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मंगलवार, 18 सितंबर 2012

अवसाद और मस्तिष्क

अवसाद या लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव मस्तिष्क को सिकोड़ देता है। अमेरिका के येल युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने शोध अध्ययन में पाया है कि भावनात्मक परिवर्तनों से शरीर पर स्थाई एवं अस्थाई परिवर्तन होते हैं। मस्तिष्क का आकार भी इसी कारण घटता है। 

अवसाद से शरीर में कई रासायनिक परिवर्तन होते हैं। कुछ स्थाई होते हैं तथा कुछ अस्थाई। हाल ही में हुए शोधों से साबित हुआ है कि प्राचीन काल से सकारात्मक सोच रखने की सीख अच्छे स्वास्थ के लिए कितनी जरूरी है। मरीज खुद को तनाव, अवसाद और व्याकुलता से जितना नुकसान पहुँचा सकता है उतना कोई दूसरा नहीं। सकारात्मक विचारों से शरीर की कई ग्रंथियाँ अधिक सक्रिय होकर काम करने लगती हैं। हारमोन्स का यह प्रवाह शरीर को तरोताजा रखता है। नींद भरपूर आती है और जीवन के प्रति रुचि जाग्रत होती है। व्याकुलता, अवसाद और अनिद्रा किसी भी इंसान को ध्वस्त करने की हद तक पहुँचा देने वाले मानसिक रोगों की अवस्थाएँ हैं। इनमें यदि वातावरणजन्य रोग और शामिल हो जाएँ तो जिंदगी ही व्यर्थ लगने लगती है। हमारी सोच पर वातावरण का भी प्रभाव पड़ता है। 

यदि आपको अपने ऑफिस बिल्डिंग की कलर स्कीम अच्छी नहीं लग रही है तो आप बेहद थकान महसूस करेंगे, आपके शरीर में फ्लू जैसे क्षण उभरने लगेंगे। मस्तिष्क पर धुंधलका छा जाएगा। आमतौर पर वातावरणजन्य रोगों में व्याकुलता, अवसाद और अनिद्रा प्रमुखता से उभरते हैं। अवसादग्रस्त होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। यह जीवनसाथी के विछोह से लेकर प्रिय कुत्ते के मर जाने तक किसी भी कारण से हो सकता है। यह अवस्था कुछ समय तक ही रहती है बाद में आप सामान्य हो जाते हैं। 

देर तक अवसादग्रस्त रहने पर शरीर में बेहद थकान, जीवन के प्रति अरुचि जैसे लक्षण उभरने लगते हैं। कई लोग अवसादग्रस्त या तनावग्रस्त होने पर अधिक खाने लगते हैं। उनकी मानसिक एकाग्रता नष्ट हो जाती है। वे भूलने लगते हैं। वे अनिर्णय की स्थिति में पहुँच जाते हैं। विचारों की स्पष्टता खत्म हो जाती है। सबसे पहले साँस पर ध्यान दें। अक्सर देखा गया है कि अवसादग्रस्त व्यक्ति भरपूर साँस नहीं लेता। उसके शरीर में ऑक्सीजन का स्तर कम रहता है। इससे मरीज को सिरदर्द और पेटदर्द की भी शिकायत होती है। कभी-कभी मरीज को चक्कर भी आ जाते हैं। चिंता, तनाव और अवसाद जब रोजमर्रा के जीवन में हस्तक्षेप करने लगें तब चिकित्सक की मदद लेना जरूरी होता है।

क्या है इलाज 
तनाव और अवसाद के इलाज के तौर पर वर्षों से प्राकृतिक तरीकों से दी जा रही चिकित्सा पर ही भरोसा किया जा सकता है। मरीज के व्यवहार और जीवनशैली से संबंधित कुछ तनाव बिंदुओं पर इलाज केंद्रित किया जाता है। व्यवहार में पूर्ण बदलाव के लिए इस तरह के १५ से २० सेशन की जरूरत होती है। मरीज के तनाव और अवसाद कारक बिंदुओं को चिन्हित कर उसकी नकारात्मक विचारधारा प्रक्रिया को रोकने की दिशा में काम किया जाता है। इसी के साथ मरीज में एक सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगता है। मरीज को अवसाद मुक्त करने वाली दवाओं के साथ मूड एलिवेटर्स दी जाती हैं। 

सिर्फ दवा काफी नहीं 
मरीज़ अकेले औषधियों से ठीक नहीं होते। उन्हें दवाओं के साथ बिहेवियरल थैरेपी भी दी जाती है। इसके अलावा,योग और मानसिक तनाव शैथिल्य की क्रियाएं भी कराई जाती हैं। 

अवसाद से निपटें इस तरह 
-अवसाद से निपटने का सबसे सरल और कारगर तरीका यह है कि एक गिलास उबलते पानी में गुलाब के फूल की पत्तियाँ मिलाएं। ठंडा करें और शक्कर मिलाकर पी जाएं।

-एक चुटकी जायफल का पावडर ताजे आंवले के रस में मिलाकर दिन में तीन बार पी लें।

-ग्रीन टी भी अवसाद दूर भगाने में मदद करती है। दिन कम से कम तीन कप ग्रीन टी पिएं। अवसाद से छुटकारा पाने का एक और उपाय यह है कि एक कप दूध के साथ एक सेबफल और शहद का सेवन करें। 

-गुनगुने पानी के टब में लगभग आधे घंटे के लिए शरीर को ढीला छोड़ दें। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हों तो नदी अथवा तालाब के पानी में तैरें। इससे अवसाद कम होगा। 

-सामान्य चाय के प्याले में एक-चौथाई चम्मच तुलसी की पत्तियां मिलाएं और दिन में दो कप लें। 

-एक कप उबलते पानी में दो हरी इलायची के दाने पीसकर मिला दें। शक्कर मिलाकर पी लें। 

-सूखे मेवे,पनीर,सेबफल का सिरका एक गिलास पानी के साथ लें। 

-कद्दू के बीज,गाजर का रस,सेबफल का रस,5-6 सूखी खुबानी को राई के दानों के साथ मिलाकर पीस लें और इसे पी लें(सेहत,नई दुनिया,सितम्बर प्रथमांक 2012)।

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शनिवार, 25 अगस्त 2012

मुखरोग का सीधा संबंध तनाव से है

तनाव का असर पूरे शरीर पर पड़ता है। यह मुंह की सेहत भी खराब कर देता है। तनाव की अधिकता की वजह से सिरदर्द, पेटदर्द या उच्च रक्तचाप होने के साथ-साथ ही दाँतों, मसूड़ों और मुँह में छाले भी हो जाते हैं।

तनाव और बेवजह की चिंताओं से मुँह की अंदरूनी सतह पर खराशें पड़ सकती हैं। केंकर सोर या कोल्ड सोर हो सकते हैं। दाँत भींचने की भी शिकायत हो सकती है। दाँत भींचने और सोते समय दाँत पीसने से दाँत खराब हो सकते हैं या मुँह में घाव हो सकते हैं। दाँतों की नियमित सफाई न होने एवं नियत समय पर भोजन न कर पाने के कारण मुँह में संक्रमण हो सकता है। केंकर सोर संक्रामक नहीं होते। 

क्या करें 
केंकर सोर आमतौर पर १० दिन में अपने आप खत्म हो जाते हैं। राहत पाने के लिए केमिस्ट से पूछकर छालों की कोई क्रीम लगाई जा सकती है। खुजली से बचने के लिए तीखा मसालेदार, बहुत गर्म या टमाटर जैसे अम्लीय खाद्य पदार्थों का सेवन न करें।

कोल्ड सोर 
ये हर्पीज सिम्पलेक्स वायरस के संक्रमण की वजह से होते है तथा एक से दूसरे तक पहुँचते हैं। ये ऐसे छाले होते हैं जिनमें तरल पदार्थ भरा रहता है। ये अक्सर मुंह के आसपास होठों के किनोर पर उभरते हैं। ये नाक के नीचे और ठोड़ी के आसपास भी हो जाते हैं। भावनात्मक तनाव की अधिकता के कारण इनकी संख्या बढ़ जाती है। एंटीवायरल औषधियाँ से राहत मिलती है। जैसे ही कोल्ड सोर की शुरूआत हो उनका इलाज चालू कर दें। इससे संक्रमण को सीमित करने में मदद मिलेगी और घर के दूसरे सदस्य इससे बच सकेंगे। 

दाँत किटकिटाना 
तनाव के कारण दाँत भींचना एक आम लक्षण है। कई लोग तनाव को सोते समय भी दूर नहीं रख पाते और दाँत किटकिटाते हैं। गंभीर अवस्था में मरीज दिन में ही अनजाने में दाँत किटकिटाने लगते हैं। दाँत किटकिटाने की समस्या के कारण जबड़े के जोड़ पर अनावश्यक दबाव पड़ता है और दर्द रहने लगता है। चिकित्सक की सलाह से दाँत भींचने और किटकिटाने की समस्या से निजात मिल सकती है।

मुँह से दुर्गंध आना 
अतिरिक्त तनाव के कारण मरीज का मूड भी ठीक नहीं रहता, इस वजह से वह रोज सुबह टूथब्रश वगैरह पर ध्यान नहीं दे पाता। अधिक समय तक टूथब्रश करने या कुल्ले करने जैसी आवश्यक क्रियाओं से मुँह मोड़ने से मुँह के स्वास्थ पर बुरा असर पड़ता है। मसूड़े सड़ने लगते हैं और सूज जाते हैं। यदि पायरिया पहले से ही हो तो समस्या और गंभीर हो जाती है। तनाव के कारण नियमित भोजन करने की आदतें भी बिगड़ जाती हैं। तनावग्रस्त लोग आलू की चिप्स जैसे अस्वास्थप्रद स्नैक्स खाते हैं, कोला ड्रिंक्स पीते हैं और जंकफूड खाते हैं। इसकी वजह से दाँतों में समय से पहले खराबी आने लगती है। मुँह की नियमित साफ सफाई की आदतें पुर्नस्थापित करें। नियमित कसरत करने की आदत डालें। इससे तनाव कम करने में मदद मिलेगी। कसरतों से शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली को ताकत मिलती है।

