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शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

डेंगू का वायरस पद-प्रतिष्ठा-पैसा नहीं देखता

शीत ऋतु के आगमन से पूर्व लोगों के डेंगू के चपेट में आने की खबरें बीते वर्षों में भी आती रही हैं लेकिन इस वर्ष डेंगू की मारक-क्षमता का विस्तार हुआ है। देश के चार मुख्य महानगरों के अलावा डेंगू ने अब छोटे-बड़े शहरों के अलावा गांव-कस्बों को भी अपनी चपेट में लिया है। एक तो यह नया रोग है और दूसरे इसके बारे में आम लोगों को कम जानकारी है, वहीं इस रोग के लक्षण अन्य बीमारियों से मिलते-जुलते हैं। मीडिया में डेंगू की खबरें खूब तैर रही हैं लेकिन वह भी सनसनी की तरह। उसमें लक्षणों व इससे बचाव के तौर-तरीकों के बारे में विशेषज्ञों के हवाले से कम ही जानकारी दी जा रही है। पिछले दिनों बॉलीवुड के स्टार निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा की डेंगू से हुई मौत के बाद इसका भय ज्यादा बढ़ा। आम आदमी के मन में सवाल उत्पन्न हुआ कि इतने संपन्न व्यक्ति की मौत तमाम चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध होने के बाद भी हो सकती है तो आम आदमी की क्या बिसात है। लेकिन वास्तविकता यह है कि यदि इस रोग का समय रहते पता चल जाये और ठीक समय पर उपचार चालू हो जाये तो अमूल्य जीवन बचाये जा सकते हैं। विडंबना यही है कि सरकारें लोक कल्याणकारी दायित्वों के निर्वहन से बचने की कोशिशों में हैं और चिकित्सा कमाई का पेशा बनता जा रहा है जहां भयादोहन और जेब ढीली करने की प्रवृत्ति नज़र आती है। डेंगू के प्रसार का एक पहलू यह है कि यह साफ पानी में व घरों के भीतर भी पनपता है। दिल्ली में देखने में आया कि यह बीमारी झुग्गी-झोपडिय़ों के बजाय पॉश इलाकों में ज्यादा नज़र आई। हरियाणा में भी नये अमीरों के शहर गुडग़ांव में डेंगू के ज्यादा मामले प्रकाश में आये हैं। वास्तव में संपन्न लोगों के घरों में साफ पानी ठहरने की ज्यादा गुंजाइश होती है। 

वास्तव में डेंगू के मच्छर से बचाव और उपचार के लिए जो ठोस व आवश्यक जानकारी जनसाधारण को दी जानी चाहिए, वह नहीं दी जा रही है। चिकित्सा-तंत्र की लापरवाही व स्टीक इलाज का उपलब्ध न होना मरीजों की कतार बढ़ा रहा है। मरीजों की संख्या इतनी अधिक है कि कई मरीजों के लिए बेड तक उपलब्ध नहीं हैं। प्राइवेट अस्पतालों की तो दीवाली के पहले दीवाली मन रही है। देश में चिकित्सा-तंत्र की जो हालत है उसे देखकर तो यही लगता है कि डेंगू अपना जीवन-चक्र पूरा करके ही जायेगा। ऐसा बढ़ते मरीजों व मरने वालों की संख्या में इजाफे से निष्कर्ष निकाला जा रहा है। वास्तव में सरकारों की तरफ से यदि डेंगू के नियंत्रण के कारगर उपाय किये जाते तो हर साल नियमित रूप से डेंगू का प्रसार न होता। इस रोग से बचने के लिए सरकार के बाद सामाजिक जिम्मेदारी बढ़ जाती है। मौसम में ठंड का असर देखते ही हम एयर कूलरों का उपयोग तो बंद कर देते हैं लेकिन उसके पानी को नहीं हटाते, जो डेंगू मच्छर को पनपने का मौका देता है। इसी तरह अभिजात्य वर्ग के इलाकों में स्वीमिंग पूल, छोटे तालाब, खुली टंकियां, हौज तथा बगीचों में ठहरा साफ पानी डेंगू मच्छरों के लिए उर्वरा भूमि तैयार करता है। विडंबना यह है कि हमारे समाज में व्यक्तिवादी सोच हावी होती चली जा रही है। हम व्यक्तिगत हित के सामने सार्वजनिक हितों की तिलांजलि दे देते हैं। यही सोच डेंगू के मामले में भी है। लेकिन हर व्यक्ति को सोच लेना चाहिए कि उसके आंगन में पला डेंगू का मच्छर उसके घर में भी असर दिखा सकता है। 

वास्तव में आज सबसे बड़ी जरूरत डेंगू के वायरस के गुण-धर्म की पहचान व उसके तात्कालिक उपचार हेतु शोध किये जाने की है। चिकित्सा विशेषज्ञ बता रहे हैं कि डेंगू के वायरस में बदलाव महसूस किया जा रहा है। पिछले पखवाड़े में दिल्ली के विशेषज्ञों को डेंगू का नया स्ट्रेन दिखा है। इसके चलते शिकार मरीज की त्वचा, आंखों व शरीर के जोड़ अधिक प्रभावित नज़र आ रहे हैं। विशेषज्ञ कयास लगा रहे हैं कि इस वायरस की प्रकृति में बदलाव आया है अथवा इसके साथ कुछ अन्य वायरस मिल चुके हैं। इन लक्षणों ने चिकित्सा विशेषज्ञों को भी हैरत में डाला है। अधिक संख्या में मरीजों के आने तथा डेंगू की पुष्टि होने से बदलते लक्षणों की पुष्टि हो पाई। लेकिन दूसरी ओर मरीज इस रोग के लक्षणों को लेकर भ्रमित रहते हैं। त्वचा में बदलाव के कारण मरीज एलर्जी समझकर त्वचा विशेषज्ञ के पास, आई फ्लू के भ्रम में नेत्र चिकित्सक के पास तथा जोड़ों में दर्द की वजह से हड्डी विशेषज्ञों के पास जाते देखे गये। ऐसा इसलिए भी हुआ कि कई मामलों में जहां बुखार का असर कम देखा गया, वहीं उनके प्लेटलेट भी अधिक गिरे। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बार डेंगू ज्यादा मारक नहीं है। मरीज तीन से पांच दिन में ठीक हो रहे हैं। लेकिन पर्याप्त जानकारी व उपचार के बारे में सही सलाह न मिलने से मरीज दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। अत: केंद्र सरकार, राज्य सरकारों व चिकित्सा विशेषज्ञों का दायित्व बनता है कि इस रोग से बचाव व उपचार के बारे आम जनता को पर्याप्त जानकारी समय रहते दी जाये। इसके वायरस की रोकथाम के लिए गहन शोध व अनुसंधान की भी तत्काल आवश्यकता महसूस की जा रही है(संपादकीय,दैनिक ट्रिब्यून,25.10.12)।

