शनिवार, 3 मार्च 2012

नजर, जुबान और कान बनती तकनीक

हर बच्चा अपने आप में खास होता है, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जो किन्हीं वजहों से शारीरिक तौर पर कुछ कमतर रह जाते हैं। उनकी मदद के लिए आज हमारे पास तमाम तकनीकें मौजूद हैं। इनके जरिए उनकी जिंदगी आसान और बेहतर बन सकती है। ऐसी ही तकनीक और उपकरणों की जानकारी एक्सपर्ट्स की मदद से दे रही हैं प्रियंका सिंह : 

कैसी-कैसी परेशानियां 
बच्चा न सुन पाता हो, न बोल पाता हो, न देख पाता हो 
ऐसा बमुश्किल ही होता है, जब बच्चे के पास बोलने, देखने और सुनने, तीनों की क्षमता न हो। ऐसे बच्चों को कुछ भी सिखाना और समझाना बहुत मुश्किल होता है। आमतौर पर अगर बच्चा देख नहीं पाता तो उसके सुनने की क्षमता काफी अच्छी होती है और अगर सुन नहीं पाता तो उसकी आंखें काफी तेज होती हैं। ऐसा इसलिए होता कि अगर दिमाग का ऑडिटरी एरिया (सुनने की क्षमता प्रदान करनेवाला एरिया) खत्म हो जाता है तो विजुअल एरिया (देखने की क्षमतावाला एरिया) ज्यादा डिवेलप हो जाता है। बधिर बच्चे अक्सर लिप मूवमेंट भी पढ़ लेते हैं। इसी तरह दृष्टिहीनों को छोटी-छोटी आवाजें भी आसानी से सुनाई दे जाती हैं। 

न सुन पाता हो, न बोल पाता हो 
बच्चा अगर पैदाइशी तौर पर सुन नहीं पाता, तो वह आमतौर पर बोल भी नहीं पाता। इसकी वजह है कि बच्चा जो सुनता है, उसे दोहरा कर ही बोलना सीखता है। अगर उसने शब्द सुने ही नहीं, तो वह बोल भी नहीं पाएगा। 

बच्चा बोल पाता हो, पर सुन न पाता हो 
कोई-कोई बच्चा सुन पाता है लेकिन बोल नहीं पाता। हालांकि ऐसा बहुत कम होता है। दिमाग के बोलने के एरिया में अगर कोई दिक्कत हो या बाद में इन्फेक्शन हो गया हो, मसलन मेनिंजाइटिस (दिमागी बुखार) जैसी बीमारी हो जाए तो सुनने की क्षमता खत्म हो सकती है। ऐसे में बच्चे ने बीमार होने के वक्त तक अगर पूरा बोलना शुरू कर दिया है या जितने भी शब्द सीखे हैं, उन्हें वह आगे भी बोल पाएगा लेकिन सुन नहीं पाएगा। 

मूक-बधिरों के लिए 
सबसे पहले यह जानना चाहिए कि बच्चे की सुनने की क्षमता ठीक है या नहीं। इसके लिए बच्चे के जन्म के फौरन बाद ओएई (ओटोअकूस्टिक इमिशन) टेस्ट कराना चाहिए। वैसे, इस टेस्ट को बाद में भी करा सकते हैं लेकिन जितना जल्दी कराएं, उतना अच्छा है। इससे पता लग जाएगा कि बच्चा सुन पाता है या नहीं। आईओए के अलावा बेरा, एएसएसआर आदि टेस्ट भी बच्चे की सुनने की क्षमता जानने के लिए होते हैं। आमतौर पर कोई भी बच्चा सुनने में पूरी तरह नाकाम नहीं होता। वह कुछ फीसदी जरूर सुन पाता है। ऐसे में जितनी जल्दी हेयरिंग एड का इस्तेमाल शुरू करा दें, उतना अच्छा है। अगर किसी बच्चे ने बचपन में हेयरिंग एड लगाया हो तो उसे सुनाई देने लगता है। फिर वह बोलना भी शुरू कर सकता है। 

