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शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

वज़न घटाएं,हॉट फ्लैशेज से बचें

लो फैट डायट और प्रचूर मात्रा में फल व सब्जियाँ व अंकुरित साबुत अनाज लेकर महिलाएँ फॉट फ्लेशेज़ की समस्या से निजात पा सकती हैं। आहार में यह सभी चीज़ें शामिल करने से सभी आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त हो जाते हैं और फैट कम होने के कारण मोटापे की आशंका भी कम होती है। ताज़ा शोध-अध्ययन से पता चला है कि यह रजोनिवृत्ति के समय दिखाई देने वाले अप्रिय लक्षणों और फॉट फ्लेशेज़ से बचने का कारगर उपाय हो सकता है। 

लोफैट आहार लेने के बाद मोटी महिलाओं का वज़न घट गया, जिससे उन्हें पहले की तरह हॉट फ्लेशेज़ और नाइट स्वेट की परेशानी नहीं होती थी। नॉर्दन कैलिफोर्निया के रिसर्च डिविज़न में हुई इस रिसर्च में यह बात सामने आई। यहाँ की सीनियर साइंटिस्ट और रिसर्चर डॉ. बेटी कान के अनुसार डायट में इन सभी बातों का ध्यान रखने पर उन महिलाओं को भी फायदा हुआ, जिनके वज़न में कोई कमी नहीं आई थी। इन्हें रजोनिवृत्ति के समय काफी कम तकलीफें पेश आई थीं। सबसे कम तकलीफें उन महिलाओं को हुई थी जो लंबे समय से इस डायट को फॉलो कर रही थीं जिससे उनका वज़न भी घटा था। जर्नल मेनोपॉज़ में यह शोध प्रकाशित हो चुका है। डॉ. कान के मुताबिक रजोनिवृत्ति के आसपास करीब ८० प्रतिशत महिलाओं को अचानक गर्मी लगने और पसीने छूटने जैसी परेशानियाँ पेश आती हैं। इनमें से लगभग आधी महिलाओं को यह लक्षण गंभीर रूप से महसूस करती हैं। अन्य को हल्के या फिर कुछ अधिक लक्षण महसूस होते हैं। 

एक अन्य अध्ययन में विशेषज्ञों ने पाया कि जिन महिलाओं का शरीर भारी, बॉडी-मास इंडेक्स अधिक या फिर फैट का प्रतिशत अधिक था उन्हें रजोनिवृत्ति के समय अधिक परेशानियाँ पेश आती हैं। अध्ययन में ४९,००० महिलाएँ शामिल हुई थीं, जिनमें से ४० प्रतिशत लो फैट डायट ले रही थीं। बाकी ६० प्रतिशत महिलाओं को तुलनात्मक अध्ययन के लिए शामिल किया गया था। रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में हृदय रोग, फ्रैक्चर, स्तन कैंसर और कोलोन कैंसर जैसी बीमारियों में लो फैट डायट के प्रभावों का अध्ययन करना इस शोध का मुख्य उद्देश्य था। डॉ. कान और उनकी टीम ने १७,००० से भी अधिक महिलाओं पर अध्ययन को केंद्रित किया था। शोध शुरू होने के समय इनकी उम्र ५० से ७९ वर्ष थी। इनमें से कोई भी महिला हारमोन थैरेपी पर नहीं थी। 

लो फैट डायट लेने वाली महिलाएं केवल 20प्रतिशत कैलोरी फैट के ज़रिए प्राप्त कर रही थीं। ये फलों और सब्ज़ियों के 5 सर्विंग और साबुत अनाज के 6 सर्विंग रोज़ाना ले रही थीं। इन सभी महिलाओं ने रजोनिवृत्ति के समय पेश आने वाले लक्षणों के बारे में बताया कि उन्हें क्या-क्या लक्षण महसूस हुए,यह कितनी बार और किस तीव्रता से सामने आए।

लक्षण
-हल्के लक्षण, जिनसे दिन ब दिन की गतिविधियाँ प्रभावित नहीं होती।

-कुछ अधिक, जिससे दैनिक जीवन थोड़ा बहुत प्रभावित होता है।

-गंभीर लक्षण, जिनके कारण महिलाएँ अपने रोज़मर्रा के कार्य भी नहीं कर पाती थी। 

क्या आया सामने? 
शोध के शुरूआत में २६ प्रतिशत महिलाओं को हॉट फ्लेशेज़ की समस्या होती थी। इन्हें हल्के लक्षण महसूस होते थे। २७ प्रतिशत को नाइट स्वेट के हल्के लक्षण महसूस होते थे। जिन महिलाओं ने लो फैट डायट फॉलो की, उनका वज़न घटने की संभावना ३ गुना अधिक थी।

इसके विपरीत लो फैट डायट नहीं लेने वाली महिलाओं में वज़न बढ़ने की आशंका २ गुना अधिक थी। एक साल से लो फैट डायट ले रही महिलाओं में रजोनिवृत्ति के कारण होने वाली समस्याएं कम होने की संभावना कहीं अधिक पाई गई। 

जिन महिलाओं को थोड़े अधिक या गंभीर लक्षण महसूस होते थे,वे 22 पाउंड वज़न घटाकर इन तक़लीफों को काफी कम कर पाईं थीं। जिन महिलाओं को हलके लक्षण महसूस होते थे,उन्हें केवल 10 पाउंड वज़न घटाकर ही इन लक्षणों से निज़ात मिल गई थी। 

अध्ययन में एक आश्चर्यजनक बात यह सामने आई कि लो-फैट डायट ले रही उन महिलाओं को भी फ़ायदा हुआ जिनके वज़न में कोई कमी नहीं आई थी या फिर जिनका वज़न कम होने की बजाए थोड़ा बढ़ गया था। डॉ. कान ने इस अध्ययन में पाया कि आहार में परिवर्तन के ज़रिए वज़न घटाकर रजोनिवृत्ति के कारण होने वाली परेशानियों को कम किया जा सकता है और इनसे निज़ात भी पाई जा सकती है(सेहत,नई दुनिया,अगस्त,2011 तृतीयांक)

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सोमवार, 27 अगस्त 2012

महिलाएं और मोटापा

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आपको पार्टी में जाना हो और आप अलमारी से ऐसे कपड़े ढ़ूँढ़ रही हों जो आपको सुंदर तो दिखाए लेकिन साथ ही आपके मोटापे को भी छिपा ले। अगर जवाब हाँ में है तो यह पीड़ा आपकी भी है। 

हर पाँच में से एक महिला का वज़न ज़्यादा होता है और दस में एक महिला मोटी होती है। ज्यादातर महिलाएँ अनियमित जीवनशैली के कारण मोटापे का शिकार हो रही हैं। आजकल महिलाओं का कामकाज इस तरह का हो गया है कि वो लगातार कई घंटों तक काम करती है या फिर काम के सिलसिले में लगातार सफर करती है। इस दौरान वे अकसर खाना नहीं खाती या फिर तला भुना भोजन कर लेती है, जिससे शरीर में कई मेटाबॉलिक बदलाव आ जाते है। इस तरह जंकफूड के खानपान या फिर लंबे समय तक भूखे रहने से मोटापा बढ़ जाता है। 

इस तरह महिलाएं कुछ किलो वज़न बढ़ा लेती है जो न सिर्फ देखने में बुरा लगता है बल्कि ये कई स्वास्थ संबंधि समस्याओं को भी बुलावा देता है। मोटापे से महिलाओं में दिल की बीमारी का जोखिम, लिपिड असुंतलित होना, ब्लड शुगर अनियमित होना, हारमोन असंतुलन और गर्भधारण न हो पाने जैसी कई समस्याएँ हो जाती है। हालाँकि मोटापे की शिकायत किसी भी आयुवर्ग में हो सकती है लेकिन जब महिलाएँ तीस की उम्र पार कर जाती है, तब ये समस्या ज़्यादा होने की आशंका रहती है। उम्र के इस दौर में अक्सर महिलाएँ परिवार, प्रोफेशन और बच्चों में इस कदर उलझ जाती है कि अपने बढ़ते वज़न की ओर ध्यान ही नहीं दे पातीं। 

फिर वज़न बढ़ने पर ज़्यादातर खाने-पीने के मेन्यू में बदलाव करती हैं या लगातार जिम जाकर पसीना बहाती है। इससे मोटापे पर कोई असर नहीं पड़ता, मांसपेशियाँ ज़रूर मजबूत हो जाती है। खानपान में बदलाव या जिम भी सिर्फ कुछ दिनों तक ही हो पाता है और वज़न कम न होने पर निराशा हो जाती है। कई मोटी महिलाएँ पारिवारिक कार्यक्रमों, ऑफिस की मींटिंग या कई बार ज़रूरी प्रस्तुतिकरणों में हिस्सा नहीं लेती क्योंकि वे मोटापे के कारण आत्मविश्वास की कमी महसूस करती है। आत्मविश्वास न होना बहुत बार महिलाओं को भावनात्मक रूप से तनाव में ला देता है। कई बार तो महिलाएँ इसी कारण अवसाद की भी शिकार हो जाती हैं।


क्या करें 
१. मेटाबॉल्ज़िम पर ध्यान देना बेसल मेटाबॉलिक रेट ( बी एम आर) वो ऊर्जा है जो कोई काम न करने पर भी इस्तेमाल हो जाती है। कई लोग बैठे रहते हैं लेकिन मोटे नहीं होते। इसलिए मेटॉबॉलिक रेट बढ़ाएँ। मिर्च और काली मिर्च खाने से बी एम आर बढ़ता है इसलिए अगली बार जब आप खाना खाएँ तो मीठे की बजाए तीखा चुनें। इसके अलावा व्यायाम भी बी एम आर बढ़ाता है। 

२. फाइबरयुक्त भोजन चुनें ज़्यादा से ज़्यादा फाइबरयुक्त भोजन करें। इससे आप लंबे समय तक खुद को भूखा महसूस नहीं करेंगे। 

३. लिफ्ट का इस्तेमाल न करें हमेशा सीढ़ियों का प्रयोग करें। इससे आपका पसीना बहेगा और ऊर्जा का क्षय होगा। इसलिए समझें कि सीढ़ियों से जाना भी एक तरह का व्यायाम है। 

४. कसरत करें ध्यान से अधिक समय तक कसरत करने वालों को पानी की कमी हो जाती है। इसलिए पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ लेते रहें। 

५. सेहतमंद जैविक सप्लिमेंट चुने जैविक सप्लिमेंट वज़न कम करने में काफी मदद करते है। इनका सेवन किसी योग्य डाइटीशियन की सलाह से करें(डॉ. अनुजा अग्रवाल,चीफ डाईटीशियन,एम्स का यह आलेख सेहत,नई दुनिया,अगस्त,2012 द्वितीयांक में प्रकाशित है)।

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बुधवार, 18 जुलाई 2012

महिलाएँ और पेट की चर्बी

हर महिला के मन में यह डर रहता है कि उम्र के साथ शरीर के विभिन्न हिस्सों, खासकर पेट पर बढ़ने वाली चर्बी कहीं उनकी खूबसूरती पर धब्बा न लगा दे। इस चर्बी से छुटकारा पाने के लिए वो अक्सर किसी-न-किसी जुगाड़ में लगी रहती हैं। आइए,जानते हैं,कैसे अलग-अलग उम्र में पेट पर इकट्ठा होने वाली चर्बी से छुटकारा पाएं: 

उम्र के साथ-साथ हमारे शरीर में काफी बदलाव होते हैं। कुछ अच्छे तो कुछ खटकने वाले भी। खासतौर से बच्चे के जन्म के बाद या 30-35 साल की उम्र के बाद महिलाओं का पेट अलग ही तरह से बढ़ने लगता है। खुद को आईने में देखकर कई बार वो सोच में पड़ जाती हैं कि मैं कैसी थी और क्या हो गयी। शरीर में आ रहे इन बदलावों को देखकर वो कई बार परेशान भी हो जाती हैं। कई बार इस वजह से वो अपने पसंद के कपड़े नहीं पहन पातीं, तो उनमें हीनभावना आ जाती है और अपने शरीर की बदलती बनावट से वो खुद में ही शर्मिदा महसूस करने लगती हैं। पेट पर इकट्ठा होने वाली तरह-तरह की चर्बी से कैसे छुटकारा पाएं, आइए जानें:

ब्लोटेड टमी की परेशानी 
हममें से अधिकांश महिलाओं को यह सवाल परेशान करता होगा कि आखिर हमारा पेट क्यों इतना बढ़ा हुआ है, जबकि शरीर के अन्य हिस्से तो बिल्कुल शेप में हैं। क्या यह मोटापा है या फिर इसका कारण कुछ और ही है? आपका पेट जिस तरह से बढ़ा हुआ है, उस तरह के पेट को ब्लोटेड टमी या फिर फूला हुआ पेट कहते हैं।

दरअसल, सुबह का नाश्ता समय पर न करने, गलत तरीके से खाना और ज्यादा जंक फूड खाने से अंजाने में ही हम ढेर सारी हवा निगल लेते हैं, जिसकी वजह से हमारे पेट में काफी गैस भर जाती है। इस गैस की वजह से हमारा पेट हमेशा फूला हुआ नजर आता है और कमर का आकार भी बड़ा हो जाता है। ब्लोटेड टमी से निजात पाने के लिए इन उपायों को आजमाएं: 

-दिन में तीन बार खाना खाने की बजाय 5 से 6 बार थोड़ा-थोड़ा करके खाएं। खाने के समय पानी न पिएं, क्योंकि इससे शरीर में ज्यादा हवा चली जाती है। खाने के आधे घंटे बाद पानी पिएं। 

