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शुक्रवार, 4 मई 2012

किडनी की समस्या का संकेत हो सकता है पीठ दर्द

पीठ के दर्द को आमतौर पर गंभीरता से नहीं लिया जाता। लेकिन शोध कहता है कि यह दर्द किडनी की समस्या का संकेत भी हो सकता है। सुषमा कुमारी का आलेखः 

एक अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबिक सिर दर्द के बाद पीठ दर्द दूसरी आम न्यूरोलॉजिकल समस्या है, जिसकी वजह से अमूमन लोग और उनका काम प्रभावित होता है। व्यस्त जीवनशैली, तनाव और गलत पोस्चर हमें अक्सर पीठ या कमर दर्द से परेशान कर देता है। ऐसे में हम पेन किलर्स लेकर काम पर चल देते हैं। लेकिन एशियन इंस्टिटय़ूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (फरीदाबाद) के चीफ नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. जितेन्द्र कुमार के मुताबिक, बैकेक की समस्या हो और आप दर्द निवारक दवाएं लेकर निश्चिंत होने की सोच रहे हैं तो सावधान हो जाएं। कहीं आप खुद को परेशानी में न डाल रहे हों। 

रहें सतर्क 
डॉ. कुमार कहते हैं कि बेशक, हमेशा ऐसा नहीं हो सकता, लेकिन सावधान होने और सतर्कता बरतने की जरूरत अवश्य है। पीठ दर्द का कारण गुर्दे से जुड़ी कोई गंभीर बीमारी भी हो सकती है। या यूं कहें कि किडनी से जुड़ी बीमारियां पीठ दर्द के जरिए अपने होने का इशारा कर सकती हैं। समय रहते इसका पता न लगा लिया गया तो यह बड़ी समस्या का कारण बन सकता है। इस कारण बाद में आपकी किडनी प्रभावित हो सकती है और वह काम करना बंद भी कर सकती है। इसलिए पेन किलर्स लेने से पहले बीमारी का सही कारण की जानकारी जरूरी है। 

जानकारी का अभाव 
अमूमन लोगों को यह मालूम नहीं होता कि हमारी दोनों किडनियां पीछे की ओर पीठ की दीवार से चिपकी होती हैं। ये दोनों किडनियां वर्टिब्रा के अगल-बगल होती हैं, जहां पसली (रिब) खत्म होती है। किडनी के कारण होने वाला दर्द पीठ के क्षेत्र में महसूस किया जाता है, जो स्पाइन के किसी भी भाग में पीछे की ओर पसलियों के लोअर एज (नीचे किनारे की ओर) में होता है। 

किडनी में संक्रमण या छोटा स्टोन होगा तो वह पीठ की ओर होगा। ऐसे में आमतौर पर कमर का दर्द समझ कर मरीज पेन किलर ले लेते हैं, जो सही नहीं है। जानकारी के अभाव में दवा लेने से किडनी प्रभावित होती है और लोग पीठ दर्द के भ्रम में दर्द के मूल कारण की ओर ध्यान नहीं दे पाते हैं। 

किडनी दर्द के कारण 
आमतौर पर किडनी के दर्द का दो कारण होते हैं-स्टोन और संक्रमण। व्यस्त जीवनशैली में पानी कम पीने और यूरिक एसिड (प्रोटीन) व पालक, टमाटर आदि अधिक मात्र में लेने से भी यह समस्या हो सकती है क्योंकि इससे खून में केमिकल्स/ यूरिक एसिड बढ़ जाता है। 

जांच जरूर कराएं 
इसका सही-सही पता लगाने के लिए डॉक्टर यूरिन टेस्ट या किडनी का अल्ट्रासाउंड कराने के लिए कह सकते हैं। जरूरत महसूस हो तो खून से जुड़ी अन्य जांच जैसे- सिटी स्कैन, न्यूक्लीयर स्कैन आदि की भी सलाह दी जा सकती है। इन जांचों को लेकर तनाव न पालें। 

डरें नहीं 
स्टोन के आकार और उसकी सही स्थिति को देखकर बड़ी सर्जरी किए बगैर भी लिपोट्रैप्सी/लेजर/पीसीएनएल (पर क्यूटेनियस नेफ्रो लिथोट्रिप्सी) के जरिए स्टोन निकाला जा सकता है। इसलिए डरें बिल्कुल भी नहीं। 

क्या करें जब पीठ सताए 
पीठ दर्द इतना बढ़ जाए कि सामान्य गतिविधियों में भी परेशानी होने लग जाए, पैर सुन्न हो जाएं, मसल्स कमजोर होने लगे तो समझ लें कि तुरंत उचित इलाज की जरूरत है। यूरिन पास करने में दिक्कत आ रही है या उसके साथ खून आ रहा है या जलन हो रही हो तो आप किडनी की समस्या से ग्रस्त हैं। जो लोग कम उम्र में ही डायबिटीज या हाइपरटेंशन के शिकार हो चुके हैं या पथरी समेत किडनी से जुड़ी कोई अन्य समस्या रही हो, तो उन्हें अधिक सचेत रहने की जरूरत है। दर्द निवारक गोलियां न लें। 

क्यों होता है पीठ दर्द 
स्टोन छोटा होगा तो दर्द ज्यादा करेगा। स्टोन बड़ा हो जाएगा तो दर्द कम महसूस होगा। इसका यह अर्थ नहीं कि स्टोन निकल गया। आप चाहे एलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेद या किसी भी अन्य पद्धति से इलाज करवा रहे हों, दर्द कम होने के बाद यह समझने की भूल न करें कि समस्या खत्म हो चुकी है। अल्ट्रासाउंड जरूर कराएं, ताकि सही स्थिति का पता चल सके। 

यदि यूरिन में जलन, रुकावट और बुखार हो तो यूरिन संक्रमण की आशंका होती है, लेकिन किडनी वाले क्षेत्र में पीठ दर्द हो तो किडनी की समस्या (पाइलोनेफ्राट्स) की आशंका ज्यादा होती है। यदि उचित इलाज नहीं किया गया तो स्थिति गंभीर हो सकती है। मधुमेह और गर्भावस्था के दौरान इसका खतरा और बढ़ जाता है। 

किडनी में गांठ (कैंसर) हो गया हो, तब भी यह दर्द हो सकता है। इसे ग्लोमेरलो नेफरैटिस कहते हैं। इसमें दोनों गुर्दो में किसी बीमारी के कारण सूजन आ जाती है। इस कारण पीठ दर्द शुरू हो सकता है। 

यूरिन में जलन या रुकावट हो, ब्लड या प्रोटीन लीक करे या सूजन हो तो यह संकेत है कि पीठ दर्द मामूली नहीं है। इसकी वजह किडनी की समस्या हो सकती है। इस लिए किसी भी तरह के पीठ दर्द को मामूली न समझों। 

अन्य कारण 
सिगरेट पीना, शराब पीना, बढ़ती उम्र, व्यस्त जीवनशैली और तनाव, गलत पोस्चर, मोटापा, चोट, दुर्घटना(हिंदुस्तान,दिल्ली,25.4.12)

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शनिवार, 17 मार्च 2012

गंभीर गुर्दा रोग के लक्षण क्या हैं?

