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सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

विक्की डोनर बनने से पहले......

रक्तदान और अंगदान जैसे विषयों पर खुले में चर्चा होती है, लेकिन शुक्राणुदान के बारे में भारतीय समाज में अब तक केवल दबे शब्दों में ही चर्चा होती थी। मगर इस वर्ष इसी विषय पर प्रदर्शित 'विक्की डोनर' ने इस मुद्दे को सुर्ख़ियों में ला दिया। फिल्म में दिखाया गया कि हीरो विक्की (आयुष्मान खुराना) बेरोजगार है, लेकिन स्पर्म डोनेशन को ऐसा काम मानता है जिससे समाज में उसकी बदनामी हो सकती है। उसे लगता है कि बिना शादी के वह बाप बन जाएगा। दरअसल,उसकी यह सोच स्पर्म डोनेशन के बारे में हर आम भारतीय की सोच है। हमारे देश में स्पर्म डोनेशन अब भी टैबू के तौर पर देखा जाता है। दूसरी तरफ,कई दंपति ऐसे हैं जिन्हें संतान प्राप्ति के लिए शुक्राणु दानदाताओं का ही सहारा है। इसके बावजूद,देश में शुक्राणुओं की बैंकिंग की माकूल व्यवस्था नहीं है। निःसंतान दंपतियों को शुक्राणु दान हासिल करने के लिए फर्टिलिटी सेंटरों के सीमित विकल्पों पर ही समझौता करना पड़ता है। स्वस्थ एवं बुद्धिमान शुक्राणुदाताओं की आज भी भारी कमी है।  

दान की महत्ता काफी समय से समाज में प्रचलित है-रक्तदान, गुर्दादान, जिगर दान एवं मरणोपरांत नेत्र-दान। इन सभी दानों को आर्थिक दान के मुकाबले महादान का दर्जा प्राप्त है। शुक्राणुदान भी काफी समय से प्रचलन में है, पर शर्म, झिझक, सामाजिक तिरस्कार की भावना एवं "लोग क्या कहेंगे" का पूर्वाभाव होने के कारण शुक्राणुदाता हमेशा समाज में अदृश्य ही रहे हैं। शुक्राणुदान अन्य दानों से एक खास भिन्नता रखता है कि यहां दाता (देने वाला) एवं ग्रहिता (लेने वाला) ताउम्र एक-दूसरे से अंजान रहते हैं पर इसके बावजूद दोनों के मध्य अप्रत्यक्ष रूप से मानवीय रिश्तों से परे एक अटूट रिश्ता बनता है जो काबिले तारीफ है। इस तरह के दान से निसंतान दंपति को संतान सुख हासिल होता है। 

कौन हो सकते हैं विक्की-डोनर 
(1) उम्र २० से ४५ वर्ष 

(२) शारीरिक मानसिक एवं बौद्धि स्तर सामान्य 

(३) किसी भी प्रकार के अनुवांशिक रोग से मुक्त 

(४) गंभीर प्रकार की बीमारियां जैसे-एड्स "बी", एवं "सी" प्रकार के पीलिया, रक्त की बीमारियाँ एवं सेक्स संबंधित अन्य बीमारियां न हो 

(५) सबसे मुख्य बात कि विवाहित हो एवं संतान सुख हासिल कर चुके हो, इससे इन लोगों के शुक्राणुओं की संतानोपत्ति क्षमता का पता चल जाता है।

क्या हैं जरूरी परीक्षण

-शुक्राणुओं की उच्च स्तरीय जाँच-संख्या, गुणवत्ता एवं संक्रमण

-रक्त परीक्षण के लिए,किसी गंभीर बीमारियों के लिए-खासकर एड्स, पीलिया, टीवी एवं सेक्स संबंधी अन्य संक्रमण के लिए।

