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गुरुवार, 10 जनवरी 2013

जब नाक कर दे हड़ताल

सूंघने की क्षमता आंशिक या पूरी तरह से खत्म होना एनॉस्मिया है। इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव मरीज की डाइट पर पड़ता है। खाने की खुशबू न ले पाने के कारण वे सेंस ऑफ टेस्ट भी खो देते हैं। कई बार एनॉस्मिया के कारण मरीज के सामने गंभीर हालात भी खड़े हो जाते हैं, जब गैस रिसने या इस तरह की स्थिति का मरीज को आभास भी नहीं हो पाता। 

हर खुशबू कुछ कहती है, तभी तो किसी खास खुशबू से हम किसी खास व्यक्ति या मौके को जोड़ पाते हैं। बहुत से लोग खुशबू से ही हांडी में पकती सब्जी का नाम बता देते हैं। कई बार सूंघ सकने की यही क्षमता खत्म हो जाती है। ऐसे में जल्दी ही मरीज की खाने-पीने में रुचि घट जाती है, जिसका गंभीर असर सेहत पर पड़ता है। कई केसेज में सेंस ऑफ स्मेल खत्म होने के कारण मरीज को अवसादग्रस्त होता भी देखा गया है। 

एनॉस्मिया के कारण 
सूंघने की क्षमता का संबंध ऑलफैक्टरी नर्व से होता है, जो नाक और मस्तिष्क से जुड़ी होती है। कोई भी गंध नाक से होकर मस्तिष्क तक जाती है। ऐसे में इस नर्व पर किसी भी तरह की चोट, सिर में चोट, केमिकल इंडस्ट्री में लंबे समय तक काम, फ्लू, साइनस इंफेक्शन, नाक का ट्यूमर, ड्रग्स लेना, कुछ खास तरह की दवाइयां और कीमोथैरेपी जैसे कई कारणों से गंध का अनुभव करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। यह कई तरह की होती है। जैसे सेंस ऑफ स्मेल आंशिक तौर पर घटने को हाइपॉस्मिया कहते हैं। कुछ लोग किसी खास गंध को महसूस नहीं कर पाते, जिसे स्पेसिफिक एनॉस्मिया कहते हैं और यह कंडीशन प्रायः आनुवंशिक होती है।

क्या है नुकसान 
एनॉस्मिया के मरीज खाने को नमकीन, मीठा, खट्टा या कड़वा तो महसूस कर पाते हैं लेकिन उसका फ्लेवर नहीं समझ पाते। इसका सीधा असर डाइट कम होने के रूप में दिखता है। मरीज कई बार घबरा भी जाते हैं और मानसिक परेशानियों से घिर जाते हैं। एनॉस्मिया से प्रभावित व्यक्ति गंध महसूस न कर पाने के कारण कई बार किसी गंभीर परेशानी में भी पड़ जाते हैं जैसे गैस लीकेज या बारूद आदि की गंध महसूस न कर पाना।  

इसके लक्षण 
इसकी पहचान का सबसे सीधा तरीका है गंध का अनुभव कर पाने की क्षमता में कोई बदलाव दिखना यानी घटना या खत्म होना। इसके अलावा कई बार अल्टर्ड सेंस ऑफ स्मेल जैसे केस भी होते हैं, जिसमें तेज गंध में लगातार रहने वाला व्यक्ति उस स्पेसिफिक गंध को अनुभव करने की क्षमता खो देता है। लक्षणों के आधार पर इसकी पहचान की जा सकती है. कई बार एमआरआई और सीटी स्कैन की जरूरत भी होती है। 

सुंदर, सुगंधित और स्वादिष्ट 
१. प्रिपरेशन के दौरान खाने में कई तरह के रंग वाली सब्जियां आदि शामिल करें ताकि खाना आकर्षक लगे। २. खाने में हींग या दूसरे मसालों के तड़के से उसकी सुगंध बढ़ाई जा सकती है। 
३. मरीज कांबीनेशन फूड अवॉइड करे क्योंकि अक्सर इससे रंग और फ्लेवर बदल जाता है। 

कीमो से संबंध 
कैंसर में रैपिड ग्रोइंग सेल्स को नष्ट करने के लिए कीमोथैरेपी दी जाती है। ऐसे में नाक की सेल्स और स्वाद-ग्रंथियां भी लगभग ७० प्रतिशत नष्ट हो जाती हैं, इस वजह से स्मेल और टेस्ट लॉस की समस्या मरीज के सामने आती है। यह स्थिति बहुत से मरीजों के लिए मानसिक प्रताड़ना की तरह होती है इसलिए कई बार इससे निबटने के लिए हम मरीज की काउंसलिंग करते हैं। उसके लिए खास डाइट प्लान करते हैं ताकि शरीर में प्रोटीन की कमी न हो। साथ ही तेज गंध वाला भोजन करने की सलाह देते हैं जैसे हींग की बघार आदि(डॉ. श्याम जी रावत,सेहत,नई दुनिया,जनवरी 2013 प्रथमांक)।

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बुधवार, 12 दिसंबर 2012

क्या आपको भी आवाज़ से चिढ़ है?

केस-१ 
आठ वर्षीय अंकित शर्मा का रुटीन अचानक तितर-बितर हो गया। वो खाने की टेबल पर शिकायत करने लगा कि सब इतनी आवाज करते हुए क्यों खा रहे हैं। यहां तक कि किसी के गहरी सांस लेने या टूथब्रश की आवाज़ पर भी अंकित को गुस्सा आने लगा। अब वो अपने साथियों के साथ हो-हल्ले में शामिल होना तो दूर, ऐसा होने पर रुंआसा होने लगा। कुछ खास आवाजों पर अंकित की प्रतिक्रिया इसी तरह की होने लगी।

केस-२ 
सभ्य-सुसंस्कृत ५२ वर्षीय अनिल देशमुख का परिवार सकते में आ गया कि क्या ये वही इंसान है, जिसे वे बरसों से जानते हैं, वरना ज़रा से शोर पर कोई किसी को इतनी बेरहमी से कैसे पीट सकता है। हुआ यूं कि ट्रेन में सफर के दौरान किसी सहयात्री के पानी की बॉटल स्कवीज करने पर अनिल ने उससे बहस की और बात बढ़कर यहां तक पहुंच गई। अनिल को भी चुनिंदा आवाज़ों से परहेज है। 

कुछ खास तरह की आवाजों के प्रति किसी का इतना आक्रामण रिएक्शन पहली नज़र में "एक्सट्रीम" लगता है लेकिन ये मीजोफोनिया का लक्षण भी हो सकता है। साउंड सेंसिटिविटी से संबंधित यह डिसऑर्डर आसानी से पकड़ में नहीं आता और इसी वजह से मरीज को कई तरह की सामाजिक-मानसिक परेशानियां उठानी पड़ती हैं। 

मीजोफोनिया के लक्षण 
१. चबाना, निगलना, चुसकी लेना, होठों से चपचप की आवाज़, मुंह में खाना भरे हुए बातें करना, डकार, बॉटल मसलना, चम्मच और फॉइल की आवाज़, थूकना, दांत कुतरना, टूथब्रश करना, प्लास्टिक बैग खोलना-बंद करना आदि। 

२. गहरी या हल्की सांस, जम्हाई, खर्राटे, सीटी बजाना, गला साफ करना, हिचकी, सूंघना, सिसकी, नाक से बोलना, हमिंग, बुदबुदाहट, हम्म, अह जैसे ओवरयूज्ड शब्द, टेलीविजन पर हंसी की आवाज आदि। 

३. जूतों की हल्की-ऊंची आवाज, फर्श पर कोई आवाज, हाथों का फर्श पर रगड़ा जाना, जोड़ों का चटकना, आंखों को मसलना और पलकें झपकना। 

४. पैरों और पूरे शरीर की रिपिटेटिव हरकत, बालों से खेलना, मुंह के पास हाथ, जलती-बुझती रोशनी, वेब एनिमेशन्स आदि। 

५. गैजेट्स से परेशानी, मोबाइल पर टेक्सट या कीबोर्ड-माउस की आवाज, बर्तनों की खड़खड़, पेपर और प्लास्टिक बैग्स, ट्रैफिक, कंसट्रक्शन साइट की आवाज, कुत्तों का भौंकना, चिड़िया की चहचहाहट, बच्चों का रोना और पानी की बूंदों की आवाज आदि। 

ये है मर्ज 
मीजोफोनिया का अर्थ है "आवाज से नफरत"। यानी इस डिसऑर्डर का शिकार व्यक्ति कुछ "खास" आवाजों के लिए इतना सेंसिटिव हो जाता है कि आक्रामक रिएक्शन देने लगता है। इस तरह की आवाजों को ट्रिगर कहते हैं, जो कई तरह के हो सकते हैं। कई बार इसमें कुछ खास भंगिमाएं भी हो सकती हैं। इसके लक्षण हायपरएक्युसिस से मिलते-जुलते से हैं, जिसमें व्यक्ति सारी आवाजों के प्रति संवेदनशील हो जाता है। कई बार इसमें किसी खास व्यक्ति की आवाज़ भी किसी के लिए ट्रिगर का काम करती है, जिससे आपस में बातचीत भी कठिन हो जाती है। हालांकि अभी इसके कारणों पर शोध हो ही रहे हैं लेकिन सेंट्रल नर्वस सिस्टम से इसका संबंध माना जा रहा है। ऐसे कई केसेज भी देखने में आ रहे हैं, जिसमें व्यक्ति किसी खास आवाज़ पर हिंसक हो गया। मिसाल के तौर पर कई बार ऐसी घटनाएं देखने को मिलती हैं, जिसमें किसी आवाज पर शांत व्यक्ति भी स्वभाव के विपरीत प्रतिक्रिया देता है। ऐसे में मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। 

यह होता है इसमें 
ट्रिगर के संपर्क में आना मीजोफोनिक व्यक्ति में एकदम से तेज़ गुस्से का कारण बन सकता है। एड्रेनिलन फ्लडिंग, चेहरा तमतमाना, दिल की धड़कन बढ़ना, कंपकंपी आना और उस आवाज से दूर भाग जाना या आवाज के जिम्मेदार व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने की इच्छा मरीज़ को होती है। किसी का चिप्स खाना या कोई अन्य साधारण सी बात इनके गुस्से का कारण बन सकती है और ट्रिगर के न रहने पर मरीज उतने ही सामान्य हो जाते हैं, जितना कोई अन्य व्यक्ति। लगभग सारे ट्रिगर्स हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी में शामिल होने के कारण मरीज खुद को इससे अलग भी नहीं कर पाता और किसी के न समझ सकने की स्थिति में और परेशान हो जाता है। अक्सर ऐसा देखा गया है कि मरीज ऐसे में धीरे -धीरे लोगों से कटता जाता है। किसी सामाजिक उत्सव या मौके पर जाकर किसी अप्रिय हालत का जिम्मेदार बनने की बजाए ये खुद को अलग-थलग कर लेते हैं। गहरा अपराधबोध भी ऐसे मरीजों में देखा गया है। हर मरीज की ट्रिगर की डिग्री अलग-अलग होती है और कई बार लोग किसी खास भंगिमा के प्रति भी संवेदनशील होते हैं।

ये है इलाज 
इसका कोई विशेष इलाज नहीं है, बल्कि कई बार इसकी पहचान में मुश्किल होती है। ऐसे में डायग्नोस होने के बाद सबसे बेहतर यही होता है कि मरीज अपने ट्रिगर्स के संपर्क में आना टाले ताकि वो आक्रामक न हो। उदाहरण के तौर पर मरीज को अगर खाने की आवाज से परेशानी है तो वो अलग बैठकर खा सकता है या फिर टेलीविजन को इस वॉल्यूम पर सेट कर सकता है कि दूसरी आवाजें दब जाएं। साथ बैठकर म्यूजिक सुनते हुए खाना भी एक अच्छा विकल्प है। कुल मिलाकर मरीज को उसके परिवारजन ऐसे विकल्प सुझाएं कि वो पूरी तरह से लोगों से कट न जाए। इस तरह के केसेज में अपराध-बोध से ग्रस्त मरीज का मनोवैज्ञानिक समस्याओं का शिकार हो जाना आम बात है तो परिवार और अन्य करीबी लोगों का सहयोग बहुत जरूरी है(डॉ आरके शुक्ला,सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर प्रथमांक,2012)।

