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शुक्रवार, 10 मई 2013

आंतों का दुश्मन है इरिटेबल बाउल सिंड्रोम

इरिटेबल बाउल सिंड्रोम यानी आईबीएस आंतों की एक ऐसी बीमारी है जो मरीज़ की दिनचर्या में बाधा डालने लगती है। यह आंतों को डैमेज तो नहीं करती,मगर इसके लक्षण यह ज़रूर बताते हैं कि पेट के अंदर कुछ गड़बड़ चल रही है जिसे जल्द ही ठीक करने की ज़रूरत है। 

आईबीएस यानी आंतों में होने वाली अकड़न जिससे पेट में दर्द बना रहता है। इसे स्पैस्टिक कोलन, इरिटेबल कोलन, म्यूकस कोइलटिस जैसे नामों से भी जाना जाता है। इससे न केवल व्यक्ति को शारीरिक तकलीफ महसूस होती है, बल्कि उसकी पूरी जीवनशैली प्रभावित हो जाती है। यह आंतों को खराब तो नहीं करता लेकिन उसके संकेत देने लगता है। पुरुषों की तुलना में महिलाएं इस बीमारी से अधिक प्रभावित होती हैं। वैसे यह आंत या पेट के कैंसर के खतरे को नहीं बढ़ाता है लेकिन जीवन को अस्त-व्यस्त कर देता है। 

क्या हैं लक्षण 
-पेट में मरोड़ उठना 

-पेट में दर्द और सूजन 

-लगातार कब्जियत का बना रहना 

-बार-बार डायरिया जैसे लक्षण 

इसके कारण 
आईबीएस के सही कारणों का अब तक पता नहीं चला है। डॉक्टर्स मानते हैं कि संवेदनशील कोलन या कमजोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता के कारण यह समस्या पैदा हो सकती है। कई बार पेट में बैक्टीरियल इंफेक्शन के कारण भी आईबीएस हो सकता है। इसके कुछ खास कारण भी हैं जो अलग-अलग रोगियों में भिन्न हो सकते हैं- 
-कोलन का कमजोर मूवमेंट, जिससे मरोड़ के साथ काफी दर्द होता है। 

-कोलन में सेरोटोनिन की अनियंत्रित मात्रा, जिससे आंतों का मूवमेंट प्रभावित होता हैं।
 
-माइल्ड सेलिएक डिसीज के आंतों को डैमेज करने के कारण आईबीएस के लक्षण उभरने लगते हैं। 

संभव है इलाज 
आईबीएस का ऐसा कोई निश्चित इलाज नहीं है, लेकिन इसके लक्षणों से राहत जरूर मिलती है। इसके लिए कोई दवा आरंभ करने से पहले जीवनशैली में बदलाव की जरूरत होती है। इससे राहत पाने के लिए कुछ खास चीजों का ध्यान रखना भी जरूरी होता है। -रोजाना व्यायाम करें। -तनाव से बचें। -कैफीनयुक्त चीजें कम से कम लें। -खाना कम मात्रा में कई बार लें। -तले-भुने और स्पाइसी खाने से दूर रहें। -प्रोबायोटिक प्रोडक्ट्‌स लें जैसे दही आदि। 

कैसे होती है पहचान 
मरीज के लक्षणों के आधार पर आईबीएस का पता लगाना आसान होता है। कुछ खास प्रकार की डाइट का सुझाव दिया जाता है या फिर खाने में से कुछ चीजें कम कर दी जाती हैं, जिससे यह पता लगाया जा सके कि कहीं ये लक्षण किसी फूड एलर्जी के कारण तो नहीं है। स्टूल सैंपल के आधार पर इंफेक्शन का पता लगाया जाता है और ब्लड टेस्ट किया जा सकता है, जिससे यह पता लगाया जाता है कि रोगी एनिमिया से तो पीड़ित नहीं है। इसके आधार पर सेलिएक डिसीज यानी ग्लूटेन इनटोलरेंस का पता भी लगाया जाता है। इसकी जांच के लिए कोलनस्कॉपी की जाती है। इस टेस्ट के जरिए डॉक्टर कोलन की जांच करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर टिशू सैंपल लिए जाते हैं। इससे इस बात का पता लगाना आसान हो जाता है कि कहीं ये सारे लक्षण किसी और बीमारी के कारण तो नहीं है, जैसे कोलाइटिस या कोई अन्य क्रॉनिक डिसीज। मरीज की उम्र ५० वर्ष से अधिक है तो भी इस जांच की आवश्यकता पड़ती है।

