावा विभिन्ना कारकों से एलर्जी, मेटल टाक्सिसिटी, जियोपैथी स्ट्रेस, साइको स्ट्रेस, हार्मोनल असंतुलन और किसी पोषक तत्व की कमी भी बड़ी भूमिका रखती है। इसके अलावा इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक प्रदूषण भी एक बड़ा कारण है, जिसकी जांच वेगाटेस्ट के द्वारा ही संभव है। इस मशीन से जांच के दौरान कोई एक्युपंक्चर पाइंट चुना जाता है और इसे पेन इलेक्ट्रोड से स्पर्श किया जाता है। यह इलेक्ट्रोड बीमारी की सूचना और इसके कारण तुरंत मशीन तक ले जाती है(डॉ. निलेश पटेल,सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर,2012 प्रथमांक)।

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मंगलवार, 28 अगस्त 2012

कई रोगों का इलाज़ हो रहा है फोटोथैरेपी से

फोटोथैरेपी त्वचा संबंधी परेशानियों में लाभकारी हो सकती हैं। अब विशेषज्ञ रोशनी का उपयोग विभिन्न रोगों के इलाज के लिए कर रहे हैं। इन दिनों स्ट्रोक, मुँह की दुर्गंध और कैंसर जैसे रोगों के इलाज के लिए भी रोशनी को उपयोग में लिया जा रहा है। शुरूआत में त्वचा रोग विशेषज्ञ लाइट थैरेपी का उपयोग सोराइसिस के इलाज के लिए करते थे। इसके बाद सर्दी के मौसम में होने वाले सीज़नल डिप्रेशन के उपचार के लिए भी इसका उपयोग किया गया। अब विभिन्न तकलीफों में राहत के लिए लाइटथैरेपी का इस्तेमाल किया जा रहा है।

कमर दर्द 
कमर दर्द से निजाद दिलाने के लिए चिकित्सक नीली रोशनी का उपयोग कर रहे हैं। सफेद रोशनी के बिखरने पर इसके सात अलग-अलग रंगों को देखा जा सकता है। नीली रोशनी बहुत शक्तिशाली होती है, यह ऊतकों को नुकसान पहुँचााए बिना शरीर पर प्रभाव डालती है। इसीलिए इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के उपचार के लिए किया जा रहा है। युनिवर्सिटी हॉस्पिटल ऑफ हेडिल्बर्ग के चिकित्सकों ने नीली रोशनी उत्सर्जित करने वाला पैच विकसित किया है। इस पैच को दर्द की मदद से चिकित्सक दर्द का उपचार कर रहे हैं। 

यह पद्धति शुरूआती अध्ययनों पर आधारित है जिनमें यह सामने आया था कि रोशनी से शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड का उत्पादन बढ़ता है। नाइट्रिक ऑक्साइड माँसपेशियों के तनाव को दूर करता है। इससे रक्त धमनियाँ चौड़ी हो जाती है जिससे रक्त संचार बेहतर होता है। हेडिल्बर्ग में पैच पर अध्ययन जारी है, नई ट्रायल में १४ दिनों में पैच का उपयोग ५ बार किया जाएगा। मरीज़ों को इसे हर बार आधे घंटे के लिए लगाया जाएगा। अमेरिका में रोशनी के ज़रिए ओस्टियोआर्थ्राइटिस के कारण घुटने में होने वाले दर्द का इलाज खोजा जा रहा है। एक अन्य शोध से सामने आया कि कंधे का दर्द दूर करने के लिए फोटोथैरेपी असरदार है, वो भी बिना किसी दुष्प्रभाव के।  

पेट के छाले 
पेट के छालों के इलाज के लिए एक ऐसा उपकरण मददगार हो सकता है जिसके ज़रिए पेट के अंदर तक नीली रोशनी पहुँचाई जा सके। इस रोशनी के प्रभाव से अल्सर के लिए ज़िम्मेदार बैक्टीरिया नष्ट होने लगते हैं। यह तकनीक पेट के कैंसर के इलाज में भी फायदेमंद हो सकती है। अध्ययन बताते हैं कि प्रभावित हिस्से पर एक घंटे से भी कम समय के लिए यदि नीली रोशनी डाली जाए तो यह हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने के लिए पर्याप्त होती है। ख़ास बात यह है कि इससे बैक्टीरिया तो नष्ट हो जाता है लेकिन शरीर के स्वस्थ ऊतकों पर कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है। यह नया उपकरण हाल ही में विकसित किया गया है और इसपर शोध-अध्ययन व ट्रायल जारी हैं। अमेरिका में हुए शोध बताते हैं कि इस इलाज के बाद बैक्टीरिया की संख्या में ९१ प्रतिशत तक की कमी देखी गई है।

मिर्गी 
मिर्गी के उपचार के लिए फोटोथैरेपी को विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। जिन मरीज़ों को मिर्गी-रोधी दवाओं से ख़ास फायदा नहीं होता है, उनके लिए फोटोथैरेपी फायदेमंद साबित हो सकती है। युनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में हुई एक ट्रायल में मिर्गी के मऱीजों को तीन महीने तक रोज़ ३० मिनिट के लिए लाइट-बॉक्स से एक्सपोज़ किया गया। इस लाइट बॉक्स से तेज़ सफेद रौशनी निकलती है। मिर्गी का यह उपचार पहले हुए शोध-अध्ययनों पर आधारित है जिससे यह पता चलता है कि जिन दिनों में बादल छाए रहते हैं, तब मरीज़ों को मिर्गी के दौरे अधिक पड़ते हैं। जिन दिनों में तेज़ धूप निकलती है, तब मरीज़ों को कम दौरे पड़ते हैं। कुछ वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि तेज़ रोशनी के प्रभाव से विटामिन-डी और मेलाटोनिन आदि का स्तर बढ़ जाता है जिससे दिम़ाग में दौरों को नियंत्रित करने वाले रसायन स्त्रावित होने लगते हैं।

घाव  
मधुमेह रोगियों के पैरों में बने गंभीर घाव, अधिक दबाव पड़ने पर बनने वाले घाव व अन्य प्रकार के गंभीर घावों के इलाज के लिए लाइट थैरेपी असरकारी है। स्टॉकहोम में हुए इस शोध अध्ययन के अनुसार लाल रोशनी और इंफ्रारेड रोशनी के कॉम्बिनेशन से घाव तेज़ी से भरते हैं। इससे प्रेशर अल्सर ५४ प्रति तेज़ी से ठीक हो गए थे। प्रेशर अल्सर का ९० प्रतिशत हिस्सा केवल ५ हफ्तों में ही भर गया था। जिन मरीज़ों को लाइट थैरेपी नहीं दी गई थी, उनमें घाव भरने के लिए ९ हफ्तों का समय लगा था। 

