गुरुवार, 12 मई 2016

थकान हो दूर,करे ताज़ा भरपूर

आज World Chronic Fatigue Syndrome Awareness Day है। 

इन दिनों थकान का ज़्यादा होना एक सामान्य अनुभव है। जानिए,बगैर ग्लूकोज लिए थकान मिटाने के नुस्खेः
 
1. वज्र मुद्राः हमें चाय-कॉफी या ऐसे किसी अन्य उत्तेजक पदार्थ से थकान में जो राहत मिलती है,इस मुद्रा से वही लाभ मिलता है क्योंकि शरीर में सबसे मज़बूत नाड़ी वज्र नाड़ी ही होती है और वज्र मुद्रा वज्र नाड़ी को ऊर्जा प्रदान करती है। 

कैसे लगाएं: कनिष्ठा,अनामिका और मध्यमा को इस प्रकार मिलाएं कि तीनों उंगलियों के नाखून एक सीध में रहें। अब अंगूठे के शीर्ष भाग को मध्यमा के शीर्ष भाग के किनारे पर इस तरह रखें कि अंगूठे का अग्रभाग मध्यमा के नाखून के कोने को छूता हुआ हो। तर्जनी उंगली सीधी रहे। 

कितनी देरःपांच-पांच मिनट तीन बार। 

2. शिवलिंग मुद्राः खासकर अवसाद और निराशा से हुए थकान को दूर करने में यह मुद्रा बहुत उपयोगी है। इस मुद्रा से एक प्रकार की मस्ती अथवा स्वीकार-भाव पैदा होता है। 

कैसे करें: बांयी हथेली को अपने पेट के पास लाकर उस पर दांयी हथेली से इस प्रकार मुट्ठी बनाकर रखें कि दांया अंगूठी सीधा ऊपर की ओर रहे। बांये हाथ की सभी उंगलियां मिली रहें और दोनों कोहनियां भी एकदम सीधी रहें। 

 
कितनी देरः पांच-पांच मिनट दो बार। 





3. शक्ति मुद्राः अहंकार,क्रोध,द्वेष,ईर्ष्या,लोभ और मोह हमें शक्तिहीन बनाते हैं। खासकर क्रोध से शक्ति बहुत जल्दी क्षीण हो जाती है। शक्ति मुद्रा ऐसी स्थिति में बहुत कारगर है। जो अत्यधिक शारीरिक श्रम के कारण थक जाते हैं,उन्हें भी इस मुद्रा से काफी लाभ होगा। 
 
कैसे करें: दोनों हाथों के अंगूठों को मुट्ठियों में बंद कर लें। वज्रासन में बैठकर अथवा लेटकर शक्ति मुद्रा बनाकर अपनी हथेलियों को नाभि के नीचे हल्के से रखें। मुट्ठियों की उंगलियां नीचे की ओर न होकर,आमने-सामने सीधी हों। दोनों मुट्टियों के बीच लगभग दो इंच का अंतर रहे। 

कितनी देरः आधा घंटा। 

 4. प्राण मुद्राः इससे रक्तप्रवाह बढ़ता है और पूरे शरीर को ऊर्जा मिलती है। कैसे करें: दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में फंसा लें और हाथ खोलकर अपनी छाती के सामने रखें। 

कितनी बारः दो से तीन बार,जितनी देर तक सहज हो। 

पुनश्चः प्राण मुद्रा के साथ होम्योपैथिक दवा फास्फोरस 200 का सेवन करने से दुर्बलता बहुत जल्दी दूर हो जाती है।

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सोमवार, 10 नवंबर 2014

सफेद दाग की सरकारी हर्बल दवा बिक्री के लिए उपलब्ध हुई

A traditional drug developed by the Defence Research and Development Organisation (DRDO) for treating vitiligo or leucoderma is now available for commercial sale in India. 