इसके साथ जीवन 
आईबीएस के साथ जीना आसान तो नहीं होता क्योंकि इससे हमारी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होती है। लेकिन कुछ बातों को अमल में लाने से इसके साथ जीना भी आसान हो जाता है। वैसे दवाओं और सही तरीके से परहेज करने पर यह ठीक भी हो सकता है। टहलने और योग या ध्यान करने से काफी राहत मिलती है। पूरी नींद लेना इससे राहत के लिए काफी जरूरी है। एक्यूपंचर आदि भी लिया जा सकता है। 

विशेषज्ञ कहते हैं 
आमतौर पर आईबीएस तीन प्रकार का होता है, जिसमें रोगी को कब्जियत, डायरिया और दर्द की शिकायत रहती है। अब एक चौथे प्रकार के आईबीएस के लक्षण भी दिख रहे हैं, जिसमें इन तीनों के मिति लक्षण होते हैं। तलाभुने खाने, दूध और उससे बनी सामग्री से परहेज करें। तनाव से बचें(डॉ देवेंद्र सिंह, गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट, बिलासपुर का यह आलेख नई दुनिया के सेहत परिशिष्ट,मई प्रथमांक,2013 में प्रकाशित है)।

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सोमवार, 3 सितंबर 2012

जीर्ण अतिसार का यौगिक उपचार

यह स्वयं रोग नहीं, वरन्‌ यह अनेक रोगों और व्याधियों का लक्षण है। इसके कई कारण हो सकते हैं -स्नायविक अतिसार, बड़ी आँत का कैंसर, डाइवर्टिकुलाइटिस, अल्सरेटिव कोलाइटिस तथा पूर्व में हुए ऑपरेशन का प्रभाव, संक्रमण, कृमि आदि। यदि संक्रमण अथवा अल्सरेशन हो तो प्रायः दर्द होता है। ऐसा प्रौढ़ावस्था में अधिक होता है। अतः प्रौढ़ लोगों को नियमित रूप से शारीरिक परीक्षण करवाते रहना चाहिए। मल में रक्त और म्यूकस का होना दस्त का लक्षण है। अतिसार ही नहीं, कैंसर होने पर भी ऐसा हो सकता है। असाध्य अतिसार अथवा दस्त से पीड़ित होने पर डॉक्टर के पास जाकर अच्छी तरह परीक्षण कराना चाहिए।

आँव 
यह बड़ी आँत और मलाशय की सूजन है, जिसमें पेट में दर्द व रक्त एवं म्यूकस युक्त शौच बार-बार होता है। यह संक्रमण के कारण होता है। आँव दो प्रकार से होती है। 

बेसिलियरी डिसेन्ट्री : 
इसका कारण शिंगेला प्रजाति के रोगाणु हैं। यह बीमारी आबादी की अधिकता तथा अस्वच्छ क्षेत्रों में महामारी के रूप में देखी जा सकती है। उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में यह मक्खियाँ व हाथों की गंदगी के कारण फैलता है। किसी संस्थान में इस रोग का फैलना काफी सामान्य बात है। कभी-कभी बेसिलियरी डिसेन्ट्री बहुत कम मात्रा में, अर्थात्‌ मात्र कुछ पतले दस्त के रूप में हल्के दर्द के साथ होती है और इसीलिए इसे पहचानना कठिन हो जाता है। कभी-कभी बेसिलियरी डिसेन्ट्री इतनी तीव्र और भयंकर होती है कि मात्र अड़तालीस घंटे के भीतर रोगी की मौत भी हो सकती है। हालाँकि ऐसा कभी कभार ही होता है। 