मसूड़ों की बीमारी 
एक शोध अध्ययन के मुताबिक अतिरिक्त तनाव भले ही अल्प समय के लिए ही हो लेकिन इसके कारण दाँतों में प्लॉक बनने की शिकायत होती है। लंबे समय तक तनाव बना रहे तो मसूड़ों से खून रिसने एवं जिंजीवाइटिस जैसी समस्याएं खड़ी होने का जोखिम रहता है। यह स्थिति मसूड़ों के स्वास्थ के लिए खतरनाक है। याद रखें कि नियमित रूप से संतुलित आहार लेना और दंत रोग विशेषज्ञ से समय-समय पर जाँचें कराते रहने से मुँह की सेहत भी बनी रहती है। दिन में दो बार टूथब्रश करना याद रखें। एंटीबैक्टेरियल माउथ रिंस से प्लॉक बनाने वाले बैक्टेरिया की सफाई हो जाती है। इसलिए दिन में एक बार इससे गरारे करना ना भूलें।

ताकि स्वस्थ रहें दाँत :  
पाचन क्रिया मुँह से ही शुरू हो जाती है। खाने को ठीक से पचाने के लिए इसका स्वस्थ होना काफी ज़रूरी होता है। यह खाना पचाने के लिए होता है और कार्बोहायड्रेट का पाचन भी यहीं से शुरू हो जाता है। दाँत खाने को चबाकर पचने में आसान बनाते हैं। लेकिन कई लोग इन्हें खाना चबाने के अलावा भी कई तरह के कामों के लिए उपयोग करते हैं, जिससे ये कमज़ोर पड़ने लगते हैं। दाँतों को स्वस्थ रखने के लिए इनका उपयोग कभी भी इस तरह से न करें : 

-बर्फ का चूरा करने के लिए

-प्लायर एवं हैंगर से दाँत खुरचना

-चिप्स के पैकेट खोलने के लिए

-कठ्ठी गठाने खोलने के लिए

-ट़ेढे-मेढ़े छुरी-कांटों को सीधा करने के लिए

-धूम्रपान से बचें : यह दाँतों और मुँह के लिए काफी नुकसानकारी हैं।

-हर २-३ महीने में टूथब्रश बदलते रहें।ज़्यादा समय तक एक ही ब्रश का इस्तेमाल करने से इसमें बैक्टीरिया पनपने लगते हैं।

-सुबह उठते ही व सोने से पहले दाँतों को ब्रश करना बेहद ज़रुरी है । इससे मुँह में बैक्टीरिया पनपने की दर व दाँतों पर प्लाक बनने की प्रक्रिया को नियंत्रित किया जा सकता है(सेहत,नई दुनिया,अगस्त द्वितीयांक 2012)।

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शुक्रवार, 15 जून 2012

माइग्रेन का यौगिक उपचार

समय-समय पर उठने वाले इस अत्यंत तीव्र सरदर्र्द की विशेषता यह है कि दर्द आधे सिर में ही होता है तथा अक्सर इसके साथ उल्टियाँ और ठीक से दिखाई न देने की तकलीफें शामिल हैं। यह पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में अधिक होता है। माना जाता है कि माइग्रेन का दर्द स्वचालित तंत्रिकाओं के असंतुलन के कारण सिर में मौजूद रक्तनलिकाओं के फैलने से होता है। ये तंत्रिकाएँ नलिका का आकुंचन बनाए रखकर सिर के रक्त प्रवाह को नियंत्रित करती है। नलिकाओं के फैलने से उनकी भित्ति में स्थित पीड़ा संवेदी तंतु उत्तेजित हो दर्द उत्पन्न करते हैं। 

यह तथ्य अभी प्रमाणित नहीं हुआ है कि रोग अनुवांशिक है या व्यावहारात्मक विरासत है। सामान्यतः लगभग वयः संधि की उम्र से शुरू होकर मध्यवय के उत्तरार्द्ध तक माइग्रेन का दर्द समय-समय पर उठता रहता है। दर्द के दौर कुछ दिनों से लेकर कई महीनों तक के अंतराल से उठते हैं। अक्सर इनका संबंध भावनात्मक दबाव से अपूरित महत्वाकांक्षाओं या अनाभिव्यक्त लैंगिक समस्याओं से रहता है, जो चिढ़चिड़ापन व खीज उत्पन्न करते हैं।

सिर में दर्द एक बिन्दु से शुरू होकर धीरे-धीरे आधे सिर में (या कभी-कभी पूरे सिर में) फैल जाता है। दर्द अत्यंत तीव्र एवं प्रतिस्पंद करता हुआ महसूस होता है। व्यक्ति पसीने-पसीने होकर उल्टियाँ करने लगता है तथा प्रकाश एवं ध्वनि बर्दाश्त नहीं कर सकता। उसे अंधेरे शांत कमरे में बिस्तर पर पड़े रहना बेहतर लगता है। यह दौरा कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों तक चलता है तथा रोगी को लस्त एवं शक्तिहीन बना देता है।

तनावजन्य सरदर्द :
माइग्रेन एवं तनावजन्य सरदर्द दोनों ही मानसिक भावनात्मक तनाव से संबंधित हैं, अंतर इतना ही है कि माइग्रेन स्वसंचालित तंत्रिकाओं के मध्यम से तथा तनावजन्य सरदर्द कायिक तंत्रिकाओं के माध्यम से दर्द की अनुभूति उत्पन्न करता है। तनाव के कारण तंत्रिका तंतु सिर की त्वचा के नीचे की पतली मांसपेशियों को या ग्रीवा पृष्ठ की पेशियों को प्रेरित कर लगातार आकुंचित बनाए रहते हैं। इसके कारण उन पेशियों में दर्द की संवेदना उत्पन्न होती है। 

यौगिक उपचार
इन समस्याओं के निदान में मेडिकल साइंस की जो कमियाँ एवं खामियाँ हैं, यौगिक अभ्यास उन्हें दूर कर इलाज पद्धति को एक संपूर्णता प्रदान करते हैं। अक्सर सभी प्रकार के तनावजन्य और संवहनीय सरदर्द (माइग्रेन एवं पेशीय अतिसंकुचन सहित) मात्र यौगिक क्रियाओं द्वारा पूर्णतः उन्मूलित किए जा सकते हैं। आधुनिक शोधों से इस बात की पुष्टि होती है कि माइग्रेन के लक्षणों के प्रकट होने के कारणों या क्रियाविधि को समझना इतना सरल नहीं है। इसमें अनेक जटिल प्रक्रियाएँ शामिल हैं, जिनमें मस्तिष्क के रसायन एवं रक्त कणिकाओं से स्रावित होने वाले रसायन अन्योन्याश्रित तौर पर विकृत रूप से कार्य करने लगते हैं। 

सामान्य निरीक्षण से,आधुनिक शोधपत्रों से,लक्षणों से एवं आधुनिक चिकित्सा पद्धति की असफलता से यह बात स्पष्टतः साबित होती है कि इस मनोकायिक रोग की समुचित चिकित्सा एक अन्य स्तर से करने की आवश्यकता है जो शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक,प्राणिक और अन्य सूक्ष्म स्तरों तक इस विकृति को प्रभावित कर रोग को समूल नष्ट कर सके।। 

इस परिप्रेक्ष्य में,योग चिकित्सा इन सभी स्तरों को प्रभावित करने का एक सशक्त विकल्प बन कर हमारे सामने आती है।योग की क्रियाएं मस्तिष्क में सेरेटॉनिन-मेलेटॉनिन इत्यादि रसायनों के स्रवणचक्र को,उनकी मात्रा को एवं अनुपात को पुनर्व्यवस्थित करती हैं। वे व्यक्ति को संवेदनात्मक तौर पर अधिक संतुलित करती हैं। योग द्वारा प्राणशक्ति के प्रवाह के अवरोध दूर होते हैं और पूरे शरीर में प्राणों का संचार बेहतर तरीक़े से होना प्रारंभ हो जाता है। नेति एवं कुंजल माइग्रेन तथा अधिक सिरदर्द के उपचार हेतु दो आधारभूत हठयौगिक क्रियाएं हैं। यदि उनका अभ्यास माइग्रेन के दौर का पूर्वाभास होते ही कर लिया जाए,तो व्यक्ति को तुरंत आराम मिल जाता है। यह सर्वविदित है कि यदि माइग्रेन के रोगी को स्वतः उल्टियां हो जाएं तो लक्षण की तीव्रता घट जाती है। यह तथ्य इस बात की पुष्टि करता है कि कुंजल की कायो-मानसिक प्रतिक्रियाएं अनाभिव्यक्त तनावों को या भावनाओं को अचेतन मन से मुक्त करने में सक्षम है। रोग को जड़ से मिटाने केलिए इन क्रियाओं का दैनिक प्रातःकाल अभ्यास करना चाहिए। साथ ही,संलग्न अभ्यास क्रम का भी दो से तीन महीने तक अभ्यास करना चाहिए(स्वामी सत्यानंद सरस्वती का यह आलेख नई दुनिया के सेहत,जून द्वितीय,2012 परिशिष्ट में प्रकाशित है)। 


नोटःमाइग्रेन के संबंध में,इसी ब्लॉग पर पूर्व में प्रकाशित आलेख यहां हैं।

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गुरुवार, 14 जून 2012

आशा-तृष्णा ना मुई,मरि-मरि गया शरीर

एक वक्त था जब पढ़ाई कर लेना काफी नहीं था। नौकरी मिलना ज्यादा बड़ी बात मानी जाती थी। आजकल तो कैंपस में ही चुन लिया जाता है। अब तनख्वाह सैकड़ों में न होकर लाखों में है। बच्चे और परिवार गर्व से भर उठते हैं। यह भौतिक समृद्धि का समय है। 

भारत ने अमीरी में विश्व के नक्शे पर अपनी जगह बना ली है। पहले सिर्फ पुरुष पर परिवार के भरण पोषण का दायित्व होता था , आज स्त्री सच्ची सहचारिणी के रूप में बराबर कमा कर ला रही है। बेटे की तरह मां - बाप का सहारा बन रही है। वह परिवार के विकास में सहायक है। इन्हीं सब कारणों से समृद्धि दिख रही है। सड़कों पर इतनी कारें और वो भी लंबी से लंबी , बड़ी से बड़ी दिखाई दे रही हैं कि छोटे वाहनों को जगह ही नहीं मिल पाती। पैदलों की तो बिसात ही क्या है। घरों की मंजिलें दो या तीन की जगह ऊंची से ऊंची होती जा रही हैं। घर में एक एयरकंडीशनर से क्या काम चलेगा , हर कमरे में जरूरत पड़ रही है। नामी स्कूल वही है जो पूरी तरह एयरकंडीशनर है। यही नहीं , स्कूल की बसें भी एयरकंडीशनर हैं। वहां बच्चे का प्रवेश गौरव की बात मानी जाती है। 

आज हर किसी में अपनी सीमा और सामर्थ्य से ज्यादा की चाह भरी हुई है। चाहने पर ही तो कोशिश की जा सकती है , और कोशिश से ही उपलब्धि होती है। पर एक बात इस दौड़ में भुला दी गई है। वह यह कि उपलब्धियों की सीमा निश्चित न होने पर ' पुन : मूषको भव ' की स्थिति भी आ सकती है। इस दौड़ से जुड़ा तनाव अपने करिश्मे दिखा रहा है। बरसों पुरानी एक फिल्म का गीत ध्यान में आ रहा है , ' इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है ?' 

