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मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

बीएचयू की अल्ज़ाइमर, पार्किंसन और बुढ़ापा नियंत्रक दवाओं को मान्यता मिली

काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) को अल्ज़ाइमर की दवा बनाने का अमरीकी पेटेंट हासिल हुआ है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के आयुर्वेद विभाग को यह अमरीकी पेटेंट हासिल हुआ है।

अल्ज़ाइमर्स बुढ़ापे में होने वाली बीमारी है। इसमें यादाश्त चली जाती है। उम्र बढ़ने के साथ ही इसका दुष्प्रभाव भी बढ़ता जाता है। 

आयुर्वेद विभाग के प्रमुख डॉ गोविंद प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि भारत में परंपरागत रूप से औषधीय गुणों वाले पौधौं से दवा बनाने का काम किया जाता रहा है। इन्हीं परंपरागत औषधियों को आधार बनाकर विभाग ने ब्राह्मी कल्प, वराही कल्प और अम्ल वेतक नाम से अल्ज़ाइमर, पार्किंसन और बुढ़ापे को कम करने वाली दवाएं विकसित की गई हैं। डॉ गोविंद के अनुसार इन तीनों दवाओं का अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की स्टैंडर्ड लैबोरेट्री में परीक्षण कर इन्हें प्रमाणित किया गया है। ब्राम्ही कल्प, वराही कल्प और अम्ल वेतक आयुर्वेदिक दवाओं का अमरीका की फ़ेडरल ड्रग एजेंसी (एफ़डीए) द्वारा मान्य प्रयोगशाला में परीक्षण भी किया गया। 

डॉ गोविंद ने बताया कि इन दवाओं के चिकित्सकीय परीक्षण के लिए चार संस्थानों को अधिकृत किया गया है। ये हैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू), एसआरएम यूनिवर्सिटी, आदेश यूनिवर्सिटी- भटिंडा और जिनोम फ़ाउंडेशन- हैदराबाद। इन चार संस्थानों ने चेन्नई के अरविंद रेमेडीज़ लिमिटेड के साथ इन तीनों दवाओं की ग्लोबल मार्केटिंग के लिए समझौता किया है। अरविंद रेमेडीज़ लिमिटेड अमरीका की फ़ेडरल ड्रग एजेंसी से अनुमति, प्रमाणन और प्रायोजन के साथ सभी ख़र्च वहन करने के लिए सहमत हो गई है। अरविंद रेमेडीज़ लिमिटेड बीएचयू और अन्य सहयोगी संगठनों में दवा के निर्माण के लिए धन उपलब्ध करवाएगी।

डॉ गोविंद कहते हैं कि ये दवाएं अल्ज़ाइमर, पार्किंसन और बुढ़ापे के असर को कम करने के अलावा अवसाद, अनिद्रा और स्मरण शक्ति के कमज़ोर होने पर प्रयोग में लाई जा सकती है। वो दावा करते हैं कि इन दवाओं के प्रयोग का शरीर पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा। डॉ गोविंद कहते हैं कि इन दवाओं के बाज़ार में आ जाने से इन बीमारियों के मरीज़ों और उनके परिजनों को काफ़ी राहत मिलेगी(मनीष कुमार मिश्रा,बीबीसी हिंदी,29 दिसम्बर,2013) 

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बुधवार, 11 जुलाई 2012

क्या आपको भी है भूलने की आदत?

दफ्तर के लिए निकलते हुए कभी रुमाल तो कभी सेलफोन भूलने की आदत आम हो चुकी है। सप्ताह में एक-दो बार हम अपनी चीजें भूलते रहते हैं। लेकिन जब ऐसी घटना बढ़ने लगे तो बगैर देर किए डॉक्टर से मुलाकात करनी चाहिए। 

नोहर मनचंदा निजी कंपनी में एक्जीक्यूटिव हैं। नई सोच के कारण उन्हें तीन साल में चार बार तरक्की मिली। लेकिन बीते छह महीने से वह अपने काम नहीं बल्कि अपनी कुछ आदतों को लेकर परेशान है। सुबह घर से निकलते वक्त मोबाइल, गाड़ी की चाभी आदि भूल जाना तो आम बात हो गई है, बिजली बिल और बच्चों की टय़ूशन फीस की तारीख भी भूल जाते हैं। शुरू में परेशानी लगने वाली यह आदत अब बीमारी का रूप ले चुकी है। मनोहर अब याददाश्त ठीक करने के लिए योगासन और मेडिटेशन का सहारा ले रहे हैं। 

सप्ताह में कभी एक बार तो कभी दो बार हम भी अपनी साधारण चीजें भूलते रहते हैं। डॉक्टरी भाषा में भूलने की इस बीमारी को अम्नेसिया कहते हैं। इसमें याद रखने की क्षमता धीरे-धीरे कम हो जाती है। बीती घटनाओं को याद कर पाना मुश्किल होता है। एम्स के मनोचिकित्सक डॉ. एच. एस. मलिक कहते हैं कि भूलना तो समस्या है, लेकिन हर बात भूल जाना बीमारी हो सकती है। परेशानी यह है कि लोग इन दोनों के बीच आसानी से फर्क नहीं समझ पाते हैं। आपको भूलने की बीमारी हो चुकी है, इसकी जांच आप खुद कर सकते हैं। दिनभर कई काम के बावजूद यदि आप सोने से पहले सुबह से शाम तक की हर छोटी बात को आसानी से याद रख पाने में सक्षम हैं तो इसका मतलब है कि आपकी याददाश्त बेहतर हैं, लेकिन ओपीडी में आने वाले 40 प्रतिशत युवा चार घंटे पहले की बात भी याद नहीं रख पाते हैं। ऐसे में सबसे अधिक असर नियमित दिनचर्या पर पड़ता है। डॉ. मलिक कहते हैं कि कई निजी क्लीनिक में मरीजों को दवाई व जांच की तारीख याद दिलाने के लिए एसएमएस की सेवा शुरू की गई जो लोगों की कम होती याददाश्त का ही एक उदाहरण है। 

