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शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

एंटी-ऑक्सीडेंट करता है शरीर को विषमुक्त

भोजन को पचाने में कई क्रियाएं होती हैं। शरीर भोजन से अपने लिए जरूरी तत्वों को ले लेता है लेकिन उन तत्वों को अलग कर देता है जो नुकसानदेह हैं। ये विषैले तत्व कई बार शरीर से आसानी से नहीं निकलते। ऐसे में एंटी-ऑक्सीडेंट उन्हें शरीर से बाहर करता है और शरीर की सफाई करता है। आइए,जानते हैं एंटी ऑक्सीडेंट के फायदे हैं और इसके स्रोतों के बारे में- 

हम सभी चाहते हैं स्वस्थ और चुस्ती से भरा-पूरा जीवन, जिसमें रोग और बुढ़ापा न सताए। शरीर से विषैले तत्वों को हटा कर एंटी ऑक्सीडेंट हमारे इसी मिशन को पूरा करने में सहायक बनते हैं। एंटी ऑक्सीडेंट वह अणु होते हैं जो दूसरे अणुओं के ऑक्सीडेशन को रोकते हैं। सैकड़ों नहीं हजारों पदार्थ एंटी ऑक्सीडेंट की तरह कार्य करते हैं। यह विटामिन, मिनरल्स और दूसरे कई पोषक तत्व होते हैं। बीटा कैरोटिन, ल्युटिन लाइकोपीन, फ्लैवोनाइड, लिगनान जैसे एंटी ऑक्सीडेंट हमारे लिए बहुत जरूरी और महत्वपूर्ण हैं। इनके अलावा मिनरल सेलेनियम भी एक एंटी ऑक्सीडेंट की तरह कार्य करता है। विटामिन ए, विटामिन सी और विटामिन ई की एक एंटी ऑक्सीडेंट के रूप में हमारे शरीर में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। 

क्या होते हैं फ्री रेडिकल्स 
हमारे शरीर की खरबों कोशिकाओं को पोषण की कमी और संक्रमण का ही खतरा नहीं होता है, बल्कि फ्री रेडिकल्स भी कोशिकाओं को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। यह दूसरे अणुओं से इलेक्ट्रॉन चुराने की कोशिश करते हैं, जिससे डीएनए और दूसरे अणुओं को नुकसान पहुंचता है। यह फ्री रेडिकल्स भोजन को ऊर्जा में बदलने की प्रक्रिया में उप-उत्पाद के रूप में निकलते हैं। इसके अलावा कुछ उस भोजन में होते हैं जो हम खाते हैं, कुछ उस हवा में तैरते रहते हैं जो हमारे आसपास मौजूद होती है। फ्री रेडिकल्स अलग-अलग आकार, माप और रासायनिक संगठन के होते हैं। फ्री रेडिकल्स कोशिकाओं को नष्ट करके हृदय रोगों, कैंसर और दूसरी बीमारियों की आशंका बढ़ा सकते हैं। एंटी ऑक्सीडेंट फ्री रेडिकल के प्रभाव से कोशिकाओं को बचाते हैं। 

शरीर की सफाई करते हैं एंटी ऑक्सीडेंट 
शरीर में बहुत सारी गतिविधियां होती हैं। हम खाना खाते हैं, उसका पाचन और अवशोषण होता है। मेटाबॉलिज्म में यह तय होता है कि इन पदार्थों में से कितना इस्तेमाल होगा और कितना संग्रह होगा। इस पूरी प्रक्रिया में मुख्य उत्पाद के साथ कई उप-उत्पाद भी बनते हैं। यह उप-उत्पाद दरअसल व्यर्थ पदार्थ होते हैं, जिन्हें कई बार शरीर बाहर नहीं निकाल पाता। एंटी ऑक्सीडेंट उनके साथ क्रिया करके शरीर को उनके नकारात्मक प्रभाव से बचाते हैं। एंटी ऑक्सीडेंट वैसे तो कई भोज्य पदार्थों में पाए जाते हैं, लेकिन ताजे फल और सब्जियों में यह सबसे अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। इन्हें स्कैवेंजर भी कहते हैं, क्योंकि यह फ्री रेडिकल्स को खाकर शरीर की सफाई करते हैं। 

स्वस्थ रहने के लिए जरूरी एंटी ऑक्सीडेंट 

-एंटी ऑक्सीडेंट कैंसर, हृदय रोगों, ब्लड प्रेशर, अल्जाइमर और दृष्टिहीनता के खतरे को कम करते हैं। 

-एंटी ऑक्सीडेंट बुढ़ापे के लक्षणों को धीमा करते हैं। विटामिन सी, विटामिन ई, बीटा-कैरोटिन और जिंक जैसे एंटी ऑक्सीडेंट एज रिलेटेड मैक्युलर डिजनरेशन से सुरक्षा करते हैं। 

-ल्युटिन हमारी आंखों की रोशनी बनाए रखने के लिए जरूरी है। 

-सेलेनियम त्वचा, बड़ी आंत और फेफड़े के कैंसर से सुरक्षा करता है। 

-एंटी ऑक्सीडेंट रोग प्रतिरोधक तंत्र को मजबूत बनाकर संक्रमणों से बचाते हैं। 

-कोशिकाओं में टॉक्सिन इकट्ठे होने से उनका डिजेनरेशन शुरू हो जाता है। यह टॉक्सिन को नष्ट कर कोशिकाओं को मृत होने से भी बचाते हैं। 

इनमें है भरपूर एंटी-ऑक्सीडेंट 
गाजर 
गाजर शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट बीटा-कैरोटिन से भरपूर होती है, जो स्वास्थ्यवर्धक कैरोटिनाइड परिवार का एक सदस्य है। यह शकरकंद, शलजम और पीली एवं नारंगी रंग की सब्जियों में होता है। यह कैंसर और हृदय रोगों से बचाता है। आर्थराइटिस के खतरे को 70 प्रतिशत तक कम करता है। 

टमाटर 
टमाटर में लाइकोपीन होता है। यह फेफड़े, बड़ी आंत और स्तन कैंसर से बचाता है और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को दुरुस्त रखता है। यह आंखों की मोतियाबिंद और मैक्युलर डिजनरेशन से रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। टमाटर में मौजूद ग्लुटाथियोन एंटी ऑक्सीडेंट इम्यून तंत्र को मजबूत करता है। 

ब्रोकली 
ब्रोकली, पत्तागोभी और फूल गोभी आदि सब्जियों में इंडोल्रू काबरेनेल पाया जाता है, जो ब्रेस्ट कैंसर के खतरे को कम करता है और एस्ट्रोजन के प्रति संवेदनशील कैंसर जैसे गर्भाशय तथा सरविक्स के कैंसर से भी बचाव करता है। 

चाय 
चाय हमें कैंसर, हृदय रोगों, स्ट्रोक और दूसरी बीमारियों से बचाती है। हरी और काली दोनों चाय काफी लाभदायक होती हैं। हरी चाय में जो कैटेचिन्स पाया जाता है, वह काली चाय बनाने में ऑक्सीडाइज्ड होकर थियाफ्लेविन बनाता है। यह भी फ्री रेडिकल्स से लड़ता है। 

लहसुन 
लहसुन एंटी ऑक्सीडेंट से भरपूर होता है जो कैंसर और हृदय रोगों से लड़ने में मददगार होता है और बढ़ती उम्र के प्रभावों को कम करता है। लहसुन में जो तीखी गंध होती है वह सल्फर के कारण होती है। यही उसके स्वास्थ्यवर्धक गुण का प्रमुख कारण है। लहसुन ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करता है। यह फ्री रेडिकल से मुकाबला करता है और रक्त का थक्का बनने से रोककर दिल की हिफाजत करता है(रॉकलैंड हॉस्पिटल की वरिष्ठ डायटीशियन सुनीता राय चौधरी से शमीम खान की बातचीत पर आधारित यह आलेख दैनिक हिंदुस्तान,दिल्ली में 20.12.12 को प्रकाशित है)।

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बुधवार, 7 नवंबर 2012

क्या केला किसी भी समय खाया जा सकता है?

- पके केले को मंद आंच में पकाकर नमक,काली मिर्च मिलाकर दमा के रोगी को खिलाने से लाभ होता है। 

- जिन स्त्रियों को श्वेत प्रदर की शिकायत हो,उन्हें पका हुआ एक केला पांच ग्राम घी के साथ कुछ दिन सेवन करने से लाभ होता है। 

- बार-बार पेशाब लग रही हो तो बार-बार केला खाना चाहिए। 

- टायफायड बुखार उतरने के बाद छोटी इलायची के चूर्ण के साथ रोगी को पका केला खिलाना चाहिए। इससे बुखार से आई दुर्बलता दूर हो जाती है। 

- पीलिया रोग में रोगी को कम से कम चार पके केले नित्य खाने चाहिए तथा कच्चे केले की सब्जी का सेवन भी करना चाहिए। 

- पेट में जलन हो तो पका केला खाएं। 

- आधा कप गाय के दही में एक केला तथा छोटी इलायची का चूर्ण मिलाकर दिन में दो-तीन बार चाटने से मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं। 

- पका केला शहद के साथ प्रातःकाल सेवन करने से हृदय बलवान बनता है,दिल की धड़कन तथा दिल के दर्द में लाभ होता है। 

- पके केले के लगातार सेवन से सूखी खांसी,गले की खराश तथा गुर्दों की कमज़ोरी दूर हो जाती है। 

- पका केला कृमिनाशक है। इसके सेवन से रक्त की खराबी दूर होकर त्वचा के रोग नष्ट हो जाते हैं। 

- दाद,खाज,खुजली में पके केले में नींबू का रस मिलाकर मरहम बनाकर लगाएं। 

- जलने पर पके केले का गूदा मरहम की तरह लगाने से जलन शांत होगी तथा फफोले नहीं पड़ेंगे। 

- पके केले के गूदे में आटा मिलाकर पानी के साथ गूंथ लें। इसे गरम करके सूजन वाले हिस्से पर बांधने से सूजन दूर हो जाएगी।

- चोट पर केले का छिलका बांधने से आराम मिलता है। घाव पर केले का पानी लगाकर पट्टी बांधने से घाव जल्दी भर जाता है। 

- जो बच्चा मिट्टी खाता हो,उसे पांच ग्राम शहद के साथ एक केला प्रतिदिन खिलाएँ। इससे पेट की मिट्टी बाहर आ जाएगी तथा बच्चे की मिट्टी खाने की आदत छूट जाएगी। 

- बच्चा कांच की गोली,सिक्का आदि निगल जाए,तो उसे केला खिलाना चाहिए। 

- केले के तने का रस,गुर्दे,लीवर तथा फेफड़े के रोगों में लाभप्रद है। 

- खूनी दस्त तथा आंव में दिन में तीन बार केले के तने का रस दो-दो चम्मच पीने से लाभ होता है। 

- केले को दिन में ही खाना चाहिए क्योंकि गरमी में यह जल्दी पचता है। रात में खाया केला जल्दी हजम नहीं होता। 

- खाली पेट केला नहीं खाना चाहिए। खाने के बाद या भोजन के साथ ही इसे खाएं। 

- केला खाकर पानी न पिएं बल्कि दूध या छोटी इलायची खाने से केला जल्दी हज़म हो जाएगा।

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सोमवार, 5 नवंबर 2012

कौन सा केला बेहतरःकच्चा या पका?

