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गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

रोग की पहचान के लिए वेगाटेस्ट

वेगाटेस्ट एक कंप्यूटराइज्ड इलेक्ट्रो डर्मल स्क्रीनिंग (सीईडीएस) मशीन है। मूलतः एक्युपंक्चर के सिद्घांत पर काम करने वाली यह मशीन विभिन्ना रोगों के कारण और उनका उपचार भी सुझाती है। एक बैंक मैनेजर को एकाएक दोनों लोअर लिंब्स में कमजोरी की शिकायत हुई। समस्या बढ़ने पर कई तरह के उपचार के बाद वेगाटेस्ट के जरिए जांच में सामने आया कि लिंब्स में कमजोरी का कारण मस्कुलर है, जिसकी वजह मर्करी टॉक्सिसिटी है। परीक्षण के दौरान पाया गया कि मरीज के दांतों में मर्करी फिलिंग्स हैं और चिकित्सक ने इसे हटाने की सलाह दी। कुछ समय बाद मरीज को गंभीर किडनी और लीवर इंफेक्शन की समस्या हुई, जिसकी वजह पुनः मर्करी इनटाक्सिकेशन पाई गई, जो कि मरीज के दांतों से मर्करी फिलिंग्स न हटाने की वजह से हुई। इसी तरह के कई अन्य केस हैं, जिसमें एक्युपंक्चर के सिद्घांत पर काम करने वाली मशीन रोग की पहचान और उसका निदान सुझाती है। इस मशीन की सहायता से एक एक्युपंक्चर पाइंट से ३,००० से भी ज्यादा एलर्जी टेस्ट किए जा सकते हैं। इस तरह से फंक्शनल गड़बड़ियों को जांचते हुए वेगाटेस्ट यह भी बताता है कि कौन सी थैरेपी मरीज के लिए सबसे बेहतर हो सकती है।

क्रानिक बीमारियों के कई कारण हैं, जिसमें बैक्टीरियल, फंगल, वाइरल के अलावा विभिन्ना कारकों से एलर्जी, मेटल टाक्सिसिटी, जियोपैथी स्ट्रेस, साइको स्ट्रेस, हार्मोनल असंतुलन और किसी पोषक तत्व की कमी भी बड़ी भूमिका रखती है। इसके अलावा इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक प्रदूषण भी एक बड़ा कारण है, जिसकी जांच वेगाटेस्ट के द्वारा ही संभव है। इस मशीन से जांच के दौरान कोई एक्युपंक्चर पाइंट चुना जाता है और इसे पेन इलेक्ट्रोड से स्पर्श किया जाता है। यह इलेक्ट्रोड बीमारी की सूचना और इसके कारण तुरंत मशीन तक ले जाती है(डॉ. निलेश पटेल,सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर,2012 प्रथमांक)।

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गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

स्लिपडिस्क का इलाज एक्यूप्रेशर से

आज दौड़ती ज़िन्दगी में पीछे छूट जाने का डर हमारी रफ्तार को बढ़ा देता है। कभी-कभी यह रफ्तार इतनी तेज हो जाती है कि हमें अपने या अपनों के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं मिलता। दौड़ते वक्त के साथ कदम मिलाकर चलने के लिए हमने जिस जीवन शैली के रंग में खुद को ढाल लिया है, उसने हमें कई तरह के रोग दिए हैं। जो हमारी गति को धीमा कर देते हैं। कुछ रोग जिनसे जीवन को ज्यादा खतरा होता है, उनकी चिंता तो हम करते हैं, पर कम तकलीफदेह छोटी-मोटी बीमारियों को लेकर लापरवाही कर जाते हैं। कमर, सिर, पीठ का दर्द ऐसी ही बीमारियां हैं। जब तक ये बीमारियां बहुत बढ़ नहीं जाती,कम ही लोग इनकी ओर ध्यान देते हैं। कुछ समय पहले तक कमर में दर्द होना बुढ़ापे की निशानी माना जाता था। आज लगभग हर उम्र का व्यक्ति इससे पीड़ित है। युवाओं से लेकर वृद्धों तक में यह बीमारी देखी जा सकती है। लगातार तेज गति का वाहन चलाने, बोझ लेकर आगे झुकने या अचानक बोझ उठाने से, गलत ढंग से बैठने, अधिक मोटापे जैसी कई वजहों से कमर में दर्द होता है। कमर के छल्लों के बीच में एक स्पंजनुमा गद्दी होती है। उसका किसी वजह से अपने स्थान से हटने से, छल्लों में कमजोरी या संक्रमण होने से कमर में दर्द का एहसास होता है। डॉक्टर इस बीमारी को स्लिपडिस्क कहते हैं। एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति में स्लिपडिस्क रोग का स्थायी समाधान खोजा गया है। यह चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद की मर्म दौड़ते वक्त के साथ कदम मिलाकर चलने के लिए हमने जिस जीवन शैली के रंग में खुद को ढाल लिया है, उसने कई तरह के रोग हमें दिए हैं। 