अमीबिक डिसेन्ट्री : 
सामान्यतः हल्के ज्वर अथवा बिना ज्वर के साथ होती है। यह बड़ी आँत में अल्सर उत्पन्ना करती है तथा लीवर तक फैलकर वहाँ फोड़ा बना सकती है। पेट में बुदबुदाहट और दर्द इस रोग में सामान्यतया देखे जा सकते है। दिन में दो या अधिक पतले दस्त हो सकते हैं तथा अतिसार एवं कब्ज़ क्रमिक रूप में होते हैं। प्रायः मल में म्यूकस होता है। मल की गंध बहुत तेज़ होती है, पेट में दर्द उठता है। 

उपचार 
सामान्यतः अतिसार में आराम करने की सलाह दी जाती है, जो संक्रमण को भी फैलने से रोकता है। अत्यधिक मात्रा में पेय पदार्थ, कम रेशेयुक्त आहार और औषधियों का भी प्रयोग किया जा सकता है। निम्न सुझाव भी उपयोगी है :- 

दिन भर विश्राम एक दिन का उपवास एवं ग्लूकोज़ का पानी या ताज़े फलों का रस, जब भी आवश्यकता महसूस हो, थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पीते जाइए। 

सप्ताह भर हर दिन जितनी बार संभव हो ईसबगोल की भूसी और ३-४ गुना पानी मिला दही लीजिए। यह हानिकारक रोगाणुओं की जगह उसकी पूर्ति अन्य लाभप्रद जीवाणुओं से करता है। यह आँत की दीवार पर बैक्टरिया को पुनर्स्थापित कर संक्रमण के प्रभाव को कम करने में सहायता करता है। चूँकि ईसबगोल का पाचन नहीं होता,अतः वह संपूर्ण पाचन संस्थान में भ्रमण कर वहाँ के विषाक्त पदार्थों को अवशोषित करता है व सफाई कार्य करता है।

करीब सप्ताह भर बाद पुनः हल्का भोजन लेना प्रारंभ कीजिए। प्रमुखतः उबला हुआ कच्चा केला, चावल एवं दही लीजिए। कुछ दिनों बाद अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर धीरे-धीरे सामान्य भोजन लेना शुरू कीजिए। 

इस पुराने रोग का निवारण योग द्वारा भी किया जा सकता है। किसी कुशल योग प्रशिक्षक की देखरेख में अभ्यास आरंभ करें। दुसाध्य अमीबिक डिसेन्ट्री में शंखप्रक्षालन का प्रयोग किया जा सकता है, परंतु इसके लिए अत्यधिक सतर्कता की आवश्यकता है। इसके साथ ही उपवास, कुंजल एवं नेति का भी प्रयोग किया जा सकता है। आसन और प्राणायाम का अभ्यास व्यक्तिगत आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर करना चाहिए। योगनिद्रा तथा प्राणविद्या भी फायदेमंद हो सकते हैं(स्वामी सत्यानंद सरस्वती का यह आलेख बिहार योग विद्यालय,मुंगेर से प्रकशित रोग और योग से,सेहत,नई दुनिया,अगस्त,2012 तृतीयांक में छपा है)।

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बुधवार, 23 मई 2012

गर्मी में उल्टी-दस्त से बचाव

सूरज जलाने को तैयार..लू झुलसाने को! खानपान में जरा-सी लापरवाही से उल्टी-दस्त लग जाते हैं। कैसे बचें इस मौसम में पांच खास बीमारियों के प्रहार से,जानते हैं विशेषज्ञों की सलाहः 