- केले का नियमित सेवन अनिद्रा और कब्ज दूर करके पेशाब की जलन को मिटाता है। यह अतिसार,आंत और कुष्ठ तथा हृदयरोगियों के लिए प्राकृतिक औषधि है। यह आसानी से पच जाता है,अतः वायुविकार उत्पन्न नहीं करता। केला शीतल,स्निग्ध,वातपित्तनाशक और कफ़कारक रहता है। यह तृष्णा और दाह का नाश करता है। 

- केला पौष्टिक तत्वों से भरपूरा है। हरे केले में स्टार्च काफी कम मात्रा में(64 से 74 प्रतिशत) रहती है,परन्तु पकने पर स्टार्च शर्करा(7 से 25 प्रतिशत तक) में बदल जाती है। 

- पके केले की विशिष्ट खुशबू उसमें उपस्थित एमाइल एसीटेट के कारण रहती है। कच्चा केला क्लोरोफिल के कारण हर रहता है,परन्तु पकने पर एंजाइमों की क्रिया से जैंथोफिल तथा केरोटिन नामक पीले रसायनों में बदल जाता है। 

- पके केले में 70 प्रतिशत पानी,1.2 प्रतिशत प्रोटीन,0.2 प्रतिशत रेशा रहता है। इसमें प्रति 100 ग्राम कैल्शियम 17 मिलीग्राम, रहता है। इसमें विटामिन ए 430 मिलीग्राम,थायमिन 0.09 मिलीग्राम,नायसिन 0.6 मिलीग्राम तथा विटामिन सी 10 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम में रहता है। सौ ग्राम केला 99 कैलोरी ऊर्जा देता है।

- केले के छिलके के नीचे विटामिन होते हैं जो केले के पकने पर उसके गूदे में चले जाते हैं तथा छिलका पतला और चित्तीदार हो जाता है।

- पका केला ठंडा,रूचिकर,मीठा,सुस्वादु,पुष्टिकारक,रक्तविकारनाशक,पथरी,रक्तपित्त दूर करने वाला,प्रदर एवं नेत्ररोगनाशक होता है।

-केले में फास्फोरस ज्यादा रहता है,जो मन-मस्तिष्क को शक्ति प्रदान करता है।

- केले में पैक्टिन नामक एक पदार्थ रहता है जो मल को मुलायम बनाकर पेट की सफाई करता है।

- केले के छिलके के अंदर वाला पतला सा मुलायम रेशा कब्ज दूर करके आंतों को ठीक रखता है। - केला क्षारधर्मी फल होने के कारण खून की अम्लता को दूर करके क्षारीयता बढ़ाता है।

- केले के सेवन से बच्चों का वजन जल्दी बढ़ता है। कमज़ोर व्यक्तियों की पाचनशक्ति ठीक होती है। भूख ज्यादा लगने से वे जल्दी हृष्ट-पुष्ट बनते हैं।

- बच्चों को दूध के साथ केला खिलाने से यह स्वास्थ्यवर्द्धक,पुष्टिकार तथा सुपाच्य रहता है। इसमें थोड़ा शहद मिलाकर खिलाया जाए तो संक्रामक रोग से भी बचाव होता है। 

 - सुबह नाश्ते में केला खाकर दूध पीना एक संतुलित तथा सम्पूर्ण आहार है। इसके सेवन से पित्त-विकार दूर होते हैं।

- केला उच्च रक्तचाप के नियंत्रण में सहायक है। यह हृदयरोग,अतिसार और आंखों के लिए प्राकृतिक औषधि है।

- स्कर्वी रोग में पके केले का नित्य सेवन रामबाण औषधि है। यह अंतड़ियों में विजातीय पदार्थों की सड़न रोकता है।

- दही के साथ केले का सेवन करने से दस्त बंद हो जाते हैं। यह आंतों के प्रवाह में आराम दिलाता है। आंत के रोगों को केला बिना ऑपरेशन ठीक कर देता है।

- यह एकमात्र फल है जो पेट के ज़ख़्म के रोगियों को दिया जा सकता है। यह पेट का अल्सर भी दूर करता है। 

- पेचिश में केले को दही में मथकर उसमें थोड़ा जीरा और काला नमक मिलाकर देने से फायदा होता है। अम्लता,पेट की जलन और पित्त में केला खाना लाभदायक होता है।

-मुंह में छाले हों तो केला खाने से लाभ होगा।

- नकसीर में 2-3 पके केलों का गूदा,दूध तथा शक्कर मिलाकर देने से आराम मिलता है।
                                                                                                                                                                           
                                                                                         जारी..........

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गुरुवार, 1 नवंबर 2012

क्या हो अगर केला खाकर ही भरना पड़े पेट

आने वाले समय में करोड़ों लोगों के लिए केला पेट भरने का सबसे अहम जरिया होगा। ऐसा जलवायु परिवर्तन के कारण हो सकता है। कृषि के क्षेत्र में शोध से जुड़ी संस्था सीजीआईएआर का कहना है कि आने वाले समय में कुछ विकासशील देशों में आलू की जगह फल ले सकते हैं। रिपोर्ट के लेखक कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण पारंपरिक फसलों पर संकट गहरा रहा है। ऐसे में लोगों को नया और अलग-अलग तरह का खान-पान अपनाना होगा। 

आज मक्का, चावल और गेहूं वे तीन फसलें हैं, जो कैलोरी देने के लिहाज से सबसे अहम हैं। दुनिया की इन तीन सबसे बड़ी फसलों का उत्पादन कई विकासशील देशों में घटने का अंदेशा है। ऐसे में केला ही बेहतर विकल्‍प बचेगा। केला सस्‍ता भी है और एनर्जी भी देता है। 

केले को गरीबों का फल कहा जाता है। केले में ज्‍यादा पोषक तत्‍व होने के चलते भारत के केरल राज्‍य और युगांडा जैसे देशों में केला प्रमुख खाद्य फल है। केले के उत्पादों की बढती मांग के कारण केले की खेती का महत्व भी दिन- प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। 

केला खाने से एनर्जी मिलती है। इसमें विटामिंस व मिनरल्स की भी अच्छी मात्रा होती है। दो छोटे केलों में फाइबर की मात्रा एक ब्रेड के बराबर होती है। यह ब्लड प्रेशर को भी कंट्रोल करता है। फाइबर की मौजूदगी के चलते केला लो ब्लड कॉलेस्ट्रोल में भी फायदेमंद है। केले में विटामिन सी, विटामिन ए और विटामिन बी6 होता है। चूंकि केला मैग्नेशियम का अच्छा स्रोत है, इसलिए यह बहुत जल्दी पच जाता है और आपके मेटाबॉलिज्म को दुरुस्त रखता है। 

बच्चों की ग्रोथ के लिए उन्‍हें केला खिलाना काफी फायदेमंद रहता है। वर्कआउट के बाद बॉडी में कम हुई एनर्जी की भरपाई के लिए केला खाने से तत्‍काल राहत मिलती है। प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं को सबसे ज्यादा विटामिन व मिनरल्स की आवश्यकता होती है। ऐसे में प्रेग्‍नेंट महिलाओं के लिए केला खास तौर पर जरूरी है। केला बुजुर्ग लोगों के लिए भी सबसे अच्‍छा फल है। इसमें विटामिन सी, बी6 और फाइबर होता है, जो बुढ़ापे में जरूरी है। 

केला अलबेला 

-केला दुनिया के सबसे पुराने और लोकप्रिय फलों में से एक है। हर मौसम में मिलने वाला यह फल स्वादिष्ट और बीजरहित है। 

-छिलके के कारण केला नैसर्गिक रूप में हमेशा शुद्ध और संक्रमण मुक्त रहता है। 

-केले की 300 से भी अधिक किस्में होती हैं और इसकी खेती बहुत बड़े पैमाने पर की जाती है। 

-केला सबसे पहले भूमध्यसागरीय देशों मे पाया गया था और अब समस्त विश्व में आसानी से उपलब्ध है। 

-केले का फूल और तना भी स्वादिष्ट व्यंजन की तरह पकाया जाता है। 

-केले की लंबाई चार इंच से लेकर 15 इंच तक हो सकती है। 

-केले की प्रजाति के आधार पर इसके स्वाद में अंतर हो सकता है। 

-केले के साथ इलायची खाने से केला आसानी से पचता है। 

-केले पर हलके भूरे रंग के दाग इस बात की निशानी हैं कि केले का स्टार्च के पूरी तरह नैसर्गिक शक्कर में परिवर्तित हो चुका है। ऐसा केला आसानी से हजम होता है। 

-केला सुबह के समय खाना अच्छा होता है। केले का छिलका उतारने के तुरन्त बाद खा लेना चाहिए और खाने के तुरन्त बाद पानी न हीं पीना चाहिए। 

-बाजार में केला चुनते वक्‍त ध्‍यान रखें कि इसका रंग पीला और हल्का हरा होना चाहिए। दबाने पर कड़ापन लगे। इसे कुछ दिनों तक पकने दें और फिर खाएं। केला फ्रिज में नहीं रखें। 

आयुर्वेद और केला 

-एक सामान्य आकार के केले में शर्करा 22 प्रतिशत, फैट एक प्रतिशत और 116 कैलरी एनर्जी होती है। इसमें विटामिन ए,बी,सी और डी भी पाया जाता है। 

-केला कई बीमारियों में काम आता है। बच्चे को दस्त लग जाने पर पके केले को कटोरी में रख कर चम्मच से घोट कर मक्खन जैसा बना लें और जरा सी मिश्री पीस कर मिला कर बच्चे को दिन में दो तीन बार खिलाएं। इससे बच्‍चे को कमजोरी नहीं आएगी और बच्चे के शरीर में पानी की कमी नहीं हो पाएगी। 

-नकसीर आने पर इसकी जड़ का रस निकाल कर दो- दो बूंद नाक में डालने से खून आना बन्द हो जाता है। बार बार नकसीर आए तो पके केले के छोटे- छोटे टुकड़े काट कर दूध में डालकर मिश्री मिलाकर खाने से फायदा होता है। 

-मिट्टी खाने के आदी बच्चों को इसका गूदा खूब फेंट कर जरा सा शहद मिला कर आधा आधा चम्मच खिलाना फायदेमंद है। 

-जी मिचलाए तो पका केला कटोरी में फेंट कर एक चम्मच मिश्री या चीनी और एक छोटी इलायची पीस कर मिला कर खाने से राहत मिलेगी। 

-प्यास अधिक लगती हो तो पका केला घोंट कर चीनी के साथ पानी में मिला कर शरबत बना लें। आधा-आधा गिलास दिन में दो तीन बार लें। 

-पेशाब में जलन हो, रुक रुक कर पेशाब आ रहा हो तो केले के पेड़ का ताजा रस पिलाना चाहिए। धातु दुर्बलता और शारीरिक दुर्बलता में पका केला खाने से लाभ होता है। प्रदर रोग (ल्युकोरिआ) में पका केला खाना उपयोगी है। पेचिश में कच्चे केले की सब्जी चावल के साथ खानी चाहिए। दुबले शरीर और कम वजन वालों को पका केला खाना चाहिए। दूध के साथ खाना ज्‍यादा फायदेमंद है। 

-कफ प्रकृति वालों को केला नहीं खाना चहिए। केला ज्यादा खाने से पेट पर भारी पड़ेगा, शरीर शिथिल होगा, आलस्य आएगा। कभी ज्यादा खा लिया जाए तो एक छोटी इलायची चबाना लाभकारी है। 

-केला अम्लता (ऐसिडिटी) को कम करता है और पेट में हल्की परत बना कर अल्सर का दर्द कम करता है। यह अतिसार और कब्ज़, दोनों में लाभकारी है। यह आंत की सारी प्रक्रिया को सामान्य कर सकता है। केले के गूदे में नमक डाल कर खाना अतिसार के लिए अच्छा होता है। 

-अच्छे पके केले का गूदा शरीर के जले हुए हिस्से पर लगाकर कपड़ा बांध दिया जाय तो तुरंत आराम मिलता है। छाले, फफोले या थोड़ी बहुत जलन होने पर केले का नया निकला छोटा पत्ता ठंडक पहुंचाता है। 

-केला शक्तिवर्धक तत्वों, प्रोटीन, विटामिन और खनिज पदार्थों का अनोखा मिश्रण है। इसमें पानी की मात्रा कम होती है। केला और दूध का मिश्रण शरीर और स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम है। 

-केला अन्न को पचाने में सहायक होने के साथ-साथ उत्साह भी देता है। केले में होनेवाली नैसर्गिक शक्कर पौष्टिक तत्वों से होने वाली रासायनिक प्रक्रिया और सेहत बनाने में मदद करती है(दैनिक भास्कर,1 नवम्बर,2012)।

कल्याण के आरोग्य अंक में,डॉ. प्रमोद कुमारजी सोनी ने काफी उपयोगी जानकारी जुटाई हैः 

-केला फल ही नहीं रोगों से लड़ने वाला योद्धा है। इससे मस्तिष्क को सेरोटोनिन मिलती है। मानसिक रूप से परेशान व्यक्तियों में सेरोटोनि की कमी होती है। केले में यह कमी पूरा करने की अद्भुत क्षमता है। 

-केला मोटापा नहीं बढ़ाता। केले में सोडियम बहुत कम होता है तथा कोलेस्टेरोल बिल्कुल नहीं होता। अतः,डाइटिंग करने वाले इसका सेवन कर सकते हैं। 

-केले में आवश्यक पोटैशियम होता है जो उच्च रक्तचाप के नियन्त्रण में तथा कई तरह के हृदय रोगों में फ़ायदेमंद रहता है। केला आंतों की सड़न रोकता है। केले का कैल्शियम आंतों की सफाई करने में अत्यन्त प्रभावी है।
                                                                                                                                                                                                जारी...........