हियरिंग एड (कान की मशीन) 
दो तरह के हियरिंग एड आते हैं : एनालॉग और डिजिटल। एनालॉग के मुकाबले डिजिटल एड बेहतर होते हैं क्योंकि इनमें आवाज ज्यादा साफ सुनाई देती है। ये ऑटो एडजस्टेबल होते हैं। हालांकि ये एनालॉग के मुकाबले महंगे भी होते हैं। अच्छे एड कस्टमाइज्ड होते हैं। मसलन अगर किसी फ्रीक्वेंसी में किसी का हेयरिंग लॉस कम है और किसी में ज्यादा तो उसी के अनुसार एड काम करता है। 

हियरिंग एड की तीन कैटिगरी होती हैं : 
1. पॉकेट मॉडल एड 
हियरिंग एड में सबसे बेसिक बॉडी लेवल एड है। इसे पॉकेट मॉडल भी कहा जाता है क्योंकि यह छोटा-सा डिवाइस होता है, जिसे पॉकेट में रखते हैं। इसकी बॉडी में माइक्रोफोन, एम्प्लिफायर और कंट्रोल्स होते हैं। एक कॉर्ड से इलेक्ट्रिक सिग्नल रिसीवर में भेजा जाता हैं, जोकि इस सिग्नल को आवाज में बदलता है। सुनने में जितनी परेशानी होती है, उसके मुताबिक आवाज का लेवल तय होता है। 
कीमत : 1000 से 5000 रुपये तक। 


2. BTE (Behind the Ear) 
कान के पीछे लगाने वाले एड आमतौर पर छोटे बच्चों को लगाए जाते हैं क्योंकि वे पॉकेट मॉडल एड को ढंग से संभाल नहीं पाते। यह कान के पीछे पहना जाता है। 
कीमत : 3000 से 3 लाख रुपये तक। 

3. ITE (In the Ear) इन द इयर, इन द कैनाल और कंप्लीट इन द कैनाल, ये तीनों कॉस्मेटिकली डिजाइन एड होते हैं। ये कान में अंदर की तरफ लगते हैं इसलिए बाहर से कम या बिल्कुल दिखाई नहीं देते। हालांकि इनकी सीमा है कि जहां बिल्कुल सुनाई नहीं देता, वहां ये काम नहीं करते। पूरा डिवाइस कान में या कान की नली में होता है। हियरिंग एड को एक सख्त प्लास्टिक के कवच में रखा जाता है। इस प्लास्टिक के कवच को कान के आकार के हिसाब से खास तौर पर बनाया जाता है। 

कीमत : 8-10 हजार से 3 लाख रुपये तक। 

कौन-से एड बेहतर 
जिस हियरिंग एड में जितने ज्यादा चैनल होते हैं, उसकी क्वॉलिटी उतनी ज्यादा अच्छी होती है। वरनाफोन, सीमेंस, पायरेक्स, फोनेक्स, एल्प आदि के हियरिंग एड को अच्छा माना जाता है। गरीबों को सरकार मुफ्त में भी पॉकेट मॉटल या बीटीई हियरिंग एड मुहैया कराती है। 

कान के लिए इम्प्लांट्स कॉकलियर इम्प्लांट्स 
अगर बच्चे को हियरिंग एड का ज्यादा फायदा नहीं हो रहा या उसे बहुत कम सुनाई देता है तो कॉकलियर इम्प्लांट लगवाना बेहतर है। इनका रिजल्ट हियरिंग मशीन से बेहतर होता है। लेकिन ये काफी महंगे पड़ते हैं। इसके अलावा, अगर एड में कोई खराबी आ जाती है तो फिर से सर्जरी करनी पड़ती है। कॉकलियर इम्प्लांट, जितना जल्दी हो सके करा देना चाहिए। इसकी वजह यह है कि ब्रेन के स्पीच एरिया का विकास पांच साल की उम्र के बाद खत्म हो जाता है। अगर कॉकलियर इम्प्लांट पांच साल के बाद होता है तो बच्चा सुन पाएगा लेकिन बोल नहीं पाएगा। जितनी जल्दी बच्चा सुनेगा, उतनी जल्दी बोल पाएगा। जन्म के एक साल के बाद लेकिन पांच साल से पहले कॉकलियर इम्प्लांट जरूर करा लेना चाहिए। 