क्यों होती है समस्या 
डॉ. मोनिका सूद के मुताबिक याददाश्त कम होना या फिर याददाश्त खो जाना दो अलग बाते हैं, बुजुर्गो में यह समस्या 60 के बाद होती है, जिसे डिमेंशिया कहा जाता है। युवाओं में याददाश्त कम होने की वजहें अलग हैं, जैसे- अधिक तनाव, सिगरेट, एल्कोहल या फिर अनियमित नींद। मार्ग दुर्घटना या फिर मस्तिष्क में टय़ूमर की वजह से भी याददाश्त खो जाती है, लेकिन इन दो वजहों से याददाश्त खोने के कई सजिर्कल उपाय हैं। यदि अनियमित दिनचर्या से याद रखने की क्षमता कम होती है तो उसे मेडिटेशन, योग या फिर बेहतर डायट से ठीक किया जा सकता है। हालांकि याददाश्त बढ़ाने के लिए चिकित्सक दवाओं के इस्तेमाल को सही नहीं मानते हैं। 

याददाश्त कम होने की वजहें 
अवसाद : अवसाद अम्नेसिया की की वजह हो सकती है। जिंदगी में अधिक हासिल करने की इच्छा जब पूरी नहीं होती तो व्यक्ति का ध्यान सामान्य बातों पर नहीं रहता, वह हरदम कुछ बढ़ा करने की योजना बनाता रहता है। समाज से कटे या अकेले रहने वाले लोगों में यह लक्षण अकसर देखने को मिलता है। विटामिन बी-12 की कमी: अम्नेसिया का यह एक महत्वपूर्ण कारक है। इसकी कमी मस्तिष्क के स्थायी नुकसान का कारण बन सकती है। विटामिन बी-12 हमारे न्यूरोंस और सेंसर मोटर को सुरक्षित रखता है। 

दवाओं का दुष्प्रभाव : 
नींद की गोलियां, एंटीथिस्टेमाइंस, ब्लड प्रेशर की दवाएं, गठिया में ली जाने दवा, एंटीडिप्रेसेन्ट, गुस्से को नियंत्रित करने के लिए ली जाने वाली गोलियां और दर्द निवारक दवाओं के ज्यादा सेवन से भी अम्नेसिया हो सकता है। लगातार नींद की गोलियां खाने वाले लोग भी सामान्य बातें जल्दी भूलने लगते हैं। 

शराब की लत : शराब का अधिक इस्तेमाल, मस्तिष्क की कोशिकाओं की क्रियाशीलता को कम करता है।

थायरॉयड : थायरॉयड ग्रंथि मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करती है। भूलने के साथ-साथ दिमाग को एकाग्र करने में भी दिक्कतें आती हैं। अधिक या कम थॉरोक्सिन याद करने की क्षमता को कम कर देता है। क्या हैं बीमारी के लक्षण अम्नेसिया के लक्षण अलग-अलग व्यक्तियों में भिन्न होते हैं। कुछ लोगों में अम्नेसिया की शुरुआत तिथि और नाम भूलने के साथ होती है, तो कुछ लोग शुरू किए गए काम का उद्देश्य ही भूल जाते हैं। एक ही स्थान पर बार-बार जाने के बाद भी उसका पता भूल जाते हैं। कुछ लोग एक ही काम को कई बार करते हैं। अम्नेसिया की शुरुआत कुछ यूं होती है। भ्रम या कम सतर्कता भूलने की बीमारी का पहला लक्षण हो सकता है। हालांकि सभी का व्यवहार एक समान नहीं होता। कुछ में सीधे भूलने की समस्या होती है तो कुछ को शब्द याद करने में मुश्किल होती है। कुछ को समझने में समस्या आती है। उन्हें छोटे-छोटे निर्णय लेने में भी तकलीफ होती है। 

कैसे होता है इलाज 
हालांकि डॉक्टर भूलने की बीमारी का इलाज दवाओं के जरिए नहीं करते हैं, बावजूद इसके यदि बीमारी की पहचान देर में हो तो इसे न्यूरोलॉजिकल टेस्ट और दवाओं से ही नियंत्रित किया जाता है। हालांकि कुछ आधुनिक इलाज में रेडिएशन युक्त जांच से भी इलाज किया जाता है। पहले मरीज की फैमिली हिस्ट्री ली जाती है। मेमोरी फंक्शन जानने के लिए कई न्यूरोसाइकोलॉजिकल टेस्ट कराए जाते हैं। फिर कुछ अन्य मेडिकल टेस्ट जैसे इलेक्ट्रोइनसेफालोग्राफी, एमआरआई या सीटी स्कैन कराए जाते हैं। हालांकि अन्य उपायों से यदि बीमारी दूर नहीं होती तो डॉक्टर दवाओं का इस्तेमाल करते हैं। 

व्यायाम है सहायक 
हर उम्र के लोगों के लिए हल्का-फुल्का व्यायाम फायदेमंद है। शोधकर्ताओं का कहना है कि नियमित व्यायाम से याददाश्त बढ़ सकती है। यही नहीं, बल्कि वे अधिक दिनों तक भूलने की बीमारी का शिकार होने से बच सकते हैं। यदि रोजाना सिर्फ आधे घंटे योग किया जाए तो भी इससे राहत मिलेगी। एक अनुमान के मुताबिक दुनियाभर में करीब 3 करोड़ 70 लाख लोग भूलने की बीमारी के शिकार हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अगले बीस सालों में इस आंकड़े में तेजी से बढ़ोतरी की आशंका जताई है। 