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रविवार, 23 सितंबर 2012

आज़माकर देखिए तो सही

1. शीतल जल में डालकर सौंफ गलाओ आप 
    मिश्री के संग पान कर,मिटे दाह-संताप 

2. फटे बिमाई या मुंह फटे,त्वचा खुरदुरी होय 
    नींबू मिश्रित आंवला,सेवन से सुख होय 

3. सौंफ इलायची गर्मी में,लौंग सर्दी में खाय 
   त्रिफला सदाबहार है,रोग सदैव हर जाय 

4. वात-पित्त जब-जब बढ़ै,पहुंचावै अति कष्ट
    सौंठ,आवला,दाख संग खावे पीड़ा नष्ट 

5. नींबू के छिलके सुखा,बना लीजिए राख 
    मिटै वमन मधु संग ले,बढ़ै वैद्य की साख 

6. लौंग इलायची चाबिये,रोज़ाना दस-पांच 
    हटै श्लेष्मा कण्ठ का,रहो स्वस्थ है सांच

7. स्याह नौन हरड़े मिला,इसे खाइये रोज़ 
    कब्ज़ गैस क्षण में मिटै,सीधी-सी है खोज 

8. पत्ते नागरबेल के,हरे चबाये कोय 
    कण्ठ साफ-सुथरा रहे,रोग भला क्यों होय 

9. खांसी जब-जब भी करे,तुमको अति बेचैन 
    सिंकी हींग अरु लौंग से मिले सहज ही चैन 

10. छल-प्रपंच से दूर हो,जन-मंगल की चाह 
      आत्मनिरोगी जन वही,गहे सत्य की राह 
(श्री धीरजकुमार जी खरया के ये दोहे कल्याण के आरोग्य अंक से साभार हैं)

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शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

वरदान है नींबू

विटामिन-सी से भरपूर नीबू स्फूर्तिदायक और रोग निवारक फल है। नीबू बहुत उपयोगी फल है। इसका वानस्पतिक नाम साइट्रस लिमोनम है। इसे संस्कृत में लिम्बुका, अरेबिक में लेमुन और अंग्रेजी में लेमन कहते हैं। इसका रंग पीला या हरा तथा स्वाद खट्टा होता है। विश्व में सबसे अधिक नीबू का उत्पादन भारत में होता है। भारत विश्व के कुल नीबू उत्पादन का १६ प्रतिशत भाग उत्पन्ना करता है। मलेशिया, मैक्सिको, अर्जेंटीना, ब्राजील एवं स्पेन अन्य मुख्य उत्पादक देश हैं। 

नीबू की कई किस्में होती हैं, लेकिन कागजी नीबू, कागजी कलाँ, गलगल तथा लाइम सिलहट ही अधिकता घरेलू उपयोग में आते हैं। इनमें कागजी नीबू सबसे अधिक लोकप्रिय है। विद्यमान विटामिन-सी की गुणवत्ता को बढ़ाता है। नीबू में विटामिन-सी के अलावा एक बहुत महत्वपूर्ण तत्व साइट्रिक एसिड (७.२ प्रश) होता है। इसके अलावा इसमें विटामिन-ए, नायसिन और थायमिन भी होते हैं। यह जबर्दस्त एंटीऑक्सीडेंट है और इम्युनिटी बढ़ाता है। नीबू खट्टा, गर्म, हल्का और तीखा होता है। विटामिन-सी के सर्वोत्तम स्रोत नीबू का उपयोग भोजन के साथ सलाद, शर्बत, आचार एवं सौंदर्य प्रसाधन के अलावा दवाओं में भी होता है। नीबू स्वाद में अम्लीय लगता है, लेकिन शरीर पर इसका प्रभाव क्षारीय है। इसलिए यह शरीर में अम्लता को कम करते है।

दाँतों का वैद्य है नीबू : 
नीबू का रस लगाने से दाँत के दर्द में आराम मिलता है। मसूड़ों पर नीबू का रस मलने से मसूड़ों से खून आना बंद हो जाता है। नीबू मुँह से आने वाली दुर्गंध में भी फायदा करता है। नीबू के सूखे छलकों को जला कर पीस लें और नमक मिला कर दंतमंजन बना लें। यह मंजन दांतों को चमका देता है और कुछ ही दिनों में दांतों पर लगी गंदगी साफ हो जाती है। नींबू का रस हमेशा पानी या किसी अन्य जूस में मिलाकर पीना चाहिए। नींबू के रस में साइट्रिक एसिड होता है जो दांतों के एनामल को नुक़सान पहुंचा सकता है। 

पाचन विकार और कब्ज़ भगाए 
यदि प्रातःकाल गुनगुने पानी में नींबू का रस और शहद मिलाकर लिया जाए तो पूरे शरीर का शोधन हो जाता है,पाचन-क्रिया चुस्त हो जाती है और कब्ज भी नहीं रहता। उदर विकार में तुरंत फायदा पहुंचता है। नींबू र्त-शोधक है और शरीर से विषैले पदार्थों का उत्सर्जन करता है। हिचकी बहुत देर से आ रही हो तो नींबू के रस में 2 छोटे चम्मच काला नमक,शहद का 1 छोटा चम्मच मिलाकर पीएं। यह पेट के कीड़े मार देता है। यह वमन का उपचार है और हैपेटाइटिस तथा अन्य रोगों में उपयोगी है। भोजन के बाद नींबू पानी एक उत्कृष्ट पेय माना गया है।

कैंसर का विनाशक 
नींबू में कैंसर कोशिकाओं का सफाया करने की चमत्कारिक क्षमता है। नींबू सभी प्रकार के कैंसर के बचाव और उपचार में बहुत कारगर है। यह कीमोथेरेपी से अधिक असरदार साबित हुई है। इसका स्वाद उम्दा है और शरीर पर कोई कुप्रभाव भी नहीं होता है। नीबू का सेवन कीमो और रेडियो के कुप्रभावों को भी कम करता है। शोधकर्ताओं ने नीबू में कुछ ऐसे तत्वों का पता लगाया है जो आँत, स्तन, प्रोस्टेट, फेफड़ा, अग्न्याशय आदि समेत १२ प्रकार के कैंसर में बहुत असरदार है। ये तत्व प्रचलित कैंसररोधी दवा एड्रियामाइसिन से १०,००० गुना असरदार है। विशेष बात यह है कि ये तत्व सिर्फ कैंसर कोशिका को ही मारते हैं, स्वस्थ कोशिकाओं पर कोई बुरा असर नहीं डालते।

रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है
नीबू के जूस से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है लेकिन इससे मोटापा नहीं बढ़ता है। पानी में नीबू और शहद मिला कर रोज पीने से आप बिना कमजोरी के वजन घटा सकते हैं।

घरेलू शैंपू है - नीबू का रस बालों की सेहत के लिए बहुत उपयोगी है। नीबू का रस लगाने से डेंड्रफ, बाल झड़ना आदि रोग मिट जाते हैं और वे चमक उठते हैं(डॉ. ओपी वर्मा,सेहत,नई दुनिया,सितम्बर 2012 प्रथमांक)।

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बुधवार, 30 मई 2012

एलोवेरा है प्राकृतिक मॉइश्चराइजर

कई तरह के पौधों के अंशों को आज कई चीजों में प्रयोग किया जाता है लेकिन इनमें से एलोवेरा को सबसे ज्यादा बहुउपयोगी माना जाता है। इसका प्रयोग 3,000 से ज्यादा वर्षों से किया जा रहा है। हालांकि इसे लिली फैमिली का सदस्य माना जाता है, लेकिन यह देखने में कैक्टस जैसा ज्यादा लगता है। यह कैक्टस के पौधे के समान मांसल और गूदेदार होता है और इसमें जूस जैसा गाढ़ा जेल पाया जाता है। आमतौर पर यह बगीचों और घरों में आसानी से मिल जाता है। सच तो यह है कि यह बहुत ही आसानी से गमलों में उग जाता है। इसका हिंदी नाम ग्वारपाठा है जबकि घकिंवर या घृतकुमारी इसका संस्कृत नाम है। प्राचीन काल से एलोवेरा को इसकी हीलिंग प्रॉपर्टी के कारण जाना जाता है। इसका प्रयोग कटे स्थान या घाव को भरने के लिए किया जाता था क्योंकि यह क्षतिग्रस्त टिशू के फॉरमेशन में सहायता करता है। यह शक्तिशाली प्राकृतिक मॉइश्चराइजर भी है। यह डेड स्किन सेल्स को मुलायम करता है और त्वचा को नर्म और चमकदार रखते हुए, उन्हें निकालने में भी मदद करता है। 

वास्तव में, यह त्वचा की मॉइश्चर ग्रहण करने की क्षमता को बढ़ाते हुए त्वचा के नॉर्मल फंक्शन में सहायता करता है। एलोवेरा में एंटी-ऑक्सिडेंट प्रॉपर्टीज पाई जाती है। यह सेल रिन्यूअल प्रोसेस को भी बढ़ाता है। कॉस्मेटिक्स प्रोडक्ट्स में स्टेब्लाइज्ड (स्थायीकृत) एलोवेरा जेल या जूस का प्रयोग किया जाता है। अगर आपने एलोवेरा के पौधे को घर में लगाया है, तो आप इसके जेल या जूस को डायरेक्ट स्किन पर अप्लाई कर सकती हैं। पौधे से लिया गया जेल पत्ते का गूदा होगा, जो पत्ते के अंदरूनी भाग में पाया जाता है। एलो का जूस पत्ती की बाहरी त्वचा के नीचे पाया जाता है। हालांकि जब आप घर पर ही इसे सीधे त्वचा पर लगाएंगी तो उससे पहले इसके पत्तों को अच्छी तरह धो लें और इसके गुणों का पूरा लाभ लें। एलोवेरा जेल या जूस को आप चेहरे पर अप्लाई कर सकती हैं, फिर 20 मिनट बाद इसे सादे पानी से धो दें। यह आपकी त्वचा को मुलायम बनाते हुए मॉइश्चराइज करेगा। सचाई तो यह है कि अगर आप इसे नियमित रूप से प्रयोग करें तो यह आपकी त्वचा को जवां बनाये रखने वाले गुणों को कायम कर सकता है। सर्दी और गर्मी, दोनों महीनों में एलोवेरा बेहतर होता है। सर्दियों में यह ड्राईनेस से बचाता और त्वचा के सॉफ्ट टेक्सचर को मेंटेन रखने में मदद करता है। 

