अपने देश में करीब 70 लाख लोग र्यूमेटाइड ऑर्थराइटिस से परेशान हैं। हर 3 में से एक महिला इस बीमारी की शिकार है। इसकी बड़ी वजह है तेज खर्राटे। सीताराम भरतिया इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड रिसर्च के सीनियर ऑर्थोपेडिक और ज्वाइंट रिप्लेसमेंट सर्जन डॉ. बीरेन नादकर्णी बता रहे हैं कि इस तकलीफ को करीब आने से कैसे रोक सकते हैं।
अक्सर हम अपने घर के सदस्यों से सुनते हैं कि तुम्हारे खर्राटों ने मेरी नींद खराब कर दी। अगर आप भी तेज खर्राटे लेते हैं तो सावधान हो जाइए, क्योंकि ये खर्राटे खुद आपकी नींद भी उड़ा सकते हैं।
हाल ही में ताइवान की मेडिकल यूनिवर्सिटी में हुए शोध के अनुसार जो लोग सोते वक्त तेज खर्राटे लेते हैं, उनमें हड्डियों की घातक बीमारी र्यूमेटायड ऑर्थराइटिस होने का खतरा दोगुना बढ़ जाता है। स्वीडन के करोलींस्का इस्टीटय़ूट में हुए अध्ययन के अनुसार अगर आप हफ्ते में तीन बार या उससे अधिक बीयर का सेवन करते हैं तो भी इस बीमारी की चपेट में आने की आशंका बढ़ जाती है।
रयूमेटाइड ऑर्थराइटिस रोगी को पंगु बना बिस्तर पर ला देती है। खास बात यह है कि यह बीमारी अधिकतर युवाओं व मध्य आयु के लोगों को अपना शिकार बनाती है। यह बीमारी 20 से 50 साल के लोगों में ज्यादा पाई जाती है और अधिकतर महिलाओं को होती है। रयूमेटायड ऑर्थराइटिस की वजह से जोड़ ढीले, असामान्य, कम गतिशील हो जाते हैं और उनमें ताकत समाप्त हो जाती है।
एक अनुमान के अनुसार भारत में रयूमेटायड अर्थराइटिस से लगभग 70 लाख लोग पीड़ित हैं। चिंता की बात यह कि इनमें से अधिकतर लोगों को बहुत देर से चलता है कि वे इस असहनीय बीमारी की चपेट में आ चुके हैं। इसका मुख्य कारण जानकारी का अभाव है।
यह एक ऑटो इम्यून बीमारी है जिसमें रोगी के शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली ही उसके शरीर को नुकसान पहुंचाने लगती है। इस तरह शरीर में कुछ ऐसे एंटीजन पैदा होते हैं जो कई हानिकारक रसायन जैसे साइटोकाइनिन्स उत्पन्न करते हैं।
इन रसायनों के कारण जोड़ों में पाया जाने वाला द्रव्य साइनोवियल सूखने लगता है तथा उनका आकार बिगड़ने लगता है, प्रभावित जोड़ के आसपास की त्वचा लाल व गर्म हो जाती है और इसके साथ-साथ असहनीय दर्द भी उत्पन्न होता है।
इलाज है
रोग का पता प्रारंभिक अवस्था में लग जाए तो बहुत हद तक इस पर काबू पाया जा सकता है, किंतु बिगड़े हुए मामलों में अधिक समय लगता है। रोग के अलग-अलग पहलुओं को ध्यान में रखकर ही इसका इलाज शुरू किया जाता है। देर से पता चलने पर जोड़ पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो जाता है और उसमें असहनीय दर्द होता है। ऐसी अवस्था में शल्य चिकित्सा का सहारा लेना पडता है। इस रोग में एक से अधिक जोड़ों के प्रभावित होने की वजह से शल्यचिकित्सा आसान नहीं होती है।
समय पर पहचान जरूरी
शुरू में रोगी को थकान, भूख न लगना, कमजोरी आदि महसूस होती है। अधिकतर लोग इन लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं। विषेशज्ञों के अनुसार यही इस बीमारी के बढ़ने व तकलीफदेह होने की मुख्य वजह हैं।
इसका इलाज सामान्य ऑर्थराइटिस से कहीं अधिक जटिल होता है। बीमारी बढ़ने पर हाथ-पैर की उंगलियों, कलाइयों और घुटनों में सूजन आ जाती है। यह समान्यत: दाएं व बाएं दोनों तरफ के जोड़ों में समान रूप से दिखाई पड़ती है। जोड़ों में सूजन के साथ दर्द होता है। जकड़न और दर्द सुबह के समय अधिक होता है। इस बीमारी में कुछ समय बाद हाथ व पैरों की उंगलियों में जकड़न के साथ टेढ़ापन आने लगता है जो बाद में अन्य जोड़ों में भी फैल जाता है।
इसके कारण उठने-बैठने, चलने-फिरने, सीढ़ियां चढ़ने, कंघी करने, लिखने, कपड़े निचोड़ने जैसे दैनिक कामों में भी बहुत ज्यादा तकलीफ का सामना करना पड़ता है(हिंदुस्तान,दिल्ली,30.8.12)।
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