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शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

बेअसर हो रहीं हैं जीवन-रक्षक दवाएं

जरा सोचिये, अगर जिंदगी बचाने वाली दवाईयां ही बेअसर होने लगें तो मरीजों की क्या दशा होगी। शायद इसे आप भयानक सपना समझे लेकिन हकीकत में ऐसा ही हो रहा है। दवाइयों पर बैक्टीरिया अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते जा रहे है और नई पीढ़ी की एंटीबायोटिक्स भी बेअसर साबित होती जा रही हैं। 

हाल ही सामने आए एक शोध अध्ययन के मुताबिक दुनियाभर के बैक्टीरिया एंटीबायोटिक दवाओं पर अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते जा रहे है और पिछले १५ सालों में तो एंटीबायोटिक पर बैक्टीरिया की प्रतिरोधक क्षमता इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि तीसरी और चौथी पीढ़ी की दवाईयां बेअसर हो चुकी है। एसचैरीचिशिया कोली, एनटिरोबैक्टीरियाए, सूडोमोनास ऐरू गीनोसा, ऐसीनीटोबेक्टर बोमानी और केल्बसीलेना न्यूमोनिया जैसे परजीवी इंसानों और जानवरों में रोगों के लिये जिम्मेदार होते है, अब तीसरी और चौथी पीढ़ी की दवाइयों पर भी प्रतिरोधक क्षमता बना चुके है। 

भारत में एंटीबायोटिक पर प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने के बहुत मामले सामने आ रहे है जो कि चिंता का विषय है। देश में मरीज और उनके परिजन एंटीबायोटिक दवाओं का गलत इस्तेमाल करते है जिससे प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती जा रही है। मरीज डाक्टर द्वारा बताई गई दवाइयों को पूरी समय सीमा तक नहीं लेते और इसी कारण बैक्टीरिया की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती जा रही है, जो कि आने वाले समय में काफी नुकसानदायक साबित हो सकती है।

विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार चिकित्सक के स्तर पर यदि ५० प्रतिशत गलत एंटीबायोटिक दवाइयों की सलाह दी होती है तो ५० प्रतिशत मरीज भी इसे लेने में कोताई बरतते हैं। ५० प्रतिशत जनसंख्या ऐसी भी है जिन्हें एंटीबायोटिक दवाएं उपलब्ध ही नहीं हो पाती है। हाल ही में ९२ एंटीबायोटिक और तपेदिक की दवाओं को बिना डाक्टरी परामर्श के वितरण पर रोक लगाई है। 

भारत में सुपरबग बनने के कई कारण हैं लेकिन सबसे ज़्यादा दिक्कत लोगों के बिना डाक्टरी सलाह के दवाएं लेने से है। सुपरबग एनडीएम1 एक ऐसा सुपरबग है जो काफी घातक है और एंटीबायोटिक दवाओं पर ये इतना ज़्यादा प्रतिरोधक क्षमता बना चुका है कि फिलहाल ऐसी कोई दवा नहीं बन पाई है जो इसे ख़त्म कर सके। सुपरबग के अलावा भी ऐसे कई एंटीबायोटिक प्रतिरोधक बैक्टीरिया हैं जो लोगों की सेहत के लिए ख़तरनाक है। 

दवाओं के अलावा,प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने के कई और कारक भी शामिल हैं और इसके कई मामले सामने आए हैं। अक्सर लोग गंदे हाथों से खाते हैं या फिर खाने में साफ-सफाई न बरतना और जानवरों व इंसानों के बीच सम्पर्क से भी बैक्टीरिया फैल जाते हैं। 

एक तरफ जहां दवाओं का अनियमित इस्तेमाल हो रहा है,वहीं दूसरी ओर नई दवाओं के विकास न होने से स्थिति अनियंत्रित हो गई है। इन बिगड़ते हालत को काबू में करने के लिए ये महत्वपूर्ण है कि लोगों को दवाओं का बेजा इस्तेमाल न करने के बारे में समझाया जाए। कई दवाइयों पर प्रतिरोधक क्षमता बढ़ना ख़तरनाक है और इसके समाधान के लिए अधिक से अधिक अनुसंधान हो,जिससे नई दवाइयों का विकास हो सके(डॉ. मुफ़्ती सुहेल सैयद,सेहत,नई दुनिया,अक्टूबर द्वितीयांक 2012)। 

एंटीबायोटिक के बारे में कुछ बेहद उपयोगी आलेख इस लिंक पर हैं।

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रविवार, 21 अगस्त 2011

एंटीबायोटिकःक़ायदे जरूरी हैं ज़िंदगी के लिए

सरकार तीसरी पीढ़ी की एंटीबायोटिक्स को शेड्यूल एचएक्स के अंतर्गत लाना चाहती है ताकि बिना पर्ची के इनकी बिक्री न हो सके। इस कदम का रिटेल डिस्पेंसिंग केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन से लेकर ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट तक सभी विरोध कर रहे हैं। दरअसल हमारे देश में जितनी दवाएं पर्ची पर बिकती हैं उससे कहीं अधिक बिना पर्ची के ओवर द काउंटर बिक जाती हैं। इसमें अत्याधुनिक एंटीबायोटिक्स से लेकर नींद आने तक सभी तरह की दवाएं शामिल हैं। पहली और दूसरी पीढ़ी की एंटीबायोटिक्स दवाएं जब असर न करें तब तीसरी पीढ़ी की एंटिबायोटिक्स दी जानी चाहिए। किसी भी चिकित्सक के पास संक्रमण से निपटने का यह अंतिम हथियार होता है। अब हो यह रहा है कि मामूली संक्रमण के पहले हमले में ही तीसरी पीढ़ी की एंटिबायोटिक्स दी जाती है। मरीज़ भी चिकित्सक पर जल्दी से जल्दी ठीक होने के लिए दवाब बनाता है। चिकित्सक भी जल्दी में होता है। वह मरीज़ को प्राथमिक स्तर की दवाएं देकर समय नष्ट नहीं करना चाहता। इसका नतीजा यह है कि आज सैकड़ों मरीज़ एंटिबायोटिक्स दवाओं की चिकित्सा सीमाओं से बाहर आ गए हैं। अब उन पर कोई एंटिबायोटिक्स असर नहीं करतीं। किसी एंटीबायोटिक्स से ठीक नहीं होने वाले संक्रमणों को ही कुछ देशों ने "सुपरबग" कहा है। हमारे यहाँ एंटीबायोटिक्स के मनमाने उपयोग करने पर ही "सुपरबग" अस्तित्व में आया है। सरकार १६ तरह की दवाओं को रिटेल बाज़ार से हटाना चाहती है और शेड्यूल एचएक्स के "पार्ट ए" में रखना चाहती है। ये दवाएं अब केवल विशिष्ट श्रेणी की चिकित्सा प्रदान करने वाले अस्पतालों में ही मरीज़ों को दी जा सकेंगी। ७० किस्म की अन्य दवाएं "पार्ट बी" में रखी जाएंगी जो सिर्फ रजिस्टर्ड मेडिकल प्रेक्टिशनर्स के पर्चेपर ही बेची जा सकेंगी। ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) चिकित्सकों के पर्चों पर निगाह रखना चाहती है इसलिए नियमानुसार केमिस्ट को दो साल तक पर्ची संभालकर रखना होगी। एंटिबायोटिक्स के दुरुपयोग को रोकने के लिए उठाए जा रहे कदमों का खूब विरोध हो रहा है। रिटेल केमिस्ट किसी नियम क़ायदों में नहीं बंधना चाहते। पर्चियों का रेकार्ड रखना व्यावहारिक रूप से कठिन है। परिवार के हर सदस्य के बीमार पड़ने पर चिकित्सक की सलाह लेना और पर्ची पर दवाएं लिखवाना आर्थिक कारणों से सभी के लिए संभव नहीं होता। एंटीबायोटिक्स के मनमाने उपयोग पर लगाम कसने के ये नियम और क़ायदे लागू हो भी जाएं तब भी चिकित्सक और दवा विक्रेताओं का चतुर गठजोड़ इसका भी तोड़ निकाल ही लेगा(संपादकीय,सेहत,नई दुनिया,अगस्त तृतीयांक 2011)।

