गुरुवार, 23 सितंबर 2010

दिल्ली और गुड़गांव में कल लिवर प्रत्यारोपण के दो असाधारण मामले सफल रहे

डॉक्टरों ने फैक्टर सात के शिकार छह माह के बच्चे को लिवर प्रत्यारोपित कर नई जिंदगी दी है। दिल्ली से सटे गुड़गांव स्थित मेदांता मेडीसिटी के डॉक्टरों का दावा है कि सबसे कम उम्र के बच्चे का लिवर प्रत्यारोपण करने की यह पूरी दुनिया में पहली घटना है। 25 डॉक्टरों की टीम को 12 घंटे तक प्रत्यारोपण के लिए मशक्कत करनी पड़ी। सर्जरी के बाद बच्चे का स्वास्थ्य तेजी से बेहतर हो रहा है और जल्द ही अस्पताल से छुट्टी दे दी जाएगी।
मुंबई निवासी बिजल जैन ने बताया कि उनका बेटा तविश पैदाइशी बीमार चल रहा था। कभी पेशाब में खून आता था तो कभी मल में खून आता था। मुंबई के डॉक्टरों को दिखाया लेकिन उसकी बीमारी का पता नहीं लग सका। इसके बाद उन्होंने मेदांता मेडीसिटी के डॉक्टरों से तविश के बारे में सलाह ली। मुख्य लिवर प्रत्यारोपण फिजिशियन और पीडियाट्रिक गैस्ट्रोइंटेरोलॉजी एंड हेपटोलॉजी डॉ. नीलम मोहन ने बताया कि तविश फैक्टर सात का शिकार था। फैक्टर सात लिवर में बनता है और शरीर में खून की स्थिति को संतुलित करता है। यानी खून को पतला और थक्का बनाता है लेकिन तविश में यह था ही नहीं। इससे खून कभी पेशाब में आता था कभी बे्रन में चला जाता था। यह समस्या पांच लाख बच्चों में से एक में होती है। ऐसे मरीजों का इलाज प्रत्यारोपण से ही संभव है इसलिए लिवर प्रत्यारोपण की सलाह माता पिता को दी गई। तविश की मां बिजल लिवर दान कर बच्चे की जिंदगी बचाने के लिए आगे आई लेकिन दुर्भाग्य से बिजल का लिवर फैटी था। इससे उसे एक माह तक अस्पताल में योग और संतुलित आहार देकर फैट को समाप्त करना पड़ा। लिवर प्रत्यारोपण सर्जन डॉ. एएस सोइन ने बताया कि एक तो कम उम्र, मात्र छह किलोग्राम वजन और फैक्टर सात की कमी से यह प्रत्यारोपण बहुत ही चुनौती भरा था। चीरा लगाने पर लगातार रक्त स्राव हो सकता था। लिवर इतना छोटा था कि निकालने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बच्चे की मां का मात्र 150 ग्राम लिवर काटकर प्रत्यारोपण किया गया। वहीं मेदांता मेडीसिटी के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक डॉ. नरेश त्रेहन ने बताया कि प्रत्यारोपण के इतिहास में यह ऐतिहासिक सफलता है। यह पूरी दुनिया को भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र की मजबूती का अहसास कराता है(अमर उजाला,दिल्ली,23.9.2010)। उधर,नई दुनिया ने सिमरन की रिपोर्ट दी है जिसकी उम्र महज नौ वर्ष है और उसका लीवर फेल हो चुका था। वह कोमा में थी। सर गंगाराम अस्पताल के डॉक्टरों की टीम उसकी सर्जरी को लेकर असमंजस में थे और चर्चा कर रही थी कि अचानक उसके शरीर में हरकत हुई। डॉक्टरों ने लीवर प्रत्यारोपण का फैसला कर लिया। नोएडा के एक निजी स्कूल में चौथी की छात्रा सिमरन के लीवर प्रत्यारोपण के लिए घर के सदस्यों ने सामूहिक रूप से धन इकठ्ठा किया और बाकी के रकम की पूर्ति अस्पताल ने छूट देकर पूरी कर दी। ऐसी ही जॉर्डन के कॉलेज की एक छात्रा के लीवर प्रत्यारोपण के लिए जर्मनी व इजिप्ट के डॉक्टरों ने मना कर दिया, लेकिन गंगाराम के डॉक्टरों की टीम ने उसे बचा लिया। पिडियाट्रिक हेपाटोलॉजिस्ट डॉ. निशांत वधवा के अनुसार सिमरन एक दम से शिथिल थी। उसे वेंटिलेटर पर रखा गया था। वह हिपाटिक फेलियर की स्थिति में थी। बिना लीवर प्रत्यारोपण के उसके ठीक होने की उम्मीद १० फीसदी से भी कम थी। सिमरन के मामा गगन ने अपने लीवर का हिस्सा दिया। सिमरन का लीवर मांस का लोथ़ड़ा बन चुका था। अब वह सामान्य बालिका की तरह स्कूल जा सकती है और अपने सारे काम कर सकती है। लीवर प्रत्यारोपण विभाग के निदेशक डॉ. विनय कुमारन ने जॉर्डन निवासी हनीन अबुशाकरा के बारे में बताया कि वह ऑटो इम्यून हैपेटाइटिस बीमारी की शिकार थी। वह इतनी कमजोर थी कि जर्मनी, इजिप्ट व टर्की के डॉक्टरों ने लीवर प्रत्यारोपण के लिए मना कर दिया। वह इतनी कमजोर हो चुकी थी कि फुसफुसाते हुए बोल पाती थी। बिना सहायता के वह बिस्तर पर भी जाने में असमर्थ थी। गंगाराम अस्पताल के डॉक्टरों ने प्रत्यारोपण का निर्णय लिया और अब वह स्वस्थ्य है। गंगाराम के चेयरमैन डॉ. बीके राव के अनुसार अस्पताल में लीवर प्रत्यारोपण के क्षेत्र में नई पद्घतियां अपनाई जा रही हैं। यहां की सफलता दर ९५ फीसदी तक है।

5 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी उपलब्धि है । लेकिन महंगा सौदा है ।

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  2. आप की रचना 24 सितम्बर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.
    http://charchamanch.blogspot.com


    आभार

    अनामिका

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  3. सवाल यही है कि ये महंगा सौदा कितने लोग उठाने में सक्षम हैं। खैर सफलता के लिए बधाई।

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  4. कल समाचार पत्र में पढ़ी थी ...अच्छी जानकारी देती पोस्ट

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