मुँह की दुर्गंध  
जेरूसलम की हीब्रू युनिवर्सिटी के डेंटल स्कूल के अध्ययनकर्ताओं ने एक शोध में पाया कि नीली रोशनी से मुँह की दुर्गंध को कम किया जा सकता है। दंत चिकित्सक अक्सर दाँतो को सफेद बनाने के लिए इन पर दो मिनिट तक नीली रोशनी डालते हैं। नीली रोशनी न सिर्फ दाँतों को सफेद बनाती है बल्कि थूक में मौजूद दुर्गंधकारी बैक्टीरिया भी इससे ख़त्म होते हैं। इसीलिए अब इसे मुँह की दुर्गंध के इलाज के रूप में देखा जा रहा है। अध्ययनकर्ताओं ने थूक के ५० नमूनों पर शोध कर पाया कि इनपर नीली रोशनी डालने पर दुर्गंध काफी कम हो जाती है। उन्होंने पाया कि रोशनी डालने के बाद थूक के नमूनों में दुर्गंधकारी बैक्टीरिया की संख्या काफी कम हो गई थी। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने शोध अध्ययन में पायाका कि नीली रोशनी से मसूड़ों में बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया को ख़त्म किया जा सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह रोशनी मुंह में होने वाले पेरियोडोन्टिस नामक संक्रमण से बचाव और उपचार के लिए भी असरकारी हो सकती है। इस संक्रमण से दांत और हड्डियां क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। 

शोध प्रमुख डॉ. निकोस सूकोज के अनुसार,रोशनी डालने पर मुंह में मौजूद कई नुकसानकारी बैक्टीरिया कुछ सेकेंड्स में ही ख़त्म हो जाते हैं। रोशनी से बैक्टीरिया का सुरक्षा-कवच नष्ट हो जाता है जिससे ये नष्ट होने लगते हैं। 

कैंसर का इलाज़ 
लाइट के उपयोग से कैंसर के इलाज के लिए एक विशेष प्रकार के ट्रीटमेंट का उपयोग किया जा रहा है, इसे फोटो-डायनामिक थैरेपी कहा जाता है। इसका सबसे अधिक उपयोग त्वचा कैंसर के इलाज के लिए किया जाता है। इस ट्रीटमेंट में रौशनी के साथ ही एक विशेष प्रकार के ड्रग का इस्तेमाल किया जाता है। यह ड्रग कैंसर की असामान्य कोशिकाओं को रोशनी के प्रति संवेदशील बनाता है। कैंसर के मरीज़ों को दिए जाने वाले इस ड्रग की विशेषता यह है कि इसे केवल कैंसर की कोशिकाएँ ही अवशोषित करती हैं। 

इसके बाद मरीज़ के प्रभावित हिस्से पर नीली रोशनी डाली जाती है। रोशनी के प्रभाव में कैंसर कोशिकाओं द्वारा अवशोषित यह ड्रग एक विशेष प्रकार की ऑक्सीजन उत्सर्जित करने लगता है, जिससे कैंसर की कोशिकाएँ मरने लगती हैं। यह ट्रीटमेंट ट्यूमर को सिकोड़ने और नष्ट करने के लिए प्रभावी है। शरीर के भीतरी हिस्सों में मौजूद कैंसर के लिए ऑप्टिक फाइबर द्वारा रोशनी को शरीर के अंदरूनी हिस्सों में भेजा जा सकता है(सेहत,नई दुनिया,अगस्त,2012 द्वितीयांक)।

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शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

जानिए,कौन-सी चीज़ किसमें रहती है सुरक्षित

फूड चाहे पका हुआ हो या कच्चा , ढंग से प्रिजर्व न किया जाए तो अपनी शेल्फ लाइफ से पहले ही खराब हो जाता है। अगर आप भी परेशान रहते हैं कि अच्छी दुकान से बेहतर क्वॉलिटी का सामान खरीदने पर भी वह जल्द खराब हो जाता है तो सामान को अच्छी तरह रखने की ट्रिक्स जान लें। फूड को ढंग से प्रिजर्व करने और उनकी लाइफ बढ़ाने के सही तरीकों के बारे में एक्सर्पट्स से बात करके नभाटा के 29 जुलाई,2012 के अंक में पूरी जानकारी दी गुंजन शर्मा ने: 

रश्मि अरोड़ा कुछ महीनों के राशन की खरीदारी एक साथ करती हैं। उनका तर्क है कि एक साथ चीजें खरीदने से दाम सही पड़ते हैं और बार - बार मार्केट जाने से झंझट से भी बच सकते हैं। लेकिन परेशानी यह है कि अक्सर उनमें से बहुत - सी चीजें अपनी शेल्फ लाइफ से पहले ही खराब हो जाती हैं और फेंकनी पड़ती हैं। इससे रश्मि को बचत की जगह चपत लग जाती है। अगर खाने की चीजों को ढंग से संभाल कर रखें तो आप ऐसी स्थिति से बच सकती हैं और खाने की शेल्फ लाइफ को बढ़ा सकती हैं। चीजों की पैकिंग डेट और एक्सपायरी डेट के बीच की अवधि को शेल्फ लाइफ कहते हैं , यानी जिस दौरान चीजें सही बनी रहती हैं। 

बिना पका सामान 
( रॉ फूड ) चावल , दालें , छोले , राजमा , चने 

किस कंटेनर में रखें : एयरटाइट डिब्बे में 

सबसे बेहतर : कांच और प्लास्टिक का जार 

सबसे बेकार : प्लास्टिक शीट वाले पैकेट 

लाइफ कितनी : एयरटाइट डिब्बे में अधिकतम 6 महीने तक 

ऐसे बढ़ाएं शेल्फ लाइफ 
- दालें , राजमा आदि को स्टोर करने से पहले डिब्बे या जार को अच्छी तरह सुखा लें। अगर उसमें नमी होगी तो स्टोर किया गया सामान जल्दी खराब होगा। 

- दालें आदि भरने के बाद डिब्बों को किसी गर्म जगह यानी उस जगह पर न रखें , जहां से वे सीधे गर्मी के संपर्क में आएं। गैस चूल्हे के एकदम ऊपर या साइड में बने सेल्फ में न रखें। 

- ऊपर लिखी चीजों को स्टोर करते वक्त डिब्बों में तेज पत्ता या लौंग डाल सकते हैं। एक किलो में 5 तेज पत्ता , 10 से 12 नीम के पत्ते या 8 से 10 लौंग डाल सकते हैं। इन्हें डिब्बे की सबसे ऊपरी और सबसे निचली लेयर में रखें। ऐसा करने से राजमा , चना , दालें आदि खराब नहीं होंगे और ज्यादा दिनों तक स्टोर करके रखे जा सकेंगे। 

गेहूं 
किस कंटेनर में रखें : मेटल के किसी बड़े बर्तन में या मिट्टी के कंटेनर में। 

सबसे बेहतर : स्टेनलेस स्टील के कंटेनर , ऐल्युमिनियम के कंटेनर भी अच्छे। 

सबसे बेकार : कांच और किसी दूसरी धातु जैसे पीतल आदि से बने कंटेनर। 

लाइफ कितनी : सही तरह से स्टोर करने पर एक साल तक। 

कैसे बढ़ाएं लाइफ 
- गेहूं भरने से पहले कंटेनर को अच्छी तरह धोकर धूप लगाएं। 

- ड्राई और कूल जगह पर स्टोर करें ताकि गेहूं में नमी न आए। 

- घर में ज्यादा मात्रा में गेहूं स्टोर नहीं किया जाता इसलिए स्टोर करते समय उसमें किसी तरह की दवाई डालने की बजाय तेज पत्ता , या नीम के सूखे पत्ते डालें। एक कट्टे में 40 से 50 तेज पत्ते , 30 से 35 नीम के पत्तों वाली छोटी डंडियां डाल सकते हैं। 

- कट्टे को दीवार से सटाकर न रखें क्योंकि बरसात के दिनों में दीवारों में नमी आ जाती है। 

