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शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

सीने में जलन से बचाव के 10 उपाय

सीने में जलन हर किसी की चिर-परिचित समस्या है। कोई बिरला ही होगा जिसने यह कष्ट नहीं भोगा होगा। खाने-पीने में थोड़ी बदपरहेज़ी बरतते ही यह तकलीफ हो सकती है। इससे कलेजा मुँह को आ जाता है, सीने में जलन होने लगती है, मुँह में खारा-खट्टा पानी भर आता है और भोजन ऊपर छाती में चढ़ आता है। ऐसे में मरीज़ अनायास ही एंटासिड या हाजमे की गोली लेने को अग्रसर हो जाता है। 

खाने की नली और आमाशय बीच बना वॉल्व इस समस्या की जड़ है। इस वॉल्व का काम भोजन को आगे आमाशय में बढ़ने देना और फिर ऊपर लौटने से रोकना है। वॉल्व के कमज़ोर होने से भोजन ऊपर की ओर लौटने लगता है। इसके साथ ही पाचन के लिए आमाशय में बना तेज़ाब उलट कर खाने की नली में जाने लगता है। नली की अंदरुनी सतह इसे सह नहीं पाती और उसमें जलन होने लगती है। पेट से भोजन मुँह में आने लगता है। मुँह में लार की मात्रा बढ़ जाती है। खट्टा-खारा पानी मुँह में भर आता है। खाने की नली की यह जलन सीने में भी दर्द पैदा कर देती है। यह दर्द गर्दन और बाँहों में भी फैल सकता है। इससे बचने के लिए यह उपाय किए जा सकते हैं - 

१.टमाटर, प्याज़, लाल मिर्च, काली मिर्च, संतरा, चॉकलेट व पेपरमिंट भोजन- नलिका के निकास पर स्थित वॉल्व को कमज़ोर बना देते हैं। इन चीज़ों को खाने से तकलीफ होती हो तो समझ लें कि इनसे परहेज़ करने में ही भलाई है। 

२.इसी प्रकार तले हुए वसा-युक्त व्यंजन भी कई लोगों को रास नहीं आते। इन्हें कम से कम लें।

३.चाय, कॉफी और कोला ड्रिंक्स में पाई जाने वाली कैफीन अन्न नली के वॉल्व की कार्यक्षमता को चौपट कर देती है। यदि सीने में जलन रहती है तो इन पदार्थों से दूरी बना लें। 

४.तंबाकू हर रूप में खाने की नली के वॉल्व का दुश्मन है। यह पेट की सुरक्षा प्रणाली को भी ठेस पहुँचाता है। इसके दुष्प्रभावों से आमाशय तेज़ाब को सहने के काबिल नहीं रहता। 

५.व्यक्ति को विवेकशून्य बनाने के साथ-साथ शराब भोजन-नली के वॉल्व को भी सुस्त कर देती है। यह तकलीफ "नीट" पीने वालों तथा मदिरा के साथ सिगरेट के कश खींचने वालों में सबसे प्रबल होती है। ऐसे में पेट में अम्ल भी अधिक बनता है जिससे स्थिति और भी बदतर हो जाती है।

६.यह छोटी सी बात गांठ बांध लें कि भोजन करने के दो-ढाई घंटे बाद तक लेटने और उलटे झुकने-मुड़ने से परहेज़ करें। गुरुत्वाकर्षीय प्रभाव के आगे वॉल्व को नतमस्तक होना ही पड़ता है। भोजन करने के बाद कुछ देर टहलना सबसे अच्छा है।टहलने न जा पाएँ तो पीठ टेककर सीधे बैठें। इसके लिए यह नियम बना लें कि रात्रि-भोज सोने के समय से कम से कम दो-ढाई घंटे पहले ही कर लें। काम धंधे से देर से लौटना और भोजन करके चटपट बिस्तर में लेट जाना एसिडिटी का कारण बनता है। 