जरूरी है नींद 
याद्दाशत मजबूत करने के लिए के लिए नींद बहुत जरूरी है। कम नींद या खराब नींद हिप्पोकैम्पस में नए न्यूरॉन्स का विकास प्रभावित करती है और स्मृति, एकाग्रता व निर्णय लेने की क्षमता कम होती जाती है। 

डायट का रखें ध्यान 
चॉकलेट : 
एक सर्वे में कहा गया कि चॉकलेट मस्तिष्क की शक्ति को बढ़ाती है। रोज 10 ग्राम चॉकलेट दिमाग को चॉकलेटी बना देती है। 

हरी सब्जियां:
इनमें विटामिन और फोलिक एसिड की भरमार होती है, जो हमें पागलपन से बचाते हैं। ध्यान रहे हरी सब्जियों को ज्यादा देर तक पकाने पर इसके न्यूट्रिएंट्स जल सकते हैं। 

काला जामुन : 
काला जामुन में एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जो न्यूरॉन्स के बीच संचार बढ़ाते हैं और आसानी से समझने में मदद करते हैं। रोज काला जामुन खाएं तो दिन, महीना और तिथि याद रखना आसान होगा। 

मछली : 
इसमें ओमेगा-3, विटामिन-डी और अन्य ऐसे पोषक तत्व होते हैं, जो आपके मस्तिष्क को किसी प्रकार के मनोविकार यानी मेंटल डिसऑर्डर से सुरक्षित रखते हैं। 

चुकंदर : 
चुकंदर याद रखने की क्षमता बढ़ाता है। इसमें नाइट्रेट होता है, जो रक्त नलिकाओं को खोलता है और दिमाग तक खून का संचार बढ़ाता है। 

होल ग्रेन : 
जब भी ब्रेड खरीदें, दुकानदार से होलग्रेन ब्रेड ही मांगें। इसमें एंटीऑक्सीडेंट और फाइबर भरपूर होता है। विटामिन बी और ई से भरा होल ग्रेन शरीर में ब्लड शुगर के स्तर को सामान्य रखने में मदद करता है। 

कॉफी : 
कॉफी में पाई जाने वाली कैफीन से कार्यक्षमता बढ़ती है। यह अल्जाइमर से लड़ने में भी मददगार है। 

सेब : सेब में क्वरसेटिन की मात्र पाई जाती है, जो हमारे ब्रेन सेल की रक्षा करता है। 

मेमोरी मैन के कारगर टिप्स 
याददाश्त को मजबूत बनाने के लिए मैमोरी मैन विश्व स्वरूप रॉय चौधरी के टिप्स 

-सोने से पहले एक बार दिनभर में किए कामों को दोहराने से याददाश्त कभी कमजोर नहीं होती। आप सारी दिनचर्या को याद नहीं कर पा रहे तो यह याददाश्त कम होने की शुरुआत है। 

-दिमाग में चीजों का चित्रण कर हम किसी चीज या बात पर अपनी एकाग्रता बढ़ा सकते हैं। कामों की लिस्ट बनाएं और उसे किसी चीज के साथ समायोजित करें। इससे उस चीज को याद करने से उससे संबंधित काम भी याद आ जाएगा( निशि भाट और वंदना भारती,हिंदुस्तान,दिल्ली,6.6.12)।

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शनिवार, 10 मार्च 2012

हम क्यों भूलते हैं?

हम अपनी जिंदगी में जितना भी सीखते हैं उसे पूरा का पूरा याद रखना संभव नहीं होता। वक्त बीतने के साथ-साथ जिंदगी में घटित कई किस्से हमारी याददाश्त से भी ग़ायब हो जाते हैं। इसे ही भूलना कहते हैं। हम ज़िंदगी भर कुछ न कुछ नया सीखते रहते हैं। 

ज़िंदगी की हर सीख और अनुभव को यदि हम याद रखना चाहें तो हमारे मस्तिष्क में इतना इकट्ठा हो जाएगा कि उसके दबाव से हम अपनी सहजता खो बैठेंगे। भूलने के अभाव में हमारी याददाश्त की तिजोरी इतनी भर जाएगी कि नए विचार को अंदर आने के लिए स्थान ही नहीं बचेगा। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि हम अपने जीवन के सभी अनुभवों को भूलते जाएँ और नए अनुभव ग्रहण करते रहें। इसलिए हर अनुभव को याद रखना और उन्हें सँजोए रखना भी उतना ही ग़लत है जितना जल्दी भूल जाना। भयभीत करने वाले अनुभव जल्दी भूल जाना हमेशा सुखद होता है, अन्यथा वे हमें ज़िंदगी भर डराते रहते हैं। भूलने की प्रक्रिया में हम ज़रूरी बातों को भी भूल जाते हैं जिससे कई बार मुसीबत में भी पड़ जाते हैं। 

भूलने के कारण 
भूलने की कई सब्जेक्टिव और ऑब्जेक्टिव परिस्थितियाँ होती हैं। इनसे सीखने की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है साथ ही सँजोकर रखने की भी। किसी भी पाठ को याद रखने के लिए लगने वाला अधिक समय भूल जाने के लिए जिम्मेदार है। इसका अर्थ यह है कि सीखने में जितना कम समय लगेगा, वह आपको अधिक देर तक याद रहने वाला है। जितना अधिक समय सीखने में लगेगा आप उसे उतनी ही जल्दी भूल जाएंगे। सीखने की प्रबल इच्छा भूलने के मामले में महत्वपूर्ण मुद्दा है। देखा गया है कि हमेशा किसी भी गद्य का हिस्सा सीखने और याद करने में काफी समय लगता है,मेहनत भी अधिक करनी पड़ती है। 

