बृहस्पतिवार, 23 मई 2013

लूः इस आग के दरिया से बचके

क्या आप एक्सट्रीम गर्मियों के लिए तैयार हैं! कूलर-एसी ऑन हैं, रेफ्रिजरेटर विभिन्न फ्लैवर के शर्बतों से अटा पड़ा है या फिर सप्ताहभर के लिए हिल-स्टेशन जा रहे हैं। इन सबके बावजूद भी गर्मी का खतरा लगातार आपका पीछा कर रहा है। इंडियन मेटेरोलॉजिकल डिपार्टमेंट ने गत वर्ष रिकॉर्ड हीट दर्ज की और इसके अनुमान कहते हैं कि आगामी सालों में गर्मी के कारण "मेडिकल कैजुअलिटीज" बढ़ेंगी। यानी गर्मी से लड़ने के लिए अभी और तैयारियां बाकी हैं। 

बीते चार दशकों में ग्लोबल वॉर्मिंग ने अंतरराष्ट्रीय जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इसके कारण न सिर्फ पर्यावरण, बल्कि आम आदमी भी व्यापक स्तर पर प्रभावित हुआ है। ग्रीष्म लहर के कारण साधारण तकलीफ तो होती ही है, साथ ही यह जानलेवा भी हो सकती है। मध्यभारत भी इसका चपेट से बरी नहीं। हीट वेव्स कंडीशन (एचडब्ल्यूसी) यानी गर्मी के औसत से ज्यादा होने के कारण कई कैजुअलिटीज सामने आ रही हैं, जिसके प्रति कोई भी संवेदनशील हो सकता है। आम भाषा में यह स्थिति हीटस्ट्रोक के नाम से जानी जाती है जिनका शुरूआती कुछ घंटों के दौरान इलाज न होना घातक हो सकता है। 

क्या है हीटस्ट्रोक 
यह एक मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें शरीर का तापमान आकस्मिक रूप से बढ़ जाता है। मेटाबॉलिज्म की प्रक्रिया के दौरान शरीर में पैदा हुई गर्मी पसीने के जरिए बाहर निकलती है। हालांकि बहुत तेज गर्मी या धूप में लगातार काम करने पर शरीर गर्मी को पूरी तरह से बाहर नहीं निकाल पाता और तापमान बढ़ जाता है। डीहाइड्रेशन यानी पानी की कमी होने पर भी शरीर से पसीना ठीक तरह से नहीं निकल पाता, जिसकी वजह से तापमान लगभग १०४ डिग्री या उससे भी ज्यादा हो जाता है। हीटस्ट्रोक, स्ट्रोक से अलग है, जिसमें मस्तिष्क के किसी हिस्से में ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा नहीं पहुंच पाती। 

रिस्क फैक्टर 
चार साल तक के बच्चे और ६५ वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्ग इससे प्रभावित हो सकते हैं क्योंकि उनका शरीर तापमान से आसानी से सामंजस्य नहीं बिठा पाता। हेल्थ कंडीशन जैसे कार्डियक, लंग और किडनी डिसीज से प्रभावित व्यक्ति हीटस्ट्रोक के प्रति संवेदनशील होते हैं। मोटापा, हाई ब्लडप्रेशर या वजन कम होना भी इसकी आशंका बढ़ाता है। ऐसे लोग जो डाइट पिल्स या सेडेटिव लेते हैं, वे भी आसानी से हीटस्ट्रोक का शिकार हो जाते हैं। एल्कोहल भी इसका बड़ा कारण है। एथलीट, कृषक और ऐसे लोग जो ज्यादातर वक्त धूप में रहते हैं, उनके इसकी चपेट में आने की आशंका सामान्य लोगों से दोगुनी होती है। 

इसके लक्षण 
हीटस्ट्रोक का सबसे निश्चित लक्षण है शरीर के तापमान का १०५ डिग्री फैरनहाइट से ऊपर चले जाना। इससे व्यक्ति मूर्छित हो सकता है। इसके अलावा सिर में धमक के साथ दर्द, पसीना आना कम या बंद होना, त्वचा का गर्म और लाल हो जाना, मांसपेशियों में तनाव और दर्द, उल्टियां और लगातार चक्कर आना, दिल की धड़कन बढ़ जाना जैसे लक्षण दिखाई पड़ते हैं। इससे प्रभावित व्यक्ति में संभ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। कई लोगों को बोलने में भी परेशानी होने लगती है। चलने या खड़े होने में कठिनाई होती है और मरीज लुढ़क सकता है या कोमा में भी जा सकता है।

