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मंगलवार, 27 मार्च 2012

घाव भरने के आयुर्वेदिक नुस्ख़े

रोजमर्रा के जीवन में छोटी-मोटी लापरवाहियों के चलते चोट लगना एक आम बात है। लेकिन कई बार ये छोटे-मोटे एक्सीडेंट्स बड़ी परेशानी का का कारण बन सकते हैं। कुछ घाव ऐसे होते हैं जो जल्द भर जाते हैं और कुछ को भरने में वक्त लगता है। ऐसे ही घावों को जल्दी भरने के लिए हम आपको बताने जा रहे हैं कुछ आयुर्वेदिक उपाय। किसी भी प्रकार का घाव हुआ हो, टांके लगवाये हों या ऑपरेशन का घाव हो, अंदरूनी घाव हो या बाहरी हो, घाव पका हो या न पका हो लेकिन आपको प्रतिजैविक लेकर जठरा, आंतों, यकृत एवं गुर्दों को साइड इफेक्ट द्वारा बिगाडऩे की कोई जरूरत नहीं है बल्कि नीचे दिये जा रहे आसान घरेलू उपायों को अपनाकर किसी भी तरह के गहरे से गहरे घाव को जड़ से मिटाया जा सकता है- 

- घाव को साफ करने के लिए ताजे गोमूत्र का उपयोग करें। बाद में घाव पर हल्दी का लेप करें। 

- एक से तीन दिन तक उपवास रखें। ध्यान रखें कि उपवास के दौरान केवल उबालकर ठंडा किया हुआ या गुनगुना गर्म पानी ही पीना है, अन्य कोई भी वस्तु खानी-पीनी नहीं है। दूध भी नहीं लेना है। 

- उपवास के बाद जितने दिन उपवास किया हो उतने दिन केवल मूंग को उबाल कर जो पानी बचता है वही पानी पीना है। मूंग का पानी धीरे-धीरे गाढ़ा करके लिया जा सकता है। 

- मूंग के पानी के बाद धीरे-धीरे मूंग, खिचड़ी, दाल-चावल, रोटी-सब्जी इस प्रकार सामान्य खुराक पर आना चाहिये। 

- कब्ज की शिकायत हो तो रोज 1 चम्मच हरड़ का चूर्ण सुबह अथवा रात को पानी के साथ लें। 

- जिनके शरीर की प्रकृति ऐसी हो कि घाव होने पर तुरंत पक जाता हो, उन्हें त्रिफला गूगल नामक 3-3 गोली दिन में 3 बार पानी के साथ लेनी चाहिए। 

- सुबह 50 ग्राम गोमूत्र तथा दिन में 2 बार 3-3 ग्राम हल्दी के चूर्ण का सेवन करने से बहुत जल्दी लाभ होता है। 

- पुराने घाव में चन्द्रप्रभा वटी की 2-2 गोलियां दिन में 2 बार लें। 


-जात्यादि तेल अथवा मलहम घाव पर लगाएं इससे घाव जल्दी से भरने लगेगा(दैनिक भास्कर,उज्जैन,26.3.12)।

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बुधवार, 21 मार्च 2012

मधुमेह में आयुर्वेद

आयुर्वेद के अनुसार मधुमेह आसाध्य रोग है। अधिक आलसी या सुखभोगी लोगों में यह रोग होना सामान्य बात है। अधिक बार मूत्र प्रवृत्ति होना तथा गंदलापन इसके प्रमुख लक्षण हैं। अन्य बीमारियों के मरीज का शिकार होना आम बात है। प्रायः मधुमेह वंशानुगत होता देखा गया है। 

ये करें 
-सुबह सैर करें, नियमित व्यायाम की आदत डालें।

-करेला, गुलर, जामुन, गुडुची (परवल), सुरजना, मैथीदाना आदि का प्रयोग दैनिक जीवन में करने पर मधुमेह से बचा जा सकता है, जिन्हें वंशानुगत मधुमेह है, वे अवश्य ध्यान दें। खाने में चकनाई कम लें ।

-ध्यान, प्राणायाम से मानसिक एकाग्रता रहती है।

ये न करें 
- इनका सेवन न करें

- शराब, दूध, तेल, घी, मैदा, सीरप, दही।

-गन्नो का रस, गुड़, शकर आदि। अधिक मात्रा में भोजन।

-पेशाब रोकना। अधिक सोना, आराम तलब जीवनशैली। 

इनसे बढ़ता है जोखिम
-आलस्य, सुस्त, आरामदायक जीवनशैली।

-देर तक सोते रहना और दिन में भी सोना।

-अनुचित (फास्टफुड) भोजन करना।

-शारीरिक श्रम बिलकुल नहीं करना।

-मानसिक तनाव होना, गुड़, चीनी, खांडसारी, मिठाइयों और तली हुई चीजों का अत्यधिक मात्रा में सेवन करना और व्यायाम भी न करना।