किडनी की बीमारियों के इलाज के लिए शुरुआती अवस्था में ही बीमारी का पता चलना ज़रूरी है। विश्व में ५ प्रतिशत से भी अधिक वयस्कों को किडनी से जुड़ी किसी न किसी तरह की परेशानी होती है। हर साल लाखों लोग गंभीर किडनी रोगों के कारण समय से पहले मर जाते हैं। देश में गंभीर किडनी रोगों से पीड़ित अधिकतर मरीज़ों में बीमारी का शुरुआती अवस्था में निदान ही नहीं हो पाता है। समय रहते इसका पता लग जाने से न केवल बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है बल्कि इससे मरीज़ में हृदय रोगों की आशंका भी कम हो सकती है।  

गंभीर किडनी रोगों के कारण 

-मधुमेह और उच्च रक्तचाप एवं किडनी का संक्रमण।

-नलिकाओं में रुकाव (प्रोस्टेट/पथरी)। 

-आनुवांशिक कारण : पॉलीसिस्टिक किडनी रोग 

भारत में मधुमेह और उच्च रक्तचाप गंभीर किडनी रोगों के सबसे आम कारण हैं। ये दोनों बीमारियाँ हृदय रोगों के लिए भी प्रमुख रूप से ज़िम्मेदार हैं। इसके अलावा यदि मधुमेह के रोगी की किडनी भी क्षतिग्रस्त हो जाती हैं तो उसे हृदय रोग होने का जोखिम आम लागों के मुकाबले १७ गुना अधिक होता है।  

किडनी रोग का निदान न होने के खतरे
समय पर बीमारी का पता न लगने से गंभीरता बढ़ती चली जाती है। किडनी रोगों के मामले में किडनी के फेल हो जाने का खतरा होता है जिसके उपचार के लिए डायलिसिस व किडनी ट्रांसप्लांट की आवश्यकता होती है।

किडनी रोगों के साथ अन्य जटिलताएँ भी उत्पन्न होने लगती हैं जैसे हृदय रोग या हार्ट अटैक, जिससे मरीज़ की असामयिक मृत्यु भी हो सकती है।शरीर में विषैले पदार्थों का जमावड़ा, हाथ-पैरों में छाले और दिमाग़ को क्षति पहुँचने की आशंका भी होती है। 

समस्या
चिकित्सकीय : मरीज़ के जीवनकाल की गुणवत्ता और अवधि कम हो जाती है।

आर्थिक : इलाज का खर्च बहुत अधिक होता है। डायलिसिस शुरू होने के बाद इलाज का मासिक खर्च रुपए १२ हज़ार से भी अधिक होता है।

सामाजिक : परिवार भावनात्मक और आर्थिक रूप से प्रभावित होता है। इलाज के लिए किडनी प्रत्यारोपण की ज़रूरत होती है, किडनी दान करने के लिए परिवार के किसी सदस्य की आवश्यकता होती है।  

इलाज 
प्रभावी इलाज के लिए शुरूआती अवस्था में ही किडनी रोग का निदान होना ज़रूरी है। किडनी रोगों का निदान शुरुआत में ही किया जा सकता है। इसके लिए लक्षणों को पहचानना आवश्यक है।

 लक्षण
-रात के समय बार-बार पेशाब आना
-मासिक धर्म का अनियमित होना।  
 - शारीरिक क्षमता घट जाना
-पैरों में पानी जमा हो जाने के कारण सूजन आना।
-भूख कम हो जाना

जाँचें
खून : रक्त में क्रिएटिनिन के स्तर का पता लगाने के लिए साधारण-सी जांच की जाती है। इससे किडनी की कार्यक्षमता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। 

पेशाबः पेशाब में क्रएटिनिन और एलब्यूमिन के लिए जांच की जाती है। 

स्क्रीनिंगः जो लोग किडनी रोगों के उच्चतम जोखिम पर हैं,उन्हें स्क्रीनिंग ज़रूर कराना चाहिए। 

-मधुमेह और उच्चरक्तचाप के मरीज़ 

-वे लोग जो मोटापे से पीड़ित और धूम्रपान के आदी हैं। 

-50 वर्ष से अधिक उम्र के लोग। 

-वे लोग जिनके परिवार में किडनी रोगों,मधुमेह या उच्च रक्तचाप की हिस्ट्री रही हो(डॉ. राजेश भराणी,सेहत,नई दुनिया,मार्च प्रथमांक 2012)।

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सोमवार, 12 मार्च 2012

गुर्दा रोग और गर्भावस्था

गर्भवती महिला के किडनी रोग से पीड़ित होने पर शिशु इससे प्रभावित हो सकता है। पहले से किडनी रोग से पीड़ित महिला में गर्भावस्था के कारण बीमारी की गंभीरता पर असर पड़ता है। स्वस्थ महिला में गर्भावस्था के कारण किडनी से जुड़ी परेशानी शुरु हो सकती है।

-गर्भावस्था के दौरान रीनल प्लाज़्मा फ्लो ५०-७० प्रतिशत तक बड़ जाता है। (पहले ६ महीनों में यह बदलाव साफ महसूस किया जा सकता है।)

-इस दौरान ग्लोमेरुलर फिल्टरेशन रेट बढ़ जाता है। गर्भावस्था के १३वें सप्ताह में यह सबसे अधिक हो जाता है और सामान्य के मुकाबले १५० प्रतिशत तक भी बढ़ सकता है।

-बदलावों के कारण युरिया और क्रिएटिनिन का स्तर भी गिर जाता है।

-गर्भावस्था के शुरुआत में प्रोजेस्टेरोन हारमोन का स्तर बढ़ जाता है जिससे शुरुआती २४ हफ्तों में रक्तचाप घट जाता है।

-शरीर में होने वाले बदलावों के कारण मूत्र मार्ग संक्रमण (यूटीआई) का जोखिम बढ़ जाता है। किडनी का आकार १-१.५ से.मि. तक बढ़ जाता है।

किडनी फंक्शन

-गर्भावस्था में एस्टिमेटेड ग्लोमेरुलर फिल्टरेशन रेट (ई.जी.एफ.आर) जाँच कराने की सलाह नहीं दी जाती है।

-पेशाब में ग्लूकोज़ की मौजूदगी वैसे तो मधुमेह के कारण होती है ,लेकिन गर्भावस्था में यह आम है। गर्भवती महिला में यह मधुमेह की सूचक नहीं है।

-गर्भावस्था के दौरान पेशाब के ज़रिए अधिक मात्रा में प्रोटीन निकलने लगता है लेकिन यह एक दिन में ३०० मिलिग्राम से अधिक कभी नहीं निकलता है।