एक्यूप्रेशर एक ऐसा उपचार है, जिसे सीखकर व्यक्ति अपना उपचार खुद कर सकता है। एक्यूप्रेशर सेवा समिति जैसी कई संस्थाएं नि:शुल्क शिविरों के माध्यम से स्लिपडिस्क का इलाज भी करती हैं। शुरुआत में ही रोग का पता लगने परनाभि, पैरों के तलवों और कमर से संबंधित एक्यूप्रेशर बिंदुओं को दबाकर उसका समाधान कर दिया जाता है, पर रोग के बढ़ जाने पर कूपिंग मेथड, नर्वस स्टीमुलेटर, लेजर या एन.सी.वी. आदि से इसका परीक्षण किया जाता है। ठीक-ठीक पता लगने के बाद जहां पर डिस्क बलजिंग या डिस्क पर प्रेशर बढ़ रहा होता है वहां की नसों को माइक्रो एक्यूप्रेशर उपकरणों द्वारा उत्तेजित कर इलाज किया जाता है। मेडीनोवा पॉलीक्लीनिक के निदेशक डॉक्टर पीयूष त्रिवेदी माइक्रोएक्यूप्रेशर तकनीक को स्लिपडिस्क के उपचार के लिए कारगर मानते हैं। वे बतलाते हैं कि इस उपचार पद्धति में माइक्रो उपकरणों द्वारा विभिन्न तरंगें डिस्क तक पहुंचाई जाती हैं, जिससे वहां हलचल होकर एक्टिव ऑक्सीजन पैदा होती है एवं ऊर्जा का संचरण सुचारु रूप से होने लगता है। ऊर्जा के संचरण से डिस्क में न्यूक्लियस के प्रोटीग्लीकेस बॉड्स जुड़ना शुरू हो जाते हैं। इस उपचार विधि को 4 से लेकर 21 दिन तक नियमित रूप से करने से बिना किसी ऑपरेशन के स्लिपडिस्क रोग से मुक्ति पाई जा सकती है। बिना ऑपरेशन के, कम खर्चे में एक्यूप्रेशर द्वारा स्लिपडिस्क का स्थायी निदान हो सकता है(अहा ज़िंदगी,11.3.12)।

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सोमवार, 2 अप्रैल 2012

क्या करें जब दर्द सताए

रिलेक्स करें 
ध्यान से दिल की धड़कन कम होती है, ब्लड प्रेशर घटता है और साँसें भी नियंत्रित होती हैं, जिससे शरीर और मस्तिष्क में शांति आती है। एक वैज्ञानिक अध्ययन में यह बात पता चली है कि मेडिटेशन से दर्द सहने की शक्ति में निश्चित तौर पर इज़ाफा होता है। इससे दर्द के प्रति प्रतिक्रिया में ४० से ५० प्रतिशत तक की कमी आती है, इसलिए २० मिनट सुबह व २० मिनट शाम को ध्यान करने की आदत डालिए, जो भविष्य में आने वाले दर्द के दौरों को सहने में आपकी मदद करेगा।

दर्द का रिश्ता है नियमित व्यायाम से 
नियमित रूप से व्यायाम करने से दर्द सहने की क्षमता बढ़ती है, भले वह मूवमेंट की रेंज बढ़ाने वाली कसरतें हों, स्ट्रेंथनिंग कसरते हों या फिर एरोबिक्स। दर्द होने पर भी अपने जोड़ के मूवमेंट को बंद न करें नहीं तो जकड़न हो सकती है व जोड़ खराब हो सकता है। व्यायाम व दर्द के समय भी पीड़ित जोड़ की गतिशीलता बनाए रखने से - 

