गुरुवार, 8 मार्च 2012

विश्व गुर्दा दिवस विशेषः मधुमेह और रक्तचाप हैं गुर्दे के दुश्मन

मधुमेह और उच्च रक्तचाप दो ऐसे हत्यारे हैं जो पीठ के पीछे से वार करते हैं। अक्सर मरीज़ को इन बीमारियों के प्रारंभिक लक्षणों का पता नहीं चलता। गुर्दे इन दोनों बीमारियों के सबसे अधिक जोखिम पर होते हैं। गुर्दों की जाँच का मौका तभी आता है जब वे क्षतिग्रस्त हो चुके होते हैं। देश में अब तक बीमारी हो चुकने के बाद इलाज की जद्दोजहद पर ही ध्यान केंद्रित है। बीमारी की रोकथाम के लिए कभी पहल नहीं की गई। मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसे घातक हमलावरों की पहचान समय रहते होना सभी के हित में है। इन दोनों बीमारियों से खड़ी होने वाली समस्याओं के निराकरण में समाज और परिवार का मूल्यवान धन नष्ट होता है। 

रोगों से बचाव के लिए एक रणनीति की जरूरत होती है। स्वास्थ्य को लेकर देश में अभी हम इतना सुदृड़ ढांचा तैयार नहीं कर सके हैं कि मधुमेह या उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों की रोकथाम समय रहते कर सकें। चिकित्सा विज्ञान की पुस्तकों में दर्ज है कि चालीस साल की उम्र के बाद उच्च रक्तचाप और मधुमेह की नियमित जांच करना चाहिए, लेकिन ये मानक हमारे देश की आबादी पर लागू नहीं होते। पहले ही हमें मधुमेह की राजधानी का दर्जा हासिल है। किशोरावस्था से ही मधुमेह और उच्च रक्तचाप शरीर में घर कर लेते हैं। टीन एज में जहाँ किसी मनपसंद ब्रांच पाने का तनाव होता है वहीं युवावस्था में कैरियर का चुनाव तनावग्रस्त कर देता है। मनमुआफिक लक्ष्य हासिल नहीं कर पाने के कारण तनावग्रस्त युवा उच्च रक्तचाप और मधुमेह के जोखिम के नज़दीक पहुंच जाते हैं। 

दरअसल कॉलेजों में ही उच्च रक्तचाप और मधुमेह की स्क्रीनिंग की जानी चाहिए। इससे न सिर्फ इन बीमारियों को शुरूआती स्तर पर पकड़ने में मदद मिलेगी बल्कि गुर्दों को क्षतिग्रस्त होने से बहुत पहले बचाया जा सकेगा। आज दुनिया के धनाढ्य देश भी अपने नागरिकों को मुफ्त डायलिसिस की सुविधा नहीं मुहैया करा पाते। हमारे जैसे विकासशील देश पर गुर्दों के रोगों का बोझ असहनीय है(संपादकीय,सेहत,नई दुनिया,मार्च प्रथमांक,2012)।

मधुमेह से प्रभावित होती हैं किडनी 
विश्वभर में कैंसर और हृदय रोगों के बाद किडनी रोग मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है। भारत में ही हर साल किडनी फेल होने की वजह से २ लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है। यही नहीं हर साल गंभीर किडनी रोगियों की संख्या के साथ १ लाख नए रोगी जुड़ जाती है। इन सभी को इलाज की ज़रुरत होती है। किडनी रोगियों में से ९ लाख मरीज़ों को डायलिसिस की ज़रुरत होती है लेकिन इनमें से केवल २ प्रतिशत डायलिसिस करवा पाते हैं और ५ प्रतिशत में ही ट्रांसप्लांट हो पाता है। मध्यमवर्गीय मरीज़ों में डायलिसिस का प्रतिमाह का खर्च पूरे परिवार की मासिक आय जितना हो सकता है या फिर इससे अधिक भी हो सकता है। इसका मतलब ये हुआ कि लगभग ९० प्रतिशत मरीज़ इलाज का खर्च वहन नहीं कर पाते।

कारण पर ध्यान दें  
मधुमेह और उच्चरक्तचाप जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ १० में से ६ किडनी रोगियों में गंभीर किडनी रोगों का कारण बनती हैं। भारत को विश्वभर में मधुमेह की राजधानी कहा जाता है इसलिए यहाँ स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। यहाँ के युवा भी इस बीमारी के शिकार होते जा रहे हैं जिससे पूरी स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है। 