 नोटःसंलग्न संपादकीय नेशनल दुनिया,दिल्ली,26.10.12 से।

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मंगलवार, 23 नवंबर 2010

अलीगढ़ःडेंगू की दवा के नाम पर ठगी

एलोपैथ में डेंगू से बचाव की कोई दवा है? डॉक्टरों से पूछिए तो यही बताएंगे कि अभी तक तो बनी नहीं। फिर भी, एक संस्था डेंगू की प्रिवेंटिव डोज देने के नाम पर लोगों का रजिस्ट्रेशन कर रही है, कार्ड बांट रही है और हर कार्ड पर दस रुपये वसूल रही है। अलीगढ़ और आसपास के जिलों में पिछले दो महीनों से मलेरिया और डेंगू का प्रकोप है। हजारों लोग इसकी चपेट में आ गए। 150 से ज्यादा मौतें हो गईं। जनता में डेंगू को लेकर ज्यादा भय है। इसी का फायदा उठाकर एक संस्था ने पब्लिक को लूटने का यह नायाब प्लान बनाया है। घर-घर जाकर विश्व उदय जन कल्याण सेवा संस्थान अलीगढ़ के नाम से टीकाकरण अभियान के लिए गत दिवस महेंद्र नगर, सासनी गेट आदि इलाकों में घर-घर जाकर लोगों के रजिस्ट्रेशन किए गए। हर रजिस्ट्रेशन पर दस रुपये वसूले गए। रजिस्ट्रेशन कराने वालों को बताया गया कि 23 नवंबर को हनुमान गली स्थित एक स्कूल में टीकाकरण शिविर लगाया जाएगा। टीके की फीस शिविर में ली जाएगी। कार्ड में वैक्सीन चार्ट भी दिया गया है। इसमें डेंगू चिकनगुनिया, हेपेटाइटिस-बी, दिमागी बुखार, टायफाइड, चिकन पॉक्स और स्वाइन फ्लू की वैक्सीन के रेट भी बताए गए हैं। ये 15 से लेकर 1200 रुपये तक हैं। कार्ड पर डब्ल्यूएचओ द्वारा प्रमाणित वैक्सीन का जिक्र भी किया गया है। इस कार्ड में संस्थान ने अपने ऑफिस का पता और चार मोबाइल नंबर भी दिए हैं। नियमों के तहत, सीएमओ की अनुमति के बिना कोई भी संस्था टीकाकरण शिविर नहीं लगा सकती। साथ ही, शिविर में इस्तेमाल होने वाली दवाओं का स्वास्थ विभाग में पहले परीक्षण होता है, लेकिन इस शिविर के लिए न तो कोई अनुमति ली गई है, न ही इस्तेमाल होने वाली वैक्सीन की जांच कराई गई है। इस बारे में बात करने पर सीएमओ उमाकांत गुप्ता ने कहा, डेंगू के नाम पर लोगों को गुमराह किया जा रहा है। यह लोगों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ है। इस शिविर के लिए न तो कोई अनुमति ली गई है, न ही अनुमति दी जा सकती है। थाने में इस मामले की रिपोर्ट दर्ज कराई जाएगी। वहीं, जिलाधिकारी के. रविन्द्र नायक ने कहा, पब्लिक सावधान रहे यह गंभीर मामला है। जनस्वास्थ्य के साथ इस तरह का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जांच कराई जाएगी और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी(राजीव शर्मा,दैनिक जागरण,अलीगढ़,23.11.2010)।

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शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

डेंगू के डंक को ज़हरीला बनाती दवाएँ

इस साल राजधानी दिल्ली व उसके आसपास जम कर बरसे बादल। कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी के चलते दिल्ली और उसके आसपास जम कर जल-भराव भी खूब हुआ। जाहिर है कि यह मच्छरों के लिए माकूल माहौल भी था- ठहरा हुआ साफ पानी, बारिश के बाद अचानक नमी-भरी गर्मी और घनी आबादी। डेंगू का असर दिखना शुरू हो गया है। दिल्ली और करीबी इलाकों में औसतन हर रोज दो मौतें डेंगू के कारण हो रही हैं। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही चेता चुका था कि इस साल दिल्ली में डेंगू महामारी बन सकता है। स्थानीय प्रशासन विभाग इंतजार कर रहा है कि कुछ ठंड पड़े तो समस्या अपने आप खत्म हो जाएगी। अखबारों व विभिन्न प्रचार माध्यम भले ही खूब विज्ञापन दिखा रहे हों, लेकिन राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के हर शहर-गांव, कॉलोनी में डेंगू के मरीजों की बाढ़ अस्पतालों की ओर आ रही है। गाजियाबाद जैसे जिलों के अस्पताल तो बुखार-पीड़ितों से पटे पड़े हैं। अब तो इतना खौफ है कि साधारण बुखार का मरीज भी बीस-पच्चीस हजार रुपए दिए बगैर अस्पताल से बाहर नहीं आता है। डॉक्टर जो दवाएं दे रहे हैं उनका असर भगवान-भरोसे है। डेंगू के मच्छरों से निबटने के लिए दी जा रही दवाएं उलटे उन मच्छरों को ताकतवर बना रही हैं।
डेंगू फैलाने वाले "एडिस" मच्छर सन १९५३ में अफ्रीका से भारत आए थे। उस समय कोई साढ़े सात करोड़ लोगों को मलेरिया वाला डेंगू हुआ था, जिससे हजारों मौतें हुई थीं। अफ्रीका में इस बुखार को डेंगी कहते हैं। हर साल करोड़ों रुपए के डीडीटी, बीएचसी, गेमैक्सिन, वीटेकस और वेटनोवेट पाउडर का छिड़काव हर मुहल्ले में हो रहा है, ताकि डेगू फैलाने वाले मच्छर न पनप सकें लेकिन मच्छर इन दवाओं को खा-खा कर और अधिक खतरनाक हो चुके हैं। यदि किसी कीट को एक ही दवा लगातार दी जाए तो वह कुछ ही दिनों में स्वयं को उसके अनुरूप ढाल लेता है। भले ही देश के मच्छरों ने अपनी खुराक बदल दी हो लेकिन अभी भी हमारा स्वास्थ्य -तंत्र " क्लोरिन" पर ही निर्भर है। हालांकि यह नए किस्म के मलेरिया यानी डेंगू पर पूरी तरह अप्रभावी है। डेंगू के इलाज में "प्राइमाक्वीन" कुछ हद तक सटीक है लेकिन इसका इस्तेमाल तभी संभव है, जब रोगी के शरीर में "जी-६ पी.डी." नामक एंजाइम की कमी न हो। यह दवा रोगी के यकृत में मौजूद परजीवियों का सफाया कर देती है। इसके अलावा "क्वीनाइन" नामक एक महंगी दवा भी उपलब्ध है, लेकिन इसकी कीमत आम मरीज की पहुंच के बाहर है। कुल मिला कर मच्छर और उससे फैल रहे रोगों से निबटने की सरकारी रणनीति ही दोषपूर्ण है। हम मच्छर को पनपने दे रहे हैं, फिर उसे मारने के लिए दवा तलाश रहे हैं जबकि जरूरत है मच्छरों की पैदावार रोकना(पंकज चतुर्वेदी,नई दुनिया,12.11.2010)।