 - शरीर में एन्डॉर्फिन्स का स्तर बढ़ता है, जो शरीर के प्राकृतिक दर्द निवारक -शरीर की मांसपेशियां व लिगामेंट्स मज़बूत होते हैं। 

 - वज़न नियंत्रित होता है। अधिक वज़न भी अधिक दर्द का कारण होता है। 

 - दर्द से ध्यान हटाने में मदद मिलती है। 

 - व्यायाम,अपनी उम्र,शरीर की स्थिति व क्षमता के अनुसार तय किया जा सकता है।

एक्यूप्रेशर 
एक्यूप्रेशर भी कमोबेश एक्यूपंक्चर के सिद्धांत पर ही कार्य करता है। बस फर्क इतना है कि इसमें शरीर के निश्चित हिस्सों पर दबाव डालकर परिणाम प्राप्त किए जाते हैं। इसमें शरीर केनिर्धारित प्रेशर पाइंट्स पर दबाव डालकर दर्द कम करने वाले रसायनों के उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाता है। ये सभी उपाय कई प्रकार के दर्द जैसे सिरदर्द, कमरदर्द व आस्टियो-आर्थ्रराइटिस के दर्द से राहत पाने में मददगार हो सकते हैं, बशर्तें इन्हें किसी योग्य व प्रशिक्षित थैरेपिस्ट के मार्गदर्शन में लिया जाए। 

एक्यूपंक्चर 
चीन से प्रारंभ हुई इस पद्धति में शरीर के "एक्यूपाइंट्स"नामक ख़ास हिस्सों को सुइयों द्वारा सक्रिय किया जाता है, जिससे दर्द से मुक्ति मिलती है। चीनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस उपचार प्रक्रिया में ऊर्जा का स्वतंत्र प्रवाह होने लगता है। चीनी इस ऊर्जा को "चि" कहते हैं, जो शरीर के रोगमुक्त होने की प्रक्रिया को बढ़ावा देता है। इस संबंध में हुए अनेक वैज्ञानिक प्रयोगों में यह बात सामने आई है कि एक्यूपंक्चर द्वारा शरीर में से एन्डॉर्फिन्स अधिक मात्रा में निकलने लगते हैं, जो शरीर के प्राकृतिक दर्द निरोधक का कार्य करते हैं। इसी बारे में हुए एक शोध में एक अन्य प्राकृतिक दर्द निवारक एडीनोसीन के एक्यूपंक्चर के परिणामस्वरूप अधिक मात्रा में निकलने की बात पता चली है(डॉ. संजीव नाईक,सेहत,नई दुनिया,मार्च चतुर्थांक 2012)।