-खाना खाने में कभी जल्दबाजी न करें। आराम से और चबा-चबा कर खाएं। 

-जब लगे कि आपका पेट बढ़ रहा है तो खाने में नमक, चावल व मसालों की मात्रा कम कर दें। सूप, सब्जियों, फलों का सेवन ज्यादा करें। 

-पीने के लिए ठंडे पानी की जगह हल्के गरम पानी का इस्तेमाल करें। 

-मीठी चीजें, जैसे चॉकलेट, चाय या कॉफी का सेवन कम-से-कम करें। 

-अपनी दिनचर्या में योगासन को शामिल करें। अगर व्यायाम के लिए ज्यादा समय नहीं हो तो खाना खाने के बाद आधा घंटा टहलें। इससे ब्लोटिंग की समस्या से छुटकारा मिलेगा। 

-जिन लोगों को कब्ज की शिकायत होती है, अक्सर उनका पेट फूला हुआ होता है। इस परेशानी से बचने के लिए हेल्दी खाना खाएं। 

30वें बसंत के बाद.. 
आप चाहे शादीशुदा हों या फिर सिंगल वुमन, 30 की उम्र पार करने के बाद आपका वजन और पेट का बढ़ना स्वाभाविक है। घर व ऑफिस की जिम्मेदारी में आप ऐसे उलझ जाती हैं कि आपके पास एक्सरसाइज करने और अपनी डाइट पर ध्यान देने का समय नहीं होता। ऐसे में जरूरी है कि अपने व्यस्त शेडय़ूल में से वक्त निकालें और इन उपायों को आजमाएं, ताकि आपके पेट पर अतिरिक्त चर्बी अड्डा जमाना शुरू न कर दे। 

विशेषज्ञों के अनुसार 25 साल की उम्र के बाद हमारा मेटाबॉलिज्म धीरे-धीरे कमजोर होता जाता है। 30 साल की उम्र के बाद लो-फैट डाइट लें। इससे मेटाबॉलिज्म मजबूत होगा और अतिरिक्त चर्बी आसानी से घट पाएगी। हरी सब्जी, सलाद, फल और हफ्ते में एक बार अंडा या चिकन जैसी प्रोटीनयुक्त चीजों को अपनी डाइट में शामिल करें। इस उम्र में कार्बोहाइड्रेट्स का अधिक सेवन आपके पेट पर ढेर सारी चर्बी जमा देता है, इसलिए चीनी, आलू के अधिक सेवन से बचें। 

साइकलिंग, स्विमिंग, डांसिंग और एरोबिक्स से एक दिन में 600-800 के बीच कैलरी बर्न होती है। नियमित रूप से इनमें से कोई एक एक्सरसाइज करें। कई बार तनाव से भी चर्बी इकट्ठा होती है। जितना हो सके खुश रहे, टेंशन न लें, खुद को व्यस्त रखें। 

मां बनने के बाद.. 
मां बनने के बाद जब आप बच्चे को देखती हैं तो खुशियों का ठिकाना नहीं रहता। आप उसके साथ खेलने व उसकी देखभाल में खुद को भूल जाती हैं। फिर एक दिन यह याद आता है कि आपने तय किया था कि गर्भावस्था के बाद अपने फिगर और खासकर अपने बढ़े पेट को कम करने की ओर ध्यान देंगी। वक्त आ गया है कि बच्चे के साथ-साथ अब आप खुद पर भी थोड़ा ध्यान दें। मां बनने के बाद पेट पर इकट्ठा चर्बी को दूर करने के लिए इन उपायों को आजमाएं: 

-बच्चे के जन्म के बाद पेट के आसपास ज्यादा चर्बी जमा होती है। इसे कम करने के लिए डॉक्टर से सलाह लेकर 

-खानपान में जरूरी बदलाव करें और डॉक्टर की रजामंदी पर हल्के-फुल्के व्यायाम भी करें। 

-खाना तभी खाएं जब भूख लगी हो। 

-वजन कम करने के लिए बच्चे के जन्म के तुरंत बाद डाइटिंग शुरू न करें, बल्कि फल, सब्जी, अनाज, प्रोटीन, कैल्शियम व आयरन युक्त खाद्य पदार्थ भरपूर लें। 

-रोज सूखे मेवे खाएं, पर जंक फूड, कोल्ड ड्रिंक व क्रीमी दूध से दूर रहें। 

-खूब पानी पिएं और सुबह का नाश्ता जरूर करें। 

-ऐसे बहुत से योगासन हैं, जिन्हें आसानी से कर सकती हैं। हलासन और भुजंगासन जैसे आसनों से आपका वजन भी घटेगा और कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होगा(करुणा कृति,हिंदुस्तान,दिल्ली,12.7.12)।

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सोमवार, 9 जुलाई 2012

बच्चे के जन्म के बाद वज़न से निज़ात कैसे पाएं?

करिश्मा कपूर, जेसिका अल्बा, सपना कुमार, लारा दत्ता और अब शिल्पा शेट्टी, ये कुछ ऐसी यमी ममीज हैं, जो बेबी होने के कुछ दिनों बाद ही ओरिजनल बॉडी शेप में लौट आईं। यही वजह है कि तमाम महिलाएं अब इनसे प्रेग्नेंसी के बाद फिट रहने का सबक सीख रही हैं : 

बेबी का उनकी लाइफ में आना महिलाओं को जितना एक्साइट करता है, उतनी ही टेंशन उनको प्रेग्नेंसी के बाद अपने फिगर की रहती है। दरअसल, प्रेग्नेंसी के बाद उनका वजन इतना बढ़ जाता है कि इस स्टेज को वे अपनी खूबसूरती का एंड ही मान लेती हैं। 

हालांकि पिछले कुछ समय में बॉलिवुड की तमाम ऐक्ट्रेस ने इस मिथ को तोड़ा है। शिल्पा शेट्टी और लारा दत्ता तो इस बात के हालिया उदाहरण हैं, लेकिन उनसे पहले मलाइका अरोड़ा, सोनाली बेंद्रे, ट्विंकल और करिश्मा कपूर ने प्रूव किया है कि अगर महिलाएं चाहें तो डिलिवरी के बाद भी सेक्सी फिगर मेनटेन रख सकती हैं। यही वजह है कि अब बाकी महिलाएं भी उनकी तरह बनने का सपना देख रही हैं। 

कैसे हो मुमकिन 
गायनकॉलजिस्ट डॉ. अनिता सोनी कहती हैं, 'डिलिवरी के 40 दिन बाद ही किसी महिला के लिए नॉर्मल शेप में लौटना पॉसिबिल है। ऐसा नहीं है कि हॉस्पिटल से आते ही वह एक्सर्साइज पर जुट जाए या डायटिंग करने लगे, बल्कि अपनी बॉडी को समझते हुए लाइट वर्कआउट शुरू कर देना चाहिए। इसमें ब्रिस्क वॉक से लेकर लाइट जॉगिंग तक चलेगी।' 

अगर आपका बेबी आपको रात भर जगाए रखता है और इस वजह से आप रात को सो नहीं पाती हैं, तो और कुछ नहीं तो, दिन में कम से कम आधा घंटा ब्रिस्क वॉक जरूर करें। डॉ. अनीता बताती हैं, 'डिलिवरी के शुरू के तीन महीनों में महिला की बॉडी का बेसल मेटाबॉलिक रेट (बीएमआर) हाई रहता है, जिस वजह से उस दौरान वेट घटाना सबसे आसान होता है। इसलिए अगर इन दिनों का फायदा उठा लिया जाए, तो बाद में इसे मेनटेन करना मुश्किल नहीं होता।' 

पहले ही रहें कॉन्शस 
डॉ. सोनी की मानें, तो प्रेग्नेंसी के दौरान महिला का 12 किलो के करीब वेट गेन करना नॉर्मल है। यह ज्यादा से ज्यादा 15 किलो तक बढ़ सकता है, लेकिन इससे ज्यादा कतई नहीं। हां, अगर महिला मोटी हैं, तो इसमें हम 6 किलो की गुंजाइश और रख सकते हैं। 

गायनकॉलजिस्ट डॉ. बिंदु बलानी कहती हैं, 'बच्चे को जन्म देने के साथ ही आपके लिए तुरंत 6 किलो वजन घटाना आसान होता है। दरअसल, बेबी, प्लेसेंटा और लिक्विड मिलाकर तकरीबन इतना वेट होता ही है। यानी 10 से 20 फीसदी वेट फ्लुइड के रूप में डिलिवरी के बाद बॉडी से बाहर निकल आता है।' 

यही वजह है कि प्रेग्नेंसी के बाद के कुछ दिनों में वजन आसानी से कम होता है, इसलिए वॉकिंग या जॉगिंग से आप इससे निजात पा सकती हैं। वहीं, प्रेग्नेंसी के बाद अगर आप अपनी बॉडी को मेनटेन करने के लिए एक्सर्साइज नहीं करेंगी, तो आपका वेट तेजी से बढ़ेगा और थोड़े दिनों में आप काफी मोटी हो सकती हैं। 

डाइट का ध्यान 
वैसे अगर प्रेग्नेंसी के दौरान आप हेल्दी डायट लेंगी, तो आपका वजन इतना बढ़ेगा भी नहीं। दरअसल, प्रेग्नेंसी टाइम में महिलाओं को खूब कैलरीज व फैट्स वाली डायट दी जाती है। इनमें नट्स से लेकर घी से बनी मिठाइयां तक होती हैं। पहले के टाइम में यह ठीक था, लेकिन अब उतनी फिजिकल ऐक्टिविटी ना होने से महिलाओं का वजन बढ़ने लगता है। हालांकि, इस मामले में ज्यादा कुछ किया भी नहीं जा सकता, क्योंकि आज भी प्रेग्नेंट लेडी को क्या खिलाना है और क्या नहीं, यह जिम्मेदारी पूरी तरह घर की बड़ी महिलाओं पर होती है और उनसे पुराने रिवाज छूटते नहीं हैं। 

फोकस बनाए रखें 
अगर आप वाकई वजन कम करना चाहती हैं, तो ध्यान रख कि हर सिचुएशन में आपको अपने वेट लॉस रिजीम पर फोकस बनाए रखना है। डॉ. बिंदु कहती हैं, 'वेट लूज न होने की ज्यादा प्रॉब्लम केवल उन महिलाओं को आ सकती है, जो पॉली-सिस्टिक ओवरियन डिजीज (पीसीओडी) या थॉयरॉइड की प्रॉब्लम से गुजर रही हैं। वरना यह मुश्किल नहीं है।' डॉ. अनीता के मुताबिक, नॉर्मल डिलिवरी होने पर आप 10 दिन बाद ही ब्रिस्क वॉक कर सकती हैं। अगर आपकी तकरीबन 20 दिन की प्री-प्रेग्नेंसी है, तो आप 20 दिन में ही नॉर्मल रुटीन में आ सकती हैं। और अगर बच्चा सिजेरियन से हुआ है, तो आप 40 दिन में एक्सर्साइज करना शुरू कर सकती हैं। हालांकि डॉ. बिंदु हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होते ही पेल्विक फ्लोर एक्सर्साइज शुरू कर देने की सलाह देते हैं।

वैसे, बेबी बर्थ के दौरान बॉडी से कैल्शियम और न्यूट्रिशंस निकल जाते हैं, इसलिए इस समय आपको अपनी स्ट्रेंथ को रीगेन करने पर भी ध्यान देना होगा। फिटनेस एक्सपर्ट लीना मोंगरे कहती हैं, 'प्रेग्नेंसी को हर महिला अलग तरीके से फेस करती है, एक्सर्साइज करने से पहले डॉक्टर्स की सलाह जरूर लें। वैसे, पोस्ट-प्रेग्नेंसी वेट लॉस इस बात पर भी डिपेंड करता है कि प्रेग्नेंसी के दौरान आपने अपनी केयर कैसे की है।' 

टेक केयर 
- प्रेग्नेंसी के दौरान आपने कितना वेट गेन किया, यह वजन घटाने के दौरान बेहद मायने रखता है। 

- कोई भी वर्कआउट बिना डॉक्टर की इजाजत के न करें। 

- डायटिंग से बचें। वरना पीठ और दूसरी जगहों पर दर्द की शिकायत हो सकती है। 

- जबर्दस्ती एक्सर्साइज न करें। डिलिवरी के बाद पूरी बॉडी पर असर पड़ता है, इसलिए इस समय आपको सही रेस्ट की जरूरत होती है। 

- वेट लूज करने के लिए बच्चे को ब्रेस्ट फीड कराना बंद न कर दें। दरअसल, यह दूध बच्चे के इम्यून सिस्टम को स्ट्रॉन्ग बनाता है। 

जानें ये मिथ्स 
- प्रेग्नेंसी के दौरान डबल डायट लेने का कॉन्सेप्ट गलत है। 

- बेबी के होने के बाद ब्रेस्ट फीडिंग के नाम पर आपको दो लोगों की डायट नहीं लेनी है। दरअसल, आपके बच्चे को बस 500 कैलरीज की जरूरत होती है, जो आप सिंगल हेल्दी डायट लेकर भी उसे दे सकती हैं। 

- बच्चे के पैदा होने के बाद पेट को शेप में लाने के लिए इस पर धोती बांधने से कुछ नहीं होता। यह केवल लूज स्किन और फैट को होल्ड करने में कुछ हद तक आपके काम आ सकता है(नभाटा,दिल्ली,5.7.12)।