क्या हैं प्रक्रिया शुक्राणु बैंक में 

शुक्राणु दाताओं को २ दिनों तक शारीरिक संपर्क एवं अन्य सेक्स गतिविधियों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। शुक्राणुओं का सेम्पल लेने के बाद पूर्ण जाँच एवं केमिकल उपचार के पश्चात शीत-प्रक्रिया द्वारा बैंक में सुरक्षित रख दिया जाता है। इस पर शुक्राणुदाता की कद-काठी, रंगरूप, ब्लड ग्रुप, आंखों एवं बालों के रंग के अनुसार कोड नंबर डाल दिए जाते है, मकसद सिर्फ यह रहता है कि जरूरतमंद अपने व्यक्तित्व से मेल खाता सेम्पल ले सके, जिससे कि संतान की शक्लो-सूरत में माँ-बाप से मेल खा सके।

महत्वपूर्ण बिंदु : आज दिया गया शुक्राणु सेम्पल सिर्फ ६ माह बाद ही उपयोग लायक होता है। इन ६ माह में तीन-तीन महीने के अंतराल से दान में मिले शुक्राणओं के पुनः परीक्षण किए जाते हैं। यह जानने के लिए कि कोई शांत पड़ी हुई पुरानी बीमारी या नई बीमारी आकार तो नहीं ले रही है। सारी जाँचें सामान्य आने पर ही सुरक्षित रखे गए सेम्पल को उपयोग लायक माना जाता है,अन्यथा नहीं। इन सारी प्रक्रियाओं के लिए शुक्राणु दाता एवं बैंक के बीच एक लिखित करार तैयार किया जाता है जो पूर्ण रूप से गोपनीय होता है।

विश्वास की नींव ही मुख्य आधार स्तंभ है 

जिस तरह सुखी, वैवाहिक जीवन का आधार स्तंभ होता है विश्वास, उसी तरह शुक्राणु दाताओं को अपने जीवन-साथी को पूर्ण रूप से विश्वास में लेकर एवं उसकी भावनाओं का सम्मान करते हुए ही विक्की-डोनर बनने का प्रयास करना चाहिए। 

किन लोगों को जरूरत होती हैं शुक्राणुओं की

-जिनके वीर्य में शुक्राणु नहीं हैं। 

- जिनके शुक्राणुओं की संख्या एवं गुणवत्ता में कमी हो एवं लाइलाज हो। 

- जिनके शुक्राणुओं में सामान्य होने के बावजूद संतानोपत्ति की क्षमता न हो।

-पुरुषों में अनुवांशिक एवं संतानोत्पत्ति के लिए घातक बीमारियाँ हों। शुक्राणुदान के अलावा अंडाणु एवं विकसित भ्रूण दान भी प्रचलन में हैं(इंदौर के डॉ. अजय जैन का यह आलेख नई दुनिया के सेहत परिशिष्ट,अक्टूबर प्रथमांक 2012 से आंशिक आशोधन के साथ साभार)। 

ब्रिटेन जैसे देशों में शुक्राणु दाता को करीब 60 पाउंड यानि करीब 2,500 रुपए दिए जाते हैं। मगर,भारत में क्या स्थिति है,इसके लिए,यह रिपोर्ट भी देखिए। 

कुछ अन्य उपयोगी जानकारीः 
-भारतीय चिकित्सकीय अनुसंधान परिषद यानि आईसीएमआर के दिशा-निर्देशों के मुताबिक एक शुक्राणु दाता के शुक्राणु से दस से ज़्यादा बच्चे पैदा नहीं किए जाने चाहिए। तर्क यह है कि एक ही शुक्राणु से पैदा होने वाले बच्चे देखने में कुछ हद तक एक समान होते हैं। 

-आईसीएमआर के दिशानिर्देशों के अनुसार, एक पुरुष को केवल अपने जीवन में 76 बार ही शुक्राणु दान करने की इजाज़त दी जा सकती है। 

-बीबीसी संवाददाता शालू यादव की एक रिपोर्ट कहती है कि दिशा-निर्देशों के मुताबिक़,जब कोई क्लिनिक शुक्राणु बैंक से शुक्राणु लेता है और वो शुक्राणु बच्चे पैदा करने में सफल रहता है, तो उसका रिकॉर्ड शुक्राणु बैंक को दिया जाना चाहिए। 