आटा 
किस कंटेनर में रखें : स्टेनलेस स्टील और ऐल्युमिनियम के कंटेनर में। 

सबसे बेहतर : स्टेनलेस स्टील।  

सबसे बेकार : प्लास्टिक का डिब्बा। 

लाइफ कितनी : 5 से 6 महीने। 

- कंटेनर में आटा भरने से पहले उसे अच्छी तरह सुखाएं। थोड़ी - सी भी नमी होने पर उसमें छोटे - छोटे कीड़े पैदा हो जाते हैं। इससे बचने के लिए आटा भरने से पहले कंटेनर की पेंदी में तेज पत्ता , दाल चीनी या नीम के सूखे पत्ते रखें। फिर आटा भरने के बाद ढक्कन लगाने से पहले आटे की ऊपरी लेयर में उन्हें रखें। 

मैदा और बेसन 
किस कंटेनर में रखें : स्टेनलेस स्टील और प्लास्टिक के एयरटाइट डिब्बे में। 

सबसे बेहतर : प्लास्टिक। 

सबसे बेकार : टिन के डिब्बे और बेकार क्वॉलिटी के प्लास्टिक के डिब्बे। 

लाइफ कितनी : 3 से 4 महीने। 

कैसे बढ़ा सकते हैं लाइफ 
अगर इनका रेग्युलर यूज नहीं करते हैं तो इन्हें ज्यादा मात्रा में स्टोर करके न रखें। भरने से पहले डिब्बे को अच्छी तरह सुखा लें। स्टोर करते समय तेज पत्ता और दालचीनी भी डाल सकते हैं। 

मसाले 
किस कंटेनर में रखें : कांच और प्लास्टिक के डिब्बे। 

सबसे बेहतर : प्लास्टिक के एयरटाइट डिब्बे। 

लाइफ कितनी : सही से स्टोर करने पर एक साल तक चल जाते हैं। हालांकि एक साल के बीच में ही हल्दी और लाल मिर्च जैसे मसालों के स्वाद और रंग में थोड़ी कमी आ सकती है लेकिन वे खराब नहीं होते। बेस्ट स्वाद 6 महीने तक रहता है। 

कैसे बढ़ा सकते हैं लाइफ 
- मसालों को ज्यादा मात्रा में खरीदकर स्टोर न करें। 

- खुले में न रखें और स्टोर करने से पहले डिब्बों को सुखा लें। 

- उन्हें गर्मी से बचाकर रखें। फ्रिज , गैस के पास न रखें। 

- खाना बनाते समय मसालों को सीधे डिब्बे से न डालें। चम्मच से डालें। इससे मसालों में भाप और गर्मी नहीं लगेगी और वे जल्दी खराब नहीं होंगे। 

ड्राई फ्रूटस 
किस कंटेनर में रखें : प्लास्टिक और कांच के डिब्बे। प्लास्टिक के जिप लॉक पाउच में भी सही। 

सबसे बेहतर : कांच के कंटेनर , प्लास्टिक के एयरटाइट डिब्बे भी कारगर। 

सबसे बेकार : टिन के डिब्बे और बेकार क्वॉलिटी के प्लास्टिक के डिब्बे। 

लाइफ कितनी : 6 महीने तक। उसके बाद इनके टेस्ट में थोड़ा फर्क ( कड़वापन ) आने लगता है। 

- ड्राई फ्रूटस में फैट होता है। सही से स्टोर न करने पर वे जल्दी खराब हो सकते हैं। गर्मी की वजह से इनमें कीड़े भी पड़ सकते हैं। 

- छह महीने तक तो कांच के कंटेनर , प्लास्टिक के डिब्बे में रख रहे हैं। उसके बाद इन्हें रूम टेंपरेचर पर रखने से उनमें नमी के कारण कड़वापन आ सकता है। 

- ज्यादा समय के लिए रखने हैं तो प्लास्टिक के एयर टाइट जिपलॉक पैकिट में डालकर फ्रिज में रखें। फ्रिजर में न रखें। छिलके वाले बादाम फ्रिज में रखने पर एक साल तक और बिना छिलके के बादाम , काजू , अखरोट आदि 3 महीने तक बेस्ट रहते हैं। 

पका हुआ खाना ( कुक्ड फूड ) 

मिठाइयां 

बेसन से बनी मिठाइयां 
किस कंटेनर में रखें : कांच और स्टील के कंटेनर में। 

सबसे बेहतर : कांच और स्टील बेस्ट। 

सबसे बेकार : ऐल्युमिनियम , टिन और प्लास्टिक। 

लाइफ कितनी : फ्रिज में रखने पर बेसन की सूखी मिठाइयां एक महीना , गीली मिठाई एक हफ्ते तक। 

- एयरटाइट डिब्बे में डालकर फ्रिज में स्टोर करें। 

- मिठाई गत्ते के डिब्बे में आई हो तो उसे निकालकर एयरटाइट डिब्बे में रखें। गत्ते के डिब्बे में ज्यादा देर तक रखने से उसमें महक आ सकती है। 

दूध और खोये की मिठाइयां 
सबसे बेहतर : कांच और स्टील के डिब्बे। 

सबसे बेकार : एल्युमिनियम , टिन और प्लास्टिक। 

लाइफ कितनी : जो मिठाइयां खोए में दूध मिलाकर बनाई गई हों , तो 1 हफ्ता और शुद्ध खोए से बनी 3 हफ्ते तक। 

- एयरटाइट डिब्बे में डालकर फ्रिज में स्टोर करें। 20 दिन तक मिठाई ठीक रहेगी। 

- मिठाई गत्ते के डिब्बे से निकालकर किसी एयरटाइट डिब्बे में रखें। 

अचार 
किस कंटेनर में रखें : सिरामिक ( चीनी मिट्टी के मर्तबान ) और कांच। 

सबसे बेहतर : सिरामिक। 

सबसे बेकार : प्लास्टिक। लाइफ कितनी : लगभग सभी तरीकों के आचारों की लाइफ काफी ज्यादा होती है , सही से प्रिजर्व करने पर दो से तीन साल तक। 

आचार में तेल , नमक और चीनी होती है , जोकि प्रिजर्वेटिव का काम करते हैं। इसलिए इनकी शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए उनमें अलग से कुछ डालने की जरूरत नहीं होती। फिर भी आचार जल्दी खराब न हो , इसके लिए इन बातों का ध्यान रखें
- आचार को सफाई से बनाएं। 

- सभी मसाले सही मात्रा में डालें। जैसे नमक कम होगा तो भी अचार जल्दी खराब होगा। 

- जिस बड़े मर्तबान में कई किलो आचार रखा हो उसमें सीधे हाथ न डालें। रोजाना के इस्तेमाल के लिए बड़े मर्तबान में से छोटे डिब्बे में आचार निकालकर रखें। 

- आचार को आटे से बचाकर रखें। आटे से आचार में फफूंद लग जाता है। 

- बरसाती मौसम में अचार को नमी से बचाकर रखें। 

- आचार को टाइट जार में बंद करके रखें। 

- डिब्बे को दीवार से दूर रखें। बरसाती दिनों में दीवारों में नमी आ जाती है। 

- बार - बार डिब्बे को न खोलें और डिब्बे को ज्यादा देर तक खुला न रखें। - डिब्बे में गीला चम्मच न डालें। - आचार निकालने के लिए हमेशा साफ चम्मच का यूज करें , पहले से इस्तेमाल हुए चम्मच का नहीं।