गर्मियों में यह त्वचा को कोमल रखता है, खासकर सन एक्सपोजर के बाद। साथ ही, यह त्वचा को ऑयली बनाए बिना ही मॉइश्चराइज करता है। एलोवेरा को फेस मास्क में भी मिलाया जा सकता है। एक टेबलस्पून बेसन, एक टीस्पून संतरे के छिलके का पाउडर और एक चम्मच दही के साथ एक टेबलस्पून एलोवेरा जेल लें। सभी को अच्छी तरह मिला कर त्वचा पर लगाएं। फिर 30 मिनट बाद धो दें। एलोवेरा को आप हेयर पैक के रूप में भी प्रयोग कर सकती हैं। इसके जेल को बालों पर लगाएं और फिर 20 मिनट बाद सादे पानी से धो दें। यह ड्राई, रफ और डैमेज बालों के टेक्सचर को इम्प्रूव करके बालों को मुलायम और कांतिवान बनाता है। इसे आप हेयर पैक के साथ भी प्रयोग कर सकती हैं। क्लिंजिंग पैक के लिए बेसन, दही और एक टेबलस्पून एलोवेरा जेल लें। इन सभी को अच्छी तरह मिलाकर बालों पर लगाएं। फिर एक घंटे बाद बाल धो लें। बहुत ज्यादा ड्राई, रफ और कमजोर बालों के लिए एक अंडा, एक टेबलस्पून कास्टर ऑयल, नींबू का रस और एक टेबलस्पून एलोवेरा जेल या जूस मिलाएं। इस मिशण्रको बालों पर लगाकर प्लास्टिक शावर कैप पहन लें। आधे घंटे बाद बाल धो लें(शहनाज हुसैन,आधी दुनिया,राष्ट्रीय सहारा,नई दिल्ली से साभार)।

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गुरुवार, 3 मई 2012

पेट के लिए वरदान है त्रिफला

आंवला, बहेड़ा और हरड़ से तैयार त्रिफला अपने खास गुणों के कारण जाना जाता है। त्रिफला को पाउडर के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। जड़ी-बूटी के गुणों वाले त्रिफला में पोषण और बड़ी मात्र में विटामिन सी मौजूद रहता है। इसके अलावा औषधीय गुणों से युक्त त्रिफला के सेवन से कई तरह की तकलीफें दूर हो जाती हैं। 

-अध्ययन में यह बात सामने आई है कि त्रिफला रक्त संचार को ठीक रखने के साथ ही कोलेस्ट्रोल को कम करता है। 

-यह उच्च रक्तचाप को कम करने में मदद करता है और पाचन सुधारता है। 

-त्रिफला में एंटीआक्सिडेंट के गुण पाए जाते हैं। इसमें एलर्जी और एचआईवी विरोधी गुण भी पाए जाते हैं।

-यह एनीमिया से जुड़ी तकलीफ, थकान और पाचन में होने वाली कठिनाई को दूर करता है। 

-त्रिफला निमोनिया, तपेदिक और एड्स जैसे रोगों में भी लाभदायी होता है। 

-आंखों से जुड़ी समस्याओं में भी त्रिफला कारगर साबित होता है। एक कटोरी पानी में एक चम्मच त्रिफला को दो घंटे तक छोड़ दें। उसके बाद उसे कपड़े से छान कर पानी से आंखों को धो लें। 

-यह पानी आंखों के लिए फायदेमंद होता है। 

-त्रिफला के काढ़े से घाव को धोने से घाव जल्दी भर जाता है। 

-इसके सेवन से कब्ज की शिकायत दूर होती है। इसके लिए त्रिफला को रात में गरम पानी के साथ लें। 

-असमय बाल सफेद होने की समस्या से मुक्ति मिलती है(प्रज्ञा पाण्डेय,हिंदुस्तान,दिल्ली,25.4.12)।

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गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

लीची है पौष्टिकता से भरपूर

लीची हिमालय की पर्वत श्रंखला में पैदा होने वाला रसीला फल है जो अपने विशिष्ट स्वाद और सुगंध के कारण लोकप्रिय है। प्रायः मई से जून तक मैदानी इलाकों में मिलता है।

गुण

-लीची कोलेस्ट्रॉल संतृप्त वसा रहित लो कैलोरी फल है, जिसमें रेशे बहुतायत में होते हैं। यह उन लोगों के लिए बेहद लाभदायी है जो वज़न कम करना चाहते हैं।

-लीची में विटामिन-सी प्रचुर मात्रा में होता है। विटामिन-सी एक प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट है जो प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ संक्रामक रोगों से बचाव करता है व बढ़ती उम्र के प्रभाव को कम करता है।

-लीची में थायमीन, नायसीन और फोलिक एसिड जैसे विटामिन-बी कॉम्प्लेक्स भी पाए जाते हैं। विटामिन-बी कॉम्लेक्स शरीर में कार्बोहायड्रेट, प्रोटीन तथा वसा के चयापचय सहायक है।

-लीची से पोटेशियम व तांबा जैसे खनिज लवणों की प्रतिपूर्ति करता है। तांबा लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण के लिए आवश्यक है जबकि पोटेशियम कोशिकाओं का एक महत्वपूर्ण घटक होने के साथ रक्तचाप व हृदय गति को नियमित रखता है।

लाभ
-बच्चों की अच्छी वृद्घि : लीची में पाए जाने वाले खनिज तत्व हड्डियों व शरीर के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं।

-रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है : कई लोग मौसम बदलने पर, ख़ासकर ठंड के दिनों में खाँसी और बुखार जैसी बीमारियों की चपेट में जल्दी आ जाते हैं। नियमित रुप से लीची खाने से इससे बचा जा सकता है। खाँसी-बुखार से राहत दिलाने के अलावा लीची ट्यूमर ग्रंथियों में सूजन दूर करने में भी सहायक होती है।

-सुंदर त्वचा : लीची त्वचा के दाग़-धब्बों को हटाकर उसे सुंदर व नम बनाती है, रक्त को शुद्घ करती है।

-शक्ति व पूर्तिदायक : लीची से रक्त व शारीरिक क्षमता बढ़ती है। यह बढ़ती उम्र के प्रभाव को कम करती है साथ ही पाचन क्षमता बढ़ाती है। अध्ययन बताते हैं कि लीची में मौजूद फ्लेवनॉइड्स जैसे तत्व इसे "एन्टी-ब्रेस्ट कैंसर" गुण देती है। इसीलिए लीची का सेवन महिलाओं के लिए विशेष हितकारी है(डॉ. अनीता जोशी,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल तृतीयांक 2012)।

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रविवार, 8 अप्रैल 2012

काली मिर्च के उपयोग

काली मिर्च एक अनुपम औषधि है। लाल मिर्च की अपेक्षा यह कम दाहक और अधिक गुणकारी है। इसीलिए मसाले में लाल मिर्च की बजाय काली मिर्च का उपयोग प्रचलित है। काली मिर्च का योग्य रीति से उपयोग किया जाए तो वह रसायन गुण देती है। आयुर्वेद में काली मिर्च को सभी प्रकार के बैक्टीरिया, वायरस आदि का नाश करने वाली औषधि माना जाता है।

लाभ 
यूनानी मतानुसार काली मिर्च उदरपीड़ा, डकार और अफ़ारा मिटाकर कामोत्तेजना एवं विरेचन करती है। अरुचि, जीर्ण ज्वर, दाँत दर्द, मसूड़ों की सूजन, पक्षाघात, नेत्ररोग आदि पर भी यह हितकारी है।

-जुकाम होने पर काली मिर्च मिलाकर गर्म दूध पीयें। यदि जुकाम बार-बार होता है, अक्सर छीकें आती हैं तो काली मिर्च की संख्या एक से शुरू करके रोज़ एक बढ़ाते हुए पंद्रह तक ले जाए फिर प्रतिदिन एक घटाते हुए पंद्रह से एक पर आएँ। इस तरह जुकाम एक माह में समाप्त हो जाएगा।

-खाँसी होने पर आधा चम्मच काली मिर्च का चूर्ण और आधा चम्मच शहद मिलाकर दिन में ३-४ बार चाटें। खाँसी दूर हो जाएगी। 

-गैस की शिकायत होने पर एक कप पानी में आधे नीबू का रस डालकर आधा चम्मच काली मिर्च का चूर्ण व आधा चम्मच काला नमक मिलाकर नियमित कुछ दिनों तक सेवन करने से गैस की शिकायत दूर हो जाती है।

गला बैठना : काली मिर्च को घी और मिश्री के साथ मिलाकर चाटने से बंद गला खुल जाता है और आवाज़ सुरीली हो जाती है। आठ-दस काली मिर्च पानी में उबालकर इस पानी से गरारे करें, इससे गले का संक्रमण खत्म हो जाएगा। 

त्वचा रोग : काली मिर्च को घी में बारीक पीसकर लेप करने से फोड़ा,फुंसी आदि चर्मरोग दूर हो जाते हैं। छोटी फुंसियां दिन में दो बार लेप करने से तुरंत बैठ जाती हैं। 

फूड पॉइजनिंग 
गर्मियों में फूड पॉइज़निंग की आशंका काफी बढ़ जाती है। इस मौसम में तापमान जीवाणुओं के बढ़ने के लिए मुफीद होता है। ज़रा-सी भी चूक से आपका खाना आपको बीमार कर सकता है।

बचने के उपाय
-खाना बनाने और खाने से पहले हाथों को अच्छी तरह धोएँ। पालतू जानवरों को छूने और टॉयलेट जाने के बाद हाथ धोना न भूलें।  

- खाना बनाने के बर्तन और किचन अच्छी तरह साफ होने चाहिए।

-घर में पालतू जानवर हों तो उन्हें किचन और डाइनिंग एरिया से दूर ही रखें।

-फलों और सब्ज़ियों को खाने से पहले चलते नल के नीचे रख कर धोएँ।

-पकाई हुई दाल, सब्जी, आटे को कई दिनों के लिए फ्रिज में रखकर उपयोग में न लें।

-खाना ताज़ा ही बनाएँ।

-यदि खाने की कोई चीज़ बच गई हो तो उसे तुरंत फ्रिज में रख दें और जल्द ही खा लें। पकाया हुआ खाना दिनभर बाहर रह गया हो तो उसे फेंकने में ही भलाई है। भले ही आपको लग रहा हो कि वो खराब नहीं हुआ है, फिर भी हो सकता है कि उसमें कीटाणु पनपना शुरू हो गए हों। ये खाना भी आपको बीमार कर सकता है। 

-बासी चीज़ों को फेंकने के लिए उनके सड़ने का इंतज़ार न करें, उसके पहले ही फेंक दें। खाने के दूषित होने की शुरुआत उसके घर आने से पहले ही शुरू हो सकती है। जिस स्थान से आप फल-सब्ज़ियाँ या दूध खरीद रहे हैं, वहाँ इन्हें सही तापमान पर न रखा जाए तो ये जल्दी खराब हो जाती हैं। इसके अलावा घर में लाने के बाद चीज़ों को तुरत ही फ्रिज में सही ढ़ंग से स्टोर करने पर विशेष ध्यान दें। फ्रिज को नियमित रूप से साफ करना बहुत ज़रूरी है। चीज़ों को फ्रिज में रखकर उन्हें भूल जाने की आदत घातक होती है। फ्रिज में रखी चीज़ों को उपयोग में लेने की समय सीमा होती है। अधिक समय तक फ्रिज में रखी हुई चीज़ें भी खराब हो जाती हैं। इससे फ्रिज में रखी अन्य चीज़ें संक्रमित हो सकती हैं। हर हफ्ते फ्रिज की सफाई अवश्य करें। 