त्वचा को बचाइए.. 
आजकल जैसी धूप है, उससे त्वचा का झुलसना बहुत आम बात है। आप इसे टैनिंग कह सकते हैं या फिर सनबर्न भी। इसमें आपकी त्वचा का रंग काला पड़ने लगता है। गर्मी के इन दिनों में सबसे अधिक टैनिंग होती है। त्वचा विशेषज्ञ डॉक्टर शेहला अग्रवाल कहती हैं, ‘त्वचा को धूप से काफी नुकसान हो सकता है। खासकर 18 साल से कम उम्र के बच्चों को तो और अधिक, क्योंकि इस उम्र में यदि सनबर्न हो गया है तो बाद में उसे स्किन कैंसर में तब्दील होने की आशंका कई गुना बढ़ जाती हैं।’ इसके अलावा गर्मी से लोगों को पिंपल की समस्या होती है। दरअसल इस मौसम में उमस, पसीना, डेड स्किन सेल्स मिलकर ब्लैकहेड्स को बढ़ावा देते हैं जिससे पिंपल्स होने लगते हैं। इसके अलावा घमौरियां बड़ी आम समस्या है। पसीना इसकी बड़ी वजह है। डेड सेल बढ़ने से त्वचा के रोमछिद्र बंद हो जाते हैं जिससे घमौरियां होती हैं या फिर लाल रंग के चकत्ते हो जाते हैं। 

बचाव के उपाय 
सनबर्न से निपटने के लिए आप तेज धूप में अधिक देर तक न रहें और दिन में कैलेमाइन लोशन का प्रयोग करें। पिंपल्स से बचने के लिए साफ-सफाई का ध्यान रखें। दिन में दो या तीन बार चेहरे को साफ पानी से अवश्य धो लें। इसके अलावा आप चेहरे से तेल सोखने के लिए किसी फेसपैक का यूज कर सकते हैं। खूब पानी पीएं और विटामिन ए का सेवन करें। घमौरियों के लिए ठंडे पानी से दिन में दो बार स्नान करें, ढीले कपड़े पहनें, स्नान के बाद टेलकम पाउडर लगाएं। 

कहीं हो न जाए पेट खराब.. 
यही मौसम है जब सबसे ज्यादा पेट खराब होता है। बाहर का खानपान और अशुद्ध पानी इसके लिए जिम्मेदार हैं। इस मौसम में उल्टी, दस्त, डायरिया, इन्फेक्शन की शिकायतें तेजी से बढ़ती हैं। डॉक्टर्स कहते हैं कि गर्मी में बैक्टीरिया तेजी से पनपते हैं और इसलिए पानी को उबालकर पीने की सलाह दी जाती है। हालांकि कुछ खास तरह के टॉक्सिन नष्ट नहीं होते और ये दूध व नॉन-वेजीटेरियरन पदार्थों में पाए जाते हैं। इसलिए इनके सेवन में सावधानी बरतनी चाहिए। 

तो रहेंगे बीमारी से दूर 
बाहर का खाना कम खाएं। अधिक तला-भुना खाना सेहत को खराब कर सकता है। लो-कैलोरी भोजन का सेवन करें। ज्यादा पेट भर खाना न खाएं और न ही देर तक बना खुले में रखा भोजन करें। पानी की अधिकता वाले फलों का सेवन करें। दही अवश्य खाएं, यह पेट को ठंडा रखता है। 

आंखों का ध्यान रखिए.. 
आंखें काफी कोमल होती हैं और इन्हें विशेष देखभाल की जरूरत है। गर्मियों में अक्सर धूल भरी आंधी चलने से या फिर तेज धूप से आंखों पर भी असर पड़ता है। सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणें भी काफी नुकसानदेह होती हैं आंखों के लिए। अक्सर इस मौसम में लोग आंख लाल होने, उसके आसपास फोड़े होने, एलर्जी, सूजन, पानी बहना जैसी समस्याओं की शिकायत करते हैं। मेडफार्ट हॉस्पिटल में आंख के विशेषज्ञ डॉक्टर त्यागमूर्ति शर्मा कहते हैं, ‘गर्मियों में आंखों की शिकायतें बढ़ जाती हैं। हर किसी को धूप में निकलने से पहले अच्छे सनग्लासेज का यूज करना चाहिए।’ स्विमिंग पूल के पानी में मिलाई गई क्लोरीन से भी आंखों में इन्फेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है। 