दूध 
किस कंटेनर में रखें : स्टेनलेस स्टील। 


सबसे बेहतर : स्टील। 


लाइफ कितनी : गर्मियों में पैकेटबंद कच्चा दूध फ्रिज की चिलर ट्रे में दो दिन तक रख सकते हैं। पैक्ड दूध उबालने के बाद फ्रिज में 5 दिनों तक और गाय व भैंस का दूध 3 से 4 दिन तक फ्रिज में रख सकते हैं। सर्दियों में तापमान पहले से ही कम होता है तो सभी तरह का दूध काफी दिन तक चल जाता है। पैकेट बंद दूध फ्रिज के चिलर टे में 1 हफ्ते तक बिना गर्म किए और गाय और भैंस के दूध को उबालने के बाद 3 से 4 दिन तक फ्रिज में रख सकते हैं। 


मदर डेयरी : दूध को बार - बार न उबालें। इससे उसमें मौजूद प्रोटीन कम हो जाते हैं। सर्दी और गर्मी , दोनों में ही दूध को पूरे दिन में सिर्फ एक बार उबालें और ठंडा होने पर उसे फ्रिज में रखें। 


भैंस और गाय का दूधः भैंस या गाय का दूध हैं तो पहले उसे छानें , फिर अच्छी तरह उबालें , क्योंकि यह दूध पॉश्चराइज्ड नहीं होता। ऐसे में इनमें बैक्टीरिया होने का डर रहता है। कभी - कभी दूध में गाय - भैंस के बाल या भूसे के तिनके भी आ जाते हैं , जो नुकसानदेह हो सकते हैं। गाय और भैंस के दूध को सुबह लाने के बाद जल्दी उबाल लें। गर्मियों में 1 घंटे से ज्यादा और सर्दियों में 1 से डेढ़ घंटे से ज्यादा उसे बिना उबाले न रखें। 


- फ्रिज में हर तरह के दूध को ढककर रखें क्योंकि बाकी चीजों की गंध से मिलकर दूध खराब हो सकता है। गर्मियों में इस बात का खास ध्यान रखें। 


रसीले फल 
गर्मियों में मौसमी , संतरे जैसे रसीले फलों के अलावा नीबू का इस्तेमाल ज्यादा होता है। गर्मियों में ऐसे फ्रूट्स का रस जल्दी सूख जाता है। इन्हें फ्रिज में रखें और अगर फ्रिज में जगह नहीं है तो नेट की जाली या छेद वाली टोकरी में रखें। 


केला 
- केलों को इस तरह रखें कि उनमें हवा लगती रहे। वरना वे काले होने के साथ ही गल भी जाएंगे। 


- छेद वाले बर्तन में रखें। 


- फ्रिज में न रखें , वरना काले हो जाएंगे। 


- ऊपर बताए तरीके से स्टोर करने पर गर्मियों में 2 दिन और सर्दियों में 3 दिन तक बढि़या रहते हैं। 


सेब 
- फ्रिज में रखें। फ्रिज में 1 हफ्ते और बाहर 3 से 4 दिन तक ठीक रहते हैं। 


अनार 
- फ्रिज में रखें। फ्रिज में 15 से 20 दिन और बाहर 1 हफ्ते तक बेस्ट रहते हैं। 


जामुन 
- एक के ऊपर एक दबाकर किसी छोटे बर्तन में न रखें। 


- छेद वाले खुले बर्तन में फैलाकर रखें , जिससे उनमें हवा लगती रहे। 


- नमक डालकर न रखें। इससे जामुन गल जाते हैं। 


- इस तरह रखने पर 2 से 3 दिन तक फ्रिज में और 1 दिन बाहर अच्छे रहते हैं। इससे ज्यादा दिन रखने पर गलने लगते हैं। 


फालसे 
- छेद वाले खुले बर्तन में फैलाकर रखें जिससे उनमें हवा लगती रहे। 


- इनमें नमक डालकर न रखें। इससे वे गल जाते हैं। 


- इस तरह रखने पर 2 दिन तक फ्रिज में और 1 दिन बाहर बढि़या रहते हैं। इससे ज्यादा दिन रखने पर गलने लगते हैं। 


क्या है फूड प्रिजर्वेशन 
फूड प्रिजर्वेशन खाने को खराब होने से बचाने और उसकी लाइफ बढ़ाने के लिए किया जाता है। ऐसा करके हम कच्चे और पके , दोनों तरह के खाने को उसमें मौजूद पोषक तत्वों को बरकरार रखते हुए लंबे समय तक यूज कर सकते हैं। 


क्या है फ्रोजन फूड 
फ्रोजन फूड की कैटिगरी में ऐसा खाना आता है , जिसे उस समय के लिए संरक्षित करके रखा जाता है , जब वे प्राकृतिक रूप से उपलब्ध नहीं होते। इन्हें भविष्य में संरक्षित करके रखने के लिए प्रिजर्वेटिव्स का यूज किया जाता है। हर मौसम में किसी भी तरह के खाने का लुत्फ उठाना चाहते हैं तो फ्रोजन फूड अच्छा ऑप्शन है। फ्रोजन फूड इस्तेमाल करने के लिए कुछ बातों को ध्यान में रखना चाहिए। 


- फ्रोजन सब्जियों के लिए फ्रिज का हमेशा चलते रहना जरूरी है।


- अगर आपका फ्रिज बिजली चले जाने से रोजाना 2-3 घंटे बंद रहता है तो फ्रोजन फूड इस्तेमाल न करें। 


- फ्रिज बंद रहने से फूड खराब हो जाता है , जो सेहत के लिए नुकसानदेह साबित होता है। 


फ्रोजन सब्जियां ( सभी तरह की ) 
लाइफ ( खुली या बंद ) : 10 महीने 


लाइफ कैसे बढ़ाएं 
- इन्हें बनाने के समय ही फ्रीजर से निकालें। 


- बचीं हुईं सब्जियों को फ्रीजर बैग में डालकर ही रखें। 


- प्लास्टिक बैग में रखने की बजाय चीनी के बर्तन या एयरटाइट डिब्बे में रखें। 


फ्रोजन फल ( सभी तरह के ) 
लाइफ ( खुले या बंद ) : 6 महीने 


- खाते समय जरूरत के हिसाब से ही इन्हें फ्रिज से निकालें। - बचे फलों को फ्रीजर बैग में डालकर रखें। 


- एक बार बाहर रखे फलों को दोबारा फ्रीजर में न रखें। ऐसे में बैक्टीरिया पैदा होने का डर रहता है। 


फ्रोजन जूस 
लाइफ , पैकिट बंद : 6 महीने , पैकिट खुलने पर : 3 दिन 


- फ्रोजन जूस को भी फ्रिज में रखें। 


- सर्व करते समय ही फ्रिज से निकालें। 


इन बातों का रखें ख्याल 


- फ्रोजन फूड का सही संरक्षण भी जरूरी है। ऐसा नहीं होने पर ये हमारी सेहत को नुकसान पहुंचा सकते हैं। 


- इस्तेमाल करने से पहले इनकी पैकेजिंग चेक कर लें। 


- पैकिंग सही नहीं होगी तो उसमें बैक्टीरिया पैदा होने की आशंका बनी रहती है। 


- फ्रोजन फूड का रोजाना इस्तेमाल न करें। अगर कर रहे हैं तो सही पैकेजिंग वाले प्रॉडक्ट ही खरीदें। 