उपचार  
फूड पॉइज़निंग के लिए ज़िम्मेदार बैक्टीरिया का असर २४ से ४८ घंटे तक रहता है। इस दौरान उल्टी और दस्त के कारण व्यक्ति के शरीर में पानी की कमी हो सकती है। इसलिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें। इससे निर्जलीकरण से तो बचते ही हैं, साथ ही शरीर में मौजूद विषैले पदार्थ भी आसानी से बाहर निकल जाते हैं। पानी को उबालकर पीएँ। पानी में रीहायड्रेशन सॉल्यूशन भी मिलाकर पी सकते हैं। कई बार इलाज के लिए एंटीबायोटिक दवाएँ भी दी जाती हैं। मामला बहुत गंभीर होने पर अस्पताल में भर्ती भी किया जा सकता है(डॉ. इकबाल मोदी,सेहत,नई दुनिया,मार्च चतुर्थांक 2012)।

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रविवार, 18 मार्च 2012

प्राकृतिक औषधि है बेल

बेलफल को कच्चे तथा पके दोनों तरह से खाया जाता है। बेल का फल ही नहीं, बल्कि उसके पत्ते, बीज, जड़ भी बहुत गुणकारी होती है। यह फल नारियल की तरह ऊपर से कठोर होता है। इसके अंदर पीले रंग का गूदा होता है, जो लसदार व हल्की मिठास लिए होता है। 

बेलफल से क्या है लाभ 

-बेलफल के रस से मधुमेह व कब्ज़ से राहत मिलती है। 

- मुँह में छाले और मसूड़ों में दर्द में बेल का गूदा पानी में उबाल कर कुल्ला करने से छाले दूर होते हैं।

-बेल के गूदे को चावल के पानी के साथ मिलाकर पीने से उल्टी व डायरिया से राहत होती है। उदर विकारों में यह उपयोगी है।

-यह कृमिनाशक का कार्य करता है। बेल के पत्ते को उबालकर छान लें। यह पानी पिलाने से पेट के कीड़े नष्ट होते हैं।

-बेलफल खाने से काफी देर तक भूख नहीं लगती। सह मोटापा को कम करने में भी सहायक। गर्मियों में लू से बचाव का कारगर उपाय है।

-अपच, खट्टी डकार, एसीलिटी को भी कम करने में सहायक।

-बेल का गूदा मैश करके चेहरे पर लगाने से चेहरा चमकदार बनता है। झुर्रियाँ व झाइयाँ कम होती हैं। अतः प्रतिदिन आहार में इसे शामिल करना स्वास्थ्य के लिए अति लाभदायक है। 

बेलफल में पौष्टिक तत्व की मात्रा 

कैलोरी- १३७ किलो कैलोरी 
प्रोटीन - १.८ ग्राम 
वसा    - ०.३ ग्राम 
कैल्शियम -८५ मिलीग्राम 
कार्बोज -३१.८ ग्राम 
फाइबर - २.९ ग्राम 
आयरन -०.६ ग्राम 
विटामिन- ८ मिलीग्राम (डॉ. संगीता मालू,सेहत,नई दुनिया,मार्च द्वितीयांक,2012)। 


बेल पर दो बेहद उपयोगी आलेख यहां और यहां हैं।

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शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

गैस के अलावा भी लाभकारी है हींग

हींग एक पौधे का चिकना रस है जिसे निकालकर सुखा लिया जाता है। यह स्वाद और गंध में बहुत ही तीखी होती है। हींग भूख को बढ़ाती है, कफ और वात को खत्म करती है, सांस की बीमारी और खांसी का नाश करती है। आइए जानें कि हींग के और क्या-क्या फायदे हैं- 

-कान में दर्द रहता है तो थोड़े सरसों के तेल में जरा-सी हींग डालकर अच्छी तरह गर्म कर लें, जब हल्का गर्म रह जाए तो छान कर, बूंद-बूंद करके कान में डालें। कफ के कारण उत्पन्न हुआ यह दर्द ठीक हो जाएगा। 

-पेट में गैस की समस्या है तो हींग को पानी में धोलकर नाभि के आसपास लेप करें। पेट की गैस निकल जाएगी। यह उपाय खासकर छोटे बच्चों के लिए बहुत ही कारगर साबित है। 

-भूनी हुई हींग में आधा से एक ग्राम, अजवाइन और काला नमक मिलाकर गर्म पानी के साथ लेने से पेट में गैस का बनना व ऊपर चढ़ना एकदम ठीक हो जाता है। 

-जुकाम में भी खूब कारगर है हींग का उपयोग। 1-1 ग्राम मात्र में हींग, सोंठ और मुलहठी को बारीक पीस लें। अब इसमें गुड़ या शहद मिलाकर छोटी-छोटी चने के आकार की गोलियां बना लें। 1-1 गोली सुबह और शाम चूसें, जुकाम ठीक हो जाएगा। 

-कफ नाक में जमा हो जाता है तो हींग के घोल को नाक से सूंधें। नाक में जमा हुआ कफ निकल जाएगा और उसकी बदबू भी दूर हो जाएगी। 

-मासिक धर्म के दौरान होने वाले दर्द से परेशान रहती हैं? तो लगभग आधा ग्राम भूनी हुई हींग तीन दिन तक सुबह पानी के साथ लें। दर्द दूर हो जाएगा। यह प्रयोग मासिक धर्म शुरू होने वाले दिन से करें। 

-बच्चे को अगर गुदा मार्ग में कीड़े लगे हों तो, थोड़ा सा हींग पानी में धोलकर गुदा मार्ग पर लगाए। कीड़े नष्ट हो जाएंगे। 


-अगर पैर की एड़ियां फट गई हों, तो नीम के तेल में हींग डालकर उसे फटी जगह पर लगाएं। एड़ियां ठीक हो जाएंगी। 

-केले के गूदे में या गुड़ में बाजरे के दाने के बराबर हींग रखकर खाने से उल्टी आना, डकार आना और हिचकी आना बंद हो जाता है। -रोजाना दाल व सब्जियों में हींग का छौंक लगाने से पेट संबंधी रोग ठीक रहते हैं। 

-अगर जी मिचलाता हो तो 5 ग्राम भूनी हुई हींग, चार चम्मच अजवाइन, दस मुनक्का और थोड़ा सा काला नमक लेकर पींस लें। चौथाई चौथाई चम्मच दिन में तीन बार लें। जी मिचलाना ठीक हो जाएगा। 

-दांत में दर्द ठीक करना हो तो अफीम और हींग का फोहा दर्द वाली जगह पर रखें, आराम मिलेगा(विभा,हिंदुस्तान,दिल्ली,15.2.12)। 


हींग के कुछ अन्य असरकारी नुस्खे यहां, यहां और यहां देखें।

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शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

पेट के अलावा भी है त्रिफला का लाभ

कमजोरी के कारण शरीर बीमारियों का शिकार हो जाता है। लेकिन यदि हम थोड़ी सी सावधानी बरतकर और आयुर्वेद को अपनाए तो अपने स्वास्थ्य की सही तरह से देखभाल कर ही पाएंगे। साथ ही शरीर का कायाकल्प भी करने में आसानी होगी। त्रिफला ऐसी ही आयुर्वेदिक औषधी है जो शरीर का कायाकल्प कर सकती है। त्रिफला के सेवन से बहुत फायदे हैं। स्वस्थ रहने के लिए त्रिफला चूर्ण महत्वपूर्ण है। त्रिफला सिर्फ कब्ज दूर करने ही नहीं बल्कि कमजोर शरीर को एनर्जी देने में भी प्रयोग हो सकता है। 

विधि
सूखा देसी आंवला, बड़ी हर्रे व बहेड़ा लेकर गुठली निकाल दें। तीनों समभाग मिलाकर महीन पीस लें। कपड़छान कर कांच की शीशी में भरकर रखें। 

 - त्रिफला के नियमित सेवन से कमजोरी दूर होती है।

 - त्रिफला के नियमित सेवन से लंबे समय तक रोगों से दूर रहा जा सकता है। 

 - त्रिफला और इसका चूर्ण तीनों दोषों यानी वात,पित्त व कफ को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

 - बालों के खराब होने और समय से पूर्व सफेद होने से भी त्रिफला के सेवन से बचा जा सकता है। 

 - गाय व शहद के मिश्रण में (घी अधिक व शहद कम) के साथ त्रिफला चूर्ण का सेवन आंखों के लिए वरदानस्वरूप है। संयम के साथ इसका नियमित प्रयोग करने से आंखों के सारे रोग दूर हो जाते हैं। बुढ़ापे तक चश्मा नहीं लगेगा। 

 -त्रिफला के काढ़े से घाव धोने से एलोपैथिक एंटिसेप्टिक की आवश्यकता नहीं रहती। घाव जल्दी भर जाता है। 

 - त्रिफला के गुनगुने काढ़े में शहद मिलाकर पीने से मोटापा कम होता है। 

 - रात को गुनगुने पानी के साथ त्रिफला लेने से कब्जियत नहीं रहती। 

 - सुबह के समय तरोताजा होकर खाली पेट ताजे पानी के साथ त्रिफला का सेवन करें और इसके बाद एक घंटे तक पानी के अलावा कुछ ना लें। 

 - मौसम को ध्यान में रखकर त्रिफला के साथ गुड़, सैंधा नमक, देशी खांड, सौंठ का चूर्ण, पीपल छोटी का चूर्ण, शहद इत्यादि मिलाकर सेवन कर सकते हैं(दैनिक भास्कर,उज्जैन,7.2.12)।

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मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

लाइकोपीनःकुदरत की अनमोल भेंट

लाइकोपीन एक बहुत ही सशक्त वनस्पति का पोषक तत्व है, जो टमाटर में बहुतायत से पाया जाता है। यह विटामिन-ए यानी रेटिनोइड और बीटा केरोटिन परिवार का सक्रिय सदस्य है, जो केरोटिनोइड के नाम से जाना जाता है। प्रकृति में करीबन ६०० तरह के केरोटिनोइड पाए जाते हैं जिनमें १२-१५ हमारे शरीर में पाए जाते हैं, जिनमें लाइकोपीन एक सर्वोपरि स्थान रखता है। वैज्ञानिकों का ध्यान इस बहुउपयोगी पोषक तत्व पर थोड़े वर्ष पूर्व ही गया, क्योंकि इस पदार्थ के करिश्माई प्रभाव से मनुष्य कई भयंकर और असाध्य रोगों से बचा रह सकता है जिनमें कैंसर और हृदय रोग प्रमुख हैं। लाइकोपीन एक सशक्त एंटीऑक्सीडेंट है, जो शरीर को नुकसान देने वाले फ्री-रेडिकल्स को नष्ट कर शरीर की रक्षा करता है। लाइकोपीन विटामिन-ई से सौ गुना ज्यादा शक्ति रखता है, साथ ही बिटा-केरोटिन से दुगना प्रभावी हैं, जो फ्री-रेडिकल्स को निष्क्रिय कर देते हैं।

फ्री-रेडिकल्स : फ्री-रेडिकल्स शरीर में होने वाली जैविक उपापचय रासायनिक प्रक्रिया के बाय-प्रॉडक्ट्स है, विशेषकर तब जब हमारा शरीर धुआँ, अन्य प्रदूषित पर्यावरणजन्य पदार्थों के संपर्क में आता है तब इसकी मात्रा बढ़ जाती है, जो शरीर में क्षयकरण और कोशिकाओं को नष्ट करते जाते हैं। हमारे शरीर में ऑक्सीजन फ्री रेडिकल्स में सुपरऑक्साइड, हाइड्रोजन परऑक्साइड, हाइड्रोक्सिल आयन एवं सिंगलेट ऑक्सीजन प्रमुख हैं।

एंटीऑक्सीडेंटः एंटीऑक्सीडेंट रासायनिक रूप से फ्री-रेडिकल्स को पकड़कर उन्हें निष्प्रभावी कर देते हैं। लाइकोपीन एक बहुत ही सशक्त एंटीऑक्सीडेंट का कार्य करता है। 

