आंख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आंख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

लोकोक्तियों में नेत्र-रोग निवारण

1. काली मिर्च को पीसकर,घी बूरा संग खाय 
    नेत्ररोग सब दूर हों,गिद्ध-दृष्टि हो जाए 

2. मिट्टी के नव-पात्र में,त्रिफला रात्रि में डाल 
    रोज़ सवेरे धोय के,नेत्ररोग को टाल 

3. ताम्र के एक पात्र में, घमिरा रस को निचोय 
    रूई साफ भिगोय के,लीजे छांह सुखाय 

4. सरसों तेल मिलाय के,आग में देहु जलाय 
    ढकिए थाली फूल की,काजल लेहु बनाय 

5. कालिख सरसों तेल में,घिसै उंगली डार 
    ऐसे सरल उपाय सो,काजल करो तैयार

6. रतौंधी धुंधी खुजली या नेत्र लाल पड़ जाए 
    बढ़े रोशनी आंख की,सारे रोग नसाय 

7. आंख-कान के मध्य में चूना लेप लगाय 
    आई आंख अच्छी करे और ललाई जाय 

8. भुनी फिटकरी लीजिए,जल गुलाब में घोल 
    आंखों की जलन मिटे,ये वैद्य के बोल 

9. केशर शहद मिलाय के,नेत्रन माहि लगाय 
    लाली और गरमी मिटै,रोग रतौंधी जाय 

10. बरगद के दूध में घिस,कपूर लगाओ नैन 
      फूली मिटे छोटी-बड़ी,और पाओ सुख चैन 

11. शुद्ध शहद में लीजिए,सेंधा नमक मिलाय 
      थोड़े दिन ही लगाइए,फूली देत मिटाय 
(श्रीमती शैल कुमारीजी मिश्र द्वारा संकलित ये दोहे कल्याण से साभार हैं)

आगे चलें...

बुधवार, 12 सितंबर 2012

डार्क सर्कल से छुटकारा

आपका चेहरा और आपकी आंखें किसी भी व्यक्ति को सबसे पहले आकर्षित करती हैं। इनमें कोई गड़बड़ी आ जाए तो आकर्षक व्यक्ति का भी आकर्षण काफी कम हो जाता है। डार्क सर्कल चेहरे की ऐसी ही एक समस्या है जो आपसे आपकी खूबसूरती छीन सकते हैं। आइए जानते हैं,इससे बचकर कैसे रहें और इसका ग्रहण लग जाए तो मुक्ति कैसे पाएं- 

डार्क सर्कल न सिर्फ आपकी सुंदरता को कम करते हैं, बल्कि आपके खराब स्वास्थ्य और अनियमित दिनचर्या की चुगली भी करते हैं। इनके कारण सुंदर चेहरा भी थका और मुरझाया-सा लगता है। डार्क सर्कल को डॉक्टरी भाषा में पेरीआर्बिटल हाईपर पिग्मेंटेशन कहते हैं। वैसे आंखों के आसपास होने वाले ये काले घेरे कोई ऐसी समस्या नहीं है जिनका उपचार न हो। इन्हें कम करने के साथ इनका पूरी तरह उपचार भी संभव है। 

क्यों हो जाते हैं डार्क सर्कल 
आंखों के नीचे काले घेरे सभी व्यक्तियों को जीवन के किसी न किसी स्तर पर प्रभावित करते हैं। लेकिन युवावस्था में आंखों के आसपास जब ये डेरा जमा लेते हैं तो ये चिंता का कारण बन जाते हैं। ऐसा कई कारणों से होता है, जिनमें प्रमुख हैं- 

-अनुवांशिक रूप से मिला स्किन पिग्मेंटेशन। 

-लगातार सूर्य की किरणों के संपर्क में रहना। 

-कई चिकित्सकीय अवस्थाएं जैसे एलर्जी, अस्थमा, किडनी और लीवर संबंधी गड़बड़ियां भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से डार्क सर्कल का कारण बन जाती हैं। 

-शरीर में पोषक तत्वों की कमी विशेषकर विटामिन के और पानी की कमी। 

-तनाव, थकान और उम्र बढ़ने के साथ रक्त संचरण प्रभावित होना। -ऐसी दवाओं का सेवन जिससे रक्त नलिकाएं फैल जाती हैं। 

कैसे बचें 

डार्क सर्कल को कम करने या ठीक करने से ज्यादा जरूरी है कि इन्हें होने ही न दिया जाए। इससे न सिर्फ हमारी आंखें और चेहरा सुंदर दिखेगा, बल्कि हमारा स्वास्थ्य भी बेहतर रहेगा। इसके लिए कुछ बातों का नियमित रूप से ध्यान देने की जरूरत है।

-संतुलित भोजन खाएं, जिसमें विटामिन के और आयरन अधिक मात्रा में हो। जैसे हरी पत्तेदार सब्जियां, फलियां और मांसाहारी भोजन। 

-विटामिन ए भी आंखों के स्वास्थ्य के लिए काफी उपयोगी होता है। यह दूध और दूध से बने पदार्थों, मछली, अंडों, फलों और हरी पत्तेदार सब्जियों में भरपूर मात्रा में पाया जाता है। 

-रात में समय पर सोएं और सुबह जल्दी जागें। 

-सूर्य की किरणों से अपनी आंखों को बचाएं। जब भी धूप में निकलें सन ग्लासेस लगाएं। 

-भरपूर पानी पिएं। 

-अपने डॉक्टर की सलाह पर विटामिन सप्लीमेंट भी ले सकते हैं। 

ऐसे पा सकते हैं मुक्ति 

आज बाजार में कई ऐसे उपचार उपलब्ध हैं, जिनके द्वारा डार्क सर्कल से पूरी तरह से छुटकारा मिल सकता है। यह उपचार इस बात पर निर्भर करते हैं कि इन काले घेरों का कारण क्या है। सबसे पहले किसी अच्छे त्वचा विशेषज्ञ को दिखाएं, ताकि इसका कारण समझ में आए। उनके सुझावों को ध्यान में रखते हुए उपचार का विकल्प चुनें। कोई भी उपचार किसी अच्छे त्वचा रोग विशेषज्ञ की निगरानी में ही कराएं। डार्क सर्कल के उपचार के लिए लेजर रिसर्फेसिंग और इंटेंस पल्स्ड लाइट ट्रीटमेंट, केमिकल पील्स, इंजेक्टेबल डर्मल फीलर प्रोसीजर्स और फैट ट्रांसफर विधियां प्रमुख रूप से उपयोग में लाई जा रही हैं। 

इन बातों का भी रखें ख्याल 

-व्यायाम और योग करें, विशेष रूप से प्राणायाम का अभ्यास जरूर करें। यह त्वचा की सेहत के लिए बहुत अच्छा है। भोजन में नमक कम खाएं। अधिक नमक शरीर में द्रवों को रोक लेता है, जिससे आखें सूजी हुई लगती हैं और उनके नीचे थैले बन जाते हैं। 

-आधुनिक शोधों में यह बात सामने आई है कि ग्रीन टी आंखों के लिए फायदेमंद है। इसमें केटेचिन्स नामक एंटी ऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो आंखों की रक्षा करते हैं। 

-रात में आंखों के आसपास ऐसे क्रीम लगाएं जिसमें कोजिक एसिड और आरन्युटिन जैसे लाइटनिंग एजेंट हों। 

घर में भी हैं इससे मुक्ति के उपाय 

-अगर डार्क सर्कल हल्के हैं तो कुछ घरेलू उपाय अपनाकर भी इनका उपचार संभव है। इससे डार्क सर्कल कम होने के साथ आंखों को राहत भी मिलेगी। आप इन उपायों को अपना सकते हैं। 

-बादाम या जैतून के तेल से आंखों के आसपास हल्के हाथों से मालिश करें इससे रक्त संचार ठीक रहता है और आंखों की थकान भी कम होती है। 

-बादाम के तेल और शहद को अच्छी तरह मिलाकर सोने के पहले आंखों के आसपास लगाएं और सारी रात लगा रहने दें। 

-ताजा पुदीने की पत्तियों का पेस्ट बना लें और उसमें नींबू के रस की कुछ बूंदें मिला लें। इस मिश्रण को काले घेरों पर प्रतिदिन 10-15 मिनट के लिए लगाएं। 

-आलू और खीरे के रस को मिलाएं इसमें रुई डुबाएं और उसे करीब 20 मिनट आंखों पर रखें, फिर ठंडे पानी से धो लें। 

-खीरे की स्लाइस या टी बैग को पानी में भिगोकर आंखों पर करीब 20 मिनट तक रखें, इसके बाद ठंडे पानी से आंखें धो लें। 

-कच्चे आलू को कद्दूकस कर काले घेरों पर लगाएं। आधे घंटे बाद आंखें ठंडे पानी से धो लें और मॉइस्चराइजर लगा लें(शमीम खान,हिंदुस्तान,दिल्ली,9.5.12)।

आगे चलें...

रविवार, 24 जून 2012

अंगदानःसोचना काफी नहीं,बुनियादी जानकारी भी होनी चाहिए

मरने के बाद हमारे सभी अंगों को खाक में मिल जाना है। कितना अच्छा हो कि मरने के बाद ये अंग किसी को जीवनदान दे सकें। अगर धार्मिक अंधविश्वास आपको ऐसा करने से रोकते हैं तो महान ऋषि दधीचि को याद कीजिए, जिन्होंने समाज की भलाई के लिए अपनी हड्ड़ियां दान कर दी थीं। उन जैसा धर्मज्ञ अगर ऐसा कर चुका है तो आम लोगों को तो डरने की जरूरत ही नहीं है। सामने आइए और खुलकर अंगदान कीजिए, इससे किसी को नई जिंदगी मिल सकती है। एक्सपर्ट्स से बात करके अंगदान की पूरी प्रक्रिया के बारे में बता रहे हैं प्रभात गौड़: 

क्या है अंगदान 
अंगदान एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें एक इंसान (मृत और कभी-कभी जीवित भी) से स्वस्थ अंगों और टिशूज़ को ले लिया जाता है और फिर इन अंगों को किसी दूसरे जरूरतमंद शख्स में ट्रांसप्लांट कर दिया जाता है। इस तरह अंगदान से किसी दूसरे शख्स की जिंदगी को बचाया जा सकता है। एक शख्स द्वारा किए गए अंगदान से 50 जरूरतमंद लोगों की मदद हो सकती है। 

किन-किन अंगों का दान 
हमारे देश में लिवर, किडनी और हार्ट के ट्रांसप्लांट होने की सुविधा है। कुछ मामलों में पैनक्रियाज भी ट्रांसप्लांट हो जाते हैं, लेकिन इनके अलावा दूसरे अंगों का भी दान किया जा सकता है: -अंदरूनी अंग मसलन गुर्दे (किडनी), दिल (हार्ट), यकृत (लिवर), अग्नाशय (पैनक्रियाज), छोटी आंत (इन्टेस्टाइन) और फेफड़े (लंग्स) -त्वचा (स्किन) -बोन और बोन मैरो -आंखें (कॉर्निया) 

दो तरह के अंगदान 
-एक होता है अंगदान और दूसरा होता है टिशू का दान। अंगदान के तहत आता है किडनी, लंग्स, लिवर, हार्ट, इंटेस्टाइन, पैनक्रियाज आदि तमाम अंदरूनी अंगों का दान। टिशू दान के तहत मुख्यत: आंखों, हड्डी और स्किन का दान आता है। 

-ज्यादातर अंगदान तब होते हैं, जब इंसान की मौत हो जाती है लेकिन कुछ अंग और टिशू इंसान के जिंदा रहते भी दान किए जा सकते हैं। 

-जीवित लोगों द्वारा दान किया जाने वाला सबसे आम अंग है किडनी, क्योंकि दान करने वाला शख्स एक ही किडनी के साथ सामान्य जिंदगी जी सकता है। वैसे भी जो किडनी जीवित शख्स से लेकर ट्रांसप्लांट की जाती है, उसके काम करने की क्षमता उस किडनी से ज्यादा होती है, जो किसी मृत शरीर से लेकर लगाई जाती है। भारत में होने वाले ज्यादातर किडनी ट्रांसप्लांट के केस जिंदा डोनर द्वारा ही होते हैं। लंग्स और लिवर के भी कुछ हिस्सों को जीवित शख्स दान कर सकता है। 

-इसके अलावा आंखों समेत बाकी तमाम अंगों को मौत के बाद ही दान किया जाता है। 

-घर पर होने वाली सामान्य मौत के मामले में सिर्फ आंखें दान की जा सकती हैं। बाकी कोई अंग नहीं ले सकते। बाकी कोई भी अंग तब लिया जा सकता है, जब इंसान की ब्रेन डेथ होती है और उसे वेंटिलेटर या लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर ले लिया जाता है। 

सामान्य मौत और ब्रेन डेथ का फर्क 
-सामान्य मौत और ब्रेन डेथ में फर्क होता है। सामान्य मौत में इंसान के सभी अंग काम करना बंद कर देते हैं, उसके दिल की धड़कन रुक जाती है, शरीर में खून का बहाव रुक जाता है। ऐसे में आंखों को छोड़कर जल्दी ही उसके सभी अंग बेकार होने लगते हैं। आंखों में ब्लड वेसल्स नहीं होतीं, इसलिए उन पर शुरुआती घंटों में फर्क नहीं पड़ता। यही वजह है कि घर पर होने वाली सामान्य मौत की हालत में सिर्फ आंखों का दान किया जा सकता है। 