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बुधवार, 6 जून 2012

बढ़ता वज़न और अनियमित मासिक है ख़तरनाक

अगर आपका वेट लगातार बढ़ रहा है या पीरियड्स रेग्युलर नहीं हो रहे, तो तुरंत अलर्ट हो जाएं। यह पीसीओएस डिजीज हो सकती है। इसमें जहां महिलाओं में कंसीव करने की पावर कम होती जाती है, वहीं कैंसर होने के चांस भी कई बढ़ जाते हैं। जानते हैं इसके बारे में : 

अगर आपकी बॉडी और फेस के बालों की लेंथ अचानक बढ़ने लगी है या वेट बढ़ रहा है, तो इसे हल्के से न लें। दरअसल, ये पीसीओएस डिजीज (पॉलीसाइटिस ओवेरियन सिंड्रोम) हो सकती है। बता दें कि पीसीओएस एक ऐसी डिजीज है जिससे कैंसर होने के चांस 10 फीसदी बढ़ जाते हैं। यही नहीं, इससे कंसीव न करने के चांस भी 70 पर्सेंट बढ़ जाते हैं। गौरतलब है कि इसमें पीरियड्स भी रेग्युलर नहीं होते। 

आईवीएफ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह प्रॉब्लम 80 प्रतिशत हॉर्माेन से जुड़ी हुई है और 20 प्रतिशत हेरिडिटी से। इसमें महिला की ओवरी में एक हार्ड लेयर डेवलप हो जाती है जिससे ओवेल्यूशन नहीं हो पाता। नतीजतन बॉडी में एंड्रोजेन और एलएच हॉर्माेन का लेवल बढ़ने लगता है। इसी वजह से कंसीव करने में दिक्कत आती है। आईवीएफ एक्सपर्ट आंचल कहती हैं, 'पीसीओएस की प्रॉब्लम होने पर पीरियड रेग्युलर नहीं होते और बॉडी फैट बढ़ता जाता है। इसमें एक समय बाद बीमारी पर कंट्रोल पाना खासा मुश्किल होता है, जिससे कई महिलाएं मेंटल टेंशन में आ जाती हैं।' 

कैंसर का खतरा 
अगर इस पर प्रॉब्लम समय रहते कंट्रोल ना किया जाए, तो कैंसर की चपेट में भी आ सकती हैं। आईवीएफ एक्सपर्ट नीरा कहती हैं कि पीसीओएस की प्रॉब्लम से जूझ रही महिलाओं की ओवरी में हार्मोन सामान्य से अधिक बनते हैं। इसकी वजह से अंडाणु सिस्ट या गांठ में तब्दील हो जाता है और कई बार कैंसर का रूप भी ले लेती है। वहीं, आंचल बताती हैं कि ये सिस्ट छोटी-छोटी थैलीनुमा शेप में होती हैं, जिनमें लिक्विड भरा होता है। इनका शेप धीरे- धीरे बढ़ता जाता है। 

पीरियड रेग्युलर नहीं 
न महिलाओं में यह बीमारी ज्यादा जल्दी अटैक करती है , जिनमें पीरियड्स रेग्युलर नहीं रहते। फेस , स्टमक और फिंगर्स जैसी जगहों पर अधिक बाल आने लगते हैं। इसके अलावा , स्किन ऑयली होती जाती है , बाल गिरने लगते हैं और फेस पर दाग धब्बे और मुंहासे हो जाते हैं। अगर समय रहते केयरफुल होकर न चला जाए , तो बच्चा न होना , शुगर और हाई कॉलेस्ट्रॉल की प्रॉब्लम हो सकती है। 

युवा भी चपेट में 
3 से 5 फीसदी युवा लड़कियों में यह बीमारी पाई जाती है , तो महिलाओं में इसका प्रतिशत 8 से 10 है। बच्चा न होने की यह खास वजह होती है। 16 से 25 वर्ष की युवतियां इसकी ज्यादा चपेट में हैं। डॉ . आंचल बताती हैं कि आमतौर पर यह प्रॉब्लम महिलाओं में 16 साल से लेकर 45 साल तक असर डालती है। 

इलाज है आसान 
पीसीओएस के इलाज के लिए कई दवाएं हैं। ऑपरेशन से भी सिस्ट निकाल कर बाहर किया जा सकता है। लेकिन अगर रुटीन ठीक रखा जाए , तो इस प्रॉब्लम से कई काफी हद तक छुटकारा खुद - ब - खुद मिल जाता है। वैसे , इस बीमारी की खास वजह फैट है। दरअसल , फैट बढ़ने से एस्ट्रोजन हॉर्मोन की क्वांटिटी में तेजी से इजाफा होता है जो ओवरी में सिस्ट बनाने के लिए जिम्मेदार माना जाता है। 

बॉडी में दिखें चेंज 
- बॉडी व फेस पर बालों का बढ़ना 
- स्किन प्रॉब्लम्स मसलन , दाग 
- धब्बे , मुंहासे और ब्राउन धब्बे होना। 
- पीरियड्स रेग्युलर न होना 
- कंसीव न कर पाना। 

ध्यान दें इन पर 
- जरूरी है रेग्युलर एक्सरसाइज 
- वेट को कंट्रोल करें 
- स्ट्रेस से दूर रहें 
- रुटीन को मैनेज करें 
- आईवीएफ कंसल्टेंट से एडवाइस लें(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,6.6.12)

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शनिवार, 12 मई 2012

मोटे बच्चों में लिवर कैंसर का जोखिम अधिक

डेनमार्क में १९३० से १९८९ के बीच १ लाख ६५ हज़ार पुरुष एवं १ लाख ६० हज़ार महिला स्वयंसेवकों पर एक शोध अध्ययन किया गया। स्कूल जाने की उम्र से ही इनके वज़न और बॉडी मास इंडेक्स पर निगाह रखी गई। इनमें से २५२ को वयस्क होने पर लिवर का कैंसर (हेपॅटोसेल्युलर कार्सीनोमा) हुआ। अध्ययन में सामने आया कि वयस्क होने तक जैसे-जैसे इनके बॉडी मास इंडेक्स में प्रति युनिट वृद्धि होती गई वैसे-वैसे इनके लिवर कैंसर का जोखिम भी बढ़ता गया। 

लिवर कैंसर का जोखिम हर लिंग और उम्र के स्वयंसेवकों में पाया गया। ईएएसएल साइंटिफिक कमेटी के सदस्य डॉ. फ्रेंक लमेर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि बचपन में हुए मोटापे के कारण न सिर्फ टाइप-२ डायबिटीज और दिल की बीमारियों का जोखिम है बल्कि फैटी लिवर डिसीज भी होती है जो बाद में लिवर कैंसर में भी तब्दील हो जाती है। इसलिए बच्चों का स्वस्थ बॉडी मास इंडेक्स बनाए रखने के महत्व को कभी भी नज़रदाज़ नहीं किया जा सकता। बचपन के मोटापे और वयस्कावस्था में विकसित हो रहे लिवर कैंसर के अंर्तसंबंधों पर ऊंगली रखने वाले इन शोध अध्ययनों के नतीजे चेताने वाले हैं। 

लिवर कैंसर के दूसरे कारणों में नियमित शराबखोरी, हिपेटाइटिस-बी और सी का संक्रमण तथा अन्य तरह की लिवर की बीमारियाँ शामिल हैं। शोध अध्ययन से जब इन कारणों से होने लिवर कैंसर के रोगियों को अलग रखा गया तब भी नतीजों में कोई बदलाव नहीं पाया गया। इससे यह संकेत मिलते हैं कि बच्चों में मोटापा हेपॅटोसेल्युलर कार्सीनोमा विकसित होने का एक प्रमुख कारण है। केवल १०-२० प्रतिशत मरीज़ों के लिवर कैंसर को सर्जरी की मदद से सफलता पूर्वक निकाला जा सकता है, शेष की ३ से ६ महीनों में मृत्यु हो जाती है। इसलिए लिवर कैंसर की रोकथाम में ही भलाई है। 

एक नए शोध अध्ययन का दावा है कि जो लोग नॉन अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिसीज़ (एनएलएफडी) से पीड़ित हैं और एक दिन में एक या दो पैग से अधिक शराब नहीं पीते उन्हें इसी बीमारी से पीड़ित दूसरे लोगों की बनिस्बत लिवर कैंसर का जोखिम आधा रहता है। नॉन अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिसीज अमेरिका में होने वाली बहुत ही आम बीमारी है। यह एक तिहाई अमेरिका वासियों को होती है। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो शराब तो नहीं पीते लेकिन मोटापे और खान-पान की बिगड़ी हुई आदतों के कारण इस बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। इस बीमारी में लिवर पर असामान्य मात्रा में वसा जमा हो जाती है। 

यह बीमारी होने का कोई ठोस कारण अभी तक मालूम नहीं हो सका है लेकिन मोटापे और मधुमेह को जोखिम की सूची में सबसे ऊपर रखा जाता है। अधिकांश मरीज़ों में लिवर पर वसा जमा होने पर कोई लक्षण प्रकट नहीं होते लेकिन बीमारी गंभीर होने पर लिवर से संबंधित बीमारियों से मृत्यु होने का जोखिम बना रहता है। नॉन एल्कोहोलिक फैटी लिवर डिसीज के कारण दिल की बीमारियाँ होने का जोखिम दो गुना अधिक होता है। 

सैन डियागो स्कूल ऑफ मेडिसिन के वरिष्ठ शोधकर्ता जैफ्री श्वीमर मानते हैं कि ५० साल का नॉन अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिसीज से ग्रस्त मरीज दिल की बीमारी के अधिक जोखिम पर होता है। आंकड़े सुझाते हैं कि लिवर की किसी बीमारी का जोखिम न हो तो कम मात्रा में शराब पीने से दिल की बीमारी का खतरा कम करने में मदद मिल सकती है लेकिन लिवर की कोई भी समस्या हो तो शराब सेवन का प्रश्न ही नहीं उठता(सेहत,नई दुनिया,मई द्वितीयांक 2012)।

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कसरत के साथ डाइटिंग है घातक

नियमित आहार और डायटिंग के बाद भी वज़न कम नहीं कर पा रहे हैं? कहीं आपकी ही कुछ आदतें तो इन प्रयासों पर पानी नहीं फेर रही। कसरत का पूरा फ़ायदा उठाने और वज़न कम करने के लिए यह समझना बहुत ज़रुरी है कि ये प्रक्रिया जिम तक ही सीमित नहीं होती। दिनभर की सभी गतिविधियों को सक्रियता से करें। स्वास्थप्रद आहार लें और एक ही हफ्ते में १० किलो वज़न कम करने के लिए अत्यधिक व्यायाम या फिर भूखे मरने जैसे अत्याचार खुद पर कभी भी न करें। 

गिनते हैं हर कैलोरी? 
अपने खाने का एक-एक निवाला सोच-समझ कर लेते हैं और जब कैलोरी गिनने की बात आती है तो आप किसी कैलक्युलेटर से कम नहीं। खाना खाते हुए आपका उद्येश्य पेट भरने के बजाय कैलोरी गिनना ही होता है। पेट भरे न भरे निर्धारित कैलोरी पूरी होते ही आपका भोजन हो जाता है। इस तरह मानव कैलक्युलेटर बनने और भूखे रहने के बाद भी वज़न कम न हो सके तो इतनी मशक्कत का क्या फ़ायदा? 

अक्सर कहते हैं कि खाने के पहले सोचना चाहिए क्योंकि बिना साचे-समझे कुछ भी खा लेने की आदत से वज़न बढ़ने की आशंका रहती है। वज़न कम करने के लिए कैलोरी का मोटा-मोटा हिसाब रखना भी ठीक है लेकिन ग़लती तब होती है जब व्यक्ति एक-एक कैलोरी गिनने के चक्कर में लग जाता है। 

विशेषज्ञों का मानना है कि वज़न कम करने के इच्छुक अक्सर यही ग़लती करते हैं। इस तरह कैलोरी गिनने से अक्सर पेट नहीं भर पाता है और हर समय भूख लगती रहती है। ऐसे में दिमाग़ तक पोषण की कमी के संकेत पहुँचने लगते हैं और भूख बढ़ जाती है। बेहतर यही होगा कि भोजन में धीरे-धीरे परिवर्तन किए जाएँ। हर समय भूख बनी रहने से शरीर फैट को जलाने के बजाय इसे इकठ्ठा करने लग जाता है। 

विशेषज्ञों का मानना है कि भूखे रहने से,खासकर कसरत के बाद कुछ भी न खाने से शरीर में फैट इकट्ठा होने लगता है और मांसपेशियां बनने की बजाए टूटने लगती हैं। मांसपेशियों से शरीर को आकार मिलता है। भूखे रहने से पानी और इसमें घुलनशील विटामिन्स की कमी होने लगती है। इससे चयापचय दर हृदय की मासपेशियां और रक्त में शर्करा का स्तर प्रभावित होने लगता है। 

यानी,कसरत करने का शरीर को जो फायदा होने वाला था,वो आपके भूखे रहने के कारण नुक़सान में बदल जाता है। इसके विपरीत,आप सोचते हैं कि कसरत और डायटिंग दोनों कर रहे हैं तो वज़न झटपट कम हो जाएगा। इस तरह से वज़न कई बार घट भी जाता है लेकिन यह स्वास्थ्य के लिए बहुत नुकसानदेह होता है। इससे शरीर क़मज़ोर होता है। अब ज़रा याद कीजिए कि आपने वज़न घटाने की कोशिशें क्यों शुरू कीं? सेहत की खातिर ही न? तो अब भूखे रहने की बजाय उचित आहार लेने की ओर ध्यान दें। वज़न कर करने की बजाय अतिरिक्त चर्बी से निज़ात पाने के लिए प्रयास करें। 