- अगर खाने के किसी सामान में हवा और पानी जा रहे हैं तो उसमें बैक्टीरिया के पनपने की पूरी गुंजाइश रहती है। कोशिश करें कि इन्हें नॉर्मल पॉलिबैग्स में न रखें। एयरटाइट डिब्बे या फ्रीजर बैग्स में ही रखें। 


- Bread.com के मुताबिक ब्रेड को स्टोर करने की सबसे अच्छी जगह फ्रीजर है। रेफ्रिजरेटर का तापमान ब्रेड को खराब होने से रोकने में कामयाब नहीं होता। 


रेफ्रिजरेटर के यूज में रखें ध्यान 
- फ्रिज में कभी भी खाना बहुत ठूंस कर न भरें। खाने की चीजों के बीच में इतना फासला जरूर होना चाहिए कि सारे फ्रिज में एक जैसा तापमान बना रहे। 


- खाना हमेशा ढक कर रखें। खाने को खुला रखने से उसका मॉश्चर खत्म हता है और फ्रिज के अंदर मौजूद खुश्क हवा खाने को खुश्क करती है। 


- खाने को ढककर रखने से खाने की दूसरी चीजों में मौजूद गंध उसमें नहीं मिल पाती। आमतौर पर तीखी गंध वाली चीजें ( पत्ता गोभी , फूलगोभी , लहसुन आदि ) दूसरे खानों की गंध पर हावी हो जाती हैं।

- खाना बनाने के दो घंटे के अंदर खाना फ्रिज में रख दें। इससे उसमें बैक्टीरिया नहीं पनपेंगे या कम पनपेंगे। 


- फ्रिज में रखने से पहले फल और सब्जियों को धोएं नहीं क्योंकि पानी रहने से वे खराब हो जाएंगी। 


होम टिप्स 
- हरी मिर्च को फ्रिज में रखने से पहले उनकी डंडियों को तोड़ लें। इससे वह लंबे समय तक ताजी रहेंगी। 


- बींस को स्टोर करने से पहले सही से धोया और सुखाया न जाए तो उसमें फंगस जल्दी लगता है , इसलिए उसे पहले अच्छे से धोकर और सुखाकर ही फ्रिज में स्टोर करें। 


- फ्रिज में स्टोर करते समय फलों और सब्जियों को अलग - अलग थैलियों में रखें। फलों से एथलीन गैस निकलती है , जिसके संपर्क में आने से सब्जियों पीली हो सकती हैं। 


- अगर अंडों को एक महीने से ज्यादा स्टोर करना चाहते हैं तो अंडों पर किसी ब्रश की मदद से कुकिंग ऑयल लगाएं। ऐसा करने से अंडे जल्दी खराब नहीं होंगे। 


- पनीर को लंबे समय तक रखना है तो उसे एक बाउल में ताजा पानी भरकर उसमें रखें। हां , पानी को दो दिन बाद फिर से जरूर बदल लें। 


- चीज को फ्रिज में रखने से पहले इसे अच्छी तरह लपेट लें। बेहतर टेस्ट और टेक्स्चर पाने के लिए इसे फ्रिज से निकालकर कर 30-45 मिनट तक कमरे के तापमान पर रखें। 


- ब्रेड के पैकिट बेस्ट फूड ग्रेड पैक्स का काम करते हैं। उनका इस्तेमाल नींबू और हरी मिर्चों को स्टोर करने में कर सकते हैं , इससे वे फ्रेश रहेंगे। पैकेट में रबर बैंड लगाकर रखें। 


- दूध की थैलियों को फेंके नहीं , इनमें फिश , चिकन और मीट रख सकते हैं। ये बेस्ट फूड ग्रेड पैकेट का काम करते हैं। पैकेट में रबर बैंड लगाकर रखें। 


एक्सपर्ट्स पैनल 
नीलांजना सिंह , न्यूट्रिशन कंसल्टेंट , पीएसआरआई हॉस्पिटल , शेख सराय संध्या पांडे , चीफ डायटिशन , कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल , गुड़गांव सीमा शर्मा , डाइटिशन , तीर्थराम शाह चैरिटेबल हॉस्पिटल

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रविवार, 29 जुलाई 2012

कैसे पहचानें फ़र्ज़ी और असली डॉक्टर को?

डॉक्टर और अस्पताल से साबका सबको पड़ता है, लेकिन कौन-से डिपार्टमेंट में किस बीमारी का इलाज होगा, इससे बहुत सारे लोग अनजान होते हैं। ऐसे में कई बार लोग गंभीर परेशानी में भी पड़ जाते हैं। इससे वक्त, पैसा और सेहत, तीनों की बर्बादी हो सकती है। डॉक्टर्स डे के मौके पर हम आपको बता रहे हैं कि अस्पताल के कौन-से डिपार्टमेंट में किस बीमारी का इलाज होता है, असली डॉक्टर की पहचान क्या है और डॉक्टर की लापरवाही पर कहां करें शिकायत। 1 जुलाई,2012 के नभाटा के लिए पूरी जानकारी जुटाई नीतू सिंह ने : 

बात 2003 की है। अध्यापक नगर, नांगलोई के रहने वाले विनोद कुमार की नाक की एक साइड में सूजन आ गई थी। उन्होंने सोचा कि दो-चार दिन में अपने आप ठीक हो जाएगा, मगर ऐसा नहीं हुआ। नाक से खून आने लगा, तो वह केशवपुरम स्थित दिल्ली जल बोर्ड की डिस्पेंसरी में गए। विनोद दिल्ली जल बोर्ड में काम करते हैं। डिस्पेंसरी में ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर ने जांच के बाद विनोद को एम्स रेफर कर दिया। विनोद अगले दिन एम्स की ओपीडी में पहुंचे। विनोद बताते हैं कि डॉक्टर ने देखने के बाद उन्हें फौरन भर्ती कर लिया और बताया कि नाक की सर्जरी करनी होगी। विनोद का आरोप है कि डॉक्टरों ने नाक के बदले गलती से सिर और मुंह का ऑपरेशन कर दिया, जिसके कुछ दिन बाद ही एक आंख भी खराब हो गई। जब डॉक्टर से पूछा कि ऐसा कैसा हो गया तो वह गलती मानने की बजाय विनोद को ही डांटने लगे। 

कुछ दिन बाद विनोद को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया। विनोद के मुताबिक, इसके बाद उनका आधा चेहरा खराब हो गया। एक आंख और नाक का एक तरफ का हिस्सा खत्म हो गया है। लेकिन उसके बाद जब भी विनोद एम्स में गए, उन्हें कह दिया गया कि अब घर जाओ, कुछ नहीं हो सकता या यह कहकर बाहर भगा दिया गया कि जाकर सफदरजंग में इलाज कराओ, यहां जगह नहीं है। सफदरजंग अस्पताल में जाकर उन्होंने इलाज कराने की कोशिश की तो एक महीने तक वह एक डिपार्टमेंट से दूसरे डिपार्टमेंट में भटकते रहे। इतने बड़े अस्पताल में उनकी समस्या का इलाज कहां होगा, इस बात की जानकारी उन्हें कहीं से नहीं मिल पा रही थी। थककर वह वापस एम्स में गए, जहां दोबारा उन्होंने अपनी इलाज की प्रक्रिया शुरू कराई। 