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रविवार, 8 मई 2011

"रेकी" है संवर्ग-विद्या का नया रूप

अथर्वा ऋषि प्रणीत अथर्ववेद सचमुच विलक्षण है। इस वेद में तरह-तरह की विद्याओं का वर्णन मिलता है। इन विद्याओं में कुछ के नाम हैं - प्राण विद्या, मधु विद्या, सम्मोहन विद्या, विकर्षण विद्या एवं संवर्ग विद्या आदि। पिछले कुछ वर्षों से अपने देश में जगह-जगह एक शब्द सुनने को मिलता है, नाम है रेकी। इसे करने वाले लोग "रेकी मास्टर्स" कहलाते हैं। इन तथाकथित मास्टर्स का कहना है कि यह विद्या जापान से आई जो सरासर झूठ है। दरअसल, इस विद्या का जिक्र हमें अथर्ववेद के तेरहवें अध्याय में मिला। जिस तरह श्री श्री रविशंकर पिछले कुछ वर्षों से "आर्ट ऑफ लिविंग" का जो प्रचार अपने नाम से कर रहे हैं, वह दरअसल महर्षि महेश द्वारा लिखित और सन्‌ १९६३ में प्रकाशित कृति "द सायंस ऑफ बीइंग एंड द आर्ट ऑफ लिविंग" से उठाई गई कला है, ठीक वही स्थिति रेकी मास्टर्स की भी है। अस्तु अब हम अथर्ववेद की संवर्ग विद्या की ओर आते हैं जो अंतःकरण की क्षमताओं की ओर संकेत करती है। अथर्ववेद कहता है कि किसी षड्यंत्रकारी ने यदि उत्कोच अर्थात घूस देकर अथवा फिर किसी अन्य उपाय से आपका अहित किया है तो आप किसी यक्ष का स्मरण कर ध्यानावस्था में रहते हुए यह आभास पा सकते हैं कि आपके खिलाफ कहां कौनसा कुचक्र हो रहा है। कुछ इसी तरह की विधायक विद्या है संवर्ग - विद्या जो उपनिषद् युगीन गाड़ीवान को आती थी। इस श्रमजीवी का नाम था - सयुग्वा रैक्व। सयुग्वा का अर्थ होता है गाड़ीवाक्ता। सयुक्वा रैक्व अपनी बैलगाड़ी पर ही रहता था और पागलों की तरह यहां-वहां गाड़ी लिए भागता-फिरता था। आज की "रेकी" का उत्स दरअसल उसी रैक्व ऋषि से हुआ जिसमें आप दूर बैठे हुए भी कल्पना की आंखों से अपने सुहृद अथवा सगे-संबंधी के लिए मंगल कामना कर सकते हैं। इसमें आप अपनी आंखों के समक्ष धवल गोल वृत्त बनाकर फिर ऊर्जा के उस गोले को अपनी बंद पलकों अथवा अपने वक्ष में तिरोहित होने देते हैं। अच्छा तो यह है कि आप इसे आधी रात के बाद करें। रेकी कोई अजूबा नहीं। रैक्व ऋषि ने विराट से झरती ऊर्जा को सीधे-सीधे ग्रहण करने की विधि अपनाई थी ऐसा इसलिए भी कि वह अपनी गाड़ी में ही सोता था। असल में हम लोगों को पता नहीं कि हम पर हजारों तरंगें लगातार बरस रही हैं। यह तो हमारे मस्तिष्क के स्नायुजाल की नैसर्गिक प्रतिभा है कि वह उनके दुष्परिणामों को जानता है और उन्हें स्वतः धकियाता रहता है, वह ऐसा न करे तो आधिग्रस्त हो जाए। किस तरंग को भीतर आने देना है और किस पर संतरण कर जाने देना है यह युक्ति हमारा मस्तिष्क जानता है। जैसा कि सर्फिग में होता है - इससे पहले कि एक बड़ी तरंग आकर हमें पछाड़े हम तत्काल पैंतरा बदल देते हैं।


यही कुछ आप द्वारा रचे षड्यंत्र या कुविचार के साथ भी होता है वह तत्काल लौटकर आप पर ही आक्रमण करता है। संवर्ग विद्या विधायक विद्या है। बाबर ने अपने बेटे हुमायूं के प्राणों की रक्षा के लिए रातभर जागकर जो कुछ किया होगा वह शायद यही संवर्ग विद्या रही होगी।

अभिनव गुप्त इस विद्या को आसाद्य नाम देते हैं। आसाद्य का मतलब है चारों ओर पूर्ण रूप से तरंगायित इसी ऊर्जा को पाने और अंतस्‌ स्नात करने की योग्यता। अभिनव गुप्त ने लिखा है कि ऊर्जा को दुलराकर पाने की भी एक विधि है। यदि हमें एकाग्र होकर उसे आत्मसात करने की युक्ति आती है तो ऊर्जा कब्रिस्तानों में बिल्कुल नहीं होती। बीती सदी में प्रकाशित कृति "द यूनीवर्स ऑफ एक्सपीरियंस" के लेखक डॉ. लैंसला-ह्वीट ने शिकायत भरे शब्दों में अफसोस जताते हुए लिखा था - काश, दुनिया भर में पसरे पड़े कब्रिस्तान और इतने तमाम मकबरे आदि अगर न होते तो जिंदगी शायद कुछ और आह्लादकारी होती(कैलाश वाजपेयी,नई दुनिया,दिल्ली,8.5.11)।

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रविवार, 26 दिसंबर 2010

एक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर

मॉडर्न मेडिसिन के अलावा एक्युपंक्चर और एक्युप्रेशर भी इलाज का बेहतरीन तरीका हो सकते हैं। इनमें बेशक इलाज में ज्यादा वक्त लगता है, लेकिन कोई साइड इफेक्ट नहीं होता। हमारे देश में ये सिस्टम बहुत चलन में नहीं हैं लेकिन चीन में ज्यादातर इन्हीं के जरिए इलाज किया जाता है। हालांकि अब ये तरीके अपने यहां भी इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं। एक्सर्ट्स से बात करके इन दोनों विधाओं की पूरी जानकारी दे रही हैं प्रियंका सिंह :