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि आज 98 प्रतिशत भारतीय तनावग्रस्त हैं। तनाव महामारी की तरह फैलता है। हमारे घर के बड़े सीमित घंटों के लिए ही घर से बाहर रहते थे। शाम तक घर भरा - पूरा होता था , क्योंकि सब लौट आते थे। घर की सारी चिंताओं से मुक्त पुरुष और बाहर की भागदौड़ से अछूती स्त्रियां , बच्चों और बड़ों के खानपान के अलावा मन को भी शांत तथा तनाव रहित रखती थीं। आज स्थिति बिल्कुल विपरीत है। नई पीढ़ी इस तथ्य को जानती है। इससे बचने के उपाय खोजती है। जगह - जगह योग , जिम , वेलनेस क्लीनिक और कायाकल्प वगैरह खोले जा रहे हैं। हालांकि वे मदद तभी कर सकते हैं जब व्यक्ति सोचने की जगह उन उपायों को जीवन में अपनाए। तनावग्रस्त व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है। 

खीज से बचने के लिए शराब या सिगरेट का सहारा लेता है। पुरुष की तरह स्त्री भी तनावग्रस्त होने पर उन्हीं उपायों को अपनाती है। फिर भी तनाव से छुटकारा नहीं मिल पाता , बल्कि बीमारियां और पकड़ लेती हैं। गुस्से और चिड़चिड़ेपन का नतीजा रोडरेज , हत्या आदि में दिखता है। आज तो घर भी सुरक्षित नहीं है। माता - पिता से संतान या संतान से माता - पिता , भाई - बहन , पति - पत्नी कोई भी रिश्ता इस हिंसा से बचा नहीं है। अक्सर लोगों को समय पर पहुंचने की चिंता आतंकित किए रहती है। 

खुशी की तलाश में कभी घर संवारते हैं तो कभी छुट्टी पर जाने की सोचते हैं , पर हर प्रयास तनाव को बढ़ावा देता जाता है क्योंकि लक्ष्य सबसे ऊपर रहने का होता है। जीवन का जो समय इन लक्ष्यों के पीछे दौड़ने में लगाते हैं वह निरर्थक लगने लगता है। रामकृष्ण परमहंस का मानना है कि ' हम क्या करें ' की चिंता व्यक्ति पर छोड़ दें तो कोई परेशानी नहीं होगी क्योंकि तब हम जान लेंगे कि सब कुछ उसकी इच्छा से होता है। विदेशी ज्ञानियों के अनुसार तनाव अज्ञान की स्थिति है। दूसरे को पछाड़ने की जगह अपनी सामर्थ्य को बढ़ाने की इच्छा से तनाव नहीं होता। किसी भी स्थिति में शांत और संतुलित रहने की चेष्टा ही लाभदायक हो सकती है(उमा पाठक,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,12.6.12)।

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सोमवार, 14 मई 2012

महिलाओं के मानसिक तनाव से जुड़ा है उनका हृदय-रोग

पैन्सिल्वेनिया अमेरिका में पैन स्टेट्स कॉलेज ऑफ मेडिसिन में हुए एक शोध अध्ययन से मालूम हुआ है कि तनाव ग्रस्त होने पर महिलाओं में हृदय की ओर रक्त का प्रवाह नहीं बढ़ता है। इसी शोध अध्ययन से पता चला है कि महिलाओं के हृदय को मानसिक तनाव का सामना करना पुरुषों के मुकाबले अधिक मुश्किल हो सकता है। 

अध्ययन के दौरान महिलाओं और पुरुषों को गणित का एक कठिन सवाल हल करने के लिए दिया गया। जैसा कि सोचा गया था, सवाल को हल करते हुए सभी का रक्तचाप और दिल धड़कने की गति दोनों बढ़ गए थे। आमतौर पर दिल धड़कने की गति और रक्तचाप के बढ़ने पर हृदय की ओर रक्त का संचार बढ़ जाता है। इससे हृदय को अधिक कार्य करने में मदद मिलती है। शोध के दौरान सभी महिलाएँ और पुरुष तनाव में काम कर रहे थे, उनके हृदय पर भी कार्यभार बढ़ गया था। इस दौरान पुरुषों की तरह महिलाओं के हृदय की ओर रक्त का प्रवाह नहीं बढ़ा था। जाहिर है कि रक्त का प्रवाह कम होने से जोखिम अधिक हो जाता है। इससे पता चलता है कि भावनात्मक तौर पर परेशान होने से महिलाओं में हृदय की समस्या होने की आशंका अधिक होती है।

मानसिक तनाव और हृदय 
शोधकर्ताओं ने गणित की यह समस्या ९ पुरुषों और ८ महिलाओं को दी। ये सभी स्वस्थ थे और सभी की उम्र २० वर्ष के आसपास थी। इन सभी का रक्तचाप और दिल की धड़कन की गति नापी गई थी। हृदय की मांसपेशियों की ओर रक्त की आपूर्ति नापने के लिए विशेष अल्ट्रासाउंड का उपयोग किया गया। शोध के दौरान, इसके पहले और बाद में हुए परिवर्तनों को नापा गया था। 

मानसिक तनाव को बढ़ाने के लिए शोधकर्ताओं ने उन्हें फटाफट समस्या हल करने के लिए कहा। उत्तर सही होने पर भी उन्होंने कई बार इसे ग़लत बताया। सवाल हल करने से पहले महिलाओं और पुरुषों में तीनों जाँचों का परिणाम एक जैसा ही था। एक बार तनाव बढ़ जाने के बाद पुरुषों के हृदय की ओर रक्त का प्रवाह बढ़ जाता था वहीं महिलाओं में ऐसा नहीं हुआ। 

शोधकर्ताओं का मानना है कि तनाव सभी के लिए हानिकारक है, इससे दूर रहने के प्रयास सभी को करने चाहिए लेकिन महिलाओं के इस संबंध में अधिक सर्तक रहने की ज़रुरत है। जो महिलाएँ तनावपूर्ण स्थिति में हृदय संबंधी समस्या के लक्षण महसूस करती हैं उन्हें इस बारे में चिकित्सक से परामर्श ज़रुर लेना चाहिए। 

ये करें तनाव-मुक्ति के लिए 

-तनाव हर व्यक्ति के लिए नुकसानप्रद होता है, विशेषकर गर्भवती महिलाओं के लिए ये बेहद हानकारक है क्योंकि इससे उसके साथ ही भ्रूण पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। तनाव को नियंत्रित न करने पर महिला को उच्च रक्तचाप, अपच या रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने जैसी समस्या हो सकती है। फलस्वरुप गर्भस्थ शिशु गंभीर रुप से प्रभावित हो सकता है।

-पौष्टिक आहार लें। थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बार-बार खाएँ। यह रक्त में शर्करा का स्तर नियंत्रित करने में सहायक होता है।

-समय-समय पर पानी पीते रहें ताकि निर्जलीकरण न हो।

-नियमित व्यायाम करें। व्यायाम से दिमाग़ में तनाव को कम करने वाले रसायन स्रावित होते हैं। योग,ध्यान या फिर मन को सुकून देने वाली कोई और गतिविधि केरं। 

-पसंदीदा खुशबुओं के साथ अरोमा बाथ लेने से राहत मिल सकती है। 

-रचनात्मक कार्यों में समय बिताना तनाव-मुक्ति के सबसे बढ़िया उपायों में से है। इस दौरान आपका दिमाग़ नई रचना की ओर केंद्रित होता है.इसलिए परेशानी से दूर हट जाता है। इन कार्यों को करते हुए दिमाग़ का हल खोजने वाला हिस्सा सक्रिय हो जाता है। भले ही आपका ध्यान इस ओर न हो,लेकिन आपका दिमाग़ समस्य का हल खोज रहा होता है। यानी,आपका तनाव अपने आप कम हो जाता है(सेहत,नई दुनिया,मई द्वितीयांक 2012)।

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शुक्रवार, 23 मार्च 2012

तनाव में क्या खाएं,क्या नहीं

आजकल अधिकांश लोगों के साथ समस्या रहती है असंतुलित खान-पान की। खाने-पीने के संबंध में यदि सावधानी नहीं रखी जाती है तो तुरंत इसके बुरे प्रभाव सामने आ जाते हैं। तेजी से बदलते खान-पान में ऐसी चीजों को छोड़ देना चाहिए जो आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं हैं। 

इस दौर में आपको क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, जानिए... 

