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शनिवार, 12 मई 2012

मोटे बच्चों में लिवर कैंसर का जोखिम अधिक

डेनमार्क में १९३० से १९८९ के बीच १ लाख ६५ हज़ार पुरुष एवं १ लाख ६० हज़ार महिला स्वयंसेवकों पर एक शोध अध्ययन किया गया। स्कूल जाने की उम्र से ही इनके वज़न और बॉडी मास इंडेक्स पर निगाह रखी गई। इनमें से २५२ को वयस्क होने पर लिवर का कैंसर (हेपॅटोसेल्युलर कार्सीनोमा) हुआ। अध्ययन में सामने आया कि वयस्क होने तक जैसे-जैसे इनके बॉडी मास इंडेक्स में प्रति युनिट वृद्धि होती गई वैसे-वैसे इनके लिवर कैंसर का जोखिम भी बढ़ता गया। 

लिवर कैंसर का जोखिम हर लिंग और उम्र के स्वयंसेवकों में पाया गया। ईएएसएल साइंटिफिक कमेटी के सदस्य डॉ. फ्रेंक लमेर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि बचपन में हुए मोटापे के कारण न सिर्फ टाइप-२ डायबिटीज और दिल की बीमारियों का जोखिम है बल्कि फैटी लिवर डिसीज भी होती है जो बाद में लिवर कैंसर में भी तब्दील हो जाती है। इसलिए बच्चों का स्वस्थ बॉडी मास इंडेक्स बनाए रखने के महत्व को कभी भी नज़रदाज़ नहीं किया जा सकता। बचपन के मोटापे और वयस्कावस्था में विकसित हो रहे लिवर कैंसर के अंर्तसंबंधों पर ऊंगली रखने वाले इन शोध अध्ययनों के नतीजे चेताने वाले हैं। 

लिवर कैंसर के दूसरे कारणों में नियमित शराबखोरी, हिपेटाइटिस-बी और सी का संक्रमण तथा अन्य तरह की लिवर की बीमारियाँ शामिल हैं। शोध अध्ययन से जब इन कारणों से होने लिवर कैंसर के रोगियों को अलग रखा गया तब भी नतीजों में कोई बदलाव नहीं पाया गया। इससे यह संकेत मिलते हैं कि बच्चों में मोटापा हेपॅटोसेल्युलर कार्सीनोमा विकसित होने का एक प्रमुख कारण है। केवल १०-२० प्रतिशत मरीज़ों के लिवर कैंसर को सर्जरी की मदद से सफलता पूर्वक निकाला जा सकता है, शेष की ३ से ६ महीनों में मृत्यु हो जाती है। इसलिए लिवर कैंसर की रोकथाम में ही भलाई है। 

एक नए शोध अध्ययन का दावा है कि जो लोग नॉन अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिसीज़ (एनएलएफडी) से पीड़ित हैं और एक दिन में एक या दो पैग से अधिक शराब नहीं पीते उन्हें इसी बीमारी से पीड़ित दूसरे लोगों की बनिस्बत लिवर कैंसर का जोखिम आधा रहता है। नॉन अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिसीज अमेरिका में होने वाली बहुत ही आम बीमारी है। यह एक तिहाई अमेरिका वासियों को होती है। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो शराब तो नहीं पीते लेकिन मोटापे और खान-पान की बिगड़ी हुई आदतों के कारण इस बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। इस बीमारी में लिवर पर असामान्य मात्रा में वसा जमा हो जाती है। 

यह बीमारी होने का कोई ठोस कारण अभी तक मालूम नहीं हो सका है लेकिन मोटापे और मधुमेह को जोखिम की सूची में सबसे ऊपर रखा जाता है। अधिकांश मरीज़ों में लिवर पर वसा जमा होने पर कोई लक्षण प्रकट नहीं होते लेकिन बीमारी गंभीर होने पर लिवर से संबंधित बीमारियों से मृत्यु होने का जोखिम बना रहता है। नॉन एल्कोहोलिक फैटी लिवर डिसीज के कारण दिल की बीमारियाँ होने का जोखिम दो गुना अधिक होता है। 

सैन डियागो स्कूल ऑफ मेडिसिन के वरिष्ठ शोधकर्ता जैफ्री श्वीमर मानते हैं कि ५० साल का नॉन अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिसीज से ग्रस्त मरीज दिल की बीमारी के अधिक जोखिम पर होता है। आंकड़े सुझाते हैं कि लिवर की किसी बीमारी का जोखिम न हो तो कम मात्रा में शराब पीने से दिल की बीमारी का खतरा कम करने में मदद मिल सकती है लेकिन लिवर की कोई भी समस्या हो तो शराब सेवन का प्रश्न ही नहीं उठता(सेहत,नई दुनिया,मई द्वितीयांक 2012)।

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शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

क्या हैं लिवर ख़राब होने के लक्षण?

लिवर ५०० से भी ज़्यादा अलग-अलग काम करता है। ऊर्जा का भंडारण करने से लेकर संक्रमण से लड़ने और शरीर से विषैले पदार्थ दूर करने तक यह किसी केमिकल फैक्टरी की तरह काम करता है। लिवर का दो-तिहाई हिस्सा लिवर कोशिकाओं से और बाकी का हिस्सा बाइल नलिकाओं से बना होता है। 

कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त हो जाएँ तो लिवर कुछ ही घंटों में नई कोशिकाओं का निर्माण कर लेता है। लिवर अपनी क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की जगह पर नई कोशिकाओं का निर्माण तो कर लेता है लेकिन बाइल डकट में खराबी आने पर यह उनकी मरम्मत नहीं कर पाता। लिवर अपनी कोशिकाओं का पुनर्निर्माण एक हद तक ही कर पाता है। उससे ज़्यादा नुकसान होने पर यह खुद की मरम्मत नहीं कर पाता।  