थोड़े-थोड़े समय के अंतराल से कुछ न कुछ खाते रहें। कार्बोहाइड्रेट,प्रोटीन,विटामिन,मिनरल,फाइबर और फैट,संतुलित आहार के इन सभी घटकों को अपने आहार में ज़रूर शामिल करें। किसी भी घटक से परहेज़ न करें। बल्कि,सभी को उचित मात्रा में नियमित रूप से लें। 

कसरत करें मन लगा कर 
व्यायाम करते हुए इसे ध्यानपूर्वक करना ज़रुरी है। ध्यान कहीं और होने से चोट लगने का जोखिम होता है और चोट के कारण आपको कुछ दिनों तक व्यायाम रोकना पड़ सकता है। भले ही आप शारीरिक कसरत कर रहे हों लेकिन इसका मतलब यह नहीं है दिमाग़ का इसमें कोई काम ही नहीं है। शरीर और दिमाग़ के सही तालमेल से ही आप उचित ढ़ंग से व्यायाम कर पाएँगे। व्यायाम करते हुए ध्यान कहीं और होने से आपकी तकनीक, पॉश्चर और इंटेंसिटी प्रभावित होती है। इस तरह से कसरत का पूरा लाभ नहीं मिलता है। वही व्यायाम करें जिसमें आपका मन लगता हो। जिम में कसरत पसंद न हो तो वहाँ अनमने ढ़ंग से व्यायाम करने से बेहतर है कि आप अपने लिए कोई अन्य विकल्प चुनें और इसे पूरे मनोयोग से करें(डॉ. संजीव नाईक,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल 2012 चतुर्थांक)।

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सोमवार, 7 मई 2012

मोटापा घटाएं लिपोसक्शन से

दौड़ती-भागती जिंदगी में अपना खयाल रखने के लिए भी आपके पास वक्त नहीं है। अनियमित दिनचर्या और खान-पान के कारण दिन-ब-दिन बढ़ता मोटापा एक गंभीर समस्या बन रहा है। लेकिन लिपोसक्शन तकनीक से आसानी से मोटापा कम कर सकते हैं। 

घर और ऑफिस के बीच व्यस्तता के कारण खुद की देखभाल के लिए भी हमारे पास समय ही नहीं बचता। जो मिल गया, खा लिया। हम ये तक नहीं देखते कि इस तरह के खाने से हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ेगा। दरअसल यही खाना हमारे मोटापे की मुख्य वजह बन जाता है। हम फास्ट फूड खा तो लेते हैं, इससे प्राप्त कैलोरी को जलाने लायक मेहनत नहीं करते। इसके बाद हम शुरू करते हैं मोटापे को कम करने की कवायद। कभी डायटिंग का सहारा, तो कभी व्यायाम और वर्कआउट। यह डायटिंग और वर्कआउट भी हमें वैसा परिणाम नहीं देता, जैसा हम चाहते हैं। कम समय में मोटापा कम करने की तकनीक है लिपोसक्शन। 

अब बिना सर्जरी, कम तकलीफ और कम समय में भी आप अपनी अतिरिक्त चर्बी घटा सकते हैं। अब आप बिना अस्पताल में भर्ती हुए अपने बेडौल शरीर को सुडौल बना सकते हैं। अल्ट्रा लिपोसेनिक एक बॉडी शेपिंग ट्रीटमेंट है, जो आपके शरीर पर जमा चर्बी को हटा सकती है। इस ट्रीटमेंट में ध्वनि तरंगों से फैट सेल्स को तोड़ा जाता है। इसके बाद टूटे हुए सेल्स को लिंफाटिक ड्रेनेज मशीन द्वारा रक्त प्रवाह प्रणाली में लाकर सुरक्षित तौर पर लिवर के द्वारा बाहर निकाला जाता है। इस प्रक्रिया में न ही कोई सर्जरी होती है और न ही दर्द होता है। फैट सेल्स मल-मूत्र के द्वारा बाहर निकल जाते हैं। फैट सेल्स टूटने पर शरीर में ढीलापन आ जाता है। अब त्वचा को टाइट करने के लिए मशीन का इस्तेमाल किया जाता है। इससे टूटे हुए सेल्स का ड्रेनेज और त्वचा की टाइटनिंग दोनों एक साथ किए जाते हैं। 

लिपोसक्शन क्या है 
कॉस्मेटिक सर्जरी की एक तकनीक है यह। इसके जरिए शरीर के विभिन्न हिस्सों से अतिरिक्त वसा को बाहर निकाल कर शरीर को सुडौल और आकर्षक बनाया जाता है। इस तकनीक में शरीर में छिपे हुए स्थानों में छोटे छिद्र बनाकर विशेष उपकरणों की सहायता से अतिरिक्त वसा को बाहर निकाल दिया जाता है। इस प्रक्रिया में लगने वाला समय इस बात पर निर्भर करता है कि शरीर में कितनी वसा है। 

इसका इस्तेमाल कहां 
लिपोसक्शन तकनीक का इस्तेमाल मुख्यत: पेट, कूल्हे, जांघों, बांहों, गर्दन, चेहरे और वक्ष पर किया जाता है। पुरुष और महिलाएं दोनों ही इस तकनीक का इस्तेमाल अपनी बॉडी को शेपअप करने के लिए करवाते हैं। एक ही ऑपरेशन के जरिए शरीर के कई हिस्सों से वसा निकाला जाता है। 

ट्रीटमेंट करवाने जा रहे हैं तो.. 
यदि आप लिपोसक्शन ट्रीटमेंट करवाने जा रहे हैं तो इसके लिए आपको किसी अच्छे प्लास्टिक सर्जन के पास जाना चाहिए। चूंकि यह एक शल्य चिकित्सा है, इसलिए जरूरी है कि किसी अनुभवी सर्जन से ही इसे करवाया जाए। सबसे पहले डॉक्टर से सलाह और पूरी जानकारी लें कि ये ट्रीटमेंट आपके शरीर के लिए सही है या नहीं। ये भी जान लें कि यह तकनीक आप पर कितनी सफल होगी और ट्रीटमेंट करवाने से पहले और बाद में आपको किन-किन समस्याओं को सामना करना पड़ सकता है। इस जानकारी से आप अपना इलाज करवाते हुए कम घबराएंगे। 

कैसे होता है ट्रीटमेंट 
ट्रीटमेंट से पहले खून की जांच की जाती है। सर्जरी के पहले ब्लडप्रेशर, शुगर आदि सभी की जांच की जाती है ताकि आपको ऑपरेशन के दौरान या बाद में कोई परेशानी न हो। इस ट्रीटमेंट में एक सक्शन मशीन को कैनुला के साथ जोड़ा जाता है। जिस जगह से वसा निकालना है, वहां छुपे स्थानों में छोटे-छोटे छिद्र बनाए जाते हैं। इसी छिद्र की सहायता से त्वचा और मांसपेशियों के बीच मौजूद अतिरिक्त चर्बी को बाहर निकाला जाता है। इस ट्रीटमेंट में किसी भी तरह के टांके नहीं आते। ऑपरेशन के दौरान बनाए गए सूक्ष्म छिद्र कुछ दिनों में खुद ही भर जाते हैं। 

ऑपरेशन के बाद 
ऑपरेशन के बाद छिद्रों से कुछ रिसाव हो सकता है। उससे परेशान होने की जरूरत नहीं है। कई बार सूजन और दर्द की शिकायत भी हो सकती है जो कुछ समय बाद खुद ही ठीक हो जाती है। ऑपरेशन के बाद भी डॉक्टर से नियमित चेकअप करवाएं। कुछ भी परेशानी हो तो डॉक्टर से संपर्क करें। लिपोसक्शन के जरिए एक बार तो आप अपने शरीर को सही आकार दे देंगे, लेकिन फिर उसे बनाए रखने के लिए नियमित रूप से व्यायाम करें और अपने खान-पान पर नियंत्रण रखें। इस ऑपरेशन के बाद भी अधिक वसा वाला खाना खाने से आपके शरीर के उन हिस्सों पर फिर से चर्बी का जमा हो सकती है(मृदुला,हिंदुस्तान,दिल्ली,19.5.12)।

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शनिवार, 7 अप्रैल 2012

अपच,वज़न घटने और रक्ताल्पता का यौगिक उपचार

इस योग कार्यक्रम का प्रारूप उन सभी व्यक्तियों की सहायता के लिए बनाया गया है, जो कमजोर पाचन शक्ति, भूख न लगने, वज़न घटने, अकारणीय रक्त अल्पता से प्रभावित हैं।

आसन 
शुरुआत पवन मुक्तासन भाग-१ समूह से करें। जब इसमें निपुणता हासिल हो जाए तो भाग-२ समूह का अभ्यास करें। इनको विशेषतः पाचन शक्ति को सुदृढ़ बनाने के लिए अभिरूपित किया गया है। इनसे शक्ति जागृत होगी और कमजोरी व मानसिक कमजोरी जाती रहेगा। 

दो हफ्तों के बाद अपने कार्यक्रम को बदल कर उसमें शक्तिबंध समूह एवं वज्रासन समूह के आसनों का समावेश करें, जैसे शशांकासन, शशांकभुजंगासन, मार्जारी आसन तथा पर्वतासन आदि। इनके अभ्यास से निम्न चक्रों एवं ऊर्जा बिन्दुओं के अवरोध दूर होंगे तथा ऊर्जा यहाँ से उर्ध्वगामी हो मध्य पाचक अंगों तक पहुँचेगी, जहाँ पर अवशोषण तथा पोषण की गड़बड़ी हो रही है, तथा रोग निवारक शक्ति प्रदान करेगी। सूर्य नमस्कार प्रारंभ कर संख्या बढ़ाते हुए १० चक्र तक ले जाएँ। फिर शवासन में पूर्ण विश्राम करें तथा उदर श्वसन के प्रति सजगता विकसित करें। 

अंततः पाँच प्रमुख आसनों का अभ्यास करें, जो पाचन प्रक्रिया को उत्तेजित करते हैं तथा "समान वायु" को निपेक्षित करते हैं। ये आसन हैं- पश्चिमोत्तासन, हलासन, चक्रासन, अर्धमत्स्येंद्रसान तथा मयूरासन। आसन की अंतिम अवस्था में अपनी चेतना को शक्तिशाली रूप से पाचन अग्नि के मूल स्थान, अर्थात मणिपुर पर केंद्रित करें। प्रत्येक भोजन के पश्चात वज्रसान में १० मिनट तक बैठें व अपनी चेतना को पाचन प्रक्रिया पर केंद्रित करें और उसे बढ़ाने की कोशिश करें। 

प्राणायाम
नाड़ी शोधन प्राणायाम (प्रथम अवस्था) का अभ्यास ५ चक्रों से प्रारंभ करें। दोनों नासिकाओं में श्वास के प्रवाह को बराबर रूप से संतुलित करें। दो हफ्ते के बाद द्वितीय अवस्था (एकांतर नासिका श्वसन) का अभ्यास १५ चक्रों से प्रारंभ करें। श्वसन पर पूर्ण नियंत्रण विकसित करने की कोशिश करें, जिसमें श्वास को शांत एवं सूक्ष्म रहना चाहिए। पूरक एवं रेचक में १:२ का अनुपात बनाए रखने का प्रयास करते रहें। यह अभ्यास एक महीने तक करें। उसके बाद तृतीय अवस्था का अभ्यास अंतर्कुंक एवं जालंधर बंध के साथ प्रारंभ करें। अभ्यास का लक्ष्य 1:4:2 का अनुपात होना चाहिए,मगर अनावश्यक ज़ोर न लगाएं। किसी जानकार के निर्देशन में सीखें। 

अंत में नाड़ीशोधन प्राणायाम के चतुर्थ चरण में आएं जिसमें अंतर्कुंभक,जालंधर बंध,उड्डियान बंध,मूलबंध तथा बाह्य कुंभक(महाबंध) को भी जोड़ें। आपका लक्ष्य 1:4:2:2 अनुपात तक पहुंचना चाहिए। यह अभ्यास पाचन क्रिया को तीव्र बनाने में प्रभावकारी होगा। इससे प्राण शक्ति और जठराग्नि का उद्दीपन होगा। अंतर्बाह्य कुंभक के साथ भस्त्रिका प्राणायाम का अभ्यास भी जोड़ें तथा इसमें दक्षता प्राप्त करने का प्रयास करें। अभ्यास के दौरान उठते-गिरते श्वास पटल(डायाफ्राम) पर अवधान रखिए। कल्पना कीजिए कि वह धौंकनी की तरह गतिशील हो क्षुधाग्नि को प्रज्ज्वलित कर रहा है। 50-50 श्वास-प्रश्वास के तीन चक्रों तक अभ्यास कीजिए।

उपवास 
यदा कदा जब आपको बहुत भूख लग रही हो तो उसे नकारते हुए अगले भोजन तक कुछ नहीं खाएँ। यह उन मनोवैज्ञानिक अवरोधों को दूर करने का सबसे प्रभावशाली उपाय है, जो आपकी भूख का दमन किए हुए थे।