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सोमवार, 4 जुलाई 2011

90 एंटीबायोटिक दवाओं की खुली बिक्री पर रोक

दिल्ली बग से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुई फजीहत के बाद केन्द्र सरकार एक बड़ा फैसला लेने जा रही है। वह 90 तरह की एंटीबायोटिक्स दवाओं की खुली बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी में है। इसमें से 16 तरह की दवाएं सिर्फ सरकारी और सरकार के अधीन चलने वाले अस्पतालों को ही सप्लाई की जा सकेंगी, वहीं 74 तरह की दवाएं एमबीबीएस चिकित्सक के पर्चे पर ही बेची जा सकेंगी। नये नियम को लागू करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने शेड्यूल एचएक्स में संशोधन कर उसे ड्रग ट्रायल एडवाइजरी बोर्ड (डीटीएबी) में पारित करने को भेज दिया है।
एंटीबायोटिक दवाओं की खुली बिक्री से गलत उपयोग हो रहा है, जो घातक है। ब्रिटेन में एक रिसर्च के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने दवाओं के शेडूयल एचएक्स में संशोधन किया गया है। संशोधित शेड्यूल के तहत इसे दो भागों में बांटा गया है। पहले भाग में 16 तरह की वे एंटीबायोटिक्स दवाएं शामिल की गई हैं, जिनकी बिक्री सरकारी अस्पतालो में या फिर सरकार के अधीन चलने वाले अस्पतालों में ही की जा सकेगी। इनकी बाजार बिक्री प्रतिबंधित रहेगी, निजी प्रैक्टिसनर्स भी इनको नहीं लिख सकेंगे।
दूसरे भाग में 74 तरह की वे एंटीबायोटिक दवाएं हैं, जिनकी बाजार में बिक्री के लिए शर्ते निर्धारित की जा रही हैं। मेडिकल स्टोर इन दवाओं को एमबीबीएस डॉक्टर का पर्चा देखने के बाद ही बेच सकेंगे। इसके लिए पर्चे की एक फोटो कॉपी मेडिकल स्टोरों को अपने पास रखनी होगी। यही नहीं पर्चे पर भी डॉक्टर द्वारा लिखी गई मात्रा के बराबर ही दवाएं दी जा सकेंगी।
ऑल इंडिया केमिस्ट एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स फेडरेशन के अध्यक्ष कैलाश गुप्ता के मुताबिक संशोधित शेड्यूल ड्रग ट्रायल एडवाइजरी बोर्ड को दिया जा चुका है। बोर्ड की स्वीकृति के बाद शीघ्र ही इसका नोटीफिकेशन कर दिया जाएगा।
विक्रय बंधित होने वाली 16 दवाएं
पार्ट ए-मेरोपैनम, इमीपैनम, अर्थापैनम, डोरीपैनम, फैरोपैनम, पॉलीमैक्सिन बी, कॉलिस्टिन, वेंकोमायसन, टैल्कोप्लानिम, लीनोजॉलिड, टेजीसिलीन, एथ्रियोनम, कैफेपाइम, कैफपिरोम, मॉक्सीफ्लोक्सिन, गैमीफ्लोक्सिन।
डॉक्टर पर्चे पर मिलने वाली दवाएं
एमिकासिन, जेंटामाइसन, कैनामाइसन, नियोमाइसन, पैरामोमिसिन, स्ट्रैप्टेामाइसिन, टोबरामाइसन, इजीपैमाइसन, फ्रामिसिटीन, कैफाजॅलिन, कैफडिनिर, कैफिक्सिम, कैफोपैराजॉन, कैफोटैक्साइम, कैफोपोडाक्सिम, कैफप्रोजिल, कैफ्टाजिडाइम, कैफ्टीब्यूटन, कैफ्ट्रियाक्जान, कैफ्यूरॉक्जिम, कैफेक्लर, कैफ्लेक्सिन, कैफ्डीटोरिन, कैफेटामेट, कैफ्टीजॉक्सिम, एजीथ्रोमाइसिन, क्लैरिथ्रोमाइसिन, एमॉक्सिलिन, इरीथ्रोमाइसिन, कोडाइन, डैक्स्ट्रोपॉक्सिपीन, डिपहैनॉक्जिलेट, प्रोपॉक्सिफीन, निट्राजेपॉम, पेंटाजोसाइन, ब्यूप्रैनॉफ्रिन, एल्प्राजॉलम, मिडजॉलम, एम्पिसिलीन, पैनिसिलीन, क्लॉक्सासिलीन, डिक्लॉक्सासिलीन, ओक्सासिलीन, कैफाड्राक्सिल, पिपेरासिलीन, बैलोफ्लॉक्सासिन, सिप्रोफ्लॉक्सासिन, गैटिफ्लॉक्सासिन, लीवोफ्लॉक्सासिन, लोमिफ्लॉक्सासिन, नालिडिसिक एसिड, नारफ्लोक्सासिन, ओफ्लॉक्सासिन, पैफ्लॉक्सासिन, प्रूलीफ्लॉक्सासिन, स्प्राफ्लॉक्सासिन, माइनोसाइक्लीन, ऑक्सीअेट्रासिलीन, टैट्रासिलीन, कैलोराम्फैनिकॉल, ट्रैमिथोफ्रिम एंड सल्फामैथोक्जॉल, कैफालोराइडिन, कार्बनसिलीन, लिंकोमाइसिन, क्लिंडामाइसिन, जॉल्पिडम, क्लोर्डियाजेपाकसइड, थर्माडॉल, रिफाम्पिसिन, आइसोनिजिड, पायराजाइनामाइड, इथैमब्यूटल।
 
विरोध में उतरेंगी दवा व्यापारी यूनियन
ऑल इंडिया केमिस्ट एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स के बैनर तले देशभर की दवा व्यापारी यूनियन इस संशोधन शेड्यूल का विरोध कर रही हैं। डॉक्टर के पर्चे पर दवा बिक्री को जटिल प्रक्रिया और व्यापार प्रभावित होना बता दिल्ली में 25 जुलाई को प्रदर्शन भी होने जा रहा है। फेडरेशन के अध्यक्ष कैलाश गुप्ता ने देश की समस्त यूनियन को इसमें आमंत्रित किया है(राहुल गुप्ता,दैनिक जागरण,आगरा,4.7.11)।

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गुरुवार, 2 जून 2011

एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बैक्टीरिया बड़ा खतरा

दिल्ली के पानी में एनडीएम-1 (न्यू डेल्ही मेटालोबेटा लैक्टामेज-1) नामक प्रतिरोधी बैक्टीरिया पाए जाने की हालांकि अभी तक पुष्टि नहीं हो पाई है लेकिन यह एक बड़ा खतरा भी हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक इस्तेमाल से ऐसे बैक्टीरिया फिर पैदा हो सकते हैं जिन पर एंटीबायोटिक दवाएं असर नहीं करतीं। ऐसे में इनका संक्रमण ज्यादा खतरनाक होगा। आइएमए नेशनल के सहायक महासचिव और शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. रवि मलिक ने बताया, प्रतिरोधी बैक्टीरिया की उत्पत्ति का कारण एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक इस्तेमाल होता है। दुनिया भर में सर्वाधिक प्रभावकारी और तेज एंटीबायोटिक दवा कार्बापेनम मानी जाती है लेकिन प्रतिरोधी बैक्टीरिया पर इसका भी असर नहीं होता। यदि एनडीएम-1 की पुष्टि हो जाती है तो वह भी प्रतिरोधी बैक्टीरिया की श्रेणी में ही आएगा। डॉ. आर.के. गुप्ता ने बताया, जानकारी के अभाव में जिस तरह एंटीबायोटिक दवाओं का लोग अधिक इस्तेमाल करते हैं, उससे ऐसे प्रतिरोधी बैक्टीरिया के पैदा होने का खतरा बना रहता है। इनका संक्रमण जानलेवा भी हो सकता है इसलिए ऐसे खतरे के प्रति समय रहते सावधान हो जाना चाहिए। डॉ. मलिक ने बताया, कुछ खास तरह के बैक्टीरिया की एंटीबायोटिक दवाओं के लिए प्रतिरोधक क्षमता चिंता का कारण बन गई है क्योंकि ऐसे बैक्टीरिया मरीज को कई अन्य तरह की समस्याएं भी उत्पन्न कर देते हैं। इसका आर्थिक खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। अस्पताल में भर्ती मरीजों में से कई के इलाज के 25 फीसदी खर्च का कारण यही होता है। डॉ. एस.एस. राठी कहते हैं कि वैसे तो बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक दवाओं का तेजी से असर होता है लेकिन इनका लगातार उपयोग बैक्टीरिया की प्रतिरोधक क्षमता को इतना बढ़ा देता है कि वे एंटीबायोटिक दवाओं से बेअसर हो जाते हैं। यह स्थिति ज्यादा खतरनाक होती है। डॉ. गुप्ता ने बताया कि जुकाम और वायरल संबंधी अन्य बीमारियों के लिए एंटीबायोटिक लेना हमेशा कारगर नहीं होता। कई बार तो यह खतरनाक भी हो सकता है क्योंकि इससे ऐसे बैक्टीरिया उत्पन्न होते हैं जिन्हें खत्म करना ही बड़ी चुनौती होता है। इनकी प्रतिरोधक क्षमता बार बार एंटीबायोटिक लेने के कारण इतनी बढ़ चुकी होती है कि उन पर दवाओं का असर नहीं होता(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,2.6.11)।

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सोमवार, 9 मई 2011

एंटीबायोटिक दवाओं का कम हो रहा है असर

एंटीबायोटिक दवाओं के असर नहीं करने की समस्या आम हो चुकी है। आए दिन छोटी सी बीमारी पर चिकित्सक की सलाह लिए बगैर मेडिकल स्टोर से एंटीबायोटिक खरीदकर खा लेना लोगों की आदत सी बन गई है।

यही कारण है कि एंटीबायोटिक का इस तरह से बेवजह हो रहा उपयोग डॉक्टर्स के साथ-साथ मरीजों के लिए समस्या बन गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि एंटीबायोटिक दवाओं के अधिक सेवन से धीरे-धीरे दवाओं का शरीर पर असर होना कम हो जाता है, जोकि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