आधा-अधूरा सीखना भी भूलने का एक महत्वपूर्ण कारम है। यदि पाठ आधा ही सीखा और समझा गया है,तब आप उसे जल्दी ही भूल भी जाएंगे। मस्तिष्क पर चोट या किसी तरह का मानसिक आघात लगना भी भूलने का एक बड़ा कारण है। मादक पदार्थों के सेवन से याद्दाश्त ख़त्म होती है। 

मादक दवाओं के प्रयोग से न्यूरोन्स प्रभावहीन हो जाते हैं। यही कारण है कि शराबखोर और मादक दवाओं का सेवन करने वाले भुलक्कड हो जाते हैं। हम अक्सर एक के बाद एक कई चीज़ें बहुत कम समय के अंतराल में याद रखने की कोशिश करते हैं। ऐसे हर मामले में,बाद में याद किया हुआ पाठ पहले सीखे हुए पाठ को प्रभावित करता है। हर नया अनुभव पुराने को धुंधला कर देता है। इस प्रक्रिया में कई चीज़ें धुंधली होकर भुला दी जाती हैं। पहले याद रखे गए किसी भी अनुभव में आई हुई रुकावट बाद में किए जा रहे पाठ को भी प्रभावित करती है। 

मानसिक थकावट के कारण भी याद्दाश्त प्रभावित होती है। बहुत अधिक देर तक किया गया बौद्धिक कार्य हमें मानसिक रूप से थका देता है। हमारी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा कम हो जाती है। हमारी सतर्कता भी प्रभावित हो जाती है। मानसिक थकान के कारण भूलने लगना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। यदि पर्याप्त शारीरिक आराम न मिले,तो इंसान नियमित रूप से भूलने लगता है। पर्याप्त नींद,शारीरिक आराम और थकान मिटाने के हर उपाय से याद्दाश्त को पैर जमाने में मदद मिलती है। 

मनोविश्लेषकों का मानना है कि हम इसलिए भूलते हैं क्योंकि हम ऐसा ही चाहते हैं। हम अप्रिय स्मृतियों को अवचेतन में धकेल देते हैं। ज़िंदगी के ग़म और भयावह हादसों को हम हमेशा से भूल जाना चाहते हैं,इसलिए वे हमें याद भी नहीं आते(डॉ. संजीव नाईक,सेहत,नई दुनिया,मार्च प्रथमांक 2012)।

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सोमवार, 23 जनवरी 2012

बढ़ाएं दिमाग़ की ताक़त

परीक्षाओं की तैयारियों के दिन आ चुके हैं। सीखे हुए पाठों को याद रखना एक बड़ी चुनौती है। मस्तिष्क की क्षमताओं को खींच कर अंतिम सिरे तक ले जाना होता है। यह कोई ऐसा काम नहीं है जिसे करने के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक का दिमाग़ चाहिए। मन में सामान्य जोड़-घटाव के कई समीकरण हल किए जा सकते हैं। निरंतर अभ्यास से मस्तिष्क की धार इतनी तेज़ हो जाएगी कि हर काम आसान लगने लगेगा। किसी भी भाषा की कविताएँ या शेरो-शायरी याद करना भी इसी तरह की मानसिक कवायद है जिससे मेधा प्रखर होती है।

दरअसल शरीर स्वस्थ रहे तो मस्तिष्क भी सामान्य रूप से काम करने लगता है। संपूर्ण शारीरिक स्वास्थ के लिए योगासन, ध्यान साधना का भी उतना ही योगदान है जितना नियमित कसरतों का। फर्क केवल इतना है कि जिम्नेशियम में माँसपेशियाँ विकसित कर मनचाहा आकार प्राप्त किया जा सकता है लेकिन मस्तिष्क के स्वास्थ पर इसका कम ही असर पड़ता है। अक्सर ऐसा होता है कि परीक्षा हॉल में सारे प्रश्नों के उत्तर आते हुए भी कई विद्यार्थियों का दिमाग़ सुन्ना हो जाता है। उत्तर जानने के बावजूद वे लिख नहीं पाते। यही मस्तिष्क की कमज़ोरी का प्रमाण है। इस अंक में याद रखने के टिप्स इसी को ध्यान में रखकर दिए गए हैं। नियमित रूप से क्रासवर्ड पज़ल्स सॉल्व करने से लेकर पहाड़े रटने जैसी मानसिक कवायद तक सभी एग्ज़ामिनेशन फीयर पर काबू पाने में मददगार साबित हो सकते हैं। शरीर की तरह आपके दिमाग़ को भी बेहतर काम करने के लिए व्यवस्थित रहना ज़रूरी है। इसके लिए कुछ टिप्स दिए जा रहे हैं। इनसे न सिर्फ आपका दिमाग़ त़ेज गति से काम करने लगेगा, बल्कि परीक्षा के लिए किसी भी पाठ को याद रखना आसान हो जाएगा। 

आप दिमाग़ी कसरत करने के लिए अपने आपको तैयार करें। दिमाग़ी कसरत शारीरिक कसरत से भिन्ना होती है। हमारे देश में शतरंज ईजाद किया गया तो इसीलिए कि यह दिमाग़ की सबसे कठिन और ज़ोरदार कसरत है। खैर शतरंज तो सभी नहीं खेलते हैं, लेकिन क्रासवर्ड पज़ल्स या कम्प्यूटर पर दिए गए गेम सालिटायर को तो लगभग सभी पसंद करते हैं। आप इनसे शुरुआत कर सकते हैं। आप यदि यह भी नहीं करना चाहते हैं तो आसान तरीका है साधारण स्तर के गुणा-भाग अथवा जोड़-घटाव करना। 