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मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

हर विधा में है टॉन्सिल का इलाज़

अक्सर बड़ी बीमारियों के डर से हम छोटी बीमारियों को नजरअंदाज कर देते हैं। बड़ी बीमारियां न हों, इसके लिए तो हम अपने खानपान का पूरा ध्यान रखते हैं, लेकिन छोटी-सी दिखने वाली बीमारी को बढ़ा लेते हैं। ऐसी ही एक आम-सी लगने वाली बीमारी है टॉन्सिलाइटस। इसे नजरअंदाज करना सही नहीं है। नवभारत टाइम्स के 21 अक्टूबर,2012 के अंक के लिए, टॉन्सिलाइटिस के बारे में एक्सपर्ट्स से बात करके पूरी जानकारी जुटाई गुंजन शर्मा नेः 

क्या है टॉन्सिल्स 
यह बादाम के आकार के ऐसे अंग हैं, जो हमारे मुंह के अंदर गले के दोनों तरफ होते हैं। टॉन्सिल्स हमारे शरीर के सिक्युरिटी गार्ड के रूप में काम करते हैं और बाहरी इन्फेक्शन से हमारी हिफाजत करते हैं। ये बाहर से आने वाली किसी भी बीमारी को हमारे शरीर में दाखिल होने से रोकते हैं। अगर हमारे टॉन्सिल मजबूत होंगे तो वे बीमारी को शरीर में जाने से तो रोकेंगे ही, साथ ही खुद भी उस बीमारी या इन्फेक्शन से बच जाएंगे। अगर टॉन्सिल्स कमजोर होंगे तो वे बीमारी को शरीर में जाने से तो रोक लेंगे लेकिन खुद बीमार हो जाएंगे यानी उनमें सूजन आ जाएंगी, वे लाल हो जाएंगे, उनमें दर्द होगा जिससे बुखार हो जाएगा। इसके अलावा कुछ भी खाने-पीने या निगलने में दिक्कत होगी। 

क्या है टॉन्सिलाइटस 
टॉन्सिल में होने वाले इन्फेक्शन को टॉन्सिलाइटिस कहते हैं। टॉन्सिलाइटिस की समस्या क्रॉनिक (लगातार बनी रहे) हो जाए तो ठीक नहीं है। टॉन्सिलाइटस को क्रॉनिक तब कहेंगे, जब यह समस्या हर एक-दो महीने में बार-बार हो रही हो। एक बार टॉन्सिलाइटिस होने पर अगर यह प्रॉब्लम दोबारा छह महीने बाद हो तो वह नॉर्मल है। 

कितनी तरह का होता है टॉन्सिलाइटिस 
1) बैक्टीरियल इन्फेक्शन 
2) वायरल इन्फेक्शन 

बैक्टीरियल इन्फेक्शन: यह इन्फेक्शन बैक्टीरिया के अटैक से होता है, जिनमें प्रमुख हैं Staphylococcus aureus,U Streptococcus pyogenes, Haemophilus influenzae आदि। 

वायरल इन्फेक्शन: यह इन्फेक्शन Reovirus, Adenovirus, Influenza virus आदि के अटैक से होता है। यह इन्फेक्शन तब होता है, जब हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता यानी बीमारियों से लड़ने की ताकत कम होती है। 

किस मौसम में होता है 
वैसे तो टॉन्सिलाइटिस इन्फेक्शन पूरे साल कभी भी हो सकता है लेकिन मौसम बदलने के दौरान यानी मार्च और सितंबर-अक्टूबर में इस इन्फेक्शन के होने का खतरा ज्यादा रहता है। इन महीनों में आप अपना ज्यादा ख्याल रखेंगे मसलन बहुत ठंडा-गरम, तीखा आदि न खाएं तो टॉन्सिलाइटिस से बच सकते हैं। 

किस उम्र में खतरा ज्यादा 
टॉन्सिलाइटिस किसी भी उम्र के लोगों को हो सकता है, लेकिन 14 साल से कम उम्र के बच्चों में इसका खतरा ज्यादा होता है। 

कैसे होता है 
- बहुत तेज गर्म खाना खाने से 
- बहुत ज्यादा ठंडा खाने या पीने से, जैसे एकदम ठंडी आइसक्रीम या कोल्ड ड्रिंक आदि 
- ज्यादा मिर्च-मसाले वाला तीखा और तला-भुना खाना खाने से 
- टॉन्सिल्स के कमजोर होने पर भी 
- प्रदूषण, धूल-मिट्टी आदि से 
- इम्यून सिस्टम (बीमारियों से लड़ने की क्षमता) कमजोर होने पर 
- पेट खराब होने से गैस या कब्ज की लगातार शिकायत रहने पर

लक्षण 
- टॉन्सिल्स का बढ़ना और सूज जाना 
- गले के बाहर भी सूजन 
- सूजन के साथ-साथ गले में दर्द 
- कुछ भी खाने-पीने और निगलने में दिक्कत 
- टॉन्सिल्स और गले का लाल होना 
- तेज बुखार होना 
- थकान होना 
- कान में दर्द 
- आवाज में बदलाव और भारीपन आना 

नोट : बच्चों और बड़े, दोनों में टॉन्सिलाइटिस के लक्षण एक जैसे ही होते हैं। 

कौन-से डॉक्टर के पास जाएं 
- अगर आपको ऊपर बताएं लक्षण दिखें तो फौरन किसी अच्छे ईएनटी एक्सपर्ट यानी कान, नाक और गले वाले डॉक्टर को दिखाएं। 
- अगर वायरल बुखार होने पर टॉन्सिल्स भी बढ़ जाएं, तब अपने फैमिली डॉक्टर (फिजिशन) को भी दिखा सकते हैं। यह जरूरी नहीं है कि हर बुखार में टॉन्सिल्स बढ़ें हीं। 

क्या है इलाज 
अगर बुखार न हो तो मरीज को बुखार की कोई दवा नहीं दी जाती। गले में दर्द के लिए सिर्फ गरारे के लिए कहा जाता है। अगर टॉन्सिलाइटिस वायरल इन्फेक्शन की वजह से होता है तो बुखार के लिए पैरासिटामॉल (क्रॉसिन, कालपोल आदि) की गोली दी जाती है। गले में दर्द के लिए गुनगुने पानी में नमक डालकर मरीज को उसके गरारे करने को कहा जाता है। अगर टॉन्सिलाइटिस बैक्टीरियल इन्फेक्शन से हुआ है तो पैरासिटामॉल और गरारों के साथ एंटी-बायोटिक दवाएं भी दी जाती हैं। इससे एक हफ्ते में मरीज को आराम हो जाता है और दो हफ्ते में वह पूरी तरह ठीक हो जाता है। 

कब होता है ऑपरेशन 
- अगर साल में तीन से चार बार टॉन्सिलाइटिस का अटैक हो। 

- अगर मरीज को बोलने, खाना निगलने में बहुत ज्यादा दिक्कत हो। 
प्रोसेस: मरीज को बेहोश करके ऑपरेशन किया जाता है। ऑपरेशन में टॉन्सिल को निकाल दिया जाता है। 

वक्त: ऑपरेशन करने में करीब 30 मिनट का वक्त लगता है और एक से दो दिन में मरीज ठीक हो जाता है। 

खर्च: करीब 20 से 30 हजार रुपये कौन करता है: ईएनटी स्पेशलिस्ट या ईएनटी सर्जन 

होम्योपैथी में इलाज 
इम्यून सिस्टम कमजोर होने से भी टॉन्सिलाइटिस की समस्या होती है। होम्योपैथी में इलाज करते वक्त इस बात का ध्यान रखा जाता है कि इम्युनिटी को इतना बढ़ा दिया जाए कि हमारे टॉन्सिल मजबूत हो जाएं और खुद पर असर हुए बिना बीमारी को रोक सकें। होम्योपैथी में टॉन्सिलाइटिस के बार-बार होने का वक्त, उसकी समयसीमा और समस्या कितनी गंभीर है, इन तमाम बातों पर गौर किया जाता है। टॉन्सिलाइटिस को धीरे-धीरे कम और फिर बिल्कुल ठीक किया जाता है। आमतौर पर पूरी तरह ठीक होने में 3-6 महीने लग जाते हैं। 

दवाएं 
Belladonna 30: टॉन्सिल्स बहुत बड़े हो गए हों, उनमें सूजन, लालिमा और दर्द हो। 
डोज : 5-5 गोली दिन में 4 बार, 3-4 महीने तक 

Baryta Carb 30: टॉन्सिल बड़े हो गए हों, मुंह खुला रहता हो, मुंह से लार आती हो, याददाश्त कम होने लगी हो और देखने में परेशानी होने लगी हो। 
डोज: 5-5 गोली दिन में 3 बार, 1-2 महीने तक 

Calcarea Carb 30: टॉन्सिलाइटिस बार-बार हो रहे हों और हर ठंडी चीज जैसे ठंडा पानी, आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक आदि खाने-पीने से परेशानी हो। 
डोज: 5-5 गोली दिन में 3 बार, 2-3 महीने तक 

नोट: इन दवाओं को अपने आप न लें। इन्हें किसी अच्छे होम्योपैथ डॉक्टर की सलाह से ही लें। 

आयुर्वेद 
आरोग्यवर्धिनीवटी: 2-2 गोली सुबह-शाम, सादा पानी के साथ 3 से 6 दिन तक खाएं। 

पुनर्नवादिमंडूर: 2-2 गोली सुबह-शाम, सादा पानी के साथ 3 से 6 दिन तक खाएं। 

महालक्ष्मीविलासरस: 1-1 गोली सुबह-शाम, सादा पानी के साथ 3 से 6 दिन तक खाएं। 

त्रिभुवनकीर्तिरस: 1-1 गोली सुबह-शाम, सादा पानी के साथ 3 से 6 दिन तक खाएं। यह दवा गर्भवती महिलाओं को नहीं लेनी है। 

कल्पतरुरस: 125 मिग्रा. पाउडर को आधा चम्मच शहद या अदरक के साथ मिलाकर रोज रात को सोने से पहले एक हफ्ते तक खाएं। 

नोट: इनमें से किसी एक दवा का सेवन करें। ये दवाएं लेने से पहले वैद्य से सलाह कर लें। 

घरेलू इलाज 
- 5 पत्ते तुलसी, 5 पत्ते काली मिर्च, 2 ग्राम या चने के बराबर अदरक को 1 कप पानी में उबालें। फिर छानकर पानी को पी लें। अगर चाहें तो इसमें आधा चम्मच चीनी और आधा चम्मच चाय पत्ती डालकर भी उबाल सकते हैं। 
डोज: महीने भर पिएं। रात को पीकर सोएं और इसे पीने के बाद कुछ खाएं-पिएं नहीं। 

- आधा चम्मच हल्दी पाउडर को एक गिलास गर्म दूध में मिलाकर पिएं। हल्दी हमारे शरीर को इन्फेक्शन से बचाती है। हल्दी को गर्म नहीं करना है। 
डोज : रोज रात को सोने से पहले महीने भर पिएं। 

- एक-चौथाई मुलेठी चूर्ण को आधा चम्मच शहद में मिलाकर खाएं। 
डोज : रोजाना रात को महीने भर खाएं। 

ऐसे बढ़ाएं इम्युनिटी 
इम्युनिटी यानी शरीर की बीमारियों से लड़ने की क्षमता हर इंसान के शरीर के अनुसार अलग-अलग होती है। 
- ताजे फल, हरी सब्जियां, दालें खूब खाएं 

- सादा खाना खाएं। 

- खूब पानी पिएं। 

- रोजाना आधा घंटा एक्सरसाइज करें 

- ताजा हवा में टहलें। 

- खाने को फ्रिज में रखने के बाद उसे बार-बार गर्म न करें। इससे खाने के पोषक तत्व कम होते हैं और इम्यून सिस्टम पर भी बुरा असर पड़ता है। ऐसा खाना हमारी पाचन क्रिया पर भी बुरा असर डालता है। वह खाने को पचने नहीं देता, जिससे शरीर में गैस, कब्ज, खट्टी डकार, दस्त आदि की शिकायत हो जाती है। फोड़े-फुंसी भी हो जाते हैं। 

