शनिवार, 10 मार्च 2012

हम क्यों भूलते हैं?

हम अपनी जिंदगी में जितना भी सीखते हैं उसे पूरा का पूरा याद रखना संभव नहीं होता। वक्त बीतने के साथ-साथ जिंदगी में घटित कई किस्से हमारी याददाश्त से भी ग़ायब हो जाते हैं। इसे ही भूलना कहते हैं। हम ज़िंदगी भर कुछ न कुछ नया सीखते रहते हैं। 

ज़िंदगी की हर सीख और अनुभव को यदि हम याद रखना चाहें तो हमारे मस्तिष्क में इतना इकट्ठा हो जाएगा कि उसके दबाव से हम अपनी सहजता खो बैठेंगे। भूलने के अभाव में हमारी याददाश्त की तिजोरी इतनी भर जाएगी कि नए विचार को अंदर आने के लिए स्थान ही नहीं बचेगा। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि हम अपने जीवन के सभी अनुभवों को भूलते जाएँ और नए अनुभव ग्रहण करते रहें। इसलिए हर अनुभव को याद रखना और उन्हें सँजोए रखना भी उतना ही ग़लत है जितना जल्दी भूल जाना। भयभीत करने वाले अनुभव जल्दी भूल जाना हमेशा सुखद होता है, अन्यथा वे हमें ज़िंदगी भर डराते रहते हैं। भूलने की प्रक्रिया में हम ज़रूरी बातों को भी भूल जाते हैं जिससे कई बार मुसीबत में भी पड़ जाते हैं। 

भूलने के कारण 
भूलने की कई सब्जेक्टिव और ऑब्जेक्टिव परिस्थितियाँ होती हैं। इनसे सीखने की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है साथ ही सँजोकर रखने की भी। किसी भी पाठ को याद रखने के लिए लगने वाला अधिक समय भूल जाने के लिए जिम्मेदार है। इसका अर्थ यह है कि सीखने में जितना कम समय लगेगा, वह आपको अधिक देर तक याद रहने वाला है। जितना अधिक समय सीखने में लगेगा आप उसे उतनी ही जल्दी भूल जाएंगे। सीखने की प्रबल इच्छा भूलने के मामले में महत्वपूर्ण मुद्दा है। देखा गया है कि हमेशा किसी भी गद्य का हिस्सा सीखने और याद करने में काफी समय लगता है,मेहनत भी अधिक करनी पड़ती है। 

आधा-अधूरा सीखना भी भूलने का एक महत्वपूर्ण कारम है। यदि पाठ आधा ही सीखा और समझा गया है,तब आप उसे जल्दी ही भूल भी जाएंगे। मस्तिष्क पर चोट या किसी तरह का मानसिक आघात लगना भी भूलने का एक बड़ा कारण है। मादक पदार्थों के सेवन से याद्दाश्त ख़त्म होती है। 

मादक दवाओं के प्रयोग से न्यूरोन्स प्रभावहीन हो जाते हैं। यही कारण है कि शराबखोर और मादक दवाओं का सेवन करने वाले भुलक्कड हो जाते हैं। हम अक्सर एक के बाद एक कई चीज़ें बहुत कम समय के अंतराल में याद रखने की कोशिश करते हैं। ऐसे हर मामले में,बाद में याद किया हुआ पाठ पहले सीखे हुए पाठ को प्रभावित करता है। हर नया अनुभव पुराने को धुंधला कर देता है। इस प्रक्रिया में कई चीज़ें धुंधली होकर भुला दी जाती हैं। पहले याद रखे गए किसी भी अनुभव में आई हुई रुकावट बाद में किए जा रहे पाठ को भी प्रभावित करती है। 

मानसिक थकावट के कारण भी याद्दाश्त प्रभावित होती है। बहुत अधिक देर तक किया गया बौद्धिक कार्य हमें मानसिक रूप से थका देता है। हमारी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा कम हो जाती है। हमारी सतर्कता भी प्रभावित हो जाती है। मानसिक थकान के कारण भूलने लगना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। यदि पर्याप्त शारीरिक आराम न मिले,तो इंसान नियमित रूप से भूलने लगता है। पर्याप्त नींद,शारीरिक आराम और थकान मिटाने के हर उपाय से याद्दाश्त को पैर जमाने में मदद मिलती है। 

मनोविश्लेषकों का मानना है कि हम इसलिए भूलते हैं क्योंकि हम ऐसा ही चाहते हैं। हम अप्रिय स्मृतियों को अवचेतन में धकेल देते हैं। ज़िंदगी के ग़म और भयावह हादसों को हम हमेशा से भूल जाना चाहते हैं,इसलिए वे हमें याद भी नहीं आते(डॉ. संजीव नाईक,सेहत,नई दुनिया,मार्च प्रथमांक 2012)।

5 टिप्‍पणियां:

  1. आधा-अधूरा सीखना भी भूलने का एक महत्वपूर्ण--
    भूल-चूक माफ़ ।

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  2. भूलने का अच्छा विश्लेषण किया है ...

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  3. बहुत अच्छा आलेख..
    अच्छी जानकारियों से भरा ब्लॉग...

    आभार.

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  4. हम तो काफ़ी कुछ भूलते ही रहते हैं कभी कभी तो खुद पर शक होता है :))))))

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