हफ्ते में एक बार कोई कविता या जोक याद करने की कोशिश करें। इससे आपका दिमाग़ शेप में रहेगा और इसकी ताकत भी बढ़ेगी। हमेशा कुछ नया करने की सोच रखिए। नए-नए आइडियाज़ को सामने आने दें। इसके लिए एक बच्चे की तरह सोचना ही काफी है। बच्चे सकारात्मक ऊर्जा, विस्मित भाव और उत्सुकता से सोचते हैं। अपने आपको दिवास्वप्न देखने दीजिए। इससे मस्तिष्क तीक्ष्ण होगा और उसकी ताकत भी बढ़ेगी। अपने आपको केवल एक ही व्यक्ति न बनने दें। एक ही व्यक्ति में बहुत सारे व्यक्तित्व पैदा कीजिए। जितने अधिक हो सकें,उतने तरीक़ों से सोचिए। 

परीक्षा का भय? 
कई विद्यर्थियों को परीक्षा के बारे में सोचकर ही बेचैनी महसूस होने लगती है। मन में कई विचार घूमने लगते हैं, -"क्या मैं सभी प्रश्नों का उत्तर दे पाउँगा?" "थोड़ा और पढ़ लेता तो अच्छा होता"आदि। ये विचार लगभग हर विद्यार्थी को परेशान करते हैं। थोड़ा-बहुत दबाव बेहतर प्रदर्शन के लिए मददगार होता है। इससे शरीर में एड्रिनलिन हारमोन स्त्रावित होता है जो व्यक्ति को सचेत और फोकस्ड बनाए रखता है। हल्का तनाव या दबाव होना स्वाभाविक है लेकिन ज़्यादा घबराहट परेशानी का सबब बन जाती है। यह व्यक्ति के चारों ओर एक नकारात्मक घेरा बना देती है और फिर वो एकाग्र होकर सोच-समझ नहीं पाता। इसका बुरा प्रभाव पड़ता है प्रदर्शन पर क्योंकि विद्यार्थी न तो प्रश्नों पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाता है और न सटीक उत्तर ही दे पाता है। ऐसे कई उपाय हैं जिनसे परीक्षा का भय दूर किया जा सकता है ताकि विद्यार्थी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकें -
परीक्षा से पहले 
अपना कोर्स समय रहते पढ़ लें और उसका रिविज़न भी कम से कम एक दिन पहले ही पूरा कर लें। ऐन वक्त तक पढ़ते रहने से तनाव बढ़ता है। चित्त स्थिर रखने और मन शांत करने के अलग-अलग तरीके हो सकते हैं, किसी को संगीत सुनने पर सुकून मिलता है तो किसी को व्यायाम करने से या फिर कुनकुने पानी से स्नान करना भी अच्छा तरीका हो सकता है। अपने लिए रिलेक्स करने का ऐसा ही कोई तरीका चुनें।

परीक्षा के दिन और उससे एक दिन पहले इस तरह के उपाय बहुत फायदेमंद साबित होते हैं। जो कुछ भी आपने पढ़ा है उसे याद रखने में ये सहायक होते हैं और आत्मविश्वास बढ़ताता है। एग्ज़ाम सेंटर का रास्ता पता न होना भी घबराहट का कारण बन सकता है। इस बारे में पहले ही जानकारी जुटा लें और संभव हो तो एक बार खुद वहाँ जाकर देखें। इससे ऐन वक्त की हड़बड़ी से बच जाएँगे। परीक्षा के नियमों को ध्यान से पढ़ लें। परीक्षा से पहले की रात नींद पूरी करें।

परीक्षा के दौरान 
"मुझे कुछ नहीं आता"। पढ़ाई नहीं की हो तो ये ख़्याल परेशान कर सकता है लेकिन अच्छे से पढ़ने पर भी ऐसे विचार उत्पन्न होना घबराहट के संकेत हैं। तनाव के कारण विद्यार्थी ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते। कई तो प्रश्न भी ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं। इससे बचने के लिए ये उपाय कर सकते हैं -

परीक्षा कक्ष में सही समय पर पहुँचें।

कक्ष में पहुँचकर लंबी-गहरी साँसें लें और छोड़ें। घबराहट में अक्सर लोग ठीक से सांस नहीं लेते हैं। गहरी सांस लेते हुए अपनी पीठ एकदम सीधी कर लें।

आपके सामने रखी किसी स्थिर निर्जीव वस्तु (दीवार, तस्वीर, आदि) की ओर देखकर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास करें। मन में कोई सकारात्मक बात दोहराएँ जैसे - "मैं ये परीक्षा पास करने वाला हूँ।" १-२ मिनिट तक यही दोहराते रहें और फिर सामान्य रुप से सांस लें। शांति अनुभव करेंगे। प्रश्नों को ध्यान से पढ़ें। यदि परीक्षा के बीच फिर से घबराहट होने लगे तो फिर से एकाग्रता के उपाय दुहराएं। प्रश्नपत्र हल करने की रणनीति तय कर लें। कौन से प्रश्न पहले हल करेंगे आदि और बिना समय बर्बाद किए उत्तर लिखना शुरू कर दें। 

याददाश्त के टिप्स... 
किसी भी बात को याद रखने के लिए दिमाग़ उस बात का अर्थ मूल्य और औचित्य के आधार पर तय करता है। दिमाग़ की प्राथमिकता भी इसी क्रम में काम करती है। याद रखने की सबसे पहली सीढ़ी है अर्थ जानना, अतः किसी भी बात को याद रखने से उसका अर्थ ज़रूर समझिए। यदि अर्थ ही समझ में नहीं आया है तो रटने का कोई मतलब नहीं है। इसलिए पहले जिस बात या पाठ को याद रखना है, पहले उसका अर्थ समझिए, फिर उसका महत्व और मूल्य समझिए इसके बाद आपके जीवन में उस बात का क्या औचित्य है यह जानिए। किसी बात के प्रति आपका रवैया क्या है,इससे उस बात को याद रखने का सीधा संबंध है। यदि आप किसी बात को याद रखते समय उसके प्रति सकारात्मक रवैया रखेंगे तो वह बात या पाठ आपको पहली बार में ही याद हो जाएगा। 