- 10 से 15 पत्ते तुलसी, 10 से 15 पत्ते पुदीने और 50 ग्राम अदरक को आधा भगौना पानी में उबालें। पानी को तब तक उबालें, जब तक वह कुल पानी का एक-चौथाई न रह जाएं। इसके बाद पानी को छान लें और उसमें पडे़ तुलसी और पुदीने के पत्तों और अदरक को भी पानी में निचोड़ लें। फिर उसमें शहद मिलाकर पिएं। इसे 7 दिनों तक 3 से 4 बार पिएं। यह उपाय उन लोगों के लिए भी फायदेमंद है, जिन्हें टॉन्सिलाइटिस की प्रॉब्लम बढ़ने पर डॉक्टरों ने ऑपरेशन की सलाह दी है। 

योग भी है कारगर 
कुंजलक्रियाः सुबह एक जग भरकर पानी उबालें, गुनगुना होने पर उसमें नमक मिलाएं। उकडू होकर बैठ जाएं और पानी पिएं। पानी उतना पिएं, जितनी आपकी क्षमता हो, जोकि 2 से 4 गिलास तक हो सकती है। जब पानी गले तक आ जाए और उलटी आने को हो तो खडे़ हो जाएं। अब आगे झुककर उलटे हाथ को लेफ्ट साइड पर पेट पर रखें और पेट को दबाएं और सीधे हाथ की मिडल फिंगर से मुंह में उलटी लटकी जीभ को टच करें। ऐसा करने से उलटी होगी। ऐसा तब तक करें, जब तक सारा पानी उलटी के जरिए बाहर न निकल जाए और सूखी उलटी न आने लगे। इसके आधे घंटे बाद एक गिलास गुनगुना दूध पिएं। 

कितने समय तक करें 
- पहले 7 दिन रोज करें 
- फिर 7 दिन में दो बार करें
- उसके बाद 7 दिन में 1 बार करें 

नोट : यह क्रिया सुबह खाली पेट करनी है और इस दौरान हाथ साफ हों और नाखून कटे हों। साथ ही जब टॉन्सिल बढे़ हुए हों, उनमें सूजन हो, लालिमा हो, उनमें दर्द हो या बुखार हो तो यह क्रिया न करें। इस क्रिया को किसी अच्छे योग गुरु के प्रशिक्षण में ही करें। 

ये हैं मददगार 
- कपालभाति 
- सेतुबंधासन 
- पवनमुक्तासन 
- भुजंगासन 
- धनुआर्सन 
- उष्ट्रासन 
- जालंधर बंध 
-अनुलोम-विलोम 
- उज्जायी प्राणायाम 
- भस्त्निका प्राणायाम 
- डीप ब्रीदिंग 

नोट : इन्हें रोजाना सुबह 15 से 20 मिनट तक करें। ये तमाम आसन और प्राणायाम टॉन्सिलाइटिस होने पर भी राहत देते हैं। 

कैसा है आपका शरीर 
हमारे शरीर में मुख्यत: 3 तरह की प्रवृत्तियां पाई जाती हैं- 

1. वात, 
2. पित्त, 
3. कफ। 

हालांकि एक इंसान के शरीर में दो तरह की प्रवृत्तियों का मिला-जुला असर भी पाया जा सकता है। 

वात 
जिन्हें पेट में गैस, कब्ज, सिरदर्द आदि रहता हो। 
दवा : आधा चम्मच अश्वगंधा चूर्ण 1 गिलास गर्म दूध के साथ रोजाना रात को 1 से 2 महीने तक पिएं। 

पित्त 
जिन्हें अक्सर बुखार, पेट में जलन, फोड़े-फुंसी, चक्कर आने की समस्या हो। 
दवा : आधा चम्मच आंवला चूर्ण सादा पानी के साथ रोजाना रात को 1 से 2 महीने तक लें। 

कफ 
जिन्हें सर्दी-जुकाम, मोटापे या शरीर में सूजन की समस्या हो। 
दवा : एक चम्मच सितोपलादि चूर्ण या आधा चम्मच मुलेठी चूर्ण रोजाना रात को सादे पानी के साथ 1 से 2 महीने तक लें। 

एक्सपर्ट्स पैनल - डॉ. धीरेंद्र सिंह, ईएनटी स्पेशलिस्ट, रॉकलैंड हॉस्पिटल - डॉ. शुचींद्र सचदेव, कन्सल्टेंट होम्योपैथ - लक्ष्मीकांत त्रिपाठी, आयुर्वेदाचार्य - सुरक्षित गोस्वामी, योग गुरु

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गुरुवार, 27 सितंबर 2012

काश,बर्फी के कानों की जांच हुई होती !

आज टाइम्स ऑफ इंडिया में मुंबई से छपी एक रिपोर्ट कहती है कि इस बारे में अभी निश्चित रूप से भले कुछ न कहा गया हो कि मोबाइल फोन का बहरेपन से संबंध है अथवा नहीं,मगर डाक्टरों का कहना है कि जो शिकायतें पहले साठ साल से ज्यादा के लोगों में मिलती थीं,अब बीस-पच्चीस साल के युवाओं में भी मिल रही हैं। कान में पैदा हो रही समस्याएं ट्यूमर तक का कारण बन रही हैं। डॉक्टरों का कहना है कि मोबाइल से दूर रहने वालों की तुलना में,इसके प्रयोक्ता में ऐसा ट्यूमर होने की संभावना 50 फीसदी ज्यादा होती है। 

बहरेपन की मूल वजह है वांछनीय स्तर से अधिक तेज़ आवाज़ को अधिक देर तक सुनने की आदत। यदि हम 80 डेसीबल से ज्यादा की आवाज़ चार घंटे से ज्यादा सुनें,तो बहरापन निश्चित है। डॉक्टरों का कहना है कि मोबाइल फोन और म्यूजिक प्लेयर की लत के कारण लोग घंटों तक तेज़ आवाज़ सुनते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी कहना है कि 85 डेसीबल से ज्यादा तेज़ आवाज़ हमारे कानों के लिए नुकसानदेह है और इसमें 3 डेसीबल की बढ़ोत्तरी भी बहरेपन की गति दोगुना कर सकती है। 

कम सुनाई देना अथवा बहरापन कोई सामान्य घटना नहीं है। अमूमन, स्रवण-शक्ति उम्रदराज़ होने पर ही घटती है। यह दो ही स्थिति में तेज़ी से घटती है। पहली स्थिति है-वायरल संक्रमण की और दूसरी तेज़ आवाज़ की। तेल अवीव विश्वविद्यालय में हुए एक शोध से पता चलता है कि एमपी3 प्लेयर अथवा आईपॉड पर चार घंटे से ज्यादा संगीत सुनने वाले युवाओं की स्रवण-शक्ति काफी घट जाती है। आवाज़ फाउंडेशन की सुमैरा अब्दुलाली कहती हैं कि ध्वनि-प्रदूषण के जिस हद तक हम शिकार हो रहे हैं,डर है,कहीं हम बहरों के देश में न तब्दील हो जाएं। लिहाज़ा,डॉक्टर महसूस करते हैं कि यह सही समय है कि हम अपनी जीवन-शैली पर गंभीरता से विचार करें। 55वें अंतरराष्ट्रीय वधिर सप्ताह के मौक़े पर, पढ़िए नवभारत टाइम्स,दिल्ली संस्करण में 23 सितम्बर,2012 के अंक में प्रकाशित यह आलेखः 

फिल्म बर्फी के हीरो मर्फी के किरदार में रणबीर कपूर ने सभी का दिल जीत लिया है। बचपन से ही सुन और बोल न पाने वाला मर्फी जिंदगी के हर लम्हे को जिंदादिली से जीता है। हालांकि सच यह है कि अगर उसके पैरंट्स ने पैदा होने के बाद उसके कानों का चेकअप कराया होता , तो उसका इलाज मुमकिन था और वह सामान्य रूप से बोल और सुन सकता था। 

कान की रचना 
कान के तीन हिस्से होते हैं - आउटर ईयर , मिडल ईयर और इनर ईयर। आउटर ईयर वातावरण से ध्वनि तरंगों के रूप में आवाजों को ग्रहण करता है। ये तरंगें कैनाल से होती हुई ईयरड्रम तक पहुंचती हैं और इनकी वजह से ईयरड्रम वाइब्रेट करने लगता है। 

इस वाइब्रेशन से मिडल ईयर में मौजूद तीन बेहद छोटी हड्डियों में गति आ जाती है और इस गति के कारण कान के अंदरूनी हिस्से में मौजूद द्रव हिलना शुरू होता है। 

इनर ईयर में कुछ हियर सेल्स (सुननेवाली कोशिकाएं) होती हैं , जो इस द्रव की गति से थोड़ी मुड़ जाती हैं और इलेक्ट्रिक पल्स के रूप में सिग्नल दिमाग को भेज देती हैं। ये सिग्नल ही हमें शब्दों और ध्वनियों के रूप में सुनाई देते हैं। 

कितनी तरह का लॉस 
हियरिंग लॉस यानी सुनने का दोष या नुकसान दो तरह का हो सकता है: 

1. कंडक्टिव हियरिंग लॉस 
यह कान के बाहरी और बीच के हिस्से में आई किसी समस्या की वजह से होता है। इसे बीमारी की वजह से होने वाला बहरापन भी कह सकते हैं। 

वजह 
- कानों से पस बहना या इन्फेक्शन 
- कानों की हड्डी में कोई गड़बड़ी 
- कान के पर्दे का डैमेज हो जाना 
- ट्यूमर , जो कैंसरस नहीं होते 

2. सेंसरीन्यूरल हियरिंग लॉस 
यह कान के अंदरूनी हिस्से में आई किसी गड़बड़ी की वजह से होता है। ऐसा तब होता है , जब हियर सेल्स नष्ट होने लगते हैं या ठीक से काम नहीं करते। दरअसल , कान में तकरीबन 15 हजार स्पेशल हियरिंग सेल्स होते हैं। इनके बाद नर्व्स होती हैं। हियर सेल्स को नर्व्स की शुरुआत कहा जा सकता है। इन्हीं की वजह से हम सुन पाते हैं , लेकिन उम्र बढ़ने के साथ-साथ ये सेल्स नष्ट होने लगते हैं , जिससे नर्व्स भी कमजोर पड़ जाती हैं और सुनने की शक्ति कम होती जाती है। 

वजह 
- उम्र का बढ़ना 

- कुछ खास तरह की दवाएं मसलन जेंटामाइसिन का इंजेक्शन। बैक्टीरियल इन्फेक्शन आदि में इस्तेमाल 

- कुछ बीमारियां जैसे डायबीटीज और हॉर्मोंस का असंतुलन। इसके अलावा मेनिंजाइटिस , खसरा , कंठमाला आदि बीमारियों से भी सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। 

- बहुत तेज आवाजः जब तक हमें पता चलता है कि हमें वाकई सुनने में कोई दिक्कत हो रही है , तब तक हमारे 30 फीसदी सेल्स नष्ट हो चुके होते हैं और एक बार नष्ट हुए सेल्स हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं। उन्हें दोबारा हासिल नहीं किया जा सकता। 

लक्षण 
सुनने की क्षमता में कमी आने के शुरुआती लक्षण बहुत साफ नहीं होते , लेकिन यहां ध्यान देने की बात यह है कि सुनने की क्षमता में आई कमी वक्त के साथ धीरे-धीरे और कम होती जाती है। ऐसे में जितना जल्दी हो सके , इसका इलाज करा लेना चाहिए। नीचे दिए गए लक्षण हैं तो डॉक्टर से मिलना चाहिए। 

- सामान्य बातचीत सुनने में दिक्कत होना , खासकर अगर बैकग्राउंड में शोर हो रहा हो 

- बातचीत में बार-बार लोगों से पूछना कि उन्होंने क्या कहा 

- फोन पर सुनने में दिक्कत होना 

- बाकी लोगों के मुकाबले ज्यादा तेज आवाज में टीवी या म्यूजिक सुनना 

- नेचरल आवाजों को न सुन पाना मसलन बारिश या पक्षियों के चहचहाने की आवाज 

- नवजात बच्चे का आवाज न सुन पाना 

इलाज 
- इन्फेक्शन की वजह से सुनने की क्षमता में कमी आई है , तो इसे दवाओं से ठीक किया जा सकता है। 