7.खाना कितना ही स्वादिष्ट हो और पकवान कितने ही प्रकार के हों, भोजन करते समय पेट के साथ कभी ज़्यादती नहीं करें। पेटू होने से स्वास्थ्य तो बिगड़ता ही है, पेट भी भोजन को नहीं संभाल पाता। जिनकी भोजननली का वॉल्व कमजोर उन्हें इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 

८.कलेजे की जलन से छुटकारा पाने के लिए थोड़ी-थोड़ी देर में पानी पीते रहें। हर आधे-एक घंटे में एक-दो घूँट पानी पीते रहने से एसिडिटी से बच सकते हैं। 

९.मोटापा स्वास्थ्य का बहुत बड़ा शत्रु है। इसके कारण भोजननली का वॉल्व भी काम करना बंद कर देता है। पेट पर लदी चर्बी वॉल्व को शिथिल बनाती है, डायफ्राम के पेशी तंतुओं में भी छितरा-पन पैदा करती है, जिससे पेट कई बार उचक कर छाती में जा बैठता है। इसे ही हायेटस हर्निया कहते हैं। ऐसे में आमाशय से भोजन के उलटकर खाने की नली में जाने पर रोक-टोक खत्म हो जाती है। 

१०.ढीले आरामदायक वस्त्र पहनें। तंग कसी हुई पेंट और जीन्स फैशनेबल ज़रूर दिख सकती हैं, पर पेट के लिए कष्टकारी है। कमर अधिक कसी रहे तो खाने की नली का वॉल्व ठीक से काम नहीं करता। 

एंटासिड लेने के नियम 
कभी-कभार की जलन और बदहज़मी से निपटने के लिए एंटासिड लिया जा सकता है। डायजीन, म्यूकेन, जेल्युसिल आदि सभी इस दृष्टि से उपयोगी हैं पर इन्हें लगातार लेना ठीक नहीं होता। कुछ एंटासिड कब्ज़ पैदा करते हैं, कुछ सोडियम होने के कारण रक्तचाप को प्रभावित करते हैं। जलन लगातार बनी रहती हो जो चिकित्सक से परामर्श लें। हर समय अपने मन से एंटासिड लेना उचित नहीं है। ऐसे में सही प्रकार से जांच-पड़ताल कर समुचित उपचार कराना अनिवार्य हो जाता है। एंडोस्कोपी जांच में विशेषज्ञ खाने की नली में दूरबीन डालकर आहारनली और वॉल्व की सही स्थिति जान सकता है। 

कभी-कभी जलन की जड़ में गंभीर रोग छिपा होता है। बहुत दिनों तक जलन बनी रहने और उसका इलाज़ न होने से खाने की नली के निचले हिस्से में ज़ख़्म बनने का ख़तरा रहता है। इन ज़ख़्मों के बिगड़कर कैंसर में भी तब्दील होने की आशंका रहती है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में जलन दूर करने की कई प्रभावी दवाएं हैं। कुछ दवाएं अम्लरोधी हैं व अन्य आमाशय में भोजन को आगे बढ़ाने की गति को तेज़ कर स्थिति में सुधार लाती है। सोते समय पलंग का सिरहाना छह इंच ऊपर उठाकर रखने से भी अम्ल खाने की नली में नहीं जाता। यह सरल-सा नुस्ख़ा भी बहुत लोगों में फ़ायदेमंद साबितहोता है(डॉ. यतीश अग्रवाल,सेहत,नई दुनिया,अगस्त २०१२)। 

आयुर्वेदिक उपाय 
3 जनवरी,2012 के दैनिक भास्कर(उज्जैन संस्करण) में,इससे बचने के कुछ कारगर आयुर्वेदिक नुस्खे बताए गए हैं- 

- ताजा पुदीने के रस का रोज सेवन करना है। 

- एक ग्लास पानी में दो चम्मच सेब का सिरका तथा दो चम्मच शहद मिलाकर खाने से पहले सेवन करें, यह भी एक बेहतरीन उपाय है 

- खाना के बाद आधा चम्मच सौंफ चबाएं। 

- भोजन के पहले अलो वेरा जूस का सेवन करें । 

- अदरक का प्रयोग भरपूर मात्रा में करें । पीसी हुई अदरक चाय में प्रयोग करने से भी सीने की जलन कम होती है। 