महत्वपूर्ण कार्य
*पाचन में सहायक
*पोषक तत्वों को अवशोषित करने के लिए महत्वपूर्ण
*दवाओं के हानिकारक तत्व और शराब आदि विषैले पदार्थों को प्रोसेस करके नुकसानकारी तत्वों को दूर करता है। ब्रेड, पास्ता, आलू आदि से भरपूर होते हैं। शरीर को ऊर्जा की आपूर्ति मुख्य रूप से कार्बोहायड्रेट द्वारा होती है। लिवर कार्बोहायड्रेट को ग्लूकोज़ में परिवर्तित करता है जिससे शरीर को ऊर्जा की आपूर्ति होती है। जब शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती है, तब ग्लूकोज़ ग्लाइकोजन के रूप में इकट्ठा कर लिया जाता है। ग्लूकोज़ का कुछ हिस्सा मांसपेशियों में इकट्ठा किया जाता है लेकिन अधिकांश हिस्सा लिवर में ही संग्रहीत होता है। रक्त में ग्लूकोज़ का स्तर नियंत्रित करने में लिवर अहम भूमिका निभाता है। 

दौड़ते हुए या कसरत करते हुए जब शरीर को ऊर्जा की अधिक आवश्यकता होती है तो ऐसे में इकट्ठा किया गया ग्लाइकोजन ग्लूकोज़ में बदल दिया जाता है ताकि शरीर इसका उपयोग कर सके। सबसे पहले मांसपेशियों में संग्रहीत ग्लाइकोजन को परिवर्तित किया जाता है लेकिन ये जल्द ही ख़त्म हो जाती हैं। फिर लिवर द्वारा ग्लूकोज़ की पूर्ति की जाती है। लिवर में खराबी आने पर शरीर में ग्लाइकोजन इकट्ठा करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है जिससे मरीज़ को जल्दी-जल्दी थकान महसूस होने लगती है। 

अन्य कार्यः 
* ग्लूकोज,विटामिन और खनिजों को संग्रहीत करके रखता है। 
* वसा के चयापचय और रक्तधारा के ज़रिए पूरे शरीर में वितरण। 
* हार्मोन का निर्माण और संतुलन बनाना। 
* एंज़ाइम व अन्य प्रोटीन का निर्माण करता है जिनका इस्तेमाल चोट लगने पर खून का थक्का जमने और क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत जैसी अनेक केमिलक रिएक्शंस में होता है। 
* लिवर खुद की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की मरम्मत का काम भी करता है। लिवर को बहुत ज्यादा क्षति पहुंचने पर यह फेल होने लगता है जिससे शरीर का हर अंग प्रभावित होने लगता है। 

संक्रमण से लड़ाई में लिवर 
संक्रमण से लड़ाई करने में लिवर की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। इसमें मेक्रोफेज नामक कोशिकाएं होती हैं जो शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र का एक हिस्सा है। रोग प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत बनाने में लिवर बहुत महत्वपूर्ण होता है। संक्रमण का पता लगते ही ये कुछ ऐसे रसायनों का निर्माण करता है जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली सक्रिय हो जाती है। लिवर के क्षतिग्रस्त होने पर प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है। 

शुरुआती लक्षण 
*थकान और कमज़ोरी।
*भूख कम होना।
*मितली-उल्टियाँ होना।
*वज़न घटना। *पेट दर्द।
*लिवर में सूजन।
*पेशाब का रंग गहरा होना। 

क्षति के लक्षणः 
लिवर के क्षतिग्रस्त होने पर शुरूआती लक्षण उतने स्पष्ट नहीं होते। लक्षण सामने आने तक लिवर काफी प्रभावित हो चुका होता है। लिवर के खराब होते ही चयापचय की प्रक्रिया भी गंभीर रूप से प्रभावित हो जाती है। 

गंभीर क्षति के लक्षण 
*त्वचा और आँखों में पीलापन।
*पेट पर सूजन होना। 
 * तेज़ बुखार और कँपकँपी।
*खून की उल्टी होना(डॉ. अश्मित चौधरी,सेहत,नई दुनिया,जनवरी तृतीयांक 2012)

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बुधवार, 25 जनवरी 2012

वसा से ख़राब हो रहे हैं लिवर

शरीर में कुदरत ने लीवर नामक एक जादुई अंग दिया है । बुरी आदतों से खराब हुए लीवर में छोटा सा हिस्सा भी सुरक्षित बच गया है तो इलाज से उसे पुनः एक नए लीवर का रूप दिया जा सकता है लेकिन लीवर पूरा खराब हो गया यानी सिरोसिस हो गया तो वह कुदरती गुण खत्म । फिर महंगा लीवर ट्रांसप्लांट ही एक रास्ता बचता है । 

इस दौर में लीवर के लिए कठिन परीक्षा की घड़ी आ गई है । आप दारू (अल्कोहल) नहीं लेते हैं, हेपेटाइटिस बी का संक्रमण भी नहीं है तो क्या हुआ? आपके लीवर पर खतरा कम नहीं हुआ है ! आप मोटे हैं, आपको डायबिटीज है, आप काउच पोटेटो (खा-पीकर टीवी के सामने बैठे रहने वाले) हैं तो भी आपके लीवर पर खतरा मंडरा रहा है । इस तरह के लोग भी अब भारी संख्या में लीवर सिरोसिस के शिकार हो रहे हैं । ट्रांसप्लांट कराने आने वालों में उनकी संख्या बढ़नी जारी है । दारू पीने वाले को यह डर बना रहता है कि उनका लीवर खराब हो सकता है लेकिन दिमाग में यह बात विरले आती है कि भोजन एवं मेटाबॉलिज्म की गड़बड़ी से, शरीर में जा रही चर्बी से भी लीवर सिरोसिस की स्थिति आ सकती है । 

आम लोगों में यह चेतना जगाना पहली जरूरत है। फैट से लीवर खराब हो रहा है । इसके लिए शरीर कोई चेतावनी भी नहीं देता है इसलिए बैठे-ठाले खाने-पीने वाले थुलथुल लोग ४० साल के बाद से ही हर साल "लीवर टेस्ट" करवाते रहें ताकि सिरोसिस की स्थिति रोकी जा सके । जंक फूड खाने वाले युवा भी दूसरी परीक्षाओं के साथ-साथ एक बार लीवर का टेस्ट दे ही दें । हो सकता है, उन्हें पता लग जाए कि लीवर में फैट की घुसपैठ होने लगी है(डॉ. ए.एस.सोईन,संडे नई दुनिया,22-28 जनवरी,2012) । 

फैटी लीवर की अनदेखी है घातक 
फैटी लीवर की समस्या अपने आप में गंभीर तो है ही, साथ ही यह कई गंभीर रोगों की जड़ भी हो सकती है । फैटी लीवर की वजह से ब्लॉकेज, किडनी संबंधित रोग, लीवर फेल होना, मोटापा, हाइपर टेंशन, कैंसर की आशंका, जीआई ट्रैक में सूजन, हीमोग्लोबिन की कमी आदि समस्याएं हो सकती हैं । ऐसे में सही समय पर इस पर नियंत्रण व इसका उपचार बेहद आवश्यक है । 