-गर्भवती महिला के पेशाब में प्रोटीन की मात्रा लगातार ५०० मिलिग्राम/दिन से अधिक होने पर तुरंत किडनी रोग विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए।

गर्भावस्था में किडनी रोग 
गर्भावस्था में किडनी रोग की शुरुआत या किडनी फेल भी हो सकती है। इससे गर्भस्थ शिशु का विकास अवरुद्ध हो सकता व अचानक गर्भपात होने का खतरा भी रहता है। इसके अलावा उच्चरक्तचाप और समय पूर्व प्रसव की आशंका भी होती है।  

किडनी रोग से पीड़ित महिला में प्रेग्नेंसी
किडनी रोग से पीड़ित महिला को गर्भधारण करने से पहले स्त्री रोग विशेषज्ञ और किडनी रोग विशेषज्ञ काउंसिलिंग लेनी चाहिए ताकि यह पता चल सके कि महिला सुरक्षित गर्भधारण कर सकती है या नहीं। यदि किडनी फंक्शन अधिक प्रभावित न हो तो महिला सुरक्षित गर्भधारण कर सकती है। हालाँकि मरीज़ को प्रसवपूर्ण कुछ जटिलताएँ हो सकती हैं जैसे हायपरटेंशन और प्रि-एक्लेम्पशिया। 

किडनी रोग की अवस्था थोड़ी गंभीर होने पर गर्भावस्था के दौरान महिला को उच्चरक्तचाप, प्रि-एक्लेम्पशिया, समयपूर्व प्रसव पीड़ा, जन्म के समय शिशु का वज़न कम होना या गर्भपात जैसी समस्या हो सकती है। ऐसी स्थिति में किडनी को स्थाई क्षति भी हो सकती है।

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गुरुवार, 8 मार्च 2012

विश्व गुर्दा दिवस विशेषः मधुमेह और रक्तचाप हैं गुर्दे के दुश्मन

मधुमेह और उच्च रक्तचाप दो ऐसे हत्यारे हैं जो पीठ के पीछे से वार करते हैं। अक्सर मरीज़ को इन बीमारियों के प्रारंभिक लक्षणों का पता नहीं चलता। गुर्दे इन दोनों बीमारियों के सबसे अधिक जोखिम पर होते हैं। गुर्दों की जाँच का मौका तभी आता है जब वे क्षतिग्रस्त हो चुके होते हैं। देश में अब तक बीमारी हो चुकने के बाद इलाज की जद्दोजहद पर ही ध्यान केंद्रित है। बीमारी की रोकथाम के लिए कभी पहल नहीं की गई। मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसे घातक हमलावरों की पहचान समय रहते होना सभी के हित में है। इन दोनों बीमारियों से खड़ी होने वाली समस्याओं के निराकरण में समाज और परिवार का मूल्यवान धन नष्ट होता है। 

रोगों से बचाव के लिए एक रणनीति की जरूरत होती है। स्वास्थ्य को लेकर देश में अभी हम इतना सुदृड़ ढांचा तैयार नहीं कर सके हैं कि मधुमेह या उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों की रोकथाम समय रहते कर सकें। चिकित्सा विज्ञान की पुस्तकों में दर्ज है कि चालीस साल की उम्र के बाद उच्च रक्तचाप और मधुमेह की नियमित जांच करना चाहिए, लेकिन ये मानक हमारे देश की आबादी पर लागू नहीं होते। पहले ही हमें मधुमेह की राजधानी का दर्जा हासिल है। किशोरावस्था से ही मधुमेह और उच्च रक्तचाप शरीर में घर कर लेते हैं। टीन एज में जहाँ किसी मनपसंद ब्रांच पाने का तनाव होता है वहीं युवावस्था में कैरियर का चुनाव तनावग्रस्त कर देता है। मनमुआफिक लक्ष्य हासिल नहीं कर पाने के कारण तनावग्रस्त युवा उच्च रक्तचाप और मधुमेह के जोखिम के नज़दीक पहुंच जाते हैं। 

दरअसल कॉलेजों में ही उच्च रक्तचाप और मधुमेह की स्क्रीनिंग की जानी चाहिए। इससे न सिर्फ इन बीमारियों को शुरूआती स्तर पर पकड़ने में मदद मिलेगी बल्कि गुर्दों को क्षतिग्रस्त होने से बहुत पहले बचाया जा सकेगा। आज दुनिया के धनाढ्य देश भी अपने नागरिकों को मुफ्त डायलिसिस की सुविधा नहीं मुहैया करा पाते। हमारे जैसे विकासशील देश पर गुर्दों के रोगों का बोझ असहनीय है(संपादकीय,सेहत,नई दुनिया,मार्च प्रथमांक,2012)।

मधुमेह से प्रभावित होती हैं किडनी 
विश्वभर में कैंसर और हृदय रोगों के बाद किडनी रोग मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है। भारत में ही हर साल किडनी फेल होने की वजह से २ लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है। यही नहीं हर साल गंभीर किडनी रोगियों की संख्या के साथ १ लाख नए रोगी जुड़ जाती है। इन सभी को इलाज की ज़रुरत होती है। किडनी रोगियों में से ९ लाख मरीज़ों को डायलिसिस की ज़रुरत होती है लेकिन इनमें से केवल २ प्रतिशत डायलिसिस करवा पाते हैं और ५ प्रतिशत में ही ट्रांसप्लांट हो पाता है। मध्यमवर्गीय मरीज़ों में डायलिसिस का प्रतिमाह का खर्च पूरे परिवार की मासिक आय जितना हो सकता है या फिर इससे अधिक भी हो सकता है। इसका मतलब ये हुआ कि लगभग ९० प्रतिशत मरीज़ इलाज का खर्च वहन नहीं कर पाते।

कारण पर ध्यान दें  
मधुमेह और उच्चरक्तचाप जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ १० में से ६ किडनी रोगियों में गंभीर किडनी रोगों का कारण बनती हैं। भारत को विश्वभर में मधुमेह की राजधानी कहा जाता है इसलिए यहाँ स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। यहाँ के युवा भी इस बीमारी के शिकार होते जा रहे हैं जिससे पूरी स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है। 

मधुमेह रोगियों में किडनी रोगों की आशंका बढ़ जाती है। मधुमेह अनियंत्रित होने पर रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ जाता है। लंबे समय तक इसके बढ़ा हुआ रहने के कारण किडनी में मौजूद बारीक-बारीक रक्तवाहिनियाँ क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। समय के साथ इससे किडनी की कार्य क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ने लगता है। क्षतिग्रस्त होने पर इन रक्तवाहिनियों में रिसाव होने लगता है। फलस्वरुप खून में रहने के बजाय थोड़ी-थोड़ी मात्रा में प्रोटीन पेशाब के ज़रिए शरीर से बाहर निकलने लगता है। इसे माइक्रो एलब्यूमिनयूरिआ कहते हैं।  