यदि आप तनाव के कारण परेशान हैं तो ध्यान रखें ये बात कि स्ट्रेस से दिमाग ऑक्सीडेटिव डैमेज के प्रति संवेदनशील हो जाता है। यानी कोशिकाओं को मिलने वाली ऑक्सीजन की मात्रा प्रभावित होने लगती है। आगे चल कर इसका प्रभाव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली पर पड़ता है। ऐसे में एंटी-ऑक्सीडेंट्स से भरपूर खान-पान अपनाने से न सिर्फ मस्तिष्क बल्कि किडनी, लीवर और दिल को भी सेहतमंद बनाए रखा जा सकता है। इसके लिए दिन भर में तीन से पांच छोटे बाउल ताजे फलों का सेवन करें। फल विटामिन सी, केरोटिनायड्स और फाइबर से भरपूर होते हैं। ये कोशिकाओं को पोषण दे, उन्हें क्षतिग्रस्त होने से बचाते हैं। इसके साथ ही ज्यादा कॉफी या चाय पीने से बचें। कैफीन की ज्यादा मात्रा से तनाव में वृद्धि होती है। शाम को तो इनके सेवन से जरूर बचें, क्योंकि कैफीन का असर नींद पर पड़ता है। 

जो लोग डिप्रेशन का सामना कर रहे हैं वे दिनभर में सात अखरोट खाएं। ये ओमेगा 3 फैटी एसिड से भरपूर होते हैं, जो दिमाग के न्यूरोट्रांसमीटर पर असर छोड़ते हैं। इसके अलावा अगर डिप्रेशन ज्यादा रहता है तो कम वसा वाले डेयरी उत्पाद, मेवे और साबुत अनाज का सेवन करें। इनमें सेलेनियम अच्छी मात्रा में होता है, जो निराशा कम करने में मददगार है। इसके साथ ही विटामिन बी3 से भरपूर बीन स्प्राउट और ब्रोकोली, केले का सेवन करें। इनमें विटामिन सी और ए भी होता है, जो निराशा कम करने में मददगार है। सेब, बादाम और गाजर का सेवन करें, इनमें प्राकृतिक एंटीडिप्रेसेंट फिनेलिथैलेलाइन होता है(दैनिक भास्कर,उज्जैन,21.3.12)। 


विश्व तपेदिक दिवस पर कल सुबह आठ बजे पढ़िएः 
क्यों बढ़ रहे हैं महिलाओं में टीबी के मामले 


और शाम चार बजेः 
बच्चों में टीबी का पता कैसे चले?

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सोमवार, 2 जनवरी 2012

मालिश से दूर करें तनाव और थकान

तनाव व कार्य के अत्यधिक भार की वजह से कई लोग हरदम थकान व बोझिल महसूस करते हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने भी इसके चिकित्सकीय महत्व को स्वीकार किया है। 

नवजात बच्चे की मालिश की जाती है ताकि उसे गहरी नींद आए व शरीर का विकास त़ेजी से हो। बुजुर्ग व्यक्ति मालिश से वात व अन्य रोगों से मुक्ति पाते हैं। शरीर की संपूर्ण मांसपेशियों का तनाव दूर होता है व रक्त संचार की गति त़ेज हो जाती है। त्वचा विषैले पदार्थों को रोमछिद्रों के जरिए शरीर के बाहर निकालती रहती है। इससे त्वचा की रोग प्रतिरोधक क्षमता में अपार वृद्धि होती है, साथ ही इसमें स्निग्धता भी आती है। रोमछिद्रों के नीचे स्वेद ग्रंथियाँ होती हैं, मालिश से उनकी कार्यक्षमता भी बढ़ जाती है। नियमित मालिश करने से थकावट पैदा करने वाले लेक्ट्रिक अम्ल तेजी से निष्कासित होते हैं। मालिश से बुढ़ापे को चकमा दिया जा सकता है। तेल से मालिश से चेहरा सुंदर होता है व उस पर झुर्रियाँ लंबे समय तक नहीं पड़ती। आँखों की ज्योति बढ़ती है। रक्त संचार तेज होने से पूरे शरीर को पोषक तत्व और ऑक्सीजन प्राप्त होते हैं मालिश से शरीर के उत्सर्जन अंगों की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है और वे शरीर से विषैले पदार्थों का निष्कासन तेजी से करते हैं जिससे शरीर की चयापचय क्रिया संतुलित होती है। मसूड़ों को मालिश करने से दाँतों की जड़ मजबूत होती है। दाँतों को ब्रश करने के साथ ही मसूड़ों की प्रतिदिन मालिश करने से दाँत जीवन भर साथ नहीं छोड़ते हैं। 

कैसे करें 
मालिश करने के पूर्व शौच से निवृत्त हो जाना चाहिए। फर्श पर चादर बिछाकर स्वयं मालिश करें। धूप में मालिश करते समय पीठ करके बैठे। रीढ़ पर मालिश हेतु पर्याप्त समय देना चाहिए। मालिश इस प्रकार से करना चाहिए कि हृदय की ओर अधिकतम रक्त प्रवाह हो।

सिर की मालिश
सिर पर मालिश करने से चमत्कारिक लाभ मिलता है, इससे मानसिक थकान दूर होती है। रात को सोने से पहले तलवे की मालिश करने से थकान दूर होती है और गहरी नींद आती है। आँखों की ज्योति भी बढ़ती है। सोने से पहले पेड़ू पर खाद्य तेल मौसम व शरीर की प्रकृति के अनुसार लगाकर बहुत हल्की मालिश करने से कब्ज से मुक्ति मिलती है।  

कौन सा तेल 
मालिश के लिए तिल, सरसों, मूँगफली, बादाम, जैतून, अरंडी तेल आदि का मौसम व शरीर की प्रकृति के अनुसार चुनाव किया जा सकता है। प्रकृति के अनुसार महानारायणादि तेल, ब्राह्मी तेल, महामरिचादि तेल व अश्वगंधादि तेल का प्रयोग किया जा सकता है। नीले, लाल व पीले रंग से तप्त तेलों से भी मालिश चिकित्सा का लाभ लिया जा सकता है, क्योंकि सूर्य की रोशनी द्वारा तप्त तेल के माध्यम से शरीर निरोगी व स्वस्थ रहता है(डॉ. जगदीश जोशी,सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर 2011 पंचमांक)।

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रविवार, 1 जनवरी 2012

नववर्ष विशेषःश्वास-नियंत्रण से रहें प्रसन्न

साँस लेना जिंदा रहने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जब हम उत्तेजित होते हैं तब साँसें बहुत तेज गति से चलने लगती हैं और शांत अवस्था में इनकी गति धीमी हो जाती है। इसको इस तरह भी कहा जा सकता है कि यदि प्रयत्नपूर्वक धीमी गति से साँस लेंगे तो तनाव शिथिल होगा। 

प्राणायाम और अनुलोम विलोम की सभी प्रक्रियाएँ तनाव शैथिल्य के कारगर उपाय समझे जाते हैं। यदि आप दाहिने ओर के नथुने को बंद कर बाईं तरफ के नथुनों से साँस लेते हैं तो तनाव दूर होता है, इसी के उलट दाहिने नथुने से साँस लेने पर तत्काल ऊर्जा हासिल होती है। हम अपनी सामान्य जिंदगी में फेफड़ों का पूरी क्षमता से कभी इस्तेमाल ही नहीं करते। इसके लिए अलग से किए गए अभ्यास से यह फायदा होगा कि धीरे-धीरे यह आदत में शामिल हो जाएगा। बुरी आदतों को दूर करने में भी प्राणायाम की क्रियाएँ सहयोग कर सकती हैं। बुरी आदतों के पैटर्न को हमेशा के लिए तोड़ने में साँसों का महत्वपूर्ण स्थान है। मस्तिष्क में गहरे तक जम चुकी आदतों को केवल योगाभ्यास से ही दूर किया जा सकता है। 

फायदा...
-शरीर में ऑक्सीजन का बहाव बढ़ेगा। इससे शरीर के प्रत्येग अंग में नई ऊर्जा का संचार होगा और रोगविहीन शरीर हासिल होगा। मन की उद्विग्नता शांत होगी।

-फेफड़ों में पहले से जमा विषैले पदार्थ बाहर निकलेंगे।

-एंडोर्फिन का उत्पादन बढ़ेगा जिससे अवसाद दूर होगा।

-फेफड़ों को अतिरिक्त फुलाने से एकाग्रता, धैर्य, लचीलापन तथा प्रतिरोध शक्ति बढ़ेगी। इससे पिट्यूटरी ग्रंथि का स्राव बढ़ेगा जिससे अंतर्दृष्टि भी बढ़ेगी।

-इससे रीढ़ की हड्डी के स्राव का बहाव मस्तिष्क की ओर बढ़ेगा जिससे संपूर्ण शरीर की ऊर्जा में भी वृद्धि होगी।

-आभामंडल बढ़ेगा और असुरक्षा की भावना खत्म होगी साथ ही भय भी जाता रहेगा।

-रक्त शुद्धि होगी।

-नकारात्मक भावनाओं पर नियंत्रण हो सकेगा और जिससे बुरी आदतों पर लगाम लगेगी। पुराना ढर्रा भी टूट सकेगा।

कैसे करें 
-पद्मासन अथवा सुखासन में रीढ़ की हड्डी बिलकुल सीधी रखते हुए बैठें।

-दाहिने नथुने को सीधे हाथ के अँगूठे से बंद कर लें। शेष अँगुलियों को आकाश की ओर रखें।

-बाएँ नथुने से फेफड़ों में साँस भरकर अंदर रोक लें। इस नथुने को अंगुलियों की मदद से बंद कर लें। धीरे-धीरे साँस दाहिने नथुने से बाहर निकाल दें।

-अब दाएँ नथुने से साँस अंदर की ओर भरें। अँगूठे की मदद से इसे बंद कर लें और थोड़ी देर रुककर बाएँ नथुने से बाहर निकाल दें। ऐसा ५ से १० मिनट तक नियमित रूप से करें। 

लंबी और गहरी साँस
फेफड़ों से पूरी क्षमता का काम लेना हो तो उसे ऑक्सीजन से भरना जरूरी है। इसके लिए लंबी और गहरी साँस ही मुफीद होगी। स्वास और प्रच्छवास दोनों लंबे और धीमी गति से पूर्ण किए जाने चाहिए। आमतौर पर ऐसा सिर्फ नाक से साँस लेने पर ही किया जा सकता है। मुँह से साँस लेकर भी इसकी गति को धीमे किया जा सकता है लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे। 