-ब्रेन डेथ वह मौत है, जिसमें किसी भी वजह से इंसान के दिमाग को चोट पहुंचती है। इस चोट की तीन मुख्य वजहें हो सकती हैं: सिर में चोट (अक्सर ऐक्सिडेंट के मामले में ऐसा होता है), ब्रेन ट्यूमर और स्ट्रोक (लकवा आदि)। ऐसे मरीजों का ब्रेन डेड हो जाता है लेकिन बाकी कुछ अंग ठीक काम कर रहे होते हैं - मसलन हो सकता है दिल धड़क रहा हो। कुछ लोग कोमा और ब्रेन डेथ को एक ही समझ लेते हैं लेकिन इनमें फर्क है। कोमा में इंसान के वापस आने के चांस होते हैं। यह मौत नहीं है। लेकिन ब्रेन डेथ में जीवन की संभावना बिल्कुल खत्म हो जाती है। इसमें इंसान वापस नहीं लौटता। 

आंखों के अलावा बाकी अंगों का दान 
आंखों के अलावा बाकी सभी अंगों का दान ब्रेन डेड होने पर ही किया जा सकता है। वैसे जिन वजहों से इंसान ब्रेन डेड होता है, उनका इलाज करने और मरीज को ठीक करने की पूरी कोशिश की जाती है और जब सभी कोशिशें नाकाम हो जाती हैं और इंसान ब्रेन डेड घोषित हो जाता है, तब ही अंगदान के बारे में सोचा जाता है। ब्रेन डेड की स्थिति में कई बार मरीज के घरवालों को लगता है कि अगर मरीज का दिल धड़क रहा है, तो उसके ठीक होने की संभावना है। फिर उसे डॉक्टरों ने मृत घोषित करके उसके अंगदान की बात कैसे शुरू कर दी। लेकिन ऐसी सोच गलत है। ब्रेन डेड होने का मतलब यही है कि इंसान अब वापस नहीं आएगा और इसीलिए उसके अंगों को दान किया जा सकता है। 

कौन कर सकता है 
कोई भी शख्स अंगदान कर सकता है। उम्र का इससे कोई लेना-देना नहीं है। नवजात बच्चों से लेकर 90 साल के बुजुर्गों तक के अंगदान कामयाब हुए हैं। अगर कोई शख्स 18 साल से कम उम्र का है तो उसे अंगदान के लिए फॉर्म भरने से पहले अपने मां-बाप की इजाजत लेना जरूरी है। 

कैसे होता है 
जिन लोगों की ब्रेन डेथ हो जाती है, उन्हें डॉक्टर वेंटिलेटर्स पर ले लेते हैं। फिर डॉक्टरों का एक पैनल इस बात की पुष्टि करता है कि उसकी ब्रेन डेथ हो चुकी है। कुछ समय बाद एक बार फिर उसकी पुष्टि की जाती है। इसके बाद घरवालों की इच्छा से और कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद मरने वाले के शरीर से अंगों को निकाल लिया जाता है। यह प्रक्रिया मरने के बाद जल्द-से-जल्द शुरू कर दी जाती है। इस काम को करते वक्त बॉडी में सिर्फ एक चीरा लगाया जाता है और उसी से अंग निकाल लिए जाते हैं। इस पूरे काम में बॉडी को पूरे सम्मान के साथ रखा जाता है और बाद में उसे साफ करके परिजनों को दे दिया जाता है। इस प्रक्रिया में आधा दिन तक का वक्त लग सकता है। हो सकता है, अंतिम क्रिया करने के काम में मामूली-सी देरी हो जाए, लेकिन अंगदान की संतुष्टि के सामने यह कोई बड़ी बात नहीं है। 

कहां है अड़चन 
ऑर्गन डोनेशन ऐक्ट 1994 के नियमों के मुताबिक अंगदान सिर्फ उसी अस्पताल में ही किया जा सकता है, जहां उसे ट्रांसप्लांट करने की भी सुविधा हो। यह अपने आप में बेहद मुश्किल नियम है। इस नियम से दूर-दराज के इलाकों के लोगों का अंगदान तो हो ही नहीं पाता। इस समस्या को देखते हुए सरकार ने 2011 में इस नियम में कुछ बदलाव करने के लिए एक बिल पास किया। नए नियम के मुताबिक अंगदान आप किसी भी आईसीयू में कर सकते हैं। यानी उस अस्पताल में ट्रांसप्लांट न भी होता हो, लेकिन आईसीयू है, तो वहां भी अंगदान किया जा सकता है। यह नियम अभी लागू नहीं हुआ है, लेकिन लागू होने के बाद अंगदान की प्रक्रिया ज्यादा तेज और सुविधाजनक होगी। अंगदान की पूरी प्रक्रिया के साथ इतनी सारी शर्तें जुड़ी होने के कारण अपने देश में आज भी अंगदान बहुत कम हो पाता है। इसी वजह से किसी से अंग लेकर उसे जरूरतमंद में ट्रांसप्लांट करने के मामले बड़े कम होते हैं। साल में कुल 50 के आस-पास लोग ही अंगदान कर पाते हैं। 

क्या होता है अंगों का 
इन अंगों को डॉक्टर जल्द-से-जल्द किन्हीं ऐसे मरीजों में ट्रांसप्लांट कर देते हैं, जिन्हें पहले से इनकी जरूरत रही हो। अंग प्रत्यारोपण करने वाले अस्पतालों के पास एक वेटिंग लिस्ट होती है। उसके हिसाब से जिस मरीज का नंबर होता है, उसमें अंग को लगा दिया जाता है। अंग लगाते वक्त मैचिंग के लिए ब्लड ग्रुप और दूसरे कई टेस्ट किए जाते हैं। अगर सब कुछ ठीक है तो अंग लगा दिया जाता है और अगर मैचिंग नहीं होती तो वेटिंग लिस्ट के अगले मरीज के साथ उसे मैच किया जाता है। 

कितने समय तक सही 
-लिवर निकालने के 6 घंटे के अंदर ट्रांसप्लांट हो जाना चाहिए। -किडनी 12 घंटे के भीतर लग जानी चाहिए। 

-आंखें 3 दिन के भीतर लगा दी जानी चाहिए। 

नोट: 6 से 12 घंटे के भीतर डोनर की बॉडी से निकालने के बाद अंगों को ट्रांसप्लांट कर दिया जाना चाहिए। जितना जल्दी प्रत्यारोपण होगा, उस अंग के काम करने की क्षमता और संभावना उतनी ही ज्यादा होगी। 

नेत्रदान कौन कर सकता है 

-एक साल से बड़ा कोई भी शख्स यह तय कर सकता है कि वह मौत के बाद अपनी आंखों का दान करना चाहता है। इसके लिए अधिकतम उम्र कोई नहीं हैं। 

-जीवित शख्स आंखों का दान नहीं कर सकता। 

-अगर आपकी नजर कमजोर है, चश्मा लगाते हैं, मोतियाबिंद या काला मोतिया का ऑपरेशन हो चुका है, डायबीटीज के मरीज हैं तो भी आप आंखें दान कर सकते हैं। यहां तक कि ऐसे अंधे लोग भी आंखें दान कर सकते हैं, जिनके अंधेपन की वजह रेटिनल या ऑप्टिक नर्व से संबंधित बीमारी हैं और उनका कॉर्निया ठीक है। 

-रेबीज, सिफलिस, हिपेटाइटिस या एड्स जैसी इन्फेक्शन वाली बीमारियों की वजह से जिन लोगों की मौत होती है, वे अपनी आंखें दान नहीं कर सकते। 

-अगर किसी इंसान की मौत दूर-दराज के इलाके में होती है, जहां आई-बैंक वालों को पहुंचने में ज्यादा वक्त लग सकता है तो उनकी आंखों का दान मुमकिन नहीं है। 

क्या है तरीका 
मौत के छह घंटे के अंदर आई बैंक वाले बॉडी से आंखों को ले लेते हैं। मृत शरीर के अंदर से आंखें लेने में इससे ज्यादा देर नहीं होनी चाहिए। इसके लिए मौत के बाद करीबी लोगों को आई बैंक को तुरंत सूचित करना जरूरी है। 

-जब तक आई बैंक वाले आएं, तब तक मरने वाले की दोनों आंखों को बंद कर देना चाहिए और आंखों पर गीली रुई रख देनी चाहिए। अगर पंखा चल रहा है तो बंद कर दें। मुमकिन हो तो कोई ऐंटिबायॉटिक आई-ड्रॉप मरने वाले की आंखों में डाल दें। इससे इन्फेक्शन का खतरा नहीं होगा। सिर के हिस्से को छह इंच ऊपर उठाकर रखना चाहिए। 

-आई-बैंक से आकर डॉक्टर पूरी आई बॉल निकाल लेते हैं। इससे आंखों में कोई गड्ढा या डिफॉर्मिटी नहीं आती। देखने में आंखें पहले जैसी ही लगती हैं। 

दूसरों को आंख लगाना 

-आई-बैंक आने के बाद कॉर्निया के कई तरह के टेस्ट किए जाते हैं। जो कॉर्निया ठीक होते हैं, उन्हें आई बॉल से निकाल लिया जाता है और फिर उन्हें एक खास सल्यूशन में रख दिया जाता है, जिससे वे कुछ दिन सुरक्षित रहते हैं। 

-अच्छी क्वॉलिटी के कॉर्निया को तीन दिनों के भीतर कॉर्नियल ट्रांसप्लांटेशन के लिए इस्तेमाल कर लिया जाना चाहिए। 

-आंख के बाकी हिस्सों को मेडिकल रिसर्च में यूज किया जाता है। 

-कॉर्निया किसे लगाया जा रहा है, यह डोनर के घरवालों को नहीं बताया जाता और न ही जिसे लगाया जा रहा है, उसे यह सूचना दी जाती है कि किसकी आंख उसे लगाई गई है। 

-यह आंख कॉर्नियल ट्रांसप्लांटेशन के जरिए किसी की आंखों में रोशनी ला सकती है। कॉर्नियल ट्रांसप्लांट के 90 फीसदी से भी ज्यादा मामलों में कॉर्नियल अंधेपन की वजह से पीड़ित लोगों की रोशनी वापस आ जाती है। 

-चूंकि कॉर्निया में ब्लड वेसल्स नहीं होतीं इसलिए इसे किसी को भी लगाया जा सकता है। लगाने से पहले मरीज के साथ मैचिंग करने की जरूरत नहीं होती। 

कहां संपर्क करें 
अगर किसी मृत इंसान की आंखें दान करनी हैं या कोई जिंदा शख्स आंखें दान करने के लिए फॉर्म भरना चाहता है तो किसी भी आई-बैंक से संपर्क कर सकते हैं। नीचे कुछ नंबर दिए गए हैं: 

-1919 आई डोनेशन के लिए केंद्रीय नंबर है, जिसे डायल किया जा सकता है लेकिन कुछ तकनीकी खामियों की वजह से यह नंबर कभी-कभार ही मिलता है। 

-9990160160 भी सेंट्रलाइज्ड नंबर है, जिस पर कॉल कर सकते हैं। 

-वेणु आई इंस्टिट्यूट ऐंड रिसर्च सेंटर: 011-2925-0952 

-गुरु गोबिंद सिंह इंटरनैशनल आई-बैंक: 011-2254-2325 

-गुरु नानक आई सेंटर: 011-2323-4612 

आप क्या करें 
अंगदान सबसे बड़ा दान है क्योंकि इसकी मदद से इंसान कई जिंदगियों को जीवन दान देता है। इसलिए तय करें कि आपको अंगदान करना है। इसके लिए दो तरीके हो सकते हैं। कई एनजीओ और अस्पतालों में अंगदान से संबंधित काम होता है। इनमें से कहीं भी जाकर आप एक फॉर्म भरकर दे सकते हैं कि आप मरने के बाद अपने इस-इस अंग को दान करना चाहते हैं। आप जो-जो अंग चाहेंगे, सिर्फ वही अंग लिया जाएगा। आप सभी या कोई एक अंग दान कर सकते हैं। संस्था से आपको एक डोनर कार्ड मिल जाएगा, लेकिन इस कार्ड की कोई लीगल वैल्यू नहीं होती। इसके बाद अपने निकटतम संबंधियों को इस बारे में जानकारी दे दें कि मैंने अपने इन-इन अंगों को दान कर दिया है और मेरे मरने के बाद उन्हें इस काम को पूरा करना है। अगर आप फॉर्म नहीं भरते हैं, तो भी कोई खास फर्क नहीं पड़ता। बस अपने निकटतम लोगों को अपनी इच्छा बताकर रखें। मौत हो जाने पर अंगदान की जिम्मेदारी आपके संबंधियों पर होगी क्योंकि उन्हें ही कॉल करनी है। अगर आपने फॉर्म नहीं भी भरा है तो भी अंगदान हो जाएगा। आपके फॉर्म भरने के बाद भी अगर संबंधी न चाहें तो अंगदान मुमकिन नहीं है। इसलिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि अपनी इच्छा के बारे में अपने निकटतम संबंधियों को बताकर रखा जाए कि आप कौन-कौन से अंगों का दान करना चाहते हैं। आंखों के अलावा दूसरे अंगों के दान के लिए परिवारजनों को कहीं भी कॉल करने की जरूरत नहीं है क्योंकि बाकी अंगों का दान होगा ही तब, जब मरीज की ब्रेन डेथ अस्पताल में हुई होगी और डॉक्टरों ने उसे फौरन जीवन बचाने वाले यंत्रों पर ले लिया होगा। अंगदान करते वक्त परिजनों का कोई खर्च नहीं होता। 

