रविवार, 21 अगस्त 2011

एंटीबायोटिकःक़ायदे जरूरी हैं ज़िंदगी के लिए

सरकार तीसरी पीढ़ी की एंटीबायोटिक्स को शेड्यूल एचएक्स के अंतर्गत लाना चाहती है ताकि बिना पर्ची के इनकी बिक्री न हो सके। इस कदम का रिटेल डिस्पेंसिंग केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन से लेकर ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट तक सभी विरोध कर रहे हैं। दरअसल हमारे देश में जितनी दवाएं पर्ची पर बिकती हैं उससे कहीं अधिक बिना पर्ची के ओवर द काउंटर बिक जाती हैं। इसमें अत्याधुनिक एंटीबायोटिक्स से लेकर नींद आने तक सभी तरह की दवाएं शामिल हैं। पहली और दूसरी पीढ़ी की एंटीबायोटिक्स दवाएं जब असर न करें तब तीसरी पीढ़ी की एंटिबायोटिक्स दी जानी चाहिए। किसी भी चिकित्सक के पास संक्रमण से निपटने का यह अंतिम हथियार होता है। अब हो यह रहा है कि मामूली संक्रमण के पहले हमले में ही तीसरी पीढ़ी की एंटिबायोटिक्स दी जाती है। मरीज़ भी चिकित्सक पर जल्दी से जल्दी ठीक होने के लिए दवाब बनाता है। चिकित्सक भी जल्दी में होता है। वह मरीज़ को प्राथमिक स्तर की दवाएं देकर समय नष्ट नहीं करना चाहता। इसका नतीजा यह है कि आज सैकड़ों मरीज़ एंटिबायोटिक्स दवाओं की चिकित्सा सीमाओं से बाहर आ गए हैं। अब उन पर कोई एंटिबायोटिक्स असर नहीं करतीं। किसी एंटीबायोटिक्स से ठीक नहीं होने वाले संक्रमणों को ही कुछ देशों ने "सुपरबग" कहा है। हमारे यहाँ एंटीबायोटिक्स के मनमाने उपयोग करने पर ही "सुपरबग" अस्तित्व में आया है। सरकार १६ तरह की दवाओं को रिटेल बाज़ार से हटाना चाहती है और शेड्यूल एचएक्स के "पार्ट ए" में रखना चाहती है। ये दवाएं अब केवल विशिष्ट श्रेणी की चिकित्सा प्रदान करने वाले अस्पतालों में ही मरीज़ों को दी जा सकेंगी। ७० किस्म की अन्य दवाएं "पार्ट बी" में रखी जाएंगी जो सिर्फ रजिस्टर्ड मेडिकल प्रेक्टिशनर्स के पर्चेपर ही बेची जा सकेंगी। ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) चिकित्सकों के पर्चों पर निगाह रखना चाहती है इसलिए नियमानुसार केमिस्ट को दो साल तक पर्ची संभालकर रखना होगी। एंटिबायोटिक्स के दुरुपयोग को रोकने के लिए उठाए जा रहे कदमों का खूब विरोध हो रहा है। रिटेल केमिस्ट किसी नियम क़ायदों में नहीं बंधना चाहते। पर्चियों का रेकार्ड रखना व्यावहारिक रूप से कठिन है। परिवार के हर सदस्य के बीमार पड़ने पर चिकित्सक की सलाह लेना और पर्ची पर दवाएं लिखवाना आर्थिक कारणों से सभी के लिए संभव नहीं होता। एंटीबायोटिक्स के मनमाने उपयोग पर लगाम कसने के ये नियम और क़ायदे लागू हो भी जाएं तब भी चिकित्सक और दवा विक्रेताओं का चतुर गठजोड़ इसका भी तोड़ निकाल ही लेगा(संपादकीय,सेहत,नई दुनिया,अगस्त तृतीयांक 2011)।

8 टिप्‍पणियां:

  1. सेहत से खिलवाड़ न होने पाए......

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  2. सरकार तो बहुत अच्छी योजनाएं चला रही है और एक अन्ना हैं कि सरकार को टेंशन दे रहे हैं और सरकार भी मजबूर होकर जो मुंह में आए बक रही है और शायद बग़ल में एक छुरी भी है और यह छुरी है इमेज की बलि चढ़ाने के लिए।
    अन्ना हजारे के आंदोलन के पीछे विदेशी हाथ बताना ‘क्रिएट ए विलेन‘ तकनीक का उदाहरण है। इसका पूरा विवरण इस लिंक पर मिलेगा-
    ब्लॉग जगत का नायक बना देती है ‘क्रिएट ए विलेन तकनीक‘ Hindi Blogging Guide (29)

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  3. मुझे लगता है कि यह एक ऐसा क़दम है जिसे दशकों पहले उठाया जाना चाहिए था।

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  4. आपके उपयोगी लेख के लिए आभार !

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  5. मैं भी ऐसा ही करता था, आगे से ध्यान जरुर रहेगा।

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  6. काश सरकार इन दवाइयों की क़ीमत कम करने पर भी ज़ोर दे

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  7. Aapka yh lekh aap aaj dekhiye Bloggers meet weekly (5) men .

    http://hbfint.blogspot.com

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  8. किसी एंटीबायोटिक्स से ठीक नहीं होने वाले संक्रमणों को ही कुछ देशों ने "सुपरबग" कहा है।
    उपरोक्त महत्वपूर्ण जानकारी हेतु धन्यवाद ......

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