सोमवार, 3 सितंबर 2012

जीर्ण अतिसार का यौगिक उपचार

यह स्वयं रोग नहीं, वरन्‌ यह अनेक रोगों और व्याधियों का लक्षण है। इसके कई कारण हो सकते हैं -स्नायविक अतिसार, बड़ी आँत का कैंसर, डाइवर्टिकुलाइटिस, अल्सरेटिव कोलाइटिस तथा पूर्व में हुए ऑपरेशन का प्रभाव, संक्रमण, कृमि आदि। यदि संक्रमण अथवा अल्सरेशन हो तो प्रायः दर्द होता है। ऐसा प्रौढ़ावस्था में अधिक होता है। अतः प्रौढ़ लोगों को नियमित रूप से शारीरिक परीक्षण करवाते रहना चाहिए। मल में रक्त और म्यूकस का होना दस्त का लक्षण है। अतिसार ही नहीं, कैंसर होने पर भी ऐसा हो सकता है। असाध्य अतिसार अथवा दस्त से पीड़ित होने पर डॉक्टर के पास जाकर अच्छी तरह परीक्षण कराना चाहिए।

आँव 
यह बड़ी आँत और मलाशय की सूजन है, जिसमें पेट में दर्द व रक्त एवं म्यूकस युक्त शौच बार-बार होता है। यह संक्रमण के कारण होता है। आँव दो प्रकार से होती है। 

बेसिलियरी डिसेन्ट्री : 
इसका कारण शिंगेला प्रजाति के रोगाणु हैं। यह बीमारी आबादी की अधिकता तथा अस्वच्छ क्षेत्रों में महामारी के रूप में देखी जा सकती है। उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में यह मक्खियाँ व हाथों की गंदगी के कारण फैलता है। किसी संस्थान में इस रोग का फैलना काफी सामान्य बात है। कभी-कभी बेसिलियरी डिसेन्ट्री बहुत कम मात्रा में, अर्थात्‌ मात्र कुछ पतले दस्त के रूप में हल्के दर्द के साथ होती है और इसीलिए इसे पहचानना कठिन हो जाता है। कभी-कभी बेसिलियरी डिसेन्ट्री इतनी तीव्र और भयंकर होती है कि मात्र अड़तालीस घंटे के भीतर रोगी की मौत भी हो सकती है। हालाँकि ऐसा कभी कभार ही होता है। 

अमीबिक डिसेन्ट्री : 
सामान्यतः हल्के ज्वर अथवा बिना ज्वर के साथ होती है। यह बड़ी आँत में अल्सर उत्पन्ना करती है तथा लीवर तक फैलकर वहाँ फोड़ा बना सकती है। पेट में बुदबुदाहट और दर्द इस रोग में सामान्यतया देखे जा सकते है। दिन में दो या अधिक पतले दस्त हो सकते हैं तथा अतिसार एवं कब्ज़ क्रमिक रूप में होते हैं। प्रायः मल में म्यूकस होता है। मल की गंध बहुत तेज़ होती है, पेट में दर्द उठता है। 

उपचार 
सामान्यतः अतिसार में आराम करने की सलाह दी जाती है, जो संक्रमण को भी फैलने से रोकता है। अत्यधिक मात्रा में पेय पदार्थ, कम रेशेयुक्त आहार और औषधियों का भी प्रयोग किया जा सकता है। निम्न सुझाव भी उपयोगी है :- 

दिन भर विश्राम एक दिन का उपवास एवं ग्लूकोज़ का पानी या ताज़े फलों का रस, जब भी आवश्यकता महसूस हो, थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पीते जाइए। 

सप्ताह भर हर दिन जितनी बार संभव हो ईसबगोल की भूसी और ३-४ गुना पानी मिला दही लीजिए। यह हानिकारक रोगाणुओं की जगह उसकी पूर्ति अन्य लाभप्रद जीवाणुओं से करता है। यह आँत की दीवार पर बैक्टरिया को पुनर्स्थापित कर संक्रमण के प्रभाव को कम करने में सहायता करता है। चूँकि ईसबगोल का पाचन नहीं होता,अतः वह संपूर्ण पाचन संस्थान में भ्रमण कर वहाँ के विषाक्त पदार्थों को अवशोषित करता है व सफाई कार्य करता है।

करीब सप्ताह भर बाद पुनः हल्का भोजन लेना प्रारंभ कीजिए। प्रमुखतः उबला हुआ कच्चा केला, चावल एवं दही लीजिए। कुछ दिनों बाद अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर धीरे-धीरे सामान्य भोजन लेना शुरू कीजिए। 

इस पुराने रोग का निवारण योग द्वारा भी किया जा सकता है। किसी कुशल योग प्रशिक्षक की देखरेख में अभ्यास आरंभ करें। दुसाध्य अमीबिक डिसेन्ट्री में शंखप्रक्षालन का प्रयोग किया जा सकता है, परंतु इसके लिए अत्यधिक सतर्कता की आवश्यकता है। इसके साथ ही उपवास, कुंजल एवं नेति का भी प्रयोग किया जा सकता है। आसन और प्राणायाम का अभ्यास व्यक्तिगत आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर करना चाहिए। योगनिद्रा तथा प्राणविद्या भी फायदेमंद हो सकते हैं(स्वामी सत्यानंद सरस्वती का यह आलेख बिहार योग विद्यालय,मुंगेर से प्रकशित रोग और योग से,सेहत,नई दुनिया,अगस्त,2012 तृतीयांक में छपा है)।

5 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी जानकारी...
    आभार

    अनु

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार 4/9/12 को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच http://charchamanch.blogspot.inपर की जायेगी|

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  3. बहुत महत्वपूर्ण जानकारी..

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  4. आपका अथक परिश्रम हमें उपयोगी जानकारी दे जाता है।

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