जीवित लोगों द्वारा अंगदान: कानूनी पहलू 
जीवित शख्स के अंगदान करने की प्रक्रिया कई कानूनी बंधनों में बंधी है और पूरे आकलन के बाद ही ऐसा करना मुमकिन हो पाता है। अपने देश में प्रत्यारोपण का पूरा कार्यक्रम द ट्रांसप्लांट ऑफ ह्यूमन ऑर्गन ऐक्ट 1994 के तहत किया जाता है। कोई भी शख्स अंगों को बेच या खरीद नहीं सकता। जिस शख्स का प्रत्यारोपण होना है, अंगदान सिर्फ उसके सगे-संबंधी या बेहद नजदीकी रिश्तेदार ही कर सकते हैं, जिसके लिए पूरी जांच-पड़ताल की जाती है। नजदीकी रिश्तेदारों में माता-पिता, पति-पत्नी, बच्चे, भाई-बहन, चचेरे भाई-बहन आदि आते हैं। इनमें से भी अगर कोई लालच या किसी चीज के बदले अंगदान कर रहा है तो वह गैरकानूनी है। मसलन किसी ने अपने भाई से कह दिया कि आप मुझे किडनी दे दें, मैं अपनी इतनी प्रॉपर्टी आपके नाम कर दूंगा, तो ऐसे कॉन्ट्रैक्ट गैरकानूनी हैं। 

किसने देखा अगला जन्म 
आमतौर पर लोग धार्मिक आस्थाओं के कारण अंगदान करने से बचते हैं, लेकिन तमाम धर्म-आध्यात्मिक गुरु भी इस बात को कह चुके हैं कि अंगदान करना एक बड़े पुण्य का काम है क्योंकि इससे आप एक मरते हुए शख्स को जिंदगी दे रहे हैं और किसी को जिंदगी देने से बड़ा पुण्य भला क्या होगा! आंखें दान करने वाले अगले जन्म में अंधे पैदा होंगे, जैसी बातें अंधविश्वास हैं। खुद सोचिए, अगर किसी ने दिल और गुर्दे दान कर दिए, तो इस थियरी के हिसाब से तो अगले जन्म में उसे बिना दिल और किडनी के पैदा होना चाहिए। क्या ऐसा मुमकिन है कि कोई इंसान बिना दिल और किडनी के जन्म ले? है ना हास्यास्पद! धर्म से संबंधित ऐसी सभी मान्यताएं जो अंगदान न करने की बात करती हैं, महज अंधविश्वास हैं, जिन्हें नजरंदाज करके हर किसी को अंगदान के लिए आगे आना चाहिए। 

एक्सपर्ट्स पैनल 
-डॉक्टर अवनीश सेठ डायरेक्टर, गेस्ट्रोइंट्रॉलजी ऐंड हिपेटोबिलेरी साइंसेज, फोर्टिस हेल्थकेयर 

-डाक्टर एस. भारती मेडिकल डायरेक्टर, भारती आई फाउंडेशन 

-मनीषा गुप्ता प्रोग्राम मैनेजर (दिल्ली-एनसीआर), मोहन फाउंडेशन(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,10.6.12)। 


इसी विषय पर यह उपयोगी आलेख भी देखिए।

आगे चलें...

बुधवार, 20 जून 2012

आँख है तो जहान है

आंखें स्वस्थ न हों तो संसार की सारी खूबसूरती बेमानी लगती हैं। फिर भी हम अपनी आंखों का पर्याप्त खयाल नहीं रख पाते। आइए,जानते हैं कि मौसम के साथ आंखों का खयाल कैसे रखें, ताकि वह हमेशा साथ दें- 

अगर कोई आपसे एक मिनट के लिए आंखें बंद करने के लिए कहता है तो आप कितनी बेचैनी महसूस करते हैं। जैसे दुनिया के सारे नजारे इसी एक मिनट में आपकी नजरों के सामने से गुजर जाएंगे और आप उन्हें देखने से चूक जाएंगे। यही आंखें उम्र और अन्य बीमारियों की वजह से धीरे-धीरे कमजोर होती चली जाती हैं तो दुनिया को साफ-साफ नहीं देख पाना कितना दुखद हो जाता है। तो फिर अपनी अनमोल आंखों के लिए थोड़ा समय निकालिए न! आपकी आंखें हमेशा आपका साथ देंगी। 

रखें आंखों का खयाल 
आंखों की देखभाल की शुरुआत बचपन से ही की जानी चाहिए। किसी भी बच्चे की आंखों की पहली बार जांच पांच साल के होने तक हो जानी चाहिए। इस उम्र में अगर बच्चे की आंखों में किसी प्रकार का बहंगापन, आंखों का छोटी-बड़ी होना या और भी कोई परेशानी रहती है तो वह इसी अवस्था में ठीक हो जाती हैं। इसी तरह किशोरावस्था में भी आंखों की नियमित जांच जरूरी है। इस अवस्था में आंखों की कम रोशनी पढ़ाई के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर किशोर के जीवन को प्रभावित कर सकती है। 

आम तौर पर 15 से 40 साल तक के स्वस्थ इंसान में आंखों की समस्या नहीं होती। इस दौरान कोई खास बीमारी ही आंखों की समस्या के लिए जिम्मेदार हो सकती हैं। लेकिन 40 साल की उम्र के बाद से आंखों में समस्याएं आनी शुरू हो जाती हैं। अगर आप 60 साल से ऊपर के हैं तो कम समय के अंतराल पर नियमित रूप से आंखों की जांच कराएं और डॉक्टरों के निर्देशानुसार चश्मे का लेंस बदलवाएं। 

आंखों के दुश्मन हैं ये गैजेट्स 
आंखों की समस्या से आज की युवा पीढ़ी ज्यादा परेशान हैं, क्योंकि वे अपना काफी समय कंप्यूटर, मोबाइल फोन, टीवी, वीडियो गेम और टैबलेट पर बिताते हैं। काफी दुखद है कि आउटडोर गेम्स की जगह इनडोर गेम्स लेते जा रहे हैं। इस कारण जरूरी शारीरिक मूवमेंट हो नहीं पाते। इससे आंखों की समस्या जल्द होने की आशंका बढ़ जाती है। इसलिए आधुनिक गैजेट्स का कम से कम इस्तेमाल करें। दिल्ली में आंखों में खुश्की (ड्राई आई), एलर्जी और नजदीक का कम दिखने की समस्या बढ़ती जा रही है। समय रहते सावधानी बरती जाए तो आंखें पूरा साथ देंगी। डॉक्टर सलाह देते हैं कि अगर कंप्यूटर पर लगातार काम करना ही पड़े तो हर 20 मिनट पर सीट से उठकर 20 फीट दूर किसी चीज को 20 सेकेंड के लिए देखें। इससे आंखों को थोड़ी राहत मिल जाती है। अपनी आंखों की खातिर इसे नियम बना लें। देर रात तक कृत्रिम रोशनी में काम करना भी आंखों के लिए ठीक नहीं। 

कैसा हो खानपान 
संतुलित खानपान आंखों के लिए बहुत जरूरी है। एक बार डॉक्टर से अपनी आंखों के लिए जरूरी आहार की जानकारी लें। अपने आहार में विटमिन ए प्रचुर मात्र में लें। यह दूध और दूध से बने पदार्थों, मछली, अंडे, रंगीन फलों और हरी सब्जियों में पाया जाता है। 

शोध में कहा गया है कि ग्रीन टी (हरी चाय) आंखों के लिए फायदेमंद है। इसमें केटेचिन्स नामक एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो आंखों की रक्षा करते हैं। 

खाने में विटामिन सी, डी और ई से युक्त चीजें भी शामिल करें। 

ओमेगा 3 भी आंखों के लिए काफी फायदेमंद साबित होता है। 

आंखों की एक्सरसाइज 
आंखों की मांसपेशियों में कमजोरी आने पर डॉक्टर की देख-रेख में आंखों से संबंधित एक्सरसाइज भी कराए जाते हैं। इसमें कागज पर बने चित्र या कार्ड पर बने चित्र और पेंसिल की मदद से एक्सरसाइज कराए जाते हैं। जब इस तरह के प्रयास से फायदा नहीं पहुंचता है, तो एक खास तरह की मशीन के जरिए आंखों की एक्सरसाइज कराई जाती है। 

आंखों में तकलीफ के लक्षण 
आंखों एवं सिर में भारीपन, धुंधला दिखना, आंखें लाल होना, आंखों से पानी आना, आंखों में जलन महसूस होना, आंखों में खुजली महसूस होना, आंखों में ड्राईनेस, रंगों का साफ न दिखना आदि में से कुछ भी महसूस होता है तो तनिक भी देर न करें, तुरंत आंखों के डॉक्टर से मिलें। 

दिलचस्प तथ्य 
-अगर इंसान के पास एक आंख होती तो चीजें तीन आयामी प्रतीत होतीं। -आंखों में पाई जाने वाली मांसपेशी जो आंखों के झपकने के लिए जिम्मेदार होती है, शरीर की सबसे तेज मांसपेशी कहलाती है। 

-जब भी आपकों छींक आती है, आंखें खुली नहीं रह सकतीं। 

-आंखों का महत्वपूर्ण कॉर्निया शरीर का एक मात्र हिस्सा है जहां रक्त की आपूर्ति नहीं होती 

-आठ सप्ताह से कम उम्र के बच्चों की आंखों में आंसू का निर्माण नहीं होता ।

मेकअप में सावधानी 
महिलाओं को सजने-संवरने का शौक होता है, लेकिन आंखों के मामले में काफी सावधानी की जरूरत होती है। सजने-संवरने के दौरान आंखों का खास खयाल रखा जाना चाहिए। आंखों पर मेकअप के लिए तरह-तरह के कॉस्मेटिक्स के इस्तेमाल किए जाते हैं। उच्च गुणवत्ता वाले ब्रांडेड कॉस्मेटिक्स का इस्तेमाल आंखों पर खास बुरा असर नहीं डालता, लेकिन साधारण कॉस्मेटिक्स का इस्तेमाल नुकसानदेह साबित हो सकता है। इसलिए अपनी खूबसूरत आंखों को और खूबसूरत बनाने से पहले इस बात का पूरा ध्यान रखें कि इस्तेमाल किया जाने वाला कॉस्मेटिक्स आपकी आंखों को नुकसान न पहुंचाए। 

हर मौसम में रखें खयाल 

गर्मी 
-बढ़ती गर्मी अपने साथ आंखों की कई समस्याएं भी लाती है। इस दौरान सूर्य की तेज रोशनी में मौजूद अल्ट्रावायलेट किरणों और धूल से आंखों को बचा कर रखना बहुत जरूरी होता है 

-जब आप किसी सार्वजनिक जगहों पर या स्विमिंग पूल में होते हैं या फिर किसी से बात कर रहे होते हैं तो संक्रमण की आशंका रहती है। इसमें आंखों का लाल होना, आंखों में चिड़चिड़ापन या फिर आंख आना जैसी समस्या आती हैं। इनसे बचने के लिए जब भी कभी बाहर निकलनें, गहरे रंग के सनग्लास का इस्तेमाल करें। यह आपकी आंखों को सूर्य से आने वाली अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाता है। डॉक्टर की सलाह से हमेशा ब्रांडेड सनग्लास ही पहनें। 

-आंखों को छूने या रगड़ने से बचें। 

-बीच-बीच में ठंढे पानी से आंखों को धोते रहें। 

बरसात 
-हमेशा अपने हाथों को साफ रखने की कोशिश करें। 

-बरसात में बाहर यात्रा पर जा रहे हों तो साथ में हैंड क्लीनर रखें। -संभव हो तो इस मौसम में स्विमिंग न करें। -आंखें लाल हैं तो कॉन्टैक्ट लेंस का इस्तेमाल न करें। 

-तौलिया, नैपकीन आदि को शेयर न करें। 

-हम रहें, न रहें, आंखें रहेंगी 

-बॉलीवुड स्टार ऐश्वर्या राय बच्चन आंखों की अहमियत को इस कदर समझती हैं कि उन्होंने अपनी आंखें दान कर दी हैं। वह आई बैंक एसोसिएशन की ब्रांड एम्बेस्डर हैं और नेत्रदान के लिए जागरूकता फैलाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। मिस वर्ल्ड के फाइनल राउंड में जब उनसे पूछा गया था कि इस दुनिया को क्या देकर जाना चाहेंगी तो उन्होंने कहा कि अपनी आखें, ताकि कोई और भी इस खूबसूरत दुनिया को देख सके। 

समय पर सोएं, जल्दी जागें 
-ताउम्र स्वस्थ आंखों के लिए रात में समय पर सोएं और सुबह जल्दी जागें। पेट की बीमारी से भी आंखों की तकलीफ पैदा हो सकती है। सुबह एक ग्लास गरम पानी में एक नीबू का रस निचोड़कर पिएं, पेट साफ रहेगा। 

-थकी हुई और लाल आंखों को ताजगी प्रदान करने के लिए खीरे के गोल टुकड़े काटकर आंखों पर दस मिनट तक रखें। फिर गुलाबजल में रुई भिगोकर आंखों पर लगाएं। एक मिनट बाद ठंडे पानी से छींटे मारकर आंखें साफ करें। 

-आंखों के नीचे काले घेरे हैं तो एक कच्चे आलू को थोड़ी देर काले घेरों पर लगाएं। आधे घंटे बाद ठंडे पानी से आंखें धो लें और मॉयस्चराइजर लगा लें। 

-अगर आंखों के आस-पास झुर्रियां नजर आने लगी हैं तो प्रतिदिन सलाद और हरी सब्जियों में एक टी स्पून वेजिटेबल ऑयल डालकर खाएं। 

-दिल्ली में एक तिहाई लोग आंखों की किसी न किसी समस्या से प्रभावित हैं। यह प्रतिशत तेजी से बढ़ रहा है। इसका बड़ा कारण है कम्प्यूटर पर काम और वायु प्रदूषण। कम्प्यूटर पर काम करने से आंखों में पानी आने, सूखने, मांशपेशियों में दर्द की तकलीफ होती है। वायु प्रदूषण के कारण आंखों में जलन, एलर्जी और पानी आने की शिकायत होती है-डॉ. संजीव लहरी(डॉ. ऋषि मोहन,हिंदुस्तान,दिल्ली,14.6.12)।

आगे चलें...