ऐसे मुस्कुराएंगी आंखें 
धूप में चश्मा पहनकर बाहर निकलें। खूब पानी पिएं, इससे आंखों में सूखापन नहीं होगा और सूजन भी नहीं होगी। दिन में चार से पांच बार आंखों को पानी से अवश्य धोएं। पानी के तेज-तेज छीटें आंखों में मारें। आंखों की नार्मल आई-ड्राप्स अपने पास रखें, जिसे सप्ताह में एक या दो बार डाल लें। 

नाक को बचाकर रखें.. 
अत्यधिक गर्मी की वजह से नाक से खून निकलने की समस्या होती है। इसे नकसीर कहते हैं। ऐसा कई कारणों से हो सकता है। शरीर अत्यधिक गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पाता तो भी ऐसा होता है। बच्चों में इस तरह की समस्या होने की संभावना अधिक होती है इसलिए उन्हें बचाकर रखने की अधिक आवश्यकता है। चेहरे को कई बार पानी से धोएं। ज्यादा गर्मी हो तो नाक सहित चेहरे पर बर्फ लगाएं। जूस-पानी ज्यादा पिएं। तनाव से बचें क्योंकि तनाव इस समस्या को अधिक बढ़ा देता है। 

डीहाइड्रेशन की समस्या.. 
गर्मी में पानी की कमी से त्वचा रूखी पड़ जाती है जिसे डीहाइड्रेशन कहा जाता है। सबसे ज्यादा लोग इसी बीमारी की वजह से अस्पतालों में भती होते हैं। गुड़गांव के आर्टिमिस हॉस्पिटल के डॉक्टर प्रवीण गुप्ता के अनुसार, ‘डीहाइड्रेशन में कई लोगों को सांस लेने में दिक्कत, सिर दर्द, चक्कर आना जैसी समस्याएं होने लगती हैं।’ ऐसा करें तो बचे रहेंगे खूब सारा पानी पिएं। गर्मी में अधिक पसीना आने के कारण पानी की मात्र दोगुनी कर दें। ज्यादा देर तक प्यासे न रहें। डॉक्टर रोज 8 लीटर पानी पीने की सलाह देते हैं। गुनगुने पानी में नींबू मिलाकर खाली पेट पिएं। ज्यादा गर्म भोजन न करें। शराब से दूर रहें। कैफीन युक्त पदार्थो जैसे चाय, कॉफी का सेवन कम से कम करें। 

आर्युवेद अपनाएं, गर्मी भगाएं 
त्वचा 
त्वचा से सबंधित समस्याओं के लिए गुलाब की पंखुड़ी (100 ग्राम), मुलतानी मिट्टी (100 ग्राम), हल्दी पाउडर (25 ग्राम) और चंदन पाउडर (50 ग्राम) में थोड़ा पानी डालकर पेस्ट बना लें। और फिर लगाएं। इसे 15 से 20 मिनट तक सूखने दें, फिर धो डालें। इसे हर रोज लगा सकते हैं। बच्चों के लिए हल्दी की जगह बेसन मिला सकते हैं। अगर फोड़े-फुंसी हो गए हैं तो हल्दी के अलावा नीम के पत्ते भी पीसकर मिला दें। पानी खूब पिएं और मौसमी फलों का सेवन करें। 

पेट
पेट को ठीक रखने के लिए बेल का मुरब्बा खाएं। हफ्ते में एक बार ईसबगोल को दही में मिलाकर दिन के समय सेवन करें। अगर रात में लेना है तो दूध के साथ लें। शरीर में नमक की कमी न होने दें। 

आंख 
आंख के लिए गुलाबजल का प्रयोग करें। आंख में इसे नियमित तौर पर डालते रहें। खाने में अमलती रसायन लें। इसका आधा चम्मच दूध के साथ दिन में एक बार सेवन करें। 