-2008 में, असिस्टिड रिप्रोडक्टिव टेकनॉलाजी यानी कृत्रिम रूप से बच्चे पैदा करने की तकनीक से जुड़ा एक विधेयक संसद में लाया गया था जिसमें इस क्षेत्र को नियंत्रित करने के लिए कुछ कानून सुझाए गए थे,लेकिन अब तक वो कानून संसद में लंबित है।

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शनिवार, 23 अप्रैल 2011

आक्सीडेटिव स्ट्रेस बना सकता है नपुंसक

मधुमेह रोग का नियंत्रण होना आक्सीडेटिव स्ट्रेस (लगातार तनाव के बाद की स्टेज) भी हो सकता है। इस आक्सीडेटिव स्ट्रेस के कारण शरीर में बनने वाले फ्रीरेडिकल्स से मरीज नंपुसक भी हो सकता है। यह बात शुक्रवार को लखनऊ में चिकित्सा विश्वविद्यालय के फिजियोलॉजी व फार्माकोलॉजी विभाग द्वारा आयोजित कार्यशाला में हमदर्द इंस्टीटय़ूट आफ मेडिकल साइंस एण्ड रिसर्च सेंटर के डा. अमित ने कही। कार्यशाला में मेटाबॉलिज्म सिंड्रोम से होने वाली बीमारियों पर भी चर्चा की गयी। डा. अमित ने कहा कि नये शोध में पता चला है कि डायबटीज को बढ़ाने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। आक्सीडेटिव स्ट्रेस की शुरुआत लगातार तनाव से होती है। इसका सीधा असर लिवर व पैक्रियांज पर पड़ता है। इससे पैक्रियाज में इंसुलिन बनना बंद हो जाता है और डायबिटीज हो जाती है। सही इलाज नहीं होने से आक्सीडेटिव स्ट्रेस से शरीर में फ्रीरेडिकल्स बनने लगते है। यह फ्रीरेडिकल्स शुक्राणु की बनावट को भी प्रभावित करता है। यह शुक्राणु अण्डाणु के साथ सक्रिय नहीं हो पाते। उन्होंने कहा कि खाना खाकर टहलने से खाना सही तरीके से नहीं पचता है। नये शोध के मुताबिक खाना खाने से पहले आधा घंटा टहलना ही खाना पचाने के लिए उचित है। एसजीपीजीआई के डा. यूके मिश्र ने बताया कि डिमेंशिया में ज्यादातर डाक्टरों की धारणा है कि 75 वर्ष की उम्र के बाद भी मस्तिष्क की कोशिकाओं में परिवर्तन होता रहता है जबकि यह गलत है। कार्यशाला में प्रो. एस बी देशपाण्डे ने कहा कि नये शोध में पता चला है कि अगर सांप या बिच्छू के काटने पर इंसुलिन का इंजेक्शन लगा दिया जाए तो उसके जहर का असर देर से होता है(रा्ष्ट्रीय सहारा,लखनऊ,23.4.11)।

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गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

पंजाबी पुरुषों में शुक्राणुओं की भारी कमी!

पंजाब के पुरुषों के वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या काफी कम हो गयी है। यह युवा पुरुषों में ‘प्रजनन क्षमता’ में लगातार हो रही कमी के बढ़ते मामले से स्पष्ट हुआ है। यह जानकारी दयानंद मेडिकल कालेज और अस्पताल (डी.एम. सी.एच.) लुधियाना के पैथालॉजी विभाग के अध्यक्ष और चिकित्सा अधीक्षक डॉ. बी.एस. शाह ने दी।

इस विषय पर डॉ. बी.एस. शाह ने कहा कि पुरुषों के वीर्य में शुक्राणुओं की औसंतन संख्या लगभग तीन दशक पहले 60 मिलियन से ज्यादा थी, जो अब कम होकर मात्र 15 मिलियन हो गयी है। इस मामले में देश में सबसे प्रभावित प्रांत पंजाब ही है। यह तथ्य विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) द्वारा तैयार आंकड़ों से भी स्पष्ट होते हैं। डॉ. शाह डब्ल्यू.एच.ओ. गाइड लाइंस की वीर्य परीक्षण के लिए तैयार कोर कमेटी के सदस्य भी हैं। उन्होंने कहा कि इसके लिए सबसे बड़े कारण नशीले पदार्थों का सेवन, ड्रग्स कीट नाशकों का अत्यधिक प्रयोग, ध्रूमपान और मोबाइल फोन का ज्यादा प्रयोग करना भी है। उन्होंने कहा कि उपरोक्त सभी चीजों के धड़ल्ले से प्रयोग के कारण प्रदेश में प्रजनन क्षमता में कमी के मामले तेजी से बढ़े हैं।