इलाज हो रहा है महंगा

आईएमए ,नागपुर के पूर्व अध्यक्ष डॉ.बी.के शर्मा के मुताबिक लोग ऑमोक्सीसिलेन, सेफ्ट्राइजोन जैसी एंटीबायोटिक का ज्यादा उपयोग कर रहे हैं, ऐसे में अब इलाज के समय ये एंटीबायोटिक्स बैक्टीरिया रजिस्टेंट होता है।

इनके बैक्टीरिया पर काम नहीं कर पाने से चिकित्सकों के पास एंटीबायोटिक के विकल्प तो कम हुए ही हैं साथ में इलाज भी महंगा हो गया है, जिसका बोझ मरीजों की जेब को परेशान कर रहा है।

मजबूरन चिकित्सकों को मैरूपैनम, टीकोप्लेनिम, टेजीसाइक्लिन, लीनेजोलिड जैसी महंगी एंटीबायोटिक का उपयोग करना पड़ रहा है।

मरीज हो जाते हैं आदी

सुपरस्पेशलिटी अस्पताल के प्रभारी डॉ.सुधीर गुप्ता के अनुसार अधिक एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन करने से बीमारी के कीटाणुओं पर दवा का असर कम हो जाता है। व्यक्ति एंटीबायोटिक लेने की स्टेज से पहले ही इतनी एंटीबायोटिक दवा का सेवन कर चुका होता है, जिससे बॉडी एंटीबायोटिक की आदी हो चुकी होती है।

जब एंटीबायोटिक दवा की जरूरत होती है तब तक उस दवा का असर रोगी के शरीर पर कम होता है। इसके लिए फिर नई व महंगी दवा का प्रयोग किया जाता है।



डब्ल्यूएचओ ने चेताया

मेडिकल कालेज के सामाजिक औषधि एवं रोग प्रतिबंधक विभाग के विभाग प्रमुख डॉ. अरुण हुमणो के अनुसार विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट के अनुसार एंटीबायोटिक्स के अनावश्यक उपयोग से इनका असर कम हो गया है और कई बार बड़ी बीमारी या गंभीर हालत में भी किसी भी एंटीबायोटिक के प्रभावी नहीं होने पर व्यक्ति के जीवन को खतरा पैदा हो जाता है। 

हर साल करीब 1.5 लाख लोग गम्भीर हालत में दवाओं काअसर नहीं होने से मृत्यु का ग्रास बन जाते हैं, वहीं मल्टीड्रगिंग रजिस्टेंस ट्यूबरक्लोसिस के भी करीब 4,40,000 मामले प्रति वर्ष बढ़ रहे हैं। 

क्या है एंटीबायोटिक

एंटीबायोटिक को एंटीमाइक्रोबियल रजिस्टेंस भी कहा जाता है। एंटीबायोटिक शरीर में बैक्टीरिया की बढ़ोत्तरी को धीरे-धीरे कम करते हैं, इससे शरीर में बैक्टीरिया की मौजूदगी से होने वाली बीमारी सही हो जाती है। बाजार में सौ से भी अधिक प्रकार की एंटीबायोटिक दवाएं उपयोग में आ रही हैं। 

महंगी एंटीबायोटिक

मैरूपैनम, टीकोप्लेनिम, टेजीसाइक्लिन, लीनेजोलिड

ये दवाएं हो रही नाकाम

ऑमोक्सीसिलीन, सेफ्ट्राइजोन

एंटीबायोटिक दवा का सेवन करने से पहले डाक्टर की सही सलाह का अनुसरण करें। एंटीबायोटिक दवा का अधिक सेवन हानिकारक है, इसलिए एंटीबायोटिक दवा का गलत प्रयोग नहीं होना चाहिए। यदि दवा का असर नहीं हो रहा है तो कल्चर रिपोर्ट जरूर करवा लें। 

गला खराब, वायरल इंफेक्शन, खांसी, जुकाम में एकदम से एंटीबायोटिक का सेवन नहीं करना चाहिए। एंटीबायोटिक दवाओं का अधिक सेवन करने से शरीर उस दवा की प्रतिरोधी हो जाती है। 
डॉ.अभिमन्यु निसवाड़े, कार्यकारी अधिष्ठाता, मेडिकल कालेज, नागपुर(राजेश यादव,दैनिक भास्कर,नागपुर,9.5.11)

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सोमवार, 18 अप्रैल 2011

क्यों बेअसर हो रही हैं एंटीबायोटिक?

चिकित्सा क्षेत्र में जिन एंटीबॉयोटिक दवाओं ने कभी क्रांति का आगाज किया था, वहीं दवाएं अब सवालों के घेरे में आ गई हैं। इसका कारण है कि डॉक्टरों ने इन दवाओं का इतना ज्यादा इस्तेामाल किया कि बीमारी फैलाने वाले माइक्रोब्स ने एंटीबॉयोटिक दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधात्मक शक्ति हासिल कर ली। विवादों से हटकर देखा जाए तो एंटीबॉयोटिक दवाओं की खोज मनुष्य जाति के लिए वरदान साबित हुई। इन दवाओं ने संक्रामक रोगों का फैलाव रोकने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। 1940 से 1980 के बीच कुछ नई एंटीबॉयोटिक दवाओं की खोज ने नक्शा ही बदल डाला लेकिन इसके बाद कोई बड़ी खोज नहीं हो पाई। देखा जाए तो जीवाणुओं में ऐसी दवाओं के विरुद्ध प्रतिरोध उत्पन्न होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसीलिए इन दवाओं को लगातार उन्नत बनाते रहने की जरूरत होती है। लेकिन एंटीबॉयोटिक दवाओं के अनावश्यक इस्तेमाल और नई दवाओं की खोज का काम ठप पड़ जाने के चलते बैक्टीरिया के विरुद्ध लड़ाई में मनुष्य ने अपना मोर्चा खुद कमजोर कर लिया। यहीं से समस्या की शुरुआत होती है। जिस तरह मानव शरीर पर्यावरण के अनुकूल अपने को अभ्यस्त कर लेता है, उसी तरह हमारे उदय के समय से ही माइक्रोब्स और उनके विरुद्ध शरीर की प्राकृतिक प्रतिरोधात्मक ताकत का भी विकास होता रहा। लेकिन एंटीबॉयोटिक दवाओं के दुरुपयोग ने दोनों के बीच के प्राकृतिक संतुलन को नष्ट कर डाला और धीरे-धीरे बैक्टीरिया ने अपने को एंटीबॉयोटिक दवाओं से ताकतवर बना लिया, जिससे
दवाएं बेअसर होने लगीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक सर्वेक्षण के मुताबिक देश की राजधानी दिल्ली में 53 फीसदी लोग बिना डॉक्टरी परामर्श के एंटीबॉयोटिक दवाइयां ले रहे हैं। जबकि संगठन के निर्देशों में खांसी-जुकाम, सिरदर्द जैसे रोगों में एंटीबॉयोटिक दवाओं के सेवन की मनाही है। खुद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वीकार किया है कि भारत में 585 ऐसी दवाइयां खुलेआम बिक रही हैं जिन्हें केवल पंजीकृत डॉक्टरों की लिखी पर्ची पर ही बेचने की इजाजत है। दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधकता की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत में हर साल एक लाख टीबी के ऐसे मरीज बढ़ रहे हैं जिन पर टीबी की साधारण दवाओं का असर नहीं हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि भारत में एंटीबॉयोटिक दवाओं के दुरुपयोग से बहुत बड़ी संख्या में लोगों को जान का खतरा पैदा हो गया है। इसके चलते प्रथम पंक्ति की दवाइयों ने असर करना बंद कर दिया है। इससे निपटने के लिए डॉक्टर जिन दूसरी और तीसरी पंक्ति की दवाइयां लिख रहे हैं वे ज्यादा खतरनाक होने के साथ-साथ महंगी भी हैं। फिर जिन लोगों पर ये दवाएं बेअसर होती हैं उनके संपर्क में आने वाले लोग भी उन विषाणुओं से ग्रसित हो जाते हैं। यही कारण है कि संक्रमण से होने वाली बीमारियों पर काबू पाना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे में सरकार को सख्ती बरतनी चाहिए ताकि मेडिकल स्टोर्स से बिना डॉक्टरों की संस्तुति के एंटीबॉयोटिक दवाइयां न बेची जा सकें। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एंटीबॉयोटिक दवाओं के व्यापक दुरुपयोग की चुनौती इतनी बड़ी है कि इसका हल निकालना सिर्फ स्वास्थ्य विभाग के वश की बात नहीं रह गई है। सभी की भागीदारी से ही इस दिशा में कोई प्रगति होगी। भारत में साफ-सफाई की बदतर हालत को देखते हुए एंटीबॉयोटिक दवाएं उम्मीद की डोर बंधाती हैं लेकिन जिस ढंग से दवाएं बेअसर हो रही हैं उससे हम धीरे-धीरे एंटीबॉयोटिक पूर्व युग की तरफ बढ़ रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो लाइलाज संक्रामक रोगों के कारण होने वाली मौतें गरीबी उन्मूलन, विकास और स्वास्थ्य प्रयासों के रास्ते में रुकावट बन जाएंगी(रमेश दुबे,दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,18.4.11)।