- मुहं में एक लौंग रखकर धीरे धीरे चूसें । 

- तुलसी के पत्ते चबाने से भी काफी लाभ मिलता है । 

- खाने से एक दो घंटे पहले नींबू के रस में काला नमक मिलाकर पीने से भी सीने की जलन में लाभ मिलता है। नींबू का प्रयोग भोजन में ज्यादा करें। 

- मूली का सेवन करने से भी लाभ मिलता है। 

- मूली का रस पीने से भी लाभ मिलता है। 

- हरड़ का टुकड़ा चबाना भी एक बहुत ही पुराना उपाय है। 

- नारियल पानी का सेवन करें।

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गुरुवार, 16 अगस्त 2012

हाइपर-एसिडिटी में उपयोगी है धनुरासन

आजकल एसिडिटी की शिकायत करने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। खाने-पीने का सही समय न होना और कई ऐसे कारण हैं जो आपको इस समस्या की ओर ले जाते हैं। कुछ उपाय करके आप इससे बचे रह सकते हैं। यह एक ऐसा उदर रोग है, जो आमाशय में अम्ल की मात्रा बढ़ जाने से उत्पन्न होता है। इस रोग में पाचक रस अनियंत्रित ढंग से बढ़ जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को अनेक परेशानियों से दो-चार होना पड़ता है। गलत जीवनशैली और फास्ट तथा जंक फूड के इस जमाने में लगभग हर व्यक्ति इस समस्या से पीड़ित नजर आता है। 

रोग के लक्षण 
पेट व छाती में जलन, खट्टी डकारें आना, पेट में दर्द, भारीपन, गैस की शिकायत, गले में जलन, कब्ज, अपच आदि। इस रोग का प्रमुख कारण हमारी गलत आदतें तथा मानसिक तनाव है। योग के नियमित अभ्यास से हम इस रोग के सभी प्रमुख कारण-आरामतलबी, व्यायाम की कमी, मानसिक तनाव तथा भोजन के असंतुलन पर नियंत्रण कर लेते हैं। हाइपर एसिडिटी को दूर करने में यौगिक क्रियाएं काफी फायदेमंद साबित होती हैं। 

आसन 
इसके समाधान हेतु धनुरासन, पवनमुक्तासन, वज्रासन, शशांकासन, मण्डूकासन, योगमुद्रा, भुजंगासन आदि बेहद कारगर हैं। पवनमुक्तासन के 10-12 चक्रों का प्रतिदिन अभ्यास करने मात्र से यह समस्या काफी हद तक दूर हो जाती है। 

धनुरासन की अभ्यास विधि 
पेट के बल जमीन पर लेट जाएं। दोनों पैरों को घुटने से मोड़ लें। घुटनों तथा पंजों के बीच में एक फुट की दूरी बनाएं। इसके बाद पैर के पंजे या अंगूठे को पकड़कर (हाथों से) सिर-धड़, जांघें तथा घुटनों को जमीन से यथासंभव ऊपर उठाएं। इसके पश्चात थोड़ी देर (आरामदायक समय तक) इस स्थिति में रुकें। फिर वापस पूर्व स्थिति में आएं। इसकी तीन-चार आवृत्तियों का अभ्यास करें।

सावधानियां 
हार्निया तथा अल्सर से पीड़ित लोग इसका अभ्यास न कर पवनमुक्तासन का अभ्यास करें। 

ध्यान की अभ्यास विधि 
पद्मासन, सिद्धासन, सुखासन या कुर्सी पर बैठकर रीढ़, गला व सिर को सीधा कर लें। आंखों को ढीली बन्द कर चेहरे को शिथिल कर लें। अब मन में उठने वाले विचारों का द्रष्टा बनने का प्रयास करें। धैर्यपूर्वक मन के विचारों पर ध्यान बनाए रखें। इस विधि का कुछ महीनों तक नियमित अभ्यास करने पर मन शान्त, निर्विचार हो जाता है। प्रतिदिन दस से पन्द्रह मिनट तक इसका अभ्यास करना चाहिए। इससे मन निद्र्वन्द्व तथा चिन्तारहित हो जाता है। 