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शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

दोबारा भी हो सकता है डेंगू

डेंगू से उबर चुके लोगों को यह नहीं सोचना चाहिए कि उन्हें दोबारा यह बुखार नहीं आएगा। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाने की वजह से डेंगू का वायरस पुन: लौट सकता है। चिकित्सकों ने यह चेतावनी दी है। देश की राजधानी में करीब 4,600 से अधिक लोगों को अपनी गिरफ्त में ले चुके डेंगू के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ग्लोबल अस्पताल के डॉ. वी.के. गोयल कहते हैं, डेंगू संक्रामक बुखार नहीं है। यह मच्छर के काटने पर ही होता है। वायरस के संक्रमण के बाद औसतन 4 से 6 दिन में डेंगू के लक्षण उभरते हैं और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित हो जाती है। राजधानी के डॉ. प्रदीप सेठ कहते हैं, डेंगू के चार प्रकार होते हैं। अगर किसी व्यक्ति को किसी भी एक प्रकार का डेंगू हुआ है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसे दूसरे प्रकार का डेंगू नहीं हो सकता। वह कहते हैं, इस बीमारी में डेंगू हैमरेजिक शॉक सिंड्रोम (डीएचएसएस) सर्वाधिक खतरनाक स्थिति होती है, जिसमें तेज बुखार के साथ आघात होता है, रक्तचाप कम हो जाता है और रक्तस्राव के लक्षण उभरने लगते हैं।मच्छर की एक प्रजाति एडीज एजिप्ति डेंगू के वायरस की वाहक है। यह मच्छर दिन में काटता है क्योंकि सूर्य की रोशनी में यह अधिक सक्रिय होता है। डॉ. सेठ के अनुसार, डेंगू के संक्रमण से रक्त वाहिनियों की दीवार कमजोर हो जाती है और विभिन्न अंगों में प्लाजमा का रिसाव होने लगता है। इस बीमारी में प्लेटलेट्स का उत्पादन घट जाता है। रक्त का थक्का बनाने के लिए प्लेटलेट्स जरूरी होते हैं। डॉ. गोयल कहते हैं यह बुखार करीब सात दिन तक रहता है और इस दौरान मरीज को शरीर में तेज दर्द होता है। इसीलिए इसे बोन ब्रेकिंग फीवर कहा जाता है। लेकिन डेंगू हेमरेजिक फीवर ज्यादा खतरनाक होता है। जिन मरीजों को डेंगू हो चुका है उन्हें डेंगू हेमरेजिक फीवर की आशंका होती है। डब्ल्यूएचओ की महानिदेशक डॉ. मार्गरेट चान की मानें तो डेंगू वायरस से होने वाली और तेजी से फैलने वाली बीमारी है जिसका सर्वाधिक असर गरीबों, खास कर शहरी आबादी पर पड़ रहा है(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,23.10.2010)।

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शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

डेंगू की पहचान 14 घंटे में

रोजाना बढ़ रहे डेंगू के मामलों के बीच एक राहत भरी खबर है। अब इसके मरीज और उनका इलाज कर रहे डॉक्टर पांच से छह दिन तक अंधेरे में नहीं रहेंगे। बल्कि संक्रमण के 14 घंटे के अंदर लिए गए नमूने में भी इसके वायरस आसानी से पकड़ में आ जाएंगे। पुणे स्थित राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (एनआईवी) की मदद से अब प्रमुख सरकारी अस्पतालों में रीयल टाइम पीसीआर (पॉलीमरेज चेन रिएक्शन) तकनीक से इन मामलों की जांच की जा सकेगी। प्रारंभिक चरण के तौर पर दिल्ली के कुछ सरकारी अस्पतालों में इसे शुरू कर दिया गया है। जल्दी ही इसे व्यापक स्तर पर उपलब्ध करवाया जाएगा। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक विश्व मोहन कटोच बताते हैं कि यह जांच अब तक की सबसे सटीक और संवेदनशील जांच है। डेंगू के इसी मौसम में इसे व्यापक स्तर पर शुरू कर दिया जाना है। कोशिश है कि दिल्ली के बाद देश भर से ऐसे नमूनों की रीयल टाइम पीसीआर जांच उपलब्ध हो सके। इस समय लिए जा रहे नमूने दिल्ली स्थित राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) की केंद्रीय प्रयोगशाला भेजे जा रहे हैं। एनसीडीसी की एक वरिष्ठ चिकित्सा वैज्ञानिक बताती हैं कि अब तक डेंगू का पता लगाने के लिए आम तौर पर एलिजा जांच का ही सहारा लिया जाता रहा है। लेकिन इस जांच के जरिए शुरुआती पांच से छह दिन तक इसके संक्रमण का पता नहीं लग पता। जबकि रीयल टाइम पीसीआर के जरिए डेंगू के सभी चारों सीरोटाइप का सटीक पता बहुत जल्दी लग जाता है। अब एनसीडीसी में नमूने आने के आठ घंटे के अंदर इसके नतीजे हासिल किए जा सकते हैं। डेंगू के मामलों में उसके डॉक्टरी परीक्षण के साथ ही वायरस विशेष के एंटीबॉडी की पहचान भी जरूरी होती है। इसलिए जांच की यह तकनीक सुलभ होने के बाद डेंगू का कहर निश्चित तौर पर बहुत हद तक काबू में होगा। जानकार बताते हैं कि बुखार के सभी मामलों में पहले 14 घंटे के अंदर नमूनों को रीयल टाइम पीसीआर जांच के लिए भेजे जाने की जरूरत नहीं होगी। लेकिन कुछ मरीज ऐसे होते हैं, जिनमें डेंगू का पता देर से लगने पर इलाज बहुत मुश्किल हो जाता है(मुकेश केजरीवाल,दैनिक जागरण,दिल्ली,24.9.2010)।