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शनिवार, 16 अप्रैल 2011

16 एंटीबायोटिक दवाओं पर लगेगी रोक

राजधानी दिल्ली के आसपास स्थित अस्पतालों और सप्लाई वाले पानी में एनडीएम-1 बैक्टीरिया (दिल्ली सुपरबग) पाए जाने की खबर के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय हरकत में आ गया है।

‘सुपरबग’ जैसे और बैक्टीरिया पैदा न हों, इसके लिए मंत्रालय देश में पहली बार थर्ड जेनरेशन की सभी एंटी-बायोटिक दवाओं की सार्वजनिक बिक्री पर अंकुश लगाने जा रही है।

इस तरह की 16 एंटी-बायोटिक दवाओं की आम बिक्री पर रोक की अधिसूचना सोमवार को जारी होने वाली है। यह जानकारी ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) के प्रमुख सुरिंदर सिंह ने एक विशेष बातचीत में दी।

उन्होंने बताया कि एक बार अधिसूचना जारी होने के बाद इस श्रेणी की दवाएं सिर्फ ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) अपोलो, लीलावती और क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज (सीएमसी) जैसे मल्टी स्पेशिएलिटी अस्पतालों में ही वितरित की जा सकेगी।’

सुरिंदर सिंह ने आगे कहा कि ये सभी एंटी-बायोटिक दवाओं के पैकिंग में भी खास बदलाव किया जा रहा है। इस श्रेणी की सभी लाल रंग की विशेष पैकिंग में ही वितरित की जाएंगी।
‘भास्कर’ के पास मौजूद अधिसूचना के अंतिम प्रारूप की प्रति के अनुसार, थर्ड जेनरेशन की इन 16 एंटी-बायोटिक दवाओं में मेरोपेनन, इमीपेनम, एरटापेनम, डोरीपेनम, फेरोपेनम, पोलिमिक्सिन बी, कोलिस्टिन, वेंकोमाइसिन, टैकोप्लेनिन, लिनजोलिड, टाइसाइक्लिन, एजट्रिओनम, केफेपाइम, सेफाइरोम, मॉक्सीफ्लोक्सिन और गैमीफ्लैक्सोसिन हैं।

एम्स में मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ. रणदीप गुलेरिया का कहना है कि देश में सुपरबग जैसे बैक्टीरिया के पैदा होने का सबसे बड़ा कारण थर्ड और फोर्थ जेनरेशन की एंटी-बायोटिक दवाओं का धड़ल्ले से इस्तेमाल ही है।

किसी भी छोटे-मोटे संक्रमण के लिए भी एक नर्सिग होम से लेकर मामूली अस्पताल तक में सबसे ताकतवर एंटी-बायोटिक दवाएं दे दी जा रही हैं। डॉ. गुलेरिया का कहना है कि एक बार कोई बैक्टीरिया सबसे ताकतवर एंटी-बायोटिक दवाओं का आदी हो जाता है, तभी वह सुपरबग जैसे बैक्टीरिया का रूप लेता है।

यही वजह है कि इन एंटी-बायोटिक दवाओं के सार्वजनिक इस्तेमाल पर रोक का कदम एकदम सही है(प्रदीप सुरीन, दैनिक भास्कर,दिल्ली,16.4.11)।

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शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

बचिए अंधाधुंध एंटीबायोटिक से

डब्ल्यूएचओ द्वारा मनाये जाने वाले वि स्वास्थ्य दिवस (सात अप्रैल) की इस बार की थीम 'एंटी माइक्रोबीयल रेसिस्टेंस' के खतरे से लोगों को आगाह कराना है। इसके प्रति सरकार, चिकित्सक, दवा निर्माताओं, दवा विक्रेताओं और मरीजों को जागरूक करने के कार्यक्रम में चलाये जा रहे हैं। हमारे देश में भी फर्जी चिकित्सकों और मरीजों में जानकारी के अभाव से इन दवाओं का अनावश्यक प्रयोग बढ़ गया है, जिसका भविष्य में दुष्प्रभाव यह पड़ेगा कि बीमार होने पर कोई दवा असर नहीं करेगी। मरीज लम्बे समय तक बीमार रहें गे औ र रोगों के प्रसार पर शीघ्र नियंतण्रनहीं पाया जा सकेगा। उत्तर प्रदेश के मरीजों में एंटीबायोटिक दवाओं के असर को लेकर किये गये एक अध्ययन के नतीजे भी भविष्य के इस खतरे की ओर संकेत कर रहे हैं।

हो सकता है आपको वायरल फीवर हो और डाक्टर एंटीबायोटिक की हैवी डोज दे, फिर भी आपको आराम न मिले। यानी आप भी प्रदेश के सौ में से उन अस्सी लोगों में शामिल हैं, जिनके शरीर पर एंटीबायोटिक का असर नहीं पड़ता। इसकी वजह ज्यादा व गलत तरीके से एंटीबायोटिक का सेवन करना है। संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में उत्तर प्रदेश के मरीजों पर किये गये अध्ययन की रिपोर्ट इस खतरनाक सच का खुलासा करती है। माइक्रोबायोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर डाक्टर टी एन ढोल बताते हैं कि प्रदेश के लोगों में अपनी मर्जी से एंटी माइक्रोबीयल ड्रग (एंटीबायोटिक, एंटी फंगल,पैरासाइटिक और एंटी वायरल) लेने की प्रवृत्ति इतनी बढ़ गयी है कि उन पर दवाओं का वांछित असर नहीं होता है। जैसे एंटीबायोटिक मेडिसिन सिप्रोफ्लॉक्ससिन का ड्रग रेसिस्टेंस अस्सी फीसद पाया गया। इसका मतलब यह हुआ कि सौ लोगों को सिप्रोफ्लॉक्ससिन की डोज देने पर मात्र 20 लोगों पर ही इसका असर होता पाया गया। बाकी 80 लोगों ने गैर जानकारी में जरूरत न होने पर भी इस दवा का सेवन कर अपने शरीर में इस दवा के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न कर ली थी। अध्ययन में एंटीबायोटिक जेन्टामाइसिन का असर सौ में मात्र 60 लोगों में पाया गया। एक समय आम प्रयोग की सामान्य दवा बन चुकी एम्पीसिलिन व पेन्सिलिन के प्रति सौ फीसद रेसिसटेंस पाया गया यानी ये दवाएं प्रदेश के लोगों पर पूरी तरह बेअसर हो गयी हैं। चिकित्सकों द्वारा खूब इस्तेमाल की जाने वाली एंटीबायोटिक ईएसबीएल भी अब मात्र बीस फीसद लोगों पर असर करती है। यह अध्ययन बताता है कि किस तरह लोग अपनी आधी- अधूरी जानकारी से भविष्य के लिए ऐसा संकट खड़ा कर रहे हैं, जिसको दूर करने का कोई उपाय नहीं है। अगर एंटीबायोटिक दवा के प्रति शरीर में प्रतिरोधक क्षमता बन जाएगी तो जरूरत पड़ने पर छोटी सी बीमारी भी जानलेवा बन सकती है। दवा विक्रेता अमित केसरवानी बताते हैं कि पेट गड़बड़ होने पर लोग नारफ्लाक्स टीजेड खरीदने आते हैं। अगर चोट लगने से घाव हो गया या एक-दो दिन फीवर रहता है तो बिना चिकित्सक की सलाह लिए खुद ही एंटीबायोटिक दवा खरीद लेते हैं। वह बताते हैं कि सिप्रोफ्लॉक्ससिन, नारफ्लाक्स टीजेड, ओफ्लाक्सासिन, राक्सिथ्रोमाइसिन जैसी एंटीबायोटिक को लोग मनमर्जी से खरीद कर इस्तेमाल करते हैं। यही नहीं, चिकित्सकों के परचे पर भी एंटीबायोटिक जरूर होती है। इस विषय में एक एमडी (मेडिसिन) डिग्रीधारी चिकित्सक अपनी मजबूरी बताते हुए कहते हैं कि बुखार से पीड़ित मरीज को केवल पैरासिटामॉल लिखें तो उसे लगता है कि ये तो वह अपने से खाकर ठीक हो सकता है। इसलिए एंटीबायोटिक भी लिखते हैं ताकि उसे फीस देना न अखरे(रेखा सिन्हा,राष्ट्रीय सहारा,लखनऊ,7.4.11)।

दैनिक भास्कर,अमृतसर संस्करण(7.4.11) में रविंदर शर्मा की यह रिपोर्ट भी देखिएः
70 साल पहले खोजी गई एंटीबायटिक दवाओं का अब इंसान के साथ-साथ जानवरों पर भी असर घटने लगा है। इसके चलते विश्व में 4.40 लाख मल्टी ड्रग टीबी संक्रमित हो गए हैं। मरीजों पर एंटीबायटिक का असर कम होने के चलते विश्व में हर साल 1,50,000 से अधिक मौतें हो रही हैं।