एक्युपंक्चर/एक्युप्रेशर का मतलब
एक्यु चीनी भाषा का शब्द है, जिसका मतलब है पॉइंट, यानी अगर शरीर के कुछ खास पॉइंट्स पर सूई से पंक्चर (छेद) कर इलाज किया जाए तो एक्युपंक्चर कहलाता है और अगर उन्हीं पॉइंट्स पर हाथ से या किसी इक्युपमेंट से दबाव डाला जाए तो एक्युप्रेशर कहलाता है। अगर पैरों और हाथों के पॉइंट्स को दबाते हैं तो रिफ्लेक्सॉलजी कहलाता है, जबकि मसाज के जरिए पूरे शरीर के पॉइंट्स दबाने को शियात्सु कहते हैं। अगर एनर्जी कम है तो क्लॉकवाइज और ज्यादा है तो एंटी-क्लॉकवाइज दबाया जाता है। इसके अलावा, प्रेस और रिलीज तकनीक भी अपना सकते हैं यानी कुछ देर के लिए पॉइंट को दबाएं, फिर छोड़ दें। ऐसा बार-बार करें।

कितना वक्त लगता है
शरीर में कुल 365 एनर्जी पॉइंट होते हैं। अलग-अलग बीमारी में अलग-अलग पॉइंट असर करते हैं। कुछ पॉइंट कॉमन भी होते हैं। एक्युपंक्चर का एक सेशन 40-60 मिनट का होता है और एक बार में 15-20 पॉइंट्स पर पंक्चर किया जाता है। एक्युप्रेशर में हर पॉइंट को दो-तीन मिनट दबाना होता है। आमतौर पर 3-4 सेशन में असर दिखने लगता है और 15-20 सिटिंग्स में पूरा आराम आ जाता है। हालांकि इलाज लंबा भी चल सकता है। एक सिटिंग के 500 से 1000 रुपये तक लिए जाते हैं। अच्छे डॉक्टर इलाज से पहले इलेक्ट्रो मेरिडियन इमेजिंग (ईएमआई) टेस्ट करते हैं, जिसमें एनर्जी लेवल और पॉइंट्स की जांच की जाती है।

एक्यु योग भी जानें
एक्युपंक्चर पॉइंट्स के साथ मिलाकर योग किया जाए तो एक्यु योग कहलाता है। जैसे कि एक्युपंक्चर या प्रेशर से शुगर के मरीज के स्प्लीन (तिल्ली) या पैंक्रियाज पॉइंट को जगाया जाता है और साथ में शलभासन कराया जाता है, जोकि स्प्लीन या पैंक्रियाज के लिए फायदेमंद है। अस्थमा में फेफड़ों के पॉइंट्स को दबाने के अलावा प्राणायाम कराया जाता है। अगर मरीज को योग और एक्युप्रेशर पॉइंट, दोनों की जानकारी हो तो अच्छा है।

टिप्स
कंक्रीट पर रोजाना 10-15 मिनट नंगे पैर चलें। ध्यान रखें कि जहां चलें, वह एरिया साफ-सुथरा हो ताकि पैरों को कोई चोट न पहंुचे। नंगे पैर चलने से तलुवों में मौजूद पॉइंट्स दबते हैं, जिससे खून का दौर बढ़ता है। इससे थकान और तनाव कम होता है और पैरों, घुटनों व शरीर के दर्द में राहत मिलती है। जो लोग नंगे पांव नहीं चलना चाहते, वे सरसों या किसी भी तेल से तलुवों की जोर-जोर से तब तक मसाज करें, जब तक कि उनसे गर्मी न निकलने लगे। एक्युप्रेशर चप्पलें भी फायदेमंद हैं।

नहाते हुए रोजाना तलुवों को ब्रश से 4-5 मिनट अच्छी तरह रगड़ें।

हफ्ते में दो बार सिर की 5-10 मिनट अच्छी तरह से मसाज करें। इसके अलावा सीवी 20 पॉइंट (जहां कई लोग चोटी रखते हैं) पर रोजाना 15-20 बार हल्के हाथ से मारें। इससे करीब 100 पॉइंट जागते हैं। डिप्रेशन से लेकर मेमरी लॉस, पार्किंसंस जैसी प्रॉब्लम्स में मदद मिलती है।

कान के नीचे वाले हिस्से (इयर लोब) की रोजाना पांच मिनट मसाज करने से याददाश्त बेहतर होती है। यह टिप पढ़नेवाले बच्चों के लिए बहुत उपयोगी है।