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बुधवार, 15 सितंबर 2010

मच्छरों से ज़रा बच के

बरसात के साथ ही डेंगू और मलेरिया का आतंक बढ़ गया है। महानगरों के अस्पतालों में डेंगू के मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। शोध बताते हैं कि गत कुछ वर्षो से मच्छरों से होने वाले रोगों में इजाफा हुआ है जबकि शासन के पास उन्हें रोकने का कोई कारगर उपाय सामने नहीं आ पाया है। मानवीय लापरवाही और शहरी गंदगी के कारण ये रोग हो रहे हैं। तो क्या है उपाय? कैसे बचें? प्रस्तुत है मुकम्मल जानकारी:

जैसे-जैसे मनुष्य ने मच्छरजनित रोगों पर काबू पाने के उपाय किए हैं, वैसे-वैसे मच्छर भी दिनोंदिन बलशाली होता जा रहा है। उसने तमाम मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रमों को धता बताते हुए ‘न मच्छर रहेंगे, न मलेरिया’ जैसे मानवीय दावों की हवा निकाल दी है। मलेरिया के अलावा कुछ और रोग भी बेबस मनुष्य की झोली में मच्छर ने डाल दिए हैं।

मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों के बढ़ते प्रकोप को रोकने के उपाय किए गए तो खबर आई कि चिकनगुनिया का मच्छर तो साफ पानी में पाया जाता है और रात में नहीं दिन में काटता है। तब इनसे बचाव के भी कई उपाय सामने आए अगरबत्ती, टिकिया, लोशन, मगर मच्छर का मुकाबला पूरी तरह हो नहीं पाया।

दवा खा कर पहले मरा पर बाद में मच्छर फिर से खून पी-पी कर इतना ताकतवर हो गया कि मलेरिया की कारगर क्लोरोक्वीन जैसी दवाएं नाकारा कर दीं। दो मिलीग्राम से भी कम भार वाले इस खतरनाक जीव ने आज भी मनुष्य का जीना दूभर कर रखा है। दुनियाभर में सबसे खतरनाक जीव नन्हा मच्छर करोड़ों को काट कर रोगी बना रहा है।

मोटे तौर पर देखा जाए तो रोगों का वाहक मच्छर गंदगी में पनपता है। देश में आज भी बड़े भाग में शौचालय की सुविधाएं विशेषकर उसके निकास के तरीके उचित नहीं हैं जो गंदगी फैलाते हैं। वहीं दूसरी ओर खुले गटर, गड्ढे पानी भरी होदियां, नालियां सब कुछ खुला है और गंद लाता है। उस पर शहरों में कूलर, पानी की खुली टंकियां, टायर जैसा अन्य कबाड़ मच्छरों के इस परिवार को बढ़ाता है। यह सब कुछ बस्तियों के पास और घर के अंदर भी है, तो भला मच्छर क्यों न पनपें और रोग क्यों न फैले।

वैज्ञानिक रॉनल्ड रॉस ने जब पहली बार यह बात उजागर की कि मलेरिया फैलाने के पीछे केवल मादा मच्छर का डंक है तो लोगों को हैरानी हुई थी। तब और शोध सामने आए पता चला कि मच्छर तो निमित्त मात्र है, वह केवल वाहक है। मलेरिया का दोषी तो कोई और ही है जो उसको और मनुष्य को अपना ठिकाना बनाए हुए है। मच्छर ने जब स्वस्थ मनुष्य को काटा तो यह आराम से उसके खून में उतर गया और अपना कहर दिखा गया। इसके बाद जब किसी रोगी को मच्छर ने काटा तो फिर परजीवी मच्छर के अंदर जा पहुंचा। इस तरह से मच्छर और मनुष्य के बीच दूषित रक्त का आदान-प्रदान होता रहा और आराम से रोग बढ़ता-फैलता रहा। इस परजीवी की चार प्रजातियां हैं, प्लाज्मो-डिपम वाईवेक्स, प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम, प्लाज्मोडियम मलेरियाई और प्लाज्मोडियम ओवेल।

इनमें वाइवेस्ट्रा आम है जबकि फाल्सीपेरम सबसे ज्यादा खतरनाक है जो सीधे मस्तिष्क को प्रभावित करता है। इसके अलावा, यह यकृत, गुर्दे और आंतों के अलावा लाल रक्त कोशिकाओं को भी बरबाद कर डालता है। ज्यों ही परजीवी मानव शरीर में पहुंचता है, वह अपना प्रभाव तेजी से बढ़ाने लगता है। आमतौर पर इसका ठिकाना लिवर यानी यकृत होता है। इसके बाद यह लाल रक्त कोशिकाओं में घुस जाता है और उन्हें प्रभावित करता है। इसकी शुरुआत होते ही शरीर का तापमान बढ़ता चला जाता है। भरी गर्मी में भी ठण्ड लगती है और कंपकंपी आती है। इस कारण तेज सिरदर्द होता है और उल्टियां आती हैं। यह सब कुछ दस से पन्द्रह दिन तक चलता है। अगर खून की जांच कर रोग पकड़ में आ जाए तो तत्काल इसका उपचार किया जाना चाहिए।