विश्व स्वास्थ्य आर्गेनाइजेशन ने इसे गंभीरता से लेते हुए इस बार विश्व स्वास्थ्य दिवस को एंटीबायटिक को समर्पित किया है। डब्लूएचओ ने विश्व स्वास्थ्य दिवस का मोटो ‘नो एक्शन टू डे-नो क्योर टू मारो’ रखा है। इसका मतलब है कि अगर इस संबंध में हम आज गंभीर नहीं हुए तो आने वाले समय में हमें पछताना पड़ेगा।

आईसीयू के मरीजों पर असर
अस्पतालों में दाखिल मरीजों विशेषकर बहुत लंबे समय तक आईसीयू में रहने वालों पर एंटीबायटिक का असर नहीं होता। इसके चलते कोई भी दवा उन पर असर नहीं करती, जिससे कई बार मरीज की मौत भी हो जाती है।

क्लोरोकुनीन व आर्टीसीमिन असरहीन
मलेरिया की रोकथाम और इसके इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली क्लोरोकुनीन का असर लगभग खत्म हो गया है। इस कारण मलेरिया का इलाज सरकार के लिए एक बहुत बड़ी समस्या बन गई है। लोगों की तरफ से आर्टीसीमिन का ज्यादा देर तक सेवन करने के कारण ही इसका भी असर खत्म हो चुका है।

केमिस्ट से दवा लेना घातक
अकसर कुछ लोग बीमार होने पर खुद ही कैमिस्ट के पास दवा लेने पहुंच जाते हैं। कैमिस्ट भी बिना पर्ची मरीज को एंटीबायटिक व अन्य दवाओं का लिफाफा थमा देते हैं। इस तरह दवाई लेना सेहत के लिए ही नहीं, बल्कि जिंदगी के लिए भी खतरनाक हो सकती है।

पशुओं पर भी असर-हीन होने लगा एंटीबायटिक
इंसानों के साथ-साथ पशुओं पर भी एंटीबायटिक दवाओं का असर घटने लगा है। इसका कारण दवाओं की गुणवत्ता का सही नहीं होना है। इसके चलते पशुओं को होने वाली बीमारियां इंसानों को भी होने लगी हैं। मेडिकल शिक्षा और शोध विभाग के डायरेक्टर डा. जयकिशन ने कहा कि इस पर रोक लगाने के लिए इंफेक्शन कंट्रोल कमेटी और एंटीबायटिक कमेटी का गठन किया जाना चाहिए। जिसमें नेता, दवाओं के निर्माता, लोग, मरीज, डाक्टर, नर्सें और फार्मासिस्ट शामिल हों।

क्या है एंटीबायटिक ?
एंटीबायटिक अर्थात एंटी माइक्रो-बॉयोलॉजी की शोध से गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लोगों को मौत के मुंह से निकाला जा सकता है। बैक्टिरिया, फंगस, परजीवी कीड़ों और वायरस वाली बीमारियों से पीड़ितों के इलाज के लिए एंटीबायटिक दवा दी जाती हैं। एंटीबायटिक की सही मात्रा और निर्धारित समय तक लेने से मरीज को बहुत फायदे मिलते हैं।

इसी अखबार में करनाल से प्रवीण अरोड़ा की रिपोर्ट भी चिंताजनक हैः
इन दिनों लोग एंटीबायोटिक दवाओं का अधिक सेवन कर रहे हैं। मामूली खांसी, जुकाम में भी एंटीबायोटिक दवा ले रहे हैं। अपने आप ही केमिस्ट से एंटीबायोटिक दवा खरीदकर ले ली जाती है, यानि कि डाक्टर की सलाह की भी जरूरत नहीं समझी जाती। यही नहीं कई डाक्टर भी रोगियों को एंटीबायोटिक दवा ही लिखकर देते हैं। जाने अनजाने लोग एंटीबायोटिक दवाओं का अधिक सेवन कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि एंटीबायोटिक दवाओं के अधिक सेवन से धीरे-धीरे दवाओं का शरीर पर असर होना कम हो जाता है, जोकि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। सवाल यह पैदा होता है झ्रिक इसके लिए जिम्मेदार कौन है। वे डाक्टर जो बिना रोगी को जांचे एंटीबायोटिक दवा दे रहे हैं या फिर वे लोग जो अपनी मर्जी से कोई न कोई एंटीबायोटिक का सेवन कर रहे हैं। वे ये भी जानने का प्रयास नहीं करते हैं कि इन दवाओं का उनके शरीर पर क्या असर होता है।

डाक्टर नहीं करते मरीज की कल्चर रिपोर्ट
रोगी पर एंटीबायोटिक दवा का असर पता करने के लिए कल्चर रिपोर्ट की सुविधा है, लेकिन कई डाक्टर इस सुविधा का प्रयोग नहीं करते। रोगी को पांच, सात व दस दिन की दवा देने के बाद भी असर न होने के बाद भी कल्चर रिपोर्ट नहीं करवाई जाती है। कई डाक्टर तो कल्चर रिपोर्ट करवाकर यह जान लेते हैं कि किस वजह से शरीर पर एंटीबायोटिक दवा का असर क्यों नहीं हो रहा है।

एंटीबायोटिक लेने की स्टेज से पहले ही हो जाते हैं आदी: करनाल सिविल अस्पताल के वरिष्ठ फिजिशियन डा. संजीव ग्रोवर के अनुसार अधिक एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन करने से बीमारी के कीटाणुओं पर दवा का असर कम हो जाता है। व्यक्ति एंटीबायोटिक लेने की स्टेज से पहले ही इतनी एंटीबायोटिक दवा का सेवन कर चुका होता है, जिससे बॉडी एंटीबायोटिक की रिस्सटेंट हो चुकी होती है। जब एंटीबायोटिक दवा की जरूरत होती है तब तक उस दवा का असर रोगी के शरीर पर कम होता है। इसके लिए फिर नई व महंगी दवा का प्रयोग किया जाता है।

बरतें एहतियात
एंटीबायोटिक दवा का सेवन करने से पहले डाक्टर की सही सलाह का अनुसरण करें एंटीबायोटिक दवा का अधिक सेवन हानिकारक है, इसलिए एंटीबायोटिक दवा का गलत प्रयोग नहीं होना चाहिए। यदि दवा का असर नहीं हो रहा है तो कल्चर रिपोर्ट जरूर करवा लें। गला खराब, वायरल इंफेक्शन, खांसी, जुकाम में एकदम से एंटीबायोटिक का सेवन नहीं करना चाहिए।

एंटीबायोटिक दवाओं का अधिक सेवन करने से बॉडी उस दवा की रिस्सटेंट हो जाती है, जोकि गलत है। लोगों को डाक्टर की सलाह के बिना एंटीबायोटिक दवा का सेवन नहीं करना चाहिए-डा. वंदना भाटिया, सिविल सर्जन करनाल

नवभारत टाइम्स में नीतू सिंह की रिपोर्ट भी देखिएः
नजफगढ़ में रहने वाले राजेंद्र सिंह को पिछले साल सर्दी , जुकाम हुआ था। उन्होंने डॉक्टर को दिखाया तो पता लगा कि गले में बैक्टीरियल इन्फेक्शन हो गया है , इसलिए डॉक्टर ने पांच दिन की ऐंटिबायॉटिक लिख दी।

पांच दिन दवा खाने के बाद राजेंद्र डॉक्टर के पास नहीं गए। चूंकि उन्हें तबियत पूरी तरह ठीक नहीं लग रही थी इसलिए वही ऐंटिबायॉटिक तीन दिन और खा ली। उसके बाद उनके घर में ही नहीं , आस - पड़ोस में भी किसी को वायरल होता तो वो वहीं ऐंटिबायॉटिक लेने की सलाह दे डालते। बिना यह जाने कि इन्फेक्शन वायरल है या बैक्टीरियल , जबकि वह काफी पढ़े - लिखे और पेशे से टीचर हैं।

इसी तरह रोहिणी में रहने वाली आशिमा को जॉन्डिस हुआ। डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने एक आयुर्वेदिक और एक एलोपैथी की दवा लेने की सलाह दी , क्योंकि इनके अलावा जॉन्डिस की कोई दवा अब तक उपलब्ध नहीं है। एक हफ्ते तक तबियत में सुधार नहीं हुआ तो उनका पूरा परिवार डॉक्टर को कोसने लगा। सब अपने - अपने अनुभव बताने लगे कि मेरे फलां जानकार ने जॉन्डिस होने पर जिस डॉक्टर को दिखाया था उसने पहले दिन से ही इतनी तगड़ी - तगड़ी एंटीबायोटिक्स दीं कि दो दिन में ही आराम हो गया। हालांकि आशिमा ने अपने डॉक्टर की ही दवा जारी रखी और वह उसी से ठीक हो गईं , हां वक्त जरूर लगा।

ये दोनों मामले सिर्फ एक उदाहरण हैं। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक यहां 90 पर्सेंट लोग इसी तरह के एटिट्यूड वाले हैं। उन्हें लगता है कि एक जैसी दिखने वाली हर किसी की बीमारी का एक ही इलाज है और जो डॉक्टर जितनी जल्दी तगड़ी दवाई लिखकर तुरंत ठीक कर देता है वही सबसे जानकार है।