कैसे काम करता है 
कॉकलियर इम्प्लांट्स उन लोगों में किया जाता है, जिनके कान के अंदरूनी हिस्से (इनर इयर) में खराबी हो। इनर इयर को सर्जरी के जरिए बायपास कर ऑडिटरी नर्व्स (सुनने वाली नस) को एक्टिव करते हैं, जिससे मेसेज सीधे ब्रेन में चला जाता है। सर्जरी अगर कामयाब होती है तो दो हफ्ते के बाद प्रोसेसर को चार्ज करते हैं। प्रोसेसर बाहर से गोलाकार होता है, जो आवाजों को जमा कर अंदर भेज देता है। इसे कान के पीछे लगाया जाता है। इसके बाद एक-दो साल स्पीच थेरपी करते हैं, तब बच्चा सुनना शुरू कर पाता है। अगर सुनने की क्षमता बाद में खराब हुई है तो ज्यादा स्पीच थेरपी की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन अगर जन्म से सुनाई नहीं देता था तो स्पीच थेरपी पर काफी काम करना पड़ता है। 

खर्च 5 से 10 लाख रुपये तक का इम्प्लांट आता है और एक-डेढ़ लाख रुपये ऑपरेशन का खर्च आता है। सरकारी अस्पताल में ऑपरेशन फ्री होता है। लेकिन इम्प्लांट का पैसा देना होता है। 

कौन-सा बेहतर 
मेडल, कॉकलियर, एडवांस बायोनिक्स आदि। 

बाहा (BAHA) 
अगर मिडल इयर में पस या कोई और प्रॉब्लम होती है, जिसकी वजह से आउटर इयर में हियरिंग एड नहीं लगा पा रहे हैं तो बोन एंकर्ड हियरिंग एड लगाया जाता है। यह सर्जरी के जरिए कान के पीछे वाली हड्डी पर लगाया जाता है। 

क्रॉस (CROSS) 
कॉन्ट्रालेटरल रूटिंग ऑफ साइड सिग्नल उन लोगों में लगाया जाता है, जिन्हें एक कान में बिल्कुल सुनाई नहीं देता, यानी जिनके एक कान की नर्व्स खराब हैं। जिस कान से सुनाई नहीं दे रहा है, उसमें एक बटन इम्प्लांट लगाकर साउंड को दूसरी ओर मोड़ देते हैं। इस तरह वह ठीक कान तक पहुंच जाती है और मरीज के सुनने की क्षमता बढ़ जाती है। 
खर्च : 3 लाख रुपये। सरकारी अस्पतालों में ऑपरेशन मुफ्त होता है। सिर्फ एड का पैसा देना होता है।

एबीआई (ABI) 
ऑडिटरी ब्रेनस्टेम इम्प्लांट उन मामलों में लगाया जाता है, जिनके कान में नहीं, कान से दिमाग तक मेसेज पहुंचानेवाली नसों में खराबी होती है। यह भी महंगा इलाज है। 

मशीन लगाने या इम्प्लांट के बाद 
 एड लगाने के बाद ऑडिटरी ट्रेनिंग बहुत जरूरी है। अगर बच्चे को बाद में सुनाई देना बंद हुआ है तो उसे कम ऑडिटरी ट्रेनिंग की जरूरत होती है। इसके बाद स्पीच एंड लैंग्वेज थेरपी देते हैं। इसमें हरेक शब्द को बताते हैं कि इसे कैसे बोला जाता है। अगर मशीन का इस्तेमाल या कॉकलियर इम्प्लांट तीन साल से पहले कर दिया जाता है तो बच्चा करीब-करीब नॉर्मल बच्चों की तरह की बोल और सुन पाता है। 

एएसी (ACC) 
ऑल्टरनेटिव ऑग्मेंटेटिव कम्युनिकेशन डिवाइस आमतौर पर उन मामलों में इस्तेमाल किए जाते हैं, जिनमें बच्चा सुनने और बोलने के साथ-साथ चलने-फिरने में भी अक्षम हो या फिर पूरी कोशिश के बाद भी बच्चा बोलना न सीख पाया हो। ये मोटे तौर पर तीन तरह के होते हैं : 

इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस 
इस डिवाइस में हर काम के लिए अलग-अलग बटन बने होते हैं। जो बटन दबाते हैं, उसकी आवाज आ जाती है। मसलन, खाना, पानी आदि। इस आवाज को सुनकर घर के लोग मदद करने आ आते हैं। यह डिवाइस काफी महंगा होता है और हर जगह मिलता नहीं है। इसी कैटिगरी में आवाज नामक डिवाइस भी है, जिसे वीलचेयर में लगा दिया जाता है। इसे गोद में भी रखा जा सकता है और डेस्क पर भी। यह हाथ, पैर और सिर के हर छोटे मूवमेंट को पकड़ता है और उसे वाक्य में तब्दील कर देता है। इसकी कीमत करीब 30 हजार रुपये है। 

कंप्यूटर बेस्ड डेडिकेटेड सॉफ्टवेयर 
कंप्यूटर की टेक्नॉलजी को यूज करते हुए कुछ सॉफ्टवेयर डिजाइन किए गए हैं। ये काफी एडवांस होते हैं। छोटे-से डिवाइस पर छोटी-सी स्क्रीन होती है। उसी पर अलग-अलग कामों के ऑप्शन होते हैं। 

ध्यान दें 
- अगर महंगा होने की वजह से इम्प्लांट नहीं करवा सकते तो हियरिंग एड जरूर लगवाएं। 
- डम न कहकर म्यूट या हियरिंग इम्पेयर्ड कहना चाहिए ऐसे लोगों को। 

कर सकते हैं शिकायत 
इन स्पेशल बच्चों को स्पेशल स्कूलों के साथ-साथ सामान्य स्कूलों में भी दाखिले का हक है। कोई भी स्कूल इससे इनकार नहीं कर सकता। अगर कोई स्पेशल बच्चा अपनी तरह के दूसरों बच्चों से बेहतर कर रहा है तो कोशिश होनी चाहिए कि वह सामान्य स्कूल में दूसरे बच्चों के साथ पढ़ सके। इससे उसे सामान्य बच्चों के साथ घुलने-मिलने में मदद मिलती है। 

अगर कोई स्कूल दाखिला देने से इनकार करता है तो मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस ऐंड एम्पावरमेंट के तहत नैशनल ट्रस्ट ऑफ इंडिया और चीफ कमिश्नर फॉर पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज को शिकायत कर सकते हैं। 

पता है 
नैशनल ट्रस्ट ऑफ इंडिया 16- बी, बड़ा बाजार रोड, ओल्ड राजेंद नगर, नई दिल्ली -100060 फोन : 4318-7878, फैक्स : 4318-7878 वेबसाइट : www.thenationaltrust.co.in 

चीफ कमिश्नर फॉर पर्सन्स विद ऑफ डिसेबिलिटीज 6, भगवान दास रोड, नई दिल्ली - 110001 फोन : 23386154/23386054, फैक्स : 23386054 वेबसाइट : www.ccdisabilities.nic.in 

दृष्टिहीनों के लिए 
दृष्टिहीनता के लेवल के मुताबिक एड इस्तेमाल किए जाते हैं। मसलन अगर पूरी तरह दृष्टिदोष नहीं है यानी थोड़ा-बहुत दिखाई देता है तो एलवीए (लो विजन एड) इस्तेमाल किए जाते हैं। खास एलवीए हैं : 

हैंडहेल्ड मैग्निफायर 
 इसे हाथ में पकड़कर पढ़ने आदि के लिए इस्तेमाल करते हैं। लो-विजन एक्सपर्ट हेमंत पांडे के मुताबिक यह छोटे अक्षरों को बड़ा कर दिखाता है। अक्षरों के बड़ा होने से उनके बीच फासला आ जाता है और एक-एक अक्षर को जोड़कर पढ़ पाना मुमकिन होता है। कीमत : 70 से 2500 रुपये तक 