लाइकोपीन के स्रोत : 
टमाटर लाइकोपीन का महत्वपूर्ण स्रोत है। टमाटर को पकाने पर भी उसमें मौजूद लाइकोपीन नष्ट नहीं होते हैं। आजकल टमाटर पल्प, कैचअप और सॉस की बोतलों में विशेष तौर पर उल्लेखित होता है कि यह कैचअप लाइकोपीन नामक पोषक तत्व से परिपूर्ण है, जो एक सशक्त प्रभावी एंटीऑक्सीडेंट है। लाइकोपीन वसा में घुलने वाला लाल रंग का वर्णक है जो टमाटर,लाल अमरूद,गुलाब अंगूरों एवं तरबूज़ों में मौजूद रहकर उनके रंग को लालिमा प्रदान करता है। 

लाइकोपीन एवं हृदयरोग 
हमारी बढ़ती उम्र के साथ हमारी रक्तवाहिनियों की आंतरिक दीवारों पर निरंतर वसा पिंडों में कोलेस्ट्रॉल के विभिन्न समूह जमा होते जाते हैं जिसे एथेरोस्केलेरोसिस प्रक्रिया कहते हैं। इसके परिणामस्वरूप धमनियों का आंतरिक व्यास कम होता जाता है। विशेषकर हृदय को रक्त प्रवाह देने वाली कोरोनरी धमनियों के प्रभावित होने पर कभी भी व्यक्ति को हार्ट अटैक हो सकता है। ऐसे में लाइकोपीन,जिसे हमारे शरीर में एक विशेष कोलेस्ट्रॉल कहते हैं,को कम करता जाता है जिससे यह रक्त वाहिनियों में जमा नहीं हो पाता है। 

प्रतिदिन दो गिलास टमाटर जूस पीकर इस समस्या से बचा जा सकता है। लाइकोपीन कोलेस्ट्रॉल बनने की संश्लेषण प्रक्रिया को कम करता है। साथ ही,कोलेस्टट्रॉल का विघटन करता जाता है। लाइकोपीन हृदयाघात एवं हृदय परिसंचरण रोगों में 33 प्रतिशत तक की कमी लाता है। 

लाइकोपीन एवं धूम्रपान 
धूम्रपान करते रहने से कोरोनरी धमनियों में एथेरोस्केलेरोसिस की प्रक्रिया बढ़ जाती है। जो धूम्रपान करते हैं,उनमें लाइकोपीन का स्तर कम हो जाता है। ऐसे लोगों को लाइकोपीन बाहर से दिया जाए तो धूम्रपान से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है। 

लाइकोपीन एवं कैंसर 
लाइकोपीन शरीर में पैदा होने वाली कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने नहीं देता है। विशेषकर स्तन और प्रोस्टेट कैंसर रोकने में कामयाब है। प्रोस्टेट कैंसर की आशंकाओं को 34 प्रतिशत तक लाइकोपीन कम कर देता है। लाइकोपीन से वेलनेस हेतु टमाटरों का भरपूर सेवन करें और टमाटर जैसे गुलाबी हो जाएं। 

लाइकोपीन बुढ़ापा रोकता हैः 
शरीर का उम्र के साथ क्षयकरण होता रहता है, विशेषकर बढ़ती उम्र में चर्म कांतिहीन होती और झुर्रियाँ पड़ने लग जाती हैं। असमय बुढ़ापे से लाइकोपीन बचाता है। दृष्टिपटल पर होने वाले क्षयकरण को भी रोकता है जिससे मेक्युलर डिजनरेशन जैसे दृष्टिदोष भी कम हो जाते हैं। लाइकोपीन पुरुष प्रजननशीलता को बढ़ाता है। महिलाओं में बार-बार गर्भपात होने को रोकता है तथा टोक्सेमिया ऑफ प्रेगनेंसी जिससे रोगी को तान के दौरे आते हैं, उनमें भी कमी लाता है। लाइकोपीन शक्ति और सुरक्षा का खजाना है। टमाटर लाइकोपीन नामक फाइटोन्यूट्रीऐंट का खजाना है(डॉ. आर. के. मालौत,सेहत,नई दुनिया,जनवरी तृतीयांक 2012)।

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शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

आयुर्वेदिक औषधि है घर का बना घी

देशी घी उतना बुरा नहीं जितना आजकल समझा जाता है। दिल की बीमारियों के लिए इसे जिम्मेदार ठहाराया जाता है जबकि यह पूरा सच नहीं है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की कसौटी पर कई बार परखे जाने के बावजूद देशी घी के प्रति धारणा बदली नहीं है। इसकी वजह यह है कि वनस्पति घी और गाय अथवा भैंस के दूध से बने घी को एक समझ लिया गया है। घर का बना हुआ घी एंटीऑक्सीडेंट्स का खजाना है जिसकी शरीर को सख्त जरूरत होती है। घी की एक खासियत है कि इसे तैयार करने के दौरान दूध के सभी प्रोटीन निकल जाते हैं जिससे यह लैक्टोस मुक्त हो जाता है। एक चम्मच घी चार बड़े चम्मच मक्खन अथवा डबल फिल्टर रिफाइंड तेल से कहीं बेहतर नतीजे देता है। 

दरअसल घी का सबसे बड़ा दुश्मन है उसका अविवेकपूर्ण इस्तेमाल। संतुलित आहार पूरे शरीर की सेहत के लिए जरूरी है। दही में लाख गुण हों लेकिन कोई केवल इसी पर जिंदा नहीं रह सकता। इसी तरह घी भले ही अन्य वसा से कहीं अधिक गुणकारी हो पर इसे अधिक मात्रा में नहीं खाया जा सकता। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान मानता है कि मक्खन और हाइड्रोजेनेटेड तेल अथवा वनस्पति घी की वसा पाचन क्रिया को धीमा कर देती है जबकि घी पेट में अम्ल स्राव की प्रक्रिया को बढ़ा देता है। जिन मरीजों का कोलेस्ट्रोल स्तर पहले से ही बढ़ा हुआ हो वे जरूर घी से परहेज रखें लेकिन स्वस्थ इंसान को घी निःसंदेह फायदा ही पहुंचाता है(संपादकीय)। 

हृदयरोग विशेषज्ञों के साथ मोटापे और दिल के रोगियों का सबसे अधिक गुस्सा घी पर ही उतरता है। आयुर्वेद में घी को औषधि माना गया है। इस सबसे प्राचीन सात्विक आहार से सर्वदोषों का निवारण होता है। वात और पित्त को शांत करने में सर्वश्रेष्ठ है साथ ही कफ भी संतुलित होता है। इससे स्वस्थ वसा प्राप्त होती है, जो लिवर और रोग प्रतिरोधक प्रणाली को ठीक रखने के लिए जरूरी है। घर का बना हुआ घी बाजार के मिलावटी घी से कहीं बेहतर होता है। 

यह तो पूरा का पूरा सैचुरेटेड फैट है, कहते हुए आप इंकार में अपना सिर हिला रहे होंगे। ज़रा धीरज रखें। घी में उतने अवगुण नहीं हैं जितने गुण छिपे हुए हैं। यह सच है कि पॉलीअनसैचुरेटेड वसा को आग पर चढ़ाना अस्वास्थकर होता है, क्योंकि ऐसा करने से पैरॉक्साइड्स और अन्य फ्री रेडिकल्स निकलते हैं। इन पदार्थों की वजह से अनेक बीमारियाँ और समस्याएँ पैदा होती हैं। इसका अर्थ यह भी है कि वनस्पतिजन्य सभी खाद्य तेलों स्वास्थ्य के लिए कमोबेश हानिकारक तो हैं ही।

फायदेमंद है घी 
घी का मामला थोड़ा जुदा है। वो इसलिए कि घी का स्मोकिंग पॉइंट दूसरी वसाओं की तुलना में बहुत अधिक है। यही वजह है कि पकाते समय आसानी से नहीं जलता। घी में स्थिर सेचुरेटेड बॉण्ड्स बहुत अधिक होते हैं जिससे फ्री रेडिकल्स निकलने की आशंका बहुत कम होती है। घी की छोटी फैटी एसिड की चेन को शरीर बहुत जल्दी पचा लेता है। अब तक आप बहुत उलझन में पड़ गए होंगे कि क्या वाकई घी इतना फायदेमंद है? अब तक तो सभी यही समझा रहे थे कि देशी घी ही रोगों की सबसे बड़ी जड़ है?

कोलेस्ट्रॉल कम होता है 
घी पर हुए शोध बताते हैं कि इससे रक्त और आँतों में मौजूद कोलेस्ट्रॉल कम होता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि घी से बाइलरी लिपिड का स्राव बढ़ जाता है। घी नाड़ी प्रणाली एवं मस्तिष्क के लिए भी श्रेष्ठ औषधि माना गया है। इससे आँखों पर पड़ने वाला दबाव कम होता है, इसलिए ग्लूकोमा के मरीजों के लिए भी फायदेमंद है। हो सकता है इस जानकारी ने आपको आश्चर्य में डाल दिया हो। घी पेट के एसिड्स के बहाव को बढ़ाने में उत्प्रेरक का काम करता है जिससे पाचन क्रिया ठीक होती ते हहृदयरोग विशेषज्ञों के साथ मोटापे और दिल के रोगियों का सबसे अधिक गुस्सा घी पर ही उतरता है। आयुर्वेद में घी को औषधि माना गया है। इस सबसे प्राचीन सात्विक आहार से सर्वदोषों का निवारण होता है। वात और पित्त को शांत करने में सर्वश्रेष्ठ है साथ ही कफ भी संतुलित होता है। इससे स्वस्थ वसा प्राप्त होती है, जो लिवर और रोग प्रतिरोधक प्रणाली को ठीक रखने के लिए जरूरी है। घर का बना हुआ घी बाजार के मिलावटी घी से कहीं बेहतर होता है। 

यह तो पूरा का पूरा सैचुरेटेड फैट है, कहते हुए आप इंकार में अपना सिर हिला रहे होंगे। ज़रा धीरज रखें। घी में उतने अवगुण नहीं हैं जितने गुण छिपे हुए हैं। यह सच है कि पॉलीअनसैचुरेटेड वसा को आग पर चढ़ाना अस्वास्थकर होता है, क्योंकि ऐसा करने से पैरॉक्साइड्स और अन्य फ्री रेडिकल्स निकलते हैं। इन पदार्थों की वजह से अनेक बीमारियाँ और समस्याएँ पैदा होती हैं। इसका अर्थ यह भी है कि वनस्पतिजन्य सभी खाद्य तेलों स्वास्थ्य के लिए कमोबेश हानिकारक तो हैं ही। 


घी खाएं या नहीं 
यदि आप स्वस्थ हैं तो घी जरूर खाएँ, क्योंकि यह मक्खन से अधिक सुरक्षित है। इसमें तेल से अधिक पोषक तत्व हैं। आपने पंजाब और हरियाणा के निवासियों को देखा होगा। वे टनों घी खाते हैं लेकिन सबसे अधिक फिट और मेहनती हैं। यद्यपि घी पर अभी और शोधों के नतीजे आने शेष हैं लेकिन प्राचीनकाल से ही आयुर्वेद में अल्सर, कब्ज, आंखों की बीमारियों के साथ त्वचा रोगों के इलाज के लिए घी का प्रयोग किया जाता है। 