डॉ. शाह का मानना है कि शराब पीने से प्रजनन क्षमता का ह्रास होता है, क्योंकि इससे न केवल वीर्य में शुक्राणुओं की कमी होती है बल्कि इसकी क्वालिटी भी प्रभावित होती है। उन्होंने बताया कि इससे बचने के लिए युवाओं को नशों से बचना चाहिए और कीटनाशकों का प्रयोग भी सीमित ढंग से करना चाहिए(अंशु सेठ,दैनिक ट्रिब्यून,लुधियाना,17.2.11)।

दैनिक भास्कर,लुधियाना संस्करण की खबर है कि एन्वायरमेंटल टॉक्सिंस पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर भी असर डाल रहे हैं। पहले किसी सामान्य पुरुष के वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या (स्पर्म काउंट) 60 हजार मिलियन होती थी, लेकिन अब डब्लयूएचओ गाइडलाइंस में 15 मिलियन स्पर्म काउंट को भी सामान्य माना जाने लगा है।

पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या कम होने व अन्य सेक्सुअल डिसआर्डर की वजहों को ढूंढने के लिए देश-विदेश के विशेषज्ञ तीन दिन तक लुधियाना में चर्चा कर रहे हैं। एंड्रोलोजी सोसायटी आफ इंडिया की ओर से पहली बार नार्थ इंडिया में कराई जा रही एंट्रोलोजी व रिप्रोडक्टिव मेडिसन पर नेशनल कांफ्रेंस एंड्रोकोन 2011 कराई जा रही है। बुधवार को मैनेजिंग सोसायटी के सचिव प्रेम गुप्ता, मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डा.बीएस शाह, डा.संदीप शर्मा व डा.परमिंदर सिंह ने प्रेस कांफ्रेंस कर यह जानकारी दी।

कांफ्रेंस में डाक्टरों ने बताया कि आमतौर पर पुरुष सेक्स से संबंधित समस्याओं को छुपाते हैं और उन पर चर्चा नहीं करना चाहते। जबकि यूएसए में 80 साल का बुजुर्ग भी सर्जरी से पहले डाक्टर से पूछता है कि इससे उसकी सेक्स लाइफ पर किसी तरह का असर तो नहीं होगा।

भारत में पुरुष सेक्स समस्याओं का इलाज नीम हकीम कर रहे हैं। वे नीम हकीमों के झूठे दावों में फंस कर उल्टा अपना नुकसान करा बैठते हैं। नीम हकीमों की ओर से बनाई गई भ्रांतियों को दूर करना भी कांफ्रेंस का मकसद है। इसका उद्घाटन इटली में वल्र्ड एंड्रोलोजिकल सोसायटी के प्रेजीडेंट डा.जी.ट्रीटी करेंगे।

इसके अलावा दुनिया में पहली बफेलो क्लोनिंग करने वाले साइंटिस्ट भी इस कांफ्रेंस में भाग लेंगे। इसमें प्लसेंटा के अलावा मासिक धर्म से स्टेम सेल लेने, बोन मैरो ट्रांसप्लांट, शुक्राणु निल होने पर मरीज के इलाज, प्रोस्टेट कैंसर, इरेक्टल डिसफंक्शन, स्पर्म काउंट करने के उचित तरीके व टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक पर भी चर्चा की जाएगी।

इधर,शुक्राणुओं की कमी का मुद्दा चिंता का विषय है,उधर डॉक्टर एक ही इंजेक्शन से परिवार नियोजन की कवायद में जुटे हैं। आज के ही दैनिक भास्कर से विपन जंड की रिपोर्ट देखिएः
 