माइक्रो एलब्यूमिनयूरिआ किडनी रोग की शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण अवस्था होती है। यदि समय रहते इसका पता लगने पर तुरंत ही इलाज शुरु होने से बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। ध्यान न देने पर समय के साथ रोग बढ़ता ही जाएगा और पेशाब में प्रोटीन की मात्रा बढ़ती चली जाएगी। पेशाब में प्रोटीन की बहुत अधिक मात्रा को मेक्रो एलब्यूमिनयूरिआ कहते हैं। इसके बाद कभी भी किडनी फेलियर की अवस्था आ सकती है। गंभीर किडनी रोग हो जाने के बाद किडनी फिर से पहले की तरह स्वस्थ तो नहीं हो सकती लेकिन कुछ सावधानियाँ बरतने से बीमारी के बढ़ने की दर धीमी हो सकती है। ग्लुकोज़ की मात्रा को नियंत्रित करने के अलावा मधुमेह रोगियों को हर साल एस्टिमेटेड ग्लोमेरुलर फिल्टरेशन रेट (ईजीएफआर) टेस्ट करवाना चाहिए ताकि किडनी की कार्यक्षमता का अंदाज़ा लगाया जा सके। किडनी की कार्यक्षमता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जाता है कि यह प्रतिमिनिट कितना खून फिल्टर करती है। यह ६० मिलिमीटर प्रतिमिनिट से कम हो तो किडनी रोग होने की आशंका होती है। खाने-पीने में सतर्कता बरतने और सक्रिय बने रहने से किडनी रोगों का जोखिम घट जाता है। आहार में प्रोटीन, शक्कर और नमक की मात्रा नियंत्रित रखना चाहिए। स्वस्थ जीवनशैली अपनाने पर मधुमेह और उच्चरक्तचाप जैसे रोगों से बच सकेंगे।

इन बातों का भी रखें ध्यान 
-शक्कर की मात्रा सीमित करने के अलावा मधुमेह रोगी इन बातों का भी ध्यान रखें ताकि किडनी रोग का जोखिम घट सके

-फल, सब्ज़ी और साबुत अनाज, वसा-रहित डेयरी उत्पाद से भरपूर पोषक आहार लें। सैच्युरेटेड फैट, ट्रांस फैट और सोडियम व शक्कर की अधिकता वाले पदार्थों से परहेज़ करें।

-प्रोटीन की मात्रा कम होने से किडनियों का भार कम हो जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि प्रोटीन से पूरी तरह परहेज़ कर लिया जाए। थोड़ी-थोड़ी मात्रा में नियमित रुप से प्रोटीन लेना चाहिए।

-सप्ताह में कम से कम ५ दिनों में ३० से ६० मिनिटों तक शारीरिक श्रम करें। व्यायाम शुरु करने या सक्रियता बढ़ाने से पहले अपने चिकित्सक से सलाह ज़रुर लें।

-दवाओं का डोस अपने मन से निर्धारित न करें। चिकित्सक के निर्देशानुसार ही दवाएँ लें, ख़ासकर वे दवाएँ जो मधुमेह, उच्चरक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने के लिए दी गई हों।

-रक्तचाप नियंत्रित होना चाहिए।

-शराब, तंबाकू और धूम्रपान से दूर रहें। इसके आदि हों तो जल्द से जल्द छुटकारा पाने के प्रयास शुरु कर दें(डॉ. अश्विनी गोयल,सेहत,नई दुनिया,मार्च प्रथमांक 2012)।

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रविवार, 29 जनवरी 2012

गुर्दे के दर्द हो हल्के में न लें

गुर्दों का महत्व हमारे लिए बेहद खास है। यह हमारे लिए काफी काम तो करते ही हैं, काफी तकलीफ भी सहते हैं। ऐसे में यह भी बेहद जरूरी है कि हम भी उनकी तकलीफ का खयाल रखें, ताकि वह हमारे लिए सही तरह काम करते रहें। गुर्दों की कौन-कौन सी तकलीफ हमारे लिए खतरे की घंटी हो सकती है और उनका कैसे खयाल रखें, बता रहे हैं अभिजीत श्रीवास्तवः

हमारे शरीर में गुर्दों का बेहद महत्वपूर्ण स्थान है। शरीर की गंदगी बाहर करने के अलावा गुर्दों का काम हमारे शरीर में बनने वाले अम्ल की मात्र को भी निर्धारित करना होता है, ताकि हमारा रक्तचाप नियंत्रित रहे। गुर्दों की एक खास बात यह होती है कि वे बिना किसी बड़ी वजह के दर्द नहीं देते। मतलब अगर आपके गुर्दों में या उनके आसपास के हिस्सों में दर्द हो रहा हो तो इसे नजर अंदाज बिलकुल नहीं करना चाहिए। यहां तक कि दुनिया में प्रचलित किडनी की गंभीर बीमारियों में से ज्यादातर में दर्द का लक्षण नहीं होता। 

क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) या गुर्दे की कई गंभीर बीमारियों में शुरुआती दौर में मरीज को दर्द की शिकायत नहीं होती। मगर कुछ बीमारियों में गुर्दे या किडनी के आसपास स्थित शरीर के हिस्सों, जैसे कमर में दर्द हो सकता है। 

गुर्दे में पथरी 
यह समस्या होने पर गुर्दे में दर्द तब शुरू होता है, जब पथरी के छोटे-छोटे टुकड़े खिसक कर मूत्र नली में आ जाते हैं। पथरी होने की दशा में गुर्दे के आसपास कमर में पीछे की तरह दर्द होता है। इस दर्द की तीव्रता हल्की से बहुत गंभीर हो सकती है। 

इसके अलावा ध्यान देने वाली बात यह भी होती है कि अगर दर्द काफी तेज है तो मरीज को इसके साथ-साथ मितली या उल्टी हो सकती है। 

यूटीआई संक्रमण 
पेशाब नली में गंभीर संक्रमण होने पर भी गुर्दे में दर्द की शिकायत हो सकती है। यह समस्या होने पर मरीज को कमर में गुर्दे के आसपास की जगह पर और पेट में दर्द हो सकता है। इसके अलावा यह परेशानी अपने साथ तेज बुखार लाती है। पेशाब नली में संक्रमण के शिकार मरीज को पेशाब करने में जलन भी होती है। 

पेशाब की नली में रुकावट (यूटीओ) 
इस समस्या में गुर्दे की पथरी खिसक कर जब पेशाब नली में आ जाती है तो मूत्र मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। इसके अलावा इसमें रुकावट आने की एक और वजह पेशाब नली का सिकुड़ना या नली में टय़ूमर हो सकता है। यूटीओ होने पर मरीज को हल्का या मध्यम तीव्रता का दर्द हो सकता है। पेशाब नली में अचानक रुकाव होने पर यह दर्द असह्य हो जाता है। यूटीओ में जो दर्द होता है, वह लगभग वैसा ही होता है, जैसा गुर्दे में पथरी होने पर होता है। 

पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज (पीकेडी) 
इस बीमारी में गुर्दे में कई गांठें उभर आती हैं, जिनके बढ़ने पर समस्या जटिल हो जाती है। इस बीमारी में गुर्दे का आकार बढ़ सकता है या गुर्दा बेकार भी हो सकता है। 

कुछ मरीजों में यह गांठें काफी तेजी से बढ़ती हैं और इसमें खून भी आता है, जिससे काफी तेज दर्द होता है। इसके अलावा इन गांठों में संक्रमण होने पर गुर्दे के आसपास कमर में पीछे की तरफ दर्द हो सकता है। डॉक्टर अक्सर ऐसे मरीजों को गुर्दे में पथरी की जांच कराने की सलाह देते हैं, ताकि यह स्थापित हो जाए कि मरीज को पथरी है या सिस्ट की समस्या है। 

रिनल सेल कार्सिनोमा 
यह किडनी का कैंसर है और इसमें मरीज को एक साथ कई परेशानियां हो सकती हैं। इसमें कमर में पिछले हिस्से में दर्द होने के अलावा पेशाब में खून आ सकता है और पेट में भी गंभीर समस्या हो सकती है। 

खून की कमी और मेलिग्नेंसी के चलते मरीज के वजन में तेज गिरावट हो सकती है। इसका कारण यह होता है कि लाल रक्त कणों के निर्माण के चलते गुर्दे ठीक तरह से काम नहीं कर पाते। पेज किडनी किसी भी कारण से गुर्दे में चोट लगने पर किडनी टिश्यू में खून रिसने लगता है। खून आने से गुर्दे के अंदरूनी हिस्सों पर दबाव बढ़ जाता है और हाइपरटेंशन भी हो सकता है। इसके अलावा कमर के आसपास के हिस्से में तेज दर्द भी हो सकता है। 

लोइन पेन हेमाटय़ूरिया सिंड्रोम 
यह एक असाधारण बीमारी है और इसमें मरीज को कभी-कभी पेशाब खून आने की शिकायत होती है और कमर में पीछे की तरफ दर्द भी होता है। डॉक्टर अक्सर ऐसे मामलों में कई तरह की जांच कराने के लिए मरीज को कहते हैं, ताकि वे तकलीफ के कारणों को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त हो सकें। दर्द से पूरी तरह राहत पाने के लिए और बीमारी से निजात पाने के लिए यह बेहद जरूरी है। 

किडनी संबंधी बीमारी में सजर्री के विकल्प 
लिथोट्रिप्सी 
गुर्दे में पथरी होने पर अपनाई जाने वाली यह सबसे कम प्रचलित प्रक्रिया है। इसके तहत सधे हुए मगर तेज झटकों के जरिए गुर्दे या पेशाब नली में मौजूद पथरी पर प्रहार किया जाता है। इससे पथरी के टुकड़े और भी छोटे कणों में टूट जाते हैं। इस प्रक्रिया में अनुमानित खर्च 40,000 से 60,000 रुपये के बीच आता है। 

गुर्दे का प्रत्यारोपण 
यह प्रक्रिया अपनाने की सलाह डॉक्टर तब देते हैं, जब मरीज के दोनों गुर्दे खराब हो जाते हैं और उनके ठीक होने की कोई गुंजाइश नहीं रहती। 

किडनी फेल होने पर मरीज के करीबी रिश्तेदार का गुर्दा प्रत्यर्पित किया जाता है। किसी की किन्हीं कारणों से मौत हो गई हो, उसका भी गुर्दा प्रत्यारोपित किया जा सकता है। इसमें यह ध्यान रखा जाता है कि जिस व्यक्ति की किडनी प्रतिरोपित की जा रही है, उसे इससे संबंधित कोई बीमारी या संक्रमण कभी न रहा हो। इस प्रक्रिया में चार से छह लाख रुपये तक का खर्च आ सकता है(हिंदुस्तान,दिल्ली,11.1.12)।

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रविवार, 22 जनवरी 2012

आप कितना जानते हैं गुर्दे के बारे में ?

प्र.१. खून को फिल्टर करना गुर्दों का एकमात्र काम है? 

१. सही 
२. ग़लत 

उत्तर २

विवरण- गुर्दे कई महतवपूर्ण काम करते हैं। ये खून को फिल्टर करके शुद्घ करते हैं, इसमें मौजूद अपशिष्ट पदार्थों को अलग करते हैं। ये अतिरिक्त तरल पदार्थों को भी अलग करते हैं ताकि शरीर में नमक व खनिजों का संतुलन बरकरार रहे। ये रक्तचाप नियंत्रित करने में भी सहायक होते हैं। 

प्र.२. पेशाब गुर्दों में बनता है? 

१. सही 
२. ग़लत 

उत्तर- १

विवरण- गुर्दे जटिल मशीन की तरह काम करते हैं। एक व्यक्ति के गुर्दे प्रतिदिन खून फिल्टर करके उसमें से लगभग १से २ लीटर अपशिष्ट और अतिरिक्त तरल पदार्थ को अलग करते हैं। यही अपशिष्ट और अतिरिक्त तरल पदार्थ पेशाब होता है जो गुर्दों से निकलकर ब्लेडर में इकठ्ठा होता है। 

प्र. ३. गुर्दों के कार्य के लिए कौन सी मेडिकल टर्म का इस्तेमाल किया जाता है? 

१. हिपेटिक 
२. रीनल 
३. इंटेस्टिनल 
४. लम्बर 

उत्तर २

विवरण- रीनल शब्द का उपयोग किडनी के संबंध में किया जाता है। "रीनल फंक्शन" और "किडनी फंक्शन" दोनो का एक ही मतलब है। इस टर्म का उपयोग यह बताने के लिए किया जाता है कि किडनी खून को फिल्टर करने का काम कितने अच्छे से कर रही है। जिन लोगों की दोनो किडनी स्वस्थ होती हैं, उनमें रीनल फंक्शन १०० प्रतिशत होता है। 

प्र. ४. गुर्दों की असाध्य बीमारी के आम लक्षणों में शामिल हैं - 

१. रात को अधिक पेशाब आना 
२. भूख कम होना 
३. हाथों और पैरों में सूजन आना
4. ऊपर बताए सभी 

उत्तरः 4 

विवरणःगुर्दों की बीमारी होने पर ये सभी लक्षण दिखाई दे सकते हैं। कम मात्रा में पेशाब आना,हाथों और पैरों में सूजन,आंखों के आस-पास सूजन होना। मुंह का स्वाद खराब होना,मुंह से दुर्गंध आना,थकान बनी रहना,सांस फूलना,भूख कम होना,रक्तचाप बढ़ना,त्वचा पीली पड़ना,त्वचा में बहुत रूखापन,खुजली होना(सेहत,नई दुनिया,जनवरी द्वितीयांक 2012)