आहार 
हल्का आहार लें। इसमें दलिया, चावल, जौ का सत्तू, उबली सब्जियां एवं मौसमी फल पर्याप्त मात्र में शामिल करें। तीखा, मसालेदार खाना, मिठाई, केक, मैदा, शराब, धूम्रपान, कॉफी तथा चाय से सख्त परहेज करें।

इन बातों का भी रखें ध्यान 
- भोजन खूब चबा-चबाकर खाएं। 
- अधिक समय तक खाली पेट न रहें। 
- नियमित रूप से समय पर खाएं। 
- सूर्योदय के पहले बिस्तर छोड़ दें तथा एक-दो गिलास पानी घूंट-घूंट कर पीकर शौच जाने की आदत डालें(कौशल कुमार,हिंदुस्तान,दिल्ली,16.8.12)।

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मंगलवार, 30 अगस्त 2011

बिना दवाई दस मिनट में दूर करें खांसी-जुकाम

मौसम के परिवर्तन के कारण संक्रमण से कई बार वाइरल इंफेक्शन के कारण हमारे गले व फेफड़ों में जमने वाली एक श्लेष्मा होती है जो खांसी या खांसने के साथ बाहर आता है। यह फायदेमंद और नुकसानदायक दोनों है। इसे ही कफ कहा जाता है। अगर आप भी खांसी या जुकाम से परेशान है तो बिना दवाई लिए भी रोज सिर्फ दस मिनट इस मुद्रा के अभ्यास से कफ छुटकारा पा सकते हैं। 
मुद्रा- 
बाएं हाथ का अंगूठा सीधा खडा कर दाहिने हाथ से बाएं हाथ कि अंगुलियों में परस्पर फँसाते हुए दोनों पंजों को ऐसे जोडें कि दाहिना अंगूठा बाएं अंगूठे को बहार से कवर कर ले, इस प्रकार जो मुद्रा बनेगी उसे अंगुष्ठ मुद्रा कहेंगे। अंगूठे में अग्नि तत्व होता है.इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर में गर्मी बढऩे लगती है. शरीर में जमा कफ तत्व सूखकर नष्ट हो जाता है।सर्दी जुकाम,खांसी इत्यादि रोगों में यह बड़ा लाभदायी होता है, कभी यदि शीत प्रकोप में आ जाए और शरीर में ठण्ड से कपकपाहट होने लगे तो इस मुद्रा का प्रयोग लाभदायक होता है। रोज दस मिनट इस मुद्रा को करने से बहुत कफ होने पर भी राहत मिलती है।
कफ शीघ्र ही सुख जाता है। साथ ही जरा सा सेंधा नमक धीरे धीरे चूसने से लाभ होता है। सुबह कोमल सूर्यकिरणों में बैठके दायें नाक से श्वास लेकर सवा मिनट रोकें और बायें से छोड़ें। ऐसा 3-4 बार करें। इससे कफ की शिकायतें दूर होंगी(दैनिक भास्कर,उज्जैन,30.8.11)।

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रविवार, 2 जनवरी 2011

एसिडिटी का सरल प्राकृतिक इलाज़

अम्लता रोग (एसिडिटी) आज के आधुनिक युग का बहु-प्रचलित रोग है। यह भोजन की अधिकता एवं व्यायाम के अभाव के कारण होते हैं। वैसे तो वात (गैस), पित्त (अम्ल) व कफ शरीर में हमेशा मौजूद रहते हैं। यदि इनमें असंतुलन आ जाता है व किसी की मात्रा सर्वाधिक हो जाती है तो हम उसे उस रोग के नाम से जानते हैं। युवा अवस्था में प्रायः तले-भुने हुए खाद्य पदार्थ, चाय, कॉफी व अन्य मादक द्रव्यों का सेवन अधिक करता है। इस वजह से उम्र के इस पड़ाव पर प्रायः युवा अम्ल रोग के शिकार होते हैं। वैसे ऐसिडिटी कब्ज का ही स्वरूप है।

