गुरुवार, 14 जून 2012

आशा-तृष्णा ना मुई,मरि-मरि गया शरीर

एक वक्त था जब पढ़ाई कर लेना काफी नहीं था। नौकरी मिलना ज्यादा बड़ी बात मानी जाती थी। आजकल तो कैंपस में ही चुन लिया जाता है। अब तनख्वाह सैकड़ों में न होकर लाखों में है। बच्चे और परिवार गर्व से भर उठते हैं। यह भौतिक समृद्धि का समय है। 

भारत ने अमीरी में विश्व के नक्शे पर अपनी जगह बना ली है। पहले सिर्फ पुरुष पर परिवार के भरण पोषण का दायित्व होता था , आज स्त्री सच्ची सहचारिणी के रूप में बराबर कमा कर ला रही है। बेटे की तरह मां - बाप का सहारा बन रही है। वह परिवार के विकास में सहायक है। इन्हीं सब कारणों से समृद्धि दिख रही है। सड़कों पर इतनी कारें और वो भी लंबी से लंबी , बड़ी से बड़ी दिखाई दे रही हैं कि छोटे वाहनों को जगह ही नहीं मिल पाती। पैदलों की तो बिसात ही क्या है। घरों की मंजिलें दो या तीन की जगह ऊंची से ऊंची होती जा रही हैं। घर में एक एयरकंडीशनर से क्या काम चलेगा , हर कमरे में जरूरत पड़ रही है। नामी स्कूल वही है जो पूरी तरह एयरकंडीशनर है। यही नहीं , स्कूल की बसें भी एयरकंडीशनर हैं। वहां बच्चे का प्रवेश गौरव की बात मानी जाती है। 

आज हर किसी में अपनी सीमा और सामर्थ्य से ज्यादा की चाह भरी हुई है। चाहने पर ही तो कोशिश की जा सकती है , और कोशिश से ही उपलब्धि होती है। पर एक बात इस दौड़ में भुला दी गई है। वह यह कि उपलब्धियों की सीमा निश्चित न होने पर ' पुन : मूषको भव ' की स्थिति भी आ सकती है। इस दौड़ से जुड़ा तनाव अपने करिश्मे दिखा रहा है। बरसों पुरानी एक फिल्म का गीत ध्यान में आ रहा है , ' इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है ?' 

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि आज 98 प्रतिशत भारतीय तनावग्रस्त हैं। तनाव महामारी की तरह फैलता है। हमारे घर के बड़े सीमित घंटों के लिए ही घर से बाहर रहते थे। शाम तक घर भरा - पूरा होता था , क्योंकि सब लौट आते थे। घर की सारी चिंताओं से मुक्त पुरुष और बाहर की भागदौड़ से अछूती स्त्रियां , बच्चों और बड़ों के खानपान के अलावा मन को भी शांत तथा तनाव रहित रखती थीं। आज स्थिति बिल्कुल विपरीत है। नई पीढ़ी इस तथ्य को जानती है। इससे बचने के उपाय खोजती है। जगह - जगह योग , जिम , वेलनेस क्लीनिक और कायाकल्प वगैरह खोले जा रहे हैं। हालांकि वे मदद तभी कर सकते हैं जब व्यक्ति सोचने की जगह उन उपायों को जीवन में अपनाए। तनावग्रस्त व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है। 

खीज से बचने के लिए शराब या सिगरेट का सहारा लेता है। पुरुष की तरह स्त्री भी तनावग्रस्त होने पर उन्हीं उपायों को अपनाती है। फिर भी तनाव से छुटकारा नहीं मिल पाता , बल्कि बीमारियां और पकड़ लेती हैं। गुस्से और चिड़चिड़ेपन का नतीजा रोडरेज , हत्या आदि में दिखता है। आज तो घर भी सुरक्षित नहीं है। माता - पिता से संतान या संतान से माता - पिता , भाई - बहन , पति - पत्नी कोई भी रिश्ता इस हिंसा से बचा नहीं है। अक्सर लोगों को समय पर पहुंचने की चिंता आतंकित किए रहती है। 

खुशी की तलाश में कभी घर संवारते हैं तो कभी छुट्टी पर जाने की सोचते हैं , पर हर प्रयास तनाव को बढ़ावा देता जाता है क्योंकि लक्ष्य सबसे ऊपर रहने का होता है। जीवन का जो समय इन लक्ष्यों के पीछे दौड़ने में लगाते हैं वह निरर्थक लगने लगता है। रामकृष्ण परमहंस का मानना है कि ' हम क्या करें ' की चिंता व्यक्ति पर छोड़ दें तो कोई परेशानी नहीं होगी क्योंकि तब हम जान लेंगे कि सब कुछ उसकी इच्छा से होता है। विदेशी ज्ञानियों के अनुसार तनाव अज्ञान की स्थिति है। दूसरे को पछाड़ने की जगह अपनी सामर्थ्य को बढ़ाने की इच्छा से तनाव नहीं होता। किसी भी स्थिति में शांत और संतुलित रहने की चेष्टा ही लाभदायक हो सकती है(उमा पाठक,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,12.6.12)।

10 टिप्‍पणियां:

  1. तृष्णा ना मुई, मरि-मरि गया शरीर

    सार्थक प्रस्तुति के लिए साधुवाद.

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  2. यदि मन की शांति मिल जाएँ तो सारे तनाव दूर हो जाते हैं .
    लेकिन इसके लिए अच्छे आचरण की ज़रुरत है .
    सुन्दर लेख .

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  3. किसी भी स्थिति में शांत और संतुलित रहने की चेष्टा ही लाभदायक हो सकती हैऔर आप तनाव से बच सकते हैं,,,,,,

    सार्थक पोस्ट ,,,,,,

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  4. सही कहते हैं आप... आज हर चेहरा तनावग्रस्त दिखता है...
    सार्थक प्रस्तुति।
    सादर।

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  5. यह तनाव बहुत कुछ छीन रहा है ....

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  6. बहुत सार्थक लेखन .......

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  7. आज पैसा है पर खुशी नहीं ... हर कोई तनावग्रस्त ही दिखता है

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  8. जैसे है वैसे का स्वीकार भाव आज के मनुष्य में खो क्या है
    इसलिए तो इतनी भागदौड़ कुछ और होने की अभिलाषा तनाव तो होगा ही,
    जबतक वर्तमान में जीने की कला नहीं आ जाती मन को शांति कहाँ ?

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