दें फर्स्ट-एड 
अगर आसपास का कोई व्यक्ति इस तरह के संकेत दे रहा है तो सबसे पहले इमरजेंसी मेडिकल सुविधा के लिए निकट के अस्पताल में फोन करें। इस दौरान मरीज को फर्स्ट-एड देना उसकी जान बचाने में बहुत महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। उसे ठंडे और छायादार वातावरण में ले जाएं। शरीर से अतिरिक्त कपड़े हटा दें और तापमान कर करने का प्रयास करें। कांख, गले, पीठ और शरीर के अन्य हिस्सों पर बर्फ मलें और लगातार पोंछते रहें। मरीज को आइस-बाथ भी दिया जा सकता है।

बरतें सावधानी 
गर्मी की मार से बचने का सबसे पहला और आसान तरीका है धूप में निकलने से बचना। अगर बाहर निकलता जरूरी हो जाए तो हल्के, हल्के रंग के और ढीले-ढाले कपड़े पहनें और सिर को धूप से बचाएं। त्वचा के बचाव के लिए ३० एसपीएफ से ज्यादा वाली सन्सक्रीन चेहरे, गरदन और हाथों पर लगाएं। ज्यादा से ज्यादा लिक्विड डाइट लें, साथ ही शरीर से नमक का स्तर भी न घटने दें। व्यायाम करते हुए या घर से बाहर काम करते वक्त अतिरिक्त सर्तकता बरतनी चाहिए, जैसे काम शुरू करने से पहले पर्याप्त पानी लें और हर दो घंटे पर पानी पीते रहें। शारीरिक मेहनत से पहले और इसके तुरंत बाद वजन लेना बता सकता है कि शरीर से पसीने के रूप में कितना पानी बाहर निकला है। भरपाई के लिए प्यास लगने का इंतजार न करें। आउटडोर एक्टिविटी रीशेड्‌यूल करने का प्रयास करें अगर वो दिन के गर्म समय में हों और सुबह या शाम का वक्त भी लिया जा सकता है। 

एक्सपर्ट ओपिनियन 
हीटस्ट्रोक में शरीर का तापमान बहुत बढ़ जाता है, त्वचा रेड-हॉट हो जाती है और पल्स तेज हो जाती है। ऐसे में शरीर का तापमान नियंत्रण में आना जरूरी है वरना परिणाम घातक हो सकता है। ऐसी स्थिति में चिकित्सक से संपर्क करें और इससे पहले मरीज को लक्षणों के आधार पर फर्स्ट-एड दें जैसे उसे ठंडे स्थान पर ले जाएं और लगातार पसीना पोंछते जाएं ताकि शरीर के बंद रोमछिद्र खुल सकें और तापमान घटे। हीटस्ट्रोक के अलावा,गर्मी के मौसम में मच्छरों के कारण होने वाली बीमारियां जैसे-मलेरिया,चिकनगुनिया और डेंगू की भी आशंका बढ़ जाती है। खानपान से संबंधित रोग भी इस समय आम हैं,इसलिए स्वच्छ पेय तथा ताज़ा भोजन ही लें। 

इन्हें भी जानें 
हीटस्ट्रोक के अलावा गर्मी से अन्य कई तरह की समस्याएं भी होती हैं, मसलन हीट एग्जॉशन और हीट क्रैम्प्स। 

हीट एग्जॉशन में 
-ठंडी, नम, निस्तेज या फ्लश करती त्वचा 
-थकान व बहुत अधिक पसीना आना 
-सिरदर्द और मांसपेशियों में दर्द 
- उबकाई आना या उल्टियां होना 
-शरीर का तापमान सामान्य होना या हल्का सा बढ़ना

क्या करें 
-व्यक्ति को ठंडे स्थान पर ले जाएं। 
-प्रभावित स्थान की मसल्स को हल्के से खींचें। 
-हर पंद्रह मिनट में पानी पिलाएं। 
-कैफीनयुक्त पेय बिल्कुल न दें 

हीट क्रैंप्स में 
-पैरों के अलावा शरीर के अन्य भागों में भी मांसपेशियों में कड़ापन 
-थकान होना और चलने की इच्छा न होना 

क्या करें 
-व्यक्ति को तुरंत ठंडे, छायादार स्थान पर ले जाएं। 
-हल्के, नर्म कपड़े पहनाएं। 
-हर पंद्रह मिनट में ठंडा पानी पिलाएं। 