शरीर में अम्ल के ज्यादा होने पर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। शरीर का क्षारत्व कम होने से शरीर चर्म रोग, गठिया, वायु रोग व अनेकानेक रोगों का शिकार हो जाता है। प्राकृतिक रूप से रक्त का स्वभाव क्षारीय होता है। अम्लता केवल रक्त के कसार व अम्ल के मध्य संतुलन लाने का प्रयास है, उक्त रोग हमें सूचित करता है कि शरीर में अम्लता बढ़ गई है।

जागो, शरीर को क्षारीय आहार उपलब्ध कराओ ताकि शरीर में अम्ल बढ़ने से जो दुष्प्रभाव हो रहे हैं उन्हें अविलंब रोका जा सके। यदि संकेत मिलते ही आहार में क्षारीय आहार की मात्रा को बढ़ा दी जाए तो शरीर अम्लता के रोग से मुक्त हो जाता है। वैसे प्रकृति हमें जीवन में हर बार विभिन्ना लक्षणों जैसे डकार, उबासी, थकान, सिरदर्द, सर्दी व अन्य लक्षणों के माध्यम से शरीर के अंदर हो रहे व संभावित रोगों की जानकारी देती रहती है, किंतु हम प्रायः प्रकृति के संकेतों का उल्लंघन कर अपने आपको गंभीर रोगों का शिकार बनाते रहते हैं।

शरीर में अम्ल के ज्यादा होने पर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। शरीर का क्षारत्व कम होने से शरीर चर्म रोग, गठिया, वायु रोग व अनेकानेक रोगों का शिकार हो जाता है। प्राकृतिक रूप से रक्त का स्वभाव क्षारीय होता है। अम्लता केवल रक्त के कसार व अम्ल के मध्य संतुलन लाने का प्रयास है, उक्त रोग हमें सूचित करता है कि शरीर में अम्लता बढ़शरीर में अम्ल के ज्यादा होने पर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। शरीर का क्षारत्व कम होने से शरीर चर्म रोग, गठिया, वायु रोग व अनेकानेक रोगों का शिकार हो जाता है। प्राकृतिक रूप से रक्त का स्वभाव क्षारीय होता है। अम्लता केवल रक्त के कसार व अम्ल के मध्य संतुलन लाने का प्रयास है, उक्त रोग हमें सूचित करता है कि शरीर में अम्लता बढ़ गई है।

रक्त की अम्लता को कम करने का सबसे सरल उपाय है कि भोजन में फल व सब्जियों की मात्रा को बढ़ा दिया जाए। हमारे भोजन का कुल ८० प्रश क्षारीय आहार होना चाहिए। जिससे प्रकृति द्वारा प्रदत्त समस्त आहार उसके मूल स्वरूप में क्षारीय आहार हैं। फल, सब्जियाँ, अंकुरित अनाज, पानी में गले किशमिश, पानी में गले हुए अंजीर व गाय का धारोष्ण दूध क्षारीय आहार की श्रेणी में आते हैं।

मनुष्य द्वारा निर्मित समस्त खाद्य पदार्थ(दाल,चावल,मिक्सचर,कचोरी,चपाती,सेव,कॉफी,चाय,शराब,तंबाकू व अन्य आहार)अम्लीय आहार की श्रेणी में आते हैं। प्रायः,हमारा आहार 80 से 90 प्रतिशत अम्लीय होता है और महज दस प्रतिशत ही क्षारीय होता है। कई मामलों में तो 10 प्रतिशत आहार भी क्षारीय नहीं होता। जब हमारे आहार का 100 प्रतिशत हिस्सा अम्लीय होगा तो कैसे हमारे रक्त की प्रकृति क्षारीय हो सकती है?