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मंगलवार, 29 मार्च 2011

थायराइड की दवा से किडनी का इलाज

दवा थायराइड की, इलाज किडनी का। पढ़ने, सुनने में यह अटपटा लग सकता है लेकिन ऐसा हुआ है। यह कमाल कर दिखाया है छत्रपति शाहू जी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के डॉक्टरों ने। यहां के डॉक्टरों ने एक ऐसी बीमारी ठीक की जो दुनिया में इससे पहले केवल दो लोगों को हुई थी। इस उपलब्धि को एक शीर्ष ब्रिटिश जरनल प्रकाशित करने जा रहा है। छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विवि में दुनिया का तीसरा अनोखा केस सामने आया है। ऐसा मामला जिसने चिकित्सा क्षेत्र में एक नई बहस और शोध को दिशा दे दी है। शोधकर्ताओं को सोचने पर मजबूर किया है कि थायराइड ग्रंथि की अनियमितता भी गुर्दे की बीमारी के लिए जिम्मेदार हो सकती है। मेडिसिन विभाग में डायलिसिस यूनिट का जिम्मा संभाल रहे डॉ.एमएल पटेल ने बताया कि लगभग छह महीने पहले उनके पास सीतापुर का एक मरीज रेफर होकर आया था। 45 वर्षीय श्रीपाल को गुर्दे की बीमारी थी। उसका यूरिया क्रेटिनिन ज्यादा (लगभग 3) था। उसे भूख नहीं लगती थी और हाथ-पैरों में सूजन थी। जांच की गई, पता चला कि उसे हाइपो थाइरॉयडिज्म भी है। डॉ.पटेल के मुताबिक यह अलग तरह की बीमारी लगी। इलाज भी अलग तरीके से किया गया। मरीज को कुछ समय तक सिर्फ थाइरायड की दवाएं दीं। इसके आश्चर्यजनक परिणाम देखने को मिले। पता चला कि सिर्फ थाइरॉयड की दवाओं से उसकी किडनी संबंधी दिक्कतें भी दूर हो गई। अध्ययन शुरू हुआ तो पता चला कि दुनिया में अब तक इस तरह के दो ही केस रिपोर्टेड हैं, जिनमें थाइरायड की दवाओं ने किडनी की परेशानी दूर कर दी। ब्रिटिश मेडिकल जरनल ने प्रमाणित किया है कि यह दुनिया का तीसरा अनोखा केस है, साथ ही जरनल ने पेपर को प्रकाशित करने की स्वीकृति दी है। इससे पहले सितंबर 2008 में इंगलैंड के डॉरसेट कंट्री हास्पिटल में दो ऐसे ही मामले आए थे(शैलजा तिवारी,दैनिक जागरण,लखनऊ,29.3.11)।

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बुधवार, 9 मार्च 2011

गुर्दे पर हिंदी में विश्व की पहली वेबसाइट

विश्व किडनी दिवस पर देश के लाखों किडनी मरीजों के लिए यह सचमुच एक बहुमूल्य तोहफा है। माना जा रहा है कि किडनी को लेकर जागरुकता फैलाने में यह वेबसाइट बहुत प्रभावी भूमिका निभाएगी। यह वेबसाइट राजकोट (गुजरात) के समर्पण अस्पताल के जाने माने नेफ्रोलॉजिस्ट (किडनी रोग विशेषज्ञ) डॉ. संजय पांड्या ने तैयार की है।

किडनी एक ऐसा अंग है जो खराब हो जाए तो उसका इलाज बहुत ही कठिन एवं बेहद खर्चीला होता है। इसलिए सबसे अच्छा तरीका है कि हम किडनी को खराब ही न होने दें। मधुमेह की दुनिया की राजधानी होने की वजह से भारत में किडनी पर भारी खतरा है। बचाव के लिए किडनी के बारे में जागरुकता जरूरी है । दस मार्च को किडनी विश्व दिवस है। डॉ. पांड्या ने बताया है कि www.kidneyinhindi.com नामक इस वेबसाइट में हिंदी भाषा में किडनी की बीमारियों एवं उनसे बचाव पर आधारित एक मात्र किताब "सुरक्षा किडनी की" को अपलोड किया गया है। इस वेबसाइट पर २०० पन्नों की यह किताब मुफ्त में पढ़ी जा सकती है। डॉ. पांड्या ने किडनी के २४ वर्ष के इलाज के आधार पर इस पुस्तक एवं वेबसाइट को तैयार किया है। हिंदी के साथ साथ यह वेबसाइट गुजराती भाषा में भी है।

पिछले सप्ताह दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय हीमो डायलिसिस सोसायटी की चौथी कांग्रेस में आए विशेषज्ञों की आम राय भी यही थी कि भारत जैसे देश में किडनी के रोग से बचाव ही एक मात्र रास्ता है। डायलिसिस के खर्च को देखते हुए किडनी की सुरक्षा पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। इंडियन सोसायटी आफ हीमोडायलिसिस के सचिव एवं सर गंगाराम अस्पताल के जाने माने नेफ्रोलॉजिस्ट डा. डी एस राणा ने भी विश्व किडनी दिवस के अवसर पर किडनी के रोग से बचाव का आह्वान किया है। उन्होंने कहा है कि अगर किडनी खराब हो जाए तो एक महीने में ही डायलिसिस का खर्च (२० से २५ हजार रुपए) जितना आता है, उसे वहन करना आम आदमी के बस के बाहर की बात है। इसलिए किडनी को लेकर जागरुकता फैलाना बेहद जरुरी है(नई दुनिया,दिल्ली,9.3.11)।

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शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

दुनिया की पहली कृत्रिम किडनी तैयार, जल्द होगा प्रत्यारोपण

दुनिया की पहली कृत्रिम किडनी तैयार कर ली गई है। कॉफी के कप जितनी बड़ी इस किडनी का प्रत्यारोपण किया जा सकता है। खास बात यह है कि भारतीय मूल के अनुसंधानकर्ता की अगुवाई में वैज्ञानिकों की एक टीम ने इस महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोज करने का दावा किया है।

कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय की शुवो रॉय और उनके सहयोगियों ने एक ऐसी कृत्रिम किडनी का निर्माण किया है जो न केवल खून को साफ करती है बल्कि इंसानी किडनी की कोशिकाओं का उपयोग कर रक्तचाप नियंत्रित करने और विटामिन डी के निर्माण का काम भी करती है।