ऑप्टिकल टेलिस्कोप 
 यह चश्मे के ऊपर लगाया जाता है। दूर की चीजों को पास दिखाता है। उनकी शार्पनेस भी बढ़ा देता है। ड्राइविंग आदि में खासतौर पर यूजफुल होता है। कीमत : 5000 रुपये तक 

क्लोज्ड सर्किट टीवी 
 इसमें टीवी और कैमरा होता है। कैमरे में हाइ-पावर के लेंस लगे होते हैं, जिनके जरिए किताब आदि पढ़ सकते हैं। प्रिंट 50 गुना तक बढ़ जाता है, जो स्क्रीन पर नजर आता है। कीमत : 30,000 रुपये तक 

जूमर/ मैग्निफायर 
कंप्यूटर में जूमर या मैग्निफायर की मदद से किसी पिक्चर या टेक्स्ट का साइज बढ़ाया जा सकता है। ये पेड और फ्री, दोनों होते हैं। इंटरनेट पर बहुत सारे फ्री मिलते हैं। 

ऐसे ही कुछ जूमर हैं : 
वर्चुअल मैग्निफाइंग ग्लास 3.5 : डाउनलोड करें, http://magnifier.sourceforge.net/ 

मैजिकल ग्लास : डाउनलोड करें, http://freestone-group.com/magg.htm 

मैग्निफायर 2.2 : डाउनलोड करें, http://www.iconico.com/magnifier/ 

जूम प्लस : डाउनलोड करें, http://gipsysoft.com/zoomplus

सुपर मैग्निफाई 1.2 : डाउनलोड करें, http://www.theabsolute.net

मेजर : डाउनलोड करें, http://www.theabsolute.net/ 

प्रोजेक्टर मैग्नीफायर 
यह मैग्नीफायर प्रोजेक्टर या लैपटॉप पर लगाए जानेवाले स्लाइड का साइज बड़ा कर देता है। इसे ज्यादातर ब्लाइंड्स के स्कूलों आदि में यूज करते हैं। वैसे घरों में भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। लैपटॉप के सामने घर की दीवार पर स्क्रीन लगाकर इसकी मदद से पढ़ सकते हैं। 

जिनके पास बिल्कुल रोशनी नहीं 
जो लोग बिल्कुल नहीं देख पाते, उन्हें भी निराश नहीं होना चाहिए। आजकल उनके लिए कई तरह की तकनीकें मौजूद हैं। 

रिफ्रेशेबल ब्रेल 
यह इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस है, जिसे कंप्यूटर पर चलाए जाने से उस लाइन में लिखे शब्द उभर जाते हैं। कीमत : 80 हजार से 2 लाख रुपये तक। 

स्क्रीन रीडर 
स्क्रीन रीडर को हाल-फिलहाल की सबसे बेहतर तकनीक माना जा सकता है। जो लोग बिल्कुल नहीं देख पाते या जिनको थोड़ा-बहुत दिखता है, दोनों ही स्क्रीन रीडर की मदद से कंप्यूटर पर पढ़ और लिख सकते हैं। जब भी स्क्रीन के किसी हिस्से पर कर्सर जाता है तो वहां लिखे शब्द को कंप्यूटर बोल देता है। स्क्रीन रीडर की मदद से ईमेल भेजने से लेकर सॉफ्टवेयर डाउनलोड करने और प्रोग्रामिंग करने तक के काम किया जा सकता है। हालांकि यह फोटोशॉप, कोरल जैसे ग्राफिक सॉफ्टवेयर्स पर काम नहीं करता। कुछ खास स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर हैं : 

JAWS (Job Access With Speech) : freedom scientific द्वारा डिवेलप यह सॉफ्टवेयर हिंदी और इंग्लिश दोनों को सपोर्ट करता है। रीयल स्पीक सोलो (जिसे बोलचाल की भाषा में लेखा कहा जाता है) के जरिए टेक्स्ट को हिंदी में भी सुना जा सकता है। यह JAWS के साथ ही काम करता है। कीमत : करीब 20,000 रुपये 