जांच और निदान 
हालांकि चिकित्सकों को मरीज की अवस्था देखकर ही अंदाजा हो जाता है कि वो हीटस्ट्रोक का शिकार है या नहीं लेकिन इसे सुनिश्चित करने के लिए कई जांचें भी की जाती हैं। ब्लड सोडियम और पोटैशियम के स्तर में कमी को जांचने के लिए ब्लड टेस्ट किया जाता है क्योंकि हीटस्ट्रोक के दौरान इनकी कमी सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर असर डालती है। यूरिन टेस्ट किया जाता है क्योंकि मूत्र का गहरा रंग इस ओर इशारा करता है कि गर्मी की वजह से किडनी पर कितना असर पड़ा है। मसल फंक्शन टेस्ट की मदद से देखा जाता है कि मांसपेशियों के ऊतकों की खास हानि तो नहीं हुई या वो किस स्तर तक हुई है(छिंदवाड़ा के डॉ. कौशल किशोर श्रीवास्तव का यह आलेख नई दुनिया के सेहत परिशिष्ट,मई प्रथमांक 2013 में प्रकाशित है)।

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शुक्रवार, 10 मई 2013

आंतों का दुश्मन है इरिटेबल बाउल सिंड्रोम

इरिटेबल बाउल सिंड्रोम यानी आईबीएस आंतों की एक ऐसी बीमारी है जो मरीज़ की दिनचर्या में बाधा डालने लगती है। यह आंतों को डैमेज तो नहीं करती,मगर इसके लक्षण यह ज़रूर बताते हैं कि पेट के अंदर कुछ गड़बड़ चल रही है जिसे जल्द ही ठीक करने की ज़रूरत है। 

आईबीएस यानी आंतों में होने वाली अकड़न जिससे पेट में दर्द बना रहता है। इसे स्पैस्टिक कोलन, इरिटेबल कोलन, म्यूकस कोइलटिस जैसे नामों से भी जाना जाता है। इससे न केवल व्यक्ति को शारीरिक तकलीफ महसूस होती है, बल्कि उसकी पूरी जीवनशैली प्रभावित हो जाती है। यह आंतों को खराब तो नहीं करता लेकिन उसके संकेत देने लगता है। पुरुषों की तुलना में महिलाएं इस बीमारी से अधिक प्रभावित होती हैं। वैसे यह आंत या पेट के कैंसर के खतरे को नहीं बढ़ाता है लेकिन जीवन को अस्त-व्यस्त कर देता है। 

क्या हैं लक्षण 
-पेट में मरोड़ उठना 

-पेट में दर्द और सूजन 

-लगातार कब्जियत का बना रहना 

-बार-बार डायरिया जैसे लक्षण 

इसके कारण 
आईबीएस के सही कारणों का अब तक पता नहीं चला है। डॉक्टर्स मानते हैं कि संवेदनशील कोलन या कमजोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता के कारण यह समस्या पैदा हो सकती है। कई बार पेट में बैक्टीरियल इंफेक्शन के कारण भी आईबीएस हो सकता है। इसके कुछ खास कारण भी हैं जो अलग-अलग रोगियों में भिन्न हो सकते हैं- 
-कोलन का कमजोर मूवमेंट, जिससे मरोड़ के साथ काफी दर्द होता है। 

-कोलन में सेरोटोनिन की अनियंत्रित मात्रा, जिससे आंतों का मूवमेंट प्रभावित होता हैं।
 
-माइल्ड सेलिएक डिसीज के आंतों को डैमेज करने के कारण आईबीएस के लक्षण उभरने लगते हैं। 

संभव है इलाज 
आईबीएस का ऐसा कोई निश्चित इलाज नहीं है, लेकिन इसके लक्षणों से राहत जरूर मिलती है। इसके लिए कोई दवा आरंभ करने से पहले जीवनशैली में बदलाव की जरूरत होती है। इससे राहत पाने के लिए कुछ खास चीजों का ध्यान रखना भी जरूरी होता है। -रोजाना व्यायाम करें। -तनाव से बचें। -कैफीनयुक्त चीजें कम से कम लें। -खाना कम मात्रा में कई बार लें। -तले-भुने और स्पाइसी खाने से दूर रहें। -प्रोबायोटिक प्रोडक्ट्‌स लें जैसे दही आदि। 

कैसे होती है पहचान 
मरीज के लक्षणों के आधार पर आईबीएस का पता लगाना आसान होता है। कुछ खास प्रकार की डाइट का सुझाव दिया जाता है या फिर खाने में से कुछ चीजें कम कर दी जाती हैं, जिससे यह पता लगाया जा सके कि कहीं ये लक्षण किसी फूड एलर्जी के कारण तो नहीं है। स्टूल सैंपल के आधार पर इंफेक्शन का पता लगाया जाता है और ब्लड टेस्ट किया जा सकता है, जिससे यह पता लगाया जाता है कि रोगी एनिमिया से तो पीड़ित नहीं है। इसके आधार पर सेलिएक डिसीज यानी ग्लूटेन इनटोलरेंस का पता भी लगाया जाता है। इसकी जांच के लिए कोलनस्कॉपी की जाती है। इस टेस्ट के जरिए डॉक्टर कोलन की जांच करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर टिशू सैंपल लिए जाते हैं। इससे इस बात का पता लगाना आसान हो जाता है कि कहीं ये सारे लक्षण किसी और बीमारी के कारण तो नहीं है, जैसे कोलाइटिस या कोई अन्य क्रॉनिक डिसीज। मरीज की उम्र ५० वर्ष से अधिक है तो भी इस जांच की आवश्यकता पड़ती है।