सबसे पहले वह जनरल मेडिसिन डिपार्टमेंट में गए। वहां से ईएनटी डिपार्टमेंट में रेफर किया गया। ईएनटी के डॉक्टर से मिलने का मौका मिलने में ही 15 दिन का समय लग गया। यहां से उन्हें आई सेंटर में रेफर किया गया। वहां जाकर पता लगा कि उनकी आंख तो बिल्कुल खराब हो चुकी है, पर बिगड़े हुए चेहरे को थोड़ा बेहतर बनाया जा सकता है। इसके लिए उन्हें दोबारा सफदरजंग अस्पताल के बर्न व प्लास्टिक सर्जरी विभाग में जाने की सलाह दी गई। इस तरह की समस्याओं से अकेले विनोद ही नहीं, दूर-दराज से आने वाले ज्यादातर मरीज दो-चार होते रहते हैं। वे यह समझ नहीं पाते कि अस्पताल के इतने सारे डिपार्टमेंट्स में से उनकी समस्या के लिए कौन-सा है या कौन-से डिपार्टमेंट में किस बीमारी का इलाज होता है। आज के इस लेख के जरिए हम आपकी इस मुश्किल को आसान करने की कोशिश कर रहे हैं। 

एनेस्थीसिया 
इस डिपार्टमेंट के डॉक्टर का काम ऑपरेशन थिएटर में होता है। ये मरीज को सुन्न करने की दवाएं देते हैं। ऐसे में यहां आपको सीधे जाने की जरूरत नहीं होती। 

कार्डियोलजी 
यहां दिल से जुड़ी तमाम बीमारियों का इलाज होता है। 

डर्मेटॉलजी 
यहां स्किन से जुड़ी हर तरह की बीमारियों का इलाज किया जाता है। आप गर्मियों में होने वाली घमौरियां और सर्दियों में सिर में होने वाली खुस्की जैसी छोटी समस्याओं के लिए भी यहां जा सकते हैं।

डायटेटिक्स 
यहां आपके शरीर की जरूरत के हिसाब से आपके खान-पान का चार्ट तैयार किया जाता है। इसके एक्सपर्ट आपकी मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर सलाह देते हैं। 

डेंटल केयर 
दांतों की साफ-सफाई से लेकर नकली दांत लगाने तक के सारे काम यहां होते हैं। 

एंडोक्रिनॉलजी, मेटाबॉलिज्म ऐंड डायबीटीज 
ये जनरल मेडिसिन के सुपर स्पेशलाइज्ड डिपार्टमेंट होते हैं, जहां डायबीटीज, मेटाबॉलिक सिस्टम में आने वाली खराबी और एंडोक्राइन ग्रंथि से संबंधित बीमारियों का इलाज होता है। 

ईएनटी
यहां नाक, कान और गले से संबंधित समस्याओं का इलाज होता है। 

आई केयर 
आंखों की देखभाल, जांच, इलाज और ऑपरेशन यहां किया जाता है। आंख से संबंधित इस ब्रांच को ऑपथेमॉलजी भी कहा जाता है। 

गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल 
यहां पेट से संबंधित समस्याओं का इलाज किया जाता है। 

गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सर्जरी 
इसके एक्सपर्ट पेट की बीमारियों से संबंधित सर्जरी करते हैं। 

हेमैटॉलजी 
यहां ब्लड से संबंधित समस्याओं की जांच और इलाज होता है। 

इंटरनल मेडिसिन 
कोई भी समस्या होने पर आमतौर पर मरीज को सीधे इसी डिपार्टमेंट में जाना होता है। अगर समस्या ज्यादा होती है तो एक्सपर्ट संबंधित डिपार्टमेंट में रेफर कर देते हैं। 

नेफ्रॉलजी 
किडनी से संबंधित बीमारियों का इलाज किया जाता है। 

न्यूरो साइंसेज सेंटर 
यहां न्यूरो यानी तंत्रिका तंत्र से संबंधित बीमारियों का इलाज होता है। दिमाग से संबंधित समस्याओं के लिए यहां जाते हैं। 

ऑब्स्टेट्रिक्स ऐंड गाइनी 
यहां स्त्री रोगों का इलाज और सर्जरी की जाती है। 

ऑन्कॉलजी 
यहां विभिन्न तरह के कैंसर का इलाज होता है। इसे कैंसर सेंटर भी कहते हैं। 

ऑर्थोपैडिक्स 
यहां हड्डियों से जुड़ी बीमारियों का इलाज और सर्जरी की जाती है। 

पीडियाट्रिक्स 
इसके एक्सपर्ट बाल रोग विशेषज्ञ होते हैं। 14 साल तक के बच्चों को कोई समस्या होने पर यहां ले जाया जाता है। 

सायकायट्री 
यहां विभिन्न तरह की मानसिक समस्याओं का इलाज किया जाता है। 

मिनिमल एक्सेस सर्जरी 
इसके एक्सपर्ट कोई भी सर्जरी परंपरागत तरीके से चीरफाड़ के बजाय नई तकनीक से एक छोटे से छेद के जरिए कैमरे की मदद से करते हैं। 

बेरियाट्रिक ऐंड मेटाबॉलिक सर्जरी 
यहां मोटापा कम करने की सर्जरी की जाती है। 

एस्थेटिक ऐंड री-कंस्ट्रक्टिव सर्जरी 
यहां खूबसूरती बढ़ाने के लिए सर्जरी होती है। मसलन नाक-होंठ आदि की शेप ठीक कराना, ब्रेस्ट इंप्लांट जैसी सर्जरी। आजकल इस फील्ड की काफी डिमांड है। 

करें असली डॉक्टर की पहचान 
आजकल हर फील्ड में नकली बाजार आबाद है। लोगों की मजबूरी का फायदा उठाने वालों की कोई कमी नहीं है। मेडिकल फील्ड भी इससे अछूता नहीं है। नकली कॉलेज खोलकर फीस के लाखों रुपए बटोरने, कुछ हजार रुपयों में नकली डिग्रियां बेचने से लेकर नकली डॉक्टरी करने जैसे मामले आए दिन सामने आते रहते हैं। इस तरह के फर्जीवाड़े से बचने के लिए आप डिग्री का फंडा भी समझें। 

आयुर्वेदिक 
अंडर ग्रैजुएट कोर्स 
बीएएमएस, बीआईएमएस और बीयूएमएस योग्यता : 10+2 साइंस से कोर्स अवधि: साढ़े चार साल का कोर्स और छह महीने से एक साल तक इंटर्नशिप कहां से करें: दिल्ली में तिब्बिया कॉलेज के अलावा भी देशभर में बहुत-से सरकारी और प्राइवेट कॉलेज खुल गए हैं, मगर इनमें कई नकली भी हैं। इन कोर्सों में दाखिला लेने से पहले सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन और दिल्ली का इंस्टिट्यूट है तो दिल्ली भारती चिकित्सा परिषद से छानबीन जरूर करें, क्योंकि कॉलेजों के लिए यहां से रजिस्ट्रेशन जरूरी है। वेबसाइट है: www.dbcp.co.in 

ऐलोपैथी 
अंडर ग्रैजुएट कोर्स 
एमबीबीएस (बैचलर ऑफ मेडिसिन बैचलर ऑफ सर्जरी) योग्यता : 10+2 साइंस (बायलॉजी) से कोर्स अवधि : साढ़े चार साल 