किसी भी नई बात को समझना आपके पहले से अर्जित ज्ञान पर निर्भर है क्योंकि तब आप नई बात को उसकी कसौटी पर रखकर जोड़ते हुए याद रख सलेंगे। आप जितना मूलभूत ज्ञान बढ़ाते जाएंगे,उतना नए ज्ञान को समझना आसान होता जाएगा। यही बात याद रखने पर भी लागू होती है(डॉ. अनिल शर्मा,सेहत,नई दुनिया,जनवरी 2012 द्वितीयांक)।

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रविवार, 15 मई 2011

याद्दाश्त के लिए डायनैमिक न्यूरोबिक्स

डायनैमिक न्यूरोबिक्स के स्टैप्स

1.सही डायरेक्शन में मुंह करके खड़े हों पूर्व की ओर मुंह करना बेहतर होगा। पूर्व से बैंगनी रंग की प्राण-ऊर्जा प्रकाशित होती है, जो ऊर्जा चक्रों को सक्रिय करती है।

2.बाएं दिमाग को एक्टिव करो
बाएं अंगूठे व इंडेक्स (तर्जनी) फिंगर से दाएं कान को हल्का सा मलो, अंगूठा बाहर की तरफ होना चाहिए। इस तरह कान मसलने से जरूरी ऊर्जा कनेक्शन पैदा होगा, जिससे बायां दिमाग व पिट्यूटरी ग्लैंड एक्टिव और एनर्जी से भरपूर हो जाएंगे।

3.दाएं दिमाग को एक्टिव करो
दाएं अंगूठे व इंडेक्स (तर्जनी) फिंगर से बाएं कान को हल्का सा मलो, अंगूठा बाहर की ओर होना चाहिए। इस तरह कान मसलने से जरूरी ऊर्जा कनेक्शन पैदा होगा, जिससे दायां दिमाग व पीनियल ग्लैंड एक्टिव और एनर्जी से भरपूर होंगे।

4.एनर्जी चैनल्स को जोड़ो
शरीर की एनर्जी वायरिंग को पूरा करने के लिए जीभ को तालू से जोड़ना होगा।

5.उंगलियां सही जगह पर हों
जब ईयरलोब को हल्का सा मसलोगे तो अंगूठे बाहर की तरफ तथा उंगलियां अंदर की तरफ होनी चाहिए। यही उंगलियों की सही पोजिशन है। ऐसा करने पर दिमाग की प्राण-ऊर्जा का स्तर ऊंचा उठता है तथा असर भी ज्यादा होता है। अगर अंगूठे अंदर की तरफ कर लोगे तो इससे उतना प्रभाव नहीं पड़ेगा।

6.बाजू सही जगह पर हो
दाईं बाजू बाहर की तरफ होनी चाहिए तथा बाईं बाजू अंदर की तरफ होनी चाहिए। इससे भी दिमाग एक्टिव और एनर्जी से भरपूर होगा।

7.गहरे नीले रंग की इमेजिनेशन के साथ एनर्जी बढ़ाओ
डायनैमिक न्यूरोबिक्स धीरे-धीरे हमारी सोई पावर्स जगाकर भीतरी रसायन प्रक्रिया में भी हिस्सा लेता है। मानसिक चित्रण का सुरक्षित और असरदार तरीका यही है कि तुम देखो कि गहरा नीला रंग तुम्हारे पूरे शरीर में फैलते हुए दिमाग की एक-एक कोशिका तक पहुंच रहा है। नीले रंग की किरणें दिमाग व पूरे नर्वस सिस्टम को एनर्जी देती हैं।

8.उठक-बैठक शुरू करो
बैठते हुए अंदर सांस लो और उठते हुए सांस बाहर छोड़ो। दोनों सैशन 14 बार तक दोहराओ।

9.उंगलियां हटा लो
एक्सरसाइज पूरी होने पर उंगलियों को ईयरलोब से हटाकर रिलैक्स हो जाओ।
(बिस्वरूप राय चौधरी,हिंदुस्तान,दिल्ली,9.5.11)

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सोमवार, 11 अप्रैल 2011

हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय ने बनाया याद्दाश्त बढ़ाने वाला बिस्कुट

हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय ने मेमोरी बढ़ाने वाला बिस्कुट बनाया है। बेसिक साइंस कॉलेज व सेंटर ऑफ फूड साइंस एंड टेक्नोलॉजी विभाग ने इसे तैयार किया है। इसमें विटामिन और खनिज लवण प्रचुर मात्रा में होंगे। फिलहाल यह बिस्कुट तीन फ्लेवरों में यूनिवर्सिटी सेंटर पर उपलब्ध है।

एचएयू के वैज्ञानिकों और छात्रों की मदद से तैयार इस बिस्कुट में गाजर और ब्राह्मी पाउडर मिलाया गया है। गाजर में मौजूद फाइबर जहां आंत और पेट को स्वस्थ रखते हैं, वहीं विटामिन ए आंखों के लिए बहुत लाभदायक है। ब्राह्मी की बात ही निराली है। आयुर्वेद ने भी इसकी महत्ता को विस्तार से बताया गया है। विश्वविद्यालय के औषधि विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक बताते हैं कि इसमें मौजूद विशेष प्रकार बिकोसाइड रसायन पाया जाता है। यह दिमाग तेज करता है। इसे सिपोनिन का ही एक रूप माना जाता है।

पौष्टिकता बरकरार रहती है
विशेष तरह के मिश्रण से तैयार किया गया यह बिस्कुट पहले विभिन्न प्रकार के सांचों में डाला जाता है। इसके बाद एक निर्धारित तापमान पर इसे बेक किया जाता है। इससे इसकी पौष्टिकता बरकरार रहती है।