The herbal drug, called Lukoskin, was developed by scientists of the Defence Bio-Energy Research (DIBER) centre at Haldwani in Uttarakhand. DIBER transferred the technology for the drug, which is being showcased at the ongoing Arogya Expo 2014, to AIMIL Pharmaceuticals India for commercial production and sale. The drug, developed in 2011, is also on sale at the expo that is being held alongside the World Ayurveda Congress.

Dr Mohammad Junail of AIMIL said his company had signed an agreement with DRDO for the commercial launch of three herbal products. "Lukosin has been launched. The two other products will soon be commercially launched in Indian markets," he said. 

Leucoderma is generally considered an incurable skin condition but Lukosin has been extremely effective against it, DRDO scientists said. "The quest to cure leucoderma has finally ended with the development of the new herbal product with extensive studies by scientists of DIBER," said Dr W. Selvamurthy of DRDO. 

Worldwide incidence of leucoderma is reported to be 1 to 2 per cent. In India, it's around 4 to 5 per cent while in some parts of Rajasthan and Gujarat it is as high as 5 to 8 per cent. 

"This skin disorder is considered a social stigma in our country and people confuse it with leprosy. Affected individuals always remain in constant depression with the feeling of being socially outcast. There are many remedies for this disorder, such as allopathic, surgical and adjunctive.

None of the therapies satisfactorily cure this condition. Secondly, these are either costly or single component based, with very low level of efficacy. People develop blisters, edema or irritation of the skin, and as a result, most patients discontinue the treatment," said a senior official of DRDO. 

DIBER scientists focussed on the causes of leucoderma and came up with a comprehensive formulation for the management of the condition by using Himalayan herbs. Clinically, Lukoskin is quite effective and helps in restoring the normal complexion in the affected area. 

Indian medicinal plants are said to be rich in disease-curing properties. An ethno-botanical survey on medicinal plants used for leucoderma by Sugali tribes of Yerramalais forest in Kurnool district of Andhra Pradesh was carried out in 2011-2012. Twenty-one plant species were found to be used specifically to treat leucoderma. 

Similarly, the Allahabad University established the efficacy of traditional treatment of leucoderma by Kol tribes of Vindhya region of Uttar Pradesh during a study. The traditional treatment used the latex of a plant called Telosma pallid (Roxb) Craib and the study found that the application of the paste of the bark treated the condition to 90 per cent in six months(http://indiatoday.intoday.in/story/drdo-lukoskin-leucoderma-drug-vitiligo-diber/1/399955.html 10 नवम्बर,2014 से साभार)


नोटः आपकी त्वचा का रंग एक संयोग मात्र है।



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सोमवार, 14 जुलाई 2014

क्लबफुट का इलाज़ आसान है और निःशुल्क भी

गर्भ के समय या पूर्व में मां ने स्टेरॉयड दवाओं का इस्तेमाल अधिक किया है तो इससे नवजात के पैर जन्म से टेढ़े हो सकते हैं जिसे क्लब फुट बीमारी कहा जाता है। जिसका बिना सर्जरी इलाज किया जा सकता है। बच्चे के पैरों का सामान्य विकास होने के इंतजार करने में अधिकतर माता पिता दो से तीन साल की उम्र में ही ऐसे बच्चों के इलाज के लिए डॉक्टर के पास पहुंचते हैं। जबकि जल्दी इलाज शुरू कर विकलांगता सही होने की संभावना अधिक रहती है। दिल्ली के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में इसका निःशुल्क इलाज किया जाता है, जहां अब तक 2100 बच्चों को ठीक किया जा चुका है। 


