शनिवार, 10 मार्च 2012

रुक सकता है बच्चों का नींद में बिस्तर भिगोना

कई बच्चे अनजाने में नींद में बार बार बिस्तर में पेशाब कर देते हैं। इन बच्चों को इस बीमारी से बहुत लज्जित होना पड़ता है व कुछ को पालकों की प्रताड़ना भी झेलनी पड़ती है। इस बीमारी को नॉक्टर्नल एन्युरेसिस कहते हैं। ज़्यादातर बच्चे ५ वर्ष की उम्र के बाद पेशाब रोक पाते हैं। कभी-कभी नियंत्रण खोना सामान्य है। पर यदि ऐसा कई बार यानी हफ्ते में दो बार से अधिक और लगातर ३ महीनों से ज़्यादा समय के लिए हो रहा है तो यह बीमारी के लक्षण हैं। यह तकलीफ ५ वर्ष की उम्र के ७ प्रतिशत लड़कों में और ३ प्रतिशत लड़कियों में पाई जाती है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ इनकी संख्या में कमी आती जाती है।


पेशाब पर हम नियंत्रण कैसे करते हैं?
पेशाब की थैली भर जाने पर यह सूचना तंत्रिकाओं द्वारा हमारे मस्तिष्क तक पहुँचती है और नींद में होने के बावजूद मस्तिष्क हमें उठने की चेतना देता है ताकि मूत्र त्याग कर पेशाब की थैली को खाली किया जा सके। हम उचित समय एवं स्थान होने तक मूत्र त्यागने की इच्छा को रोक सकते हैं। यदि यह मूत्र त्याग रोकने की क्षमता देरी से विकसित हो या फिर पेशाब मार्ग या तंत्रिकाओं की रचना में खराबी हो तो ये बच्चे इसको नियंत्रित नहीं कर पाते।

क्यों करते हैं बच्चे बिस्तर गीला?
अनुवांशिक कारणों को छोड़कर अन्य कई कारणों से यह परेशानी हो सकती है। इनमें कुछ मानसिक और कुछ शारीरिक कारण शामिल हैं। मानसिक कारणों में बच्चे का अत्यधिक चंचल होना या लगातार तनावग्रस्त होना शामिल है। शारीरिक कारणों में एवीपी (अर्जिनीन वेसोप्रेसीन) नामक हारमोन का कम बनना या पेशाब मार्ग की रचना में खराबी होना शामिल हैं। कुछ बच्चों में इस परेशानी का कोई कारण नहीं होता और ये परेशानी महज़ उनके इस क्षमता के देरी से विकसित होने से होती है। 


प्राइमरी नॉक्टर्नल एन्युरेसिस 
कुछ बच्चे जन्म से ही कभी भी पेशाब रोकने पर नियंत्रण नहीं कर पाते हैं। इसे प्राइमरी नॉक्टर्नल एन्युरेसिस कहते हैं। 


सेकंडरी नॉक्टर्नल एन्युरेसिस 
कुछ बच्चे पेशाब पर नियंत्रण शुरू में तो कुछ समय के लिए पा लेते हैं(6 महीने से अधिक समय) लेकिन परेशानियों के आने पर फिर इसे खो देते हैं। पेशाब मार्ग में संक्रमण,मधुमेह,अत्यधिक मानसिक तनाव आदि इन परेशानियों में शामिल हैं। 


पालक क्या करें 
बच्चे को चिकित्सक के पास ले जाएं जिससे उन्हें समुचित सलाह मिल पाए(डॉ.अंजली भराणी,सेहत,नई दुनिया,मार्च प्रथमांक 20120।

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