- अगर पर्दा डैमेज हो गया है , तो सर्जरी करनी पड़ती है। कई बार पर्दा डैमेज होने का इलाज भी दवाओं से ही हो जाता है। 

- नर्व्स में आई किसी कमी की वजह से सुनने की क्षमता में कमी आई तो जो नुकसान नर्व्स का हो गया है , उसे किसी भी तरह वापस नहीं लाया जा सकता। ऐसे में एक ही तरीका है कि हियरिंग एड का इस्तेमाल किया जाए। हियरिंग एड फौरन राहत देता है और दिक्कत को आगे बढ़ने से भी रोकता है। ऐसी हालत में हियरिंग एड का इस्तेमाल नहीं करते , तो कानों की नर्व्स पर तनाव बढ़ता है और समस्या बढ़ती जाती है। 

हर बच्चे की जांच जरूरी 
सुनने की क्षमता में कमी पैदायशी हो सकती है , इसीलिए सलाह यही है कि पैदा होते ही हर बच्चे की सुनने की क्षमता की जांच होनी चाहिए। सामान्य बाल रोग विशेषज्ञ यह जांच नहीं करते। इसके लिए किसी ईएनटी विशेषज्ञ से जांच कराएं। जांच में बच्चे को कुछ करने की जरूरत नहीं है। मशीन की मदद से उसकी ब्रेन की वेव्स को देखकर ही पता चल जाता है कि उसकी सुनने की क्षमता कैसी है। वैसे तो सभी बच्चों की जांच होनी चाहिए। बाद में अगर किसी बच्चे में कुछ शक लगे , तब तो यह जांच जरूर करानी चाहिए। मसलन , अगर छह महीने तक बच्चा किसी आवाज की ओर ध्यान न दे या दो साल की उम्र तक एक भी शब्द नहीं बोल पाए। अगर जल्द ही यह पता चल जाए कि बच्चे की सुनने की क्षमता में कमी है तो उसका इलाज किया जा सकता है , लेकिन इसके लिए 2 से 3 साल तक की उम्र ही सही है। इसके बाद इलाज कराने का कोई फायदा नहीं है। इसकी वजह यह है कि पांच साल की उम्र तक बच्चे के सुनने , समझने और बोलने की क्षमता का पूरा विकास हो जाता है , इसलिए इसी उम्र तक उसके सुनने की क्षमता में सुधार हो गया तो ठीक है , वरना पांच साल के बाद ऑपरेशन कराने से उसके सुनने की क्षमता तो वापस आ जाएगी , लेकिन वह बोलना नहीं सीख पाएगा। 

बच्चों के इस तरह के बहरेपन के इलाज में या तो हियरिंग एड दिए जाते हैं या फिर बच्चे का कोकलियर ट्रांसप्लांट कर दिया जाता है। इन तरीकों से बच्चे की सुनने की क्षमता ठीक हो जाती है। अगर हियरिंग एड से फायदा नहीं मिल रहा है तो कोकलियर इम्प्लांट बड़ों का भी किया जा सकता है। यह सेफ तकनीक है और नतीजे बहुत अच्छे हैं , लेकिन महंगी बहुत है। एक कान के ऑपरेशन का खर्च आमतौर पर 6 से सात लाख रुपये आ जाता है। 

हियरिंग एड्स 
अगर कान का पर्दा फट गया है और कान से सुनाई नहीं देता , तो डॉक्टर हियरिंग एड लगा सकते हैं। इससे सुनाई भी देने लगता है , लेकिन आमतौर पर डॉक्टर ऐसा नहीं करते। डॉक्टर ऐसी स्थिति में सर्जरी कराने की ही सलाह देते हैं क्योंकि हियरिंग एड से कान की जो समस्या है , वह जहां की तहां बनी रहती है , जबकि सर्जरी से उसे ठीक कर दिया जाता है। अगर कान से डिस्चार्ज हो रहा है तो किसी भी हालत में हियरिंग एड लगाने की सलाह नहीं दी जाती।

हियरिंग एड मोटे तौर पर दो तरह के हैं : 
एनालॉग : इन हियरिंग एड को काफी समय पहले इस्तेमाल किया जाता था। अब इनका इस्तेमाल मोटे तौर पर बंद हो गया है। कंपनियां भी अब इन्हें नहीं बनातीं। एनालॉग हियरिंग एड में वातावरण की आवाजें पूरी की पूरी अंदर कान में आ जाती हैं , जिससे सुनने वाले को असली आवाज सुनने में दिक्कत होती है , यानी ये गैरजरूरी साउंड को कंट्रोल नहीं कर पाते। 

डिजिटल : ये पूरी तरह प्रोग्राम्ड होते हैं और गैरजरूरी आवाज को कंट्रोल कर लेते हैं। आवाज ज्यादा साफ सुनाई देती है। इनकी कीमत 10 हजार रुपये से शुरू होती हैं। इसमें वायरलेस तकनीक पर चलने वाले हियरिंग एड भी आते हैं। इन्हें मोबाइल , टीवी और रिमोट कंट्रोल के साथ सिंक किया जा सकता है। एक ही हियरिंग एड को तीनों के साथ सिंक कर सकते हैं , बशर्ते उस एड में इस काम के लिए जरूरी तकनीक हो। ऐसा करके हियरिंग एड से ही आवाज को घटा-बढ़ाकर मोबाइल की आवाज सुनी जा सकती है। टीवी का वॉल्यूम बिना घटाए-बढ़ाए मरीज अपने हियरिंग एड की आवाज को एडजस्ट कर टीवी की आवाज सुन सकता है। 

आकार के हिसाब से हियरिंग एड चार तरह के हो सकते हैं। ये हैं : पॉकेट मॉडल , कान के पीछे लगाए जाने वाले , कान के अंदर लगाए जाने वाले और चश्मे के साथ लगाए जाने वाले। चारों तरह के हियरिंग एड एनालॉग और डिजिटल , दोनों कैटिगरी में उपलब्ध हैं। 

कीमत : 
अच्छी क्वॉलिटी का डिजिटल हियरिंग एड (सिंगल) 15 से 20 हजार रुपये में आता है। वैसे , मार्केट में डेढ़ लाख रुपये तक के हियरिंग एड मौजूद हैं। एनालॉग हियरिंग एड (सिंगल) की कीमत 3 से 10 हजार रुपये के बीच होती है। 

रेग्युलर चेकअप 
- अगर कान की कोई समस्या नहीं है और सुनाई ठीक देता है तो आंखों की तरह कानों के रेग्युलर चेकअप की कोई जरूरत नहीं है। 

- हालांकि कुछ डॉक्टरों का यह भी मानना है कि अगर आपकी उम्र 30 से 45 साल के बीच है और आपको लगता है कि आपकी सुनने की क्षमता ठीक है , तो भी दो साल में एक बार कानों का चेकअप करा लें। 

- 50 साल की उम्र के आसपास कान की नसें कमजोर होने की शिकायत हो सकती है , इसलिए 50 साल के बाद साल में एक बार कानों का चेकअप करा लें। 

- चेकअप के लिए अगर आप ईएनटी विशेषज्ञ के पास जा रहे हैं तो वह आपके कान के पर्दे आदि की जांच करेगा , लेकिन कान की संवेदनशीलता और उसके सुनने के टेस्ट के लिए ऑडियॉलजिस्ट के पास भी जा सकते हैं। 

- वैसे बेहतर यही है कि कान की जांच के लिए ईएनटी विशेषज्ञ के पास ही जाएं। पूरी जांच के बाद अगर ईएनटी विशेषज्ञ को जरूरत महसूस होगी तो वही आपको ऑडियॉलजिस्ट के पास जाने को कह सकते हैं। 

वैक्स हो तो क्या करें 
- कानों में वैक्स होना कोई गलत बात नहीं है और न ही यह किसी बीमारी की निशानी है , बल्कि ऐसा होना अच्छी बात है। स्वस्थ कान वैक्स पैदा करते ही हैं। वैक्स कानों के लिए एक तरह के सुरक्षा कवच का काम करता है। 

- जब तक कानों में दर्द या कोई और दिक्कत न हो , तब तक वैक्स को लेकर परेशान होने की जरूरत नहीं है। वैक्स कान को बचाता है। बाहर की गंदगी को अंदर जाने से रोकता है। कान के बाल भी यही काम करते हैं। 

- अगर कभी वैक्स ज्यादा बन रहा है तो वह धीरे-धीरे कान के अंदर जमा होने लगता है और कान की कैनाल को ब्लॉक कर देता है। इससे कान बंद हो जाता है और भारी-भारी लगने लगता है। कई बार सुनने में भी दिक्कत होने लगती है। 

- ऐसे में सलाह यह है कि कान में कभी भी ईयरबड न डालें। इससे पर्दा डैमेज होने का खतरा होता है। 

- ऐसे वैक्स को हटाने के लिए अपने ईएनटी स्पेशलिस्ट के पास जाएं , लेकिन भूलकर भी बाजार में चिमटी आदि लेकर घूमने वाले लाल पगड़ी वाले लोगों से वैक्स न निकलवाएं। 

- ऑलिव ऑयल की दो बूंदें कान में डाल सकते हैं , लेकिन तेल डालने के बाद उसे ईयरबड से कुरेदने की कोशिश न करें और न वैक्स को बाहर निकालें। तेल डालने से वैक्स अपने आप ही घुल जाता है और परेशानी ठीक हो जाती है। कोई दिक्कत होने पर ही ऐसा करें। सरसों का तेल न डालें। 

- अगर कान के बाहरी हिस्से की सफाई निश्चित अंतराल पर खुद ही कॉटन के ईयरबड से करते रहें , तो वैक्स इकट्ठा ही नहीं होगा क्योंकि वैक्स आमतौर पर कान के बाहरी हिस्से में ही पैदा होता है। कान की सफाई नहाते वक्त उंगली से कर सकते हैं। 

पानी चला जाए तो... 
सामान्य तौर पर कान के अंदर पानी जाने का कोई खास रिस्क नहीं होता , लेकिन अगर कान में इन्फेक्शन है तो डॉक्टर सलाह देते हैं कि कान को पानी से बचाकर रखा जाए। आमतौर पर पानी खुद ही निकल जाता है , लेकिन अगर दिक्कत हो तो डॉक्टर से मिलें। अगर कान की कोई समस्या है तो ज्यादा स्विमिंग करने से नुकसान हो सकता है। ऐसे में स्विमिंग से बचना ही अच्छा है। वैसे डॉक्टर स्विमिंग करते वक्त कानों में ईयरप्लग लगाना बेहतर है। 

कैसे बरकरार रखें सुनने की क्षमता 
- पैदा होते ही बच्चे के कानों का टेस्ट कराएं। 45 साल की उम्र के बाद कानों का रेग्युलर चेकअप कराते रहें। 

- अगर शोरगुल वाली जगह मसलन फैक्ट्री आदि में काम करते हैं तो कानों के लिए प्रोटेक्शन जरूर लें। ईयर प्लग लगा सकते हैं। 

- 90 डेसिबल से कम आवाज कानों के लिए ठीक है। 90 या इससे ज्यादा डेसिबल की आवाज कानों के लिए नुकसानदायक होती है। इससे बचें। 

- आईपॉड , एमपी 3 प्लेयर को हेडफोन या ईयरबड्स की मदद से जरूरत-से-ज्यादा आवाज पर और लगातार लंबे वक्त तक सुनना हमारी सुनने की क्षमता को बिगाड़ सकता है। 

- म्यूजिक सुनते वक्त वॉल्यूम हमेशा मीडियम या लो लेवल पर रखें , लेकिन कई बार बाहर के शोर की वजह से आवाज तेज करनी पड़ती है। तेज आवाज में सुनने से कानों को नुकसान हो सकता है इसलिए शोरगुल वाली जगहों के लिए शोर को खत्म करने वाले ईयरफोन का इस्तेमाल कर सकते हैं , लेकिन आवाज कम ही रखें। 