इसके साथ जीवन 
आईबीएस के साथ जीना आसान तो नहीं होता क्योंकि इससे हमारी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होती है। लेकिन कुछ बातों को अमल में लाने से इसके साथ जीना भी आसान हो जाता है। वैसे दवाओं और सही तरीके से परहेज करने पर यह ठीक भी हो सकता है। टहलने और योग या ध्यान करने से काफी राहत मिलती है। पूरी नींद लेना इससे राहत के लिए काफी जरूरी है। एक्यूपंचर आदि भी लिया जा सकता है। 

विशेषज्ञ कहते हैं 
आमतौर पर आईबीएस तीन प्रकार का होता है, जिसमें रोगी को कब्जियत, डायरिया और दर्द की शिकायत रहती है। अब एक चौथे प्रकार के आईबीएस के लक्षण भी दिख रहे हैं, जिसमें इन तीनों के मिति लक्षण होते हैं। तलाभुने खाने, दूध और उससे बनी सामग्री से परहेज करें। तनाव से बचें(डॉ देवेंद्र सिंह, गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट, बिलासपुर का यह आलेख नई दुनिया के सेहत परिशिष्ट,मई प्रथमांक,2013 में प्रकाशित है)।

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बृहस्पतिवार, 11 अप्रैल 2013

बैक-पेनःअनदेखी होगी घातक

बदलती जीवन शैली और भागमभाग भरी जिंदगी के कारण आज हर दसवां व्यक्ति बैक पेन से परेशान है। कभी बुढ़ापे में होने वाला यह पीठ या कमर दर्द आज युवाओं और अधेड़ों से लेकर बच्चों में भी दिखाई पड़ने लगा है। यदि कमर दर्द के लक्षणों की लंबी समय तक अनदेखी की जाए तो यह गंभीर बीमारी का रूप भी ले सकता है क्योंकि रीढ़ की हड्‌डी और कमर दोनों मिलकर ही शरीर को आधारभूत संरचना प्रदान करते हैं और दैनिक कार्य करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हमारे शरीर का पूरा भार कमर पर होता है। यह भार जब असंतुलित ढंग से मसल्स, कार्टिलेज, बोन्स या स्पाइनल कार्ड पर पड़ता है तो दर्द की शुरुआत होती है।

क्या हैं कारण 
बैक पेन के कई कारण हो सकते हैं। वजन का बढ़ना कुछ सबसे सामान्य कारणों में से एक है। इसके अलावा ऑर्थराइटिस व प्रोलेप्स डिस्क (स्लिप डिस्क), उठने-बैठने और सोने का गलत ढंग, कमर की मांसपेशियों में अत्यधिक खिंचाव और स्पॉन्डीलाइटिस कुछ अन्य कारण हैं, जो बैक पेन का कारण बनते हैं। एक ही स्थिति में लगातार खड़े रहना भी पीठ में दर्द पैदा करता है। स्त्रियों में अनियमित मासिक धर्म की वजह से भी बैक पेन होता है या फिर गर्भवती होने के दौरान ऐसा होना आम है। नौकरी या पढ़ाई से जुड़ा मानसिक तनाव या अवसाद भी बैक पेन के लिए जिम्मेदार है। 

लक्षणों पर करें गौर
-किसी नर्व के दब जाने से पैरों में अकड़न।
-जलन, सुन्नपन, झुनझुनी होना।
-कमर के पिछले हिस्से में सामान्य दर्द की शुरुआत।
-दर्द का फैलाव पैर की अंगुलियों तक होना। 
-ज्यादा से ज्यादा आराम करने पर ही आराम महसूस होना। 

ये होते हैं ज़्यादा प्रभावित 
बैकपेन लोगों को विभिन्न कारणों से और अलग-अलग तरह से प्रभावित करता है। ऐसे लोग जिनका वजन लगातार बढ़ रहा हो, वे इसके लिए अधिक संवेदनशील होते हैं। कंप्यूटर पर लगातार काम करने वाले लोग, गलत ढंग से कसरत करना दर्द की शुरूआत करता या उसे बढ़ाता है। जिन्हें लगातार एसिडिटी की शिकायत हो या गरिष्ठ भोजन करने वाले भी इसके लिए वल्नरेबल होते हैं। ज्यादा कोमल गद्दों पर सोना भी दर्द दे सकता है। 