टीम ने इसका परीक्षण जानवरों पर किया है और अब वे इसका प्रयोग इंसानों पर भी करने जा रहे हैं। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी द्वारा प्रकाशित पत्रिका टेक्नोलॉजी रिव्यू में रॉय ने कहा कि डायलिसिस न केवल काफी समय लेता है बल्कि कमजोर भी बनाता है। कई मरीज इससे अच्छा महसूस नहीं करते। कृत्रिम किडनी के दो हिस्से हैं। एक मैं सिलिकन के बेहद बारीक फिल्टर हैं, जो खून के अपने दबाव से शुगर, सॉल्ट, पानी और दूसरे तत्वों को छान लेते हैं। किडनी के दूसरे चैम्बर में इंसानी किडनी के सेल्स की परत होती है, जिससे गुजर कर कुछ शुगर, सॉल्ट और पानी फिर से खून में लौट आते हैं। यहीं विटामिन-डी भी बनता है। इस प्रोसेस से खून का जरूरी प्रेशर कायम रहता है। नॉर्मल किडनी भी ऐसा ही करती है, लेकिन किडनी के फेल हो जाने पर जिस डायलिसिस से काम लिया जाता है, वह ऐसा नहीं कर पाता। नई किडनी न केवल खून साफ करती है बल्कि कई तरह के काम निपटाती है जा डायलिसिस नहीं कर पाती।

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रविवार, 19 सितंबर 2010

मां की गर्भनाल बनेगी बीमारी के लिए रामबाण

जन्म देने वाली मां ही बच्चों के भविष्य की बीमारियों के लिए रक्षा कवच तैयार करेगी। इसके लिए गर्भनाल संरक्षण को बढ़ावा देने के वास्ते, अब सरकारी प्रयास भी तेज कर दिए गए है। आई सीएमआर की सहमति के बाद जल्द ही अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भी कार्ड संरक्षण का काम शुरू किया जाएगा। अभी तक संस्थान कुछ ही मामलों में स्टेम सेल्स संरक्षण का काम कर रहा है । जन्म के बाद नवजात को मां से जोड़ ने वाले गर्भनाल में हजारों की संख्या में स्टेम सेल्स मौजूद होते हैं , इन सेल्स को संरक्षित कर रक्त संबंधी विकार व क्षतिग्रस्त अंगों को सही किया जा सकता है । हालांकि लोगों में गर्भनाल संरक्षण की जागरूकता न होने के कारण दो करोड़ की आबादी में केवल 1500 लोगों ने ही राजधानी में गर्भनाल को सुरक्षित कराया है । निजी कंपनियों के सहयोग से अब गर्भनाल संरक्षण को सरकारी अस्पतालों में भी शुरू करने की पहल की जा रही है । स्वास्थ्य मंत्रालय के उच्च पदस्थ अधिकारी ने बताया कि वर्ष 2007 में जारी आई सीएमआर की गाइडलाइन के बाद इस समय दो दर्जन कंपनियां स्टेम सेल्स संर क्षण पर काम कर रही है । संरक्षण का व्यवसायिक उपयोग न हो इसलिए क्षेत्र में सरकारी दखल बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। कैसे होता है संरक्षण जन्म के तुरंत बाद 5 घंटे के अंतराल में मां से बच्चे को अलग करने वाली नाल को किट में संरक्षित किया जाता है। प्राइवेट व व्यक्तिगत बैंकिंग के बाद माता पिता को बारकोड कार्ड दिया जाता है, जरूरत पड़ने पर बैंक में इसी बारकोड का मिलान कर नाल को इस्तेमाल किया जाता है । निजी कंपनियां फिलहाल 75 हजार के शुल्क पर 21 साल तक नाल संरक्षण का काम कर रही है। शुल्क को किश्तों में भी अदा किया जा सकता है। किस बीमारी के लिए कारगर आईसीएमआर द्वारा कार्ड ब्लड को 78 प्रमुख बीमारियों के इलाज के लिए स्वीकृत किया है जिसमें रक्त संबंधी बीमारियां जैसे थैलीसीमिया व हीमोफीलिया मस्तिष्क संबधी बीमारी हेपेटाइटिस, किडनी, दिल व मधुमेह आदि का इलाज किया जा सकता है। दरअसल क्षतिग्रस्त अंग में संरक्षित स्टेम सेल्स प्रत्यारोपित की जाती हैं, स्टेम सेल्स ही वह मात्र सेल्स होती है, जिनमें अपनी तरह की कई सेल्स बनाने की क्षमता होती है(हिंदुस्तान,दिल्ली,19.9.2010)।

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बुधवार, 8 सितंबर 2010

जयपुर: स्टेम सेल तकनीक से विश्व का दूसरा सफल गुर्दा प्रत्यारोपण जयपुर में हुआ

सवाई मानसिंह अस्पताल के नेफ्रोलॉजी विभाग के चिकित्सकों ने एक युवक का गुर्दा स्टेम सेल तकनीक से ट्रांसप्लांट किया है। उदयपुरवाटी (झुंझुनू) निवासी 35 वर्षीय हरिसिंह पुत्र कुल्डाराम का स्टेम सेल तकनीक से सफल गुर्दा प्रत्यारोपण किया गया है। नेफ्रोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ.एल.सी. शर्मा का दावा है कि इस तरह का विश्व में दूसरा सफल गुर्दा प्रत्यारोपण हुआ है। इससे पहले हार्वर्ड मेडिकल स्कूल, बोस्टन में गुर्दे की गंभीर बीमारी से पीड़ित एवं डायलेसिस पर निर्भर एक साथ पांच मरीजों का स्टेम सेल तकनीक द्वारा गुर्दा प्रत्यारोपित किया। ऐसे हुआ प्रोजेक्ट स्वीकृत प्रत्यारोपण के लिए लोकल ऐथिकल व स्टेम सेल कमेटी की अनुशंसा के बाद अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (एम्स) नई दिल्ली को अनुमोदिन के लिए भेजा गया। कमेटी में भारत के 19 विषय विशेषज्ञों के सामने डॉ.एल.सी.शर्मा ने प्रोजेक्ट को प्रस्तुत किया। इसके बाद प्रोजेक्ट को न केवल स्वीकृत किया गया, बल्कि वित्तीय सहायता भी दी गई। चिकित्सकों को मिलेगी प्रेरणा विशेषज्ञ के अनुसार एसएमएस के नेफ्रोलॉजी विभाग में स्टेम सेल से किडनी ट्रांसप्लांट होने के बाद देश के सभी चिकित्सकों को प्रेरणा मिलेगी, जिससे मरीजों को फायदा मिलेगा। इसके साथ ही इस तरह के ट्रांसप्लांट होने के बाद चिकित्सकों का विश्वास बढ़ने के साथ अन्य बीमारियों का इलाज करने की प्रेरणा मिलेगी। ऐसे किया प्रत्यारोपण मां की बोनमेरो से लिया टिश्यू 1. मरीज को टोटल लिंफोइड रेडिएशन दिया गया। 2. डॉ.एलसी शर्मा व डॉ.शिमोन ने हरिसिंह की मां इंद्रा (डोनर) की बोनमेरो से स्टेम सेल लेकर किलर सेल एडीसीसी पद्धति से अलग कर मरीज को चढ़ाई 3. प्रत्यारोपण के बाद रोगी की प्रतिरोधक क्षमता कम करने की दवा दी, ताकि हानिकारक टी-सेल्स खत्म हो जाए तथा हैल्पर टी सेल्स ही रहें। जिससे शरीर प्रत्यारोपित गुर्दे एवं स्टेम सेल को स्वीकार लें। 4. दवा की मात्रा भी 25 फीसदी कम की। प्रत्यारोपण टीम में डॉ. शर्मा, इजराइल के डॉ.शिमोन स्लेविन एवं डॉ. टी.सी. सदासुखी आदि का सहयोग रहा। स्टेम सेल ट्रासंप्लांट डोनर व मरीज की हृूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन (एचएलए) की जांच कर मरीज को रेडियोथैरेपी दी जाती है। डोनर से स्टेम सेल प्रत्यारोपित करने के बाद मरीज को जिन्दगी भर दवा लेने की जरुरत नहीं। टौलरेंस विकसित हो जाती है। इतनी तरह के होते हैं ट्रांसप्लांट 1. ऑटोग्राफ्ट: इसमें ऊतकों का प्रत्यारोपण किया जाता है। या तो अतिरिक्त ऊतकों का प्रत्यारोपण किया जाता है या पहले ऊतक तैयार किया जाता है। जैसे-स्किन ग्राफ्टिंग। 2. एलोग्राफ्ट: एक ही प्रजाति के आनुवांशिक रूप से असमान सदस्यों के अंग या ऊतक प्रत्यारोपित किए जाते हैं। मनुष्यों में अंग प्रत्यारोपण के ज्यादातर मामले ऐसे ही होते हैं। 3.जेनोग्राफ्ट: किसी प्रजाति के प्राणी के अंग या ऊतक दूसरी प्रजाति के सदस्य में प्रत्यारोपित किए जाते हैं। 4.आइसोग्राफ्ट: इसमें एक ही प्रजाति के आनुवांशिक रूप से समान सदस्यों (जैसे जुड़वां व्यक्ति) के अंग या उतक प्रत्यारोपित किए जाते हैं। 1954 में बोस्टन में जोसेफ मूर ने गुर्दे का पहला सफल प्रत्यारोपण किया। (सुरेन्द्र स्वामी,दैनिक भास्कर,जयपुर,8.9.2010)।