पोस्ट ग्रैजुएट कोर्स 
मेडिसिन में : एमडी इंटरनल मेडिसिन, एमडी गाइनी, एमडी स्किन, एमडी चेस्ट, एमडी पीडियाट्रिक, एमडी रेडियो डाइग्नोसिस, एमडी ऑर्थोपेडिडिक आदि सर्जरी में: एमएस जनरल सर्जरी, एमएस प्लास्टिक सर्जरी, एमएस काडिर्एक सर्जरी, एमएस पीडियाट्रिक सर्जरी आदि योग्यता: एमबीबीएस कोर्स अवधि : तीन साल

पीजी लेवल के डिप्लोमा कोर्स 
डिप्लोमा इन चाइल्ड हेल्थ (डीसीएच), डिप्लोमा इन पैथेलॉजी (डीसीपी), डिप्लोमा इन चेस्ट डिजीज (डीपीसीपी), डिप्लोमा इन रेडियॉलजी (डीएमआरडी) और डिप्लोमा इन स्किन एंड वेनरल डिजीज (डीएसवीडी) आदि योग्यता: एमबीबीएस कोर्स अवधि: दो साल नोट: नैशनल बोर्ड द्वारा रिकग्नाइज्ड डीएनबी कोर्स भी एमडी और एमएस के बराबर होता है, लेकिन यह कोर्स सिर्फ प्राइवेट इंस्टिट्यूट् करवाते हैं। 

पोस्ट पीजी (सुपर स्पेशियलिटी) कोर्स 
मेडिसिन में: डीएम इन कार्डियॉलजी, डीएम इन गैस्ट्रोइंटेरॉलजी, डीएम इन गाइनिकॉलजी आदि योग्यता: इंटरनल मेडिसिन में एमडी सर्जरी में: एमसीएच इन कार्डियो सर्जरी, एमसीएच इन जनरल सर्जरी आदि योग्यता: एमएस कोर्स अवधि : तीन साल 

होम्योपैथी अंडर ग्रैजुएट कोर्स 
बीएचएमएस कोर्स अवधि : साढ़े चार साल और छह महीने से एक साल तक इंटर्नशिप कहां से करें : दिल्ली में दो कॉलेज हैं - नेहरु होम्योपैथी और बीआर सूर होम्योपैथी कॉलेज नोट: अब होम्योपैथी में भी पीजी कोर्स शुरू हो गया है, मगर पीजी-इन-होम्योपैथी लिखना जरूरी होता है और ये कॉलेज या कोर्स होम्योपैथी बोर्ड से रजिस्टर्ड होते हैं। जिनका रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है, वे नकली हैं। 

डेंटल सर्जरी के कोर्स 
बीडीएस (बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी) पीजी कोर्स :एमडीएस (मास्टर ऑफ डेंटल सर्जरी) ये कोर्स कराने वाले कॉलेजों का डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया से रजिस्टर्ड होना जरूरी है। वेबसाइट है: www.dciindia.org 

ये डिग्रियां हैं नकली 
एमडीएमए: मेंबर ऑफ दिल्ली मेडिकल असोसिएशन 

एमडीएमसी: मेंबर दिल्ली मेडिकल काउंसिल एमआरएसएच: मेंबरशिप ऑफ रॉयल कॉलेज ऑफ लंदन की फेलोशिप आरएमपी: रूरल मेडिकल प्रैक्टिसनर। लोग इसे अक्सर रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिसनर समझ लेते हैं 

पीएमपी: प्राइवेट मेडिकल प्रैक्टिशनर 

बंगाली या मद्रासी डॉक्टर 

एमआईएमएस: इलेक्ट्रो होम्योपैथी नोट: रूस, चीन, नेपाल और मॉरिशस से एमबीबीएस करके आने वाले अगर एमसीआई का एग्जाम पास किए बगैर प्रैक्टिस कर रहे हैं तो यह गलत है। 

डॉक्टर-मरीज संबंधी दो अहम फैसले 
सुप्रीम कोर्ट द्वारा इंडियन मेडिकल असोसिएशन बनाम वी. पी. शांता मामले में 1995 में दिए गए फैसले के मुताबिक डॉक्टरों पर दो कारणों से मुकदमा चलाया जा सकता है। एक तो लापरवाही बरतने के लिए उन पर आपराधिक मामला बनता है और दूसरा उपभोक्ता फोरम में उनसे मुआवजे की मांग भी की जा सकती है, जबकि इससे पहले डॉक्टरों को सिर्फ असावधानी बरतने के लिए दोषी पाए जाने पर सजा सुनाई जा सकती थी। 

5 अगस्त 2005 को डॉ. जैकब मैथ्यू मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के मुताबिक किसी आम आदमी को डॉक्टर की लापरवाही के खिलाफ सीधे केस करने का अधिकार नहीं है। मामला तभी दर्ज किया जा सकता है, जब किसी सक्षम डॉक्टर (सरकारी क्षेत्र से हो तो बेहतर है) ने इस मामले में अपनी राय दी हो। इस मामले में बचाव पक्ष के वकील की एक दलील यह भी थी कि अगर डॉक्टर पर यह तलवार लटकती रही कि उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है तो वह इलाज करने से घबराने लगेगा। 

मरीज कहां कर सकते हैं शिकायत 

दिल्ली मेडिकल काउंसिल 
अगर किसी कोई अपने या अपने रिश्तेदार के इलाज से संतुष्ट नहीं है या इलाज से कोई मृत्यु या कोई और नुकसान हो गया है तो दिल्ली मेडिकल काउंसिल में अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। यहां सारे संबंधित कागजात और शिकायत-पत्र पोस्ट कर सकते हैं या यहां जाकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। काउंसिल का पता है : 

दिल्ली मेडिकल काउंसिल, थर्ड फ्लोर, पैथलॉजी ब्लॉक, मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, बहादुरशाह जफर मार्ग, नई दिल्ली-2 

कंस्यूमर फोरम 
मरीज या उसके रिश्तेदार चाहें तो पुलिस या सीधे कंस्यूमर फोरम में भी मामला दर्ज करा सकते हैं। पुलिस को अगर मेडिकल नेग्लिजेंस यानी लापरवाही का मामला लगता है तो वह मामले को दिल्ली मेडिकल काउंसिल के पास भेज देती है। कंस्यूमर फोरम भी इसके लिए या तो डीएमसी से संपर्क करता है या किसी भी सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों की टीम को जांच की जिम्मेदारी सौंपता है। 

क्या है प्रोसेस 
डीएमसी शिकायती के सारे डॉक्युमेंट्स की जांच करती है और जरूरत पड़ने पर शिकायती और डॉक्टर को बुलाकर सारे पहलुओं को जानने की कोशिश करती है। इसके बाद मामले को काउंसिल की इग्जेक्युटिव कमिटी के सामने रखा जाता है। कमिटी के सारे सदस्य मिलकर इस पर चर्चा करते हैं और अपनी राय देते हैं। अगर मामला बहुत गंभीर होता है और एक बार में कोई फैसला नहीं हो पाता तो दोबारा मीटिंग की जाती है और अपनी रिपोर्ट के आधार पर आदेश पारित किया जाता है। अपने स्तर पर डीएमसी शिकायत सही पाए जाने पर डॉक्टर को चेतावनी दे सकती है या उसका लाइसेंस भी कैंसल कर सकती है। अगर शिकायती अपने नुकसान की भरपाई चाहते हैं तो डीएमसी की रिपोर्ट के आधार पर कंस्यूमर फोरम में जा सकते हैं और मुआवजा पा सकते हैं। अगर डीएमसी के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं तो मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया में इस फैसले के खिलाफ अपील कर सकते हैं। डीएमसी ऐसे मामलों के निपटारे के लिए महीने में दो बार इग्जेक्युटिव कमिटी की मीटिंग बुलाती है। जरूरत पड़ने पर महीने में चार या पांच बार भी मीटिंग हो सकती है। 

जब इलाज कराने जाएं तो नीचे लिखी बातों का ध्यान रखें... 