रविवार, 17 जून 2012

बचें कंजंक्टिवाइटिस से

गर्मियों के अंत और बारिश की शुरूआती दिनों में कंजंक्टिवाइटिस का प्रकोप होता है। आमतौर पर यह संक्रमण पीड़ित व्यक्ति से संपर्क में आने पर दूसरों तक फैलता है। व्यक्तिगत साफ सफाई एवं चुनिंदा सावधानियों के ज़रिए इससे बचा जा सकता है। तेज़ धूप एवं गर्म माहौल में पनपने वाले बैक्टेरिया और वायरस आँखों में एलर्जी और संक्रमण के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। इनसे आँखों में लाली, पानी आना, जलन एवं चुभन जैसी परेशानियाँ महसूस होती हैं। यह कंजंक्टिवाइटिस के मुख्य लक्षण हैं। इससे बचने के लिए ऑंखों को दिन में कई बार साफ पानी से धोना चाहिए। साथ ही एन्टीबायटिक आईड्रॉप का उपयोग भी किया जा सकता है। कंजंक्टिवाइटिस से पीड़ित व्यक्ति से दूरी बनाए रखना चाहिए, खासतौर पर रूमाल, टॉवेल समेत उसके द्वारा उपयोग की गई अन्य वस्तुओं का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए। कंजंक्टिवाइटिस के रोगाणु तेज़ी से फैलते हैं।

बच्चों को अधिक है खतरा 
कंजंक्टिवाइटिस की समस्या बच्चों में अधिक होती है। इसकी मुख्य वजह है समय पर टीकाकरण नहीं होना, भोजन नहीं करना, खाँसी, निमोनिया, डायरिया, चिकनपॉक्स आदि बीमारियाँ। इनके कारण बच्चों में विटामिन-ए की कमी हो जाती है जिससे बारह साल तक के बच्चे इसकी चपेट में आ जाते हैं। बच्चों को कंजंक्टिवाइटिस की समस्या से बचाने के लिए नियमित विटामिन ए का डोज़ दिया जाना ज़रूरी है। साथ ही हरे-पीले रंग के फल आम, गाजर, दूध, रस व रसीले फल दिए जाना चाहिए। इनसे विटामिन-ए की कमी को पूरा किया जा सकता है और बच्चों को कंजंक्टिवाइटिस की समस्या से बचाया जा सकता है।  

घातक हैं घरेलू उपचार 
कंजंक्टिवाइटिस से आँखों में अल्सर की समस्या भी हो सकती है। आँख शरीर का महत्वपूर्ण अंग है। इसकी सुरक्षा के प्रति लापरवाही नहीं बरतना चाहिए। किसी भी तरह का घरेलू उपचार नहीं करना चाहिए। आँखों में तकलीफ होने पर चिकित्सक के परामर्शानुसार ही उपचार करना चाहिए। आँखों के लिए घरेलू उपचार घातक साबित हो सकते हैं। सही समय पर उचित इलाज के अभाव में आँखों में अल्सर की समस्या हो जाती है जिससे कई बार आँखों की रोशनी भी चली जाती है(डॉ. के. प्रसाद,सेहत,नई दुनिया,जून द्वितीयांक 20120।

आगे चलें...

रविवार, 27 मई 2012

आंसुओं को बेकार न बहने दें

आँसू आना एक सामान्य बात समझी जाती है। ग़म हो या खुशी आँसुओं पर किसी का नियंत्रण नहीं है। दिल में हलचल हुई तो बस समझ लीजिए आँसू बरबस ही आ जाएँगे। यह प्रकृति प्रदत्त अविभिन्न तंत्र है जो जन्म से मृत्यु तक कार्य करता है।  

अधिक आँसू बहना 
अधिक आँसू बहने के दो कारण हो सकते हैं - आँसू का अधिक बनना और आँसू का सामान्य मात्रा में ही बनना लेकिन अश्रु तंत्र के अवरुद्ध होने से आँखों के बाहर बहना। आँसुओं के अधिक बहने के तीन कारण हैं - भावनात्मक कारण जैसे- रोना, आँखों में खुजली या जलन होने पर जैसे तेज़ रौशनी, तेज़ हवा, धुएँ से संपर्क या आँखों में कचरा पड़ने पर। तीसरा कारण है आँखों में संक्रमण या चोट लगना। आँखों में कचरा पड़ गया हो तो इसे निकालने से आँसू थम जाते हैं। संक्रमण होने पर एंटीबायोटिक दवा देने से आँसू बंद हो जाते हैं।  

नलिका तंत्र में रूकावट के कारण 
पलकों के अपने स्थान से हटने से, चेहरे का लकवा, आँख का ठीक से बंद न हो पाना, अश्रुनलिका के छिद्र का आँख से संपर्क न रह पाना, अश्रुनलिका के छिद्र में असामान्यता, जन्मजात अनुपस्थिति, महीन कण का फँसना, अश्रुपथरी, चोट से इसमें सिकुड़न, आदि कारणों से मार्ग बंद हो जाता है और आँसू बहने लगते है। अश्रुनलिका के छिद्र को साफ करके कचरा निकालकर ठीक किया जा सकता है। नलिका के सिकुड़ने के कारण आँसू आ रहे हों तो इलाज करके रास्ता साफ किया जाता है। नवजात शिशुओं की आँख से आँसू आना काफी आम है। शिशुओं में अश्रु ग्रंथी और नाक को जोड़ने वाली नली अविकसित होती है इसलिए मार्ग अवरुद्ध रहता है। इस स्थिति में एक आँख ही प्रभावित होती है। प्रभावित आँख अधिक नम दिखाई देती है। इसमें संक्रमण होने पर आँसू के साथ सफेद डिस्चार्ज भी आने लगता है। इस बीमारी में अश्रु थैली को दबाकर साफ करके मालिश करने की सलाह दी जाती है। बाद में करीब छह माह की उम्र में नीडल डालकर रास्ता बनाया जाता है।  

वयस्कों में इसके कारण 
वयस्कों में अश्रु थैली में संक्रमण हो सकता है। मामूली संक्रमण होने पर अश्रु ग्रंथि के हिस्से में सूजन, दर्द के साथ बुखार आ सकता है। इसमें एंटीबायटिक व दर्द निवारक दवा दी जाती है। पुराना संक्रमण होने पर आँखों से पानी आने, सफेद डिस्चार्ज आने की शिकायत होती है। यह समस्या अधिकतर महिलाओं में होता है क्योंकि इनमें अक्सर नाक और अश्रु ग्रंथि को जोड़ने वाली नलिका संकरी होती है। इस स्थिति में सिरिंजिंग व प्रोबिंग द्वारा सफाई की जाती है। अंत में ऑपरेशन कर रास्ता बनाया जाता है। बच्चों में खसरा, मम्पस आदि रोगों के साथ अश्रु ग्रंथि का संक्रमण हो सकता है। टीबी व सिफलिस आदि रोग लंबे समय से बने हों तो मरीज़ में अश्रु ग्रंथी के गंभीर संक्रमण की आशंका होती है। ऐसे में मूल बीमारी के उपचार के साथ ही उचित एंटीबायोटिक भी दी जाती हैं। अश्रु ग्रंथि ट्यूमर भी हो सकता है। इसे बायोप्सी, रेडियोथैरेपी या ऑपरेशन से ठीक किया जाता है। आँखों के स्वास्थ्य, पोषण व सुरक्षा के लिए आँसूओं का नियमित बनना ज़रूरी है।  
 
गर्मियों में सूख जाती हैं आँखें 
-गर्मियों में आँखों में सूखापन आ जाता है। इसके कई कारण हैं जिसमें मौसम की खुश्की प्रमुख है। इसका इलाज नेत्ररोग विशेषज्ञ से ही कराना ठीक होता है लेकिन कुछ सावधानियाँ रखकर इस समस्या को दूर रखा जा सकता है। 

-नेत्ररोग विशेषज्ञ द्वारा सुझाए गए आई ल्युब्रिकेंट का नियमित उपयोग करें।

-सूखी आँखों में कोई दूसरे आईड्राप न डालें क्योंकि वे आँखों में किसी संक्रमण को ठीक करने के लिए बनाए गए हैं(डॉ. दिनेश मिश्र,सेहत,नई दुनिया,मई तृतीयांक 2012)।

आगे चलें...

मंगलवार, 15 मई 2012

जब खरीदें धूप का चश्मा...

गर्मियां शुरू होते ही अधिकांश व्यक्तियों को धूप के चश्मे की जरूरत महसूस होने लगती है। चिलचिलाती धूप में आंखों पर बिना चश्मा चढ़ाये बाहर जाने पर आंखों में जलने, पानी गिरना, सिर चकराना, जी मिचलाना जैसी शिकायतें होने लगती हैं। धूप का चश्मा खरीदते समय कुछ बातों का ख्याल रखना बेहद जरूरी है। कभी भी सस्ते व घटिया किस्म के लैंसों वाले चश्मे न खरीदें। सस्ते चश्मों में लैंस के स्थान पर वही शीशे लगा दिये जाते हैं जो खिड़कियों आदि में इस्तेमाल किये जाते हैं। यही नहीं, ऐसे चश्मों में शीशे के अलावा प्लास्टिक का भी प्रयोग होता है और वह भी बहुत घटिया किस्म का होता है। इस तरह के घटिया शीशे या प्लास्टिक के लैंस सूर्य की किरणों के साथ आने वाली पराबैंगनी किरणों का शोषण नहीं कर पाते और लैंस के माध्यम से आरपार होकर आंखों को नुकसान पहुंचाते हैं। 

लैंस के रंग का चयन करते समय भी सावधानी बरतनी चाहिए। लैंस ऐसे रंग का हो जो आंखों को कोमलता का अहसास दिलाये। लैंस हमेशा हरे, हल्के काले, गहरे नीले, कत्थई या भूरे रंग का ही खरीदें। अच्छी किस्म और उचित रंगों के लैंस सूर्य की किरणों और प्रकाश को परावर्ती करके वापस लौटा देते हैं। फलस्वरूप लैंस गर्म नहीं होते और आंखों को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाते। 

चश्मे में फ्रेम भी ठीक होना चाहिए। आजकल चश्मे की दुकानों पर विभिन्न प्रकार के फ्रेम मिलते हैं। जैसे : धातु फ्रेम, प्लास्टिक का फ्रेम, सेल्यूलोज नाईट्रेट फ्रेम आदि। लगातार अनावश्यक स्थानों पर व अनुपयुक्त समय पर धूप का चश्मा लगाते रहने से प्रकाशांतक (फोटोफोबिया) नामक रोग भी हो सकता है। अत: इसका उपयोग केवल आवश्यकता होने पर ही करना चाहिए(अनिल कुमार,दैनिक ट्रिब्यून,13.5.12)।

आगे चलें...

गुरुवार, 3 मई 2012

आँखों को रखें नम

आज भले ही सिर के ऊपर बादल नजर आ जाए, लेकिन कल से छह दिन सूर्य सुकून से नहीं जीने देगा। हालांकि अधिकतम तापमान 37 डिग्री से ऊपर नहीं जाएगा, लेकिन आंखों के लिए यह भी कम नुकसानदेह नहीं है। क्या सावधानी बरतें, बता रहे हैं नेत्र विशेषज्ञ डॉ. संजीव लाहिड़ीः 

घर से बाहर निकलते समय धूप का चश्मा जरूर लगाएं। इससे धूप, धूल-मिट्टी से तो आपकी आंखों की रक्षा होगी ही, बार-बार आंखों को छूने की भी जरूरत महसूस नहीं होगी। धूप से रक्षा करने वाली कैप भी पहनना फायदेमंद रहेगा। इस मौसम में आंखें शुष्क हो जाती हैं। उनमें खुजली या जलन जैसी समस्या आ सकती है। आंखें लाल भी हो सकती हैं। आंखों को दो-तीन बार धोएं। 

पानी खूब पीएं। रात में सोने से पहले आंखों को साफ पानी से धोएं, लेकिन आंखों में पानी का छींटा न मारें, इससे नाजुक आंखों को नुकसान होता है। 

साफ-सफाई का विशेष खयाल रखें, क्योंकि गर्मी में आंखों के संक्रमित होने का खतरा काफी बढ़ जाता है। संक्रमित आंखों वाला व्यक्ति नजर आए तो उससे बचें। ऐसे व्यक्ति के आसपास के सामान पर हाथ न रखें, क्योंकि उन्होंने अपनी आंखों को छूकर अपना हाथ वहां रखा हो सकता है। इससे आपकी आंखें संक्रमित हो सकती हैं। अगर आपकी आंखें संक्रमित हैं तो आप भी खुद को अलग रखें। खासकर घर में बच्चों से खुद को दूर रखें, क्योंकि उनकी आंखें आपकी वजह से संक्रमित हो सकती हैं। 

इस मौसम में आंखें लाल, संक्रमित या शुष्क या एलर्जी का शिकार हो जाएं तो डॉक्टरी सलाह लेने से न हिचकें। धूल-मिट्टी और भीड़-भाड़ वाले वातावरण में जाने से बचें, क्योंकि इससे आपकी नाजुक आंखों को नुकसान हो सकता है। धूल-मिट्टी आंखों की दुश्मन तो हैं ही, भीड़-भाड़ वाले वातावरण में संक्रमित आंखों वाले व्यक्ति भी हो सकते हैं जो आपको संक्रमित कर सकते हैं। घर लौटकर हाथों को अच्छी तरह साबुन से धोएं, ताकि आपके गंदे हाथों से कोई संक्रमण न फैले। 

आंखों का अनावश्यक रूप से न छुएं। छूने या पोंछने की जरूरत महसूस हो तो साफ रुमाल या टिशू पेपर का इस्तेमाल करें। छोटे बच्चे अपनी आंखों का ध्यान खुद नहीं रख सकते। इसलिए माता-पिता उनकी आंखों का ध्यान रखें। उन्हें कोई भी तकलीफ हो तो तुरंत डॉक्टर से दिखाएं। 

खाने-पीने का तो विशेष ध्यान रखें ही। हरी सब्जियां आंखों के लिए अच्छी होती हैं, इसलिए इनका अधिक से अधिक सेवन करें(हिंदुस्तान,दिल्ली,25.4.12)।

आगे चलें...