फैटी लीवर की कई वजहें हो सकती हैं । मसलन, बहुत अधिक तली-भुनी चीजों का सेवन, दही-लस्सी जैसी ठंडी चीजों का अधिक सेवन, जंक फूड, प्रकृति विरुद्ध भोजन का सेवन जैसे नमक-दूध का एक साथ सेवन आदि । मेवे, मदिरा व अत्यधिक धूम्रपान आदि से भी फैटी लीवर की आशंका बढ़ जाती है । थायराइड के मरीजों में इसकी आशंका अधिक रहती है । प्रजनन के बाद महिलाओं में फैटी लीवर के मामले भी बढ़ जाते हैं । चयापचय क्रिया (मेटाबॉलिज्म रेट) के घटने से भी लीवर पर फैट जमा हो जाता है । 

फैटी लीवर के उपचार के लिए आयुर्वेद में कई कारगर औषधियां हैं । पुनर्नवादि गुग्गुल, यकृत प्लीहारी लौह, आरोग्यवर्धनी वटी, वृष आंवला, त्रिकूट चूर्ण, पुनर्नवादि क्वाथ, लौह भस्म, मंडूर भस्म, मवायस लौह, लीव-५२, पुनर्नवादि मंडूर, दशमूल क्वाथ आदि औषधियां फैटी लीवर के उपचार में बेहद कारगर हैं बशर्ते इन्हें किसी अनुभवी आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह से लें(डॉ. आकाश परमार,संडे नई दुनिया,22-28 जनवरी,2012) । 

लीवर सिरोसिस का संकेत हो सकता है फैटी लीवर 
जब किसी व्यक्ति के लीवर की कोशिकाएं फूल जाती हैं, उनमें चर्बी और पानी जमा होने लगता है या हो जाता है तो उसे फैटी लीवर कहते हैं । आमतौर पर ज्यादा शराब एवं मांसाहारी भोजन से फैटी लीवर या अल्कोहलिक हेपेटाइटिस के मामले देखे जाते हैं । फैटी लीवर के मामले में पेट में दाहिनी तरफ पसलियों के पीछे सूजन, दर्द तथा आंखों में पीलापन या जॉन्डिस जैसे लक्षण हो सकते हैं । 

शराब का ज्यादा सेवन करने वाले व्यक्तियों में फैटी लीवर के लक्षण पहले आते हैं फिर मामला लीवर सिरोसिस तक भी पहुंच सकता है । प्रायः मधुमेह, मोटापा, कुपोषण आदि की स्थिति में भी फैटी लीवर हो सकता है । लीवर संक्रमण के लिए हेपेटाइटिस बी एवं सी वायरस भी जिम्मेदार है, अतः फैटी लीवर के मामले में शीघ्र व समय से लीवर फंक्शन की जांच किसी विशेषज्ञ चिकित्सक की निगरानी में अवश्य करा लेनी चाहिए । 

महानगरों और कस्बों में युवाओं में शराब की लत बढ़ने से इन युवाओं में फैटी लीवर के मामले भी बढ़े हैं । आमतौर पर ४०-४५ वर्ष की उम्र में होने वाली यह स्थिति अब ३०-३५ वर्ष की उम्र के युवाओं में देखी जा रही है । फैटी लीवर के लक्षण भविष्य के लीवर सिरोसिस एवं लीवर कैंसर का आरंभ भी हो सकते हैं इसलिए संबंधित व्यक्ति अपने फैटी लीवर को नजरअंदाज न करें । लीवर में चर्बी या फैट जमा होने से लीवर के आवश्यक कार्य बाधित हो जाते हैं और व्यक्ति की भूख कम हो जाती है । अपच, पेट में सूजन, पैरों एवं हाथों में सूजन, शरीर पर खुजली, कमजोरी आदि के लक्षण सामने आने लगते हैं । 

जैसे ही आपके लीवर में चर्बी के लक्षण दिखें वैसे ही सतर्क हो जाएं । अपने विशेषज्ञ चिकित्सक से मिलें । खानपान व जीवनशैली नियंत्रित करें । नियमित व्यायाम और प्राणायाम आदि भी आपके उपचार में मददगार सिद्ध होंगे । 

खाने में चर्बी, तली हुई चीजें, घी, तेल, मिर्च-मसाले कम कर दें । शराब को तो भूल ही जाएं और अपने होम्योपैथिक चिकित्सक से परामर्श करें । होम्योपैथी में फैटी लीवर एवं लीवर की अन्य तकलीफों के लिए अच्छी व प्रामाणिक दवाएं उपलब्ध हैं । फैटी लीवर के ९५ प्रतिशत मामले होम्योपैथिक उपचार से ठीक हो जाते हैं। 

यहां मैं केवल जानकारी के लिए इस रोग में प्रयुक्त होने वाली दवाओं के नाम का जिक्र कर रहा हूं। प्रमुख होम्योपैथिक दवाओं में अरममेट, आर्सेनिक अल्ब, चेलिडोनियम, काली बाइक्रोम, कार्डुअस मेरिओनस, चिलोन, चिनिनम सल्फ, लाइकोपोडियम, लैकेसिस, फॉस्फोरस, पिकरिक एसिड, मरक्यूरियस, सल्फर आदि अनेक उपयोगी व प्रभावी दवाएं हैं । होम्योपैथिक उपचार रोगी के शरीरिक व मानसिक लक्षणों की सदृश्यता के आधार पर होता है इसलिए सलाह है कि होम्योपैथिक विशेषज्ञ से परामर्श करने के बाद ही दवाओं का सेवन करें(डॉ. ए.के.अरूण,संडे नई दुनिया,22-28 जनवरी,2012)।

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मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