भोजन सादा शाकाहारी हो... 
भोजन के प्रति अपने नखरों को त्याग दें। भोजन ग्रहण करते समय जो भी आप कर रहे हैं, उसकी सतत चेतना को अक्षुण्ण रखें। चेतन रूप से भूख की संवेदना को महसूस कर उसे बनाए रखें, अपने मन को इस बात की सजगता से इधर-उधर फिसलने न दें। जो भी भोजन आप कर रहे हैं, अपना ध्यान उसी पर केंद्रित रखें एवं सजग रहें कि यह धरती माता की देन है। भोजन को दैवीय प्रसाद जान आनंदपूर्वक ग्रहण करें। सादा शाकाहारी भोजन ग्रहण करें। बाजार में मिलने वाले रंग-बिरंगे एवं चटपटे भोजन के प्रति अभिरुचि अर्थहीन है। भोजन की पोषकता पर ध्यान दें, न कि उसके बाह्य स्वरूप और क्षणिक स्वादानुभूति पर(स्वामी सत्यानंद सरस्वती का यह आलेख बिहार योग विद्यालय,मुंगेर के सौजन्य से सेहत,नई दुनिया,मार्च चतुर्थांक 2012 में प्रकाशित है)।

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रविवार, 18 मार्च 2012

वजन घटाएंगे ये 10 कदम

फिटनेस का फीवर युवा पीढ़ी को तेजी से अपनी गिरफ्त में ले रहा है। कोई पेट का टायर कम करने के लिए सुबह रस्सी कूदता है, तो कोई कमर पर चढ़ी चर्बी की मोटी परत उतार फेंकने की खातिर दिन भर जूस पीता रहता है। यही वजह है कि जिम और योग सेंटर में युवाओं की भीड़ तेजी से बढ़ रही है। लेकिन उनका क्या जिनके पास न तो जिम जाने का वक्त है और न ही अपनी डायट पर कंट्रोल रख सकते हैं। उनके लिए कई ऐसे घरेलू नुस्खे हैं, जो वजन घटाने में मददगार हो सकते हैं। मृदुला भारद्वाज दे रही हैं पूरी जानकारीः 

01. रोज 8 गिलास पानी पीजिए 
खूब पढ़ा और खूब सुना कि पानी पीने से वजन कम हो जाएगा। लेकिन आखिर कितना पानी पिया जाए जिससे वजन कम हो जाए? एक्सपर्ट जवाब देते हैं कि अगर सामान्य व्यक्ति रोजाना 8 से 10 गिलास पानी पिए तो उसका वजन काफी हद तक संतुलित हो सकता है। दरअसल पानी शरीर को साफ रखता है और उन तत्वों को शरीर से बाहर निकालता है, जिनसे शरीर में चर्बी बनती है। पानी पीने का सबसे बड़ा फायदा यह भी है कि लोग ओवरईटिंग से बचते हैं। यानी केवल उतना ही खाना खाते हैं, जितनी भूख होती है। जाहिर है कि जब आप कम खाएंगे तो इससे भी मोटापा कंट्रोल में आता है। साथ ही आपका मेटाबॉलिज्म भी दुरुस्त रहेगा, जिससे खाना आसानी से पच जाएगा। चूंकि खाना अच्छे से पचेगा तो वो सारे तत्व जो मोटापे का बायस बनते हैं, आपके शरीर से बाहर चले जाएंगे। ऐसे में आपकी काया छरहरी बनी रहेगी। अगर ज्यादा पानी पीना आपके लिए संभव नहीं है तो आप लेमन टी, जूस या दूध भी ले सकते हैं, ये भी शरीर को अंदर से साफ करते हैं। 

02. छोटी-छोटी खुराक लीजिए 
खुद को भूखा रखकर या सिर्फ एक या दो बार खाकर वजन कम करने की कोशिश न करें। इससे आपकी सेहत पर खराब असर पड़ेगा और वजन भी कम नहीं होगा। आपको कमजोरी महसूस होगी सो अलग। हां, आप ऐसा कर सकते हैं कि एक बार में ज्यादा खाने की जगह छोटी-छोटी खुराक लें। यानी अगर आप दिन में तीन बार खाना खाते हैं और 15 रोटी खाते हैं तो रोटी की संख्या कम करने के बजाय खाने का समय बढ़ा दीजिए। दिन में पांच बार खाना खाइए और हर बार तीन रोटी खाइए। इससे आप एक साथ अधिक कैलोरी लेने से बच जाएंगे। साथ ही शरीर में जा रही कैलोरी को पचने का समय मिल जाएगा। वजन बढ़ने की समस्या काफी हद तक दूर हो जाएगी। इसी तरह से अगर आप चाय या कॉफी के शौकीन हैं तो एक कप चाय या कॉफी की जगह आधा कप चाय या कॉफी पिएं। इससे कम शुगर आपके शरीर में जाएगी। 

03. खाने में प्रोटीन शामिल करें, शुगर से परहेज करें 
फिट रहने के लिए न्यूट्रिशंस से भरपूर डाइट लें। अगर आप एक्सरसाइज वगैरह करते हैं तो प्रोटीन काम्पलेक्स कार्बोहाइड्रेट वाली डाइट लें। फिट रहने के लिए संतुलित आहार लेना बेहद आवश्यक है, लेकिन इसके साथ कैलोरी का ध्यान जरूर रखें। आमतौर पर लोग मानते हैं कि लिक्विड डाइट से वजन कम होता है। यह सही है, लेकिन तब, जब लिक्विड डाइट में कैलोरी और शुगर की मात्र न हों। यों भी अगर आप वजन कम करना चाहते हैं तो शुगर से परहेज करना ही बेहतर है। 

04. लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करें 
एक्सरसाइज जरूर कीजिए। अगर आप जिम या योग क्लासेज में नहीं जा सकते तो कोई बात नहीं। घर पर ही छोटी-छोटी एक्सरसाइज कीजिए। आप रस्सी कूद सकते हैं। डांस कर सकते हैं। अगर ये सब भी मुश्किल लगे तो ऑफिस में तीन से चार बार सीढ़ियां उतरिए। लिफ्ट का इस्तेमाल बंद कर दीजिए, सीढ़ियों का इस्तेमाल ज्यादा से ज्यादा कीजिए। 

05. कुकिंग कीजिए 
आज ज्यादातर लोग बैठे-बैठे सारा काम करते हैं। खड़े होने का मौका कम ही मिलता है। इस आदत से इनसान की शारीरिक और मानसिक दोनों सेहत खराब होती है, जिसका एक नतीजा यह भी होता है कि इनसान मोटापे का शिकार बनता है। कोशिश करें कि रोज कम से कम 10 मिनट खड़े हों। इसके लिए आप किचन में कोई एक डिश बना सकते हैं। मेट्रो या बस में अपनी सीट किसी और को दे सकते हैं। ऑफिस में चाय खड़े होकर पी सकते हैं। 

06. लेबल पढ़ें, फिर खाएं 
वजन कम करने के लिए सबसे जरूरी है कि अपने खाने के सामान के लेबल पढ़ने की आदत डालें। खाने की चीज पर लगे लेबल उसमें मौजूद कैलोरी और वसा के बारे में जानकारी देते हैं। इससे आप खुद ब खुद उन चीज का सेवन करेंगे। 

07. सब्जी खरीदने जाइए 
पैदल चलने की आदत डालिए। मेट्रो के बाद ऑटो या रिक्शा लेने के बजाय पैदल घर जाएं। सब्जी खरीदने या छोटी-मोटी शॉपिंग के लिए बाजार तक पैदल चलकर जाएं। ऑफिस से निकल कर थोड़ी दूर चाय पीने जाएं। दिन में एक से दो बार पूरे ऑफिस का चक्कर लगाएं। 

08. नींद पूरी कीजिए 
नींद पूरी न होने पर इनसान को भूख ज्यादा लगती है, पाचन प्रक्रिया कमजोर होती है, जिससे वह धीरे-धीरे मोटापे का शिकार बनने लगता है। नींद पूरी न होने से हार्मोस का संतुलन गड़बड़ाता है, जिससे पेट बाहर आने की शिकायत होती है। इसलिए कोशिश करें कि दिन में आठ घंटे जरूर सोएं। 

09. वसा कम, फाइबर ज्यादा 
ऐसा खाना खाएं, जिसमें वसा की मात्र कम हो और फाइबर की मात्र ज्यादा हो। कोशिश करें कि खाने में अनाज को ज्यादा से ज्यादा शामिल करें। अनाज खाने से मेटाबॉलिज्म दुरुस्त रहता है और वजन भी कंट्रोल में रहता है। 

10. फूड डायरी बनाइए 
एक फूड डायरी बनाएं। दिन भर में आप क्या और कितना खाते हैं, उसे एक डायरी में नोट करें। इससे आप जान पाएंगे कि आपने कितनी कैलोरी का सेवन किया है। फिर तय करें कि अगले दिन आपको क्या कम खाना है? इससे धीरे-धीरे आपकी डायट कंट्रोल हो जाएगी(हिंदुस्तान,दिल्ली,14.3.12)।

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शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

वजन घटना एनोरेक्सिया का लक्षण हो सकता है

वजन नियंत्रित रखना और हमेशा खुद को फिट रखने की कवायद करना एक बात है और वजन कम करने की लत पाल लेना अलग। अगर काफी कम वक्त में आपका वजन तेजी से कम हुआ है, तो संभव है कि यह एनोरेक्सिया के शुरुआती लक्षण हों। जानिए,क्या-क्या हैं एनोरेक्सिया के लक्षण और कैसे बचें इस बीमारी सेः 

अगर आपका वजन अचानक बहुत ज्यादा कम हो गया है और दांत पीले नजर आने लगे हैं, तो सतर्क हो जाइए। ये लक्षण एनोरेक्सिया बीमारी के हैं। दरअसल एनोरेक्सियाएक ऐसी मानसिक अवस्था है, जिसमें व्यक्ति अपने वजन को लेकर जरूरत से ज्यादा संजीदा हो जाता है। ऐसे लोग वजन कम करने के लिए अत्यधिक डाइटिंग और व्यायाम का सहारा लेते हैं। उन्हें हर समय डर लगा रहता है कि भरपेट भोजन करने से वे मोटे हो जाएंगे। लिहाजा उनका खानपान अनियमित हो जाता है। जाहिर है अनियमित भोजन और कम खुराक सीधे उनकी सेहत को खराब करते हैं और शरीर अंदर-अंदर ही कमजोर होने लगता है। 

एनोरेक्सिया के लक्षण 
वजन का तेजी से घटना: कम खुराक की वजह से अचानक वजन बहुत ज्यादा कम होता है। चर्बी घटने का असर त्वचा पर साफ दिखाई देता है। कुछ लोगों में त्वचा का ढीलापन और स्ट्रेच मार्क नजर आने लगते है। विशेषज्ञ मानते हैं कि एनोरेक्सिया से पीड़ित लोग खुद को दुबला दिखाने की कोशिश में भूखे रहने लगते हैं और ऐसा करना सेहत के लिए उचित नहीं हैं। 

संक्रमण या चोट का खतरा: 
ऐसे लोगों में संक्रमण और चोट लगने का खतरा ज्यादा होता है। दरअसल कैलोरी से बचने की कोशिश में लोग भोजन से मिलने वाले पौष्टिक तत्वों से वंचित रह जाते हैं। अच्छी सेहत और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने के लिए विटामिन व खनिज जरूरी हैं। मसलन जिंक में एंटी ऑक्सीडेंट होते हैं, जबकि विटामिन ए और सी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मददगार हैं। दूसरी तरफ कम खुराक की वजह से मांसपेशियां और हड्डियां कमजोर होने लगती हैं। इसकी वजह से संक्रमण व चोट लगने का खतरा बढ़ता है। 

पीले नाखून व पीला चेहरा: 
अनियमित खुराक लेने वाले लोगों के नाखून व चेहरे पर पीलापन नजर आने लगता है। आंखों के चारों ओर कालापन दिखने लगता है। ये सारे लक्षण एनीमिया के हैं। इसकी वजह है भोजन में पौष्टिक तत्वों की भारी कमी। ऐसे लोग हर समय अत्यधिक थकावट महसूस करते हैं। 

बाल झड़ना: 
पौष्टिक तत्वों की कमी की वजह से तेजी से बाल झड़ने लगते हैं। वैसे बाल गिरने की मुख्य वजह है शरीर में फोलिक एसिड और विटामिन बी12 की कमी। जाहिर है कम खुराक की वजह से शरीर में इन तत्वों की कमी हो जाती है। बाल झड़ने लगते हैं। बाल झड़ने से व्यक्ति के आत्मविश्वास में कमी और निराशा का भाव पनपने लगता है। 

सिरदर्द या माइग्रेन: 
एनोरेक्सिया से परेशान लोगों में सिरदर्द का दौरा-सा पड़ता है। विशेषज्ञों की मानें तो शरीर में कैल्शियम की कमी की वजह से सरदर्द या माइग्रेन का खतरा बढ़ता है। कम खुराक लेने वालों लोगों के दिमाग को पर्याप्त ऊर्जा नहीं मिल पाती है, जो सरदर्द की वजह बनती है। 

अपर्याप्त नींद: 
अगर बहुत ज्यादा या बहुत कम नींद आए तो मान लीजिए कि कुछ गड़बड़ जरूर है। अनियमित भोजन व्यक्ति को एक तरह से कुपोषण का शिकार बनाता है। कम खुराक का नतीजा है न्यूरो-बायोलॉजिकल सिस्टम में हारमोन संबंधी असंतुलन होना। यह असंतुलन नींद को प्रभावित करता है। इसकी वजह से व्यक्ति या तो बहुत ज्यादा सोता या बहुत कम। अनियमित नींद कई तरह की बीमारियों को जन्म देती है। 