बुधवार, 14 मार्च 2012

कैसे-कैसे चश्मे,कितनी तरह की लेंस

पिछले दो-तीन सालों में अचानक पूरे देश में आंख के अस्पतालों की बाढ़ आ गई है । दिल्ली के "सेंटर फॉर साइट" आईकेयर समूह ने इस साल के अंत तक अपने और ५० केंद्र स्थापित करने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई है । तमिलनाडु की आईकेयर कंपनी वासन आईकेयर भी दिल्ली में २५ आई केंद्र स्थापित करने की तरफ अग्रसर है । दुबई के हेल्थकेयर कारोबारी केरल के मूल निवासी डॉ. मुपेन की एमडी हेल्थकेयर कंपनी भी दिल्ली में इतने ही नेत्र अस्पताल खोलने जा रही है । आखिर अचानक आंख के इतने अस्पतालों की जरूरत क्यों पैदा हो गई ? दरअसल, भारी संख्या में विदेशी पर्यटक आंख के मेडिकल एवं कॉस्मेटिक इलाज की मांग के साथ यहां आ रहे हैं ।

त्रिची स्थित अत्याधुनिक वासन आईकेयर क्लिनक में न्यूजीलैंड की एक लड़की की आंखों के रंग बदलने की देश की पहली सर्जरी करने वाले डॉ. शिबू बर्के ने बताया कि वासन आईकेयर में इलाज के लिए जितने मरीज आते हैं, उनमें १५ प्रतिशत से अधिक विदेशी ही होते हैं । इनमें सिंगापुर, मलेशिया, अमेरिका, यूके, मध्य-पूर्व के देशों के मरीज बहुत होते हैं । वजह यह है कि यहां विश्वस्तरीय आईकेयर खर्च के १०वें भाग में ही उपलब्ध है । सेंटर फॉर साइट नेत्र अस्पताल समूह के चेयरमैन डॉ. महीपाल सचदेव ने कहा कि मेडिकल टूरिज्म की बात करें तो सबसे अधिक विदेशी मरीज आंख के अस्पतालों में ही आ रहे हैं । इसकी एक खास वजह है । आंख का इलाज डेकेयर है । इसमें अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं होती । कोई दिल का मरीज हो, लीवर का मरीज हो या किसी और गंभीर बीमारी का मरीज हो तो उनके लिए लंबी यात्रा करना भी एक समस्या है लेकिन आंख का इलाज कराना है तो यह समस्या आड़े नहीं आती । फिर आंख का इलाज कराने के बाद वे भारत के भ्रमण के लायक भी हो जाते हैं ।

डॉ. शिबू बर्के ने कहा कि आंख का इलाज का परिणाम तुरंत आता है । इलाज से आंख ठीक हुई या नहीं, इसके लिए इंतजार करने की जरूरत नहीं होती इसलिए भ्रमण के लिए आए विदेशी आंख के इलाज़ की योजना तत्काल बना लेते हैं। विदेशी मरीज़ों की आंख के इलाज़ का मार्केट भारत में बहुत तेज़ी से फैल रहा है। आईकेअर में कई मामलों में हम विकसित देशों से भी आगे हैं। मसलन,अमरीका में आंखों का रंग बदलने की सर्जरी नहीं होती। अचानक इतने आईकेअर अस्पदाल खुलने की वजह क्या है? जवाब में डाक्टर बर्के कहते हैं कि यह सही है कि पिछले दो सालों में आंख के दर्जनों अस्पताल खुल गए हैं लेकिन अब भी हम सिर्फ आठ प्रतिशत लोगों की आंक के इलाज़ की ज़रूरत ही पूरी कर पाएंगे। विदेशी मरीज़ों का दबाव इतना बढ़ रहा है कि कई गुना और अस्पताल खोलने पड़ेंगे। आईकेअर का मतलब अब केवल मोतियाबिंद की सर्जरी नहीं रहा। मेडिकल के साथ-साथ कॉस्मेटिक आईकेअर की मांग में भारी वृद्धि हुई है। अब मुड़ने वाले लेंस,मल्टीफोकल लेंस,एकोमोडेटिव लेंस जैसे कॉस्मेटिक इलाज़ की मांग विदेशियों की तरफ से ज्यादा हो रही है(धनंजय,संडे नई दुनिया,11 मार्च,2012)

नजर कमजोर होना बेहद आम समस्या है। वक्त पर सही इलाज से इसे बढ़ने से रोका जा सकता है। इसके लिए चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस की जानकारी होना जरूरी है। चश्मे और लेंस के बारे में पूरी जानकारी डॉक्टर संजय तेवतिया से: 

नजर के दोष को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। नजर की समस्या होने पर हमेशा सही नंबर का चश्मा या कॉन्टैक्ट लेंस पहनना चाहिए। ऐसा न करने पर आंख के पर्दे पर पाया जाने वाला मेक्यूला डल यानी सुस्त हो जाता है। इसे सुस्त आंख की बीमारी (एम्बलायोपिया) भी कहा जाता है। मेक्यूला रेटिना का ही एक हिस्सा होता है और लगातार लाइट पड़ते रहने से यह एक्टिव रहता है। नजर में दोष होने पर लाइट मेक्यूला के आगे या पीछे पड़ती है और मेक्यूला सुस्त हो जाता है। 

ऐसा होने पर वक्त रहते आंखों के डॉक्टर से नजर की जांच कराकर फौरन सही नंबर का चश्मा या कॉन्टैक्ट लेंस पहनना शुरू कर देना चाहिए। ऐसा करने से लाइट लगातार मेक्यूला पर पड़ती रहेगी और मेक्यूला को सुस्त होने (एम्बलायोपिया) से बचाया जा सकेगा। एम्बलायोपिया होने पर चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस की मदद से भी आंख में पूरी रोशनी नहीं आ पाती। आमतौर पर तीन तरह के नजर के दोष पाए जाते हैं- मायोपिया (निकट दृष्टिदोष), हाइपरमेट्रोपिया (दूर दृष्टिदोष) और एस्टिग्मेटिज्म। 

मायोपिया 
मायोपिया में किसी चीज का प्रतिबिंब आंख के पर्दे के आगे बन जाता है। इससे दूर की चीजें ढंग से दिखाई नहीं देतीं। मायोपिया को ठीक करने के लिए कॉनकेव या माइनस नंबर का लेंस दिया जाता है। 

हाइपरमेट्रोपिया 
हाइपरमेट्रोपिया में किसी चीज का प्रतिबिंब आंख के पर्दे के पीछे की तरफ बनता है। इससे पास का देखने में दिक्कत होती है। इसके इलाज के लिए कॉन्वेक्स या प्लस नंबर का लेंस चश्मे में दिया जाता है।

एस्टिग्मेटिज्म 
एस्टिग्मेटिज्म में रोशनी की किरणें एक जगह पर फोकस न होकर अलग-अलग फोकस होती हैं। इसमें दूर या पास, दोनों जगह का धुंधला दिख सकता है। एस्टिग्मेटिज्म में सिलिंड्रिकल लेंस का इस्तेमाल किया जाता है। 

प्रेस्बायोपिया 
इसके अलावा प्रेस्बायोपिया भी आंख की समस्या है लेकिन इसे दृष्टिदोष नहीं कहा जाता। प्रेस्बायोपिया उम्र के साथ होता है। 40 साल या उससे ज्यादा उम्र होने पर ज्यादातर लोगों को पास का देखने में परेशानी होती है। इसकी वजह आंख के पास की चीज पर फोकस करने में दिक्कत होती है। इसके लिए चश्मे में कॉन्वेक्स या प्लस नंबर का लेंस दिया जाता है। प्रेस्बायोपिया में हर समय चश्मा पहनने की जरूरत नहीं होती। सिर्फ पास का काम करते समय ही चश्मा पहनना होता है। 

चश्मा और फ्रेम 
गलत शेप और साइज का चश्मा न सिर्फ किसी के लिए परेशानी की वजह बन सकता है, बल्कि यह किसी की खूबसूरती को बढ़ा या खत्म भी कर सकता है, फिर चाहे आई-ग्लास हो या सन-ग्लास। चश्मा खरीदने से पहले हमेशा कुछ चीजों का ध्यान रखना चाहिए। 

- चश्मा और उसका फ्रेम आरामदायक होना चाहिए। यह न ज्यादा ढीला हो और न ज्यादा टाइट। 

- चश्मे और फ्रेम का वजन कम होना चाहिए। नाक और कान पर चश्मे का ज्यादा दबाव नहीं होना चाहिए। 

- चश्मे का साइज बहुत छोटा नहीं होना चाहिए। साइज कम-से-कम इतना जरूर हो कि वह आंख को पूरी तरह से ढक सके। 

- बच्चों में खासतौर पर चश्मे का आकार थोड़ा बड़ा होना चाहिए, वरना बच्चा चश्मे से ऊपर की तरफ या साइड से देखना शुरू कर देता है। 

- चश्मे का फ्रेम ऐसा होना चाहिए, जो लंबे समय तक अपना सही आकार बनाए रख सके। 

- चश्मे को पहनते और उतारते वक्त हमेशा दोनों हाथों का इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसा न करने पर अक्सर चश्मे का आकार थोड़ा आड़ा-तिरछा हो सकता है। ऐसा होने पर चश्मे की पावर बदलने, प्रिज्म जैसी खराबी आने या चीजें आड़ी-तिरछी दिखने की आशंका होती है। 

- आजकल चश्मे पूरे फ्रेम वाले, आधे फ्रेम (हाफ फ्रेम) वाले और फ्रेमलेस मिलते हैं। 

- चश्मे के फ्रेम आमतौर पर मेटल, प्लास्टिक के अलावा लचीले मटीरियल के भी बने होते हैं। बच्चों और बूढ़ों के लिए खासतौर पर प्लास्टिक वाले फ्रेम बेहतर होते हैं। लचीले मटीरियल वाले फ्रेम को आराम से मोड़ा जा सकता है और ऐसे फ्रेम गिरने पर टूटते भी नहीं हैं। चश्मे के फ्रेम की करीब हर छह महीने में जांच कराते रहना चाहिए। 

चश्मे का लेंस 
चश्मे का लेंस नजर के दोष को ठीक करने, आंख को तेज धूप और अल्ट्रावॉयलट किरणों से बचाने के अलावा आंखों की खूबसूरती बढ़ाने के काम आता है। चश्मे के लेंस कई तरह के मटीरियल के बने होते हैं। -आमतौर पर चश्मों में क्राउन ग्लास इस्तेमाल किए जाते हैं। हालांकि आजकल क्राउन ग्लास ज्यादा चलन में नहीं हैं। -रेजिन लेंस हल्के होते हैं, आसानी से टूटते नहीं हैं और इन पर खरोंच भी नहीं पड़ती है। -प्लास्टिक लेंस भी हल्के होते हैं और आसानी से टूटते नहीं है लेकिन इन पर खरोंच जल्दी पड़ जाती हैं। -ट्रिप्लेक्स लेंस भी वजन में हल्के होते हैं और जल्दी टूटते नहीं हैं। -लेंस पर कई तरह की कोटिंग भी मिलती है, जैसे कि एंटी-ग्लेर, एंटी-स्क्रैच, फोटो-क्रोमैटिक आदि। एंटी-ग्लेर कोटिंग आंखों को चौंध से और फोटो-क्रोमैटिक अल्ट्रावॉयलट किरणों से बचाती है। 

कितनी तरह के लेंस 
मोनोफोकल या सिंगल विजन लेंस 
इसमें पूरे लेंस की पावर एक जैसी ही होती है। इनका इस्तेमाल सिर्फ नजर के दोष जैसे मायोपिया, हाइपरमेट्रोपिया, एस्टीग्मेटिज्म या प्रेस्बायोपिया में से सिर्फ एक के लिए किया जा सकता है। 

बायफोकल लेंस 
बायफोकल लेंस में ऊपर की तरफ दूर का देखने का नंबर और नीचे की ओर पास का देखने का नंबर होता है।

ट्राइफोकल लेंस 
ट्राइफोकल लेंस में ऊपर की तरफ दूर का देखने का नंबर होता है। बीच में बीच वाला एरिया देखने का और नीचे की तरफ पास का नंबर होता है। ट्राइफोकल लेंस में बीच वाला एरिया बड़ा होता है। ट्राइफोकल लेंस 40 साल से ज्यादा उम्र के ऐसे लोगों के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं, जो कंप्यूटर पर काम करते हैं। 