- कितनी आवाज कितनी देर तक सुनना ठीक है , इसके लिए 60/60 का नियम फॉलो कर सकते हैं। इसमें आईपॉड को 60 मिनट के लिए उसके मैक्सिमम वॉल्यूम के 60 फीसदी पर सुनें और फिर कम से कम 60 मिनट यानी एक घंटे का ब्रेक लें। 

- म्यूजिक या मोबाइल सुनने के लिए ईयरबड्स भी आती हैं और हेडफोंस भी। ईयर बड्स कान के अंदर कैनाल में घुसाकर लगाए जाते हैं , जबकि हेडफोन कान के बाहर लगते हैं। ईयर बड्स की तुलना में हेडफोन बेहतर है।  

कितनी देर म्यूजिक सुनें (हर दिन)  -    वॉल्यूम 
                                             50%     -   कोई सीमा नहीं 
                                             60%     -    18 घंटे 
                                            70%      -    साढ़े चार घंटे 
                                            80%      -    करीब डेढ़ घंटा 
                                            90%      -    करीब 18 मिनट 
                                          100%      -    करीब 5 मिनट 

किसकी कितनी तेज आवाज 
फुसफुसाने की आवाज =30 डीबी 
शांत ऑफिस =40 डीबी 
बारिश की आवाज= 50 डीबी 
सामान्य बातचीत= 60 डीबी 
सामान्य ट्रैफिक , कार का इंजन= 70 डीबी 
एमपी 3 की अधिकतम आवाज= 105 डीबी 
रॉक कंसर्ट =110 डीबी 
जेट का उड़ना= 120 डीबी 
पटाखे की आवाज= 150 डीबी 

नोट : जब भी डेसिबल में 10 की बढ़ोतरी होगी , आवाज में 10 गुना तेजी आ जाएगी। जैसे सामान्य बातचीत के मुकाबले कार का इंजन 10 गुनी आवाज देता है। 

भ्रामरी प्राणायाम है मददगार 
सुनने की क्षमता बरकरार रखने में अनुलोम विलोम , कपालभाति , भस्त्रिका और भ्रामरी प्राणायाम बहुत लाभकारी हैं। इनमें से भी भ्रामरी खासतौर पर उपयोगी है। इसे करने के लिए किसी आसन में बैठ जाएं। पूरा सांस भरें। सांस भरने के बाद अंगूठों से दोनों कानों को बंद कर लें और तर्जनी उंगलियों को माथे पर लगाएं। दोनों हाथों की बाकी तीन-तीन उंगलियां आंखों पर आ जाएंगी। इसके बाद सांस निकालें और भंवरे जैसी गूंज करें। इस तरह से 10 से 11 बार रोजाना करें। इसके अलावा जल नेति , सूत्र नेति और घृत नेति करने की भी सलाह दी जाती है , लेकिन ये क्रियाएं किसी योग गुरु से सीखकर ही करनी चाहिए। 

एक्सपर्ट्स पैनल 
डॉ. सोमेश्वर सिंह , ईएनटी स्पेशलिस्ट , कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल 
डॉ. शलभ शर्मा , ईएनटी स्पेशलिस्ट , गंगाराम हॉस्पिटल 
डॉ. मनुज अग्रवाल , सीनियर ऑडियॉलजिस्ट , एम्प्लिफोन इंडिया

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बुधवार, 16 मई 2012

मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज का अध्ययनःमोबाइल से बहरेपन का ख़तरा

मोबाइल फोन खासकर इयर फोन का ज्यादा इस्तेमाल आपको या आपके बच्चों को बहरा कर सकता है। रोज 6 से 7 घंटे मोबाइल का इस्तेमाल करने वाले तो बहरेपन की गिरफ्त में हैं ही। इन 6 से 7 घंटों में बात करने के साथ ही इयरफोन से गाने सुनना भी शामिल है। वहीं जो लोग मोबाइल का कम यूज करने वालों में भी सामान्य लोगों की अपेक्षा सुनने की क्षमता 15 पर्सेंट कम हो रही है। ऐसे लोगों की संख्या 70 फीसदी है। अध्ययन में शामिल लोगों को तीन वर्ग में बांटा गया, जिसमें 13 से 19 साल, 20 से 45 साल और 46 से 65 साल के लोग थे। बच्चों में यह समस्या अन्य की तुलना में ज्यादा पाई गई है। गौरतलब है कि इन दिनों राजधानी में ज्यादातर बच्चे और युवा कानों में इयरफोन लगाए मिल जाएंगे। इनमें से ज्यादातर को सुनने की क्षमता बढ़ाने के लिए मशीन लगाने की जरूरत है। 

यह जहां 13 साल तक के बच्चों के लिए खतरनाक है, वहीं 65 साल के बुजुर्ग भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के ईएनटी डिपार्टमेंट ने यह स्टडी की है, जिसमें 13 साल से 65 साल तक के करीब 400 लोगों को शामिल किया गया। 

अस्पताल के डीन और ईएनटी विभाग के हेड डॉ. अरूण अग्रवाल का कहना है कि कान में करीब 15 हजार स्पेशल हेयर सेल्स होते हैं। इसके बाद नर्व्स होते हैं। ये जब खराब होने लगते हैं तो सुनने की क्षमता कम होने लगती है। एक बार सेल्स खराब हो गए तो इनका दोबारा बनना मुश्किल होता है। सुनने की क्षमता में कमी आने का शुरू में पता नहीं चलता है। जब तक पता चलता है करीब 30 फीसदी सेल्स खराब हो चुकी होती हैं। हालांकि उम्र बढ़ने के साथ और ज्यादा दवाइयां भी इसका कारण हैं, लेकिन मोबाइल फोन की भूमिका इसमें बहुत ज्यादा हो गई है। अगर हम आईपॉड को एक घंटे के लिए सिर्फ 60 वॉल्यूम पर सुनें या थोड़ी थोड़ी देर में ब्रेक लें तो इसमें शुरू से ही कुछ कंट्रोल हो सकता है(सुशील कुमार त्रिपाठी,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,15.5.12)।

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शनिवार, 5 मई 2012

क्यों हो जाती है आवाज़ ख़राब?

वॉइस बॉक्स या लैरिंक्स में मौजूद वोकल कॉर्ड्स पर अत्यधिक तनाव पड़ने के कारण इनमें गांठ या नॉड्यूल्स बन जाती है। आमतौर पर यह स्थिति लंबे समय तक तेज़ आवाज़ में बोलने, बहुत ज़्यादा बोलने या चीखने-चिल्लाने से बनती है। 

ये गांठें प्रायः छोटी-छोटी होती हैं और अंगूर जितनी बड़ी हो सकती हैं। किरेटीन से बनी इन गांठों का रंग सफेद-स्लेटी होता है। वोकल कॉर्ड पर इस तरह की गांठों का बनना पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, ये संभवतः वोकल कॉर्ड्‌स के सामान्य से अधिक टकराने के कारण बनती हैं। इससे वॉइस बॉक्स का कार्य प्रभावित होता है। हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि ज़्यादा बोलने या गाना गाने वाले ही अधिकतर प्रभावित क्यों होते हैं। इन गांठों के कारण व्यक्ति की आवाज़ कर्कश और अस्पष्ट हो जाती है।

इलाज 
निदान के लिए कान नाक गला रोग विशेषज्ञ मिरर लैरिंगोस्कोपी तकनीक से वॉइस बॉक्स की जाँच करते हैं। यह तकनीक दर्द रहित होती है। इसके अलावा गांठ की बायोप्सी भी की जा सकती है। गांठ का आकार छोटा होने पर स्पीच थैरेपी से इलाज किया जाता है। इसके ज़रिए व्यक्ति को अपनी आवाज़ का सही ढ़ंग से उपयोग करना सिखाया जाता है ताकि वोकल कॉर्ड्‌स को अधिक क्षति से बचाया जा सके। प्रायः स्पीच थैरेपी से गांठ का आकार छोटा होने लगता है और ये धीरे-धीरे ग़ायब हो जाती हैं। बड़ी गांठों को माइनर सर्जरी या लेज़र सर्जरी द्वारा निकाला जा सकता है(डॉ. माधवी पटेल,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल चतुर्थांक 2012)।

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गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

स्विमर्स ईयरःकान का संक्रमण

ओटाइटिस एक्सटर्ना नामक कानों की बीमारी को आमतौर पर स्विमर्स इयर नाम से जाना जाता है। इससे कान के अंदर की त्वचा लाल होकर सूज जाती है। शुरुआत में कान में खुजली भी हो सकती है और खुजालने से समस्या और बढ़ जाती है। कान में घाव बन सकते हैं और दर्द भी होने लगता है। कान में से द्रव पदार्थ निकल सकता है और मैल भी अधिक बनता है। सूजन और मैल के कारण कान के बंद होने से सुनने की क्षमता प्रभावित होने लगती है।

कारण 
ओटाइटिस एक्सटर्ना मुख्य रुप से संक्रमण के कारण होता है, यह संक्रमण फंगल या बैक्टीरियल हो सकता है। यह बीमारी एग्ज़िमा या डर्मेटाइटिस का रुप भी ले सकती है जिसमें संक्रमण न होने के बावजूद भी त्वचा पर सूजन बनी रहती है।

जोखिम 
ओटाइटिस एक्सटर्ना किसी को भी हो सकता है। कान साफ करने के लिए इयर बड को बार-बार कान में डालने और त्वचा के अधिक खुरचने से संक्रमण हो सकता हे। कान में हमेशा ही गीलापन बने रहने से इसकी प्रतिरक्षण प्रणाली प्रभावित होती है जिससे संक्रमण पनपने लगते हैं। दिन में कई घंटे तैरने पर कान में गीलापन बने रहने का खतरा रहता है। इसीलिए इस बीमारी को स्विमर्स ईयर कहते हैं। 

उपचार 
कान का परीक्षण कर अंदर जमे मैल का जांच से पता लगाया जा सकता है कि संक्रमण फंगल है या बैक्टीरियल। शुरूआती अवस्था में ही यदि मरीज़ चिकित्सक के पास पहुंच जाए तो चिकित्सक द्वारा कान की सावधानीपूर्वक सफाई करने से कान अपने आप ठीक होने लगता है। दरअसल,गीलापन और मैल निकाल देने पर कान की प्रतिरक्षा प्रणाली सक्रिय होकर संक्रमण से लड़ पाती है। ध्यान देने लायक बात यह है कि संक्रमणग्रस्त होने पर कान की सफाई चिकित्सक द्वारा कराना ही उचित होता है। घर पर कान साफ करने की स्थिति और बिगाड़ भी सकती है। अधिकतर मरीज़ों को एंटीबायोटिक दवाएं भी दी जाती हैं। आमतौर पर एंटीबायोटिक ईयरड्रॉप दिए जाते हैं लेकिन समस्या गंभीर होने या बार-बार होने पर इसकी गोलियां भी दी जा सकती हैं। कभी-कभी स्टेरॉइड क्रीम या ड्रॉप भी दिए जाते हैं। अधिकतर मीरज़ों में उपचार शुरू होने के 2-3 दिनों के अंदर आराम मिल जाता है। मधुमेह रोगियों को संक्रमण होने पर तुरंत चिकित्सक को दिखाना चाहिए क्योंकि इनमें संक्रमण के पनपने और फैलने की आशंका कहीं अधिक होती है(सेहत,नई दुनिया,अप्रैल 2012 द्वितीयांक)

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शनिवार, 31 मार्च 2012

नकसीर और होम्योपैथी

यह ११ वर्षीय बालक पिछले तीन सालों से नकसीर (एपिस्टेक्सिस) से पीड़ित था। समस्या की शुरुआत गर्मी के मौसम में हुई। एक दिन स्कूल से लौटते समय उसे नाक से कुछ बहता हुआ महसूस हुआ। घर आकर देखने पर उसने पाया कि नाक से खून बह रहा था। माँ ने उसे लेटाकर नाक पर रुई रख दी। ५ मिनट बाद खून बहना बंद हो गया और कुछ देर आराम करके वो बिलकुल ठीक हो गया। गर्मी और धूप के कारण कभी-कभी नाक से खून बहने लगता है। इसे सामान्य मानकर बच्चे के माता-पिता ने इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। करीब १५ दिन बाद उसे फिर से यही समस्या हुई, इस बार स्कूल के मैदान में खेलते हुए। उसे स्कूल से घर भेज दिया गया, माँ ने उसे पहले की तरह ही लेटाकर नाक पर रुई रख दी। कुछ देर में खून बहना रुक गया। 