अब पुरुषों को परिवार सीमित करने के लिए ज्यादा झंझट में नहीं पड़ना होगा। अब बस एक इंजेक्शन से वे जब तक चाहे परिवार को सीमित रख सकते हैं। पुरुषों के लिए ऐसा कांटरासेप्टिव इंजेक्शन तैयार हो गया है। इससे वे दस साल तक परिवार नियोजन कर सकते हैं।

इंडियन कौंसिल आफ मेडिकल रिसर्च की मंजूरी से लुधियाना के डीएमसी अस्पताल में इस इंजेक्शन का आठ पुरुषों पर ट्रायल हो गया है। टेस्टिंग में इन आठों पुरुषों के स्पर्म काउंट निल आए हैं। दो दिन बाद लुधियाना में एंड्रोलोजी सोसायटी ऑफ इंडिया की ओर से आयोजित हो रही एंड्रोलोजी एंड रिप्रोडक्टिव मेडिसन कांफ्रेंस में इस इंजेक्शन का लाइव डेमो दिया जाएगा।

कोलकाता के डा.एसके गुहा तीन मरीजों को यह इंजेक्शन लगाएंगे। डीएमसी अस्पताल के डा.संदीप शर्मा के मुताबिक इंडियन कौंसिल आफ मेडिकल रिसर्च के तहत इंजेक्शन के अभी तक तीन ट्रायल हो चुके हैं। बंदरों पर परीक्षण के बाद मौलाना आजाद मेडिकल कालेज, आल इंडिया इंस्टीटच्यूट आफ मेडिकल साइंस में इंसानों पर भी इसका ट्रायल हो चुका है। मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डा.बीएस शाह के मुताबिक इंजेक्शन यूएसए, सिंगापुर समेत तीन देशों में पेटेंट हो चुका है।

खत्म भी हो सकता है असर
यह इंजेक्शन प्री लोडेड सीरिंज में आता है। दोनों टेसटिज में एक छोटा-सा छेद करके वीर्य की नली को निकालकर इंजेक्शन उसमें लगाकर नाली को बंद कर दिया जाता है। इंजेक्शन लगाने के तीन महीने बाद पहला वीर्य परीक्षण होता है, जिससे रिजल्ट पता लगता है। दस साल के दौरान परिवार आगे बढ़ाना हो, तो छोटा-सा चीरा लगाकर बंद हिस्से को काटकर दोबारा जोड़ दिया जाता है।

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मंगलवार, 11 जनवरी 2011

प्रदूषण और टेंशन हैं फर्टिलिटी के दुश्मन

लंबी दूरी की यात्रा करने वाले ड्राइवरों, टोल बूथ वर्कर्स और ज्यादा प्रदूषण वाले शहरों में रह रहे पुरुषों में स्पर्म की संख्या तेजी से घट रही है। इसी तरह नाइट शिफ्ट में काम करने वाली महिलाओं में मेंसुरेशन का अनियमित होना आम हो गया है। इसका असर फर्टिलिटी की क्षमता पर पड़ रहा है। ये तथ्य इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की मल्टी सेंट्रिक स्टडी में सामने आए हैं।

देशभर के 12 राज्यों में चल रहे ह्यूमन रिप्रॉडक्शन रिसर्च सेंटर के जरिए काउंसिल ने समस्या का पता लगाया तो यह बात सामने आई कि जीवनशैली से जुड़े तनाव और वातावरण में बढ़ता प्रदूषण दिक्कतें तेजी से बढ़ा रहा है। इनमें नींद पूरी न होना, काम का तनाव, औद्योगिक कचरे, खाने-पीने की चीजों में रासायनिक तत्वों के इस्तेमाल और कॉस्मेटिक्स में हो रही जैविक मिलावट जैसी चीजें शामिल हैं। महिलाओं में तनाव और अल्कोहल का इस्तेमाल समस्या की सबसे आम वजह है। कुछ सेंटरों की स्टडी में यहां तक कहा गया है कि काफी ज्यादा देर मुक्केबाजी जैसी एक्सरसाइज करने और ज्यादा गर्म पानी से नहाने से भी स्पर्म काउंट पर असर पड़ता है।