मल्टिफोकल या प्रोग्रेसिव लेंस 
मल्टिफोकल या प्रोगेसिव लेंस में बहुत सारी फोकल लेंथ होती हैं। कितनी दूरी पर देखना है, उसके हिसाब से इसमें लेंस की पावर या नंबर अलग होता है। इस समय मल्टिफोकल या प्रोग्रेसिव लेंस सबसे अच्छे माने जाते हैं लेकिन इस लेंस को एडजस्ट करने में थोड़ा वक्त लगता है, मसलन लेंस के किस क्षेत्र से कितनी दूरी का देखना है, सीढ़िया चढ़ने-उतरने में सही अनुमान लगाने में समय लगना आदि। 

कॉन्टैक्ट लेंस 
आजकल कॉन्टैक्ट लेंस का इस्तेमाल आम हो गया है। कॉन्टैक्ट लेंस का इस्तेमाल नजर की कमजोरी, कॉर्नियल अल्सर, काला मोतिया के इलाज के अलावा लोग फैशन के तौर पर भी करते हैं। कॉन्टैक्ट लेंस आमतौर पर तीन तरह के होते हैं: 

हार्ड कॉन्टैक्ट लेंस 
हार्ड कॉन्टैक्ट लेंस पॉलिमिथाइल मिथाइल एक्रिलेट मटीरियल के बने होते है। ये लंबे समय तक इस्तेमाल किए जा सकते है। वजन में हल्के होते हैं लेकिन हार्ड कॉन्टैक्ट लेंस ऑक्सिजन को आरपार नहीं होने देते, जिस वजह से कॉर्निया तक ऑक्सिजन नहीं पहुंच पाती। इन्हें रोजाना पहन सकते हैं लेकिन रात के वक्त इन्हें उतारना जरूरी है, वरना कॉर्निया को ऑक्सिजन की कमी हो जाती है और आदमी को धुंधला दिखने लगता है। हार्ड होने के कारण कॉन्टैक्ट लेंस को पहनते और उतारते वक्त कॉर्निया में खरोंच लगने और कॉर्नियल अल्सर होने का डर रहता है। आजकल हार्ड कॉन्टैक्ट लेंस का इस्तेमाल काफी कम हो गया है। 

सेमी-सॉफ्ट कॉन्टैक्ट लेंस 
सेमी-सॉफ्ट कॉन्टैक्ट लेंस सिलिकॉन पॉलिमर्स के बने होते हैं। इनमें हार्ड और सॉफ्ट, दोनों तरह की क्वॉलिटी पाई जाती है। सेमी-सॉफ्ट कॉन्टैक्ट लेंस सबसे अच्छे माने जाते हैं क्योंकि ये ऑक्सिजन को कॉर्निया तक पहुंचाने में भी मददगार होते हैं। अपना आकार बनाए रखने के साथ-साथ इनसे दिखाई भी एकदम साफ देता है। जिन लोगों का सिलिंड्रिकल नंबर (पास और दूर, दोनों हो सकते हैं) होता है, उनके लिए ये लेंस सबसे अच्छे होते हैं। सिलिंड्रिकल नंबर से फोकस रेटिना के ऊपर और एक ही जगह पर होने लगता है। इन लेंस की देखभाल करना आसान है और ये टिकाऊ भी खूब होते हैं। 

सॉफ्ट कॉन्टैक्ट लेंस 
ये लेंस जिस मटीरियल के बने होते हैं, उसमें पानी भी मिला होता है, जो ऑक्सिजन को लेंस के कॉर्निया तक पहुंचाने में मददगार होता है। ये लेंस सूरज की अल्ट्रावॉयलेट किरणों से आंखों का बचाव करते हैं। सॉफ्ट होने के कारण पहली बार लेंस यूज कर रहे लोगों को इन्हें इस्तेमाल करना आसान होता है। हालांकि इनमें थोड़े समय में ही आंख के अंदर का प्रोटीन जमा होने लगता है, जिससे ये धुंधले पड़ जाते हैं और इन्हें बदलना पड़ता है। सॉफ्ट होने के कारण इनमें क्रैक जल्दी पड़ने लगते हैं। सॉफ्ट कॉन्टैक्स लेंस में डिस्पोजेबल लेंस पहनना बेहतर होता है। 

नोट: सॉफ्ट लेंस को साल में एक बार जरूर बदल देना चाहिए। ऐसा करने से आंख में इन्फेक्शन का खतरा कम रहता है। सॉफ्ट लेंस उन लोगों के लिए बहुत कारगर होते हैं, जिन्हें हर रोज देर तक काम करना होता है। सभी तरह के लेंस को रात में उतार देना चाहिए। हालांकि मजबूरी में सॉफ्ट या सेमी-सॉफ्ट लेंस को पहनकर सो भी सकते हैं, जबकि हार्ड कॉन्टैक्स लेंस को जरूर उतारना चाहिए। 

सॉफ्ट लेंस कई तरह के होते हैं : 
महीने में बदले जानेवाले कॉन्टैक्ट लेंस 
इन लेंस को एक महीने इस्तेमाल करने के बाद बदल देना जरूरी होता है। जिन लोगों में इन्फेक्शन जल्दी-जल्दी होता है, उनके लिए ये लेंस कारगर होते हैं। रोजाना बदले जानेवाले लेंस की तुलना में ये सस्ते भी पड़ते हैं और पसंद भी ज्यादा किए जाते हैं। 

डिस्पोजेबल कॉन्टैक्ट लेंस 
इन्हें रोजाना बदलने वाले लेंस भी कह सकते हैं क्योंकि इन्हें एक बार इस्तेमाल के बाद फेंक दिया जाता है। जिन लोगों को एलर्जी या आंख में इन्फेक्शन की शिकायत होती है, उनके लिए इस तरह के कॉन्टैक्ट लेंस बहुत काम के होते हैं। 

कलर्ड सॉफ्ट कॉन्टैक्ट लेंस 
कलर्ड कॉन्टैक्ट लेंस से कोई भी आंखों का रंग बदल सकता है। फिल्म स्टार, मॉडल्स के अलावा फैशन में आम लोग खासकर युवा लड़कियां इनका इस्तेमाल करती हैं। आंख की पुतली पर फुला या माड़ा पड़ने पर भी लोग इनका इस्तेमाल करते हैं। 

बायफोकल और ग्रेडिड कॉन्टैक्ट लेंस 
 बायफोकल कॉन्टैक्ट लेंस दूर और पास के नजर दोष, दोनों में इस्तेमाल किए जाते हैं। इन कॉन्टैक्ट लेंस का इस्तेमाल प्रेस्बायोपिया में किया जाता है। 

कॉन्टैक्ट लेंस के खराब नतीजे 
कॉन्टैक्स लेंस का ढंग से इस्तेमाल न करने पर कई समस्याएं हो सकती हैं। जैसे: 

एलर्जी (एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस): इसमें आंख लाल हो जाती है। आंख में खुजली होने लगती है। ऐसा होने पर कुछ समय के लिए कॉन्टैक्ट लेंस न लगाएं और आंख के डॉक्टर की सलाह लें। 

इन्फेक्शन: इससे बचने के लिए जरूरी है कि कॉन्टैक्ट लेंस पहनने से पहले अच्छी तरह हाथ धोएं। कॉन्टैक्ट लेंस को पानी से नहीं धोना चाहिए। पानी में मौजूद बैक्टीरिया आंख में इन्फेक्शन कर सकते हैं। कॉन्टैक्ट लेंस को लेंस केयर सल्यूशन से साफ करें और एक बार इस्तेमाल किए गए सल्यूशन को दोबारा इस्तेमाल न करें।

पुतली (कॉर्निया) पर खरोंच: ध्यान रखें कि कॉन्टैक्ट लेंस को पहनते और उतारते वक्त आंख की पुतली पर खरोंच न लगे क्योंकि ऐसा होने पर कॉर्नियल अल्सर और आंख की पुतली पर सफेदी पड़ने का डर रहता है, जिससे हमेशा के लिए आंख की रोशनी जा सकती है। 

कब यूज न करें लेंस 
-अगर किसी का दिमाग पूरा काम न करता हो -आंख में इन्फेक्शन या एलर्जी होने पर 
-आंख में रूसी (ब्लिफेराइटिस) होने पर 
-आंख के सूखे (ड्राई आई सिंड्रोम) होने पर 
-आंख की पुतली पर सूजन होने पर 

लेंस खरीदते वक्त रखें ध्यान 
-लेंस खरीदते वक्त देखें कि लेंस से बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा है या नहीं। लेंस का वजन भी हल्का होना चाहिए। 

-लेंस पर एंटी-ग्लेयर कोटिंग (चौंधरहित कवर) होनी चाहिए, जो आंख को चौंध से बचाए रख सके और साफ देखने में मदद करे। 

-लेंस का रिफ्रेक्टिव इंडेक्स ज्यादा होना चाहिए। ऐसा लेंस पतला होता है और किसी भी चीज के तिरछा दिखने की आशंका को कम कर देता है। इसे हाई इंडेक्स लेंस भी कहा जाता है। 

ऐसे खरीदें सनग्लास 
गर्मियों में धूप का चश्मा सिर्फ फैशन के लिए नहीं होना चाहिए। चश्मा खरीदने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि यह चश्मा आपकी आंखों का अल्ट्रावॉयलट किरणों से बचाव कर सकता है या नहीं। कभी भी सस्ते और सड़क किनारे बिकने वाले चश्मे नहीं खरीदने चाहिए। सड़क के किनारे बिकने वाले सस्ते चश्मे आंखों को अल्ट्रावॉयलट किरणों से बचा नहीं पाते और आंखों को नुकसान पहुंचाते हैं। हमेशा अच्छी ऑप्टिकल शॉप से अच्छी कंपनी और क्वॉलिटी का चश्मा खरीदना चाहिए(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,11.3.12)।

आगे चलें...

शनिवार, 3 मार्च 2012

नजर, जुबान और कान बनती तकनीक

हर बच्चा अपने आप में खास होता है, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जो किन्हीं वजहों से शारीरिक तौर पर कुछ कमतर रह जाते हैं। उनकी मदद के लिए आज हमारे पास तमाम तकनीकें मौजूद हैं। इनके जरिए उनकी जिंदगी आसान और बेहतर बन सकती है। ऐसी ही तकनीक और उपकरणों की जानकारी एक्सपर्ट्स की मदद से दे रही हैं प्रियंका सिंह : 

कैसी-कैसी परेशानियां 
बच्चा न सुन पाता हो, न बोल पाता हो, न देख पाता हो 
ऐसा बमुश्किल ही होता है, जब बच्चे के पास बोलने, देखने और सुनने, तीनों की क्षमता न हो। ऐसे बच्चों को कुछ भी सिखाना और समझाना बहुत मुश्किल होता है। आमतौर पर अगर बच्चा देख नहीं पाता तो उसके सुनने की क्षमता काफी अच्छी होती है और अगर सुन नहीं पाता तो उसकी आंखें काफी तेज होती हैं। ऐसा इसलिए होता कि अगर दिमाग का ऑडिटरी एरिया (सुनने की क्षमता प्रदान करनेवाला एरिया) खत्म हो जाता है तो विजुअल एरिया (देखने की क्षमतावाला एरिया) ज्यादा डिवेलप हो जाता है। बधिर बच्चे अक्सर लिप मूवमेंट भी पढ़ लेते हैं। इसी तरह दृष्टिहीनों को छोटी-छोटी आवाजें भी आसानी से सुनाई दे जाती हैं। 

न सुन पाता हो, न बोल पाता हो 
बच्चा अगर पैदाइशी तौर पर सुन नहीं पाता, तो वह आमतौर पर बोल भी नहीं पाता। इसकी वजह है कि बच्चा जो सुनता है, उसे दोहरा कर ही बोलना सीखता है। अगर उसने शब्द सुने ही नहीं, तो वह बोल भी नहीं पाएगा। 

बच्चा बोल पाता हो, पर सुन न पाता हो 
कोई-कोई बच्चा सुन पाता है लेकिन बोल नहीं पाता। हालांकि ऐसा बहुत कम होता है। दिमाग के बोलने के एरिया में अगर कोई दिक्कत हो या बाद में इन्फेक्शन हो गया हो, मसलन मेनिंजाइटिस (दिमागी बुखार) जैसी बीमारी हो जाए तो सुनने की क्षमता खत्म हो सकती है। ऐसे में बच्चे ने बीमार होने के वक्त तक अगर पूरा बोलना शुरू कर दिया है या जितने भी शब्द सीखे हैं, उन्हें वह आगे भी बोल पाएगा लेकिन सुन नहीं पाएगा। 

मूक-बधिरों के लिए 
सबसे पहले यह जानना चाहिए कि बच्चे की सुनने की क्षमता ठीक है या नहीं। इसके लिए बच्चे के जन्म के फौरन बाद ओएई (ओटोअकूस्टिक इमिशन) टेस्ट कराना चाहिए। वैसे, इस टेस्ट को बाद में भी करा सकते हैं लेकिन जितना जल्दी कराएं, उतना अच्छा है। इससे पता लग जाएगा कि बच्चा सुन पाता है या नहीं। आईओए के अलावा बेरा, एएसएसआर आदि टेस्ट भी बच्चे की सुनने की क्षमता जानने के लिए होते हैं। आमतौर पर कोई भी बच्चा सुनने में पूरी तरह नाकाम नहीं होता। वह कुछ फीसदी जरूर सुन पाता है। ऐसे में जितनी जल्दी हेयरिंग एड का इस्तेमाल शुरू करा दें, उतना अच्छा है। अगर किसी बच्चे ने बचपन में हेयरिंग एड लगाया हो तो उसे सुनाई देने लगता है। फिर वह बोलना भी शुरू कर सकता है। 