अब माता-पिता उसे लेकर चिंतित थे और वे चिकित्सक के पास जाते उसके पहले बालक की नाक से फिर खून बहना शुरू हो गया। समस्या शुरू होने के डेढ़ महीनों के अंदर यह तीसरा अटैक था। इसलिए वे तुरंत चिकित्सक के पास पहुँचे। चिकित्सक ने बताया कि चिंता कि कोई बात नहीं थी। नाक में कई छोटी-छोटी रक्तवाहिनियाँ होती हैं, जो गर्मी बढ़ने या खरोचने से क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। कई बार नाक साफ करते हुए नाखुन लगने के कारण नाक से खून बहने लगता है। चिकित्सक ने उसे नाक में उँगली न डालने की सलाह दी। कुछ दिनों तक सबकुछ सामान्य रहा। एक दिन जब बच्चा पिकनिक पर गया था, दिन में तेज़ गर्मी के कारण उसकी नाक से फिर खून बहना शुरू हो गया। इस बार खून बहुत ज़्यादा बहा था। बच्चे के माता-पिता ने तुरंत उसे लेटा दिया और ब्लीडिंग रुकने तक नाक पर रुई लगाकर रखी। 

इसके बाद वे फिर चिकित्सक के पास पहुँचे, जिन्होंने परीक्षण करके यही बताया कि सबकुछ सामान्य है। बार-बार खून बहने के कारण चिकित्सक ने उन्हें कान-नाक-गला रोग विशेषज्ञ के पास जाने की सलाह दी।

कई दिनों तक सब कुछ सामान्य रहा। इसलिए उन्होंने विशेषज्ञ से परामर्श नहीं लिया। ४-५ महीने बीत गए और सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहा। गर्मियों की छुट्टियाँ भी ख़त्म हो गईं। इसके बाद सितंबर में एक बार नाक से थोड़ा-सा खून बहा, जो आसानी से रुक गया। फिर एक साल तक कोई समस्या नहीं हुई और वे चिकित्सक या विशेषज्ञ को दिखाने भी नहीं गए। अगले साल गर्मियाँ शुरू होते ही एक बार नाक से हल्का-सा खून बहा। २-३ दिन बाद उसे फिर अटैक आया, जो गंभीर था। ५ मिनट तक नाक से खून बहता रहा व बड़ी मुश्किल से रुका। माता-पिता ने रुई से लेकर बर्फ के सेक तक हर उपाय कर लिया, लेकिन खून बहता जा रहा था। 

अब उन्हें यह समझ आ गया था कि नाक से खून निकलने का कारण तेज़ गर्मी थी। जब भी बच्चा तेज़ धूप या गर्मी में घर से बाहर निकलता, उसकी नाक से खून बहना शुरू हो जाता। गर्मियों में समस्या बहुत अधिक होती थी, इसलिए उसके धूप में बाहर निकलने पर रोक लगा दी। अब वो केवल सुबह या शाम को ही बाहर निकलता और पूरा दिन घर में बंद रहता था। इससे नाक से खून बहना तो रुक गया, लेकिन बच्चे की सामान्य गतिविधियों में भी रुकावट आने लगी। इस तरह गर्मी की छुट्टियाँ ख़त्म हो गई और स्कूल शुरू हो गए। बारिश के चलते मौसम में ठंडक बनी रही और बच्चे को कोई तकलीफ़ नहीं हुई लेकिन सितम्बर में एक बार फिर उसे अटैक आया। इस बार वे लोग विशेषज्ञ से परामर्श लेने पहुंचे। 

वहां भी परीक्षण में कोई परेशानी दिखाई नहीं दी। विशेषज्ञ ने अटैक को देखते हुए कॉटराइजेशन प्रक्रिया कराने की सलाह दी। नाक के एक हिस्से में कई बारीक-बारीक रक्तवाहिनियां होती हैं जिसे लिटिल्स एरिया कहते हैं। कॉटराइजेशन के ज़रिए इस हिस्से को जलाया जाता है ताकि नाक से खून बहना बंद हो सके। माता-पिता ने सोचा कि वे यह प्रक्रिया परीक्षा के बाद छुट्टियों में करवाएंगे। तब तक ब्लीडिंग से बचने के लिए उन्होंने उसे धूप और गर्मी से बचाने की ओर ध्यान दिया। कुछ महीनों तक नाक से बिल्कुल भी खून नहीं आया किंतु गर्मियों के शुरू होते ही उसे एक बार फिर अटैक आया। परीक्षाओं के दौरान ब्लीडिंग से बचने के लिए उन्होंने कुछ समय होम्योपैखी का इलाज़ कराने का फैसला किया। 

गर्मी के कारण नाक से खून बहने की समस्या के लिए क्रोकस सटाइवस नामक दवा से इलाज़ शुरू किया। दवाएं लेने के बाद उसे कोई अटैक नहीं आया। और परीक्षाएं खत्म हो गईं। हमने उसके माता-पिता को कुछ समय यही इलाज़ लेने की सलाह दी। दवाओं से यदि समस्या ख़त्म हो जाए,तो कॉटराइजेशन की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। 

इलाज़ के बाद केवल 3-4 माइल्ड अटैक आए और कुछ महीनों बाद वो पूरी तरह ठीक हो गया। कभी अचानक अटैक आने पर इस्तेमाल करने के लिए उसे दवा की एक डोज दी गई,किंतु उसे इसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ी(डॉ. कैलाशचंद्र दीक्षीत,सेहत,नई दुनिया,मार्च चतुर्थांक 2012)

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शनिवार, 3 मार्च 2012

नजर, जुबान और कान बनती तकनीक

हर बच्चा अपने आप में खास होता है, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जो किन्हीं वजहों से शारीरिक तौर पर कुछ कमतर रह जाते हैं। उनकी मदद के लिए आज हमारे पास तमाम तकनीकें मौजूद हैं। इनके जरिए उनकी जिंदगी आसान और बेहतर बन सकती है। ऐसी ही तकनीक और उपकरणों की जानकारी एक्सपर्ट्स की मदद से दे रही हैं प्रियंका सिंह : 

कैसी-कैसी परेशानियां 
बच्चा न सुन पाता हो, न बोल पाता हो, न देख पाता हो 
ऐसा बमुश्किल ही होता है, जब बच्चे के पास बोलने, देखने और सुनने, तीनों की क्षमता न हो। ऐसे बच्चों को कुछ भी सिखाना और समझाना बहुत मुश्किल होता है। आमतौर पर अगर बच्चा देख नहीं पाता तो उसके सुनने की क्षमता काफी अच्छी होती है और अगर सुन नहीं पाता तो उसकी आंखें काफी तेज होती हैं। ऐसा इसलिए होता कि अगर दिमाग का ऑडिटरी एरिया (सुनने की क्षमता प्रदान करनेवाला एरिया) खत्म हो जाता है तो विजुअल एरिया (देखने की क्षमतावाला एरिया) ज्यादा डिवेलप हो जाता है। बधिर बच्चे अक्सर लिप मूवमेंट भी पढ़ लेते हैं। इसी तरह दृष्टिहीनों को छोटी-छोटी आवाजें भी आसानी से सुनाई दे जाती हैं। 

न सुन पाता हो, न बोल पाता हो 
बच्चा अगर पैदाइशी तौर पर सुन नहीं पाता, तो वह आमतौर पर बोल भी नहीं पाता। इसकी वजह है कि बच्चा जो सुनता है, उसे दोहरा कर ही बोलना सीखता है। अगर उसने शब्द सुने ही नहीं, तो वह बोल भी नहीं पाएगा। 

बच्चा बोल पाता हो, पर सुन न पाता हो 
कोई-कोई बच्चा सुन पाता है लेकिन बोल नहीं पाता। हालांकि ऐसा बहुत कम होता है। दिमाग के बोलने के एरिया में अगर कोई दिक्कत हो या बाद में इन्फेक्शन हो गया हो, मसलन मेनिंजाइटिस (दिमागी बुखार) जैसी बीमारी हो जाए तो सुनने की क्षमता खत्म हो सकती है। ऐसे में बच्चे ने बीमार होने के वक्त तक अगर पूरा बोलना शुरू कर दिया है या जितने भी शब्द सीखे हैं, उन्हें वह आगे भी बोल पाएगा लेकिन सुन नहीं पाएगा। 

मूक-बधिरों के लिए 
सबसे पहले यह जानना चाहिए कि बच्चे की सुनने की क्षमता ठीक है या नहीं। इसके लिए बच्चे के जन्म के फौरन बाद ओएई (ओटोअकूस्टिक इमिशन) टेस्ट कराना चाहिए। वैसे, इस टेस्ट को बाद में भी करा सकते हैं लेकिन जितना जल्दी कराएं, उतना अच्छा है। इससे पता लग जाएगा कि बच्चा सुन पाता है या नहीं। आईओए के अलावा बेरा, एएसएसआर आदि टेस्ट भी बच्चे की सुनने की क्षमता जानने के लिए होते हैं। आमतौर पर कोई भी बच्चा सुनने में पूरी तरह नाकाम नहीं होता। वह कुछ फीसदी जरूर सुन पाता है। ऐसे में जितनी जल्दी हेयरिंग एड का इस्तेमाल शुरू करा दें, उतना अच्छा है। अगर किसी बच्चे ने बचपन में हेयरिंग एड लगाया हो तो उसे सुनाई देने लगता है। फिर वह बोलना भी शुरू कर सकता है। 

हियरिंग एड (कान की मशीन) 
दो तरह के हियरिंग एड आते हैं : एनालॉग और डिजिटल। एनालॉग के मुकाबले डिजिटल एड बेहतर होते हैं क्योंकि इनमें आवाज ज्यादा साफ सुनाई देती है। ये ऑटो एडजस्टेबल होते हैं। हालांकि ये एनालॉग के मुकाबले महंगे भी होते हैं। अच्छे एड कस्टमाइज्ड होते हैं। मसलन अगर किसी फ्रीक्वेंसी में किसी का हेयरिंग लॉस कम है और किसी में ज्यादा तो उसी के अनुसार एड काम करता है। 

हियरिंग एड की तीन कैटिगरी होती हैं : 
1. पॉकेट मॉडल एड 
हियरिंग एड में सबसे बेसिक बॉडी लेवल एड है। इसे पॉकेट मॉडल भी कहा जाता है क्योंकि यह छोटा-सा डिवाइस होता है, जिसे पॉकेट में रखते हैं। इसकी बॉडी में माइक्रोफोन, एम्प्लिफायर और कंट्रोल्स होते हैं। एक कॉर्ड से इलेक्ट्रिक सिग्नल रिसीवर में भेजा जाता हैं, जोकि इस सिग्नल को आवाज में बदलता है। सुनने में जितनी परेशानी होती है, उसके मुताबिक आवाज का लेवल तय होता है। 
कीमत : 1000 से 5000 रुपये तक। 


2. BTE (Behind the Ear) 
कान के पीछे लगाने वाले एड आमतौर पर छोटे बच्चों को लगाए जाते हैं क्योंकि वे पॉकेट मॉडल एड को ढंग से संभाल नहीं पाते। यह कान के पीछे पहना जाता है। 
कीमत : 3000 से 3 लाख रुपये तक। 

3. ITE (In the Ear) इन द इयर, इन द कैनाल और कंप्लीट इन द कैनाल, ये तीनों कॉस्मेटिकली डिजाइन एड होते हैं। ये कान में अंदर की तरफ लगते हैं इसलिए बाहर से कम या बिल्कुल दिखाई नहीं देते। हालांकि इनकी सीमा है कि जहां बिल्कुल सुनाई नहीं देता, वहां ये काम नहीं करते। पूरा डिवाइस कान में या कान की नली में होता है। हियरिंग एड को एक सख्त प्लास्टिक के कवच में रखा जाता है। इस प्लास्टिक के कवच को कान के आकार के हिसाब से खास तौर पर बनाया जाता है। 