एम्स के आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. शाह आलम खान ने बताया जेनेटिक कारणों के अलावा अधिक स्टेरॉयड दवाओं का इस्तेमाल, खून की कमी या जुड़वा बच्चे होने की सूरत में गर्भ में नवजात के पैरों का सामान्य विकास नहीं हो पाता, जिसकी वजह से पैर विकृत या विकलांग हो जाते हैं। ऐसे बच्चों को जन्म के तुरंत बाद पहचाना जा सकता है, जिन अस्पतालों में क्लबफुट का इलाज उपलब्ध वह इसे जन्म के बाद ही शुरू कर देते हैं। जबकि विशेषज्ञों की सलाह पर क्लब फुट सोसाइटी से भी संपर्क कर इलाज कराया जा सकता है। 

चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय,दिल्ली के आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. अनिल अग्रवाल ने बताया कि इलाज के लिए टीनोटॉमी विधि से बच्चों को विशेष तरह का प्लास्टर चढ़ाया जाता है, इसके बाद विशेष जूतों की सहायता से पैरों को सही एंगल (40 डिग्री) दिया जाता है। पूरी तरह ठीक होने पर 10 से 12 साल का समय लगता है। एम्स सहित दिल्ली के सात सरकारी अस्पतालों में क्लब फुट का इलाज किया जाता है। क्योर इंटरनेशनल के डॉ. संतोष जार्ज ने बताया क्लबफुट के दिल्ली में बीते तीन साल में 2100 बच्चों का इलाज किया जा चुका है, जबकि अब तक देश भर में 4000 बच्चें सही हो चुके हैं। जबकि वर्ष 2008 से पहले ऐसे बच्चों को विकलांगों की श्रेणी में रखा जाता था। 

क्या है टीनोटॉमी 
बच्चों की एड़ी को सही एंगल देने के लिए टीनाटॉमी के बाद प्लास्टर चढ़ाया जाता है, इसके लिए डॉक्टर एड़ी में हल्का कट लगाते हैं, विकृत 90 डिग्री के एंगल के पैरों में टीनाटॉमी की जरूरत अधिक होती है। कई बार
बच्चों को एक पैर में विकलांगता की शिकायत होती है, जबकि कभी दोनों पैरों में विकलांगता होती है। टीनोटॉमी के बाद विशेष तरह के जूतों (स्पीन्ट) से विकृति को दूर करते हैं। प्रक्रिया में बच्चों की बोन ग्राफ्टिंग नहीं होती है।

कब कहां इलाज 
*चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय - बुधवार 
*दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल- सोमवार 
*महर्षि वाल्मिकी अस्पताल बावाना- गुरुवार 
*लेडी हार्डिग मेडिकल कॉलेज और कलावती सरन बाल चिकित्सालय- बुध व शुक्र 
*सेंट स्टीफेंस अस्पताल- शनिवार 
*सफदरजंग अस्पताल - सोमवार 

नोट- लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में भी क्लबफुट क्योर शुरू किया जा चुका है, सभी केन्द्रों पर बच्चों का निशुल्क इलाज किया जाता है। (हिंदुस्तान,दिल्ली,14 जुलाई,2014)।

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मंगलवार, 6 मई 2014

अस्थमा दिवस विशेषः मुश्किल बढ़ा रहे डॉगी के बाल, परफ्यूम की महक

सांस उखड़ने का दौरा पड़ जाता है। जरा सा मौसम बदलता सांस फूलने लगती है। सांस रूठ जाने का एहसास होता है। कोई खास चीज खाने पीने पर सांस जैसे जवाब देती हुई महसूस होती है। दम घुटने लगता है। डॉक्टर इसे दमा के लक्षण बताते हैं। इन लक्षणों को प्रकट होने देने से रोका जा सकता है। ऐसा तभी मुमकिन है जब हमारी सांसों में सेहत घुली होगी। 