हियरिंग एड (कान की मशीन) 
दो तरह के हियरिंग एड आते हैं : एनालॉग और डिजिटल। एनालॉग के मुकाबले डिजिटल एड बेहतर होते हैं क्योंकि इनमें आवाज ज्यादा साफ सुनाई देती है। ये ऑटो एडजस्टेबल होते हैं। हालांकि ये एनालॉग के मुकाबले महंगे भी होते हैं। अच्छे एड कस्टमाइज्ड होते हैं। मसलन अगर किसी फ्रीक्वेंसी में किसी का हेयरिंग लॉस कम है और किसी में ज्यादा तो उसी के अनुसार एड काम करता है। 

हियरिंग एड की तीन कैटिगरी होती हैं : 
1. पॉकेट मॉडल एड 
हियरिंग एड में सबसे बेसिक बॉडी लेवल एड है। इसे पॉकेट मॉडल भी कहा जाता है क्योंकि यह छोटा-सा डिवाइस होता है, जिसे पॉकेट में रखते हैं। इसकी बॉडी में माइक्रोफोन, एम्प्लिफायर और कंट्रोल्स होते हैं। एक कॉर्ड से इलेक्ट्रिक सिग्नल रिसीवर में भेजा जाता हैं, जोकि इस सिग्नल को आवाज में बदलता है। सुनने में जितनी परेशानी होती है, उसके मुताबिक आवाज का लेवल तय होता है। 
कीमत : 1000 से 5000 रुपये तक। 


2. BTE (Behind the Ear) 
कान के पीछे लगाने वाले एड आमतौर पर छोटे बच्चों को लगाए जाते हैं क्योंकि वे पॉकेट मॉडल एड को ढंग से संभाल नहीं पाते। यह कान के पीछे पहना जाता है। 
कीमत : 3000 से 3 लाख रुपये तक। 

3. ITE (In the Ear) इन द इयर, इन द कैनाल और कंप्लीट इन द कैनाल, ये तीनों कॉस्मेटिकली डिजाइन एड होते हैं। ये कान में अंदर की तरफ लगते हैं इसलिए बाहर से कम या बिल्कुल दिखाई नहीं देते। हालांकि इनकी सीमा है कि जहां बिल्कुल सुनाई नहीं देता, वहां ये काम नहीं करते। पूरा डिवाइस कान में या कान की नली में होता है। हियरिंग एड को एक सख्त प्लास्टिक के कवच में रखा जाता है। इस प्लास्टिक के कवच को कान के आकार के हिसाब से खास तौर पर बनाया जाता है। 

कीमत : 8-10 हजार से 3 लाख रुपये तक। 

कौन-से एड बेहतर 
जिस हियरिंग एड में जितने ज्यादा चैनल होते हैं, उसकी क्वॉलिटी उतनी ज्यादा अच्छी होती है। वरनाफोन, सीमेंस, पायरेक्स, फोनेक्स, एल्प आदि के हियरिंग एड को अच्छा माना जाता है। गरीबों को सरकार मुफ्त में भी पॉकेट मॉटल या बीटीई हियरिंग एड मुहैया कराती है। 

कान के लिए इम्प्लांट्स कॉकलियर इम्प्लांट्स 
अगर बच्चे को हियरिंग एड का ज्यादा फायदा नहीं हो रहा या उसे बहुत कम सुनाई देता है तो कॉकलियर इम्प्लांट लगवाना बेहतर है। इनका रिजल्ट हियरिंग मशीन से बेहतर होता है। लेकिन ये काफी महंगे पड़ते हैं। इसके अलावा, अगर एड में कोई खराबी आ जाती है तो फिर से सर्जरी करनी पड़ती है। कॉकलियर इम्प्लांट, जितना जल्दी हो सके करा देना चाहिए। इसकी वजह यह है कि ब्रेन के स्पीच एरिया का विकास पांच साल की उम्र के बाद खत्म हो जाता है। अगर कॉकलियर इम्प्लांट पांच साल के बाद होता है तो बच्चा सुन पाएगा लेकिन बोल नहीं पाएगा। जितनी जल्दी बच्चा सुनेगा, उतनी जल्दी बोल पाएगा। जन्म के एक साल के बाद लेकिन पांच साल से पहले कॉकलियर इम्प्लांट जरूर करा लेना चाहिए। 

कैसे काम करता है 
कॉकलियर इम्प्लांट्स उन लोगों में किया जाता है, जिनके कान के अंदरूनी हिस्से (इनर इयर) में खराबी हो। इनर इयर को सर्जरी के जरिए बायपास कर ऑडिटरी नर्व्स (सुनने वाली नस) को एक्टिव करते हैं, जिससे मेसेज सीधे ब्रेन में चला जाता है। सर्जरी अगर कामयाब होती है तो दो हफ्ते के बाद प्रोसेसर को चार्ज करते हैं। प्रोसेसर बाहर से गोलाकार होता है, जो आवाजों को जमा कर अंदर भेज देता है। इसे कान के पीछे लगाया जाता है। इसके बाद एक-दो साल स्पीच थेरपी करते हैं, तब बच्चा सुनना शुरू कर पाता है। अगर सुनने की क्षमता बाद में खराब हुई है तो ज्यादा स्पीच थेरपी की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन अगर जन्म से सुनाई नहीं देता था तो स्पीच थेरपी पर काफी काम करना पड़ता है। 

खर्च 5 से 10 लाख रुपये तक का इम्प्लांट आता है और एक-डेढ़ लाख रुपये ऑपरेशन का खर्च आता है। सरकारी अस्पताल में ऑपरेशन फ्री होता है। लेकिन इम्प्लांट का पैसा देना होता है। 

कौन-सा बेहतर 
मेडल, कॉकलियर, एडवांस बायोनिक्स आदि। 

बाहा (BAHA) 
अगर मिडल इयर में पस या कोई और प्रॉब्लम होती है, जिसकी वजह से आउटर इयर में हियरिंग एड नहीं लगा पा रहे हैं तो बोन एंकर्ड हियरिंग एड लगाया जाता है। यह सर्जरी के जरिए कान के पीछे वाली हड्डी पर लगाया जाता है। 

क्रॉस (CROSS) 
कॉन्ट्रालेटरल रूटिंग ऑफ साइड सिग्नल उन लोगों में लगाया जाता है, जिन्हें एक कान में बिल्कुल सुनाई नहीं देता, यानी जिनके एक कान की नर्व्स खराब हैं। जिस कान से सुनाई नहीं दे रहा है, उसमें एक बटन इम्प्लांट लगाकर साउंड को दूसरी ओर मोड़ देते हैं। इस तरह वह ठीक कान तक पहुंच जाती है और मरीज के सुनने की क्षमता बढ़ जाती है। 
खर्च : 3 लाख रुपये। सरकारी अस्पतालों में ऑपरेशन मुफ्त होता है। सिर्फ एड का पैसा देना होता है।

एबीआई (ABI) 
ऑडिटरी ब्रेनस्टेम इम्प्लांट उन मामलों में लगाया जाता है, जिनके कान में नहीं, कान से दिमाग तक मेसेज पहुंचानेवाली नसों में खराबी होती है। यह भी महंगा इलाज है। 

मशीन लगाने या इम्प्लांट के बाद 
 एड लगाने के बाद ऑडिटरी ट्रेनिंग बहुत जरूरी है। अगर बच्चे को बाद में सुनाई देना बंद हुआ है तो उसे कम ऑडिटरी ट्रेनिंग की जरूरत होती है। इसके बाद स्पीच एंड लैंग्वेज थेरपी देते हैं। इसमें हरेक शब्द को बताते हैं कि इसे कैसे बोला जाता है। अगर मशीन का इस्तेमाल या कॉकलियर इम्प्लांट तीन साल से पहले कर दिया जाता है तो बच्चा करीब-करीब नॉर्मल बच्चों की तरह की बोल और सुन पाता है। 

एएसी (ACC) 
ऑल्टरनेटिव ऑग्मेंटेटिव कम्युनिकेशन डिवाइस आमतौर पर उन मामलों में इस्तेमाल किए जाते हैं, जिनमें बच्चा सुनने और बोलने के साथ-साथ चलने-फिरने में भी अक्षम हो या फिर पूरी कोशिश के बाद भी बच्चा बोलना न सीख पाया हो। ये मोटे तौर पर तीन तरह के होते हैं : 

इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस 
इस डिवाइस में हर काम के लिए अलग-अलग बटन बने होते हैं। जो बटन दबाते हैं, उसकी आवाज आ जाती है। मसलन, खाना, पानी आदि। इस आवाज को सुनकर घर के लोग मदद करने आ आते हैं। यह डिवाइस काफी महंगा होता है और हर जगह मिलता नहीं है। इसी कैटिगरी में आवाज नामक डिवाइस भी है, जिसे वीलचेयर में लगा दिया जाता है। इसे गोद में भी रखा जा सकता है और डेस्क पर भी। यह हाथ, पैर और सिर के हर छोटे मूवमेंट को पकड़ता है और उसे वाक्य में तब्दील कर देता है। इसकी कीमत करीब 30 हजार रुपये है। 

कंप्यूटर बेस्ड डेडिकेटेड सॉफ्टवेयर 
कंप्यूटर की टेक्नॉलजी को यूज करते हुए कुछ सॉफ्टवेयर डिजाइन किए गए हैं। ये काफी एडवांस होते हैं। छोटे-से डिवाइस पर छोटी-सी स्क्रीन होती है। उसी पर अलग-अलग कामों के ऑप्शन होते हैं। 

ध्यान दें 
- अगर महंगा होने की वजह से इम्प्लांट नहीं करवा सकते तो हियरिंग एड जरूर लगवाएं। 
- डम न कहकर म्यूट या हियरिंग इम्पेयर्ड कहना चाहिए ऐसे लोगों को। 

कर सकते हैं शिकायत 
इन स्पेशल बच्चों को स्पेशल स्कूलों के साथ-साथ सामान्य स्कूलों में भी दाखिले का हक है। कोई भी स्कूल इससे इनकार नहीं कर सकता। अगर कोई स्पेशल बच्चा अपनी तरह के दूसरों बच्चों से बेहतर कर रहा है तो कोशिश होनी चाहिए कि वह सामान्य स्कूल में दूसरे बच्चों के साथ पढ़ सके। इससे उसे सामान्य बच्चों के साथ घुलने-मिलने में मदद मिलती है। 

अगर कोई स्कूल दाखिला देने से इनकार करता है तो मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस ऐंड एम्पावरमेंट के तहत नैशनल ट्रस्ट ऑफ इंडिया और चीफ कमिश्नर फॉर पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज को शिकायत कर सकते हैं। 

पता है 
नैशनल ट्रस्ट ऑफ इंडिया 16- बी, बड़ा बाजार रोड, ओल्ड राजेंद नगर, नई दिल्ली -100060 फोन : 4318-7878, फैक्स : 4318-7878 वेबसाइट : www.thenationaltrust.co.in 

चीफ कमिश्नर फॉर पर्सन्स विद ऑफ डिसेबिलिटीज 6, भगवान दास रोड, नई दिल्ली - 110001 फोन : 23386154/23386054, फैक्स : 23386054 वेबसाइट : www.ccdisabilities.nic.in 

दृष्टिहीनों के लिए 
दृष्टिहीनता के लेवल के मुताबिक एड इस्तेमाल किए जाते हैं। मसलन अगर पूरी तरह दृष्टिदोष नहीं है यानी थोड़ा-बहुत दिखाई देता है तो एलवीए (लो विजन एड) इस्तेमाल किए जाते हैं। खास एलवीए हैं : 

हैंडहेल्ड मैग्निफायर 
 इसे हाथ में पकड़कर पढ़ने आदि के लिए इस्तेमाल करते हैं। लो-विजन एक्सपर्ट हेमंत पांडे के मुताबिक यह छोटे अक्षरों को बड़ा कर दिखाता है। अक्षरों के बड़ा होने से उनके बीच फासला आ जाता है और एक-एक अक्षर को जोड़कर पढ़ पाना मुमकिन होता है। कीमत : 70 से 2500 रुपये तक 

ऑप्टिकल टेलिस्कोप 
 यह चश्मे के ऊपर लगाया जाता है। दूर की चीजों को पास दिखाता है। उनकी शार्पनेस भी बढ़ा देता है। ड्राइविंग आदि में खासतौर पर यूजफुल होता है। कीमत : 5000 रुपये तक 

क्लोज्ड सर्किट टीवी 
 इसमें टीवी और कैमरा होता है। कैमरे में हाइ-पावर के लेंस लगे होते हैं, जिनके जरिए किताब आदि पढ़ सकते हैं। प्रिंट 50 गुना तक बढ़ जाता है, जो स्क्रीन पर नजर आता है। कीमत : 30,000 रुपये तक 

जूमर/ मैग्निफायर 
कंप्यूटर में जूमर या मैग्निफायर की मदद से किसी पिक्चर या टेक्स्ट का साइज बढ़ाया जा सकता है। ये पेड और फ्री, दोनों होते हैं। इंटरनेट पर बहुत सारे फ्री मिलते हैं। 

ऐसे ही कुछ जूमर हैं : 
वर्चुअल मैग्निफाइंग ग्लास 3.5 : डाउनलोड करें, http://magnifier.sourceforge.net/ 