अगर भूख कम करनी है तो खाने से आधा घंटा पहले कान के बाहर छोटेवाले हिस्से (ट्राइगस) को दो मिनट उंगली से दबाएं। भूख कम लगेगी। यहीं पर प्यास का भी पॉइंट होता है। निर्जला व्रत में लोग इसे दबाएं तो प्यास कम लगेगी।

जीभ रोजाना अच्छी तरह से साफ करें। जीभ में हार्ट, किडनी आदि के पॉइंट होते हैं। जीभ की सफाई के दौरान ये दबते हैं।

तीखे किनारों वाले रोलर को हाथ पर फेरें तो कई दर्द गायब हो जाते हैं।

रोजाना 5-7 मिनट तालियां बजाएं। इससे हाथों में मौजूद एक्युप्रेशर पॉइंट जागते हैं।

स्टमक 36, रेन 6 और स्प्लीन 6 को टोनिफिकेशन पॉइंट कहा जाता है। इन्हें रोजाना एक-एक मिनट दबाएं तो कार्यक्षमता और इम्यूनिटी बढ़ती है। एनर्जी बनी रहती है।

नोट: ऊपर बताई गतिविधियां को करने से वाइट ब्लड सेल्स बढ़ते हैं, जो हमारे इम्यून सिस्टम को बेहतर करते हैं। ध्यान रखें कि इनसे पूरी बीमारी ठीक नहीं होगी, लेकिन राहत जरूर मिलेगी। बीमारी ठीक करने के लिए पूरा इलाज करना होगा।

ये पॉइंट्स हैं खास
एक्युप्रेशर/एक्युपंक्चर के कुल 365 पॉइंट्स में से कुछ ऐसे हैं, जो काफी असरदार होते हैं और कई तरह की बीमारियों में राहत दिलाते हैं। ये पॉइंट्स हैं :

जीवी 20 या डीयू 20
कहां : सिर के बीचोंबीच, जहां कई लोग चोटी रखते हैं।

उपयोग: याददाश्त बढ़ाता है, चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, हाइपर एक्टिविटी को कम कर मन को शांत करता है। पढ़नेवाले बच्चों के लिए खासतौर पर असरदार। यह सारे पॉइंट्स का कंट्रोलिंग पॉइंट भी है, इसलिए इसे हर बीमारी में दबाया जाता है।

जीबी 20
कहां : कान के पीछे के झुकाव में।

उपयोग: डिप्रेशन, सिरदर्द, चक्कर और सेंस ऑर्गन यानी नाक, कान और आंख से जुड़ी बीमारियों में राहत। दिमागी असंतुलन, लकवा, और यूटरस की बीमारियों में असरदार।

एलआई 11
कहां : एल्बो (कोहनी) क्रीज के बाहरी हिस्से पर।

उपयोग: कॉलेस्ट्रॉल, ब्लडप्रेशर, गले में इन्फेक्शन, यूरिन इन्फेक्शन, उलटी, डायरिया, हिचकी, पीलिया, खून की कमी आदि में। खून से संबंधित हर बीमारी में कारगर। इम्यूनिटी बढ़ाता है। यूबी 17 (बीएल 17) के साथ करें तो बेहतर है।

एसटी 36
कहां : घुटने से चार उंगली नीचे, बाहर की तरफ। इसे टोनिफिकेशन पॉइंट भी कहा जाता है। इस पर रोजाना मसाज करने से कई बीमारियों से बचा जा सकता है।

उपयोग: फौरन स्टैमिना बढ़ाता है। थकान और लंबी बीमारी के बाद ठीक होने में मदद करता है। पेट की बीमारियों और लूज मोशंस में असरदार। दस्त में स्टमक 25 (नाभि के दोनों तरफ तीन उंगली की दूरी पर) भी काफी फायदेमंद है।

लिव 3
कहां : पैर में अंगूठे और साथ वाली उंगली के बीच में, तीन उंगली ऊपर की तरफ।

उपयोग: इमोशन कंट्रोल, पीरियड्स की तकलीफ, शरीर में जकड़न और आंखों की बीमारियां में फायदेमंद। हेपटाइटिस, पीलिया, लिवर से जुड़ी प्रॉब्लम में असरदार।