सेरेब्रल मलेरिया जो मस्तिष्क को सीधा प्रभावित करता है और भी गंभीर स्थिति पैदा करता है। चिकित्सकों का कहना है कि अगर दो तीन दिन के अंदर रोग काबू में न आए तो बेहोशी के साथ मृत्यु तक हो जाती है। बच्चों में तो इसका प्रभाव और भी गंभीर होता है। तेज बुखार उनमें ऐंठन पैदा कर उन्हें मनोरोगी बना देता है। अगर जल्द ही दवा का असर हो जाए और बुखार उतर जाए तो रोग काबू में आ जाता है और जान बच जाती है।

आमतौर पर इससे बचाव की सलाह दी जाती है यानी पहली दशा में तो मच्छरों के प्रजनन को रोकने की बात। दूसरी सलाह होती है मच्छरदानी लगा कर सोने की ताकि मच्छर काट ही न पाएं। तीसरा है लोशन या मच्छर भगाऊ या मच्छर मार दवाओं का प्रयोग और अगर मलेरिया हो जाए तो तत्काल डॉक्टर की सलाह और कड़वी कुनैन, क्लोरोक्वीन जैसी दवाओं का प्रयोग। मगर दुखद पहलू यह भी है कि आज मच्छर और परजीवी दोनों पर दवाएं बेअसर भी साबित हो रही हैं।

मच्छरों का यह कहर वर्षो से चला आ रहा है। लाख कोशिशों के बाद भी मच्छर वही है, मनुष्य भी और रोग भी वही है, बल्कि रोग है कि महामारी बन रहे हैं। इनसे निबटने के लिए शोध कार्य भी लगातार चल रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि कोई कारगर समाधान भी सामने आएगा जो लोगों को मच्छरजनित रोगों और मौत से बचाने में पूरी तरह कारगर सिद्ध होने वाला होगा।

डेंगू बुखार मच्छर की ही देन डेंगू बुखार भी है। इससे प्रभावित रोगी को रोज बुखार आता है, तेज सिरदर्द होता है, इसके अलावा, आंखों और मांसपेशियों में असहनीय पीड़ा होती है। यही नहीं, रोगी के शरीर पर जगह-जगह लाल चकत्ते बनने लगते हैं। रोगी का जी मिचलाता है और लगातार उलटी आती है। गंभीर दशा में संक्रमण फेफड़ों में जा पहुंचता है, साथ ही रक्त परिभ्रमण व्यवस्था लड़खड़ाने लगती है।

रक्तचाप तेजी से गिरने लगता है और बेहोशी आती है। ऐसे में अगर रक्त कोशिकाओं की संख्या घटने लगती है तो जिंदगी खतरे में पड़ जाती है। हमारे स्वस्थ शरीर में औसतन डेढ़ से चार लाख तक प्लेटलैट्स होती हैं जब यह संख्या घटते घटते 30,000 जा पहुंचती है तो खतरे की स्थिति हो जाती है, तब बाहर से प्लेटलैट्स पहुंचाना जरूरी हो जाता है।

पानी में है डेंगू से राहत डेंगू की कोई कारगर दवा अभी तक सामने नहीं आई है, इसलिए रोग का सहयोगी उपचार किया जाता है। चिकित्सकीय सलाह है कि चूंकि इसके संक्रमण से शरीर में तेजी से पानी की कमी होने लगती है, इसलिए रोगी को खूब पानी पिलाना चाहिए। भले ही कोई कारगर दवा न हो, मगर जो भी है उससे रोग पर काबू पाना संभव है।

डेंगू बुखार एडीज़ इजिप्टी मच्छरों के काटे जाने से फैलने वाली वाइरल डिजीज़ है। ये मच्छर इनसानी बस्तियों में खुले और साफ पानी में पैदा होते हैं, जैसे कि बगैर ढक्कन वाली टंकियां, टूटे फूटे सामान, कबाड़ और पुराने और बेकार पड़े टायरों में भरा पानी। ये मच्छर दिन के समय काटते हैं।

खासकर सुबह और शाम व रात होने से पहले के कुछ घंटे इनके काटने का समय है। डेंगू फैलाने वाले चार वाइरस- डेन वन, डेन टू, डेन थ्री और डेन फोर इम्युनोलॉजी के लिहाज से आपस में संबंधित हैं, लेकिन एक दूसरे के प्रति क्रॉस प्रोटेक्शन की इम्युनिटी नहीं देते। दुनिया की करीब ढाई अरब आबादी इस बीमारी की आशंका वाले इलाकों में रहती है।

बचाव में ही सुरक्षा डेंगू से बचाव के लिए कोई सटीक टीका उपलब्ध नहीं है। इसलिए जहां तक हो सके मच्छर के काटने से खुद को बचा कर रखें। - शरीर का कोई अंग खुला न छोड़ें। पूरी बाजू के कपड़े पहनें। - मच्छर मारने वाली दवा का प्रयोग करें। डेंगू होने पर बुखार को काबू में करने के लिए डॉक्टर एसिटामिनोफेन देते हैं। - डेंगू में एस्पिरिन और आइबूप्रोफेन नहीं लेना चाहिए। खासकर बच्चों को तो एस्पिरिन बिलकुल नहीं देनी चाहिए। - डेंगू के मरीज़ को भरपूर आराम करना चाहिए और तरल पदार्थो का सेवन करना चाहिए। - डेंगू बिगड़ने पर मरीज को बुखार के साथ-साथ तेज पेट दर्द होता है। - डेंगू बुखार में शरीर के रक्त में तेजी से प्लेटलेट्स का स्तर कम होता है, इसलिए बुखार में भूल कर भी एस्प्रीन दवाएं, डिस्प्रीन या फिर क्रोसिन नहीं देनी चाहिए, जबकि पैरासिटामोल का सेवन बुखार में सुधार ला सकता है। -जरूरी नहीं हर तरह के डेंगू में प्लेटलेट्स चढ़ाए जाएं, केवल हैमरेजिक और शॉक सिंड्रोम डेंगू में प्लेटलेट्स की अनिवार्यता बताई गई है, जबकि साधारण डेंगू में जरूरी दवाएं काम करती हैं। - लगातार उल्टियां और चिड़चिड़ापन, सुस्ती और विभ्रम जैसी मानसिक परेशानियां भी हो सकती हैं। - ऐसे में मरीज को तुरंत अस्पताल में भर्ती करके ग्लूकोज चढ़ाना ज़रूरी हो जाता है।