लोगों की मानसिकता से डॉक्टर भी कम प्रभावित नहीं है , खासतौर से नए डॉक्टर। यही वजह है कि तमाम जरूरी दवाओं के प्रति तेजी से प्रतिरोधक उत्पन्न होने लगे हैं , जो कि इनको निष्क्रिय बना रहे हैं।

मेदांता मेडिसिटी के एक्सपर्ट डॉ . राजीव पारख कहते हैं कि बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी ऐंटिबायॉटिक लेना फायदे के बजाय नुकसान पहुंचा सकता है। आर्टमिस हॉस्पिटल के एक्सपर्ट डॉ . अनिल ढल कहते हैं कि ऐंटिबायॉटिक का सबसे ज्यादा दुरुपयोग वायरल के मामलों में देखा जाता है , जबकि वायरल इन्फेक्शन में ऐंटिबायॉटिक दवाओं से कोई फायदा नहीं होता , उलटे ये समस्या को और बढ़ा सकती हैं।

ऐसे में बिना बीमारी की सही स्थिति जाने कोई भी दवा लेना खतरनाक हो सकता है। दिल्ली डेंटल काउंसिल के अध्यक्ष डॉ . अनिल चांदना कहते हैं कि दांतों या मसूढ़ों के इन्फेक्शन के मामले में अक्सर ऐसा देखा जाता है कि मरीज को पांच दिन की ऐंटिबायॉटिक लिखो तो वह उन्हें खाने के बाद अपनी मर्जी से तीन दिन और जरूर खा लेता है।

फॉलोअप के लिए भी तब आता है जब दोबारा तकलीफ हो। यह तरीका बहुत गलत है। दिल्ली हार्ट एंड लंग इंस्टिट्यूट के अध्यक्ष डॉ . के . के . सेठी कहते हैं कि समस्या के लिए डॉक्टर और आम लोग दोनों में जानकारी का अभाव जिम्मेदार है , उन्हें इस बारे में जागरूक करना चाहिए।

पिछले दिनों ऐंटिबायॉटिक रेजिस्टेंस का मामला दुनिया भर में काफी चर्चा का विषय रहा था। ऐसे में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने इस बार विश्व स्वास्थ्स दिवस के लिए इसी समस्या को थीम बनाकर इस बारे में जागरूकता अभियान छेड़ने का ऐलान किया है।

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बुधवार, 16 मार्च 2011

पस में एंटीबायोटिक

आपने देखा होगा कि कई बार फोड़े-फुंसी होने या चोट वगैरह लगने के बाद जख्मों पर हल्के पीले-सफेद रंग का (कभी-कभी हल्का हरा-भूरा भी) द्रव जमने लगता है जिसे "पस" (मवाद) कहते हैं। लेकिन क्या आप जानते हो कि यह क्यों और कैसे बनता है? आज इसी बारे में बात करते हैं। 

जब हमारे शरीर पर फोड़े-फुंसी हो जाते हैं या चोट आदि के कारण त्वचा कट-फट जाती है तो कई दफा सही तरह से देखभाल के अभाव में ऐसे खुले हिस्सों में बीमारियां फैलाने वाले बैक्टीरिया का संक्रमण होने लगते हैं। ऐसी स्थिति में इन खतरनाक बैक्टीरिया से निपटने के लिए हमारे शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली काम करने लगती है। प्रकृति ने हमारे शरीर में ऐसी व्यवस्था की हुई है कि जैसे ही इस तरह के बैक्टीरिया हमारे शरीर को हानि पहुंचाने की कोशिश करते हैं तो हमारे रक्त में मौजूद श्वेत रक्त कोशिकाएं इन बैक्टीरिया से लड़कर इन्हें खत्म करने लगती हैं।

शरीर पर घाव आदि होने पर ये श्वेत रक्त कोशिकाएं बैक्टीरिया को समाप्त करने के लिए उसके आस-पास मोर्चा संभालकर घेराबंदी करने में जुट जाती हैं। शरीर में घुस आए इन दुश्मनों को मार भगाने के लिए ऐसे स्थान पर सामान्य से बहुत अधिक मात्रा में श्वेत रक्त कोशिकाएं जमा हो जाती हैं। इस तरह, एक ओर बैक्टीरिया शरीर को नुकसान पहुंचाने का प्रयास करते हैं और दूसरी ओर श्वेत रक्त कोशिकाएं शरीर की रक्षा कर रही होती हैं। दोनों तरफ से जमकर "युद्ध" होता है। इस लड़ाई में बहुत-से बैक्टीरिया मारे जाते हैं और कई श्वेत रक्त कोशिकाएं भी "शहीद" हो जाती हैं। इस दौरान मारे गए बैक्टीरिया और नष्ट होने वाली कोशिकाएं पस के रूप में शरीर से बाहर आते रहते हैं। यह भी हमारे शरीर की एक खासियत है कि वह बेकार की चीजों को पसंद नहीं करता और उन्हें जल्दी से जल्दी शरीर से बाहर भेजने का प्रयास करता है। पस के मामले में भी यही होता है। बैक्टीरिया और कोशिकाओं का यह युद्ध लगातार तब तक चलता रहता है, जब तक कि फोड़े-फुंसी या घाव से सभी बैक्टीरिया का सफाया नहीं हो जाता। कई बार जब शरीर की इस प्रतिरोधक प्रणाली से भी बात नहीं बनती या बैक्टीरिया इस पर हावी होने लगते हैं तो हमें डॉक्टर की दी हुई दवाओं का सहारा लेना पड़ता है। इन एंटीबायोटिक दवाओं के प्रयोग से शरीर की प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ जाती है और शरीर बैक्टीरिया के दुष्प्रभाव से मुक्त होकर स्वस्थ होने लगता है।
(राजीव शर्मा,नई दुनिया,15.3.11)

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शुक्रवार, 4 मार्च 2011

मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान का शोधःनैनो-पार्टिकल्स से बढ़ेगी एंटीबायोटिक दवाओं की क्षमता

शरीर में बायोफिल्म तैयार कर एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधी क्षमता हासिल करने वाले रोगाणुओं (माइक्रोव्स) के खिलाफ नैनो पार्टिकल्स एक कारगर उपाय साबित होंगे। मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआइटी) के अप्लाइड मेकेनिक्स विभाग में तीन एंटीबायोटिक दवाओं पर किए गए शोध में इस बात का पता चला है कि नैनो पार्टिकल में दवा देकर हानिकारक रोगाणुओं के सुरक्षा चक्र को भेदना संभव है। रोगों के लिए जिम्मेदार माइक्रोव्स (सूक्ष्म अणु जिनमें बैक्टीरिया या विषाणु भी शामिल हैं) शरीर में अपनी संख्या को बढ़ा लेते हैं, जिससे उनकी बायोफिल्म बन जाती है। यह बायोफिल्म दरअसल शुगर और प्रोटीन का एक सुरक्षा चक्र होती है। इसे भेद पाने में सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं बेअसर साबित हो जाती हैं। कई मामलों में तो सौ से हजार गुना ज्यादा पावर की एंटीबायोटिक देने के उदाहरण भी मिले हैं। शरीर में बायोफिल्म बना चुके इन माइक्रोव्स को भेद पाने में अक्षम एंटीबायोटिक दवाओं में बिना रासायनिक पदार्थ बढ़ाए हुए इनकी क्षमता बढ़ाने की जरूरत को देखते हुए एमएनएनआइटी के वैज्ञानिक डॉ. विष्णु अग्रवाल और उनकी टीम ने नैनो पार्टिकल्स का उपयोग किया। इसके लिए जेंटामाइसिन, सिप्रोफ्लोक्सिन और ओफ्लाक्सिन को चुना गया। प्रारंभ में कुछ वाह्य इम्प्लांट उपकरण जैसे कैथेटर, कांटैक्ट लेंस, ग्लूकोज चढ़ाने वाली निडिल आदि में माइक्रोव्स की बायोफिल्म तैयार की गई। इसके बाद इनमें उक्त तीनों औषधियों को सामान्य ढंग से प्रयोग किया गया। माइक्रोव्स के सुरक्षा कवच को यह दवाएं भेद नहीं पाई। कुछ मामलों ने इन्होंने माइक्रोव्स के किसी कंपोनेंट के साथ अभिक्रिया करके विपरीत प्रभाव भी दिया। प्रयोग के अगले चरण में इन दवाओं को नैनो पार्टिकल्स में रखकर बायोफिल्म में डाला गया। इस बार माइक्रोव्स के किसी भी कंपोनेंट के साथ इन दवाओं की अभिक्रिया तो रुकी ही, ये दवाएं बराबर सक्रिय रहीं और इन्होंने बायोफिल्म के जाल के समान सुरक्षा चक्र को भेद दिया। संक्रमण की स्थिति में नैनोपार्टिकल में दवा देकर कम समय में दवा की कम मात्रा के प्रयोग से अच्छे परिणाम मिले(दैनिक जागरण,इलाहाबाद,4.3.11)।

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शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

फार्मा कंपनियों के आगे झुकी सरकार !

