मंगलवार, 11 जनवरी 2011

प्रदूषण और टेंशन हैं फर्टिलिटी के दुश्मन

लंबी दूरी की यात्रा करने वाले ड्राइवरों, टोल बूथ वर्कर्स और ज्यादा प्रदूषण वाले शहरों में रह रहे पुरुषों में स्पर्म की संख्या तेजी से घट रही है। इसी तरह नाइट शिफ्ट में काम करने वाली महिलाओं में मेंसुरेशन का अनियमित होना आम हो गया है। इसका असर फर्टिलिटी की क्षमता पर पड़ रहा है। ये तथ्य इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की मल्टी सेंट्रिक स्टडी में सामने आए हैं।

देशभर के 12 राज्यों में चल रहे ह्यूमन रिप्रॉडक्शन रिसर्च सेंटर के जरिए काउंसिल ने समस्या का पता लगाया तो यह बात सामने आई कि जीवनशैली से जुड़े तनाव और वातावरण में बढ़ता प्रदूषण दिक्कतें तेजी से बढ़ा रहा है। इनमें नींद पूरी न होना, काम का तनाव, औद्योगिक कचरे, खाने-पीने की चीजों में रासायनिक तत्वों के इस्तेमाल और कॉस्मेटिक्स में हो रही जैविक मिलावट जैसी चीजें शामिल हैं। महिलाओं में तनाव और अल्कोहल का इस्तेमाल समस्या की सबसे आम वजह है। कुछ सेंटरों की स्टडी में यहां तक कहा गया है कि काफी ज्यादा देर मुक्केबाजी जैसी एक्सरसाइज करने और ज्यादा गर्म पानी से नहाने से भी स्पर्म काउंट पर असर पड़ता है।

स्टडी में शामिल एक्सपर्ट्स का कहना है कि यही समय है जब समस्या को गंभीरता से लेने और बड़े स्तर पर रिसर्च करके दिक्कतों पर नियंत्रण के उपाय ढूंढने चाहिए, वरना काफी देर हो जाएगी। स्टडी में शामिल होप फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. टी. सी. आनंद कुमार कहते हैं कि समस्या तेजी से बढ़ रही है और इसकी वजह से कई कपल यह महसूस करने लगे हैं कि वे बच्चों को जन्म नहीं दे सकते।

राजस्थान यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडीज के एक्सपर्ट एन. के. लोहिया कहते हैं कि स्वास्थ्य से जुड़े मसलों पर बेहतर होता है समस्या बढ़ने से पहले ही उसके नियंत्रण के उपाय ढूंढ लेना। चूंकि ऐसी दिक्कतें तेजी से बढ़ती हैं और बहुत जल्द हाथ से निकल जाती हैं। एचआईवी/एड्स की समस्या इसका एक उदाहरण है। सीनियर साइंटिस्ट राजीव मेहता कहते हैं कि स्पर्म काउंट पर रेडिएशन के असर का पता लगाने के लिए जानवरों पर कई स्टडी की गई हैं, मगर इंसानों के मामले में बहुत कम काम हुआ है।

जेएनयू के साइंटिस्ट जे. बिहारी की टीम ने माइक्रोवेव रेडिएशन का चूहों पर असर जानने के लिए एक स्टडी की थी, जिसमें उनके क्रोमोसोम (गुणसूत्र) को काफी ज्यादा नुकसान हुआ था। इंसानों पर भी इसी तरह का असर होता है यह जानने के लिए और स्टडी की जरूरत है। इससे पहले साल 1992 से साल 1997 के बीच की गई एक स्टडी में भी पुरुषों में स्पर्म काउंट में लगातार कमी दर्ज की गई थी। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि यही वो दौर था जब शहर तेजी से विकसित हो रहे थे। निर्माण कार्य और कमर्शल गाड़ियों की संख्या में बढ़ोतरी और डीजल जेनरेटर के चलते वातावरण में सस्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर जैसे तत्व भी तेजी से बढ़ रहे थे।

सीनियर गायनेकॉलजिस्ट डॉ. कामिनी राव कहती हैं कि 1990 से पहले हुई एक स्टडी में भी इसी तरह के रिजल्ट सामने आए थे। इसका मतलब है कि समस्या लगातार बढ़ रही है(नीतू सिंह,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,11.1.11)।

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाकई ये समस्या वर्तमान जीवनशैली में तेजी से बढ रही है । इसके निराकरण के उपचार भी आसान तो नहीं लगते लेकिन अगली पीढियों के स्वस्थ विकास हेतु उपचार स्वयं दम्पत्तियों के साथ ही चिकित्साजगत को भी ढूंढने तो होंगे ।

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