क्या रखें सावधानियाँ 
भैंस के दूध के मुकाबले गाय के दूध में वसा की मात्रा कम होती है इसलिए शुरू में निराश न हों। हमेशा इतना बनाएँ कि वह जल्दी ही खत्म हो जाए। अगले हफ्ते पुनः यही प्रक्रिया दोहराई जा सकती है। गाय के दूध में सामान्य दूध की ही तरह ही प्रदूषण का असर हो सकता है, मसलन कीटनाशक और कृत्रिम खाद के अंश चारे के साथ गाय के पेट में जा सकते हैं। जैविक घी में इस तरह के प्रदूषण से बचने की कोशिश की जाती है। यदि संभव हो तो गाय के दूध में कीटनाशकों और रासायनिक खाद के अंश की जाँच कराई जा सकती है। जिस तरह हर चीज़ की अति बुरी होती है,इसी तरह घी का प्रयोग भी संतुलित मात्रा में ही किया जाना चाहिए।  

कैसे बनाएँ घी 
हमारे देश में पहले घर-घर घी बनाने की परंपरा थी, लेकिन अब कई कारणों से ऐसा संभव नहीं रहा। रूटीन से थोड़ा हटते हुए घर पर बनाएँगे तब इसके गुणों के आगे घी बनाने के सारे कष्ट भूल जाएँगे। - एक लीटर गाय के दूध को उबालकर ठंडा होने दें।
-रूम टेम्परेचर पर इसमें एक चम्मच दही मिला दें।
-रातभर के लिए ढँककर रखा रहने दें।
-सुबह दही पर जमी मलाई की परत उतारकर अलग रख लें। मलाई फ्रिज में रखें।
-सात दिन तक दही की मलाई इकट्ठा करें।
-फ्रिज से निकालकर रखें, रूम टेम्परेचर पर आने का इंतजार करें।
-मथानी से १०-१५ मिनट तक बिलोएँ।
-बिलोने के दौरान दो कटोरी पानी मिलाएँ। 
- जब झाग निकलने लगे तब इसे किसी बारीक छन्नी से छान लें।

 "घी स्मृति, मेधा, ऊर्जा, बलवीर्य, ओज, कफ और वसावर्धक है। यह वात, पित्त, बुखार और विषैले पदार्थों का नाशक है" -चरक संहिता(डॉ. संजीव नाईक,सेहत,नई दुनिया,जनवरी तृतीयांक 2012)

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गुरुवार, 26 जनवरी 2012

मसालों में छिपी है सेहत

जैसे सही मसाले आपके खाने के स्वाद को कई गुना बढ़ा देते हैं, ठीक वैसे ही मसालों की प्रकृति के बारे में सही जानकारी कई बीमारियों को आपसे कोसों दूर भगा सकती है। आप रोज जिन मसालों को उपयोग में लाती हैं, उनके फायदे अनेक हैं। आजमा कर तो देखिएः 

हींग: बढ़ती ठंड के कारण आप भी कफ की शिकार हो गई हैं तो हींग को पानी में उबालें। पानी जब हल्का गर्म रहे तो उसे छानकर उस पानी को पिएं। कफ की समस्या में कमी आप खुद महसूस करेंगी। इसके अलावा गैस की समस्या के कारण अगर पेट दर्द हो रहा है तो हींग में हल्का-सा नमक मिलाएं और उसे खाएं। पेट दर्द की परेशानी दूर हो जाएगी। तेजपत्ता: तेजपत्ता के तेज में एंटीफंगल और एंटी बैक्टीरियल गुण होते हैं और फंगल या बैक्टीरियल इंफेक्शन को दूर करने में यह कारगर होता है। 

लाल मिर्च: लाल मिर्च में एंटीऑक्सिडेंट्स होते हैं। ये कोलेस्ट्रॉल की बढ़ती मात्र पर अंकुश लगाते हैं और साथ ही कैलोरीज कम करने में भी मदद करते हैं। 

दालचीनी: यह शरीर में इंसुलिन के प्राकृतिक निर्माण को बढ़ावा देता है और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखता है। लौंग: दांत या मसूढ़े में दर्द है तो मुंह में एक लौंग रख लें। दर्द में लाभ मिलेगा। सीने में दर्द, बुखार, पेट की परेशानियां और सर्दी-जुकाम में भी लौंग फायदेमंद साबित होता है। 

इलायची: खीर या मिठाई आदि में आप इलायची के पाउडर का इस्तेमाल तो करती ही होंगी। पर क्या आपको मालूम है, मुंह की बदबू दूर करने में भी इलायची कारगर है। इसके अलावा पेट की समस्याओं को भी यह दूर करती है। अगर डायबिटीज की समस्या है तो साबुत इलायची खाएं। 

जीरा: जीरा आयरन का एक अच्छा स्नोत है और शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता को मजबूत रखने में कारगर होता है। पेट खराब होने की स्थिति में पानी में जीरा उबालने के बाद उस पानी को छानकर पीने से लाभ मिलता है। 

अदरक: ठंड के मौसम में अदरक वाली चाय पीने की सलाह तो आपने हजार बार सुनी होगी। अदरक कफ और कोल्ड से बचाने का काम करता है। इसके अलावा यह पाचन तंत्र को भी मजबूत रखता है। 

करी पत्ता: रायते के स्वाद को बेहतर बनाने वाला करी पत्ता खून में शुगर की मात्र को कम करने में भी मददगार है। 

मेथी: अगर डायबिटीज की शिकार हैं तो हर दिन जरा-सी मेथी खाएं। असर जल्द ही महसूस करेंगी। इसके अलावा मेथी कोलेस्ट्रॉल कम करने में भी मददगार होती है। 

लहसुन: ठंड के मौसम में सेहतमंद और सर्दी-जुकाम से बचकर रहना है तो अपने खाने में लहसुन को शामिल करें। इसमें एंटीबायोटिक गुण होते हैं। इसके अलावा जोड़ों के दर्द को दूर करने में भी लहसुन वाला तेल फायदेमंद है। 

पीली सरसों: सरसों का तेल शरीर की मसाज में और बालों के सही विकास में उपयोगी माना जाता है। सरसों ओमेगा-3 फैटी एसिड का अच्छा स्नोत है। यह आयरन, जिंक, मैग्नीशियम, कैल्शियम और प्रोटीन से भी भरपूर होता है। 

काली मिर्च: सर्दी-जुकाम और इंफेक्शन से बचाने के अलावा काली मिर्च मांसपेशियों के दर्द को दूर करने में भी कारगर होती है। काली मिर्च के इस्तेमाल से पाचन तंत्र से जुड़ी परेशानियों से भी छुटकारा पाया जा सकता है। 

हल्दी: तमाम दवा खाने के बाद भी कफ से निजात नहीं मिल रही है तो हल्दीवाला दूध पिएं, फायदा मिलेगा। हल्दी त्वचा संबंधी परेशानियों को दूर करने में भी मददगार है। यह शरीर की रोगप्रतिरोधी क्षमता को मजबूत बनाती है, जिससे शरीर बीमारियों से लड़ने के लिए खुद को तैयार कर लेता है(हिंदुस्तान,दिल्ली,19.1.12)।

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शनिवार, 21 जनवरी 2012

कोई विकल्प नहीं है तिल का

असीरियन पुराणों में वर्णन है कि देवताओं ने पृथ्वी का निर्माण करने से पहले तिलबीज से बनने वाली शराब पी थी। एशियाई आहार श्रृंखला में आदिकाल से तिलबीज शामिल रहे हैं। ईसा के ३००० साल पहले से ५००० साल बाद तक जिक्र होता रहा है कि चीनी सभ्यता में तिलबीज को सम्मानजनक स्थान हासिल है। वे लोग सदियों से तिलबीज के तेल के दीपक से अपनी अँधेरी रातें रोशन करते आए हैं। चीनियों की काली रोशनाई भी तिलबीज के तेल के दीपक से बनती थी। अफ्रीकन काले नीग्रो गुलामों के साथ तिल के बीज अमेरिका महाद्वीप में भी पहुँच गए। अब तिल के बीज लगभग हर व्यंजन में इस्तेमाल किए जाते हैं। एशियाई देशों में तिलबीज के तेल का इस्तेमाल खाना पकाने के लिए सदियों से इस्तेमाल किया जाता है। 

तिलबीज एक प्राचीन तिलहन है जिसका पौराणिक महत्व है। मानव इतिहास के आदिकाल से ही इसे प्रतिष्ठापूर्ण स्थान मिला हुआ है। तिलबीजों के असंख्य गुणों के कारण इसे लगभग हर धर्म के धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल किया जाता है। गुणकारी तिलबीज का तेल भोजन में तो इस्तेमाल किया ही जाता है, मालिश के लिए भी इसे मुफीद माना जाता है। तिल का तेल वेसोडायलेटर माना जाता है जिससे मालिश के बाद नसें फैलती हैं व रक्त प्रवाह बेहतर होता है। 

तिलबीज मैंगनीज़, ताँबा, कैल्शियम, मैगनेशियम, आयरन, फास्फोरस, विटामिन बी-१, जिंक और रेशे का बढ़िया स्त्रोत है। इन महत्वपूर्ण पौष्टिक तत्वों के अलावा दो और अनोखे तत्व तिल में पाए जाते हैं - सिस्सामिन और सिसामोलिन। दोनों पदार्थ विशेष लाभकारी रेशे लिगनान्स समूह के सदस्य हैं। इन्हें कोलेस्ट्रोल और उच्च रक्तचाप कम करने वाले पदार्थों के तौर पर जाना जाता है। तिलबीज लीवर को ऑक्सीडेटिव नुकसान से भी बचा लेती है। 

ज़रूरी है तांबा 
तिलबीज से भरा हुआ एक चौथाई कप तांबे की रोजाना की खुराक की ७५ फीसद मात्रा की आपूर्ति कर देता है। इसी तरह मैगनेशियम की ३२ फीसद तथा कैल्शियम की ३६ फीसद कमी की पूर्ति करता है। यदि इतने खनिज तत्व आपको खुराक में रोज़ मिल रहे हैं तो इसमें से तांबे की मात्रा रिह्यूमेटाइड आर्थराइटिस से होने वाली तकलीफ में राहत प्रदान कर सकती है। तांबा दर्द निवारण एवं एंटिऑक्सीडेंट एंज़ाइम प्रणाली में महत्वपूर्ण घटक है। यह धातु रक्त नलिकाओं में लचीलापन एवं मजबूती प्रदान करने वाली महत्वपूर्ण धातु के रूप में जाना जाता है। मैग्नेशियम से रक्त नलिकाओं में शुद्धि एवं श्वसन संबंधी बीमारियों में राहत मिलती है। मैगनेशियम से अस्थमा के दौरे में राहत मिलती है तथा श्वसन प्रणाली खुलने में सहायता मिलती है। मैगनेशियम खनिज उच्च रक्तचाप को कम करने, दिल के दौरे तथा मधुमेह के कारण होने वाली दिल की बीमारियों से बचाता है। इससे ट्राइजिमिनल न्यूरॉल्जिया के कारण होने वाले माइग्रेन के दौरे भी रूकते हैं। यह महिलाओं में रजोनिवृति के बाद होने वाले अप्रिय लक्षणों को रोकने और सामान्य नींद लौटाने में मददगार है।  

कैल्शियम कैल्शियम खनिज बड़ी आंत के कैंसर,माइग्रेन और अस्थिक्षरण को रोकने के लिए अत्यावश्यक है। तिल में यह बहुतायत से पाया जाता है। इसी तरह,जिंक धातु का हड्डियों की मज़बूती से गहरा संबंध है। आमतौर पर माना जाता है कि रजोनिवृत्ति के बाद,अस्थिक्षरण(ऑस्टियोपोरोसिस) की शिकार केवल महिलाएं ही होती हैं,जबकि यह पूरा सच नहीं है। पुरूषों में भी यह समस्या आती है-ख़ासकर बुजुर्गों में यह समस्या बहुत आम होती है। अस्थिक्षरण के कारण नितम्ब के जोड़ खराब होने की शिकायत भी सबसे अधिक वृद्धावस्था में पहुंचे पुरुषों में पाई जाती है। 