मैजिकल ग्लास : डाउनलोड करें, http://freestone-group.com/magg.htm 

मैग्निफायर 2.2 : डाउनलोड करें, http://www.iconico.com/magnifier/ 

जूम प्लस : डाउनलोड करें, http://gipsysoft.com/zoomplus

सुपर मैग्निफाई 1.2 : डाउनलोड करें, http://www.theabsolute.net

मेजर : डाउनलोड करें, http://www.theabsolute.net/ 

प्रोजेक्टर मैग्नीफायर 
यह मैग्नीफायर प्रोजेक्टर या लैपटॉप पर लगाए जानेवाले स्लाइड का साइज बड़ा कर देता है। इसे ज्यादातर ब्लाइंड्स के स्कूलों आदि में यूज करते हैं। वैसे घरों में भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। लैपटॉप के सामने घर की दीवार पर स्क्रीन लगाकर इसकी मदद से पढ़ सकते हैं। 

जिनके पास बिल्कुल रोशनी नहीं 
जो लोग बिल्कुल नहीं देख पाते, उन्हें भी निराश नहीं होना चाहिए। आजकल उनके लिए कई तरह की तकनीकें मौजूद हैं। 

रिफ्रेशेबल ब्रेल 
यह इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस है, जिसे कंप्यूटर पर चलाए जाने से उस लाइन में लिखे शब्द उभर जाते हैं। कीमत : 80 हजार से 2 लाख रुपये तक। 

स्क्रीन रीडर 
स्क्रीन रीडर को हाल-फिलहाल की सबसे बेहतर तकनीक माना जा सकता है। जो लोग बिल्कुल नहीं देख पाते या जिनको थोड़ा-बहुत दिखता है, दोनों ही स्क्रीन रीडर की मदद से कंप्यूटर पर पढ़ और लिख सकते हैं। जब भी स्क्रीन के किसी हिस्से पर कर्सर जाता है तो वहां लिखे शब्द को कंप्यूटर बोल देता है। स्क्रीन रीडर की मदद से ईमेल भेजने से लेकर सॉफ्टवेयर डाउनलोड करने और प्रोग्रामिंग करने तक के काम किया जा सकता है। हालांकि यह फोटोशॉप, कोरल जैसे ग्राफिक सॉफ्टवेयर्स पर काम नहीं करता। कुछ खास स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर हैं : 

JAWS (Job Access With Speech) : freedom scientific द्वारा डिवेलप यह सॉफ्टवेयर हिंदी और इंग्लिश दोनों को सपोर्ट करता है। रीयल स्पीक सोलो (जिसे बोलचाल की भाषा में लेखा कहा जाता है) के जरिए टेक्स्ट को हिंदी में भी सुना जा सकता है। यह JAWS के साथ ही काम करता है। कीमत : करीब 20,000 रुपये 

 Super Nova : dolphin.com द्वारा तैयार यह स्क्रीन रीडर हिंदी और इंग्लिश, दोनों को सपोर्ट करता है। कीमत : 19,000 रुपये 

NVDA : यह फ्री सॉफ्टवेयर अच्छा है। यह विंडोा पर काम करता है लेकिन पावरपॉइंट, जावा जैसे प्रोग्राम्स को सपोर्ट नहीं करता। डाउनलोड करें : www.nvda-project.org

ORCA : यह फ्रीवेयर लाइनेक्स में इनबिल्ट होता है। डाउनलोड करें : projects.gnome.org/orca/ 

Thunder यह फ्रीवेयर विंडोज 7, एक्सपी और विस्टा पर काम करता है। डाउनलोड करें : http://www.screenreader.net/ 

Windows narrator विंडोज में इनबिल्ट होता है। ChromeVox : गूगल द्वारा तैयार यह सॉफ्टवेयर विंडोज, लाइनेक्स, मैक, क्रोम पर काम करता है। VoiceOver : एपल प्रॉडक्ट्स के साथ फ्री मिलता है। आई फोन, आई पैड, आई पॉड आदि में काम करता है। 

सूटेबल मोबाइल 
आजकल मोबाइलों में दृष्टिहीनों की मदद के लिए काफी सारे फीचर आ गए हैं। इनमें स्क्रीन रीडर, बुक रीडर, नैविगेशन (रास्ता गाइड करना) आदि फीचर होते हैं, जिनकी मदद से दृष्टि से वंचित लोग भी आम लोगों की तरह मोबाइल के सारे फंक्शन (कॉल, एसएमएस, ईमेल, नेट सर्फिंग आदि ) इस्तेमाल कर पाते हैं। सूटेबल मोबाइल तकनीक को ऑपरेटिंग सिस्टम के आधार पर तीन कैटिगरी में बांटा जा सकता है : 

 - आईओएस : एपल के आई-फोन्स में यह फीचर इनबिल्ट होता है। हालांकि ये फोन काफी महंगे होते हैं। 
 - सिंबियन : हमारे देश में सबसे ज्यादा यही फोन यूज होते हैं। नोकिया के एन और ई सीरीज के फोंस पर मोबाइस स्क्रीन रीडर काम करते हैं। विदेशों में यह तकनीक काफी महंगी है लेकिन हमारे यहां (सक्षम के पास) 1800 रुपये में मिल जाती है। 
 - एंड्रॉयड : मोटोरोला, सैमसंग, एचटीसी आदि के फोंस में काम करता है। एंड्रॉयड माकेर्ट से फ्री में डाउनलोड कर सकते हैं। 

यह है खास मोबाइल 
बाप्सी (बाइडायरेक्शनल एक्सेस प्रमोशन सोसायटी) के प्रेजिडेंट अरुण मेहता और सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर अमोल आनंद के मुताबिक, जो न देख सकते हैं, न सुन सकते हैं, न बोल सकते हैं, उनके लिए खास पॉकेट एसएमएस मोबाइल ऐप्लिकेशन तैयार की गई है। इसमें एसएमएस सीधा वाइब्रेट हो जाएगा, जिससे मालूम हो जाएगा कि एसएमएस आया है। स्क्रीन पर बटन मौजूद होगा। उसे दबाने से एसएमएस वाइब्रेशन के जरिए कम्युनिकेट हो जाएगा। इसके लिए मोर्स कोड तकनीक इस्तेमाल की गई है। मोर्स कोड में हर अक्षर का एक कोड होता है। मसलन, अगर डॉट पर मोबाइल एक सेकंड के लिए वाइब्रेट होगा तो डैश पर तीन सेकंड के लिए। फिलहाल यह तकनीक इंग्लिश में ही काम करती है। अगर सेंड करना है तो बटन लंबे समय के लिए दबाएंगे। स्क्रीन पर उंगली से जो कुछ लिखेंगे, वह स्क्रीन पर लिख जाएगा। फिर जिसने एसएमएस भेजा है, उसे जवाब देना है तो TX लिखेंगे। अगर किसी और को भेजना है तो NX लिखेंगे। NX लिखने के बाद स्क्रीन पर नंबर लिखना होगा। 

नोट : यह फ्रीफेयर एंड्रॉयड मोबाइल पर ही चलेगा। इसे वेबसाइट www.bapsi.org से डाउनलोड कर सकते हैं।  

ये भी काम के ब्रेल स्लेट्स : 
सक्षम की डायरेक्टर रूमी सेठ के मुताबिक स्टाइलस (पेंसिल जैसा) की मदद से पेपर पर डॉट्स बनाए जाते हैं, जिनकी मदद से बच्चे शुरू में पढ़ना सीखते हैं। कीमत : 100 रुपये तक 

टेलर फ्रेम : 
इससे मैथ्स सिखाया जाता है। हिबिस्कस भी इस काम के लिए इस्तेमाल करते हैं। डिजिटल बुक्स : डिजिटल बुक्स (डेजी डिजिटल बुक्स) टॉकिंग और ई-टेक्स्ट बुक, दोनों फॉरमैट में मिलती हैं। सीडी के रूप में बाजार में तमाम सब्जेक्ट्स पर टॉकिंग बुक्स उपलब्ध हैं। इनमें किताबों का मैटर एमपी-3 फॉरमैट में होता है। इन्हें कहीं भी और कभी भी पढ़ा जा सकता है। बस जरूरत कंप्यूटर या लैपटॉप की होती है, जिस पर फ्री में www.daisy.org सॉफ्टवेयर डाउनलोड कर सकते हैं। ऑनलाइन ब्रेल लाइब्रेरी www.oblindia.org से कैटलॉग लेकर ई-टेक्स्ट लाइब्रेरी www.bookshare.org से बुक डाउनलोड कर सकते हैं। इसके बाद ब्रेल या स्क्रीन रीडिंग सॉफ्टवेयर की मदद से पढ़ सकते हैं या ब्रेल में प्रिंटआउट ले सकते हैं। 

नेटबुक : 
इस स्पेशल नेटबुक में एक बटन होता है, जिसकी मदद से किताब के किसी भी सेक्शन पर जा सकते हैं। इसके लिए खास टूल मौजूद है। इसे www.samarth.saksham.org से फ्री डाउनलोड कर सकते हैं। इसकी मद से कंप्यूटर पर किताब पढ़ने, लिखने, डिक्शनरी देखने, अखबार पढ़ने जैसे सारे काम कर सकते हैं। ब्रेल नहीं है तो ऑडियो के जरिए पढ़ सकते हैं। यह सुविधा इंग्लिश के अलावा हिंदी, कन्नड़ और तमिल में भी उपलब्ध है।  

चेक प्रिंटिंग टैम्पलेट्स : 
इसकी मदद से किसी भी आम प्रिंटर से दृष्टिहीन खुद अपना चेक लिख सकते हैं। इसे www.prashant.myehome.in से फ्री डाउनलोड कर सकते हैं। 

करंसी आइडेंटिफायर : 
कुल 30 रुपये में आनेवाले इस आइडेंटिफायर की मदद से छूकर पता लगाया जा सकता है कि नोट कितने रुपये का है। 

टॉकिंग कैलकुलेटर : 
बोलकर जोड़, गुणा आदि बताता है। कीमत : 350 रुपये 

टॉकिंग रिस्ट वॉच : 
यह कलाई घड़ी बोलकर टाइम की जानकारी देती है। कीमत : 300 रुपये 

टेबल क्लॉक : 
बोलकर टाइम बताती है यह टेबल क्लॉक। कीमत : 500 रुपये 

थर्मोमीटर : 
अगर टेंपरेचर लेना होता हो तो यह बोलकर आपको बता देता है कि आपको कितना बुखार है। कीमत : 250 रुपये 

ब्रेल बॉल और कार्ड्स : 
ब्रेल प्लेयिंग कार्ड्स और क्रिकेट बॉल्स एंटरटेनमेंट के अच्छे साधन हैं। कार्ड्स ब्रेल लिपि में होते हैं तो बॉल से आवाज आती है। कीमत : 20 रुपये 

नोट : ये आइटम ब्लाइंड स्कूल आदि में मिल जाते हैं। नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ विजुअली हैंडिकैप्ड, चेन्नै से मंगा सकते हैं। फोन : 044-26274476, 26272505 या e-mail: nivhrc@mail.com पर मेल कर सकते हैं। पूरी जानकारी के लिए देखें :www.nivh.org.in इसके अलावा, दिल्ली एनसीआर में एनजीओ सक्षम भी ये आइटम मुहैया कराता है। यहां दिए गए ज्यादातर आइट्म्स के रेट सक्षम ने मुहैया कराए हैं। फोन : 011-26162707, वेबसाइट : www.saksham.org 

यहां से मिल सकती है मदद

- अली यावर जंग नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ द हियरिंग हैंडिकैप्ड, दिल्ली (AYJNIHH) फोन : 011-2982-5094/95, 
यह हेल्पलाइन आमतौर पर काम के घंटों में काम करती है। वेबसाइट : ayjnihh.nic.in

ऑल इंडिया कन्फेडरेशन ऑफ द ब्लाइंड्स, दिल्ली (AICB) फोन : 011-2705-4082, 98106-84208 वेबसाइट : www.aicb.in 

नैशनल असोसिएशन फॉर ब्लाइंड्स, दिल्ली फोन : 011-2617-5886, 2610-2944 वेबसाइट : www.nabdelhi.org

जानें कैसे बोल पाते हैं स्टीफन हॉकिंग 
 नामी ब्रिटिश साइंटिस्ट स्टीवन हॉकिंग की जिंदगी उन तमाम लोगों के लिए एक मिसाल है, जो बोल नहीं सकते। हॉकिंग एक न्यूरोलॉजिकल डिस्ऑर्डर का शिकार हैं, जिसमें इंसान बोलने, चलने, हिलने-डुलने का मोहताज हो जाता है। हॉकिंग एक स्पीच जेनरेटिंग डिवाइस की मदद से अपनी बात रखते हैं। यह डिवाइस उनके छोटे-छोटे लिप मूवमेंट और शरीर में होनेवाली हरकतों को कैच कर वॉयस सिंथेसाइजर की मदद से बोलता है। हॉकिंग किस तरह तकनीक की मदद से लगातार दूसरों के लिए प्रेरणा साबित हो रहे हैं, जानने के लिए देखे ऑग्युमेंटेटिव रिएलिटी। 

एक्सपर्ट्स पैनल - डॉ. धीरेंद्र सिंह, कंसल्टेंट (ईएनटी), रॉकलैंड हॉस्पिटल - डॉ. अतुल मित्तल, सीनियर कंसल्टेंट (ईएनटी), मैक्स हॉस्पिटल - डॉ. संजय तेवतिया, सीनियर आई कंसल्टेंट - दीपेंद्र मनोचा, फाउंडर/डायरेक्टर, सक्षम - हिमांशु सिंह, ऑडियॉलजिस्ट ऐंड स्पीच थेरपिस्ट - अरुण शर्मा, कंप्यूटर ट्रेनर(नवभारत टाइम्स ,दिc,19.२.१२)

आगे चलें...