बीमार होने पर हमारा सम्पूर्ण आहार क्षारीय हो जाता है। जैसे-जैसे हम फल और सब्जियों की पर्याप्त मात्रा का सेवन करने लगते हैं,रक्त का स्वभाव भी क्षारीय होता जाता है। जैसे ही रक्त का स्वभाव क्षारीय होता है,जब रोगमुक्त हो जाते हैं।

जिस समय शरीर में अम्लता की मात्रा बहुत अधिक हो,उस समय खट्टे पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। इस अवस्था में कुछ दिनों तक दूध,मौसम्बी,पपीता,केला,सेवफल,पका केला,अनार,खीरे का रस,गाजर का रस,तरबूज,किशमिश व खजूर का सेवन किया जा सकता है। कुछ दिनों तक उक्त आहार का सेवन करने के बाद,टमाटर व नींबू का सेवन किया जाना चाहिए ताकि रक्त का स्वभाव पूर्ण रूप से क्षारीय हो जाए। नींबू के बारे में भ्रांति है कि एसिडिटी में इसका सेवन नहीं करना चाहिए जबकि सच्चाई इसके विपरीत है।

नींबू का स्वाद तो अम्लीय है किंतु इसकी प्रकृति क्षारीय है, क्योंकि प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार प्रातःकाल शरीर में अम्ल की मात्रा न्यूनतम स्तर पर होती है और यदि नियमित रूप से नीबू का प्रातःकाल खाली पेट सेवन किया जाए तो अम्लता से शीघ्र मुक्ति मिल जाती है। नींबू के रस का गुनगुने जल के साथ सेवन करना चाहिए। इसके साथ शहद का भी सेवन किया जाए तो लाभ द्विगुणित हो जाता है। यदि सर्दी प्रकृति के रोगी इसमें अदरक का रस मिला लें,तो उन्हें सर्दी से भी मुक्ति मिल जाती है। भोजन के साथ नींबू का सेवन कदापि नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से पाचन विलम्बित होता है और गैस की पूर्ण आशंका हो जाती है।

प्रायःयह देखा गया है कि शरीर में अम्लता बढ़ने पर सोडा(सोडियम बायकार्बोनेट)का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रयोग तात्कालिक लाभ तो दे सकता है किंतु बाद में अधिक अम्ल पैदा होने लगता है। अतः,अम्लता की स्थिति में सोडे का प्रयोग गलत ही नहीं,शरीर को नुकसान पहुंचाने वाला भी है।

जैतून का तेल भी अम्लता के निदान में सहायक है। भोजन के एक घंटे पूर्व 10 मिली. जैतून तेल का सेवन करने से आंतों को स्निग्धता प्राप्त होती है और पेट की अच्छी सफाई हो जाती है। जैतून का तेल हल्का,सुपाच्य,स्निग्धकारी व शरीर को शक्ति प्रदान करने वाला होता है।

अम्लता रोगी के लिए नारियल और नारियल का पानी श्रेष्ठ आहार है। नारियल में 50 प्रतिशत तक वसा होता है जो आंतों को स्निग्धता प्रदान करता है।

अम्लता के रोगी को चावल का सेवन पर्याप्त सब्जियों के साथ करना चाहिए और एकबार में ही खाने की बजाए थोड़ा-थोड़ा कर खाना चाहिए। प्रातःकाल गुनगुने जल का सेवन करने से भी अम्लता कम होती है। ठंडे पानी का सेवन करने से अम्ल का स्त्राव अधिक होता है।

पेट में जलन,आंखों का लाल होना,अधिक गर्मी का लगना,त्वचा का रूखापन आदि अम्लता के लक्षण हैं। अतः,अम्लता प्रकट होते ही मिर्च,मसाले,शक्कर,चाय,मांस,मदिरा और अन्य मादक पदार्थों का सेवन अविलंब बंद कर देना चाहिए।

योग से दूर करें एसिडिटी
प्राकृतिक चिकित्सा एवं योग का साथ काफी पुराना है। प्राकृतिक चिकित्सा में कुंजल क्रिया को हाईपर एसिडिटी पर काबू पाने के लिए सुझाया जाता है। इसमें सुबह खाली पेट खूब सारा पानी पीने के बाद मुंह में उंगली के जरिए उल्टी की जाती है। इससे पेट में भरा हुए पानी के साथ रात भर में इकट्ठा हुआ एसिड बाहर आ जाता है। चिकित्सा विज्ञान मानता है कि सोते समय एसिडिटी बढ़ जाती है। यही वजह है कि हमारे देश में रात को सोने से पहले दूध पीने की सलाह दी जाती है।