रोकथाम के उपाय
-वजन पर नियंत्रण रखना जरूरी क्योंकि वजन बढ़ने के साथ कमर दर्द की शिकायत भी बढ़ती है।
-एक्सपर्ट की देखरेख में नियमित व्यायाम करें और संतुलित आहार लें।
-खड़े रहते समय दोनों पैरों पर समान वजन डालें, पीठ और पांव सीधे रखें।
-लंबे समय तक बैठते वक्त यदि संभव हो तो फुट स्टूल का इस्तेमाल करें।
-फ्लैट फुटवेयर का इस्तेमाल करें। 
- लंबे समय तक बैठे-बैठे काम करना हो तो बीच-बीच में ब्रेक लें।

उपचार 
दो या दो से अधिक दिनों तक बैक पेन बना रहे तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। दर्दनिवारक दवाइयां राहत तो पहुंचा सकती हैं लेकिन दर्द को जड़ से खत्म नहीं करतीं और इसके साइड-इफैक्ट्‌स भी हैं। फिजियोथैरेपी में दर्द कम करने के लिए गर्म पानी या बर्फ से विशेष सिंकाई की जाती है। इसके तहत अत्याधुनिक मशीनों जैसे लेजर अल्ट्रावॉयलेट आदि भी कमर दर्द में बहुत राहत पहुंचाती है। ट्रैक्शन (कैल्कुलेट खिंचाव) के द्वारा वर्टिब्राओं के बीच के गैप को सामान्य रखने की कोशिश की जाती है। कसरत के जरिए बीमार की रीढ़ की हड्डियों से लगी मांसपेशियों को मजबूती दी जाती है।

क्या करें 
कमर दर्द का सबसे बड़ा कारण पोश्चर का सही नहीं होना है इसलिए इसमें सुधार जरूरी है। जैसे, शरीर के वजन को पंजे के मुकाबले एड़ियों पर ज्यादा डालें। एकदम मुडें या झुकें नहीं। ड्राइविंग करते वक्त कार की सीट को सही तरीके से एडजस्ट करें। दोपहियां वाहन चलाते समय लंबर बेल्ट का इस्तेमाल करें। सोते समय जांघों और घुटनों को थोड़ा सा मोड़ लें। बिस्तर छोड़ते समय एकाएक न उठकर पहले करवट लें और फिर उठें।

क्या न करें 
-औंधे मुंह न सोएं।
-न अचानक उठें, न एकदम से बैठें।
-बॉश बेसिन का उपयोग झुककर न करें।
-भारी सामान को धकलने की कोशिश न करें।
-दो हफ्तों से ज्यादा बेड रेस्ट न करें। अधिक बेड रेस्ट करने से दूसरी बीमारियां पैदा हो सकती हैं(रायपुर के फिजियोथैरेपिस्ट डॉ. गीतेश अमरोहित का यह आलेख नई दुनिया के सेहत परिशिष्ट,मार्च द्वितीयांक,2013 में प्रकाशित है)।

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बुधवार, 6 मार्च 2013

किस ख़ुशबू में क्या

खुशबू में सूदिंग और रिलैक्सिंग प्रॉप्रटीज तो हैं ही, साथ ही चिकित्सकीय गुण भी हैं। विशेषकर पौधों का सत्व, जिसे एसेंशियल ऑइल भी कहा जाता है, ऐसे गुणों से भरपूर है। तो आइए खुशबूओं में नहाकर स्वास्थ्य-लाभ लें। एसेंशियल ऑइल बैक्टीरियल, फंगल और वाइरल संक्रमण दूर करने में काफी मदद करते हैं। वहीं सौंदर्य चिकित्सा में इनका कोई सानी नहीं। १९३७ में तकनीकी रूप से आए इस ऑइल का कंसेप्ट वैसे तो प्राचीनकाल से सुना जा रहा है। इन अतिसांद्र ऑइल के इस्तेमाल का विज्ञान एरोमाथैरेपी कहलाता है और खासा लोकप्रिय भी हो चुका है। 

इस तरह करें उपचार 
बालों की कंडीशनिंग के लिए 
१ टीस्पून जोजोबा ऑइल और एक से तीन बूंदें रोजमैरी ऑइल की लेकर बालों पर लगाएं, तीस मिनट इसे रखें और फिर धो लें। 

दाग-धब्बों के लिए 
३ बूंदें लेवेंडर ऑइल की लेकर इसमें ३ टीस्पून वीटजर्म ऑइल मिलाएं और चेहरे पर लगाएं। 

मुहांसे दूर करने के लिए 
३ बूंदें बर्गामॉट में २ बूंदें कैमोमिल, १ विटामिन ई कैप्सूल और ६ टीस्पून सनफ्लावर ऑइल मिलाकर लगाएं। 