 Super Nova : dolphin.com द्वारा तैयार यह स्क्रीन रीडर हिंदी और इंग्लिश, दोनों को सपोर्ट करता है। कीमत : 19,000 रुपये 

NVDA : यह फ्री सॉफ्टवेयर अच्छा है। यह विंडोा पर काम करता है लेकिन पावरपॉइंट, जावा जैसे प्रोग्राम्स को सपोर्ट नहीं करता। डाउनलोड करें : www.nvda-project.org

ORCA : यह फ्रीवेयर लाइनेक्स में इनबिल्ट होता है। डाउनलोड करें : projects.gnome.org/orca/ 

Thunder यह फ्रीवेयर विंडोज 7, एक्सपी और विस्टा पर काम करता है। डाउनलोड करें : http://www.screenreader.net/ 

Windows narrator विंडोज में इनबिल्ट होता है। ChromeVox : गूगल द्वारा तैयार यह सॉफ्टवेयर विंडोज, लाइनेक्स, मैक, क्रोम पर काम करता है। VoiceOver : एपल प्रॉडक्ट्स के साथ फ्री मिलता है। आई फोन, आई पैड, आई पॉड आदि में काम करता है। 

सूटेबल मोबाइल 
आजकल मोबाइलों में दृष्टिहीनों की मदद के लिए काफी सारे फीचर आ गए हैं। इनमें स्क्रीन रीडर, बुक रीडर, नैविगेशन (रास्ता गाइड करना) आदि फीचर होते हैं, जिनकी मदद से दृष्टि से वंचित लोग भी आम लोगों की तरह मोबाइल के सारे फंक्शन (कॉल, एसएमएस, ईमेल, नेट सर्फिंग आदि ) इस्तेमाल कर पाते हैं। सूटेबल मोबाइल तकनीक को ऑपरेटिंग सिस्टम के आधार पर तीन कैटिगरी में बांटा जा सकता है : 

 - आईओएस : एपल के आई-फोन्स में यह फीचर इनबिल्ट होता है। हालांकि ये फोन काफी महंगे होते हैं। 
 - सिंबियन : हमारे देश में सबसे ज्यादा यही फोन यूज होते हैं। नोकिया के एन और ई सीरीज के फोंस पर मोबाइस स्क्रीन रीडर काम करते हैं। विदेशों में यह तकनीक काफी महंगी है लेकिन हमारे यहां (सक्षम के पास) 1800 रुपये में मिल जाती है। 
 - एंड्रॉयड : मोटोरोला, सैमसंग, एचटीसी आदि के फोंस में काम करता है। एंड्रॉयड माकेर्ट से फ्री में डाउनलोड कर सकते हैं। 

यह है खास मोबाइल 
बाप्सी (बाइडायरेक्शनल एक्सेस प्रमोशन सोसायटी) के प्रेजिडेंट अरुण मेहता और सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर अमोल आनंद के मुताबिक, जो न देख सकते हैं, न सुन सकते हैं, न बोल सकते हैं, उनके लिए खास पॉकेट एसएमएस मोबाइल ऐप्लिकेशन तैयार की गई है। इसमें एसएमएस सीधा वाइब्रेट हो जाएगा, जिससे मालूम हो जाएगा कि एसएमएस आया है। स्क्रीन पर बटन मौजूद होगा। उसे दबाने से एसएमएस वाइब्रेशन के जरिए कम्युनिकेट हो जाएगा। इसके लिए मोर्स कोड तकनीक इस्तेमाल की गई है। मोर्स कोड में हर अक्षर का एक कोड होता है। मसलन, अगर डॉट पर मोबाइल एक सेकंड के लिए वाइब्रेट होगा तो डैश पर तीन सेकंड के लिए। फिलहाल यह तकनीक इंग्लिश में ही काम करती है। अगर सेंड करना है तो बटन लंबे समय के लिए दबाएंगे। स्क्रीन पर उंगली से जो कुछ लिखेंगे, वह स्क्रीन पर लिख जाएगा। फिर जिसने एसएमएस भेजा है, उसे जवाब देना है तो TX लिखेंगे। अगर किसी और को भेजना है तो NX लिखेंगे। NX लिखने के बाद स्क्रीन पर नंबर लिखना होगा। 