प्राणायाम करें : हाईपर एसिडिटी के तत्काल इलाज के लिए दो तरह के प्राणायाम करने के लिए कहा जाता है। पहली तरह के प्राणायाम में दोनों होंठ खुले रखते हुए अपने जबड़ों को बंद कर लें। अब दाँतों के बीच से श्वास खींचें। इससे मुंह के गीलेपन में लिपटी हवा फेफड़ों तक पहुंचेगी। इससे पेट की जलन में तत्काल फायदा होता है। श्वास मुंह के जरिए लेना है और नाक से छोड़ना है। इसके अलावा दूसरे आसन में जीभ को गोल पाइप की तरह सिकोड़ लें। होंठ खुले रखते हुे अब श्वांस भरें, इसे फेफड़ों में रोकें और नाक के जरिए छोड़ दें।

सर्दियों का मेवा-पिंड खजूर
पिंडखजूर ठंड के दिनों में पूरे भारत में आसानी से उपलब्ध रहता है। इसका वृक्ष ३० से ४० फुट लंबा, ३ फुट चौड़ा हल्का भूरा रंग व पत्तियाँ १० से १५ फुट लंबी होती हैं। यह १ से डेढ़ इंच लंबा, अंडाकार आकार व गहरे लाल रंग का फल होता है। पिंडखजूर के अंदर का बीज अत्यधिक कड़क रहता है।

पिंड खजूर इनके कार्य में भी सहायक
लिवर : यकृत के कार्य के लिए आवश्यक पाचक रस को बढ़ाने में मदद करता है।

कब्जियत : फाइबर की अधिकता होने के कारण कब्जीयत दूर करता है।

वजन बढ़ाने में: कार्बोहाइड्रेड व कैलोरी की मात्रा ज्यादा होने के कारण वजन बढ़ाने में सहायक।

तंत्रिका तंत्र : शकर की मात्रा अधिक होने के कारण मस्तिष्क क्रियाओं की क्षमता बढ़ाने में सहायक।

मिनरल : आयरन व कैल्शियम की अधिक मात्रा होने के कारण शरीर में खून बढ़ाने व हड्डियों को मजबूत करने में सहायक।

अन्य लाभ
थकान व चक्कर दूर करता है।
शरीर में रक्त संचार की क्रिया में मजबूती प्रदान करता है।
संक्रामक रोग, जैसे सर्दी, खाँसी, जुकाम, बुखार से बचाव।


पिंड खजूर में पोषक तत्वों की मात्रा
प्रोटीन - १.२ प्रतिशत

फेटी एसिड- ०.४ प्रतिशत

कार्बोज - ८५ प्रतिशत

मिनरल - १.७ प्रतिशत

कैल्शियम - ०.०२२ प्रतिशत

पोटेशियम - ०.३२ प्रतिशत

कैलोरी        -  ३१७

(डॉ. सुनीता जोशी तथा डॉ. संगीता मालू का यह आलेख सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर,2010 तृतीय अंक में प्रकाशित है)

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गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

पित्तशमन और मस्तिष्क की सक्रियता के लिए-चंद्रभेदन प्राणायाम

अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति के लिए प्राणायाम सबसे अच्छा उपाय है। अष्टांग योग में प्राणायाम का महत्वपूर्ण स्थान है। मात्र सांस लेने की क्रिया से ही हमारे स्वास्थ्य को बहुत लाभ प्राप्त होता है। प्राणायाम से मन को शांति मिलती है और साथ ही दिमाग तेजी से कार्य करने लगता है। चंद्र भेदन प्राणायाम से हमारे तर्क शक्ति बढ़ती है और दिमाग दौडऩे लगता है।