संतुलन बढ़ेगा
-मस्तिष्क के दोनों हिस्सों का संतुलन बढ़ेगा।
-प्रभावशीलता और शांति में इजाफा होगा।
-मानसिक स्थिति में बदलाव होगा।
-किसी प्रेजेंटेशन अथवा महत्वपूर्ण मीटिंग जिसमें आपके नर्वस होने के अवसर अधिक हों उसमें जाने से पहले ये यौगिक क्रियाएँ अवश्य करें।
-इससे आपको नर्वसनेस पर काबू पाने में मदद मिलेगी।
-आपकी घबराहट शांत रहेगी और आप किसी प्रश्न का उत्तर बिना उत्तेजित हुए दे सकेंगे।
-जीवन में लगातार तनावग्रस्त रहते हों तो प्रतिदिन इन यौगिक क्रियाओं से आपको बहुत फायदा होगा(डॉ. संजीव नाईक,सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर,चतुर्थांक 2011)।

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मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

शिफ्टों की नींद है ख़तरनाक

दिल्ली के यूथ पर हुई एक स्टडी बताती है कि नाइट शिफ्ट करने वाले ज्यादातर लोगों की लाइफ काफी प्रभावित हुई है। उन्हें डिप्रेशन जैसी हेल्थ प्रॉब्लम्स का सामना करना पड़ रहा है : 

पिछले दिनों इंडियन स्लीप डिसऑर्डर एसोसिएशन ने दिल्ली के 19 से 37 साल के ऐज ग्रुप के लोगों पर एक स्टडी की। इसमें पाया गया कि नाइट शिफ्ट में काम करने वाले 81.1 पर्सेंट प्रफेशनल्स को डिप्रेशन की शिकायत है। दूसरी ओर , डे शिफ्ट में काम करने वालों में महज 14.8 पर्सेंट लोग ही इसके शिकार हैं। 

यही नहीं , नाइट शिफ्ट वालों में स्मोकिंग और अल्कोहल लेने की हैबिट भी देखी गई है। यह दिल्लीवालों के लिए प्रॉब्लम और बड़ी कर रहा है। दरअसल , ये रात में काम करने के लिए कॉफी और एनर्जी ड्रिंक्स पर डिपेंड हैं , वहीं दिन में सोने के लिए अल्कोहल की हेल्प लेते हैं। 

दिक्कत ही दिक्कत 
 बीपीओ सेक्टर के अलावा भी कई फील्ड्स हैं , जहां लेट नाइट ऑफिस टाइमिंग्स हैं। मेट्रो हॉस्पिटल एंड हार्ट इंस्टीट्यूट , नोएडा में स्लीप मेडिसिन के डिपार्टमेंटल हेड डॉ . अपार जिंदल का कहना है कि सबसे ज्यादा प्रॉब्लम वहां होती है , जहां रोटेटिंग शिफ्ट होती है। ऐसे में बॉडी को शिफ्ट के अनुसार खुद को एडजस्ट करने में प्रॉब्लम होती है। 

शिफ्ट वर्क स्लीप डिसऑर्डर के चलते क्रॉनिक इंसोमेनिया या एक्सेसिव स्लीपीनेस की प्रॉब्लम भी हो जाती है। यही नहीं , लगातार कंप्यूटर और हेडफोन के एक्सपोजर से बैक और शोल्डर पेन जैसी फिजिकल प्रॉब्लम्स हो सकती हैं। सीनियर फिजिशियन डॉ . एस . सी . मोदी के मुताबिक , शिफ्ट्स के चलते गैस्ट्रिक या कॉन्स्टिपेशन की प्रॉब्लम भी बहुत देखने में आती है। 

वैसे तो , स्लीप हाईजीन सबके लिए बेहद काम की चीज है , लेकिन शिफ्ट जॉब वालों को तो इसकी जरूरत कुछ ज्यादा ही होती है। 

खो गई सपनों वाली नींद 
करियर की ऊंची उड़ान और ढेर सारा पैसा कमाने की जिद ने यूथ की नींद छीन ली है। ऐसे में दिल्ली के युवा ज्यादा से ज्यादा काम और कम से कम आराम कर रहे हैं। नाइट शिफ्ट की वजह से उन्हें अच्छी नींद भी नहीं आती। 

दरअसल , दिन में सोने से रैपिड स्लीप और नॉन रैपिड स्लीप की रेश्यो खराब हो जाती है। यह रेश्यो 25 : 75 का होता है। डॉ . जिंदल के मुताबिक , ' टोटल स्लीप का 25 पर्सेंट हिस्सा रैपिड स्लीप होती है और इसी की वजह से लोगों को मीठे - मीठे सपने आते हैं। होता यह है कि जब हम अपनी नींद का नेचरल टाइम खो देते हैं , तब दोनों पर ही इफेक्ट पड़ता है। दिन में सोने के बाद भी रैपिड स्लीप पूरी नहीं हो पाती। इसकी वजह से आपकी इंटेलेक्चुअल कपैसिटी और मेमरी पर भी असर पड़ने लगता है। मूड चेंजिंग की दिक्कत भी आ सकती है। आपको बिना किसी वजह के ही गुस्सा आने लगता है और फ्रस्टेशन भी होती है। ' 
जाहिर है , ऐसे में दिल्ली के युवाओं को साइलेंट स्लीप की जरूरत है। 

प्लान करें गेट - टुगेदर 
दरअसल , हम डे - ओरिएंटेड सोसाइटी में रहते हैं। ऐसे में शिफ्ट में काम करने वालों को अपने करीबी रिश्तेदारों या दोस्तों से मिलने - जुलने के शेड्यूल को मैच कराने के लिए एक्स्ट्रा एफर्ट करने पड़ते हैं। एक्सपर्ट की मानें , तो इसका सॉल्यूशन यह है कि आप गेट - टुगेदर के लिए थोड़ी सी प्लानिंग करें। इससे आप खुद को अपनी फैमिली से अलग - थलग महसूस नहीं करेंगे। लोगों से मिलने - जुलने से डिप्रेशन जैसी चीजों को रोका जा सकता है। 

एक्सपर्ट की सलाह - 
साइलेंट स्लीप के लिए बाहर के शोर को आप अवॉइड नहीं कर सकते , ऐसे में इयर बड या कॉटन डालकर सो सकते हैं। आंखों पर भी बैंड लगाकर सो सकते हैं। सोने के रिलैक्सिंग तकनीक अपनाएं। मोबाइल को साइलेंट कर दें। शॉवर ले लें या फिर वॉर्म वॉटर में पैर डाल लें। अगर इससे भी काम नहीं चलता तब किसी स्लीप एक्सपर्ट से मिलें। किसी एक्सपर्ट की सजेशन लेकर आप ' मेलाटोनिन ' जैसी मेडिसिन ले सकते हैं , जिसके असर से आप दिन में अच्छी नींद ले सकते हैं और रात में काम करते हुए अलर्ट रह सकते हैं। 

- काम के बीच में 15 मिनट का ब्रेक लें। इस ब्रेक से थकान घटेगी और प्रॉडक्टिविटी लेवल भी बढ़ेगा। अगर आपकी शिफ्ट 8 घंटे की है , तो इसमें लंच के अलावा 15 मिनट के दो या तीन ब्रेक लें। बेहतर होगा अगर आपकी शिफ्ट कम से कम दो हफ्ते के इंटरवल पर रोटेट हो। 

- ऐसे में डाइट को हर हाल में बैंलेंस रखें। डॉ . मोदी के मुताबिक , खाने के तुरंत बाद न सोएं। एक्स्ट्रा स्पाइसी फूड न लें और पानी खूब पीएं। एनर्जी के लिए हाई प्रोटीन और हाई कार्बोहाईड्रेट वाली डाइट लें। लो फैट डाइट लें। थोड़ी सी एक्सरसाइज जरूर करें। 

- ज्यादा चाय या कॉफी न लें। आपको बता दें कि कैफीन की क्वांटिटी ज्यादा होने से आयरन और कैल्शियम को एब्जॉर्ब करने में दिक्कत आती है , जो महिलाओं के लिए खासी हार्मफुल होती है। इससे ब्लड प्रेशर पर भी इफेक्ट पड़ता है। इसकी जगह हर्बल टी , जूस या मिल्क ले सकते हैं(प्रीतंभरा प्रकाश,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,2.12.11)।

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गुरुवार, 19 मई 2011

जम्मू-कश्मीरःमहिलाओं को तनाव से बचाएगा आयोग

महिलाओं को तनाव से बचाने के लिए राज्य महिला आयोग स्ट्रेस मैनेजमेंट सेंटर खोलेगा। राज्य का यह पहला ऐसा केंद्र होगा जहां महिलाओं को तनाव से दूर रहने के नुस्खे सिखाए जाएंगे।

सेंटर खोलने के लिए आयोग जल्द ही बैठक करेगा सेंटर किस अस्पताल में खोलना है, इसका निर्णय भी बैठक में ही होगा। ऐसी संभावना है कि जीएमसी अस्पताल, गांधीनगर, एसएमजीएस और सरवाल अस्पताल में से किसी एक जगह सेंटर खुलेगा।

अस्पताल ही क्यों
राज्य महिला आयोग के मुताबिक अस्पताल में सेंटर खुलने से अधिक फायदा होगा। विशेषज्ञ डॉक्टरों से तनावमुक्त रहने के नुस्खे मिलेंगे। एक कोर्स के तौर पर महिलाओं को तनाव से दूर रहने के बारे बताया जाएगा। अस्पताल में सेंटर खुलने से 24 घंटे डॉक्टर उपलब्ध रहेंगे और ट्रीटमेंट के लिए अन्य जरूरी सुविधाऐं भी मिलेगीं।

आयोग के पास पहुंचने वाले घरेलू हिंसा के मामलों की जांच करने पर यह सामने आया है कि महिलाएं तनाव में रहती हैं। इसके कारण महिलाएं कहीं आत्महत्या कर रही हैं तो कोई इसका प्रयास कर रही हैं। आयोग समय-समय पर जानकारी जुटाता रहता है। इसलिए महिलाओं को तनावमुक्तबनाने के लिए सेंटर खोला जा रहा है-"हफीजा मुजफ्फर, सचिव, राज्य महिला आयोग(अजय मीनिया,दैनिक भास्कर,जम्मू,18.5.11)।

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गुरुवार, 10 मार्च 2011

गर ऑफिस के तनाव से मुक्त होना हो......