ब्लैकहैड्‌स दूर करने के लिए 
२ बूंद लैवेंडर में २ बूंद जेरानिअम, १ बूंद नींबू, ६ टीस्पून सनफ्लावर ऑइल और १ विटामिन ई कैप्सूल मिलाकर प्रभावित भाग पर लगाएं। 

ऐसे हो इनका उपयोग 
- स्नान के समय पानी में अपने शरीर को सूट करने वाले एसेंशियल ऑइल की कुछ बूंदें मिलाएं। 
- मालिश इनके इस्तेमाल का सबसे प्रचलित तरीका है। किसी लोशन के साथ मिलाकर इससे मालिश मानसिक-शारीरिक दोनों तरह से रिलैक्स करती है। 
- इनहेलेशन में ऑइल की पांच बूंदें गर्म पानी में डालकर तौलिए का इस्तेमाल करते हुए भाप लेते हैं। 
- कंप्रेसिंग में गुनगुने पानी में तेल की कुछ बूंदें डालकर एक कपड़ा भिगोएं और प्रभावित स्थान पर इसे रखें। कई तरह के दर्द में लाभकारी, खासकर मसल क्रैम्प्स में। 

सेफ्टी टिप 
अरोमा ऑइल पौधों का सत्व होते हैं, जबकि दूसरे सुगंध द्रव्य रासायनिक प्रक्रिया से बनते हैं। एसेंशियल ऑइल लगाने से पहले इनकी सांद्रता कम कर लेनी चाहिए। एक निश्चित मात्रा में ही उपयोग करें, वरना सिरदर्द और बेचैनी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। गलती से ये ऑइल मुंह के भीतर चले जाएं तो पानी से कुल्ला करें। ढेर सारा पानी पिएं और आराम न होने पर चिकित्सक की सलाह लें। अगर आप प्रेगनेंट हैं, गंभीर अस्थमा है या किसी किस्म की एलर्जी है। कीमोथैरेपी चल रही हो तो भी अरोमा थैरेपी न लें।

बढ़ रहा है क्रेज़ 
अल्टरनेटिव थैरेपी को लेकर लोगों में खासा आकर्षण भी है और दिनों दिन इसे आजमाने वालों की संख्या भी बढ़ रही है। भारतीयों के अलावा बड़ी संख्या में विदेशी भी इसके मुरीद बन रहे हैं। चाहे साधारण सिरदर्द हो या कैंसर जैसी बीमारी, अल्टरनेटिव थैरेपीज़ में सबके लिए इलाज के दावे किए जाते हैं। इस मामले में यह साल भी खबरों से भरा रहा। वेट लॉस करवाने से लेकर अस्थमा, डिप्रेशन, स्वाइन फ्लू आदि जैसी हर चीज़ के लिए कोई उपाय होने का दावा अल्टनेट थैरेपी में किया जाता है। 

कॉमन ऑइल और उनके गुण 
कैमोमिल- कारगर एंटीडिप्रेजेंट, अवसाद कम करता है। मुंहासे जड़ से खत्म करता है। 

यूकेलिप्टस- श्वाससंबंधी बीमारियों में असरदार। अपनी कूलिंग प्रॉप्रटीज के कारण माइग्रेन, बुखार और मांसपेशियों का दर्द दूर करता है। 

लैवेंडर- फ्लू, कोल्ड में भी कारगर। घाव और जले हुए स्थान पर एंटीसेप्टिक का काम। 

सीडरवुड- युरिनरी ट्रैक्ट के संक्रमण को दूर करने में प्रभावशाली। 

टी-ट्री ऑइल- मुंहासों के लिए सबसे अच्छा इलाज। 

रोजमैरी- बालों की संपूर्ण देखभाल जैसे डैंड्रफ और बालों का झड़ना रोकता है। 

पेपरमिंट- मैंथॉल सिरदर्द और मांसपेशियों का दर्द घटाता है लेकिन सोने से पहले इसका उपयोग टालें।

जोजोबा ऑइल- बहुत ही शानदार मॉइश्चराइजर है और झुर्रियां कम करता है। बेस ऑइल बतौर भी इस्तेमाल होता है। 

सैंडलवुड- हर तरह की त्वचा के लिए फायदेमंद है। सूखी खांसी और गले के विकार दूर करने में इस्तेमाल होता है। 

जिंजर- कोल्ड और फ्लू में असरदार। 

नेरोली- अनिद्रा और सिरदर्द का इलाज होता है। 

जेरानिअम- त्वचा संबंधी समस्याओं में राहत। 

गेहूं के अंकुर का तेल- विटामिन ई से भरपूर होने के कारण सन-बर्न में फायदेमंद। स्ट्रेच मार्क्स दूर करने में भी सहायक। 