दमा के दम के साथ जाने की बात भी सालों से सुनी जा रही है। आज की तारीख में चिकित्सा विज्ञान की तरक्की ने इसे झूठा साबित कर दिया है। दमा का बेहतर इलाज संभव हो गया है तो इससे बचाव को लेकर भी लोगों को जागरूक किए जाने पर जोर दिया जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा योग गुरु के रूप में नियुक्त आयुर्वेद के सीनियर फिजीशियन डॉ.एसपी गुप्ता कहते हैं, दमा ऐसी बीमारी है जिसमें श्वास नलियां सिकुड़ जाती हैं जिसकी वजह से मरीज को सांस अंदर लेने और बाहर छोड़ने में दिक्कत होती है। सांस की इस तकलीफ की वजह तमाम तरह की एलर्जी बनती है। किसी भी प्रकार की एलर्जी अपना असर नहीं दिखा सके इसके लिए शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता, जीवनशक्ति मजबूत होना जरूरी है। प्राणायाम हमारी जीवनशक्ति बढ़ाने के साथ ही सांसों की नलियों का आयाम बढ़ाता है। सीनियर फिजीशियन डॉ.राकेश कुमार के मुताबिक दमा का कारण चाहे कोई भी एलर्जी हो, लेकिन इसका कारगर इलाज उपलब्ध हो गया है। इनहेलर तकनीक से साइड इफेक्ट का खतरा लगातार कम होता जा रहा है। इनहेलर के इस्तेमाल से फेफड़ों की ताकत बढ़ती है। इनहेलर को पहले लोग आखिरी दवा मानते थे, लेकिन अब इसे पहली और सबसे कारगर दवा के रूप में स्वीकार किया जाने लगा है। यह दवा सीधे फेफड़ों में जाती है शरीर के बाकी हिस्सों पर इसका असर नहीं पड़ता। अस्थमा रोग विशेषज्ञ डॉ.अजीम इकबाल के मुताबिक इनहेलर दमा रोगियों के लिए वरदान बन रहा है। इसकी वजह से मरीजों में दमा के दौरे पड़ने की प्रवृत्ति कम हुई है। लोगों में इनहेलर का इस्तेमाल बढ़ने लगा है। इसकी वजह से दवा खाने की जरूरत कम हो रही है। ज्यादा गंभीर स्थिति में खाने की दवा असर करना बंद कर देती है। तब इनहेलर का ही सहारा लेना पड़ता है। 

बदला हुआ लाइफ स्टाइल दमा को दावत दे रहा है। वो चाहे डॉगी पालने का शौक हो या फिर एक से बढ़कर सुगंधित परफ्यूम के इस्तेमाल का। डॉ.अजीम इकबाल के मुताबिक जिन लोगों को धूल से एलर्जी के चलते दमा होता है उनके लिए पालतू जानवरों जैसे कुत्ते के बाल भी परेशानी का कारण बनते हैं। परफ्यूम, रूम स्प्रे, कॉइल का धुआं, कोई भी क्रीम, लोशन आदि के इस्तेमाल से भी एलर्जी हो सकती है। दमा के मर्ज की कोई उम्र नहीं है, लेकिन पंद्रह से पैंतीस साल के युवाओं में इसकी प्रवृत्ति ज्यादा देखने को मिल रही है। इसकी वजह उन्हें धूल का एक्सपोजर ज्यादा होना हो सकती है।

दमा के जो मरीज अपने इलाज पर ज्यादा पैसा खर्च करने की स्थिति में नहीं हैं वह होम्योपैथी का सहारा ले सकते हैं। जिला होम्योपैथी चिकित्साधिकारी डॉ.बीपी सिंह के मुताबिक होम्योपैथी में दमा का कारगर इलाज हो सकता है। होम्योपैथी में हर मरीज को अलग अलग दवा देने की जरूरत महसूस की जाती है। क्योंकि, सभी के लक्षण एक जैसे नहीं होते। इस चिकित्सा पद्धति से इलाज करते समय मरीज की मानसिक स्थिति भी ध्यान में रखी जाती है। पचास साल से कम उम्र के मरीजों का होम्योपैथी में पूरी तरह से इलाज हो जाता है। इलाज के दौरान और सामान्य स्थिति में भी दमा के मरीजों को ठंडी और खट्टी चीजें खाने से बचना चाहिए। कोल्ड ड्रिंक, आइसक्रीम आदि का सेवन बिल्कुल नहीं करें तो अच्छा है। आयुर्वेद फिजीशियन डॉ.एसपी गुप्ता के मुताबिक, दमा के मरीजों को चावल, उड़द, दही से परहेज करना चाहिए(हिंदुस्तान संवाददाता,मुरादाबाद,6.5.14)। 