शराब और लिवर सिरोसिस

महानगरों की बिगड़ती जीवनशैली, जंक फूड पर निर्भरता, तनावभरी जिंदगी और प्रतिस्पर्द्घा नई-नई बीमारियों को बढ़ा रही है। लोगों ने शराब के सेवन को अपने जीवनशैली का हिस्सा बना लिया है। अधिक शराब का सेवन हर तरह से खतरनाक है। इससे लिवर सिरोसिस (जिगर का सिकुड़ना) जैसी जानलेवा बीमारी के शिकार होने की आशंका रहती है। विदेशी सर्वेक्षणों का सहारा लेकर कई डॉक्टर यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि प्रतिदिन ६० एमएल शराब का सेवन किया जा सकता है, लेकिन भारतीय परिस्थितियों में यह अत्यंत हानिकारक है। यहाँ सप्ताह में एक या दो दिन से अधिक शराब का सेवन हानिकारक है। भारत पश्चिम की अपेक्षा अधिक गर्म देश है, इसलिए यहाँ कोशिश करनी चाहिए कि सप्ताह में ६० एमएल से अधिक शराब का सेवन न किया जाए।

शराब आदि के अधिक सेवन की वजह से जिगर क्षतिग्रस्त होने लगता है। बार-बार क्षतिग्रस्त होने के कारण जिगर में रेशा (फाइब्रोसिस) बनने लगता है जिससे जिगर सिकुड़ने लगता है। उसमें छोटी-बड़ी गाँठ पड़ जाती है। यह लिविर सिरोसिस है। यदि लिवर में सिर्फ सूजन आए, लेकिन रेशे में न बदले तो उस अवस्था को हेपेटाइटिस कहा जाता है। सिरोसिस के १५ से २० कारण हैं। परंतु शराब का लगातार सेवन, वायरल हेपेटाइटिस (विशेषकर हेपेटाइटिस बी व सी) नामक बीमारी और फैटी लिवर नामक बीमारी की वजह से लिवर सिरोसिस के मामले सामने आते हैं। पिछले एक दशक में फैटी लिवर के मामले तेशराब आदि के अधिक सेवन की वजह से जिगर क्षतिग्रस्त होने लगता है। बार-बार क्षतिग्रस्त होने के कारण जिगर में रेशा (फाइब्रोसिस) बनने लगता है जिससे जिगर सिकुड़ने लगता है। उसमें छोटी-बड़ी गाँठ पड़ जाती है। यह लिविर सिरोसिस है। यदि लिवर में सिर्फ सूजन आए, लेकिन रेशे में न बदले तो उस अवस्था को हेपेटाइटिस कहा जाता है। सिरोसिस के १५ से २० कारण हैं। परंतु शराब का लगातार सेवन, वायरल हेपेटाइटिस (विशेषकर हेपेटाइटिस बी व सी) नामक बीमारी और फैटी लिवर नामक बीमारी की वजह से लिवर सिरोसिस के मामले सामने आते हैं। पिछले एक दशक में फैटी लिवर के मामले तेजी से बढ़े हैं।

लिवर सिरोसिस बहुत खतरनाक व जानलेवा बीमारी है। इसका पता एक बार में नहीं चलता। माना जाता है कि पहली बार इस बीमारी का पता चलने के बाद अगले पाँच साल में अधिकांश मरीजों की मौत हो जाती है। यदि १०० लोग इस बीमारी के शिकार हैं तो ८० लोग पाँच साल के भीतर कभी भी मौत के मुँह में समा सकते हैं। लिवर सिरोसिस में तबीयत लगातार बिगड़ती चली जाती है, व्यक्ति सुस्त पड़ जाता है, किसी भी काम में वह जल्दी थक जाता है, सारा बदन टूटता रहता है, हड्डियों में तेज दर्द रहता है, जी मिचलाता रहता है, भूख नहीं लगती, वजन कम होता चला जाता है। इसमें लंबे समय तक हल्का बुखार (९९ डिसे) रहता है। यदि बुखार लगातार पाँच से छः महीने तक है तो तत्काल डॉक्टर से मिलने की जरूरत है।



लिवर विकार के लक्षणः
  • नियमित मद्यपान और खाली पेट मद्यपान
  • क्रोध,भय,तृष्णा और शोक से पीड़ित अवस्था
  • बहुत अधिक जल पीना तथा भूख से अधिक भोजन करना
  • ऊष्णता से त्रस्त रहने पर वेगों को रोकना
मरीज इन लक्षणों को लगातार नजरअंदाज करता चला जाता है। वह डॉक्टरों के पास तभी पहुँचता है, जब इस बीमारी की जटिलता उभरनी शुरू होती है। ज्यों-ज्यों बीमारी बढ़ती है मरीज में बेहोशी के लक्षण, पेट में पानी आना, पेट के पानी में सेप्टिक बनना(एसाइटिस),खून की उल्टी और काला पाखाना आने लगता है। यह स्थिति बेहद ख़तरनाक है। साधारण खून की जांच,लिवर फंक्शन टेस्ट और अल्ट्रासाउंड की जांच से लिवर सिरोसिस का पता चल जाता है।

उपचार
  • इलाज़ से परहेज हमेशा बेहतर उपचार है।
  • शराब का लगातार सेवन बहुत अधिक हानिकारक है।
शराब पिएं भी तो सप्ताह में 60 एमएल से अधिक नहीं।
हैपेटाइटिस-बी और सी से बचें।
फैटी लिवर से बचने के लिए मधुमेह और मोटापे पर नियंत्रण ज़रूरी है।
  • तला भोजन न करें।
  • कसरत नियमित रूप से करें।
  • सुबह-शाम तेज़ कदमों से टहलें।
आयुर्वेद में लिवर का उपचार
आयुर्वेद में लिवर (जिगर) के विकारों का संपूर्ण इलाज संभव है। लिवर हमारा खाना पचाने से लेकर बुनियादी प्रोटीन तक का निर्माण करता है। शरीर के मुख्य प्रोटीन एल्बिमिन का निर्माण यही करता है। वास्तव में लिवर का शरीर के लिए मुख्य रूप से पाँच कार्य होता है। पहला कार्य हमारे शरीर के खून को जमाने के लिए प्रोटीन का निर्माण करना है। यदि लिवर प्रोटीन का निर्माण न करे तो हमारा खून कभी जम ही न पाए। लिवर का दूसरा कार्य खाए हुए भोजन को शरीर के लिए ऊर्जा में परिवर्तित करना है। खाने से यदि ऊर्जा बने ही नहीं तो वह खाना हमारे लिए व्यर्थ है। लिवर का तीसरा कार्य शरीर के जहरीले पदार्थ के जहर को खत्म कर उसे शरीर के लिए उपयुक्त बनाना है। लिवर का चौथा कार्य शरीर के गंदे पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना है। यदि शरीर में विषैला व गंदा पदार्थ रह जाए तो शरीर जहरीला हो जाए। लिवर का पाँचवाँ कार्य पित्त का निर्माण और भोजन के वसा का पाचन है।
लिवर के इन कार्यों और उससे संबंधित बीमारी के आधार पर ही इलाज़ किया जाता है। आयुर्वेद में त्रिदोषों और धातुओं में विकार के आधार पर लिवर की बीमारी का पता चलता है। लिवर की बीमारी में वात-पित्त-कफ तीनों में दोष उत्पन्न हो जाता है। इसके अलावा,रस और रक्त में भी दोष आ जाता है जिससे लिवर अपना मुख्य कार्य करना बंद कर देता है। आयुर्वेद में त्रिदोषों का शमन करते हुए लिवर का इलाज़ किया जाता है।