डेंगू मरीजों का खान-पान डेंगू के मरीजों को प्लेटलेट्स बढ़ाने के लिए डाइट में लिक्विड की मात्र ज्यादा रखनी चाहिए। लिक्विड में सबसे ज्यादा मात्र जूस की होनी चाहिए। हालांकि लस्सी, दूध, नारियल पानी, वेजिटेबल सूप, मट्ठा वगैरह भी डेंगू के मरीजों के लिए बेहतर है। बैलेंस्ड डाइट के अलावा उन्हें एक दिन में कम से कम तीन लीटर तक तरल पदार्थ का सेवन करना चाहिए। डॉ. माला मनराल (डायटीशियन), अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली

(हिंदुस्तान,दिल्ली,14.9.2010)


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शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

दून में लगेगा प्लेटलेट्स सेपरेटर

दून अस्पताल में पुराने प्लेटलेट्स सेपरेटर के स्थान पर नया प्लेटलेट्स सेपरेटर लगाया जाएगा। इसके लिए कार्रवाई शुरू हो गई है। दरअसल, डेंगू के लिहाज से प्लेटलेट्स सेपरेटर का अपना महत्व है। दून अस्पताल के ब्लड बैंक में लगी प्लेटलेट्स सेपरेटर मशीन लगभग एक सप्ताह से खराब पड़ी है। बीते रोज मीडिया में इस मशीन के खराब होने संबंधी खबरें आई तो उत्तरांचल एड्स कंट्रोल सोसाइटी (यूसैक्स) हरकत में आई। संयुक्त निदेशक डॉ.मीनाक्षी उनियाल के अनुसार मामला उनके संज्ञान में है। इसी क्रम में गत दिनों नए प्लेटलेट्स खरीदने के लिए प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई थी। बहुत संभव है कि आगामी दस बारह दिन में नई प्लेटलेट्स सेपरेटर मशीन दून चिकित्सालय में उपलब्ध करा दी जाए। उनके मुताबिक फिलहाल दून अस्पताल से कहा गया है कि यदि प्लेटलेट्स सेपरेट करने के बाद उसकी स्टोरेज में कोई दिक्कत आ रही है तो इसमें आईएमए ब्लड बैंक का भी सहयोग लिया जा सकता है। बता दें कि अस्पताल में अभी रोजाना के लिहाज से तो प्लेटलेट्स बनाने का काम चल रहा है, लेकिन इसकी स्टोरेज में परेशानी आ रही है। अस्पतालों को रखना होगा रेकॉर्ड सरकारी व गैर सरकारी अस्पतालों को ओपीडी में आने वाले मरीजों का पूरा-पूरा ब्योरा रखना होगा। जिला मलेरिया अधिकारी जगदीश प्रसाद बहुगुणा के मुताबिक सभी अस्पतालों को पत्र जारी कर निर्देशित किया गया है कि यदि डेंगू या मलेरिया का संभावित मरीज आता है तो उसका पूरा ब्योरा यानी आवासीय पते के अलावा वह कहां से आया, इलाके में किसी और की तबीयत तो खराब नहीं, इस सब का रेकॉर्ड रखा जाए। काबिलेगौर है कि दैनिक जागरण ने गुरुवार को डेंगू संबंधी समाचार में इस लापरवाही को उजागर किया था, जिसके बाद हरकत में आते हुए विभाग ने यह कदम उठाया है(दैनिक जागरण,देहरादून,10.9.2010)

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शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

‘यूनिवर्सल डोनर’ नहीं आ रहे डेंगू मरीजों के काम

अस्पतालों में प्लेटलेट्स की कमी के चलते डेंगू मरीजों की परेशानी बढ़ी
अगर आप ओ-पॉजिटिव रक्तदाता हैं और डेंगू के शिकार अन्य किसी ब्लड ग्रुप के मरीज को रक्त देना चाहते हैं तो यह संभव नहीं है । डेंगू में प्रयोग किए जाने वाली प्लेटलेट्स की जरूरत ने यूनिवर्सल डोनर की धारणा को भी खारिज कर दिया है । ओ-पॉजिटिव रक्तदाता के रक्त का प्रयोग आरबीसी (लाल रक्त कणिकाएं) या फिर प्लाज्मा के लिए अधिक किया जाता है , जबकि प्लेटलेट्स में एंटीजिन और एसडीपीसी की जांच के बाद ही प्लेटलेट्स चढ़ाया जाता है । इसी कारण डेंगू में रक्त देने के लिए आने वाले 60 फीसदी ओ-पॉजिटिव ग्रुप के रक्तदाताओं के रक्त को अयोग्य साबित कर दिया गया है। मैक्स अस्पताल की इंटरनल मेडिसन विभाग की डॉ. सुप्रिया बाली ने बताया कि ओ-पॉजिटिव रक्तदाता के रक्त का प्रयोग अन्य सामान्य बीमारियों के लिए किया जा सकता है । लेकिन डेंगू में खून से प्लेटलेट्स को लिया जाता है , इसलिए खून की अन्य जांच के बाद एसडीपीसी (सिंगल डोनर प्लेटलेट्स काउंट ) को प्रमुख माना गया है । इस संदर्भ में हमेशा ओ-पॉजिटिव रक्तदाता काम नहीं आ पाते। यही कारण है कि डेंगू पॉजिटिव मरीजों के लिए बाजार से प्लेटलेट्स लेना या फिर अन्य डोनर जुटाना प्रमुख समस्या बन रहा है । रोटरी ब्लड बैंक के डॉ. एनके भाटिया कहते हैं कि ओ-पॉजिटिव रक्तदाता के रक्त के प्लाज्मा में ए-एंटीजिन पाया जाता है , यदि मरीज ओ-पॉजिटिव ब्लड ग्रुप का है तो उसे ओ-पॉजिटिव रक्तदाता का प्लेटलेट्स दिया जा सकता है(निशि भाट,हिंदुस्तान,दिल्ली,3.9.2010) ।