नोट : यह फ्रीफेयर एंड्रॉयड मोबाइल पर ही चलेगा। इसे वेबसाइट www.bapsi.org से डाउनलोड कर सकते हैं।  

ये भी काम के ब्रेल स्लेट्स : 
सक्षम की डायरेक्टर रूमी सेठ के मुताबिक स्टाइलस (पेंसिल जैसा) की मदद से पेपर पर डॉट्स बनाए जाते हैं, जिनकी मदद से बच्चे शुरू में पढ़ना सीखते हैं। कीमत : 100 रुपये तक 

टेलर फ्रेम : 
इससे मैथ्स सिखाया जाता है। हिबिस्कस भी इस काम के लिए इस्तेमाल करते हैं। डिजिटल बुक्स : डिजिटल बुक्स (डेजी डिजिटल बुक्स) टॉकिंग और ई-टेक्स्ट बुक, दोनों फॉरमैट में मिलती हैं। सीडी के रूप में बाजार में तमाम सब्जेक्ट्स पर टॉकिंग बुक्स उपलब्ध हैं। इनमें किताबों का मैटर एमपी-3 फॉरमैट में होता है। इन्हें कहीं भी और कभी भी पढ़ा जा सकता है। बस जरूरत कंप्यूटर या लैपटॉप की होती है, जिस पर फ्री में www.daisy.org सॉफ्टवेयर डाउनलोड कर सकते हैं। ऑनलाइन ब्रेल लाइब्रेरी www.oblindia.org से कैटलॉग लेकर ई-टेक्स्ट लाइब्रेरी www.bookshare.org से बुक डाउनलोड कर सकते हैं। इसके बाद ब्रेल या स्क्रीन रीडिंग सॉफ्टवेयर की मदद से पढ़ सकते हैं या ब्रेल में प्रिंटआउट ले सकते हैं। 

नेटबुक : 
इस स्पेशल नेटबुक में एक बटन होता है, जिसकी मदद से किताब के किसी भी सेक्शन पर जा सकते हैं। इसके लिए खास टूल मौजूद है। इसे www.samarth.saksham.org से फ्री डाउनलोड कर सकते हैं। इसकी मद से कंप्यूटर पर किताब पढ़ने, लिखने, डिक्शनरी देखने, अखबार पढ़ने जैसे सारे काम कर सकते हैं। ब्रेल नहीं है तो ऑडियो के जरिए पढ़ सकते हैं। यह सुविधा इंग्लिश के अलावा हिंदी, कन्नड़ और तमिल में भी उपलब्ध है।  

चेक प्रिंटिंग टैम्पलेट्स : 
इसकी मदद से किसी भी आम प्रिंटर से दृष्टिहीन खुद अपना चेक लिख सकते हैं। इसे www.prashant.myehome.in से फ्री डाउनलोड कर सकते हैं। 

करंसी आइडेंटिफायर : 
कुल 30 रुपये में आनेवाले इस आइडेंटिफायर की मदद से छूकर पता लगाया जा सकता है कि नोट कितने रुपये का है। 

टॉकिंग कैलकुलेटर : 
बोलकर जोड़, गुणा आदि बताता है। कीमत : 350 रुपये 

टॉकिंग रिस्ट वॉच : 
यह कलाई घड़ी बोलकर टाइम की जानकारी देती है। कीमत : 300 रुपये 

टेबल क्लॉक : 
बोलकर टाइम बताती है यह टेबल क्लॉक। कीमत : 500 रुपये 

थर्मोमीटर : 
अगर टेंपरेचर लेना होता हो तो यह बोलकर आपको बता देता है कि आपको कितना बुखार है। कीमत : 250 रुपये 

ब्रेल बॉल और कार्ड्स : 
ब्रेल प्लेयिंग कार्ड्स और क्रिकेट बॉल्स एंटरटेनमेंट के अच्छे साधन हैं। कार्ड्स ब्रेल लिपि में होते हैं तो बॉल से आवाज आती है। कीमत : 20 रुपये 