आपकी त्वचा के लिए 
वातज स्किन (ड्राय और रफ) रोज-ऑइल इस तरह की त्वचा के लिए सर्वश्रेष्ठ है। 

पित्तज स्किन (अतिसंवेदनशील व नाजुक) सैंडलवुड सबसे अच्छा है। 

कफज स्किन (दाग-धब्बेदार व तैलीय) बर्गामॉट तेल इस त्वचा के लिए लाभकारी(डॉ. माधवी वटी जगत,सेहत,नई दुनिया,मार्च प्रथमांक 2013)।

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मंगलवार, 19 फरवरी 2013

सुर से सेहत

स्वस्थ हो या बीमार, शरीर संगीत पर प्रतिक्रिया करता है। म्यूजिक थैरेपी का सबसे खूबसूरत हिस्सा ये है कि इसके लिए चिकित्सक के प्रेस्क्रिप्शन की जरूरत भी नहीं। इस थैरेपी के तहत संगीत की स्वरलहरियां मरीज के शरीर को कई जटिल बीमारियों में राहत देती हैं। अब चिकित्सक भी इसे कॉम्प्लिमेंटरी थैरेपी की तरह अपना रहे हैं। 

हाल के सालों में किसी विशेष चिकित्सकीय मकसद तक पहुंचने के लिए मरीज को संगीत के करीब लाने का चलन बढ़ा है। इसमें संगीत का कोई खास पीस, या फिर कई बार मरीज की पसंद की कोई स्वरलहरी या धुन उसे नियत समय के लिए सुनाई जाती है। विभिन्न शोध भी इसकी पुष्टि कर चुके हैं कि म्यूजिक के पैसिव और एक्टिव फॉर्म गंभीर शारीरिक-मानसिक समस्याओं में मरीज को काफी राहत देते हैं। यही वजह है कि अब कन्वेंशनल इलाज के साथ म्यूजिक थैरेपी को तरजीह दी जा है। मरीज थैरेपिस्ट के साथ मिलकर अपनी जरूरतों और पसंद के आधार पर संगीत का चयन कर सकता है। हालांकि कई कारणों से शास्त्रीय संगीत को तरजीह दी जाती है। थैरेपी के लिए मरीज का संगीत की पृष्ठभूमि से होने की जरूरत नहीं है।  

इन बीमारियों में संगीत करता है मदद 
ऑस्टिस्टिक स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर, सेरिब्रल पाल्सी, लर्निंग डिफिकल्टी, डाउन-सिंड्रोम, कम्युनिकेशन प्रॉब्लम, मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम, न्यूरोलॉजिकल कंडीशन, सेक्सुअल एब्यूज, कैंसर और अन्य बड़ी बीमारियां, एचआईवी एड्‌स, एडिक्शन, जेरिआट्रिक केयर, सुनने में समस्या, गर्भवती स्त्री की देखभाल और डिलीवरी के दौरान की जटिलताएं घटाना आदि। सर्जरी के बाद की रिकवरी में म्यूजिक थैरेपी काफी सहायता करती है। 

हर सुर का अलग-अलग असर 
संगीत के सारे अंग जैसे ताल, धुन और वॉल्यूम शरीर पर अलग-अलग तरह से असर करते हैं। एक मिनट में लगभग ६० से ७० बीट्‌स की ताल को सबसे ज्यादा आरामदायक माना गया है क्योंकि ये दिल की धड़कन से समानता रखती है। इससे एक पेस तेज होना तनाव का कारक होता है, जबकि धीमा होना सस्पेंस पैदा करता है। इसी तरह से संगीत का वॉल्यूम ज्यादा होना भी तनाव बढ़ाता है, जबकि कम वॉल्यूम मस्तिष्क को आराम देता है। शरीर की जरूरत के मुताबिक थैरेपी सेशन प्लान किया जाता है, जो हर दिन से लेकर कुछ दिनों के अंतराल पर भी हो सकता है। एक सेशन आधे से एक घंटे तक चलता है। रोगी की दशा और थैरेपी से हो रहे लाभों के मद्देनजर सेशन्स बढ़ाए या घटाए जाते हैं। पैसिव म्यूजिक थैरेपी गर्भवती स्त्री, दिल के मरीज या बिहैवियरल समस्याओं में दी जाती है। वहीं एक्टिव म्यूजिक थैरेपी न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के अलावा उन बच्चों को दी जाती है, जिन्हें बोलने में समस्या है। इसके अलावा हाइपर-एक्टिव बच्चों में एकाग्रता लाने के लिए इसकी मदद ली जा सकती है।