नाक 
नाक में सरसों के तेल की कुछ बूंदें डालें। इसे हफ्ते में एक या दो बार डाल सकते हैं। तेल के अलावा आप गाय के घी का प्रयोग भी कर सकते हैं। मुलतानी मिट्टी सूंघने से भी आराम मिलेगा। 

डीहाइड्रेशन डीहाइड्रेशन से बचने के लिए नारियल का पानी खूब पिएं। नमक-चीनी का घोल मिलाकर पिएं। रसदार फल व तरल पदार्थ अधिक लें। 

गर्मी से बचाव 
दो-तीन बार शिकंजी पिलाएं 
बच्चों की मासूम त्वचा और कोमल शरीर इस गर्मी का सामना नहीं कर सकते। बच्चों की देखभाल के कुछ टिप्स दे रहे हैं सर गंगाराम अस्पताल के डॉ. कृष्ण चुघः 
बच्चे मासूम और कोमल होते हैं। इस कारण गर्मी उन्हें और अधिक परेशान करती है। इस मौसम में बच्चों में पेट की गड़बड़ियां आम होने लगती हैं जिनमें डायरिया, कॉलरा और फूड पॉइजनिंग की समस्या प्रमुखता से शामिल है। इनकी वजह से डीहाइड्रेशन की समस्या होने लगती है। इसके साथ शरीर का इलेक्ट्रोलाइट असंतुलित हो जाता है यानी शरीर में सोडियम, पोटैशियम और क्लोरीन का संतुलन बिगड़ सकता है। इस स्थिति में बच्चे की जान भी जा सकती है। टायफायड भी इस मौसम की आम समस्या है, क्योंकि इसके कीटाणुओं को पनपने के लिए यह अनुकूल मौसम होता है। इस कारण इस मौसम में खाने-पीने की चीजें ज्यादा खराब होती हैं। खासकर कटी हुई चीजें या कम पका हुआ और खुले में रखा हुआ खाना बच्चे को न दें। खाना परोसते समय ग्लव्स भी पहनें, क्योंकि आपके नाखूनों में भी बीमारी के कीटाणु हो सकते हैं। ग्लव्स बदलते रहें। 

त्वचा संक्रमण की समस्या इस मौसम में बढ़ जाती है। कई बार मच्छर के काटे हुए खरोचे पर बनने वाली फुंसी को बच्चा नाखून से खुरच देता है। उन्हें ऐसा न करने दें क्योंकि यह फुंसी गंभीर घाव में बदल सकता है। ऐसी फुंसी पर एंटीबायोटिक क्रीम लगा दें। 

चेहरे, माथे आदि शरीर के काफी संवेदनशील हिस्से हैं, क्योंकि ये ब्रेन के पास होते हैं। ऐसी जगह फुंसी या दाने हो जाएं तो डॉक्टर की सलाह से पीने वाला एंटीबायोटिक दें। पेट में कीड़े अधिक बनते हैं जो बच्चे का खाया हुआ खाना खा जाते हैं। डॉक्टर से मिलें जो कीड़े को नियंत्रित करने वाली दवा देंगे। 

इस मौसम में बच्चों को दिन में घर से बाहर जाने से रोकें। उसे बार-बार पानी देते रहें। दिनभर में दो-तीन बार नमक, चीनी और नींबू से बना शिकंजी भी देते रहें। अगर वह लगातार दो घंटे से अधिक खेलता है तो उसे शिकंजी जरूर दें। एक बार शाम में खेलने के लिए भेजने से पहले भी उसे शिकंजी दें। 

अभी स्कूल खुले हैं। बच्चों को स्कूल जाते समय दूध या फ्रूट जूस जरूर दें। स्कूल के लिए कटे फल के बजाय संतरा, नारंगी जैसे छोटे फल रख दें(आरती मिश्रा,हिंदुस्तान,दिल्ली,16.5.12)।

