शनिवार, 12 मई 2012

मोटे बच्चों में लिवर कैंसर का जोखिम अधिक

डेनमार्क में १९३० से १९८९ के बीच १ लाख ६५ हज़ार पुरुष एवं १ लाख ६० हज़ार महिला स्वयंसेवकों पर एक शोध अध्ययन किया गया। स्कूल जाने की उम्र से ही इनके वज़न और बॉडी मास इंडेक्स पर निगाह रखी गई। इनमें से २५२ को वयस्क होने पर लिवर का कैंसर (हेपॅटोसेल्युलर कार्सीनोमा) हुआ। अध्ययन में सामने आया कि वयस्क होने तक जैसे-जैसे इनके बॉडी मास इंडेक्स में प्रति युनिट वृद्धि होती गई वैसे-वैसे इनके लिवर कैंसर का जोखिम भी बढ़ता गया। 

लिवर कैंसर का जोखिम हर लिंग और उम्र के स्वयंसेवकों में पाया गया। ईएएसएल साइंटिफिक कमेटी के सदस्य डॉ. फ्रेंक लमेर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि बचपन में हुए मोटापे के कारण न सिर्फ टाइप-२ डायबिटीज और दिल की बीमारियों का जोखिम है बल्कि फैटी लिवर डिसीज भी होती है जो बाद में लिवर कैंसर में भी तब्दील हो जाती है। इसलिए बच्चों का स्वस्थ बॉडी मास इंडेक्स बनाए रखने के महत्व को कभी भी नज़रदाज़ नहीं किया जा सकता। बचपन के मोटापे और वयस्कावस्था में विकसित हो रहे लिवर कैंसर के अंर्तसंबंधों पर ऊंगली रखने वाले इन शोध अध्ययनों के नतीजे चेताने वाले हैं। 

लिवर कैंसर के दूसरे कारणों में नियमित शराबखोरी, हिपेटाइटिस-बी और सी का संक्रमण तथा अन्य तरह की लिवर की बीमारियाँ शामिल हैं। शोध अध्ययन से जब इन कारणों से होने लिवर कैंसर के रोगियों को अलग रखा गया तब भी नतीजों में कोई बदलाव नहीं पाया गया। इससे यह संकेत मिलते हैं कि बच्चों में मोटापा हेपॅटोसेल्युलर कार्सीनोमा विकसित होने का एक प्रमुख कारण है। केवल १०-२० प्रतिशत मरीज़ों के लिवर कैंसर को सर्जरी की मदद से सफलता पूर्वक निकाला जा सकता है, शेष की ३ से ६ महीनों में मृत्यु हो जाती है। इसलिए लिवर कैंसर की रोकथाम में ही भलाई है। 

एक नए शोध अध्ययन का दावा है कि जो लोग नॉन अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिसीज़ (एनएलएफडी) से पीड़ित हैं और एक दिन में एक या दो पैग से अधिक शराब नहीं पीते उन्हें इसी बीमारी से पीड़ित दूसरे लोगों की बनिस्बत लिवर कैंसर का जोखिम आधा रहता है। नॉन अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिसीज अमेरिका में होने वाली बहुत ही आम बीमारी है। यह एक तिहाई अमेरिका वासियों को होती है। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो शराब तो नहीं पीते लेकिन मोटापे और खान-पान की बिगड़ी हुई आदतों के कारण इस बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। इस बीमारी में लिवर पर असामान्य मात्रा में वसा जमा हो जाती है। 

यह बीमारी होने का कोई ठोस कारण अभी तक मालूम नहीं हो सका है लेकिन मोटापे और मधुमेह को जोखिम की सूची में सबसे ऊपर रखा जाता है। अधिकांश मरीज़ों में लिवर पर वसा जमा होने पर कोई लक्षण प्रकट नहीं होते लेकिन बीमारी गंभीर होने पर लिवर से संबंधित बीमारियों से मृत्यु होने का जोखिम बना रहता है। नॉन एल्कोहोलिक फैटी लिवर डिसीज के कारण दिल की बीमारियाँ होने का जोखिम दो गुना अधिक होता है। 

सैन डियागो स्कूल ऑफ मेडिसिन के वरिष्ठ शोधकर्ता जैफ्री श्वीमर मानते हैं कि ५० साल का नॉन अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिसीज से ग्रस्त मरीज दिल की बीमारी के अधिक जोखिम पर होता है। आंकड़े सुझाते हैं कि लिवर की किसी बीमारी का जोखिम न हो तो कम मात्रा में शराब पीने से दिल की बीमारी का खतरा कम करने में मदद मिल सकती है लेकिन लिवर की कोई भी समस्या हो तो शराब सेवन का प्रश्न ही नहीं उठता(सेहत,नई दुनिया,मई द्वितीयांक 2012)।

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुमूल्य जानकारी ...
    आभार .

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  2. जब से आपके ब्‍लाग से जुडो हू। बहूत ही श्रानवर्धक जानकारी हासिल को राही है जानकारी के लिये हम आपके आभारी है

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