दमा के संबंध में इस ब्लॉग पर पूर्व में प्रकाशित कुछ उपयोगी आलेखों का लिंक है- 

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मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

बीएचयू की अल्ज़ाइमर, पार्किंसन और बुढ़ापा नियंत्रक दवाओं को मान्यता मिली

काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) को अल्ज़ाइमर की दवा बनाने का अमरीकी पेटेंट हासिल हुआ है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के आयुर्वेद विभाग को यह अमरीकी पेटेंट हासिल हुआ है।

अल्ज़ाइमर्स बुढ़ापे में होने वाली बीमारी है। इसमें यादाश्त चली जाती है। उम्र बढ़ने के साथ ही इसका दुष्प्रभाव भी बढ़ता जाता है। 

आयुर्वेद विभाग के प्रमुख डॉ गोविंद प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि भारत में परंपरागत रूप से औषधीय गुणों वाले पौधौं से दवा बनाने का काम किया जाता रहा है। इन्हीं परंपरागत औषधियों को आधार बनाकर विभाग ने ब्राह्मी कल्प, वराही कल्प और अम्ल वेतक नाम से अल्ज़ाइमर, पार्किंसन और बुढ़ापे को कम करने वाली दवाएं विकसित की गई हैं। डॉ गोविंद के अनुसार इन तीनों दवाओं का अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की स्टैंडर्ड लैबोरेट्री में परीक्षण कर इन्हें प्रमाणित किया गया है। ब्राम्ही कल्प, वराही कल्प और अम्ल वेतक आयुर्वेदिक दवाओं का अमरीका की फ़ेडरल ड्रग एजेंसी (एफ़डीए) द्वारा मान्य प्रयोगशाला में परीक्षण भी किया गया। 

डॉ गोविंद ने बताया कि इन दवाओं के चिकित्सकीय परीक्षण के लिए चार संस्थानों को अधिकृत किया गया है। ये हैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू), एसआरएम यूनिवर्सिटी, आदेश यूनिवर्सिटी- भटिंडा और जिनोम फ़ाउंडेशन- हैदराबाद। इन चार संस्थानों ने चेन्नई के अरविंद रेमेडीज़ लिमिटेड के साथ इन तीनों दवाओं की ग्लोबल मार्केटिंग के लिए समझौता किया है। अरविंद रेमेडीज़ लिमिटेड अमरीका की फ़ेडरल ड्रग एजेंसी से अनुमति, प्रमाणन और प्रायोजन के साथ सभी ख़र्च वहन करने के लिए सहमत हो गई है। अरविंद रेमेडीज़ लिमिटेड बीएचयू और अन्य सहयोगी संगठनों में दवा के निर्माण के लिए धन उपलब्ध करवाएगी।

डॉ गोविंद कहते हैं कि ये दवाएं अल्ज़ाइमर, पार्किंसन और बुढ़ापे के असर को कम करने के अलावा अवसाद, अनिद्रा और स्मरण शक्ति के कमज़ोर होने पर प्रयोग में लाई जा सकती है। वो दावा करते हैं कि इन दवाओं के प्रयोग का शरीर पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा। डॉ गोविंद कहते हैं कि इन दवाओं के बाज़ार में आ जाने से इन बीमारियों के मरीज़ों और उनके परिजनों को काफ़ी राहत मिलेगी(मनीष कुमार मिश्रा,बीबीसी हिंदी,29 दिसम्बर,2013) 

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