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मंगलवार, 1 नवंबर 2011

डायरियाःफैक्ट शीट

डायरिया एक ऐसी बीमारी है जो विश्वभर में पाँच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत का सबसे बड़ा कारण है। इससे मरने वाले बच्चों की संख्या एड्स, मलेरिया और मीज़ल्स से मरने वाले कुल मरीज़ों से भी अधिक है। भारत में डायरिया की वजह से सबसे ज़्यादा जानें जाती हैं। इसकी वजह से करीब ५ लाख बच्चों की हर साल मौत हो जाती है। ऐसी स्थिति में डायरिया, इससे बचाव और इलाज के बारे में जागरूकता बहुत ज़रूरी है, ताकि इससे हो रही मौतों को रोका जा सके। डायरिया से होने वाले निर्जलीकरण और खनिज पदार्थों की कमी मृत्यु का प्रमुख कारण होते हैं। मौत के लिए ज़िम्मेदार दूसरा सबसे कारण कुपोषण है। डायरिया से पीड़ित बच्चे को पुनः स्वस्थ होने के लिए पोषक आहार की ज़रूरत होती है। डायरिया से बचाव और इलाज़ के लिए उचित साफ-सफाई रखना ज़रूरी है। डायरिया से बचाव और इलाज़ से जुड़े तीन साधारण से नियम हैं जो काफी कारगर साबित होते हैं- 

1. हाथ धोने के लिए साबुन का इस्तेमालःखाना बनाने,खाने और खिलाने से पहले व शौच के बाद साबुन से अच्छी तरह हाथों को धोना चाहिए। 

2. पीने के पानी की सफाईःपानी को उबालकर,फिल्टर करके या क्लोरीन से ट्रीट करके ही पीएं। पानी के बर्तन और स्थान की साफ-सफाई का ध्यान रखें। 

3. दस्त हो रही हो तो मरीज़ को तुरंत जीवनरक्षक घोल देना शुरू कर दें। स्तनपान जारी रखें और पोषक आहार दें (सेहत,नई दुनिया,अक्टूबर द्वितीयांक 2011)। 


ओआरएस का इस्तेमाल.. 
बच्चों में दस्त की समस्या बहुत ही जल्दी गंभीर रूप धारण कर सकती है। दस्त के कारण पहले से ही कमज़ोर बच्चों में निर्जलीकरण की आशंका अधिक होती है। पर्याप्त मात्रा में शुद्घ पेय जल पिलाना आवश्यक होता है। अक्सर दस्त से निढाल बच्चा पानी अथवा किसी तरह के पेय की माँग नहीं करता अतः पालकों को चाहिए कि वे समय-समय पर तरल पदार्थों की आपूर्ति करते रहें। 


- एक लीटर पानी में ओआरएस घोल का एक बड़ा पैकेट मिलाएँ। इसे २४ घंटे के अंदर सेवन कर समाप्त करें। अगली बार के लिए बचा कर न रखें। 


शरीर में द्रव की भरपाई करना बेहद महत्वपूर्ण है नहीं तो निर्जलीकरण का खतरा बढ़ जाता है, जिससे डायरिया गंभीर हो सकता है। दो साल से बड़े बच्चे के लिए, आधा गिलास या १०० एमएल तक ओआरएस प्रत्येक दस्त के बाद दिए जाने की जरूरत होती है(सेहत,नई दुनिया,अक्टूबर तृतीयांक 2011)।  


अंतर्मंथन और चित्रकथा ब्लॉगों के स्वामी डाक्टर टी एस दराल साहब की यह पोस्ट काबिले-गौर है।
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आज शाम सात बजे जानिएः 


क्या है ऑपरेशन में प्रयुक्त होने वाला एनेस्थीसिया

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शनिवार, 21 मई 2011

डायरिया में क्या करें?