रोज़ खाएं तिल 
बुजुर्गों के आहार में तिलबीज को नियमित शामिल किया जा सकता है। ठंड में तिल के कई तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। तिल का पेस्ट ब्रेड या टोस्ट पर शङद के साथ लगाकर खाया जा सकता है। तिल के लड्डू,पट्टी,गजक आदि इसी मौसम में खाए जाते हैं। गुड़ और तिलबीज का परांठा गुणकारी ही नहीं,स्वादिष्ट भी होता है। तिल लगी हुई कई तरह के बेकरी उत्पाद जैसे-ब्रेड और बन भी बाज़ार में मिल जाते हैं। स्टीम की हुई सब्ज़ियां जैसे ब्रोकोली और फूलगोभी में नींबू और तिल का भरपूर छिड़काव करके खा सकते हैं। भुनी हुई तिल को चावल और विनेगर के साथ खाया जा सकता है। इसके अलावा,तिलबीज के तेल में भोजन पकाया जा सकता है। दक्षिण भारत में,तिल के तेल में भी कई व्यंजन पकाए जाते हैं(डॉ. प्रीति शुक्ला,सेहत,नई दुनिया,जनवरी 2012 द्वितीयांक)

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संतरा है सुरक्षा-कवच

खट्टा-मीठा, रसीला और सुंदर चटख रंग वाला संतरा देखकर ही ताज़गी आ जाती है। नाश्ते के साथ या स्नैक के रुप में संतरे का काफी उपयोग किया जाता है। यह एक ऐसा फल है जो दुनियाभर में बहुत ही लोकप्रिय है। यह लोप्रियता इस सुंदर "सिट्रस फ्रूट" को ऐसे ही नहीं मिल गई। संतरे की हर चीर कई पोषक तत्वों और गुणों से भरपूर होती है ।

संतरे में विभिन्न पोषक तत्व प्रचूर मात्रा में होते हैं। इसकी बड़ी खूबी यह है कि इसमें कैलोरीज़ काफी कम होती है। किसी भी प्रकार का सैच्यूरेटेड फैट या कोलेस्ट्रॉल संतरे में नहीं होता है। इसके विपरीत इसे खाने से डायटरी फायबर मिलता है जो इन हानिकारक तत्वों को शरीर से बाहर करने में सहायक होता है। संतरा "डासजेस्टिव सिस्टम" के लिए टॉनिक की तरह काम करता है।

संतरे में सबसे अधिक मात्रा होती है विटामिन सी की। यह एक "सिट्रस फ्रूट" है और इस प्रकार के फ्रूट्स विटामिन सी की अच्छे स्त्रोत होते हैं। संतरा नेचरल एंटीऑक्सीडेंट होता है और इम्यूनिटी बढ़ाता है। खून साफ करने के साथ ही यह स्टेमिना बढ़ाने में भी मददगार होता है। 

आँखों के लिए लाभकारी विटामिन ए इसमें अच्छी मात्रा में मिलता है। यह विटामिन बी कॉमप्लेक्स का स्त्रोत भी है जो हीमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ता है।

विटामिन के अलावा संतरे से पोटेशियम और केल्शियम जैसे मिनरल्स भी मिलते हैं। यह हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर रेगुलेट करता है और हड्डियों को मज़बूत बनाता है। 

संतरे में एन्टी इन्फ्लेमेटरी प्रॉपर्टीज़ होती है और यह हमारे शरीर में इलेक्ट्रोलाइट बैलेन्स को बनाए रखने में मदद करता है।

ऐसे ले सकते हैं 
वैसे तो किसी भी फल को प्राकृतिक रुप में खाना ही सर्वेष्ठ होता है लेकिन इसके अलावा भी कुछ तरीकों से आन इसे ले सकते हैं।

ऑरेंज ज्यूस : 
संतरे को सबसे ज़्यादा ज्यूस के रुप में लिए जाता है। एक ग्लास संतरे का रस यदि नियमित रुप से लिया जाए तो यह हेल्थ के ऑल राउंड ऑटोमेटिक प्रोटेक्टर की तरह काम करता है। इसके शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म दोनो ही तरह के फायदे होते हैं। बीमारियों से बचाने के अलावा यह उन्हे दूर करने में भी मददगार होता है(सेहत,नई दुनिया,जनवरी द्वितीयांक 2012)।

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रविवार, 8 जनवरी 2012

20 फ़ायदे हल्दी के

हल्दी के गुण अनंत हैं। हल्दी पर रोज नए शोध हो रहे हैं। भारतीय आहार शैली में यह आदिकाल से शामिल रही है। किसी समय इसे रंग के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता था। यह एक सर्वगुण संपन्ना एंटीबायोटिक्स तो है ही, प्राकृतिक चमत्कार के रूप में भी इसकी ख्याति है। यह कैंसर से लेकर अल्झाइमर्स तक कई बीमारियों को ठीक करने के लिए इस्तेमाल की जाती है। २० कारणों की वजह से हल्दी को अपने आहार में जरूर शामिल करना चाहिएः 

 1. यह एक प्राकृतिक एंटिसेप्टिक एवं एंटिबैक्टेरियल एजेन्ट है। हल्दी का पावडर जले और कटे अंग पर लगाने से संक्रमण का जोखिम कम हो जाता है। 

 2. हल्दी को फूलगोभी के साथ मिलाकर खाने से प्रोस्टेट कैंसर की आशंका जाती रहती है। इसके अलावा अगर प्रोस्टेट कैंसर हो तो उसका बढ़ना रुक जाता है। 

 3. चूहों पर हुए प्रयोग से पता चला है कि हल्दी स्तन कैंसर को फेफड़ों में जाने से रोक देती है।

 4. हल्दी से मेलानोमा यानी काले तिल उभरना रुक सकता है। इसके अलावा मौजूद मेलानोमा सेल्स आत्महत्या कर लेते हैं। हल्दी त्वचा का रूप निखारने के लिए सदियों से भारत में इस्तेमाल की जाती रही है। 

 5. बचपन में होने वाले ल्यूकेमिया यानी रक्तकैंसर का जोखिम कम हो जाता है। 6. लिवर शुद्धि के लिए यह एक प्राकृतिक छन्नी है। 

 7. हल्दी मस्तिष्क में बनने वाले एम्लोयड प्लॉक की वृद्धि एवं निर्माण रोककर एल्जाइमर्स की बढ़त पर रोकथाम कर लेती है। 

 8. यह कई प्रकार के कैंसर की वृद्धि पर रोकथाम लगाती है। 

 9. यह दाह और जलन को दूर करने का एक प्राकृतिक पदार्थ है। यह कई एंटी-इन्फ्लेमेटरी ड्रग्रस से बेहतर काम करती है और इसके कोई साइड-इफेक्ट्स भी नहीं होते। 

 10. यह प्राकृतिक दर्द-निवारक है। 

 11. चूहों पर हुए प्रयोग में पाया गया है कि हल्दी मल्टीपल स्क्लेरोसिसस की रोकथाम करने में समर्थ है। 

 12. यह वजन कम करने के साथ फैट मेटाबोलिज्म में मदद करती है। 

 13. अर्से से इसे अवसाद दूर करने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। 

 14. हल्दी आर्थ्राइटिस और रिह्यूमेटाइड ऑर्थ्राइटिस का प्राकृतिक निरोधक है। 

 15. हल्दी कीमोथैरेपी में इस्तेमाल की जाने वाली दवा पैक्लिटेक्सेल के प्रभाव को बढ़ा देती है और इसके साइड-इफेक्ट्स को कम कर देती है।। 

 16. पैंक्रियाज ग्रंथि के कैंसर पर हल्दी के प्रयोग पर हुए शोधों के नतीज़े सकारात्मक आ रहे हैं। 

 17. किसी भी ग्रंथि में नई रक्त नलिकाओं के निर्माण को हल्दी सफलतापूर्वक रोक देती है। 

18. घाव को जल्दी भरने के साथ-साथ यह क्षतिग्रस्त त्वचा को भी ठीक करती है। 

 19. सोरायसिस सहित त्वचा की कई बीमारियों के इलाज़ में हल्दी से मदद मिलती है। 

 20. कच्ची हल्दी पर हुए प्रयोगों से पता चलता है कि इससे शराबखोरी के कारण क्षतिग्रस्त हुए लिवर को ठीक करने में मदद मिलती है। 

हल्दी कच्ची और सुखाकर बनाए गए पाउडर बाज़ार में मौजूद हैं। इसके अलावा,250-300 मिलीग्राम शक्ति के हल्दी के कैप्सूल बाज़ार में मिलते हैं। 

सावधानियाँ... 
 पित्ताशय की पथरी एवं पित्त की रुकावट के मरीजों को हल्दी का प्रयोग नहीं करना चाहिए। गर्भवती महिलाएँ हल्दी का खूब उपयोग करती हैं लेकिन इससे गर्भाशय की प्रक्रिया भी तेज होने लगती है इसलिए किसी स्त्री रोग विशेषज्ञ की सलाह से इसे इस्तेमाल करना चाहिए(डॉ. संगीता मालू,सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर 2011 चतुर्थांक)। 


 रतन सिंह शेखावत जी कहते हैं कि हल्दी से तो सब्जी बनती ही है,खुद हल्दी की भी सब्जी बनती है।

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सोमवार, 2 जनवरी 2012

जानिए,क्या-क्या कर सकता है भुट्टा

हल्के पीले रंग के मक्के को हम भुट्टा भी कहते हैं। यह खाने में तो रुचिकर होता ही है, कफ-पित्त नाशक व दस्त रोकने वाला भी है। विटामिन ए, बी-2, ई, फास्फोरस, पोटैशियम, कैल्शियम, आयरन, आर्गेनिक अम्ल, फैट और प्रोटीन से भरपूर भुट्टा ऊर्जा का भी अच्छा स्त्रोत है। कार्नफ्लैक्स की तरह खाने से यह हृदय रोग में भी सहायक है। इतना ही नहीं, यह घरेलू उपचार के लिए भी काफी फायदेमंद साबित होता है। 

टीबी से पीड़ित रोगी को मक्का की रोटी खाने से फायदा होता है। 

लीवर से संबंधित समस्या हो तो गेहूं के स्थान पर मक्की के आटे का सेवन करने से लाभ होता है। मक्का के भुट्टे को जलाकर राख बना लें। इसमें स्वादानुसार सेंधा नमक डालें। अब आधा-आधा चम्मच सुबह-शाम गर्म पानी के साथ लें। खांसी से राहत मिलेगी। 

उल्टी रोकने के लिए मक्का के भुट्टों में से दाने निकालकर उन्हें जलाकर राख बना लें और आधा ग्राम राख शहद के साथ चाटें, तुरंत लाभ होगा। 

अधिक रेशे वाला भोजन होने के कारण यह वजन घटाने में भी काफी कारगर साबित होता है। मक्का के छोटे पौधों को एकत्र कर इसे पानी में उबालकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को टब में भरकर उसमें बैठने से बवासीर (पाइल्स) के दर्द में फायदा पहुंचता है। और लंबे समय तक इस्तेमाल करने से बवासीर पूरी तरह ठीक हो जाती है। 

पथरी के रोग से बचाव के लिए मक्का के बालों (सिल्क) को रातभर पानी में भिगोएं। सुबह सिल्क हटाकर पानी को पीएं, लाभ होगा। नियमित प्रयोग से लाभ होगा। ताजा मक्के के भुट्टों को पानी में उबाल लें। अब इस पानी में मिसरी मिलाकर पीयें। पेशाब की जलन और गुर्दो की कमजोरी दूर होती है। दाने निकली हुई मक्का को जलाकर उसकी राख बना लें। इस राख को पीस कर रख लें। इसका आधा ग्राम चूर्ण ताजा मक्खन के साथ खाने से दिल की कमजोरी दूर होती है। मक्का का प्रयोग अमाशय को मजबूत बनाता है और यह खून को बढ़ाने वाला है(विभा मित्तल,हिंदुस्तान,दिल्ली,29.12.11)।

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