आखिर क्यों लगता है खाने से डर: 
एनोरेक्सिया से पीड़ित लोगों के मन में मोटापे के लेकर फोबिया पैदा हो जाता है। उन्हें वजन बढ़ने की इतनी ज्यादा चिंता रहती है कि वे दोस्तों के सामने खाने से डरने लगते हैं। अगर वे दुबले हों तो भी उन्हें लगता है कि वे मोटे हैं। इसलिए वे खाने के नाम पर टालमटोल करने लगते हैं। कुछ लोगों में तो व्यायाम को लेकर जुनून-सा पैदा हो जाता है। उनके दिमाग में हर समय यही चलता रहता है कि कैसे वजन कम किया जाए। 

देर ना करें  
अगर आपको खुद में या फिर अपने किसी करीबी में ऐसे लक्षण नजर आएं तो देर ना करें। तुरंत सतर्क हो जाएं। मोटापे को लेकर पनप रहे फोबिया से बचने का आसान उपाय है, उचित सलाह। अगर आप खुद इस तरह की समस्या से पीड़ित हैं तो आपको खुद को समझाना होगा कि पर्याप्त खुराक सेहत के लिए बहुत जरूरी है। सेहत से जरूरी और कुछ नहीं है। अगर शरीर स्वस्थ होगा तभी आप खूबसूरत और स्मार्ट दिखेंगी। लिहाजा दुबले दिखने के लिए भोजन से परहेज करना बेमानी है। अगर आपके किसी करीबी में एनोरिसिक होने के लक्षण नजर आ रहे हैं तो उसे प्यार से समझाएं। मोटापे की चिंता से बाहर निकालने के लिए आप उन्हें कुपोषण से होने वाले नुकसान के बारे में बताएं। हो सके तो उन्हें अपने साथ खाने के लिए प्रेरित करें और खुश रहने में मदद करें(मीना त्रिवेदी,हिंदुस्तान,दिल्ली,26.1.12)।

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रविवार, 18 दिसंबर 2011

प्रयोगशालाओं की जांच में नहीं होता कोलेस्ट्रॉल का सही आकलन

दिल्ली की जांच प्रयोगशालाओं (पैथ लैब) की रिपोर्ट अपडेट नहीं होती। राजधानी के हृदय रोग विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे अधिक उल्लंघन बैड व गुड कोलेस्ट्रॉल की मात्रा दर्शाने में सामने आता है। जांच रिपोर्ट के एक ओर गुड व बैड कोलेस्ट्रॉल की जो न्यूनतम/अधिकतम मात्रा आज दर्शाई जा रही है, वह वर्षों पुरानी है।

फोर्टिस एस्कॉर्ट के वरिष्ठ इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. विनय सांघी के अनुसार, जांच प्रयोगशालाओं को लेकर भारत में कोई स्पष्ट मानक नहीं है। कोलेस्स्ट्रॉल को लेकर तो कोई मानक ही तय नहीं है। पूरी दुनिया में अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन और अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी द्वारा तय मानक ही चलते हैं। इन दोनों संस्थाओं द्वारा वर्षों पूर्व तय किए गए मानक ही राजधानी दिल्ली सहित पूरे देश के प्रयोगशालाओं की रिपोर्ट में दर्शाया जाता है। 

कोई मरीज जब डॉक्टर के कहने पर जांच कराने जाता है तो उसकी रिपोर्ट में एक ओर न्यूनतम व अधिकतम की सीमा दर्शाई गई होती है, जिसके आधार पर मरीज खुद को स्वस्थ्य मान लेता है जबकि आज की जीवनशैली व परिस्थितियों में बेहद बदलाव आ चुका है। 

डॉक्टर द्वारा इलाज की सलाह पर मरीज खुद को जांच रिपोर्ट के आधार पर सामान्य बताते हैं, लेकिन वास्तव में बीमारी की शुरुआत उनमें हो चुकी होती है। यदि ऐसे मरीज सही समय पर इलाज ले लें तो हृदय की धमनियों में रुकावट, हृदयाघात और लकवा जैसी स्थितियों से बच सकते हैं, लेकिन गलत रिपोर्ट के कारण वह सही समय पर इलाज नहीं ले पाते। 

अमेरिका में विशेषज्ञ की हैसियत से काम कर चुके डॉ. विनय सांघी के अनुसार, वर्तमान में प्रयोगशालाओं की रिपोर्ट में लो डेंसिटी कोलेस्ट्रॉल की मात्रा १०० से १५० एमजी परसेंट तक दर्शाई गई होती है जबकि यह ७० से कम होना चाहिए। 

इसी तरह टोटल कोलेस्ट्रॉल की मात्रा रिपोर्ट में २५० से ३०० एमजी परसेंट दर्शाई गई होती है जबकि यह १८० से नीचे होनी चाहिए। डॉ. सांघी के अनुसार, लो डेंसिटी कोलेस्ट्रॉल यदि अधिक होगा तो धमनियों में ब्लॉकेज, हार्टअटैक और लकवा का अटैक आ सकता है। 

वहीं हाई डेंसिटी कोलेस्ट्रॉल एक सफाईकर्मी की तरह है तो धमनियों की सफाई करता है। इसकी मात्रा ५० एमजी परसेंट से अधिक होनी चाहिए, लेकिन लैब की रिपोर्ट पर ४०-४५ दर्ज होता है। प्रयोगशाला प्रबंधकों को चाहिए कि वह इस रिपोर्ट को या तो अपडेट करते रहें या फिर कुछ लिखे ही नहीं। इससे मरीजों में दुविधा की स्थिति उत्पन्न नहीं होगी। 

इस बारे में दिल्ली के बड़े प्रयोगशालाओं में शुमार एक के प्रबंधक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि जब सरकार का इस बारे में कोई दिशानिर्देश ही नहीं है तो जो चल रहा है वह चल रहा है। यह हमारी जिम्मेवारी नहीं है(नई दुनिया,दिल्ली,13.12.11)।

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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

मोटापे को बाय कहने की तरक़ीब जानें

हाल के बरसों में मोटापा लोगों की एक बड़ी समस्या बन चुका है। जो लोग फिट हैं , वे वजन बढ़ने नहीं देना चाहते और जो मोटे हैं , वे इसे घटाना चाहते हैं। एक्सर्पट्स की सलाह से यहां हम फिट रहने के तरीके बता रहे हैं : 

जानें अपना BMI 
यह जानना बेहद जरूरी है कि असल में फिट किसे कहें। इसका सीधा - सा फंडा है बीएमआई यानी बॉडी मास इंडेक्स। स्वस्थ व्यक्ति के लिए डब्ल्यूएचओ ने 25 और भारत सरकार ने 23 बीएमआई तय किया है क्योंकि भारतीयों के शरीर में पश्चिमी देशों के लोगों के मुकाबले 5 फीसदी फैट ज्यादा होता है। 

कैसे निकालें BMI 
बॉडी मॉस इंडेक्स = वजन ( किलो में ) / लंबाई ( मीटर में ) 2 
अगर आपका वजन 60 किलो है और लंबाई 160 सेंटीमीटर यानी 1.6 मीटर है। 
BMI= 60 / 1.6 x 1.6 = 60 / 2.56 = 23.4(यानि आप फिट हैं)

1 . 23 या इससे कम - फिट
2 . 24 से 25- ओवरवेट
3 . 26 से 30- मोटे
4. 30 से ज्यादा - बेहद मोटे
5 . 19 से नीचे - अंडरवेट 

कमर की चौड़ाई से पता लगाएं रिस्क 
आप ओवरवेट हैं या नहीं , यह पता लगाने का बीएमआई अच्छा तरीका है। अगर आपका बीएमआई तय सीमा से ज्यादा है तो इसका मतलब है कि आपका वजन ज्यादा है , लेकिन क्या आपको पता है कि अगर शरीर के कुछ खास एरिया में यह एक्स्ट्रा फैट हुआ तो यह और भी ज्यादा नुकसानदायक हो सकता है। अब्डॉमेन के पास मौजूद फैट बाकी जगहों पर मौजूद फैट के मुकाबले कहीं ज्यादा खतरनाक है। अगर किसी के दूसरे अंगों के मुकाबले टमी पर फैट ज्यादा है तो इससे टाइप टू डायबीटीज और दिल की बीमारियां होने की आशंका बढ़ जाती है। कहीं अब्डॉमेन पर ज्यादा वेट तो नहीं है , यह जानने के लिए वेस्ट साइज देखा जा सकता है , जो इस तरह है : 

महिलाओं के लिए 
सामान्य : 32 इंच से कम ज्यादा : 32 से 35 इंच बहुत ज्यादा : 35 इंच से ज्यादा 

पुरुषों के लिए 
सामान्य : 37 इंच से कम ज्यादा : 37 इंच से 40 इंच बहुत ज्यादा : 40 इंच से ज्यादा 

वजन घटाने के तरीके 

योग 
वजन कम करने का सबसे सटीक और सरल तरीका है योग। ये आसन वजन कम करने में मददगार हैं : कपालभाति : सांस को तेजी से नाक से बाहर फेंकें , जिससे पेट अंदर - बाहर जाएगा। 5-10 मिनट करें। हाई बीपी वाले धीरे - धीरे करें और कमर दर्द वाले कुर्सी पर बैठकर करें। 

अग्निसार : खड़े होकर पैरों को थोड़ा खोलकर हाथों को जंघाओं पर रखें। सांस को बाहर रोक दें। फिर पेट की पंपिंग करें यानी पेट अंदर खींचें , फिर छोड़ें। स्लिप डिस्क , हाई बीपी या पेट का ऑपरेशन करा चुके लोग इसे न करें। 

उर्ध्व हस्तोत्तानासन : खड़े होकर पैरों को थोड़ा खोलें। हाथों की उंगलियों को फंसाकर सिर के ऊपर उठा लें। सांस निकालें और कमर को लेफ्ट साइड में झुका लें। दूसरी ओर भी करें। 

दुत उत्तानपादासन : कमर के बल लेटकर हाथों को जंघाओं के नीचे जमीन पर रखें। दोनों पैरों को 90 डिग्री तक ऊपर उठाएं। इस प्रकार जमीन पर बिना टिकाए बार - बार पैरों को ऊपर - नीचे करते रहें। कमर दर्द वाले इसे न करें। 

हृदय स्तंभासन : कमर के बल लेटकर हाथों को जंघाओं के ऊपर रखें। सांस भरकर पैरों को उठाएं। सिर और कमर को उठाएं। इस दौरान शरीर का भार हिप्स पर रहेगा। 

द्विपाद साइकलिंग : कमर के बल लेटे - लेटे ही दोनों पैरों को मिलाकर एक साथ साइकलिंग की तरह घुमाएं। थकान होने तक लगातार घुमाते रहें। हाथों को कमर के नीचे रखें। 

 भुजंगासन : पेट के बल लेटकर दोनों हाथों को हिप्स के नीचे रखें। सांस भरते हुए आगे से सिर और छाती को ऊपर उठाकर पीछे की ओर मोड़ लें। 

उज्जायी प्राणायाम : थायरॉइड के मरीजों के लिए यह काफी फायदेमंद है। सीधे बैठकर सांस बाहर निकालें। अब सांस भरते हुए गले की मांसपेशियों को टाइट करें और सांस भरते जाएं। गले से घर्षण की आवाज करते जाएं। फिर नाक से सांस धीरे - से बाहर निकाल दें। 

इन सभी प्राणायाम - आसनों को 8-10 बार दोहराएं। अगर सुबह नियमित रूप से ये आसन किए जाएं तो एक महीने में 5 किलो तक वजन कम हो सकता है। 

नेचरोपैथी 
नेचरोपैथी में वजन कम करने के लिए नेचरल तरीका अपनाया जाता हैं। इसमें तीन स्टेप होते हैं : 

1. मसाज व स्टीम : मसाज के लिए शीशम , ओलिव या सरसों का तेल और जड़ी - बूटियों वाला पाउडर इस्तेमाल किया जाता है। इसके बाद स्टीम दी जाती है। 

2. कटि स्नान : इसके लिए व्यक्ति को अलग - अलग तापमान के पानी में बिठाया जाता है। इससे कब्ज से छुटकारा मिलता है। 

3. स्पेशल पैक : बॉडी पर स्पेशल पैक लगाए जाते हैं। जमीन से दो फुट नीचे से निकाली गई मिट्टी से मड पैक तैयार किया जाता है , जो शरीर से जहरीले पदार्थों को निकालता है। इसमें 12-15 सिटिंग में 5 किलो तक वजन घट सकता है। इसके लिए 2-5 हजार रुपए चार्ज किए जाते हैं। 

आयुर्वेद 
आयुर्वेद में इलाज मुख्यत : जड़ी - बूटियों पर आधारित होता है। यह करीब - करीब नेचरोपैथी जैसा ही है। इसमें भी मसाज और स्टीम बेस्ड तकनीक होती है। मसाज के लिए अदरक , कुलष्ठा व दूसरी बूटियों मिला तेल या पाउडर इस्तेमाल किया जाता है। फिर स्टीम दी जाती है। खास पैक भी लगाया जाता है। इन सब तरीकों से फैट पिघल जाता है। आयुर्वेद में आमतौर पर 10-15 सीटिंग में पांच किलो तक वजन घट सकता है। 5 हजार से 20 हजार रुपये तक चार्ज किए जाते हैं। इसका फायदा यह है कि शरीर ढीला नहीं पड़ता और वजन अचानक वापस नहीं आता। डॉक्टर की सलाह से त्रिफला , आयोग्यवर्धिनी , घृतकुमारी आदि दवाएं भी ले सकते हैं। 