चेतना पॉइंट
कहां : लेफ्ट हाथ में कलाई और कोहनी के बिल्कुल बीचोबीच।

उपयोग: 30-35 साल की उम्र के बाद इसे नियमित रूप से दबाने से बुढ़ापा आने की रफ्तार कम होती है। यह नींद लाने में भी मदद करता है।

किस बीमारी में कौन-सा पॉइंट कारगर
सिरदर्द
एलआई 4, आंखों के आसपास दर्द है तो लिव 3, सामने दर्द है तो एसटी 44, माथे में दर्द है तो जीबी 43, सिर के पीछे दर्द में यूबी 67, सिर से पॉइंट जितना दूर होगा, उतना फायदेमंद।

बदन दर्द
एसपी 21, जीबी 34, एलआई 4

सर्वाइकल, गर्दन में दर्द
एसआई 9, जीबी 21, एलयू 7, एसआई 3

घुटने में दर्द
एसटी 34, एसटी 36, एसपी 10, यूबी 40

कमर का दर्द
यूबी 23, यूबी 40, यूबी 57, यूबी 60, यूबी 61, जीबी 34, एसटी 36

पेटदर्द, गैस, एसिडिटी
एसटी 36, एलआई 4, पी 6, रेन 12

सर्दी-जुकाम और खांसी
डीयू 20, एलआई 4, एलआई 11, एलयू 7, स्प्लीन 10 (नी कैप पर दो इंच ऊपर) एलर्जी के लिए

उलटी
पी 6, एसटी 36, के1 (मॉर्निंग सिकनेस और ट्रैवल सिकनेस में भी असरदार)

लूज मोशंस
एसटी 36, लिव 13, रेन 6, स्प्लीन 4

आंखों की बीमारियां
एसटी 1, यूबी 1 (इसमें सूई न लगाएं), एसटी 1, जीबी 1, एक्स्ट्रा 1, यूबी 67

मुंहासे
एलआई 4, डीयू 20, एलआई 11, एसटी 6, एलयू 7

चक्कर आना
एलआई 4, सीवी 13, पी 6

याददाश्त बढ़ाना
डीयू 20, एक्स्ट्रा 1

जीवनी शक्ति बढ़ाने के लिए
एसटी 36, एलआई 11 और स्प्लीन 36

नींद न आना
डीयू 20, यूबी 62, हार्ट 7 (मन को शांत करता है)

स्त्री रोग और जनन संबंधी रोग
स्प्लीन 6, रेन 4, लिव 3

थकान
एसटी 36, रेन 6, चेतना पॉइंट

कॉलेस्ट्रॉल
सीवी 12, सीवी 13, लिव 13, यूबी 17

ब्लड प्रेशर
लिव 3, लिव 4, एलयू 9, डीयू 20, लिव 4 भी गुस्सा कम करता है और दिमाग को कंट्रोल में रखता है।

शुगर
एसपी 10, सीवी 12, लिव 13

अस्थमा
एलयू 6, एलयू 7, एलयू 9, एलआई 11, पी 6, रेन 17, रेन 22 (इमरजेंसी में बेहद कारगर)

पीलिया
लिव 3, लिव 14, हेपटाइटिस और लिवर से जुड़ी बाकी प्रॉब्लम्स में भी

लकवा
एलआई 4, एलआई 11, एलआई 15, एसटी 31, एसटी 32, एसटी 36, एसटी 41, स्प्लीन 6, लिव 3

कौन-सा पॉइंट कहां
एक्स्ट्रा 1
कहां : माथे पर, जहां महिलाएं बिंदी लगाती हैं।

एक्स्ट्रा 2
कहां : आंख के कोने से एक उंगली पीछे कान की तरफ।

एलआई 4
कहां : अंगूठे और इंडेक्स फिंगर (तर्जनी) को मिलाते हैं तो सबसे ऊंचे पॉइंट पर यह मौजूद होता है।

एलआई 20
कहां : नाक के साइड में, नथुने जहां खत्म होते हैं।

यूबी 40
कहां : घुटने के पीछे।

रेन 4
कहां : नाभि से चार उंगली नीचे।

रेन 6
कहां : नाभि से दो उंगली नीचे।

रेन 12
कहां : पेट के सामनेवाले हिस्से पर बीच में, नाभि और पसलियों के बीच।

रेन 17
कहां : दोनों निपल के बीच सीने की हड्डियों के बीच में।

रेन 22
कहां : गले के सामने वाले गड्ढे में।

जीबी 21
कहां : कंधे और गले के जोड़ के बीच में।

सीवी 12
कहां : नाभि से तीन उंगली ऊपर।

सीवी 13
कहां : नाभि से चार उंगली ऊपर।

लिव 6
कहां : काफ मसल के पास, टखने से आठ उंगली ऊपर।

लिव 13
कहां : 12वीं पसली के पास, जहां पेट के साइड में दोनों कुहनियां टच करती हैं।