स्टडी में शामिल एक्सपर्ट्स का कहना है कि यही समय है जब समस्या को गंभीरता से लेने और बड़े स्तर पर रिसर्च करके दिक्कतों पर नियंत्रण के उपाय ढूंढने चाहिए, वरना काफी देर हो जाएगी। स्टडी में शामिल होप फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. टी. सी. आनंद कुमार कहते हैं कि समस्या तेजी से बढ़ रही है और इसकी वजह से कई कपल यह महसूस करने लगे हैं कि वे बच्चों को जन्म नहीं दे सकते।

राजस्थान यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडीज के एक्सपर्ट एन. के. लोहिया कहते हैं कि स्वास्थ्य से जुड़े मसलों पर बेहतर होता है समस्या बढ़ने से पहले ही उसके नियंत्रण के उपाय ढूंढ लेना। चूंकि ऐसी दिक्कतें तेजी से बढ़ती हैं और बहुत जल्द हाथ से निकल जाती हैं। एचआईवी/एड्स की समस्या इसका एक उदाहरण है। सीनियर साइंटिस्ट राजीव मेहता कहते हैं कि स्पर्म काउंट पर रेडिएशन के असर का पता लगाने के लिए जानवरों पर कई स्टडी की गई हैं, मगर इंसानों के मामले में बहुत कम काम हुआ है।

जेएनयू के साइंटिस्ट जे. बिहारी की टीम ने माइक्रोवेव रेडिएशन का चूहों पर असर जानने के लिए एक स्टडी की थी, जिसमें उनके क्रोमोसोम (गुणसूत्र) को काफी ज्यादा नुकसान हुआ था। इंसानों पर भी इसी तरह का असर होता है यह जानने के लिए और स्टडी की जरूरत है। इससे पहले साल 1992 से साल 1997 के बीच की गई एक स्टडी में भी पुरुषों में स्पर्म काउंट में लगातार कमी दर्ज की गई थी। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि यही वो दौर था जब शहर तेजी से विकसित हो रहे थे। निर्माण कार्य और कमर्शल गाड़ियों की संख्या में बढ़ोतरी और डीजल जेनरेटर के चलते वातावरण में सस्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर जैसे तत्व भी तेजी से बढ़ रहे थे।

सीनियर गायनेकॉलजिस्ट डॉ. कामिनी राव कहती हैं कि 1990 से पहले हुई एक स्टडी में भी इसी तरह के रिजल्ट सामने आए थे। इसका मतलब है कि समस्या लगातार बढ़ रही है(नीतू सिंह,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,11.1.11)।

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शनिवार, 27 नवंबर 2010

मेरठ के लाला लाजपत राय मेडिकल कालेज में कृत्रिम शुक्राणु बनाने में प्रारंभिक सफलता

यह सुनने, समझने और मानने में काफी वक्त लगेगा, लेकिन वैज्ञानिकों की ओर से खोजी गई स्टेम सेल कमाल की चीज है। इससे शुक्राणु बनाए जा सकते हैं। वैज्ञानिकों को इसमें प्रारंभिक सफलता हाथ लगी है। स्पेन में स्टेम सेल कार्यशाला से लौटे डा. अनिरुद्ध सिंह ने यह जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि यह स्टेम सेल एंब्रियो से बनाई जा रही है। एंब्रियो स्त्री के अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु के मिलन से बनता है। यह गोल सी संरचना है। एक एंब्रियो में कुल 125 कोशिकाएं होती हैं। इन्हें स्टेम सेल में बदला जाता है। डा. अनिरुद्ध सिंह ने बताया कि एंब्रियो की हर कोशिका खुद में कृत्रिम शुक्राणु बनाने में सक्षम होती है। स्टेम सेल वह होती है, जो शरीर के किसी भी हिस्से का टिश्यू (ऊतक) बना सकती है या फिर रिपेयर कर सकती है।