बच्चे भी खा लेते हैं आसानी से
बेसिक साइंस कॉलेज की डीन और सेंटर ऑफ फूड साइंस एंड टेक्नोलॉजी विभाग की निदेशक डॉ.संतोष ढिल्लों बताती हैं की ब्राह्मी का पावउर बच्चे आसानी से खाते नहीं है। इसके चलते इसे बिस्कुट में प्रयोग करने को सोचा गया। इसके बाद जो परिणाम आया अप्रत्याशित है।

इस बिस्कुट में न केवल ब्राह्मी के सभी गुण मौजूद है, बल्कि पौष्टिकता भी इसमें ज्यादा है। सेंटर में एमएससी की आठ और पीएचडी की तीन सीट हैं। इसमें आने वाले छात्र वैज्ञानिकों के साथ मिलकर नए नए प्रयोग कर रहे हैं। यह बिस्कुट भी इसी का नतीजा है। फिलहाल यह गाजर बिस्कुट, ब्राह्मी बिस्कुट और गाजर व ब्राह्मी के मिक्स फ्लेवर में बनाया गया है(आनंद मणि त्रिपाठी,दैनिक भास्कर,हिसार,11.4.11)।

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बुधवार, 5 मई 2010

स्मरण-शक्ति

इस वर्ष मार्च में,मेलबन के वैज्ञानिकों ने पाया कि अल्जाइमर मस्तिष्क के हिस्सों को सिकोड़ देता है और इस कारण संदेश ठीक से नहीं पहुंच पाते। वैज्ञानिकों का कहना था कि अल्जाइमर रोग में मस्तिष्क के अंदर एम्बलाइड बीटा प्लेक्स का निर्माण होता है और न्यूरोन्स का नुकसान होता है। इस संबंध में न्यूरोलॉजी जर्नल में प्रकाशित आलेख में डॉक्टर कासंद्रा स्जोएक का कहना था कि यह अब तक एक पहेली थी कि नयूरोन की कमी की वजह से मस्तिष्क सिकुड़ने वाले हिस्से वैसे नहीं हैं जैसा कि एम्बलाइड बीटा के अधिक मात्रा में जमा होने से दिखते हैं। खैर,इधर अपने बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का फार्मेसी विभाग भी इन दिनों भूलने की बीमारी यानी अल्जाइमर पर शोध कर रहा है। यह कोशिश की जा रही है कि मानव शरीर में मौजूद प्रीसलीन जीन को कैसे निष्प्रभावी किया जाए। अल्जाइमर मानव शरीर में मौजूद प्रीसलीन जींस में खराबी आने के कारण पैदा होती है। इस बीमारी से ग्रसित व्यक्ति अपने रोजमर्रा के काम तक भूल जाता है। एल्जाइमर पर काबू पाने के लिए कोई ठोस दवा उपलब्ध नहीं है। इस कारण यह विभाग कंप्यूटर बेस्ड शोध कर रहा है। प्रीसलीन जींस मानव मस्तिष्क में बड़े प्रोटीन को छोटे प्रोटीन में तोड़ना है। ये छोटे-छोटे प्रोटीन ही हमारे दिमाग को ऊर्जा देते हैं। तनाव, प्रदूषण आदि के कारण यह जीन प्रभावित होता है, जिसके चलते छोटे-छोटे प्रोटीन आपस में जुड़ने लगते हैं जिससे न्यूरो फिब्रिलिटी टेंगल (एनएफटी) बन जाता है। यह स्मरण-शक्ति को कम करता है और धीरे-धीरे व्यक्ति एल्जाइमर का शिकार हो जाता है। दैनिक जागरण के भोपाल संस्करण में 4 मई को प्रकाशित खबर के मुताबिक,विश्वविद्यालय का फार्मेसी विभाग प्रीसलीन जींस को गामा सीक्रेटस एन्जाइम से बंद करने का प्रयास कर रहा है, जिससे छोटे-छोटे प्रोटीन का आपस में जुड़ना रुकेगा। बात धन,वैभव और यश की हो या सहज जीवन-शैली की,स्मरण-शक्ति के बगैर गुजारा नहीं है। इस बात पर कम ही ध्यान दिया गया है कि हमारे हाथ-पैर की उंगलियों के अनुचित संचालन का हमारी स्मरण-शक्ति से सीधा संबंध है। स्मरण शक्ति के कमजोर होने के लिए तनाव अथवा मनोरोग को जिम्मेदार ठहराया जाता है और इसे तेज़ करने के लिए त्राटक समेत कई प्रकार के आसन-प्राणायाम आदि करने,ज्ञान मुद्रा में बैठने,शंखपुष्पी के सेवन आदि की सलाह दी जाती है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि याद्दाश्त का संबंध केवल भौतिक जीवन-शैली से है और चंद आदतों को सुधार लेने से याद्दाश्त सामान्य हो जा सकती है। इसमें शक नहीं कि स्मरण-शक्ति,बुद्धि,मन और मस्तिष्क के लिए ज्ञानमुद्रा से बढकर कोई दूसरी क्रिया नहीं है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह पूरी तरह हानिरहित है और इसका जितना चाहें,जिस अवस्था में चाहें, प्रयोग कर सकते हैं। लेकिन आज हम स्मरण-शक्ति के कुछ अन्य उपायों पर विचार करेंगे जिनकी ओर ध्यान कम दिया गया है। इनमें से एक है-ताली बजाना। किसी बच्चे को देखिए,खुश होते ही ताली बजाने लगता है। इसी तरह,ताली बजाने से भी खुशी मिलती है। वस्तुतः,ताली बजाने से मन,मस्तिष्क,बुद्धि और समस्त स्नायुमंडल में प्रसन्नता व्याप्त हो जाती है। हमारी हथेलियों में सैकड़ों मर्मस्थल हैं और उन्हें दबाने से बौद्धिक शक्ति और चैतन्य का विकास होता है। दूसरा है तलवों की मालिश। यह केवल नेत्र-ज्योति के लिए उपयोगी नहीं है बल्कि इससे 