लिव 14
कहां : सीने में सामने की तरफ, निपल लाइन से नीचे छठी और सातवीं पसली के बीच।

एलयू 6
कहां : कलाई से आठ उंगली ऊपर, थोड़ा-सा बाहर की तरफ।

एलयू 7
कहां : एलयू 9 से दो उंगली ऊपर।

एलयू 9
कहां : कलाई के जोड़ से जहां अंगूठा शुरू होता है, उससे एक इंच अंदर की तरफ।

एसपी 10
कहां : घुटने से चार उंगली ऊपर साइड में।

एसपी 21
कहां : सीने पर आठवीं पसली के दोनों तरफ।

यूबी 23
कहां : रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ दो उंगली साइड में, पसलियों के निचले हिस्से में।

यूबी 59
कहां : काफ मसल से थोड़ा नीचे।

यूबी 60
कहां : यूबी 59 से दो उंगली नीचे।

यूबी 61
कहां : पंजे की बाहरी साइड में, छोटी उंगली के पास एड़ी से थोड़ा अंदर।

एसटी 31
कहां : जांघ के ऊपरी हिस्से पर।

एसटी 32
कहां : घुटने से आठ उंगली ऊपर बाहर की तरफ।

कहां : घुटने से चार उंगली नीचे।
एसटी 41

कहां : टखने के सामने।
लंग 7

कहां : कलाई के जोड़ से दो उंगली ऊपर।
पी 6

कहां : कलाई के सामने वाले हिस्से पर, कलाई के जोड़ से तीन उंगली ऊपर।

स्प्लीन 6
कहां : पैर के सामनेवाले हिस्से में, टखने से चार उंगली ऊपर।

के1
कहां : पैर के तलुवे में बीच वाली उंगली से थोड़ा नीचे, जहां उठा हुआ हिस्सा होता है।

हार्ट 7
कहां : कलाई पर अंदर की तरफ, एलयू 7 के पास।
किसका मतलब क्या

जीवी : गवर्निंग वेल्स
जीबी : गॉल ब्लेडर
यूबी : यूरिनरी गॉल ब्लेडर
एलआई : लार्ज इंटेस्टाइन
लिव : लिवर
एसटी : स्टमक
पी : पेरिकाडिर्म

सावधानियां बरतें
एक्युपंक्चर हमेशा अच्छे क्लिनिक और क्वॉलिफाइड डॉक्टर से कराएं। साफ-सफाई का खास ध्यान रखें।

सूइयां फिर से इस्तेमाल न करें। खुद की इस्तेमाल की हुई सूइयां भी फिर से इस्तेमाल न करें। कई लोग कहते हैं कि ज्यादा इस्तेमाल के बाद ही सूइयां बेहतर काम करती हैं, लेकिन यह सच नहीं है। इस्तेमाल की हुई सूइयों को दोबारा इस्तेमाल करने से एड्स या हेपटाइटिस जैसी बीमारियां हो सकती हैं।

गलत पॉइंट दबाने से फायदा नहीं होगा लेकिन नुकसान भी नहीं होगा। एक्युप्रेशर/एक्युपंक्चर का कोई साइड इफेक्ट नहीं है।

एक्सपर्ट्स पैनल
डॉ. ओ. पी. छाबड़ा, कंसल्टिंग एक्युपंक्चरिस्ट, विमहैंस
डॉ. रवि के. तुली, होलिस्टिक मेडिसिन एक्सपर्ट
डॉ. जतिन चौधरी, स्पोर्ट्स मेडिसिन एक्सपर्ट व एक्युपंक्चरिस्ट
(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,26.12.2010)

नोटःजाने-माने चर्चाकार श्री मनोज जी ने इस पोस्ट को चिट्ठाचर्चा ब्लॉग पर दिनांक 27.12.2010 को लिया है जिसे यहां देखा जा सकता है।
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गुरुवार, 31 दिसंबर 2009