चंद्र भेदन प्राणायाम की विधि
किसी भी शांत एवं स्वच्छ वातावरण वाले स्थान पर सुखासन में बैठ जाएं। अब नाक के बाएं छिद्र से सांस अंदर खींचें। पूरक अथवा सांस धीरे-धीरे गहराई से लें। अब नाक के दोनों छिद्रों को बंद करें। अब सांस को रोक कर लें (कुंभक करें), जालंधर बंध और मूलबंध लगाएं। बंध शिथिल करें और नाक के दाएं छिद्र से सांस छोड़ दें। यही क्रिया कम से कम 10 बार करें।

सावधानी
एक ही दिन में सूर्य भेदन प्राणायाम और चंद्र भेदन प्राणायाम न करें।

प्राणायाम के लाभ
शरीर में शीतलता आती है और मन प्रसन्न रहता है। पित्त रोग में फायदा होता है। यह प्राणायाम मन को शांत करता है और क्रोध पर नियंत्रण लगाता है। अत्यधिक कार्य होने पर भी मानसिक तनाव महसूस नहीं होता। दिमाग तेजी से कार्य करने लगता है। हाई ब्लड प्रेशर वालों को इस प्राणायाम से विशेष लाभ प्राप्त होता है(दैनिक भास्कर,उज्जैन,15.12.2010)।

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रविवार, 10 अक्टूबर 2010

वात और पित्त का शमन करता है गिलोय

गिलोय को गुर्च और अमृता के नाम से भी जाना जाता है। यह मेनीस्पर्मेसी फैमिली की वनस्पति है। इसका वैज्ञानिक नाम टीनोस्फोर कार्डी फोलिया है। आम तौर पर यह ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से उपलब्ध हो जाती है। नीम की गिलोय में सब से अधिक औषधीय गुण होते हैं। इसी लिए इसको सर्वोत्तम कहा गया है। यह बहुवर्ती दानेदार पौधा होता है। गिलोय में वात और पित्त शमन का गुण होता है। स्निग्ध ऊष्ण होने के कारण वात शमन के लिए चिकित्सक इसे लेने की सलाह देते हैं। पित्त कशाय होने के कारण यह कफ और पित्त का भी शमन करता है। इसे सभी आयु वर्ग के लोगों को दिया जा सकता है। यदि इसे घी के साथ दिया जाए तो विशेष लाभ होगा। शर्करा के साथ देने से पित्त का शमन करने में मदद मिलती है। इसी क्रम में यदि गिलोय को शहद के साथ प्रयोग किया जाये तो कफ की समस्या से छुटकारा मिलता है। जीर्ण ज्वर और विषम ज्वर में भी इसका प्रयोग लाभकारी होता है। ज्वर दाह शांत करने में डाक्टरों द्वारा इसका प्रयोग करने की सलाह दी जाती है। शरीर में अग्नि तत्व को बढ़ाने और दुर्बलता को दूर करने में भी यह सहायक होता है। गिलोय के अंग और कांड को प्रयोग किया जाता है। मरीज को जब क्वात्त के रूप में दिया जाता है तो 50 से 100 मिलीलीटर के बीच खुराक दी जाती है। चूर्ण के रूप में 3 से 6 ग्राम की मात्रा दी जाती है। इसी प्रकार यदि सत्व के रूप में दिया जाना हो तो एक से दो ग्राम तक की मात्रा लाभकारी होती है। गिलोय के प्रयोग से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। रक्त शोधन का भी गुण इसमें बड़े पैमाने पर पाया जाता है। प्रमेह के रोगियों को भी यह स्वस्थ करने में सहायक है(डा. मनोज कुमार सिंह, चिकित्साधिकारी,आयुर्वेद चिकित्सालय,दैनिक जागरण,इलाहाबाद,9.10.2010)।

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रविवार, 24 जनवरी 2010

कफ और योग

(हिंदुस्तान,पटना,22.1.10)
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शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

पित्त और आहार

(हिंदुस्तान,पटना,15.1.10)
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लीवर और पित्त के इलाज़ के लिए देश का पहला अस्पताल दिल्ली में खुला

(नई दुनिया,दिल्ली,15.1.10)
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