कैसे बनेंगे शुक्राणु
एंब्रियोनिक स्टेम सेल के प्रयोग से कृत्रिम शुक्राणु बनाने में स्पेन के डाक्टरों को शुरुआती सफलता हाथ लगी है। वहां के डाक्टरों का कहना है कि अगले दस सालों में वह चिकित्सा विज्ञान में एक नए युग की शुरुआत करने जा रहे हैं।
मेरठ में पहले हुआ था प्रयोग
डा. अनिरुद्ध सिंह ने बताया कि अभी भारत में स्टेम सेल तकनीक विकसित नहीं है। उन्होंने बताया कि मेरठ के लाला लाजपत राय मेडिकल कालेज में डा. संदीप मित्थल के नेतृत्व में हुए एक शोध में स्टेम सेल बनाने में तो नहीं, लेकिन उसी की तरह के एक प्रयोग में कामयाबी हाथ लगी है। इस प्रयोग में एंब्रियोनिक मेंब्रेन का प्रयोग आंख और उसके आस-पास लगे घावों को भरने में किया गया है(दैनिक जागरण,मेरठ,27.11.2010)।

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मंगलवार, 9 नवंबर 2010

धात गिरनाःमिथक और सच्चाई

शरीर क्रिया विज्ञान के मुताबिक यूरिन के साथ सीमेन का जाना नामुमकिन है। जैसे ही कोई पुरुष क्लाइमैक्स में पहुंचकर डिस्चार्ज करता है तो पहले यूरिन का रास्ता बंद हो जाता है। सीमेन उसके बाद आता है। लिहाजा यूरिन और सीमेन एक साथ कभी मिल ही नहीं सकते। असल में जो चिकना सफेद पदार्थ जा रहा है और जिसे आप सीमेन समझते हैं, वह हकीकत में प्रोस्टेट और मूत्रमार्गीय ग्रंथियों का स्त्राव होता है। जब कोई शख्स शौच के लिए बैठता है और मल त्याग के वक्त थोड़ा प्रेशर लगाता है तो यह दबाव मलाशय से होकर प्रोस्टेट और मूत्र नलिका पर भी पड़ता है और लिसलिसे चिकने सफेद पदार्थ की कुछ बूंदें जमा होकर बाहर निकल आती हैं। लोग इसे सीमेन समझ बैठते हैं। सीमेन एक कीमती चीज है और उसका संचय करना जरूरी है', यह गलतफहमी बरसों से चली आ रही है। साथ ही लोगों के दिमाग में यह भी गलतफहमी होती है कि सीमेन की एक बूंद खून की सौ बूंदों से बनती है। ' धात' जाने की इस प्रक्रिया का कारण हमारी शौच जाने की पद्धति है। हमारे देश के अलावा पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे तमाम विकासशील देशों में भी यही पद्धति चलती है, लेकिन पश्चिम के विकसित देशों में ऐसा नहीं होता। वहां लोग कमोड का प्रयोग करते हैं और शौच करते समय सीधा (सामने की ओर) देखते हैं। हमारे देश में लोग उकरू बैठकर शौच करते हैं, जिसकी वजह से शौच करते वक्त वे नीचे देखते हैं। ऐसे में उन्हें जो लिसलिसा पदार्थ नजर आता है, उसे वे सीमेन समझ लेते हैं। सीमेन के कीमती होने की धारणा उनके मन में पहले से ही होती है इसलिए जब वे अखबारों में 'यदि आप कीमती शक्ति पेशाब के रास्ते बाहर निकाल रहे हैं, तो हमसे इलाज कराएं' जैसे शीर्षक वाले विज्ञापन पढ़ते हैं तो उनकी चिंता और ज्यादा बढ़ जाती है। बीमार न होते हुए भी वे खुद को बीमार समझने लगते हैं। कहने का मतलब यही है कि यह कोई बीमारी नहीं है और जब यह बीमारी ही नहीं है, तो इसके इलाज की भी कोई जरूरत नहीं है। अगर कोई शख्स इस 'धात वाले पेशाब' को किसी पैथॉलजी लैब में चेक कराए तो उसमें एक भी शुक्राणु नहीं मिलेगा क्योंकि वह लिसलिसा पदार्थ सीमेन है ही नहीं। तो याद रखिए, यह सिर्फ देखने की बीमारी है, जिसने देखा वह फंस गया। जिसने नहीं देखा, वह बच गया(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,7.11.2010)।

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सोमवार, 25 जनवरी 2010

स्पर्म अगर कम हो जाए

(हिंदुस्तान,पटना,20.1.10)
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