100 से ज्यादा रोग दूर होते हैं। सैनिकों की निर्णय-क्षमता के सब कायल हैं। उन्हें परेड,ड्रिल आदि भले शारीरिक रूप से चुस्त रखने के लिए कराया जाता हो,मगर इसका उनकी बुद्धि पर भी परोक्ष प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार वज्रासन को, भोजन पचाने वाले आसन के रूप में ही प्रचारित किया जाता है। कपालभाति प्रक्रिया में शरीर में अधिक ऑक्सीजन जाने के कारण स्नायुमंडल शांत हो जाता है। अगर कपालभाति के बाद ज्ञानमुद्रा में वज्रासन लगाया जाए अथवा पराध्यान साधना की जाए,तो स्मरण-शक्ति का अद्भुत विकास होता है। और तो और,गंध का भी याद्दाश्त से गहरा ताल्लुक है। ध्यान दीजिए कि पारंपरिक रूप से शरीर के जिन 12 स्थलों पर चंदन लगाने की परंपरा थी,उनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण ललाट के मध्य चंदन के लेप का रहा है। पराविद्या रिसर्च फाउंडेशन के संस्थापक आचार्य केशवदेव जी महाराज कहते हैं कि इसके वैज्ञानिक रहस्य को जाने बिना भी,श्रद्धा और भक्ति के कारण ही सही,सर्वसाधारण अनजाने में ही इससे लाभान्वित होते रहे हैं। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर बताया है कि मिट्टी के टुकड़े को पानी में भिगोकर सूंघने से मस्तिष्क की शक्ति विकसित होती है। इत्र भी मस्तिष्क को शांत करने और याद्दाश्त बढाने में सहायक है। केसर,मेहँदी और इलायची की गंध को इस लिहाज से खास उपयोगी माना गया है। कुछ वर्ष पूर्व,प्रतियोगिता परीक्षाओं से जुड़ी पत्रिकाओं में ऐसे कैसेट के विज्ञापन की बड़ी धूम मची थी जो छात्रों की एकाग्रता बढाने के लिए तैयार किये गए थे। इस कैसेट में और कुछ नहीं था-सिवाए प्राकृतिक संगीत के। महानगरों में अब यह भले सुलभ न हो मगर अन्य इलाकों में पक्षियों का कलरव,रिमझिम बारिश से उपजता संगीत,बादलों की गर्जना सहज हैं। इन्हें सुनने का प्रयास करना मस्तिष्क के लिए स्वास्थ्यकर है। स्मरण शक्ति का ऑक्सीजन से सीधा संबंध है। केवल पीपल का वृक्ष ऐसा है जिससे 24 घंटे ऑक्सीजन निकलता है।संभवतः,यही कारण है कि शास्त्रों में भी पीपल की सात परिक्रमा करने का निर्धारण किया गया है। ध्यान दें कि पीपल की लकड़ी का हवन में विशेष महत्व है। आर्य समाजी संस्थाओं में पीपल की लकड़ी के साथ चन्दन,गुग्गुल,अष्टगन्ध आदि से तैयार सामग्री का हवन के लिए उपयोग होता है जिससे वातावरण तो शुद्ध होता ही है,स्नायुमंडल पर भी सकारात्मक असर पड़ता है। आचार्य केशवदेव जी के अनुसार,पीपल के पके फल से बने चूर्ण का दूध,चाय,पानी आदि के साथ नियमित रूप से सेवन करने से बुद्धि का विकास होता है। इस फल को खाया भी जा सकता है। सर्वत्र प्राप्य शंखपुष्पी की चटनी को शहदयुक्त पानी के साथ पीने पर चमत्कारिक लाभ मिलता है। इसका एक चम्मच पाउडर पानी या दूध के साथ लेने से भी शीघ्र प्रभाव देखा जा सकता है। नेचुरोपैथी के विशेषज्ञ कहते हैं कि गर्दन के नीचे लगभग आधे घंटे तक यदि नियमित रूप से हल्की मालिश की जाए,तो स्मरण-शक्ति बहुत बढ़ जाती है। नहाते समय भी सबसे ज्यादा पानी ऊपर से नीचे की ओर मेरूदण्ड पर डालना भी इस लिहाज से बहुत उपयोगी है। कुछ अन्य ज़रूरी बातें। मानें न मानें, गर्म सीट अथवा स्थान पर बैठना दिमाग के लिए ठीक नहीं है। गर्मियों में,रबड़ की तली वाला जूता बिल्कुल नहीं पहनना चाहिए। और सबसे बड़ा मंत्र यह है कि उन्मुक्त होकर हंसिए। बालसुलभ हंसी। प्रसन्नता अनेक रोगों का समाधान है। यह स्नायु-तंत्र में स्फूर्ति का संचार करता है जिसका स्मरण-शक्ति से सीधा ताल्लुक है। केशव देवजी महाराज ने महासरस्वती के बीजमंत्र ऊँ क्लीं नमः को पद्मासन अथवा किसी भी आसन में,ज्ञानमुद्रा में अपनी कमर को सीधा रखते हुए,हृदय के मध्य सूर्य की उपस्थिति मानकर ध्यान का अभ्यास करने की भी सलाह दी है।

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बुधवार, 3 मार्च 2010

श्वास और याद्दाश्त


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मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

जई और स्मरण-शक्ति


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गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

मैग्नीशियम से बढती है याद्दाश्त

(हिंदुस्तान,पटना,4.2.10) (नई दुनिया,दिल्ली,4.2.10)
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