आयुर्वेद से उपचार
  • शराब के परित्याग के लिए प्रेरित करना
  • जिस दोष(वात,पित्त अथवा कफ) की अधिकता है,पहले उसका उपचार किया जात है। तीनों दोषों में समता होने पर पहले कफ,फिर पित्त और आखिर में वात का इलाज़ किया जाता है।
  • अनुवासन और यापन वास्ति का प्रयोग तथा वातनाशक लैतभ्यंग और उबटन का प्रयोग। वातनाशक पौष्टिक पथ्य देना चाहिए।
  • यदि बल-मांसादि से क्षीण हो गई हो तो संशमन उपचार करें।
  • स्नेहन,स्वेदन,विरेचन कराएं। तत्पश्चात् शमन चिकित्सा करें।
(डॉ. कैलाश सिंघला और डॉ. आकाश परमार,सेहत,नई दुनिया,मार्च तृतीयांक,2011)

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गुरुवार, 13 जनवरी 2011

एल्कलाइन फॉस्फेटेस

एल्केलाइन फॉस्फेटेस एक एंजाइम है जो कि खून में पाया जाता है और मुख्यत: लिवर और हड्डियों में बनता है। यह आंतों और किडनी में भी कम मात्रा में बनता है।

कब कराएं जांच
नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स के पेडिएट्रिक्स न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. जितेंद्र साहू के अनुसार जब भी आपको लिवर या हड्डियों से जुड़ी बीमारी का संदेह हो तो आप यह जांच अवश्य कराएं।

कैसे करें लिवर की बीमारियों की पहचान
जब आपको कमजोरी महसूस हो, भूख में कमी, उल्टियां, पीलिया, पेट में सूजन, स्टूल का रंग हल्का और पेशाब का गहरा नजर आए तो समझों कि आप लिवर की बीमारी से ग्रस्त हो सकते हैं।

कैसे करें हड्डियों से जुड़ी बीमारी की पहचान
जब आपको हड्डियों में दर्द महसूस हो, मामूली चोट से भी फैर्स हो रहे हों या हड्डियां तिरछी हो रही हों तो समझ जाएं कि आप हड्डियों से जुड़ी किसी समस्या से ग्रस्त हो सकते हैं।

कैसे देखें जांच रिपोर्ट
डॉ. साहू कहते हैं कि सामान्य लोगों में इसकी रीडिंग 40 से 150 इंटरनेशनल यूनिट प्रति लीटर होती है। यदि रीडिंग 150 से ज्यादा हो तो लिवर या हड्डियों से जुड़ी बीमारियां होने की संभावना होती है। लिवर की बीमारियां जैसे- वायरल हैपिटाइटिस, हिपैटिक कैंसर, पित्त की नलियों में रुकावट की संभावना हो सकती है। हड्डियों की बीमारियां जैसे- बच्चों में रिकेट्स, बड़ों में ऑस्टियोमलेशिया, पेजेट्स के खतरे हो सकते हैं।

जिंक की कमी या ब्लड ट्रांसफ्यूजन से इसकी रीडिंग 40 से कम हो सकती है। ऐसे बच्चों जो हड्डियों की बीमारी से ग्रस्त हैं और उनकी रीडिंग 40 से कम है तो हो सकता है कि वे हाइपोफॉस्फेटेसिया नामक आनुवांशिक बीमारी से ग्रस्त हैं।

नोटःस्वस्थ बढ़ते बच्चों में एल्केलाइन फॉस्फेट्स की रीडिंग 1000 तक भी हो सकती है। गर्भवती महिलाओं में भी इसकी रीडिंग अपेक्षाकृत ज्यादा हो सकती है।

कहां कराएं जांच
लगभग सभी सरकारी अस्पतालों यह जांच उपलब्ध है। लिवर फंक्शन पैनल के साथ यह जांच रूटीन में लिखी जाती है, जिसके अंतर्गत एएलटी, एएसपी, बिलिरूबिन, एएलपी जैसे जांच आते हैं। सरकारी अस्पतालों में यह मुफ्त और निजी अस्पतालों में भी लगभग 200 रुपये में करवाई जा सकती है(सुषमा कुमारी,हिंदुस्तान,दिल्ली,11.1.11)।

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शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