संगीतमय इलाज़ 
मर्ज के अनुसार इस थैरेपी का पैटर्न, प्रोग्राम और ड्‌यूरेशन बदलता है। किसी खास भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक या शारीरिक समस्या से जूझ रहा व्यक्ति जब थैरेपिस्ट से संपर्क करता है तो जरूरी है कि वो अपने लक्षणों और जरूरतों पर खुलकर बात करे। इसके बाद थैरेपिस्ट प्रभावित व्यक्ति की इमोशनल वेल-बीइंग, शारीरिक स्वास्थ्य, संवाद की क्षमता आदि संगीत पर उसकी प्रतिक्रिया के जरिए जांचता है। अब इस प्रतिक्रिया (म्यूजिकल रेस्पॉन्स) के आधार पर खास प्रोग्राम डिजाइन किया जाता है। 

इसमें संगीत सुनना, गीत या धुन का विश्लेषण करना, गाना कंपोज करना, धुन तैयार करना आदि शामिल हो सकते हैं। म्यूजिक थैरेपिस्ट मरीज को जरूरी निर्देश देता है। व्यक्ति संगीत सेशन्स के दौरान अपने दिमाग में उभर रही छवियों पर बात कर सकता है। अपना पसंदीदा संगीत सुन सकता है। गा या बेसिक वाद्ययंत्र बजा सकता है। हल्का-फुल्का नृत्य कर सकता है। कोई धुन तैयार कर सकता है या फिर बोल लिख उनपर चर्चा कर सकता है। कुछ सेशन्स समान जरूरतों वाले मरीजों के समूह में तो कुछ व्यक्तिगत भी होते हैं। सामूहिक सेशन के दौरान लोग बैकग्राउंड संगीत के साथ आराम कर सकते हैं तो मिलकर कोई परफॉर्मेंस भी दे सकते हैं।

संगीत की जानकारी ज़रूरी नहीं 
म्यूजिक थैरेपी मरीज की सामाजिक, भावनात्मक, शैक्षिक और शारीरिक जरूरतों के मद्देनजर संगीत का व्यवस्थित प्रस्तुतीकरण है। संगीत की आवृति मस्तिष्क और फिर शरीर को प्रभावित करती है, जिससे संबंधित जरूरत की भी पूर्ति होती है। जैसे मरीज का चिकित्सक द्वारा दी जा रही दवाइयों के इन्ग्रेडिएंट्‌स जानना जरूरी नहीं, ठीक वैसे ही म्यूजिक थैरेपी के लिए संगीत की जानकारी जरूरी नहीं। शुद्ध यूनिवर्सल क्लासिकल म्यूजिक, खासकर जिसमें शब्द न हों, कारगर साबित होता है। संगीत स्वस्थ व्यक्तियों के लिए चमत्कारी भी साबित हो चुका है इसलिए बहुत से लोग स्वास्थ्य बरकरार रखने के लिए भी म्यूजिक थैरेपी लेने लगे हैं। तनाव, अवसाद, अनिद्रा, माइग्रेन, डर और दर्द घटाने में इसका उपयोग होता है। यह बच्चों में एकाग्रता और याददाश्त बढ़ाने में मददगार है। गर्भवती महिलाओं को शुरुआत में थैरेपी देना न सिर्फ नार्मल डिलीवरी की संभावना बढ़ाता है, बल्कि भ्रूण के विकास में भी सहायक होता है। आने वाले शिशु में कॉग्निटिव पहलुओं के अलावा सौंदर्यबोध का भी विकास होता है। कुछ ही थैरेपी सेशन्स के भीतर मरीज खुद में सकारात्मक बदलाव महसूस कर सकता है। 

दिनचर्या हो म्यूजिकल 
म्यूजिक थैरेपी कई तरह की बीमारियों में कॉम्प्लिमेंटरी थैरेपी की तरह मरीज को राहत देती है। पेन-मैनेजमेंट में कारगर है। साथ ही इसे रुटीन में भी शामिल किया जा सकता है। संगीत तनाव घटाकर शारीरिक रिलेक्सेशन में मदद करता है। खासकर "स्ट्रेस रिलीफ एक्टिविटीज" जैसे योग, व्यायाम, स्नान के दौरान संगीत सुनना तनाव घटाकर आसपास को सकारात्मक ऊर्जा से भरने में मददगार साबित हो चुका है। हालांकि विभिन्न गतिविधियों के दौरान संगीत के अलग-अलग फॉर्म फायदेमंद होते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर आप अनिद्रा के शिकार हैं और आपको फास्ट म्यूजिक पसंद है तो कम से कम सोते वक्त इसे अवॉइड करना ही बेहतर है। यानी हर समस्या के अनुसार बेस्ट म्यूजिक और सुनने की स्ट्रेटजी एक सी नहीं रहती(डॉ. टी. मैथिली,सेहत,नई दुनिया,फरवरी द्वितीयांक 2013)।

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