कार्यस्थल के तनाव को घर तक ले आना समझदारी नहीं है। काम के बोझ को बहुत दिल पर लेने से सामान्य स्थिति मे लौटना मुश्किल हो जाता है। आप अपनी समस्या जितनी अच्छी तरह से समझ सकते हैं दूसरा नहीं समझ सकता। इसलिए उन पर बहुत निर्भर रहने की अपेक्षा खुद पर ही भरोसा करें। याद रखें कि काम का तनाव आपको बहुत गंभीर बीमारी की ओर धकेल सकता है।

जरा अपने जीवन के उन लम्हों को याद कीजिए जब आप तनावग्रस्त थे। हो सकता है कि ऐसा तब हुआ हो जब अपने काम के दौरान आप अपनी प्रेजेंटेशन दे रहे हों, अपने बच्चों के बारे में चिंतित हों, डेडलाइन को पूरा करने के लिए जूझ रहे हों या फिर अपने जीवनसाथी से बहस में उलझ गए हों। सोचो कि आपका दिल उस समय किस तरह जोर-जोर से धड़क रहा था और मुश्किल से साँस ले पा रहे थे? यह लगातार तनाव और चिंता भावनात्मक, शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक संकट बढ़ सकती हैं और यहाँ तक कि आपके हृदय तक के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं।

हाल ही में किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि काम के दौरान होने वाले तनावों का हृदय रोग से गहरा संबंध है। जिन लोगों को काम के दौरान तनाव था उन्हें कॉरोनरी हार्ट डिजीज होने का खतरा उन लोगों की तुलना में ६८ प्रतिशत अधिक रहता है जिन लोगों को काम के दौरान कम तनाव होता है। मूड तथा चैन की नींद आने में दिक्कत, पेट खराब होने, सिर दर्द या फिर परिवार अथवा मित्रों के साथ संबंध ठीक ना होना कार्यस्थल के दौरान तनाव के कुछ प्रारंभिक कारण हैं।

इसीलिए तनाव पर काबू पाना आवश्यक हो गया है खासतौर पर ऐसे समय में जब आपकी नौकरी काफी डिमांडिंग या चुनौतियों से भरी हो।


कार्यस्थल पर तनावमुक्त तथा प्रसन्न रहने के कुछ आसान उपाय
ब्रेक लीजिए- 
यह एक साधारण सा सुझाव है लेकिन इसके बहुत ही अच्छे एवं प्रभावकारी परिणाम होते हैं। रुकिए, थोड़ा ब्रेक लीजिए और फिर से विश्लेषण कीजिए। कुछ पल के बाद ही आपको आगे बढ़ने के लिए ताकत मिलेगी। केवल एक मिनट का ब्रेक भी हमारे मस्तिष्क को तरोताजा कर देगा और हमें अगला काम करने के लिए शक्ति तथा प्रेरणा देगा।

सोचिए कि कार्यस्थल पर कौन सा काम करके आपका दिन अच्छा गुजरता है- 
अगली बार जब कभी काम के दौरान मजा लेने का मौका हो तो उसे जाहिर करने के लिए एक पल लीजिए। लिखिए जिससे आपका दिन बहुत ही बेहतरीन बन गया हो। आपने क्या किया था? आपने क्या कहा था? इस प्रकार आपके पास आपके "बेहतरीन गुजरे" दिनों की सूची हो जाएगी। आपको पता होगा कि आपको क्या चाहिए। इस पर काम कीजिए। हरेक के लिए मौज मस्ती के मायने अलग-अलग होते हैं।

अपने आसपास ऐसी चीजें रखिए जिनसे आपको प्रसन्न रहने में मदद मिले- अपने मित्र, पालतू जानवर या उसकी तस्वीर लगाइए जिसे आप प्यार करते हों। केलेंडर लगाइए और उसमें दिन तब तक मार्क करिए जब तक कि आपकी अगली छुट्टी का दिन न आ जाए। आपके कम्प्यूटर पर वह स्क्रीन सेवर लगाइए जो आपको प्रेरित करता हो या आपको खुश रखता हो।

नियमित रूप से अपने मित्रों तथा परिवार के साथ घूमने जाइए
डिनर पर जाइए, फिल्म या फिर सप्ताहांत गुजारने के लिए भी बाहर जाइए। पौष्टिक भोजन कीजिए और नियमित व्यायाम कीजिए- इसके लिए चाहिए बस व्यायाम करते समय पहनने वाले जूते, कुछ पलों के लिए ट्रेडमिल पर या फिर इससे भी बेहतर है होगा किसी खूबसूरत से बीच यानी समुद्र तट पर जॉगिंग करना या फिर पार्क में दौड़ना।

इन्हें आजमाएं..
स्वयं समाज सेवा दीजिए : किसी की मदद करने से जिस संतोष का अनुभव होता है वह असीम है। आप विकलांग बच्चों या ओल्ड एज होम में बुजुर्गों को पढ़ा कर अपना योगदान दे सकते हैं।


खुशियां बिखेरिए: अपना दिन मुस्कुराहट के साथ शुरू कीजिए, हर दिन कम से कम एक व्यक्ति की सराहना कीजिए, लोगों को शुभकामनाएँ देते समय मुस्कुराइए और मानिए जैसे हर दिन आपके शेष जीवन का प्रथम दिन हो।

कार्यस्थल पर मित्र बनाइए : कार्यस्थल पर सबसे खुशहाल वे लोग होते हैं जिनके सहयोगी उनके मित्र होते हैं। कार्यस्थल पर उन लोगों की पहचान कीजिए जिन्हें आप पसंद करते हों और उनके साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार करने के लिए पूरे प्रयास कीजिए। लोगों में वास्तव में रुचि लीजिए और वे वैसा ही आपके साथ भी करेंगे।

ध्यान लगाइए : कुछ समय ध्यान लगाने यानी चिंतन और आध्यात्मिकता के लिए भी रखिए- यह आपके जीवन से तनाव को समाप्त करने में मदद करता है(डॉ. टी.एस. क्लेर,सेहत,नई दुनिया,मार्च प्रथमांक 2011)।

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गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

क्रोध और चिड़चिड़ेपन से बचाता है सर्वांगासन

आज प्रतिस्पर्धा का युग है। ऐसे में सभी को अत्यधिक मेहनत करना होती है। शारीरिक और मानसिक श्रम की अधिकता से अधिकांश लोगों का स्वभाव क्रोधी और चिड़चिड़ेपन वाला हो जाता है। किसी का भी छोटी-छोटी बातों में चिड़ जाना यह तो आम बात हो गई है परंतु जो व्यक्ति प्रतिदिन योग करते हैं वे क्रोध से दूर ही रहते हैं। सर्वांगासन के नियमित अभ्यास से हमारा मन शांत रहता है। जिससे क्रोध तथा चिड़चिड़ेपन से निजात मिलती है।
आसन की विधि- समतल भूमि पर आसन बिछाकर शवासन में लेट जाइएं। अपने दोनों हाथों को जांघों की बगल में तथा हथेलियों को जमीन पर रखें। पैरों को घुटनों से मोड़कर ऊपर उठाइएं तथा पाीठ को कं धों तक उठाइएं। दोनों हाथ कमर के नीचे रखकर शरीर के उठे हुए भाग को सहारा दीजिएं। इस तरह ठुड्डी को छाती से लगाए रखें। अब श्वांस को रोके नहीं स्वाभाविक रुप से चलने दें। पैर और धड़ को एक सीध में रखें। इस स्थिति में रुकने के बाद, पैरों को जमीन पर वापस लाइएं। पैरों को घुटनों से मोड़ते हुए घुटनों को माथे के पास लाइएं। हाथों को जमीन रखते हुये शरीर और पैरों को धीरे -धीरे वापस शवासन में लाइएं। अब शवासन में शरीर को शिथिल अवस्था में लाइएं। आसन करते समय आंखों को खुला रखें।

आसन के लिए सावधानियां - आसन का अभ्यास करते समय धैर्य से काम लें। जल्दबाजी एवं हड़बड़ाहट में आसन न करें। इस आसन का अभ्यास पीठ दर्द, कमर दर्द, नेत्र रोगी और उच्च रक्तचाप के रोगी ने करें।
आसन के लाभ- इस आसन के नियमित अभ्यास से मानसिक तनाव, निराशा, हताशा एवं चिंताएं आदि रोगों का नाश होता है। इससे आखों का तेज बढ़ता है और चेहरा कांतिमय बनता है। स्त्रियों के स्वास्थ में इस आसन से विशेष लाभ होता है । स्त्रियों की मासिक धर्म संबंधी समस्याएं दूर होती हैं। सर्वांगासन से शरीर के उन अंगों से रक्त संचरण बढ़ जाता है, जहां रक्त संचार कम होता है। शरीर का प्रत्येक अंग स्वस्थ हो जाता है। चेहरे पर झाइयां नहीं पड़ती हैं और चेहरे पर चमक बनी रहती है। समय से पूर्व बाल सफेद नहीं होते हैं। आंखे स्वस्थ रहती है। इस आसन के करने से मानसिक तनाव दूर होता है। क्रोध और चिड़चिडा़पन दूर होता है(दैनिक भास्कर,उज्जैन,22.12.2010)।

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सोमवार, 8 नवंबर 2010

आईटी का ग्लैमर देता है महिलाओं को टेंशन!

सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) सेक्टर में नौकरी की चकाचौंध और वेतन भले ही बढि़या हो, लेकिन महिलाओं के लिए यह नौकरियां बड़े शारीरिक और मानसिक तनाव का कारण है। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है। केरल राज्य महिला आयोग के किए गए अध्ययन के अनुसार,आईटी सेक्टर की मोटी तनख्वाह और इससे बढ़ती सामाजिक प्रतिष्ठा ने महिलाओं को यहां पर काम करने के लिए आकर्षित किया है। अध्ययन में आईटी सेक्टर में कार्यरत 150 महिलाओं को शामिल किया गया। इस अध्ययन में निजी अस्पतालों के नर्सिग क्षेत्र के अलावा भी कई अन्य क्षेत्रों में भी अध्ययन किया गया। अन्य क्षेत्रों की पचास महिलाओं को इस अध्ययन में शामिल किया गया। इसमें पाया गया कि बैठकर देर तक काम करने के घंटों और काम के दबाव से महिलाएं शारीरिक और मानसिक पीड़ा से गुजरती हैं। भले ही उनका ऑफिस कितना ही शानदार क्यों न हो। अध्ययन में सलाह दी गई है कि सभी आईटी संस्थानों को महिला कर्मियों का तनाव कम करने के लिए परामर्श (काउंसिलिंग) की व्यवस्था करनी चाहिए। सरकार की ओर से नियम बनाकर उनके काम करने के घंटों को पुन: निर्धारित किया जाना चाहिए। आयोग ने यह भी कहा है कि आईटी सेक्टर में काम कर रही महिलाओं को सरकारी नौकरी कर रही महिलाओं की तरह ही मातृत्व सुविधा दी जानी चाहिए। साथ ही उनकी कार्य अवधि पर भी खास ध्यान दिया जाना चाहिए। इस अध्ययन से सहमति जताते हुए टेक्नोपार्क के पूर्व सीईओ एन. राधाकृष्णनन नायर ने कहा कि फिर भी आईटी क्षेत्र में कामकाज का माहौल अन्य क्षेत्रों से कहीं बेहतर है। उन्होंने कहा कि काम खत्म करने की डेडलाइन का दबाव जरूर होता है, लेकिन यह दबाव महिलाओं और पुरुषों दोनों पर ही समान रूप से होता है। उनके मुताबिक बीपीओ क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं को जरूर सहायता की जरूरत हो सकती है(दैनिकजागरण,राष्ट्रीय संस्करण में तिरुवनंतपुरम् की रिपोर्ट)।

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शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

तनाव और गपशप

बात करना हमेशा कठिन, जटिल से जटिल मामले में राह दिखाने वाला होता है। इसलिए आपसी संबंधों में जब भी कोई संकट दिखे आँख मूँदकर बातचीत का सहारा लें। समस्या खत्म हो जाएगी और तनाव से छुटकारा भी मिलेगा।
यूँ तो बातचीत किसी भी तरह के संबंधों को सहज बनाए रखने, उन्हें रिचार्ज करने के लिए जरूरी होती है; लेकिन अगर रिश्ता पति-पत्नी का हो और दोनों के बीच बेफिक्री से ज्यादा मन-मुटाव पसरा रहता हो तो बहुत ही जल्द पति-पत्नी के रिश्तों में ठंडापन आ जाता है। यदि दोनों कामकाजी हैं तो दोनों में संवाद का सिलसिला भी धीरे-धीरे कम हो जाता है। इसलिए ऐसी स्थिति में वह ठंडापन और ज्यादा बढ़ जाता है। इससे तनाव, अवसाद व नकारात्मक मानसिक परेशानियों के उपजने का खतरा और भी बढ़ जाता है। आपसी संवाद से न केवल दोनों के बीच आत्मविश्वास पुख्ता होता है, बल्कि इससे आपसी प्यार भी बढ़ता है। अपने दिनभर के क्रियाकलापों व गतिविधियों को आपस में मिल-बैठकर तय करना, उन्हें शेयर करना, एक-दूसरे को सलाह देना, डिस्कशन के दौरान आपसी विचारों का खुलापन इस बात की ओर इशारा करता है कि दोनों के बीच कोई दुराव-छिपाव नहीं है और दोनों एक-दूसरे को लेकर खुले विचारों के हैं। पूरा दिन काम की थकान के बाद पति-पत्नी के बीच यदि दिन भर की गतिविधियों के बारे में थोड़ी-बहुत बातचीत हो जाती है तो यह बातचीत दोनों के मूड को फ्रेश कर देती है। अपने सहकर्मियों के साथ की गतिविधियाँ, अपने भावी प्रोजेक्ट्स के विषय में सलाह जैसी चीजें, आपको लगातार एक-दूसरे से जोड़े रहती है। आपमें नई ऊर्जा भरती है। रात में खाने के दौरान भी बातचीत का सिलसिला शुरू किया जा सकता है, लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि इस समय दोनों एक-दूसरे को अप्रिय लगने वाले विषयों या चीजों पर बातचीत करने से बचें, क्योंकि इससे आपसी तनाव दूर होने की बजाय बढ़ भी सकता है। डाइनिंग टेबल पर बातचीत तुरंत खाना परोसने के साथ ही शुरू न करें। इसे खाना खाने के दौरान कुछ इस ढंग से शुरू करें,-तुम्हें पता है आज क्या हुआ...? इस तरह की शुरुआत से आप अपनी दिनभर की गतिविधियों से बातचीत का सिलसिला बेहतर ढंग से बनाए रख सकते हैं। पति-पत्नी में यदि एक को बातचीत में सिर्फ हाँ या न कहने की आदत है तो जरूरी नहीं है कि दूसरा कम बात को खत्म करके तुरंत दूसरी बात या फिर तीसरी बात का सिलसिला लगातार बनाए रखे। इससे दोनों के बीच बेहतर संवाद की स्थिति नहीं बन पाती है। खाने के समय आपसी संवाद के अलावा आप दोनों अपनी अन्य गतिविधियों में भी बातों का सिलसिला बनाए रखने के लिए समय निकालें। टीवी प्रोग्राम देखने के विषय में भी दोनों अपनी पसंद का प्रोग्राम एकसाथ मिलकर देखें। अपने जीवनसाथी के साथ लंबे समय तक बेहतर संवाद जारी रखने के लिए पेश हैं कुछ उपयोगी टिप्स :- *सुबह-जल्दी उठें। संभव हो तो रसोई में मिल-जुलकर काम करें। *सब्जी काटने में पार्टनर से ली गई मदद बातचीत का सिलसिला बरकरार रखने का बेहतरीन जरिया है। * बातचीत के दौरान दोनों एक-दूसरे को पसंदीदा जोक सुनाएँ। *यदि आपका पार्टनर आपकी किसी बात को सुनकर सीरियस हो गया हो तो इस बारे में गंभीर होकर सोचने की जरूरत है। * एक-दूसरे की इच्छाओं, अपेक्षाओं का सम्मान करें। *अपने पार्टनर से पूछे बिना कोई बड़ा निर्णय न लें। *अपनी भावी योजनाओं के विषय में बातचीत करते रहें। *अकस्मात कोई निर्णय लेने की बजाए धीरे-धीरे स्थितियों का खुलासा करें इससे आपसी संबंधी की डोर मजबूत होती है(नायिका,नई दुनिया,21 जुलाई,2010)।