नोट : ये आइटम ब्लाइंड स्कूल आदि में मिल जाते हैं। नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ विजुअली हैंडिकैप्ड, चेन्नै से मंगा सकते हैं। फोन : 044-26274476, 26272505 या e-mail: nivhrc@mail.com पर मेल कर सकते हैं। पूरी जानकारी के लिए देखें :www.nivh.org.in इसके अलावा, दिल्ली एनसीआर में एनजीओ सक्षम भी ये आइटम मुहैया कराता है। यहां दिए गए ज्यादातर आइट्म्स के रेट सक्षम ने मुहैया कराए हैं। फोन : 011-26162707, वेबसाइट : www.saksham.org 

यहां से मिल सकती है मदद

- अली यावर जंग नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ द हियरिंग हैंडिकैप्ड, दिल्ली (AYJNIHH) फोन : 011-2982-5094/95, 
यह हेल्पलाइन आमतौर पर काम के घंटों में काम करती है। वेबसाइट : ayjnihh.nic.in

ऑल इंडिया कन्फेडरेशन ऑफ द ब्लाइंड्स, दिल्ली (AICB) फोन : 011-2705-4082, 98106-84208 वेबसाइट : www.aicb.in 

नैशनल असोसिएशन फॉर ब्लाइंड्स, दिल्ली फोन : 011-2617-5886, 2610-2944 वेबसाइट : www.nabdelhi.org

जानें कैसे बोल पाते हैं स्टीफन हॉकिंग 
 नामी ब्रिटिश साइंटिस्ट स्टीवन हॉकिंग की जिंदगी उन तमाम लोगों के लिए एक मिसाल है, जो बोल नहीं सकते। हॉकिंग एक न्यूरोलॉजिकल डिस्ऑर्डर का शिकार हैं, जिसमें इंसान बोलने, चलने, हिलने-डुलने का मोहताज हो जाता है। हॉकिंग एक स्पीच जेनरेटिंग डिवाइस की मदद से अपनी बात रखते हैं। यह डिवाइस उनके छोटे-छोटे लिप मूवमेंट और शरीर में होनेवाली हरकतों को कैच कर वॉयस सिंथेसाइजर की मदद से बोलता है। हॉकिंग किस तरह तकनीक की मदद से लगातार दूसरों के लिए प्रेरणा साबित हो रहे हैं, जानने के लिए देखे ऑग्युमेंटेटिव रिएलिटी। 

एक्सपर्ट्स पैनल - डॉ. धीरेंद्र सिंह, कंसल्टेंट (ईएनटी), रॉकलैंड हॉस्पिटल - डॉ. अतुल मित्तल, सीनियर कंसल्टेंट (ईएनटी), मैक्स हॉस्पिटल - डॉ. संजय तेवतिया, सीनियर आई कंसल्टेंट - दीपेंद्र मनोचा, फाउंडर/डायरेक्टर, सक्षम - हिमांशु सिंह, ऑडियॉलजिस्ट ऐंड स्पीच थेरपिस्ट - अरुण शर्मा, कंप्यूटर ट्रेनर(नवभारत टाइम्स ,दिc,19.२.१२)

8 टिप्‍पणियां:

  1. एक साथ, एक जगह, इतनी जानकारी प्रस्तुत कर देना आपके ही बस की बात है राधारमण जी।
    आभार इस प्रस्तुति के लिए।

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  2. बहुत सुन्दर मै प्रयास करुंगा कि इस जानकारी का उपयोग कर सकूं....

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  3. हमेशा की तरह बेहद उपयोगी जानकारी से भरा पोस्ट !
    आभार !

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  4. होली है होलो हुलस, हाजिर हफ्ता-हाट ।

    चर्चित चर्चा-मंच पर, रविकर जोहे बाट ।


    रविवारीय चर्चा-मंच

    charchamanch.blogspot.com

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  5. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    रंगों के त्यौहार होलिकोत्सव की अग्रिम शुभकामनाएँ!

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  6. शायद आपकी इस प्रविष्टी की चर्चाआज बुधवार के चर्चा मंच पर भी हो!
    सूचनार्थ

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