कीमत : 8-10 हजार से 3 लाख रुपये तक। 

कौन-से एड बेहतर 
जिस हियरिंग एड में जितने ज्यादा चैनल होते हैं, उसकी क्वॉलिटी उतनी ज्यादा अच्छी होती है। वरनाफोन, सीमेंस, पायरेक्स, फोनेक्स, एल्प आदि के हियरिंग एड को अच्छा माना जाता है। गरीबों को सरकार मुफ्त में भी पॉकेट मॉटल या बीटीई हियरिंग एड मुहैया कराती है। 

कान के लिए इम्प्लांट्स कॉकलियर इम्प्लांट्स 
अगर बच्चे को हियरिंग एड का ज्यादा फायदा नहीं हो रहा या उसे बहुत कम सुनाई देता है तो कॉकलियर इम्प्लांट लगवाना बेहतर है। इनका रिजल्ट हियरिंग मशीन से बेहतर होता है। लेकिन ये काफी महंगे पड़ते हैं। इसके अलावा, अगर एड में कोई खराबी आ जाती है तो फिर से सर्जरी करनी पड़ती है। कॉकलियर इम्प्लांट, जितना जल्दी हो सके करा देना चाहिए। इसकी वजह यह है कि ब्रेन के स्पीच एरिया का विकास पांच साल की उम्र के बाद खत्म हो जाता है। अगर कॉकलियर इम्प्लांट पांच साल के बाद होता है तो बच्चा सुन पाएगा लेकिन बोल नहीं पाएगा। जितनी जल्दी बच्चा सुनेगा, उतनी जल्दी बोल पाएगा। जन्म के एक साल के बाद लेकिन पांच साल से पहले कॉकलियर इम्प्लांट जरूर करा लेना चाहिए। 

कैसे काम करता है 
कॉकलियर इम्प्लांट्स उन लोगों में किया जाता है, जिनके कान के अंदरूनी हिस्से (इनर इयर) में खराबी हो। इनर इयर को सर्जरी के जरिए बायपास कर ऑडिटरी नर्व्स (सुनने वाली नस) को एक्टिव करते हैं, जिससे मेसेज सीधे ब्रेन में चला जाता है। सर्जरी अगर कामयाब होती है तो दो हफ्ते के बाद प्रोसेसर को चार्ज करते हैं। प्रोसेसर बाहर से गोलाकार होता है, जो आवाजों को जमा कर अंदर भेज देता है। इसे कान के पीछे लगाया जाता है। इसके बाद एक-दो साल स्पीच थेरपी करते हैं, तब बच्चा सुनना शुरू कर पाता है। अगर सुनने की क्षमता बाद में खराब हुई है तो ज्यादा स्पीच थेरपी की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन अगर जन्म से सुनाई नहीं देता था तो स्पीच थेरपी पर काफी काम करना पड़ता है। 

खर्च 5 से 10 लाख रुपये तक का इम्प्लांट आता है और एक-डेढ़ लाख रुपये ऑपरेशन का खर्च आता है। सरकारी अस्पताल में ऑपरेशन फ्री होता है। लेकिन इम्प्लांट का पैसा देना होता है। 

कौन-सा बेहतर 
मेडल, कॉकलियर, एडवांस बायोनिक्स आदि। 

बाहा (BAHA) 
अगर मिडल इयर में पस या कोई और प्रॉब्लम होती है, जिसकी वजह से आउटर इयर में हियरिंग एड नहीं लगा पा रहे हैं तो बोन एंकर्ड हियरिंग एड लगाया जाता है। यह सर्जरी के जरिए कान के पीछे वाली हड्डी पर लगाया जाता है। 

क्रॉस (CROSS) 
कॉन्ट्रालेटरल रूटिंग ऑफ साइड सिग्नल उन लोगों में लगाया जाता है, जिन्हें एक कान में बिल्कुल सुनाई नहीं देता, यानी जिनके एक कान की नर्व्स खराब हैं। जिस कान से सुनाई नहीं दे रहा है, उसमें एक बटन इम्प्लांट लगाकर साउंड को दूसरी ओर मोड़ देते हैं। इस तरह वह ठीक कान तक पहुंच जाती है और मरीज के सुनने की क्षमता बढ़ जाती है। 
खर्च : 3 लाख रुपये। सरकारी अस्पतालों में ऑपरेशन मुफ्त होता है। सिर्फ एड का पैसा देना होता है।

एबीआई (ABI) 
ऑडिटरी ब्रेनस्टेम इम्प्लांट उन मामलों में लगाया जाता है, जिनके कान में नहीं, कान से दिमाग तक मेसेज पहुंचानेवाली नसों में खराबी होती है। यह भी महंगा इलाज है। 

मशीन लगाने या इम्प्लांट के बाद 
 एड लगाने के बाद ऑडिटरी ट्रेनिंग बहुत जरूरी है। अगर बच्चे को बाद में सुनाई देना बंद हुआ है तो उसे कम ऑडिटरी ट्रेनिंग की जरूरत होती है। इसके बाद स्पीच एंड लैंग्वेज थेरपी देते हैं। इसमें हरेक शब्द को बताते हैं कि इसे कैसे बोला जाता है। अगर मशीन का इस्तेमाल या कॉकलियर इम्प्लांट तीन साल से पहले कर दिया जाता है तो बच्चा करीब-करीब नॉर्मल बच्चों की तरह की बोल और सुन पाता है। 

एएसी (ACC) 
ऑल्टरनेटिव ऑग्मेंटेटिव कम्युनिकेशन डिवाइस आमतौर पर उन मामलों में इस्तेमाल किए जाते हैं, जिनमें बच्चा सुनने और बोलने के साथ-साथ चलने-फिरने में भी अक्षम हो या फिर पूरी कोशिश के बाद भी बच्चा बोलना न सीख पाया हो। ये मोटे तौर पर तीन तरह के होते हैं : 

इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस 
इस डिवाइस में हर काम के लिए अलग-अलग बटन बने होते हैं। जो बटन दबाते हैं, उसकी आवाज आ जाती है। मसलन, खाना, पानी आदि। इस आवाज को सुनकर घर के लोग मदद करने आ आते हैं। यह डिवाइस काफी महंगा होता है और हर जगह मिलता नहीं है। इसी कैटिगरी में आवाज नामक डिवाइस भी है, जिसे वीलचेयर में लगा दिया जाता है। इसे गोद में भी रखा जा सकता है और डेस्क पर भी। यह हाथ, पैर और सिर के हर छोटे मूवमेंट को पकड़ता है और उसे वाक्य में तब्दील कर देता है। इसकी कीमत करीब 30 हजार रुपये है। 

कंप्यूटर बेस्ड डेडिकेटेड सॉफ्टवेयर 
कंप्यूटर की टेक्नॉलजी को यूज करते हुए कुछ सॉफ्टवेयर डिजाइन किए गए हैं। ये काफी एडवांस होते हैं। छोटे-से डिवाइस पर छोटी-सी स्क्रीन होती है। उसी पर अलग-अलग कामों के ऑप्शन होते हैं। 

ध्यान दें 
- अगर महंगा होने की वजह से इम्प्लांट नहीं करवा सकते तो हियरिंग एड जरूर लगवाएं। 
- डम न कहकर म्यूट या हियरिंग इम्पेयर्ड कहना चाहिए ऐसे लोगों को। 

कर सकते हैं शिकायत 
इन स्पेशल बच्चों को स्पेशल स्कूलों के साथ-साथ सामान्य स्कूलों में भी दाखिले का हक है। कोई भी स्कूल इससे इनकार नहीं कर सकता। अगर कोई स्पेशल बच्चा अपनी तरह के दूसरों बच्चों से बेहतर कर रहा है तो कोशिश होनी चाहिए कि वह सामान्य स्कूल में दूसरे बच्चों के साथ पढ़ सके। इससे उसे सामान्य बच्चों के साथ घुलने-मिलने में मदद मिलती है। 

अगर कोई स्कूल दाखिला देने से इनकार करता है तो मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस ऐंड एम्पावरमेंट के तहत नैशनल ट्रस्ट ऑफ इंडिया और चीफ कमिश्नर फॉर पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज को शिकायत कर सकते हैं। 

पता है 
नैशनल ट्रस्ट ऑफ इंडिया 16- बी, बड़ा बाजार रोड, ओल्ड राजेंद नगर, नई दिल्ली -100060 फोन : 4318-7878, फैक्स : 4318-7878 वेबसाइट : www.thenationaltrust.co.in 

चीफ कमिश्नर फॉर पर्सन्स विद ऑफ डिसेबिलिटीज 6, भगवान दास रोड, नई दिल्ली - 110001 फोन : 23386154/23386054, फैक्स : 23386054 वेबसाइट : www.ccdisabilities.nic.in 

दृष्टिहीनों के लिए 
दृष्टिहीनता के लेवल के मुताबिक एड इस्तेमाल किए जाते हैं। मसलन अगर पूरी तरह दृष्टिदोष नहीं है यानी थोड़ा-बहुत दिखाई देता है तो एलवीए (लो विजन एड) इस्तेमाल किए जाते हैं। खास एलवीए हैं : 

हैंडहेल्ड मैग्निफायर 
 इसे हाथ में पकड़कर पढ़ने आदि के लिए इस्तेमाल करते हैं। लो-विजन एक्सपर्ट हेमंत पांडे के मुताबिक यह छोटे अक्षरों को बड़ा कर दिखाता है। अक्षरों के बड़ा होने से उनके बीच फासला आ जाता है और एक-एक अक्षर को जोड़कर पढ़ पाना मुमकिन होता है। कीमत : 70 से 2500 रुपये तक 

ऑप्टिकल टेलिस्कोप 
 यह चश्मे के ऊपर लगाया जाता है। दूर की चीजों को पास दिखाता है। उनकी शार्पनेस भी बढ़ा देता है। ड्राइविंग आदि में खासतौर पर यूजफुल होता है। कीमत : 5000 रुपये तक 

क्लोज्ड सर्किट टीवी 
 इसमें टीवी और कैमरा होता है। कैमरे में हाइ-पावर के लेंस लगे होते हैं, जिनके जरिए किताब आदि पढ़ सकते हैं। प्रिंट 50 गुना तक बढ़ जाता है, जो स्क्रीन पर नजर आता है। कीमत : 30,000 रुपये तक 

जूमर/ मैग्निफायर 
कंप्यूटर में जूमर या मैग्निफायर की मदद से किसी पिक्चर या टेक्स्ट का साइज बढ़ाया जा सकता है। ये पेड और फ्री, दोनों होते हैं। इंटरनेट पर बहुत सारे फ्री मिलते हैं। 

ऐसे ही कुछ जूमर हैं : 
वर्चुअल मैग्निफाइंग ग्लास 3.5 : डाउनलोड करें, http://magnifier.sourceforge.net/ 

मैजिकल ग्लास : डाउनलोड करें, http://freestone-group.com/magg.htm 

मैग्निफायर 2.2 : डाउनलोड करें, http://www.iconico.com/magnifier/ 

जूम प्लस : डाउनलोड करें, http://gipsysoft.com/zoomplus

सुपर मैग्निफाई 1.2 : डाउनलोड करें, http://www.theabsolute.net

मेजर : डाउनलोड करें, http://www.theabsolute.net/ 

प्रोजेक्टर मैग्नीफायर 
यह मैग्नीफायर प्रोजेक्टर या लैपटॉप पर लगाए जानेवाले स्लाइड का साइज बड़ा कर देता है। इसे ज्यादातर ब्लाइंड्स के स्कूलों आदि में यूज करते हैं। वैसे घरों में भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। लैपटॉप के सामने घर की दीवार पर स्क्रीन लगाकर इसकी मदद से पढ़ सकते हैं। 

जिनके पास बिल्कुल रोशनी नहीं 
जो लोग बिल्कुल नहीं देख पाते, उन्हें भी निराश नहीं होना चाहिए। आजकल उनके लिए कई तरह की तकनीकें मौजूद हैं। 

रिफ्रेशेबल ब्रेल 
यह इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस है, जिसे कंप्यूटर पर चलाए जाने से उस लाइन में लिखे शब्द उभर जाते हैं। कीमत : 80 हजार से 2 लाख रुपये तक। 