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बुधवार, 25 अगस्त 2010

डेंगू,मलेरिया और स्वाइन फ्लू

बारिश के साथ डेंगू का खतरा भी चार गुना बढ़ गया है। राजधानी सहित अन्य शहरों से डेंगू के साथ मलेरिया के मरीजों की भी सूचना मिल रही है। चिकित्सकीय भाषा में हालांकि डेंगू के लिए अभी तक कोई इलाज स्वीकृत नहीं किया गया है। इसके बावजूद कुछ साधारण सावधानियां इस्तेमाल कर बीमारी से बचा जा सकता है, जिसमें प्रमुख रूप से बुखार होने पर एस्प्रिन दवाओं का सेवन न करना माना गया है। इसके साथ ही साफ पानी के जमा न होने पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए।

डेंगू बुखार : मादा एडीस मच्छर के काटने का असर डेंगू बुखार के रूप में सामने आता है। डेंगू को मुख्य रूप से तीन प्रकार में विभाजित किया जा सकता है, जिसमें साधारण डेगू, हैमरेजिक और शॉक सिंड्रोम डेंगू प्रमुख हैं। रक्त में संक्रमण होने से पांच से छह दिन के अंदर यह बुखार अपना असर दिखाना शुरू करता है।

साधारण डेंगू -अचानक तेज बुखार के साथ सिर में दर्द। -मांसपेशियों के साथ जोड़ों में तेज खिंचाव व दर्द होना। -अत्यधिक कमजोरी का महसूस होना, भूख न लगना। -मुंह के लार्वा प्रभावित होने से स्वाद खत्म होना। -पेट में असहनीय दर्द का अनुभव होना, बिना किसी कारण -गला सूखने का एहसास होना, उपरोक्त के साथ शरीर में लाल व गुलाबी रंग के चकत्तों का बनना साधारण डेंगू के लक्षण हैं।

डेंगू हैमरेजिक फीवर नाक, मुंह व दांतों में रक्तस्राव के साथ तेज बुखार होना डेंगू हैमरेजिक बुखार के लक्षण हैं, इसमें मरीज के बुखार का स्तर 105 डिग्री फारेनहाइट तक भी जा सकता है, जिसका सीधा असर मस्तिष्क पर भी पड़ता है। डीएचएस पॉजीटिव जांच के बाद मरीज को प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत होती है।

डेंगू शॉक सिंड्रोम डेंगू की गंभीर व तीसरी अवस्था को डेंगू शॉक सिंड्रोम कहा जाता है, जिसके तेज कंपकंपाहट के साथ मरीज को पसीने आते हैं। इस अवस्था में इलाज की देरी मरीज की जान ले सकती है। शॉक सिंड्रोम की स्थिति आने तक मरीज के शरीर पर लाल चकत्ते के दाग स्थाई हो जाते हैं, जिनमें खुजली भी होने लगती है।

क्या बरतें सावधानी -मादा एनाफिलिज मच्छर का म्यूटेशन (प्रजनन) क्योंकि साफ पानी में ही होता है, इसलिए घर के किसी भी कोने या बर्तन में साफ पानी को जमा न होने दें, इससे एक से दो दिन के बीच में ही मच्छर पनपने लगते हैं। -साफ पानी में मच्छरों के पैदा होने से बचाव के लिए गंबूश मछली या फिर कुनैन टैबलेट्स का प्रयोग किया जा सकता है। गंबूश मछलियां एडीस के लार्वा को खा जाती हैं।

-मादा मच्छर क्योंकि दिन में ही काटता है, इसलिए दोपहर में मच्छरों से बचाव पर पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए।

और जरूरी एहतियात -डेंगू बुखार में शरीर के रक्त में तेजी से प्लेटलेट्स का स्तर कम होता है, इसलिए बुखार में भूल कर भी एस्प्रीन दवाएं, डिस्प्रीन या फिर क्रोसिन नहीं देनी चाहिए, जबकि पैरासिटामोल का सेवन बुखार में सुधार ला सकता है।

-जरूरी नहीं हर तरह के डेंगू में प्लेटलेट्स चढ़ाए जाएं, केवल हैमरेजिक और शॉक सिंड्रोम डेंगू में प्लेटलेट्स की अनिवार्यता बताई गई है, जबकि साधारण डेंगू में जरूरी दवाओं के साथ मरीज को ठीक किया जा सकता है। इस दौरान ताजे फलों का जूस व द्रव्य चीजों का अधिक सेवन तेजी से स्थिति में सुधार ला सकता है।

मलेरिया मानसून की आम बीमारियों में दूसरा नाम मलेरिया का है। चालीस से पचास प्रतिशत मलेरिया का कारण प्लाज्मोडियम फैलसिपेरम को माना जाता है। मादा मच्छर एनाफिलीज के काटने से प्लाज्मोडियम मरीज की लाल रक्त कणिकाओं को तेजी से प्रभावित करता है। रक्त में पहुंच कर प्लाज्मोडियम 12 से 24 घंटे के बीच तेजी से सेल्स को प्रभावित करना शुरू कर देता है, जिसका असर थकान, तेज बुखार और नाक बहने के रूप में सामने आता है। बरसात के ठहरे हुए पानी को मादा एनाफिलीज की ब्रीडिंग के लिए सटीक माना जाता है।

लक्षण -श्वांस लेने में तकलीफ होना, तेजी से नाक का बहना। -बुखार का रुक-रुक कर आना, शरीर में कंपकंपाहट महसूस होना। -भूख का निरंतर कम होना व कमजोरी का बने रहना। -पेट में असहनीय दर्द होना आदि मलेरिया के प्रमुख लक्षण हैं।

जांच सिवियर और साधारण मलेरिया जांच के लिए रैपिड टैस्ट जांच को जरूरी बताया गया है, जिसमें रक्त में फैलसिपेरम प्लाज्मोडियम की उपस्थिति को आरबीसी के आधार पर गिना जाता है। हालांकि पीसीआर (पॉलिमेरेज चेन रिएक्शन) टेस्ट को भी सही माना जाता है।