होम्योपैथी 
खाना खाने के बाद दिन में तीन बार 10-15 बूंदें फायटोलका डिकंड्रा क्यू (Phytolaca Decandra Q) या फ्यूकस वेस क्यू (Fuccus Ves Q) चौथाई कप पानी में लें। कैल्केरिया कार्ब (Calc. Carb.) की 4-5 गोलियां भी दिन में तीन बार ले सकते हैं। ये दवाएं फैट कम करती हैं और नियमित लेने पर दो - तीन महीने में असर दिखने लगता है। इन दवाओं का कोई साइड इफेक्ट नहीं है , फिर भी होम्योपैथ की सलाह से लेना बेहतर है। 

मशीनों का सहारा 
 साइंटिफिक तकनीक में मशीनों द्वारा मसल एक्टिविटी , ब्लड सर्कुलेशन और शरीर की लचक बढ़ाई जाती है। मॉर्निंग वॉकर मशीन : वजन कम करने और हाई बीपी , डायबीटीज जैसी तमाम बीमारियों को दूर करने में मॉर्निंग वॉकर मशीन को काफी मददगार माना जाता है। रोजाना कुछ देर के लिए इसका इस्तेमाल कर दिन की शुरुआत की जा सकती है। वाइब्रेशन : मशीन के जरिए शरीर पर वाइब्रेशंस दी जाती हैं। इससे मांसपेशियों की एक्टिविटी बढ़ती है , जिससे फैट बर्न होता है। हीट थेरपी : शरीर पर पैड लपेटकर हीट दी जाती है। इससे शरीर का ताप बढ़ जाता है , जो बेसिक मेटाबॉलिज्म रेट में इजाफा करता है। 

सिर्फ इन्हीं दोनों तरीकों से वजन कम करने से स्किन ढीली होने का खतरा होता है। उसके लिए मसाज की सलाह दी जाती है। मशीनी तरीकों से वजन कम करने के लिए दो से तीन हजार रुपये चार्ज किए जाते हैं। लाइपो - आर : यह थेरपी किसी एक हिस्से से फैट घटाने में मददगार होती है। मसलन अगर पेट पर ज्यादा चर्बी है तो फौरन एक - दो इंच तक पेट कम हो जाता है। महीने भर में कुल तीन इंच तक का फर्क हो सकता है। इसमें किसी तरह का कट या सर्जरी नहीं होती। इसमें 10 से 15 हजार रुपए खर्च आता है। 

सर्जरी 
बेहद मोटे लोगों यानी जिन्हें 35-40 किलो वजन घटाना होता है , वे सर्जरी करा सकते हैं। 

लाइपोसक्शन : इसमें शरीर से फालतू फैट को निकाला जाता है। 

बैरिएट्रिक सर्जरी : इस सर्जरी को करने के कई तरीके हैं। इनमें जो सबसे पॉप्युलर है , उसमें पेट के साइज को कम कर दिया जाता है , जिससे कम खाने के बाद ही इंसान की संतुष्टि हो जाती है। यह सर्जरी उन लोगों के लिए है जो बहुत ज्यादा मोटे हैं और जिन्हें मोटापे की वजह से डायबीटीज और हाई बीपी जैसे समस्याओं ने घेर रखा है। कुछ समय पहले बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने इसी सर्जरी को कराया था। 

स्टमक बाइपास : पेट में एक पाउच बनाकर सीधे इंटेस्टाइन से जोड़ दिया जाता है। इससे ज्यादा कैलरी एब्जॉर्ब नहीं होती। सिलिकॉन बैंड : पेट में सिलिकॉन बैंड फिट कर दिया जाता है। इससे पेट भरा लगता है और भूख कम लगती है। 

उम्र और मोटापा 
 50 साल के आसपास का समय महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। इस उम्र में अकसर मोटापा आने लगता है। दरअसल , महिलाओं में इस उम्र में मासिक धर्म बंद होने वाला होता है और उनकी हॉर्मोंस प्रक्रिया में बदलाव आने लगता है। इस उम्र में थकावट आदि रहने से महिलाएं आरामपरस्त हो जाती हैं और उनके शरीर का वजन धीरे धीरे बढ़ने लगता है। 
दूसरी तरफ पुरुषों को इस उम्र में दमा , खांसी , गठिया , जोड़ों का दर्द आदि हो जाते हैं , जिससे उनकी जिंदगी घर के दायरे में ही सिमटकर रह जाती है। यह स्थिति उनके मोटापे का कारण बन जाती है। ऐसे लोगों को महिलाएं हों या पुरुष घर के अंदर ही थोड़ी बहुत एक्सरसाइज , योगासन , प्राणायाम करते रहना चाहिए , जिससे वजन पर कंट्रोल रखा जा सके। 

किसे कितनी कैलरी की जरूरत 
उम्र-रोजाना जरूरी कैलरी 
एक साल तक-100 कैलरी प्रति किग्रा शरीर के वजन के मुताबिक 
1-3 साल-1200 
4-6 साल-1500 
7-9 साल-1800 
10-12 साल-2100 
13-15 साल (लड़के)-2500 
13-15 साल (लड़की)-2200 
16-18 साल (लड़के)-3000 
16-18 साल (लड़की)-2200, पुरुष (हल्की मेहनत करने वाले)-2200 पुरुष (भारी मेहनत करने वाले)-3400 महिलाएं (हल्की मेहनत करने वाली)-1900 महिलाएं (भारी मेहनत करने वाली)-2800 

किसके बजाय क्या खाएं : 
 - वाइट ब्रेड सैंडविच के बदले होल वीट या ब्राउन ब्रेड -भरवां परांठा के बदले भरवां रोटी 

- पुलाव / बिरयानी / वाइट राइस के बदले ब्राउन राइस ( मांड निकला ) 

 -समोसे / पकौड़े के बदले इडली / उपमा / पोहा 

- मिठाई के बदले गुड़ / सूखे मेवे -कोल्ड ड्रिंक के बदले नारियल पानी / नीबू 

- पानी -दूध वाली चाय के बदले हर्बल टी / लेमन टी 

-फुल क्रीम दूध के बदले डबल टोंड दूध 

-जूस के बदले संतरा / मौसमी 

 -मीठी लस्सी के बदले छाछ 

- पनीर के बदले पनीर ( टोंड मिल्क से बना )/ टोफू 

- अंडा ( फुल ) के बदले अंडे का सफेद हिस्सा 

5 टॉप गलतियां , जो बढ़ाती हैं वजन 
1- कम बार खाना , पर खूब खाना 
कुछ लोगों को लगता है कि बार - बार खाने से बेहतर है , दिन में सिर्फ तीन बार खाना। ऐसे में ज्यादा भूख लगती है और लोग ज्यादा कैलरी ले जाते हैं। मसलन अगर ब्रेकफास्ट सुबह 9 बजे और लंच दोपहर 2 बजे लेंगे तो भूख ज्यादा लगेगी और लंच में ज्यादा खाना खाएंगे। बीच में 11 या 11:30 बजे अगर फल या ड्राइफ्रूटस या कोई और हेल्दी चीज खा लेंगे तो लंच में खाना कम खाएंगे। हेवी डिनर भी वजन बढ़ने की अहम वजहों में से है। रात में हल्का खाना खाएं। 

 2- वीकएंड पर दावत
कई लोग हफ्ते में पांच - छह दिन डाइटिंग करते हैं , मसलन लिक्विड डाइट पर रहते हैं , फल सब्जी खाते हैं पर वीकएंड पर जमकर खाते हैं। उन्हें लगता है कि एक दिन खुलकर खाने से क्या फर्क पड़ता है। यह सही नहीं है। इससे पूरे हफ्ते का संयम बेकार जाता है और एक ही दिन में हफ्ते भर में की कैलरी शरीर में लौट आती हैं। 

 3- खाने के बाद मीठा 
ज्यादातर लोगों के घर में खाने के बाद मीठे का चलन है। यह कॉम्बिनेशन और कैलरी , दोनों लिहाज से गलत है। गलत कॉम्बिनेशन इसलिए कि भारी कार्बोहाइड्रेट या फैट के बाद शुगर नहीं खाना चाहिए। साथ ही मिठाई में मौजूद कैलरी सेहत के लिए नुकसानदेह हैं। खाने के बाद मीठे का मन है तो गुड़ ले लें , लेकिन कम। गुड़ में मौजूद आयरन सेहत के लिए अच्छा है। सौंफ और किशमिश ले सकते हैं। सौंफ खाना पचाने में मदद करती है और किशमिश सीधे ग्लूकोज में नहीं बदलती। 

 4- शुगर - फ्री चीजें 
आजकल शुगर - फ्री या डाइट आइटम फैशन में हैं। कई लोग नेचरल शुगर न लेकर शुगर - फ्री लेते हैं। इससे वे चीनी के जरिए मिलनेवाली कैलरी से तो दूर रहते हैं पर लंबे वक्त तक शुगर - फ्री लेना अच्छा नहीं है। शुगर - फ्री आइटम्स में आर्टिफिशल चीजें होती हैं , जिन्हें लंबे समय तक नहीं खाना चाहिए। 

5- बिंज ईटिंग की आदत 
एक टॉफी या चॉकलेट से क्या होता है , यह बात अक्सर लोग बोलते हैं , लेकिन यही छोटी चीजें मोटापे की वजह बनती हैं। हाई कैलरी स्नैकिंग ( पकौड़े , समोसे , नमकीन , बिस्कुट आदि ) और बिंज ईटिंग ( बीच - बीच में छुटपुट खाना ) की आदत वजन बढ़ने की बड़ी वजहों में से हैं। जो लोग चॉकलेट के शौकीन हैं , वे डार्क चॉकलेट की बजाय वेफर वाली चॉकलेट खाएं। स्नैक्स में मुरमुरे , रोस्टेड ( भुने हुए ) स्नैक्स या नॉर्मल पॉपकॉर्न ले सकते हैं। 

कैसी हो आपकी डाइट 
वजन घटाने के लिए सही वक्त पर सही खाना बेहद जरूरी है। 

तीनों वक्त खाना खाएं 
अगर वजन घटाना चाहते हैं तो सबसे पहले जरूरी है कि कोई भी खाना छोड़ें नहीं। तीन प्रॉपर मील और बीच में दो स्नैक्स जरूर लें। कोई खाना छोड़ेंगे तो अगली बार ज्यादा खाएंगे , जो सही नहीं है। 

दिन की शुरुआत 
दिन की शुरुआत कॉफी या चाय से न करें। नीबू पानी , नारियल पानी , जूस लिया जा सकता है। 

ब्रेकफास्ट पर फोकस 
दिन भर के खाने में सबसे ज्यादा फोकस ब्रेकफास्ट पर होना चाहिए। अक्सर लोग वजन कम करने की धुन में ब्रेकफास्ट नहीं लेते लेकिन रिसर्च कहती हैं कि अगर नियमित रूप से ब्रेकफास्ट लिया जाए तो लंबी अवधि में वजन कम होता है। नाश्ते में हमेशा एक जैसी चीजें न खाएं , बल्कि बदलते रहें। 

जल्दी करें डिनर 
दिन का खाना पूरा होना चाहिए , जबकि डिनर सबसे हल्का। डिनर रात में 8 बजे तक कर लेना चाहिए। ऐसा संभव नहीं है तो भी सोने से दो घंटे पहले खाना जरूर खा लें। राजमा , चावल जैसी चीजें रात में नहीं खाना चाहिए क्योंकि ये आसानी से पचती नहीं हैं। अगर देर रात तक जागते हैं और भूख लगती है तो फ्रूट्स या सलाद खाने चाहिए। 

चीनी और जंक फूड से तौबा 
शुगर , जंक फूड , फास्ट फूड , मिठाइयां खाने की लिस्ट से निकाल दें। कैंडी , जेली , शहद , मिठाई और सॉफ्ट ड्रिंक्स से दूर रहें। इसी तरह बिस्कुट , केक , पेस्ट्री में काफी फैट और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट होता है , जो मोटापा बढ़ाता है। चीनी ज्यादा नहीं खानी चाहिए। 5 ग्राम (1 चम्मच ) चीनी में 20 कैलरी होती हैं। 

नमक में कटौती 
खाने में ऊपर से नमक न मिलाएं। नमक शरीर में पानी को रोकता है , इसलिए ज्यादा नमक से बचना चाहिए। दिन भर में पांच ग्राम ( करीब एक चम्मच ) नमक काफी होता है। इसमें सब्जी आदि में डाला गया नमक भी शामिल है। दो चम्मच नमक से ज्यादा बिल्कुल नहीं खाना चाहिए। कोशिश करें कि रात में 10 बजे के बाद नमक न लें। सलाद , रायता , ड्राई - फ्रूट्स , नीबू - पानी आदि में नमक से परहेज करें और टेबल सॉल्ट से दूर रहें। हेल्दी खाने का मतलब फीके खाने से नहीं है। 

मसाले 
परंपरागत मसाले न सिर्फ स्वाद बढ़ाते हैं , बल्कि उनमें माइक्रोन्यूट्रिएंट्स , एंटी - ऑक्सिडेंट और फाइबर भी होते हैं। बस इन्हें भूनने के लिए ज्यादा तेल का इस्तेमाल न किया जाए। 