-नियमों के मुताबिक किसी भी पद्धति का डॉक्टर संबंधित मेडिकल काउंसिल या बोर्ड से रजिस्ट्रेशन के बिना प्रैक्टिस नहीं कर सकता है। 

-नए नियमों के मुताबिक डॉक्टर के लिए अपने क्लीनिक में फोटो वाला रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट डिस्प्ले करना जरूरी है। 

-कोई भी प्रैक्टिसनर सिर्फ अपनी फील्ड में ही प्रैक्टिस कर सकता है। अगर वह कोई दूसरी पद्धति की दवाएं दे रहा है तो यह गलत है। 

-अगर किसी पर शक हो तो उसके रजिस्ट्रेशन नंबर का संबंधित काउंसिल या बोर्ड से वेरिफिकेशन करें। यह जानकारी संबंधित विभाग की वेबसाइट या ऑफिस के फोन से भी हासिल कर सकते हैं। 

-नियमों के मुताबिक कोई भी मेडिकल प्रैक्टिसनर अपना विज्ञापन नहीं दे सकता, इसलिए बड़े-बड़े भ्रामक विज्ञापनों के चक्कर में न पड़ें(नवभारत टाइम्स,नई दिल्ली,1.7.12)।

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शनिवार, 21 जुलाई 2012

स्वास्थ्य बीमे के बारे में यह भी जानें

ज्यादातर लोग समझते हैं कि हेल्थ इंश्यारेंस पॉलिसी सिर्फ हॉस्पिटल में भर्ती होने का खर्चा उठाती है। हालांकि, ऐसी कई पॉलिसीज हैं, जिनसे इससे जुड़े दूसरे खर्च भी पूरे होते हैं। हेल्थ इंश्योरेंस में कई ऐसे बेनेफिट हैं, जिनके बारे में लोगों को पता नहीं होता। इस वजह से वे इनका फायदा नहीं उठा पाते। पॉलिसी डॉक्युमेंट को पढ़ने पर इनके बारे में पता चलता है। 

डेली हॉस्पिटल कैश अलाउंस: सभी हेल्थ पॉलिसीज में अस्पताल में भर्ती होने के वक्त खर्च हुए पैसे का भुगतान किया जाता है। हालांकि, फूड और रिफ्रेशमेंट पर होने वाले खर्च का क्या होगा? घर से हॉस्पिटल आने-जाने पर भी काफी पैसा खर्च होता है। पॉलिसी के डेली हॉस्पिटल कैश अलाउंस से आप यह पैसा बचा सकते हैं। आपको पता करना होगा कि पॉलिसी में प्री-फिक्स्ड, प्री-डे कैश हैंड-आउट्स शामिल हैं या नहीं? आईसीआईसीआई लोम्बार्ड के हेड (अंडरराइटिंग एंड क्लेम्स) संजय दत्ता ने बताया, 'यह रकम क्लेम के सपोर्ट में बिल पेश किए बगैर चुकाई जाती है, इस बारे में कोई सवाल नहीं पूछा जाता।' 

लंबे समय का पेमेंट: इंश्योरेंस कंपनी हॉस्पिटल में लंबे समय तक रहने पर भी पॉलिसीहोल्डर को एकमुश्त रकम का भुगतान करती है। अपोलो म्यूनिख के सीईओ एंटनी जैकब ने कहा, 'पॉलिसी के तहत हॉस्पिटल में 7-10 दिन ज्यादा रहने की इजाजत होती है। इस बेनेफिट के तहत हॉस्पिटल में स्टे के चलते इनकम लॉस जैसी सप्लीमेंटरी कॉस्ट का भी पेमेंट किया जाता है।' आपके लिए एलिजबल बेनेफिट अमाउंट और पीरियड की जानकारी हासिल करना जरूरी है, जो अक्सर पहले से तय होती है। 

ऑल्टरनेटिव ट्रीटमेंट: इरडा की हालिया ड्राफ्ट गाइडलाइंस में सभी कंपनियों को ट्रीटमेंट के गैर-एलोपैथिक तरीके जैसे आयुर्वेद, यूनानी और होम्योपैथी को कवर करने के लिए बाध्य किया जा सकता है, लेकिन कुछ कंपनियां पहले से ऐसा कर रही हैं। मिसाल के लिए न्यू इंडिया एश्योरेंस इस तरह के 25 फीसदी खर्च को रीम्बर्स करती है, बशर्ते ट्रीटमेंट सरकारी हॉस्पिटल में हुआ हो। 

घर में ट्रीटमेंट: माना जाता है कि हेल्थ इंश्योरेंस के दायरे में सिर्फ हॉस्पिटलाइजेशन या डे-केयर फैसिलिटीज ही आती हैं। हालांकि, कई पॉलिसीज डॉक्टर की सलाह पर घर में ट्रीटमेंट का खर्च भी देती हैं। हालांकि, ऐसा तभी होता है, जब पेशेंट हॉस्पिटल में आने की हालत में न हो। दत्ता कहते हैं, 'यहां पॉलिसीहोल्डर को डॉक्टर के क्लिनिक का बिल पेश करने के लिए कहा जाता है। भुगतान फीसदी में या वैल्यू-बेस्ड होता है।' इस तरह के पेमेंट की सीमा तय होती है। 

अंगदान देने वाले व्यक्ति से संबंधित खर्च: किसी तरह के ट्रांसप्लांटेशन सर्जरी में पॉलिसीहोल्डर्स पर फाइनैंशली और इमोशनली काफी बड़ा दबाव होता है। अगर कोई शख्स आपको अंग दान कर रहा हो, तो उसके ट्रीटमेंट के अलावा डोनर का एक्सपेंस भी हॉस्पिटल बिल में शामिल होता है। डोनर के एक्सपेंस के क्लेम का प्रोविजन आपकी पॉलिसी में होता है। 

अटेंडेंट अलाउंस: हॉस्पिटल में इनश्योर्ड चाइल्ड की देखभाल करने वाले एडल्ट के लिए कुछ पॉलिसीज में फिक्स्ड अलाउंस का प्रोविजन होता है। इसकी शर्तें इंश्योरर और प्रॉडक्ट के मुताबिक अलग-अलग हो सकती हैं। मिसाल के लिए ओरिएंटल जनरल इंश्योरेंस के हेल्थ प्लान में हॉस्पिटलाइजेशन के दौरान हर दिन के लिए 500 रुपए दिए जाते हैं। ज्यादा से ज्यादा 10 दिन के लिए भुगतान किया जा सकता है। 

क्रिटिकल इलनेस: आम तौर पर सभी पॉलिसीज डायलिसिस और कीमोथेरेपी से जुड़े महंगे खर्च उठाती हैं। हालांकि, कुछ खास प्रॉडक्ट्स चुनिंदा क्रिटिकल इलनेस के लिए ज्यादा कवर ऑफर करते हैं। मिसाल के लिए एलऐंडटी इंश्योरेंस की हेल्थ पॉलिसी में इन गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए सम-एश्योर्ड की दोगुनी रकम दी जाती है(प्रीति कुलकर्णी,नभाटा,दिल्ली,20.7.12)।

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