स्क्रीन रीडर 
स्क्रीन रीडर को हाल-फिलहाल की सबसे बेहतर तकनीक माना जा सकता है। जो लोग बिल्कुल नहीं देख पाते या जिनको थोड़ा-बहुत दिखता है, दोनों ही स्क्रीन रीडर की मदद से कंप्यूटर पर पढ़ और लिख सकते हैं। जब भी स्क्रीन के किसी हिस्से पर कर्सर जाता है तो वहां लिखे शब्द को कंप्यूटर बोल देता है। स्क्रीन रीडर की मदद से ईमेल भेजने से लेकर सॉफ्टवेयर डाउनलोड करने और प्रोग्रामिंग करने तक के काम किया जा सकता है। हालांकि यह फोटोशॉप, कोरल जैसे ग्राफिक सॉफ्टवेयर्स पर काम नहीं करता। कुछ खास स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर हैं : 

JAWS (Job Access With Speech) : freedom scientific द्वारा डिवेलप यह सॉफ्टवेयर हिंदी और इंग्लिश दोनों को सपोर्ट करता है। रीयल स्पीक सोलो (जिसे बोलचाल की भाषा में लेखा कहा जाता है) के जरिए टेक्स्ट को हिंदी में भी सुना जा सकता है। यह JAWS के साथ ही काम करता है। कीमत : करीब 20,000 रुपये 

 Super Nova : dolphin.com द्वारा तैयार यह स्क्रीन रीडर हिंदी और इंग्लिश, दोनों को सपोर्ट करता है। कीमत : 19,000 रुपये 

NVDA : यह फ्री सॉफ्टवेयर अच्छा है। यह विंडोा पर काम करता है लेकिन पावरपॉइंट, जावा जैसे प्रोग्राम्स को सपोर्ट नहीं करता। डाउनलोड करें : www.nvda-project.org

ORCA : यह फ्रीवेयर लाइनेक्स में इनबिल्ट होता है। डाउनलोड करें : projects.gnome.org/orca/ 

Thunder यह फ्रीवेयर विंडोज 7, एक्सपी और विस्टा पर काम करता है। डाउनलोड करें : http://www.screenreader.net/ 

Windows narrator विंडोज में इनबिल्ट होता है। ChromeVox : गूगल द्वारा तैयार यह सॉफ्टवेयर विंडोज, लाइनेक्स, मैक, क्रोम पर काम करता है। VoiceOver : एपल प्रॉडक्ट्स के साथ फ्री मिलता है। आई फोन, आई पैड, आई पॉड आदि में काम करता है। 

सूटेबल मोबाइल 
आजकल मोबाइलों में दृष्टिहीनों की मदद के लिए काफी सारे फीचर आ गए हैं। इनमें स्क्रीन रीडर, बुक रीडर, नैविगेशन (रास्ता गाइड करना) आदि फीचर होते हैं, जिनकी मदद से दृष्टि से वंचित लोग भी आम लोगों की तरह मोबाइल के सारे फंक्शन (कॉल, एसएमएस, ईमेल, नेट सर्फिंग आदि ) इस्तेमाल कर पाते हैं। सूटेबल मोबाइल तकनीक को ऑपरेटिंग सिस्टम के आधार पर तीन कैटिगरी में बांटा जा सकता है : 

 - आईओएस : एपल के आई-फोन्स में यह फीचर इनबिल्ट होता है। हालांकि ये फोन काफी महंगे होते हैं। 
 - सिंबियन : हमारे देश में सबसे ज्यादा यही फोन यूज होते हैं। नोकिया के एन और ई सीरीज के फोंस पर मोबाइस स्क्रीन रीडर काम करते हैं। विदेशों में यह तकनीक काफी महंगी है लेकिन हमारे यहां (सक्षम के पास) 1800 रुपये में मिल जाती है। 
 - एंड्रॉयड : मोटोरोला, सैमसंग, एचटीसी आदि के फोंस में काम करता है। एंड्रॉयड माकेर्ट से फ्री में डाउनलोड कर सकते हैं। 

यह है खास मोबाइल 
बाप्सी (बाइडायरेक्शनल एक्सेस प्रमोशन सोसायटी) के प्रेजिडेंट अरुण मेहता और सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर अमोल आनंद के मुताबिक, जो न देख सकते हैं, न सुन सकते हैं, न बोल सकते हैं, उनके लिए खास पॉकेट एसएमएस मोबाइल ऐप्लिकेशन तैयार की गई है। इसमें एसएमएस सीधा वाइब्रेट हो जाएगा, जिससे मालूम हो जाएगा कि एसएमएस आया है। स्क्रीन पर बटन मौजूद होगा। उसे दबाने से एसएमएस वाइब्रेशन के जरिए कम्युनिकेट हो जाएगा। इसके लिए मोर्स कोड तकनीक इस्तेमाल की गई है। मोर्स कोड में हर अक्षर का एक कोड होता है। मसलन, अगर डॉट पर मोबाइल एक सेकंड के लिए वाइब्रेट होगा तो डैश पर तीन सेकंड के लिए। फिलहाल यह तकनीक इंग्लिश में ही काम करती है। अगर सेंड करना है तो बटन लंबे समय के लिए दबाएंगे। स्क्रीन पर उंगली से जो कुछ लिखेंगे, वह स्क्रीन पर लिख जाएगा। फिर जिसने एसएमएस भेजा है, उसे जवाब देना है तो TX लिखेंगे। अगर किसी और को भेजना है तो NX लिखेंगे। NX लिखने के बाद स्क्रीन पर नंबर लिखना होगा। 

नोट : यह फ्रीफेयर एंड्रॉयड मोबाइल पर ही चलेगा। इसे वेबसाइट www.bapsi.org से डाउनलोड कर सकते हैं।  

ये भी काम के ब्रेल स्लेट्स : 
सक्षम की डायरेक्टर रूमी सेठ के मुताबिक स्टाइलस (पेंसिल जैसा) की मदद से पेपर पर डॉट्स बनाए जाते हैं, जिनकी मदद से बच्चे शुरू में पढ़ना सीखते हैं। कीमत : 100 रुपये तक 

टेलर फ्रेम : 
इससे मैथ्स सिखाया जाता है। हिबिस्कस भी इस काम के लिए इस्तेमाल करते हैं। डिजिटल बुक्स : डिजिटल बुक्स (डेजी डिजिटल बुक्स) टॉकिंग और ई-टेक्स्ट बुक, दोनों फॉरमैट में मिलती हैं। सीडी के रूप में बाजार में तमाम सब्जेक्ट्स पर टॉकिंग बुक्स उपलब्ध हैं। इनमें किताबों का मैटर एमपी-3 फॉरमैट में होता है। इन्हें कहीं भी और कभी भी पढ़ा जा सकता है। बस जरूरत कंप्यूटर या लैपटॉप की होती है, जिस पर फ्री में www.daisy.org सॉफ्टवेयर डाउनलोड कर सकते हैं। ऑनलाइन ब्रेल लाइब्रेरी www.oblindia.org से कैटलॉग लेकर ई-टेक्स्ट लाइब्रेरी www.bookshare.org से बुक डाउनलोड कर सकते हैं। इसके बाद ब्रेल या स्क्रीन रीडिंग सॉफ्टवेयर की मदद से पढ़ सकते हैं या ब्रेल में प्रिंटआउट ले सकते हैं। 

नेटबुक : 
इस स्पेशल नेटबुक में एक बटन होता है, जिसकी मदद से किताब के किसी भी सेक्शन पर जा सकते हैं। इसके लिए खास टूल मौजूद है। इसे www.samarth.saksham.org से फ्री डाउनलोड कर सकते हैं। इसकी मद से कंप्यूटर पर किताब पढ़ने, लिखने, डिक्शनरी देखने, अखबार पढ़ने जैसे सारे काम कर सकते हैं। ब्रेल नहीं है तो ऑडियो के जरिए पढ़ सकते हैं। यह सुविधा इंग्लिश के अलावा हिंदी, कन्नड़ और तमिल में भी उपलब्ध है।  

चेक प्रिंटिंग टैम्पलेट्स : 
इसकी मदद से किसी भी आम प्रिंटर से दृष्टिहीन खुद अपना चेक लिख सकते हैं। इसे www.prashant.myehome.in से फ्री डाउनलोड कर सकते हैं। 

करंसी आइडेंटिफायर : 
कुल 30 रुपये में आनेवाले इस आइडेंटिफायर की मदद से छूकर पता लगाया जा सकता है कि नोट कितने रुपये का है। 

टॉकिंग कैलकुलेटर : 
बोलकर जोड़, गुणा आदि बताता है। कीमत : 350 रुपये 

टॉकिंग रिस्ट वॉच : 
यह कलाई घड़ी बोलकर टाइम की जानकारी देती है। कीमत : 300 रुपये 

टेबल क्लॉक : 
बोलकर टाइम बताती है यह टेबल क्लॉक। कीमत : 500 रुपये 

थर्मोमीटर : 
अगर टेंपरेचर लेना होता हो तो यह बोलकर आपको बता देता है कि आपको कितना बुखार है। कीमत : 250 रुपये 

ब्रेल बॉल और कार्ड्स : 
ब्रेल प्लेयिंग कार्ड्स और क्रिकेट बॉल्स एंटरटेनमेंट के अच्छे साधन हैं। कार्ड्स ब्रेल लिपि में होते हैं तो बॉल से आवाज आती है। कीमत : 20 रुपये 

नोट : ये आइटम ब्लाइंड स्कूल आदि में मिल जाते हैं। नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ विजुअली हैंडिकैप्ड, चेन्नै से मंगा सकते हैं। फोन : 044-26274476, 26272505 या e-mail: nivhrc@mail.com पर मेल कर सकते हैं। पूरी जानकारी के लिए देखें :www.nivh.org.in इसके अलावा, दिल्ली एनसीआर में एनजीओ सक्षम भी ये आइटम मुहैया कराता है। यहां दिए गए ज्यादातर आइट्म्स के रेट सक्षम ने मुहैया कराए हैं। फोन : 011-26162707, वेबसाइट : www.saksham.org 

यहां से मिल सकती है मदद

- अली यावर जंग नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ द हियरिंग हैंडिकैप्ड, दिल्ली (AYJNIHH) फोन : 011-2982-5094/95, 
यह हेल्पलाइन आमतौर पर काम के घंटों में काम करती है। वेबसाइट : ayjnihh.nic.in

ऑल इंडिया कन्फेडरेशन ऑफ द ब्लाइंड्स, दिल्ली (AICB) फोन : 011-2705-4082, 98106-84208 वेबसाइट : www.aicb.in 

नैशनल असोसिएशन फॉर ब्लाइंड्स, दिल्ली फोन : 011-2617-5886, 2610-2944 वेबसाइट : www.nabdelhi.org

जानें कैसे बोल पाते हैं स्टीफन हॉकिंग 
 नामी ब्रिटिश साइंटिस्ट स्टीवन हॉकिंग की जिंदगी उन तमाम लोगों के लिए एक मिसाल है, जो बोल नहीं सकते। हॉकिंग एक न्यूरोलॉजिकल डिस्ऑर्डर का शिकार हैं, जिसमें इंसान बोलने, चलने, हिलने-डुलने का मोहताज हो जाता है। हॉकिंग एक स्पीच जेनरेटिंग डिवाइस की मदद से अपनी बात रखते हैं। यह डिवाइस उनके छोटे-छोटे लिप मूवमेंट और शरीर में होनेवाली हरकतों को कैच कर वॉयस सिंथेसाइजर की मदद से बोलता है। हॉकिंग किस तरह तकनीक की मदद से लगातार दूसरों के लिए प्रेरणा साबित हो रहे हैं, जानने के लिए देखे ऑग्युमेंटेटिव रिएलिटी। 

एक्सपर्ट्स पैनल - डॉ. धीरेंद्र सिंह, कंसल्टेंट (ईएनटी), रॉकलैंड हॉस्पिटल - डॉ. अतुल मित्तल, सीनियर कंसल्टेंट (ईएनटी), मैक्स हॉस्पिटल - डॉ. संजय तेवतिया, सीनियर आई कंसल्टेंट - दीपेंद्र मनोचा, फाउंडर/डायरेक्टर, सक्षम - हिमांशु सिंह, ऑडियॉलजिस्ट ऐंड स्पीच थेरपिस्ट - अरुण शर्मा, कंप्यूटर ट्रेनर(नवभारत टाइम्स ,दिc,19.२.१२)

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