साबुत व छिलके वाली चीजें 
बिना छना आटा खाएं। गेहूं के साथ चने का आटा मिलाने से पाचन अच्छा होता है। गेहूं या जौ का आटा ( बिना छना ), ब्राउन ब्रेड , दलिया , कॉर्न या वीट फ्लैक्स , ब्राउन राइस व छिलके वाली दालें आदि खाएं। अंकुरित अनाज व दालें विटामिन , मिनरल , प्रोटीन से भरपूर होती हैं। 

छुटपुट खाने को बाय 
दो घंटे के बीच में कुछ न खाएं। छुटपुट खाना ही सेहत का सबसे बड़ा दुश्मन है। बीच - बीच में बिस्कुट , नमकीन , ड्राई - फ्रूट्स , कोल्ड ड्रिंक , चाय - कॉफी पीते रहना काफी कैलरी जमा कर देता है। 

मौसमी फल 
मौसमी फल खाएं। जूस के बजाय साबुत फल बेहतर है। सेब , बेरी लें। सेब में पेक्टिन केमिकल होता है। सेब के साथ - साथ ज्यादातर सभी फलों के छिलकों में पेक्टिन पाया जाता है। यह फैट को अब्जॉर्ब करता है।

सोयाबीन और ड्राई फ्रूट्स 
सोयाबीन में मौजूद लेसिथिन केमिकल सेल्स पर फैट जमा होने से रोकता है। हफ्ते में कम - से - कम तीन बार सोयाबीन खाने से शरीर में फैट से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। सोयाबीन को अंकुरित करके रोज सुबह लिया जा सकता है। इसके अलावा लहसुन का रस शरीर में मौजूद फैट्स को कम करने में मददगार है। लहसुन कच्चा खाएं और चबाकर खाएं तो बेहतर है। साथ ही मुट्ठी भर नट्स रोज खाने चाहिए। इनमें बादाम , किशमिश , अखरोट और पिस्ता ले सकते हैं। लेकिन ये फ्राइड न हों और इनमें नमक भी नहीं होना चाहिए। 

सफेद से परहेज , रंगीन से प्यार 
वजन कम करना चाहते हैं तो ज्यादातर सफेद चीजें ( आलू , मैदा , चीनी , चावल आदि ) कम करें और मल्टिग्रेन या मल्टिकलर खाने ( दालें , गेहूं , चना , जौ , गाजर , पालक , सेब , पपीता आदि ) पर जोर दें। 

दूध ,दही और पनीर 
बिना फैट वाला दूध या दही खाएं। दूध में फैट कम करने के लिए उसमें पानी मिलाने से बेहतर है कि मलाई उतार लें। पानी मिलाने से दूध में पोषक तत्व कम होते हैं। सोया से बना पनीर , दूध और दही खा सकते हैं। जिन्हें दूध या सोया प्रॉडक्ट से एलर्जी है , वे राजमा , नीबू , टमाटर , मेथी , पालक , बादाम , काजू जैसी चीजें खाकर कैल्शियम की कमी पूरी कर सकते हैं। 

पानी व तरल पदार्थ 
दिन में 2-3 लीटर पानी व तरल पदार्थ लें। पानी न सिर्फ फैट कम करता है , बल्कि शरीर से जहरीले तत्वों को भी निकालता है। यह भूख कम करता है और कब्ज रोकता है। खाने के 15 मिनट बाद घूंट - घूंट कर गर्म पानी पीना चाहिए। जब भी पानी पिएं , ठंडे या सादे की बजाय गुनगुने पानी को तरजीह दें। 

सबसे जरूरी है स्पेशलिस्ट से सलाह करके योजना बनाना और उस पर लगातार अमल करना। आमतौर पर लोग वजन घटाने के लिए डाइटिंग को ही एक तरीका मानते हैं और भूखे रहने लगते हैं , जो सही नहीं है। डाइटिंग का मतलब भूखे रहना नहीं है , बल्कि सही वक्त पर उचित मात्रा में कम कैलरी और लो फैट वाली फाइबर युक्त चीजें खाना है। 

असल में जब हम कम खाते हैं तो बॉडी का मेटाबॉलिज्म कम हो जाता है और मिनरल व विटामिन की कमी हो जाती है। इसलिए जरूरी है कि आप भरपूर , लेकिन सही खाना खाएं। 

वजन घटाने के लिए हमें थ्री - डाइमेंशनल ( तीन पहलुओं पर ) कोशिश करनी होगी : 1. कैलरी कम लें। शरीर को कम कैलरी मिलेगी तो वह पहले से जमा कैलरी का इस्तेमाल करेगा। 2 . ज्यादा कैलरी बर्न करें। एक्सरसाइज और शारीरिक मेहनत करने पर शरीर में जमा फालतू कैलरी बर्न होगी। 3. स्ट्रेस कम करें। इससे आपको भूख ज्यादा लगती है और आप इमोशनल ईटिंग करते हैं। 

मसलन , अगर आपने 4 किलो वजन कम करने का टारगेट है तो सबसे पहले खाने में से 1000 कैलरी की कटौती करें। फिर कैलरी खर्च करें। आधे घंटे तेज सैर से 80 कैलरी तक बर्न हो जाती हैं। बाकी के लिए एरोबिक्स , जॉगिंग , स्विमिंग या दूसरी एक्सरसाइज की जा सकती हैं। 

तीसरी जरूरी चीज है , लाइफस्टाइल में बदलाव। लिफ्ट के बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल करें , नौकर से पानी मांगने के बजाय खुद उठकर जाएं , आसपास रिक्शे या दूसरे वीइकल के बजाय पैदल जाएं। इन छोटी - छोटी चीजों से काफी कैलरी काफी खर्च होती हैं। एक महीने में 3-4 किलो वजन घटाना सही रहता है। डाइट और एक्सरसाइज के अलावा वजन घटाने के कुछ और भी तरीके हैं। इनमें से कुछ घर में अपनाए जा सकते हैं तो कुछ के लिए एक्सपर्ट या जिम का सहारा लेना होगा(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,20.11.11)।

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गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

जानलेवा ना बन जाए मोटापा

मोटापा आ जाए तो कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इस मोटापे के कारण डायबिटीज, हाइपरटेंशन, हार्ट फेलियर, अस्थमा जैसी बीमारियों का भी खतरा बढ़ जाता है। वर्ल्ड ओबेसिटी डे के अवसर पर सुमन बाजपेयी बता रही हैं मोटापे से बचाव के उपायः 

रितिका जिसकी हाइट 5 फुट 4 इंच और वजन 57 किलो था, यह सोच कर खुश रहती थी कि उसकी फिगर परफेक्ट है। उसका बीएमआई (बॉडी मास इंडेक्स) 21.45 किग्रा/एम2 था। रितिका को लगा कि वह पूर्णतया हेल्दी है और किसी किस्म के खतरे से परे भी। पर उसे तब धक्का लगा, जब उसके डॉक्टर ने बताया कि वह मोटी है। उसकी कमर फैली हुई थी और पेट के हिस्से में फैट जमा था। यह परेशान करने वाली बात थी, क्योंकि पेट के पास जमा फैट कई बीमारियां होने का कारण बन सकता है। 

जानलेवा भी बन सकता है 
फोर्टिस अस्पताल(वसंत कुंज) के बैरिएट्रिक सर्जन डॉ. रंदीप वधावन के अनुसार, ‘मोटापा एक ऐसी मेडिकल कंडीशन है, जिसमें बॉडी फैट इस हद तक जमा हो जाता है कि उसका सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है। मोटापे की वजह से आयु भी कम हो जाती है। बीएमआई जो वजन व लंबाई की तुलना करता है, बताता है कि कोई व्यक्ति ओवरवेट है कि नहीं। डब्लयूएचओ की गाइडलाइंस के अनुसार जब किसी का बीएमआई 25किग्रा/एम2 और 30 किग्रा/एम2 के बीच होता है तो उसे ओवरवेट माना जाता है और जब वह 30 किग्रा/एम2 से अधिक होता है तो उसे मोटा (ओबेस) माना जाता है। पूरी दुनिया में मोटापा एक महामारी की तरह फैल रहा है। 21वींसदी में मोटापा दुनिया की आबादी के 5 प्रतिशत लोगों को प्रभावित कर रहा है। इसकी वजह से डायबिटीज, हाइपरटेंशन, हार्ट फेलियर, अस्थमा, कोलेस्ट्रॉल, अत्यधिक पसीना आना, जोड़ों में दर्द, इंफर्टिलिटी आदि का खतरा बढ़ जाता है।’ 

मोटापे की वजह -
मोटापे की सबसे प्रमुख वजह है गलत फूड हैबिट्स और ऐसा लाइफस्टाइल है, जिसमें फिजिकल एक्टिविटी न हो। इसकी वजह से हमारी सैल (कोशिकाएं) फैट सैल्स में बदल जाती हैं। -फास्ट फूड, ऑयली फूड, चॉकलेट, मैदे से बनी चीजें, सॉफ्ट ड्रिंक्स का अधिक सेवन तो इसके लिए जिम्मेदार है ही, साथ ही महिलाओं में डिलीवरी के बाद एंडोकरीनल ग्लैंड का ठीक से काम न करना, हार्मोनल बदलाव भी इसकी एक वजह है। -नियमित रूप से एंटीडिप्रेसेंट दवाएं लेने से भी मोटापा बढ़ता है। कुछ मामलों में यह वंशानुगत भी होता है। -माना जाता है कि एक मोटापे की वजह से व्यक्ति को 53 तरह की बीमारियां हो सकती हैं। 

स्लिम दिखने का जुनून 
वजह चाहे जो भी हो, सच तो यह है कि आज की लड़कियां स्लिम दिखने के चक्कर में जल्दी वजन घटाने के लिए क्रैश डाइटिंग का सहारा लेने लगी हैं। पतले होने के लिए स्लिमिंग सेंटरों के पैकेज लेना आम बात हो गई है। साइज जीरो के ट्रेंड के चलते तो स्लिमिंग सेंटरों की कमाई कई गुना बढ़ गई है। खासकर शादी के लिए फटाफट पतले होने व तत्काल सुंदर बनने के चक्कर में वे खाना-पीना छोड़ देती हैं।

इसके नुकसान उन्हें बाद में झेलने पड़ते हैं। दिल्ली ओबेसिटी सेंटर, नजफगढ़ के हेड डॉ. अनिल खेत्रपाल के अनुसार, ‘क्रैश डाइटिंग या कोई फिटनेस सेंटर ज्वाइन करने के कुछ समय के लिए तो वजन कम हो जाता है, पर बाद में जब वे वापस अपनी नॉर्मल डाइट पर आ जाती हैं और एक्सरसाइज इत्यादि करना या फिटनेस सेंटर जाना छोड़ देती हैं तो जितना वजन उनका घटा था, उससे कहींज्यादा बढ़ जाता है। 

ऑपरेशन : बड़े जोखिम हैं इस राह में 
100 किलो से अचानक 60 किलो हो जाना बेशक बहुत सुकून देता है, पर इससे स्वास्थ्य और सुंदरता दोनों पर बुरा असर पड़ता है, क्योंकि इससे इम्यूम सिस्टम प्रभावित होता है। शरीर में कमजोरी रहने लगती है, चक्कर आने लगते हैं और चेहरे की रौनक गायब हो जाती है। डॉ. खेत्रपाल के अनुसार, इससे बेहतर है कि आप संतुलित और पोषणयुक्त आहार लें। इससे वजन कम होने में समय ज्यादा लगता है, पर परिणाम स्थायी होते हैं। हाल ही में नितिन गडकरी ने भी अपना मोटापा कम करने के लिए अपनी सजर्री करवाई है। नोवा मेडिकल सेंटर, मुंबई के बैरिएट्रिक सर्जरी के हेड, डॉक्टर रमन गोयल कहते हैं, ‘बैरिएट्रिक सर्जरी में पाचन-तंत्र की संरचना में बदलाव किया जाता है। पेट की क्षमता को कम कर दिया जाता है, ताकि थोड़ा-सा खाने पर ही मरीज को लगे कि उसका पेट भर गया है। इस सर्जरी को कराने वाले लोगों की तादाद निरंतर बढ़ रही है। 

वर्ष 2009 में 1500 लोगों ने इस सेवा का लाभ उठाया। 2010 में 2500 ने यह सजर्री करवाई। संभावना है कि इस वर्ष ऐसे लोगों की संख्या 4000 को पार कर जाएगी। इस सर्जरी के बाद पेट का आकार छोटा हो जाने से विटामिन बी, प्रोटीन या खनिजों की कमी शरीर में हो सकती है, जिसके बाद डॉक्टर की सख्त हिदायतों को मानना जरूरी हो जाता है।’ 

आंकड़े जो डराते हैं 
*50.1% लोग मोटे हैं (बीएमआई के अनुपात पर आधारित) 
*85% बॉडी फैट के कारण मोटे हैं 
*71% के पेट के पास फैट जमा है 
*45% लोग मेटाबॉलिक सिंड्रोम के रिस्क पर हैं, जिसकी वजह से डाइबिटीज और हृदय रोग हो सकते हैं 
*68% लोगों में स्किन के नीचे फैट है। भारतीयों में पश्चिमी देशों के लोगों की तुलना में स्किन के अंदर ज्यादा फैट होता है, जो हेल्थ के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है(हिंदुस्तान,दिल्ली,23.11.11)। टिप्पणीःरविकर जी ने 9 दिसम्बर के चर्चामंच पर और यशवंत माथुर जी ने नई पुरानी हलचल पर यह पोस्ट ली है।

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