मधुमेह रोगियों में किडनी रोगों की आशंका बढ़ जाती है। मधुमेह अनियंत्रित होने पर रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ जाता है। लंबे समय तक इसके बढ़ा हुआ रहने के कारण किडनी में मौजूद बारीक-बारीक रक्तवाहिनियाँ क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। समय के साथ इससे किडनी की कार्य क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ने लगता है। क्षतिग्रस्त होने पर इन रक्तवाहिनियों में रिसाव होने लगता है। फलस्वरुप खून में रहने के बजाय थोड़ी-थोड़ी मात्रा में प्रोटीन पेशाब के ज़रिए शरीर से बाहर निकलने लगता है। इसे माइक्रो एलब्यूमिनयूरिआ कहते हैं।  

माइक्रो एलब्यूमिनयूरिआ किडनी रोग की शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण अवस्था होती है। यदि समय रहते इसका पता लगने पर तुरंत ही इलाज शुरु होने से बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। ध्यान न देने पर समय के साथ रोग बढ़ता ही जाएगा और पेशाब में प्रोटीन की मात्रा बढ़ती चली जाएगी। पेशाब में प्रोटीन की बहुत अधिक मात्रा को मेक्रो एलब्यूमिनयूरिआ कहते हैं। इसके बाद कभी भी किडनी फेलियर की अवस्था आ सकती है। गंभीर किडनी रोग हो जाने के बाद किडनी फिर से पहले की तरह स्वस्थ तो नहीं हो सकती लेकिन कुछ सावधानियाँ बरतने से बीमारी के बढ़ने की दर धीमी हो सकती है। ग्लुकोज़ की मात्रा को नियंत्रित करने के अलावा मधुमेह रोगियों को हर साल एस्टिमेटेड ग्लोमेरुलर फिल्टरेशन रेट (ईजीएफआर) टेस्ट करवाना चाहिए ताकि किडनी की कार्यक्षमता का अंदाज़ा लगाया जा सके। किडनी की कार्यक्षमता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जाता है कि यह प्रतिमिनिट कितना खून फिल्टर करती है। यह ६० मिलिमीटर प्रतिमिनिट से कम हो तो किडनी रोग होने की आशंका होती है। खाने-पीने में सतर्कता बरतने और सक्रिय बने रहने से किडनी रोगों का जोखिम घट जाता है। आहार में प्रोटीन, शक्कर और नमक की मात्रा नियंत्रित रखना चाहिए। स्वस्थ जीवनशैली अपनाने पर मधुमेह और उच्चरक्तचाप जैसे रोगों से बच सकेंगे।

इन बातों का भी रखें ध्यान 
-शक्कर की मात्रा सीमित करने के अलावा मधुमेह रोगी इन बातों का भी ध्यान रखें ताकि किडनी रोग का जोखिम घट सके

-फल, सब्ज़ी और साबुत अनाज, वसा-रहित डेयरी उत्पाद से भरपूर पोषक आहार लें। सैच्युरेटेड फैट, ट्रांस फैट और सोडियम व शक्कर की अधिकता वाले पदार्थों से परहेज़ करें।

-प्रोटीन की मात्रा कम होने से किडनियों का भार कम हो जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि प्रोटीन से पूरी तरह परहेज़ कर लिया जाए। थोड़ी-थोड़ी मात्रा में नियमित रुप से प्रोटीन लेना चाहिए।

-सप्ताह में कम से कम ५ दिनों में ३० से ६० मिनिटों तक शारीरिक श्रम करें। व्यायाम शुरु करने या सक्रियता बढ़ाने से पहले अपने चिकित्सक से सलाह ज़रुर लें।

-दवाओं का डोस अपने मन से निर्धारित न करें। चिकित्सक के निर्देशानुसार ही दवाएँ लें, ख़ासकर वे दवाएँ जो मधुमेह, उच्चरक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने के लिए दी गई हों।

-रक्तचाप नियंत्रित होना चाहिए।

-शराब, तंबाकू और धूम्रपान से दूर रहें। इसके आदि हों तो जल्द से जल्द छुटकारा पाने के प्रयास शुरु कर दें(डॉ. अश्विनी गोयल,सेहत,नई दुनिया,मार्च प्रथमांक 2012)।

3 टिप्‍पणियां:

  1. इस लेख को पढ़ कर थोड़ा डर गयी हूँ ... :):) अमल करने की कोशिश रहेगी ...अच्छी जानकारी मिली ...

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