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने फार्मा कंपनियों के दबाव में एंटी-बायोटिक दवाओं के इस्तेमाल को लेकर बनाए जा रहे नियमों को कमजोर कर दिया है। मंत्रालय ने एंटीबायोटिक के अंधाधुंध इस्तेमाल को हतोत्साहित करने के लिए जोर-शोर से कड़े प्रावधान का ऐलान किया था। लेकिन अब सरकार इससे पीछे हटती दिख रही है। नए नियमों को अगले दो-चार दिनों में अधिसूचित किया जाएगा लेकिन सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाली करीब 60 फीसदी एंटीबायोटिक दवाओं को इन नियमों से अलग रखा जा रहा है। सिर्फ 30-40 फीसदी महंगी और कम इस्तेमाल होने वाली दवाओं की बिक्री के लिए ही कड़े प्रावधान होंगे। स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार विशेषज्ञों ने एंटीबायोयिक दवाओं की बिक्री को लेकर जो सुझाव दिए थे उसके अनुसार इन्हें दवाओं की बिक्री के एच शिड्यूल से हटाकर एक नए शिड्यूल एचएक्स में रखने की बात कही थी। सभी अधिकारी इस पर सहमत थे। अभी एंटीबायोटिक एच शिड्यूल में हैं यानी उन्हें डाक्टर के लिखने पर ही केमिस्ट से खरीदा जा सकता है जबकि एक्स शिड्यूल में मार्फीन जैसी दवाएं रखी जाती हैं जिनकी बिक्री का पूरा रिकार्ड डाक्टर को रखना पड़ता है। डाक्टर ऐसी दवाओं के लिए दो पर्चे लिखता है। प्रस्तावित नियमों को लेकर फार्मा कंपनियों में भारी हलचल मची और इनके प्रतिनिधियों ने स्वास्थ्य मंत्रालय पर दबाव बनाया जो कामयाब रहा। अभी तक नए नियमों की अधिसूचना जारी नहीं हुई है लेकिन खबर है कि अब इसमें बदलाव कर दिया है। अब एचएक्स शिड्यूल बनाने का भी खयाल छोड़ दिया गया है बल्कि इसकी जगह एच-1 शिड्यूल बनेगा जिसमें जनरेशन-3 और फोर के एंटीबायोटिक को ही शामिल किया जाएगा(मदन जैड़ा,हिंदुस्तान,दिल्ली,17.11.2010)।

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मंगलवार, 2 नवंबर 2010

बिना पर्ची नहीं मिलेगी एंटीबायोटिक्स

अब सरकार ऐसे नियम बनाने जा रही है जिससे बिना पर्ची के मेडिकल स्टोर्स से आपको एंटीबायोटिक्स नहीं मिल सकेगी। और तो और आपको एक ही दवा अगर दोबारा खरीदनी हो तो आपको डॉक्टर से फिर से एक नई पर्ची लेनी होगी। भारतीय औषधि महानियंत्रक (डीसीजीआई) ने सिफारिश की है कि अब डॉक्टर एंटीबायोटिक्स दवाओं का नुस्खा लिखते समय दो पर्ची बनाएंगे जिसमें से एक पर्ची केमिस्ट को अपने पास दवा की बिक्री के दिन से लेकर एक साल तक रखनी होगा ताकि इनकी जांच-पड़ताल की जा सके। फिलहाल यह नियम अस्तित्व में है कि बिना पर्ची के कोई दवा विक्रेता एंटीबायोटिक्स न बेचे लेकिन इसका पालन कोई नहीं करता। नए कदम का उद्देश्य व्यापक पैमाने पर हो रहे एंटीबायोटिक्स के दुरुपयोग को रोकना है। इसके लिए जरुरी है कि अमरीका सहित पश्चिमी देशों की तरह दवा विक्रेता बिना डॉक्टर की पर्ची के एंटीबायोटिक्स बेचना बंद कर दें। एंटीबायोटिक्स को लेकर यह कदम हाल ही में सुपरबग की चर्चा के बाद शुरु हुआ है जिसके लिए भारत को दोषी ठहराया जा रहा है। सुपरबग के पनपने की वजह एंटीबायोटिक्स को ही माना जाता है। सुपरबग एनडीएम-1 यानी नई दिल्ली मेटैलो-बीटा-लैक्टामेज-1 एक ऐसा एंजाइम है जो अलग तरह के बैक्टीरिया के अंदर आसानी से रह सकता है। इस एंजाइम को जो भी बैक्टीरिया अपने साथ लेकर चलेगा उस पर कार्बापेनेम नामक सर्वाधिक शक्तिशाली एंटीबायोटिक का भी कोई असर नहीं होता है। विशेषज्ञों को डर है कि इस तरह ऐसे खतरनाक संक्रामक रोग पैदा हो सकते हैं जिनका इलाज लगभग नामुमकिन होगा। अलग अनुसूची : डीसीजीआई ने अपने फैसले को मजबूती से अमली जामा पहनाने के लिए ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत एंटीबायोटिक्स को एक अलग अनुसूची में रखने का फैसला किया है। नई अनुसूची में जिन 50-60 एंटीबायोटिक्स को रखने की बात कही गई है, उनमें 15 से 20 हैबिट फॉर्मिंग ड्रग (यानी लत पैदा करने वाली दवाइयां) भी शामिल हैं(दैनिक जागरण,भोपाल संस्करण,2.11.2010 में दिल्ली की ख़बर)।

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सोमवार, 20 सितंबर 2010

एंटीबायटिक का असर

कुछ ही वक्त पहले, शहद में एंटीबायटिक दवाओं की मौजूदगी की खबर ने हलचल मचाई थी। वैसे खोजा जाए तो कई खाद्य पदार्थों, खासकर पशुओं से प्राप्त होने वाले खाद्य पदार्थों में एंटीबायटिक मिल सकते हैं क्योंकि बीमारियों से बचाने के लिए पशुओं को उदारता से एंटीबायटिक दवाएं खिलाई जाती हैं । यह भी माना जाता है कि इंसानों को भी डॉक्टर कुछ ज्यादा ही एंटीबायटिक खिलाते हैं। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि लगभग 90 प्रतिशत एंटीबायटिक दवाओं का दुरुपयोग होता है । इस दुरुपयोग के कई बुरे नतीजे भी सामने आते हैं,खासतौर पर बैक्टीरिया में एंटीबायटिक के लिए प्रतिरोध पैदा हो जाता है और इससे उस एंटीबायटिक का असर कम हो जाता है । पिछले दिनों एक ‘सुपरबग’ की चर्चा भी जोरों पर थी यानी ऐसा बैक्टीरिया जिस पर आम एंटीबायटिक दवाओं का असर ही नहीं होता। ऐसे तगड़े ‘सुपरबग’ अक्सर पैदा होते रहते हैं । एंटीबायटिक दवाओं का एक आम दुष्परिणाम यह होता है कि रोग पैदा करने वाले बैक्टीरिया के साथ-साथ वह आंतों में मौजूद ऐसे बैक्टीरिया को भी मार देता है जो हमारे लिए फायदेमंद होते हैं। इसीलिए अक्सर इन दवाओं को लेने से पेट में गड़बड़ी या दस्त जैसी शिकायतें हो जाती हैं । इस बात की बारीकी से जांच के लिए अमेरिका में शोधकर्ताओं ने कुछ प्रयोग किए। उन्हें तीन लोगों को पांच दिन तक ‘सिप्रोफ्लॉक्सैसिन’ नामक एंटीबायटिक खिलाई । यह एंटीबायटिक आमतौर पर लाभदायक बैक्टीरिया के लिए ज्यादा नुकसानदेह नहीं मानी जाती। शोधकर्ताओं ने रोज इन लोगों के मल की जांच की। उन्होंने पाया कि पांच दिन में सभी तीन लोगों की आंतों में लाभदायक बैक्टीरिया पूरी तरह खत्म हो गए। दवा का इस्तेमाल रोकने के बाद भी कई दिन तक ये बैक्टीरिया फिर से नहीं पनप पाए। एक महिला की आंतों में बैक्टीरिया की सामान्य स्थिति बनने में महीनों लग गए। एंटीबायटिक दवाएं निश्चय ही बहुत फायदेमंद हैं और जबसे चिकित्सा विज्ञान में आई हैं तबसे इस क्षेत्र में क्रांति हो गई है । कई भयानक संक्रमण जो पहले लाइलाज थे, इनकी वजह से ठीक हो जाते हैं । सर्जरी भी इनकी वजह से बेहद सुरक्षित हो गई है । लेकिन एंटीबायटिक दवाओं के इस्तेमाल के पीछे यह विचार है कि सूक्ष्मजीव हमारे दुश्मन हैं और उन्हें मार डालना जरूरी है । अब चिकित्सा विज्ञान ने पाया है कि सूक्ष्मजीवों और हमारा रिश्ता जटिल है । वे हमारे शरीर में कई सारे काम करते हैं जो हमें अब तक समझ में नहीं आए हैं । जैसे कि इस शोध के एक शोधकर्ता ने क हा है कि हमारी आंतों का पारिस्थितिकी तंत्र या ‘इको सिस्टम’ दुनिया के सबसे जटिल ‘इको सिस्टम’ में से है। इसमें अंधाधुंध रूप से एंटीबायटिक डाल देना इस पूरे तंत्र को बिगाड़ देना है । इस तंत्र के बिगड़ने से सिर्फ पेट ही खराब नहीं होता, गंभीर बीमारियां भी हो सकती हैं । लाभदायक बैक्टीरिया हानिकारक बैक्टीरिया या दूसरे परजीवियों से बचाते हैं और हमारे रोग प्रतिरोधक तंत्र को मजबूत करते हैं । इनका नष्ट हो जाना कई सारी समस्याएं खड़ी कर सकता है । इसका अर्थ यह नहीं कि एंटीबायटिक दवाओं का बहिष्कार कर दिया जाए। इसका अर्थ यह है कि हम हमारे शरीर में मौजूदा सहजीवी सूक्ष्म जीवों की भूमिका को समझें और एंटीबायटिक दवाएं तभी लें, जब सचमुच उनकी जरूरत हो(संपादकीय,हिंदुस्तान,दिल्ली,20.9.2010)।