केईएम में हुआ सफल लिवर ट्रांसप्लांट

पुणे की एक फर्म में काम करनेवाले आईटी इंजिनियर उल्लास चौधरी (27) को दो साल पहले जब पता चला कि वे ऑटोइम्यून हिपैटाइटिस से पीड़ित हैं जिसका एकमात्र इलाज लिवर ट्रांसप्लांट है, तो उन्होंने जिंदगी की उम्मीद छोड़ दी थी। लेकिन लिवर ट्रांसप्लांट के चार हफ्ते बाद बुधवार दोपहर केईएम हॉस्पिटल के आईसीयू में उनके चेहरे पर फैली मुस्कराहट और आंखों में चमक उनके जज्बात को बयान कर रही थी कि जिंदगी के मायने अब और खास हैं। क्षतिग्रस्त हो चुके लिवर की कारण उल्लास को ट्रांसप्लांट की जरूरत थी। दूसरी जिंदगी भी उन्हें पिता की बदौलत मिली और जरिया बना पब्लिक हॉस्पिटल केईएम। पिता शशिकांत चौधरी कहते हैं, 'जलगांव का एक मध्यवर्गीय परिवार भला प्राइवेट हॉस्पिटलों में लिवर ट्रांसप्लांट का 15-16लाख रु खर्च कहां उठा पाता। और राज्य के सरकारी हॉस्पिटलों में यह महंगी सर्जरी होती नहीं थी। लेकिन तीन महीने पूर्व केईएम हॉस्पिटल के सर्जनों ने कहा कि अगर आप जिगर का एक टुकड़ा दान करें,तो बेटे की जिंदगी बच सकती है।' शशिकांत चौधरी ने हां कहने में एक पल भी नहीं लगाया और गत 23सितंबर को लिवर का दाहिना लोब निकालकर बेटे के दाहिने लिवर की जगह प्रत्यारोपित कर दिया गया। पिता को उसी दिन डिस्चार्ज कर दिया गया। उल्लास को 15दिन हॉस्पिटल में और रहना होगा क्योंकि फॉलोअप के लिए जलगांव के येवला गांव से आना-जाना आसान नहीं होगा। लेकिन उल्लास के लिए हॉस्पिटल में रुकना कोई तकलीफ की बात नहीं। 'लोग सरकारी अस्पतालों को बदनाम करते हैं,लेकिन मैंने डॉक्टरों और स्टाफ का जो समर्पण और सपोर्ट यहां देखा, वह काबिल-ए-तारीफ है।' जटिल सर्जरी को अंजाम दिया केईएम के कंसल्टेंट लिवर सर्जन डॉ चेतन कंथारिया और उनकी टीम ने। टीम को सुपरवाइज करने के लिए मौजूद थे मेदांता मेडसिटी (गुड़गांव) के लिवर ट्रांसप्लांट सेंटर के चेयरमैन और भारत में लिवर ट्रांसप्लांट के पिता मानेजाने वाले डॉ. अरविंदर सिंह सॉएन। डॉ. सॉएन को केईएम ने विजिटिंग प्रफेसर के तौर पर नियुक्ति दी है और वे आनेवाले समय में हॉस्पिटल में होनेवाले लिवर ट्रांसप्लांट को सुपरवाइज करते रहेंगे। डॉ. सॉएन के मुताबिक, 'उल्लास का लिवर चूंकि पूरी तरह क्षतिग्रस्त था, इसलिए हम कैडेवर लिवर का इंतजार नहीं कर सकते थे। यही वजह है कि लाइव डोनर चुना गया। इत्तफाक से पिता और बेटे की ब्लड और टिशू भी मैच कर गए।'(नवभारत टाइम्स,मुंबई,21.10.2010)

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गुरुवार, 23 सितंबर 2010

दिल्ली और गुड़गांव में कल लिवर प्रत्यारोपण के दो असाधारण मामले सफल रहे

डॉक्टरों ने फैक्टर सात के शिकार छह माह के बच्चे को लिवर प्रत्यारोपित कर नई जिंदगी दी है। दिल्ली से सटे गुड़गांव स्थित मेदांता मेडीसिटी के डॉक्टरों का दावा है कि सबसे कम उम्र के बच्चे का लिवर प्रत्यारोपण करने की यह पूरी दुनिया में पहली घटना है। 25 डॉक्टरों की टीम को 12 घंटे तक प्रत्यारोपण के लिए मशक्कत करनी पड़ी। सर्जरी के बाद बच्चे का स्वास्थ्य तेजी से बेहतर हो रहा है और जल्द ही अस्पताल से छुट्टी दे दी जाएगी।
मुंबई निवासी बिजल जैन ने बताया कि उनका बेटा तविश पैदाइशी बीमार चल रहा था। कभी पेशाब में खून आता था तो कभी मल में खून आता था। मुंबई के डॉक्टरों को दिखाया लेकिन उसकी बीमारी का पता नहीं लग सका। इसके बाद उन्होंने मेदांता मेडीसिटी के डॉक्टरों से तविश के बारे में सलाह ली। मुख्य लिवर प्रत्यारोपण फिजिशियन और पीडियाट्रिक गैस्ट्रोइंटेरोलॉजी एंड हेपटोलॉजी डॉ. नीलम मोहन ने बताया कि तविश फैक्टर सात का शिकार था। फैक्टर सात लिवर में बनता है और शरीर में खून की स्थिति को संतुलित करता है। यानी खून को पतला और थक्का बनाता है लेकिन तविश में यह था ही नहीं। इससे खून कभी पेशाब में आता था कभी बे्रन में चला जाता था। यह समस्या पांच लाख बच्चों में से एक में होती है। ऐसे मरीजों का इलाज प्रत्यारोपण से ही संभव है इसलिए लिवर प्रत्यारोपण की सलाह माता पिता को दी गई। तविश की मां बिजल लिवर दान कर बच्चे की जिंदगी बचाने के लिए आगे आई लेकिन दुर्भाग्य से बिजल का लिवर फैटी था। इससे उसे एक माह तक अस्पताल में योग और संतुलित आहार देकर फैट को समाप्त करना पड़ा। लिवर प्रत्यारोपण सर्जन डॉ. एएस सोइन ने बताया कि एक तो कम उम्र, मात्र छह किलोग्राम वजन और फैक्टर सात की कमी से यह प्रत्यारोपण बहुत ही चुनौती भरा था। चीरा लगाने पर लगातार रक्त स्राव हो सकता था। लिवर इतना छोटा था कि निकालने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बच्चे की मां का मात्र 150 ग्राम लिवर काटकर प्रत्यारोपण किया गया। वहीं मेदांता मेडीसिटी के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक डॉ. नरेश त्रेहन ने बताया कि प्रत्यारोपण के इतिहास में यह ऐतिहासिक सफलता है। यह पूरी दुनिया को भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र की मजबूती का अहसास कराता है(अमर उजाला,दिल्ली,23.9.2010)। उधर,नई दुनिया ने सिमरन की रिपोर्ट दी है जिसकी उम्र महज नौ वर्ष है और उसका लीवर फेल हो चुका था। वह कोमा में थी। सर गंगाराम अस्पताल के डॉक्टरों की टीम उसकी सर्जरी को लेकर असमंजस में थे और चर्चा कर रही थी कि अचानक उसके शरीर में हरकत हुई। डॉक्टरों ने लीवर प्रत्यारोपण का फैसला कर लिया। नोएडा के एक निजी स्कूल में चौथी की छात्रा सिमरन के लीवर प्रत्यारोपण के लिए घर के सदस्यों ने सामूहिक रूप से धन इकठ्ठा किया और बाकी के रकम की पूर्ति अस्पताल ने छूट देकर पूरी कर दी। ऐसी ही जॉर्डन के कॉलेज की एक छात्रा के लीवर प्रत्यारोपण के लिए जर्मनी व इजिप्ट के डॉक्टरों ने मना कर दिया, लेकिन गंगाराम के डॉक्टरों की टीम ने उसे बचा लिया। पिडियाट्रिक हेपाटोलॉजिस्ट डॉ. निशांत वधवा के अनुसार सिमरन एक दम से शिथिल थी। उसे वेंटिलेटर पर रखा गया था। वह हिपाटिक फेलियर की स्थिति में थी। बिना लीवर प्रत्यारोपण के उसके ठीक होने की उम्मीद १० फीसदी से भी कम थी। सिमरन के मामा गगन ने अपने लीवर का हिस्सा दिया। सिमरन का लीवर मांस का लोथ़ड़ा बन चुका था। अब वह सामान्य बालिका की तरह स्कूल जा सकती है और अपने सारे काम कर सकती है। लीवर प्रत्यारोपण विभाग के निदेशक डॉ. विनय कुमारन ने जॉर्डन निवासी हनीन अबुशाकरा के बारे में बताया कि वह ऑटो इम्यून हैपेटाइटिस बीमारी की शिकार थी। वह इतनी कमजोर थी कि जर्मनी, इजिप्ट व टर्की के डॉक्टरों ने लीवर प्रत्यारोपण के लिए मना कर दिया। वह इतनी कमजोर हो चुकी थी कि फुसफुसाते हुए बोल पाती थी। बिना सहायता के वह बिस्तर पर भी जाने में असमर्थ थी। गंगाराम अस्पताल के डॉक्टरों ने प्रत्यारोपण का निर्णय लिया और अब वह स्वस्थ्य है। गंगाराम के चेयरमैन डॉ. बीके राव के अनुसार अस्पताल में लीवर प्रत्यारोपण के क्षेत्र में नई पद्घतियां अपनाई जा रही हैं। यहां की सफलता दर ९५ फीसदी तक है।