(सेहत,नई दुनिया,मई 2011 द्वितीयांक)

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मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

बच्चों में रोटावायरस डायरिया

रोटावायरस छोटे बच्चों में डायरिया होने का एक प्रमुख कारण है। डायरिया से दुनिया में हर साल पांच लाख से भी अधिक बच्चों की मौत हो जाती है। हालांकि ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्ट यानी (ओआरएस) जैसे सस्ते उपाय से इसका उपचार हो सकता है। फिर भी इस रोग की वजह से बच्चों की मृत्यु जारी है। जन-स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक 6 महीने से कम आयु के बच्चों का टीकाकरण इस मर्ज से बचाव का एक आसान तरीका है, जिससे इन मौतों को रोका जा सकता है। जून 2009 में विश्व स्वास्थ्य संगठन भी दुनिया भर में शिशुओं को रोटावायरस का टीका लगाने की सिफारिश कर चुका था। पिछले 4 सालों से दो ओरल रोटावायरस वैक्सीन विश्व बाजार में उपलब्ध हैं। ये टीके भारत के निजी क्षेत्र में पहले से ही उपलब्ध हैं और आम तौर पर शिशु व बाल रोग विशेषज्ञ नवजात शिशुओं के माता-पिता को इस टीके को लगाने की सलाह देते हैं, किंतु दुखद बात यह है कि जिन बच्चों को सबसे अधिक जोखिम है उनकी पहुंच इस रोटावायरस वैक्सीन तक नहीं है। भारत के राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में रोटावायरस वैक्सीन को शामिल करने के बारे में अभी तक दुविधा बरकरार है। 
"देश में निर्मित रोटावायरस वैक्सीन के आने के बाद इस बारे में तुरंत फैसला करना और भी जरूरी हो गया है। यह वैक्सीन भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई है और भारतीय टीका कंपनियां इसका उत्पादन करेंगी। बहरहाल, राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में रोटावायरस वैक्सीन को शामिल करने से देश में डायरिया से होने वाली 44,000 मौतों को हर साल कम किया जा सकेगा। इसलिए देश के सबसे गरीब और सबसे जरूरतमंद बच्चों के लिए यह जीवन बचाने वाला टीका सुलभ कराना सरकार और हम सभी प्रबुद्ध लोगों की जिम्मेदारी है"- डॉ. नवीन ठक्कर गांधीधाम, कच्छ (गुजरात) पूर्व अध्यक्ष-इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (दैनिक जागरण,26.4.11)

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शनिवार, 21 अगस्त 2010

डायरिया घटाने में प्रो-बायोटिक कारगर

प्रोबायोटिक खाद्य पदार्थो को लेक र देश में पहली बार हुए बड़े क्लिनिकल ट्रायल में ,इन्हें डायरिया कम करने में कारगर पाया गया है। यह शोध इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के कोलकाता स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कालरा एंड एंटेरिक डिजीज द्वारा किया गया है । शोध के आंकड़ों को साइंस जर्नल एपिडेमियोलॉजी एंड इंफेक्शन के ताजा अंक में प्रकाशित किया गया है । इंस्टीट्यूट के निदेशक जीबी नायर ने बताया कि इस शोध में कोलकात्ता के झुग्गी इलाके में एक से पांच साल की उम्र के चार हजार बच्चों पर प्रो-बायोटिक पेय पदार्थ का परीक्षण किया गया। इन बच्चों को दो-दो हजार के दो समूहों में बांटा गया। तीन महीने तक एक समूह को सामान्य पोषण पेय तथा दूसरे समूह को प्रोबायोटिक पेय दिया गया। इन्हें प्रतिदिन तीन माह तक 67 मिली. की प्रो-बायोटिक खुराक दी गई जिसमें 6.7 अरब प्रोबायोटिक माइक्रोआर्गनिज्म होते हैं । तीन महीने के परीक्षण पूरे होने के बाद अगले तीन महीने तक इनके स्वास्थ्य पर निगरानी रखी गई। इस अवधि में प्रो-बायोटिक पेय ले रहे दो हजार बच्चों में से 608 को डायरिया संक्रमण हुआ।जबकि दूसरे समूह के 674 बच्चों को डायरिया हुआ। इस प्रकार प्रोबायोटिक लेने वाले बच्चों में इसके संक्रमण की दर करीब 14 फीसदी कम रही(हिंदुस्तान,दिल्ली,21.8.2010)।

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