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सोमवार, 23 अगस्त 2010

एंटीबॉयटिक दवाओं की सीमाएं

वैज्ञानिकों ने एंटीबॉयटिक दवाओं की खोज करके एक बड़ा किला फतह कर लिया था लेकिन डॉक्टरों ने इन दवाओं का इतना ज्यादा इस्तेमाल किया कि बीमारी फैलाने वाले माइक्रोब्स ने एंटीबॉयटिक दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधात्मक शक्ति हासिल कर ली यानी तुम डाल-डाल तो हम पात-पात। हमारे शरीर माइक्रोब्स से भरे पड़े हैं और सारे के सारे माइक्रोब्स खराब नहीं होते कई अच्छे माइक्रोब्स भी होते हैं, मसलन कुछ माइक्रोब्स हमारी पाचन प्रक्रिया के लिए लाभदायक होते हैं। एंटीबॉयटिक दवाओं की खोज मनुष्य जाति के लिए वरदान साबित हुई थी क्योंकि इससे तमाम संक्रामक रोगों से मुक्ति पाने की आशा बंधी थी। मगर जैसे ही संक्रामक रोगों से लड़ने के लिए एंटीबॉयटिक दवाओं का इस्तेमाल शुरू हुआ, वैज्ञानिकों ने देखा कि पुराने माइक्रोब्स ने अपना रूपांतरण कर लिया है। मसलन पेंसिलीन की खोज एक क्रांतिकारी खोज थी मगर वैज्ञानिकों ने देखा कि कुछ ऐसे माइक्रोब्स सामने आ गए है कि पेंसिलीन तक का उन पर कोई असर नहीं पड़ता । माइक्रोब्स इतने सूक्ष्म होते हैं कि उन्हें माइक्रोस्कोप से ही देखा जा सकता है। वायरस और बैक्टीरिया माइक्रोब्स का ही रूप हैं जो किसी भी कोशिका में पहुंचकर शरीर को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देते हैं। ये हमारी त्वचा, मुंह और नाक के जरिए हमारे शरीर में पहुंच जाते हैं और फिर एक से दूसरे व्यक्ति में फैलने लगते हैं। इसीलिए आजकल डॉक्टर कहते हैं कि हर व्यक्ति से कम से कम एक हाथ की दूरी बनाकर बात करो। हमारी त्वचा इन माइक्रोब्स का प्रवेश रोकने में सबसे बड़े अवरोधक का काम करती रही है और फिर भी यदि माइक्रोब्स शरीर में दाखिल होते रहे तो एंटीबॉयटिक दवाओं ने उनका काम तमाम कर डाला। संक्रामक रोगों का फैलाव रोकने में एंटीबॉयटिक दवाओं ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई। इससे पहले भारत में भी अस्पताल संक्रामक रोगियों से भरे रहते थे और डॉक्टर उन्हें बचा नहीं पाते थे। निमोनिया के रोगी को बचाना भी मुश्किल था और अगर खुदा न खास्ता शरीर पर कोई घाव हो गया या वह थोड़ा सा भी कट गया तो टिटनेस और सेप्सिस से ग्रस्त रोगी कुछ ही दिनों का मेहमान रह जाता था। सन्‌ १९४० से १९८० के बीच कुछ नई एंटीबॉयटिक दवाओं की खोज ने जन स्वास्थ्य का नक्शा ही बदल डाला मगर इसके बाद कोई बड़ी खोज नहीं हो पाई। १९९० में एक नई किस्म की एंटीबॉयटिक की खोज जरूर हुई मगर बाजार में जो भी नई दवाएं आईं वे पुरानी दवाओं के ही प्रायः नए संस्करण थे। अब पेच यह है कि नई एंटीबॉयटिक दवाएं विकसित नहीं हो रही हैं,जबकि नए माइक्रोब्स सामने आ रहे हैं जिन्होंने उपलब्ध एंटीबॉयटिक दवाओं की सीमाएं स्पष्ट कर दी हैं। इस पृष्ठभूमि में नए संक्रामक रोगों का खतरा बढ़ रहा है। हाल ही में नई दिल्ली के नाम पर न्यू दिल्ली मेटेलो-बीटा-लेक्टामासे-१ (एनडीएम-१) नामक एक सुपरबग का पता चला है जिसका उत्स भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को बताया जा रहा है। इस सुपरबग की खोज करने वाली टीम में एक भारतीय का नाम भी आया है, जिसने बाद में इस शोध के निष्कर्षों से अपने आप को अलग कर लिया है। मगर यह सुपरबग ऐसा है जिस पर कोई भी मौजूदा एंटीबॉयटिक दवा असर नहीं करती। इस बग के कारण पेशाब की नली में संक्रमण होता है। भारत में साफ पानी और उचित सेनिटेशन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है इसलिए डॉक्टरों को डर है कि इस बग के कारण कहर टूट सकता है। ऐसा ही एक सुपरबग एमआरएसए नामक बैक्टीरिया को माना जाता है जो त्वचा और नाक के अंदर घुसकर उत्पात मचाता है। इस सुपरबग से त्वचा, सॉफ्ट टिश्यू, हड्डियों, फेफड़ों और हृदय के वॉल्व में संक्रामक बीमारी हो जाती है। इसकी काट के लिए मेथिसिलीन नामक दवा का प्रयोग शुरू किया गया मगर धीरे-धीरे सुपरबग ने इसके खिलाफ भी प्रतिरोधात्मक क्षमता हासिल कर ली। पश्चिमी देशों में एमआरएसए के कारण होने वाले संक्रामक रोग से लड़ने में आज अरबों डॉलर की राशि खर्च हो रही है। अमेरिका आदि में इसके कारण हर साल हजारों मौतें हो जाती हैं। प्रकृति ने मनुष्य को रोगों से लड़ने के लिए अपना प्रतिरक्षात्मक तंत्र दिया है। जैसे व्हाइट ब्लड सैल या लाइफोजाइम है जो बैक्टीरिया को काट देता है। एंटीबॉयटिक दवाओं ने जहां अनेक संक्रामक रोगों से मानव जाति को बचाया,वहीं शरीर की प्रतिरोधात्मक शक्ति को भी तहस-नहस कर डाला। जिस तरह मानव शरीर तापमान और पर्यावरण के अनुकूल अपने को अभ्यस्त कर लेता है, उसी तरह हमारे उदय के समय से ही माइक्रोब्स और उनके विरुद्ध शरीर की प्राकृतिक प्रतिरोधात्मक ताकत का भी विकास होता रहा। एंटीबॉयटिक दवाओं ने दोनों के बीच के संतुलन को नष्ट कर डाला और धीरे-धीरे होने यह लगा कि एंटीबॉयटिक दवाएं जब-जब भारी पड़ीं,माइक्रोब्स या बैक्टीरिया ने अपने को और ताकतवर बना लिया। जैसे सिंह पर सवार दुर्गा रक्तबीजों के सिर काटती थीं और तत्काल नए रक्तबीज पैदा हो जाते थे। सुपरबग इसी तरह के रक्तबीज हैं। इसलिए आज वैज्ञानिक कह रहे हैं कि एंटीबॉयटिक दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल रुकना चाहिए। आज डॉक्टर लोग खांसी-जुकाम और पेट के साधारण रोगों में भी मरीज को एंटीबॉयटिक दवाएं लिख देते हैं। दुनिया में एंटीबॉयटिक दवाओं का अरबों-खरबों का व्यापार है। दवा कंपनियां अपने मेडिकल-रिप्रजेंटेटिव के जरिए डॉक्टरों को प्रभावित करती हैं और अपने इन सेल्समैनों का वार्षिक टार्गेट बढ़ाती रहती हैं। इस पृष्ठभूमि में जिस मरीज का जुकाम जोशांदे से दो चार रोज में ठीक हो सकता है,उसे भी नाहक एंटीबॉयटिक दवाएं लेनी पड़ती हैं। एलोपैथी ने आयुर्वेद, यूनानी, प्राकृतिक चिकित्सा और होम्योपैथी को अवैज्ञानिक कहकर हाशिए पर डाल दिया है लेकिन एंटीबॉयटिक दवाओं की सीमाएं वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति पर फिर से पुनर्विचार करना होगा(संपादकीय,नई दुनिया,दिल्ली,23.8.2010)

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