क्लीनिकल बदलाव -केएफटी (किडनी फंक्शनिंग टेस्ट) में सीरम क्रेटाइन व ब्लूरूबिन का 3एमजी/डीएल से कम होना। -सिवियर एनेमिक पाया जाना, जिसमें रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्र 5 डीएल/एमजी से कम पाया जाना। -एक्यूट रेस्पायरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम जांच का पॉजिटिव आना। -हाइपोग्लीसीमिया की स्थिति, जिसमें प्लाज्मा ग्लूकोज की स्थिति 40एजी/डीएल से अधिक पाया जाना। -रक्तचाप वयस्क में 80 एमएमएचजी से अधिक होना तथा बच्चों में 70 एमएम एचजी से अधिक पाया जाना गंभीर अवस्था का लक्षण है।

इलाज साधारण मलेरिया में हालांकि क्लोरोक्वीनिन दवाई को जांच पॉजिटिव आने के बाद दिया जाता है, लेकिन वर्ष 2008 में मलेरिया अनुसंधान संस्थान द्वारा मलेरिया की वैक्सीन को भी लांच किया गया। क्लोरोक्वीन दवाई हालांकि फैलसिपेरम प्लाज्मोडियम ‘पी’ में अधिक कारगर नहीं मानी गई। इसलिए दवा से पहले मलेरिया प्लाज्मोडियम की जांच जरूरी है।

(उपरोक्त जानकारी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के कम्यूनिटी मेडिसन विभाग के डॉ. बीर सिंह और गैस्ट्रोइंटोलॉजिस्ट डॉ. अमिताभ यादव द्वारा दी गई। )

क्या हो इस मौसम का आहार -तापमान में गिरावट के साथ ही विशेषज्ञ विटामिन सी को खाने में प्रमुखता की सलाह देते हैं, जिसके लिए आंवला व नीबू के साथ ही विटामिन सी की दवाओं को भी शामिल किया जा सकता है।

-बारिश के साथ मौसम में आद्रता के बने रहने से शरीर में पानी की कमी हो सकती है, इसके लिए फलो के ताजे जूस को भोजन में शामिल किया जाना जरूरी है।

-साधारण भोजन के अलावा मानसून में 200 से 300 कैलोरी इंटेक किया जा सकता है, हालांकि इसके साथ ही शारीरिक श्रम को अनुपात बनाए रखना भी जरूरी है।

-हरी सब्जियों के अलावा, न्यूट्रिशियन व पाइथोन्यूट्रिट को शामिल किया जा सकता है।

-रसदार फलों का सेवन करें। आँवले का सेवन जरूर करें। यह विटामिन सी से भरपूर होता है। डिब्बा बंद आँवले का शरबत भी खरीद सकते हैं। डॉ. रितिका सामदार, डायटिशियन, मैक्स अस्पताल

घरेलू इलाजः स्वाइन फ्लू से बचने के उपाय रोज सुबह उठकर 5 तुलसी की पत्तियाँ धोकर खाएँ। गिलोय देशभर में बहुतायत से मिलता है। इसकी एक फुट लंबी डाल का हिस्सा, तुलसी की पाँच-छह पत्तियों के साथ 15 मिनट तक उबालें। स्वाद के मुताबिक सेंधा नमक या मिश्री मिलाएं। कुनकुना होने पर इस काढ़े को पीएं। यह आपकी रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ा देगा।

हमदर्द, बैद्यनाथ या किसी अच्छी आयुर्वेदिक दवा कंपनी का गिलोय भी ले सकते हैं। महीने में एक या दो बार कपूर की गोली पानी के साथ लें। बच्चों को केले अथवा उबले हुए आलू में मिलाकर दे सकते हैं। याद रखें कपूर रोज नहीं लेना है, मौसम में एक बार या महीने में एक या दो बार ले सकते हैं। लहसुन की दो कलियां रोज सुबह खाली पेट कुनकुने पानी के साथ जरूर लें। इससे रोग प्रतिरोधक शक्ति में इजाफा होगा।

रात को सोते समय हल्दी का दूध अवश्य पीएं। थायमल, मेंथल, केर्फर (कपूर) को बराबर मात्र में मिला कर तैयार श्यू वायरल के घोल की बूंदों को अगर रुमाल या टिश्यू पेपर पर डालकर लोग सूंघें तो भीड़ में मास्क पहन कर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

पान के पत्ते पर दवा की तीन बूंदें डालकर 5 दिन तक दिन में दो बार खाने पर स्वाइन फ्लू से बचाव हो सकता है। 100 मि़ ली़ पानी में तीन ग्राम नीम, गिलोय, चिरैता के साथ आधा ग्राम काली मिर्च और एक ग्राम सोंठ का काढ़ा बना कर पीना भी काफी लाभदायक रहता है।

इन चीजों को पानी के साथ तब तक उबालना है जब तक वह 60 मिलिग्राम न रह जाए। इसे एक सप्ताह के लिए रोज सुबह खाली पेट पीने पर स्वाइन फ्लू से लड़ने के लिए शरीर में जरूरी परिरक्षण क्षमता (इम्यूनिटी) पैदा हो जाएगी।

त्रिफला, त्रिकाटू, मधुयास्ती और अमृता को समान मात्र में लेकर उसे एक चम्मच लेने से प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। यह दवा खाना खाने के बाद दो बार लेने से फायदा होगा।

कॉमन फ्लू वायरस से मुकाबला करने में होम्योपैथिक औषधियाँ चमत्कारिक रूप से असरकारक मानी जाती हैं। किसी योग्य चिकित्सक से दवा ले सकते हैं।

-ग्वारपाठे का एक चम्मच गूदा रोज पानी के साथ लें। इससे जोड़ों के दर्द कम होने से साथ-साथ रोगों से लड़ने की क्षमता भी बढ़ेगी।

-दिन में कई बार अपने हाथ एंटिबायोटिक साबुन से जरूर धोएं। इसके लिए एल्कोलिक क्लींजर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

-रोज प्राणायाम करें। अपने फिटनेस लेवल को बढ़ा कर रखें ताकि किसी भी बैक्टीरिया अथवा वायरस के हमले का सामना कर सके। श्वास प्रणाली की कसरत से यह तंत्र मजबूत होता है। (प्रियंका,प्रस्तुतिःअरविंद ऋतुराज,हिंदुस्तान,दिल्ली,24.8.2010)


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