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सोमवार, 21 जून 2010

चलेगी बेमेल ब्लडग्रुप की किडनी

किडनी बदलने के लिए सही ब्लडग्रुप के डोनर का इंतजार करना नहीं पड़ेगा। चेन्नई के एमआईओटी अस्पताल के विशेषज्ञों का दावा है कि मेल न खाने वाले ब्लडग्रुप के डोनर की किडनी भी मरीज को प्रत्यारोपित की जा सकती है। यह दावा बी ब्लडग्रुप के एक मरीज की किडनी ओ ब्लडग्रुप के मरीज से बदले जाने की प्रक्रिया के सफल रहने के बाद किया गया है। अस्पताल के संस्थापक पीवीए मोहनदास ने कहा कि इस उपलब्धि से किडनी बदलने की प्रक्रिया में क्रांति आने की उम्मीद है। इससे रक्तसंबंधियों के अलावा अन्य व्यक्तियों की किडनी भी प्रत्यारोपण के काम आ सकेगी। इसके लिए जापान में विकसित तकनीक पहली बार देश में अपनाई गई है। इसमें डबल फिल्ट्रेशन प्लाज्माफेरेसिस की मदद से एंटीबॉडीज को हटा दिया जाता है। (दैनिक भास्कर,20.6.2010)

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गुरुवार, 11 मार्च 2010

आज विश्व गुर्दा दिवस है

देश भर मे,गुर्दे के जानलेवा रोगों की संख्या चिंताजनक ढंग से बढ रही है। अगर आपको मधुमेह,हाइपरटेंशन या यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन(यूटीआई) है,तो गुर्दे के जानलेवा रोग का जोखिम बहुत बढ जाता है। आंकड़े बताते हैं कि अधिकतर गुर्दा रोगी अस्पताल तब पहुंचते हैं जब उनका गुर्दा लगभग 50 प्रतिशत खराब हो चुका होता है। भारत मे,लगभग 16 प्रतिशत लोग गुर्दे की खतरनाक बीमारियों से पीड़ित हैं।
चिकित्सकों का मानना है कि लोगों को गुर्दे के रोग से बचने के लिए उसी प्रकार जांच करानी चाहिए जिस प्रकार वे मूत्र,रक्त,पेट के अल्ट्रासाउंड आदि के मामले मे करते हैं ताकि शुरूआती दौर मे ही पता लगाया जा सके। डायबिटीज और हाइपरटेंशन के रोगियों को गुर्दे की नियमित जांच करानी चाहिए क्योंकि ऐसे लोगों मे गुर्दे की जानलेवा बीमारी की संभावना 50 प्रतिशत ज्यादा होती है। गुर्दे की बीमारी वयस्कों मे आम है। गुर्दे को किसी भी प्रकार के नुकसान का प्रभाव हृदय पर भी पड़ता है क्योंकि बेकार पदार्थों को बाहर निकालने के अलावा,गुर्दा शरीर मे हीमोग्लोबिन तथा रक्तचाप सामान्य बनाए रखने का काम भी करता है। गुर्दे के प्रति सतर्क रहना इसलिए भी जरूरी है कि इससे जुड़े रोगों के इलाज यानी,डायलिसिस अथवा प्रत्यारोपण पर बहुत ज्यादा खर्च आता है जिसे वहन कर सकने मे 80 प्रतिशत रोगी अक्षम होते हैं। ध्यान रहे कि डायलिसिस भी दो तरह के होते हैं- हीमोडायलिसिस और पेरीटोनियल डायलिसिस। पेरीटोनियल डायलिसिस घर पर भी की जा सकती है। डायलिसिस जीवन भर की बाध्यता बन जाती है और प्रति डायलिसिस लगभग 18 से 20 हजार रूपए प्रतिमाह का खर्च(गैर-सरकारी मामलों मे) आता है। गुर्दा प्रत्यारोपण पर 5 से 8 लाख रूपए तक का खर्च आता है। यह एक बेहतर विकल्प तो है लेकिन गुर्दा दान करने वाला ढूंढना मुश्किल होता है। प्रत्यारोपण या डायलिसिस के लिए एम्स सहित लगभग सभी सरकारी अस्पतालों मे लगभग कोई शुल्क नहीं लिया जाता। ध्यान रहे कि बच्चे के जन्म के समय भी गुर्दे मे खराबी के मामले सामने आते हैं। कई बच्चे कम नेफ्रॉन या अल्प-विकसित गुर्दे के साथ जन्म लेते हैं। गर्भवती महिलाओं को भी पेनकिलर्स लेने से बचना चाहिए । यहां तक कि यूनानी और आयुर्वेदिक दवाओं मे भी धातु की मात्रा काफी ज्यादा होती है इसलिए उनका सेवन डाक्टर की सलाह पर ही करना चाहिए। गुर्दे के बारे मे,मशहूर डाक्टर टी.एस.दराल जी के एक बेहद उपयोगी आलेख के लिए क्लिक कीजिए।

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