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मंगलवार, 6 जुलाई 2010

हाइपरटेंशन

वैश्वीकरण और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में चारों ओर एक ही प्रकार की हवा बह रही है। इस हवा के चलते हर कोई एक जीवन में सबकुछ हासिल कर लेने को उतावला होता जा रहा है। इस जीवनशैली ने लोगों को तरक्की के साथ कुछ नकारात्मक चीजें भी दी हैं। इनमें पहले स्थान पर आता है तनाव। तेजी से भागती जीवनशैली ने आदमी को आधुनिक होने का तमगा तो दिला दिया लेकिन इसी के साथ कई प्रकार के दबाव और इस दबाव के कारण तनाव की स्थिति का जन्म हुआ। तनाव के अस्तित्व में आने से बीमारियों के प्रकार में भी वृद्धि होती गई। तनाव के कारण उपजी बीमारियों मेंं हाइपरटेंशन सबसे घातक बीमारी बन चुकी है। इसे मुख्यत: एक समस्या कहा जा सकता है जो तनाव के कारण उत्पन्न होती है। इस समस्या से ही तमाम जानलेवा बीमारियां अस्तित्व में आई हैं। हाइपरटेंशन के साथ परेशानी का विषय यह भी है कि व्यक्ति कब इसकी चपेट में आ जाता है, उसे खुद भी पता नहीं चलता। लगातार तनाव में बने रहने की स्थिति से ही हाइपरटेंशन का जन्म होता है। इस बीमारी का असर सीधे तौर पर व्यक्ति के दिमाग पर पड़ता है। मानव शरीर को नियंत्रित करने या यूं कहें कि शरीर के बॉस की भूमिका दिमाग ही निभाता है। यही शरीर के अन्य महत्वपूर्ण हिस्सों को भी उनकी जिम्मेदारियों से परिचित कराता है। ऐसे में अगर इस हिस्से में ही समस्या उत्पन्न हो जाए तो जाहिर सी बात है इसका प्रभाव पूरे शरीर पर पड़ेगा। हाइपरटेंशन एक जटिल मेडिकल अवस्था है जिससे प्रभावित होने पर व्यक्ति को रक्तचाप में उतार-चढ़ाव की शिकायत होनी शुरू हो जाती है। हाइपरटेंशन हाई ब्लड प्रेशर का मुख्य कारण होता है। ब्लड प्रेशर हाई होने पर हृदय रोग की शिकायत आम हो जाती है। हाइपरटेंशन को दो प्रकारों में विभाजित किया गया है,प्राइमरी और सेकेंडरी। प्राइमरी हाइपरटेंशन में रक्तचाप के बढऩे का कोई मेडिकल कारण नहीं होता,यह अचानक ही बढऩे या घटने लगता है। हाइपरटेंशन के शिकार ज्यादातर लोग इसी प्रकार से पीडि़त रहते हैं। सेकेंडरी हाइपरटेंशन में ब्लड प्रेशर हाई होने के पीछे कोई न कोई कारण कोई न कोई वजह होती है, जैसे किडनी से जुड़ी बीमारियां, ट्यूमर आदि। हाइपरटेंशन के कारण सबसे बड़ा खतरा स्ट्रोक, हार्ट अटैक, हार्ट फैल्योर का रहता है। हाइपरटेंशन की समस्या होने पर शरीर में खून का प्रवाह सही ढंग से होना बंद हो जाता है। हाइपरटेंशन की समस्या लगातार बढऩे से स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इसे रक्तचाप में उतार-चढ़ाव के आधर पर दो अन्य वर्गों में विभाजित कर दिया है, इनमें एक है प्रीहाइपरटेंशन और दूसरा है आइसोलेटेड सिस्टोलिक हाइपरटेंशन। दूसरे प्रकार के हाइपरटेंशन से ज्यादातर बुजुर्ग ही पीडि़त रहते हैं। हाइपरटेंशन की समस्या उत्पन्न होते ही शरीर के अलग-अलग हिस्सों में छोटे-बड़े संकेत मिलने लगते हैं जिनमें सिर में दर्द बने रहना, हमेशा भ्रम की स्थिति में रहना, आंखों में परेशानी होने पर देखने में दिक्कत होना, अकसर ही जुकाम हो जाना और जी मिचलाना आदि मुख्य हैं। बड़ों को साथ-साथ अब तो बच्चों को भी हाइपरटेंशन ने अपनी गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया है। तनाव अब ऐसा जाल बन चुका है जो किसी भी आयु वर्ग को अपने शिकंजे में कस लेता है। हाइपरटेंशन के चलते होने वाली बीमारियों में हाइपरथायरोडिज्म, हाइपोथायरोडिज्म या हार्मोन्स का बढ़ जाना शामिल है। व्यक्ति के इन बीमारियों से पीडि़त होने पर उसमें तेजी से वजन कम होने, पाचन शक्ति पर प्रभाव पडऩे और सामान्य से अधिक पसीना आना जैसे लक्षण दिखाई पड़ते हैं। अब बात करते हैं हाइपरटेंशन के कारणों की। दिनों-दिन जटिल होती हाइपरटेंशन की समस्या मुख्यत: जटिलताओं से भरी जीवनशैली का ही परिणाम है। जटिलताओं से भरी जीवनशैली में रहन-सहन, खान-पान, काम का अतिरिक्त बोझ समेत कई अन्य चीजें शामिल हैं जो इंसान को प्राइमरी हाइपरटेंशन का शिकार बना देती हैं। प्राइमरी हाइपरटेंशन मुख्यत: पोटेशियम डिफीसिएंसी जिसे हाइपोकालेमिया भी कहते हैं, ओवर वेट, सेडियम सेंसिटीविटी, जरूरत से ज्यादा अल्कोहल लेना, विटामिन-डी की कमी होना आदि के कारण पनपता है। कभी-कभी यह उम्र बढऩे के साथ और अनुवांशिक कारणों से भी प्रभावी हो जाता है। अनुवांशिक कारणों से अर्थ है अगर परिवार में माता-पिता में से कोई भी प्राइमरी हाइपरटेंशन से पीडि़त रहा है तो संतान में इस समस्या के होने की आशंका 90 प्रतिशत तक बनी रहती है। प्राइमरी हाइपरटेंशन के सक्रिय होने का एक मुख्य कारण मेटाबोलिक सिंड्रोम भी है। इसके अतिरिक्त उन बच्चों के प्राइमरी हाइपरटेंशन से ग्रस्त होने की आशंका और भी बढ़ जाती है जिनका वजन जन्म के समय सामान्य से काफी कम रहता है। सेकेंडरी हाइपरटेंशन के ज्यादातर कारण मेडिकल परीक्षणों के जरिए आसानी से पहचान में आ जाते हैं। लेकिन इनमें परेशानी यह होती है कि यह शरीर पर प्राइमरी की तुलना में ज्यादा घातक प्रभाव डालते हैं। सेकेंडरी हाइपरटेंशन के कारणों में से बहुचर्चित कारण है कुसिंग सिंड्रोम। सेकेंडरी हाइपरटेंशन के इस कारण में हार्मोंस के बीच संतुलन बिगड़ जाता है। 80 प्रतिशत सेकेंडरी हाइपरटेंशन के शिकार मरीज कुसिंग सिंड्रोम से ही प्रभावित रहते हैं। सेकेंडरी हाइपरटेंशन में किडनी से संबंधित तमाम रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इसमें पॉलीसिस्टिक किडनी डिसीज मुख्य है। इस बीमारी से दोनों किडनियों के अलावा लिवर, हृदय और मस्तिष्क भी प्रभावित हो सकता है। सेकेंडरी हाइपरटेंशन में व्यक्ति न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर से भी ग्रस्त हो सकता है। इन सभी के अलावा बिना डॉक्टरों की सलाह लिए दवाओं का सेवन करने से भी हाइपरटेंशन हो सकता है। महिलाओं में हाइपरटेंशन की शिकायत ज्यादातर गर्भावस्था के दौरान होती है। इस अवस्था में सामान्यत: महिलाओं का ब्लड प्रेशर 11 प्रतिशत तक हाई रहता है, ऐसे में वह हाइपरटेंशन से ग्रस्त हो जाती हैं और डिलीवरी सामान्य नही रह पाती। हाइपरटेंशन से बचाव के लिए जरूरी है कि समय-समय पर रक्तचाप की जांच कराते रहें। डॉक्टरों के अनुसार हाइपरटेंशन से निपटने के लिए व शरीर पर इसके प्रभाव को रोकने के लिए हफ्ते में तीन बार ब्लड प्रेशर की जांच जरूर कराते रहना चाहिए। ब्लड प्रेशर के बहुत कम या ज्यादा रहने पर बिना देर किए इसका इलाज कराना शुरू कर दें। लेकिन ब्लड प्रेशर की जांच से पहले कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना भी जरूरी है। रक्तचाप की जांच कैफीन के सेवन के एक घंटे पहले या बाद में होनी चाहिए। जांच के आधे घंटे पहले तक धूम्रपान, व्यायाम न करें और न ही किसी प्रकार का तनाव लें, इससे रक्तचाप की जांच प्रभावित हो सकती है। ब्लड प्रेशर मापने के परंपरागत उपकरण के अलावा अब तो ऑटोमैटिक मशीनें आ चुकी हैं जो बिना किसी त्रुटि के सही ब्लड प्रेशर बताती हैं। ज्यादातर परिवारों में बच्चों के ब्लड प्रेशर की जांच नहीं कराई जाती है। परिवार के सदस्यों को लगता है कि बच्चे तो दिनभर उछलते कूदते रहते हैं, उन्हें भला ब्लड प्रेशर की शिकायत कैसे हो सकती है जबकि स्वास्थ्य संबंधी अध्ययनों की मानें तो दुनिया में सेकेंडरी हाइपरटेंशन के सबसे ज्यादा शिकार बच्चे ही होते हैंं। इस समस्या से बचे रहने का सबसे सस्ता और आसान उपाय है जीवनशैली को सही ढंग से व्यवस्थित किया जाए। ऐसा करने से रक्तचाप नियंत्रित रहेगा और तनाव से मुक्ति मिल जाएगी। ब्रिटिश हाइपरटेंशन सोसाइटी के अनुसार हाइपरटेंशन से बचने के लिए वजन को नियंत्रित रखना व नित्य व्यायाम करना बेहद जरूरी है। शर्करा का सेवन कम मात्रा में करें। शर्करा के साथ भोजन में नमक के सेवन में सावधानी बरतें। ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव नमक से भी प्रभावित रहता है। खानपान में विशेष सतर्कता बरतकर भी हाइपरटेंशन से मुक्ति पाई जा सकती है। धूम्रपान और अल्कोहल का उपयोग भी हाइपरटेंशन को बढ़ाता है। तनाव से छुटकारा पाकर भी हाइपरटेंशन से दूरी बनाई जा सकती है। इसके लिए तनाव कम करने संबंधी व्यायाम करने चाहिए। इसके लिए मेडीटेशन या योग विद्या सर्वोत्तम मानी जाती है(रविवारीय,दैनिक ट्रिब्यून,16 जून,2010)।

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शुक्रवार, 5 मार्च 2010

मंगलवार, 2 मार्च 2010

तनाव और आत्महत्या


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सोमवार, 4 जनवरी 2010

Depression:डिप्रेशन

(हिंदुस्तान,पटना,04.01.10)
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बुधवार, 23 दिसंबर 2009

Stress Management-तनाव से मुक्ति के उपाय

At a time, when companies are leaving no stone unturned to ride the economic storm, managing workplace stress has become a crucial issue that needs to be addressed According to a global survey conducted by Regus, an office workplace solutions provider, 58 per cent of companies worldwide have experienced an appreciable rise in workplace stress over the last two years. The survey found that Indian workers experienced a slightly lower level of stress than their international counterparts, with 57 per cent reporting that their stress levels have grown higher or much higher over the past two years. The survey confirmed that 45 per cent of Indian workers are particularly stressed by the increased focus on profitability that has arisen during the recession. Company size has also had an influence on the increased level of stress experienced in recent years. Sector variations on a global level were also apparent throughout the survey, with workers in the healthcare and pharmaceutical industry reporting the greatest increase in stress (65 per cent), while retail showed the least growth in stress (52 per cent). Kishore Velankar, HR- head, YOU Broadband & Cable India Pvt Ltd. feels that any change brings some amount of stress in an individual /employee. The slowdown did have an impact on the stress levels of employees, says Velankar . He further adds, Stress during a slowdown is primarily career/employment related. With performance being a major factor for retention, people who were on the edge felt it more. In a sensitive situation, employees feel the need for regular assurances. Organisations need to be wary of this and communicate in the right way at the right time. Employees are often faced with problems due to stress: work productivity can be seriously impaired , motivation levels may be damaged and conflict between colleagues can undermine professionalism . So, how are organisations helping employees cope up with the increasing stress levels at the workplace Sandyp Bhattacharya , VP-HR , Comviva Technologies feels that communication is the key to overcome stress. Decisive communication, transparency and openness in matters related to stress help subside many issues. One of our key communication forums is ComShare which is a town-hall quarterly meeting held at each of our key locations. We also hold business unit or group level meetings , ComConnect , where employees in a team get together to review business performance and objectives and also talk on any matters that they face at the workplace , says Bhattacharya. We have Heart to Heart sessions where each employee and their direct manager get together to have a chat on how things are going - and discuss issues related to employee development or employee concerns. Besides these, employees can request for skiplevel meetings with their managers manager or approach HR for any of their concerns. Proactively, we also organise stress management sessions and run a series of programs in collaboration with the Art of Living foundation, he adds. (TOI,23 dec.2009)

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