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शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

दिल्लीःअपोलो ने डेढ़ साल के बच्चे का लीवर प्रत्यारोपण कर रचा इतिहास

अठारह माह का स्रोय किम। कंबोडिया के इस बच्चे का अपोलो अस्पताल में लीवर प्रत्यारोपण कर नया जीवन दिया गया। स्रोय किम जन्म से ही पीलिया तथा हाइपरटेंशन से पीडि़त था और दिनों दिन हालत बिगड़ती जा रही थी। पड़ताल में पता चला कि उसे ऐक्स्ट्राहैपेटिक बिलियरी की भी बीमारी है, तत्काल उसका लीवर प्रत्यारोपण किया गया और आज वह पूरी तरह से ठीक है। उसकी मां ने कहा कि इसके पहले हमने इसका इलाज सिंगापुर में कराया था लेकिन फायदा नही हुआ तो हमने इसे अपोलो लाने का फैसला किया, यहां के डॉक्टरों ने मेरा बेटा वापस किया है। अपोलो ग्रुप द्वारा आठ महीने में 534 अंग प्रत्यारोपित कर एक नया इतिहास रचा है। इस विशेष मौके पर अपोलो द्वारा आयोजित प्रेस वार्ता में इस बात का खुलासा किया गया। इस मौके पर अपोलो हॉस्पिटल गु्रप के चेयरमैन डा.प्रताप सी. रेड्डी ने इस उपलब्धि पर अंग प्रत्यारोपण टीम को बधाई देते हुए आम लोगों को इसके लिए जागरूक करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आज हर साल भारत में दो लाख से अधिक लोगों को अंग प्रत्यारोपण की जरूरत होती है और हर वर्ष हर साल बीस हजार लीवर प्रत्यारोपण की आवश्यकता है। अपोलो ग्रुप द्वारा अब तक 6587 अंग प्रत्यारोपण किया जा चुका है। जहां तक वर्ष 2010 की बात है तो इस वर्ष लीवर 134, किडनी 398, हार्ट 2 और 51 बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया गया है(दैनिक जागरण,दिल्ली,27.8.2010)। इसी मुद्दे पर आज नई दुनिया की रिपोर्ट कहती है कि इस साल के अंत तक अपोलो अस्पताल समूह अंगों के ट्रांसप्लांट (प्रत्यारोपण) में दुनिया का सबसे व्यस्त अस्पताल हो जाएगा । वह इस मामले में अमेरिका के मायो क्लीनिक को पीछे छोड़ने वाला है । यह तब है जब यहां केडेवर ट्रांसप्लांट ( ब्रेन डेड हुए लोगों के अंगों से) जोर नहीं पकड़ रहा है । संसद में संशोधित अंग प्रत्यारोपण कानून के पारित होने के बाद देश में अंग दान अभियान को खासा बल मिलने वाला है । वह दिन दूर नहीं जब भारत दुनिया का सबसे बड़ा ट्रांसप्लांट हब बन जाएगा । भारत में हर साल दो लाख से अधिक लोगों को अंग प्रत्यारोपण की जरूरत होती है । एक अनुमान के मुताबिक यहां हर तीन मिनट में एक ऐसा मरीज जुड़ जाता है जिसे अंग प्रत्यारोपण की जरूरत है । अपोलो समूह के अध्यक्ष डॉ. प्रताप सी रेड्डी ने गुरुवार को संवाददाता सम्मेलन में बताया कि अस्पताल समूह ने इस साल आठवें महीने में ५३४ अंग प्रत्यारोपण का रिकॉर्ड कायम किया है । समूह के चिकित्सा निदेशक एवं शिशु लीवर विशेषज्ञ डॉ. अनुपम सिब्बल ने कहा कि दिसंबर तक यह अस्पताल समूह अमेरिका के मायो क्लीनिक को निश्चित ही पीछे छोड़ देगा । मायो क्लीनिक में अभी औसतन ६६२ अंग प्रत्यारोपण होते हैं । इस मौके पर लीवर ट्रांसप्लांट कराने वाले अस्पताल के ५०० वें मरीज ५८ वर्षीय रणवीर सिंह भी थे । १९ महीने का कंबोडिया का बालक स्रॉय किम अपनी बाल सुलभ हरकतों से सभी को अपनी और आकर्षित कर रहा था । जन्म से ही पीलिया रोग के शिकार किम का तीन महीने पहले लीवर का ट्रांसप्लांट हुआ है ।

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मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

बीजीएस अस्पताल का लिवर जागरूकता सप्ताह

बीजीएस अस्पताल,बंगलौर लोगों को लिवर के प्रति जागरूक बनाने के लिए इन दिनों हैप्पी लिवर वीक मना रहा है। यह सप्ताह 25 अप्रैल तक चलेगा। अस्पताल के उपाध्यक्ष डॉ. एन.के.वेंकटरमण का कहना है कि इस सप्ताह के दौरान,लिवर के प्रति लोगों को जागरूक बनाने के लिए अवेयरनेस वाक,व्याख्यान और मुफ्त जांच का आयोजन किया जा रहा है। अस्पताल ने बंगलोर के सार्वजनिक पार्कों(कबन पार्क में एक और राजराजेश्वरनगर में तीन अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र बनाए हैं। इन केंद्रों पर रक्तचाप,आरबीएस औऱ बीएमआई की जांच मुफ्त की जाएगी। अस्पताल की ओर से ऐसी विवरणिकाएं भी वितरित की जा रही हैं जिनमें बताया गया है कि लिवर को स्वस्थ रखने के लिए क्या किए जाने चाहिए। बीजीएस अस्पताल के हैपेटोलॉजिस्ट डाक्टर एस.टी.त्यागी का कहना है कि लिवर की बीमारी तेजी से बढ रही है और यह साइलेंट किलर साबित हो रहा है। उनका कहना है कि लिवर के रोगों के लक्षण तब सामने आते हैं जब लिवर का 70 प्रतिशत नुकसान हो चुका होता है। यह एक तथ्य है कि लिवर ट्रांसप्लांट के मामलों में जबरदस्त प्रगति के बावजूद,दुनिया भर में लिवर रोगों से मरने वालों की संख्या बढ़ रही है। कैंसर के तमाम मामलों में संख्या के लिहाज से लिवर कैंसर का स्थान छठा है। देर से पता चलने के कारण इस रोग से मरने वालों का प्रतिशत ज्यादा होता है। कैंसर से मरने वाला हर तीसरा रोगी लिवर कैंसर का होता है। देश में 3 से 4 फीसदी लोग हैपेटाइटिस-बी से पीड़ित हैं। विकासशील देशों में,लिवर कैंसर के 82 प्रतिशत मामले हैपेटाइटिस-बी और सी के कारण होते हैं। यह भी गौरतलब है कि हार्ट अटैक की तुलना में,लिवर की नाकामी से मौत का जोखिम कहीं ज्यादा होता है। यदि इसकी समय पर पहचान हो जाए तो नुकसान की भरपाई काफी हद तक संभव होती है। डॉ. गोपाल का यह भी कहना है कि खान-पान की आदतों में तब्दीली लाकर,शराब से परहेज कर,धूम्रपान छोड़कर,कम वसायुक्त भोजन लेकर और सब्जी तथा फलों का सेवन बढाकर लिवर को तंदुरुस्त रखा जा सकता है। नियमित व्यायाम भी इसमें सहायक है। इस ब्लॉग पर पाठकों को सूचित किया गया था कि पिछले सप्ताह ही,बीजीएस अस्पताल ने मेटस्टैटिक लिवर ट्रांसप्लांट करने में कामयाबी पाई थी जो भारत में इस प्रकार का पहला मामला था।
अस्पताल ने इसी वर्ष जनवरी से लिवर,पैंक्रिएटिक रोग और मल्टीऑर्गन प्रत्यारोपण केंद्र की शुरूआत की है।

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गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

बीजीएस,बंगलोर में हुआ देश का पहला कैडेवर लिवर ट्रांसप्लांट

बीजीएस ग्लोबल हास्पिटल ने देश में पहली बार मैसिव मेटस्टेटिक लिवर डिजीज के लिए कैडेवर लिवर ट्रांसप्लांट सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। मेटस्टेटिक लिवर कैंसर एक ऐसे प्रकार का कैंसर है जो होता तो होता तो लिवर में है लेकिन जिसकी शुरूआत शरीर के किसी अन्य हिस्से से होती है।
प्रोफेसर मोहम्मद रेला के नेतृत्व में 15 सर्जनों की एक टीम ने 10 घंटे तक चली इस सर्जरी में,रोगी सीवी रामचंद्रन के 6.5 किग्रा. वजनी रोगग्रस्त लिवर को हटा कर एक ब्रेन-डेड व्यक्ति का कैडेवर लिवर प्रत्यारोपित किया। यह सर्जरी बेहद चुनौतीपूर्ण थी क्योंकि रोगग्रस्त लिवर का आकार काफी बढा हुआ तो था ही,यह ribcage और posterior abdominal wall के बीच इस कदर फंसा हुआ था कि काम करने की जगह बची ही नहीं थी ।
यह देश में तो इस तरह की ट्रांसप्लांट सर्जरी है ही,दुनिया भर में ऐसी सर्जरी के उदाहरण गिने-चुने ही हैं। एप्पल कम्प्यूटर्स के सीईओ स्टीव जाब्स की एक वर्ष पूर्व ऐसी ही सर्जरी की गई थी।
बीजीएस ग्लोबल हॉस्पीटल देश का एकमात्र अस्पताल है जहां लिवर से संबंधित सभी प्रकार के इलाज़ उपलब्ध हैं। देश में सबसे ज्यादा कैडेवर लिवर ट्रांसप्लांट करने का श्रेय बीजीएस को ही है। इनमें से 90 प्रतिशत प्रत्यारोपण सफल रहे हैं।
इस सर्जरी को अंजाम देने वाले प्रोफेसर रेला ग्लोबल ग्रुप के लिवर ट्रांसप्लांट कार्यक्रम के प्रमुख हैं। उन्होंने 20 वर्ष के अपने करियर में 1300 से ज्यादा लिवर ट्रांसप्लांट किए हैं। पाँच दिन के एक बच्चे का सफल लिवर प्रत्यारोपण करने के कारण उनका नाम गिनीज बुक ऑफ रिकार्ड्स में दर्ज हो चुका है। देश में स्प्लिट लिवर का,Auxilary लिवर का और बच्चों के सबसे ज्यादा लिवर ट्रांसप्लांट करने का रिकार्ड भी उन्हीं के नाम है। (ऊपर चित्र में डाक्टर रेला)

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