औषधियों से रोकथाम 

कोई भी उपचार चिकित्सक की सलाह के बिना नहीं करना चाहिए, परंतु इनमें से कोई भी एक प्रयोग करके मधुमेह से बचने का प्रयास कर सकते हैं या मधुमेह पर नियंत्रण कर सकते हैं-

-हल्दी का चूर्ण ३ ग्राम प्रतिदिन सुबह-शाम।

-गुडूची सत्व २ ग्राम सुबह-शाम।

-त्रिफला चूर्ण ३ से ६ ग्राम या त्रिफला क्वाथ १९०-२० मिलि।

-शुद्ध शिलाजित १ ग्राम दूध में घोलकर।

-गुड़मार की पत्तियाँ पीसकर उसका रस निकालकर पिलाएँ।

-बकायन के बीजों की मिंगी २ ग्राम, पानी से सुबह-शाम।

-नीम, बिल्वपत्र अथवा आँवला का रस १० मिलिग्राम प्रतिदिन।

-विजयसार की लक़डी का पानी पीने से भी लाभ होता है(डॉ. विनोद बैरागी,सेहत,नई दुनिया,मार्च,2012 द्वितीयांक)।  


दो संगत आलेख यहां हैं- 


1. मधुमेह पर आयुर्वेद का मत

2. आयुर्वेद रक्त शर्करा को विनियमित करने के लिए हर्बल उपचार
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गुरुवार, 10 नवंबर 2011

पंचम दासःपोलियो के रामबाण इलाज की मान्यता के लिए भटकता एक धन्वंतरि पुत्र

क्षीर सागर मंथन में आयुर्वेद के जन्मदाता देव धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। जंगलों और पहाड़ों की कंदराओं की जड़ी बूटियों में "अमृत" ढूंढ़ने का सिलसिला बदस्तूर जारी है लेकिन धन्वंतरि के इन "बेटों" को आज पहचान पाने के लिए एड़ी-चोटी का पसीना एक करना पड़ता है। २४ अक्टूबर को हम एक बार फिर धन्वंतरि को याद करने की रस्म अदा कर लेंगे लेकिन पोलियो ठीक करने की रामबाण दवा खोजने वाले बिहार के ४७ वर्षीय पंचम कुमार दास जैसे धन्वंतरि पुत्र को पहचान कब मिलेगी, आयुर्वेद को बढ़ावा देने के सरकार के बड़े-बड़े दावों के बीच यह सवाल आज भी यक्ष प्रश्न बना हुआ है। 

वे पिछले २२ साल से अपनी उस बेहद प्रभावी दवा के फार्मूले को सहेजते हुए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च सहित सरकारी शोध संस्थानों के चक्कर लगा रहे हैं लेकिन पूरे देश में घूम-घूम कर पोलियों के कई मरीजों को ठीक कर चुके पंचम दास अब भी गुमनामी के अंधरे में भटक रहे हैं। चिकित्सा शोध की देश की सर्वोच्च सरकारी संस्था आईसीएमआर की टीम ने दवा के प्रभाव को परखने के बाद वैद्य पंचम के दावे को सही भी पाया। लेकिन वह रिपोर्ट संस्थान की फाइलों में वर्षों से धूल फांक रहा है। इन संस्थानों में जाने पर उन्हें बार-बार यह तल्ख अहसास भी हुआ है कि सबकी रुचि उनके फॉर्मूले को हड़पने में ज्यादा है। समुद्र मंथन में अमृत के निकलने पर दानवों ने भी उसे देवों से छीनना चाहा था। इन संस्थानों में अपने अनुभव के बाद पंचम दास अपने फार्मूले को पेटेंट कराने का आवेदन करने का साहस भी नहीं जुटा पा रहे। कोई मल्टीनेशनल फार्मास्यूटिकल कंपनी कोई दवा या टीका लेकर आ जाए तो आईसीएमआर जैसे संस्थानों को बिना जरूरी शोध के भी उसे हरी झंडी देने की हड़बड़ी रहती है लेकिन पंचम दास की पोलियो की प्रभावी दवा को लेकर उनमें कोई तत्परता नहीं दिखती। 

नवरात्र के दौरान अभी अपने दस्तावेजों की पोटली लिए पंचम दास दिल्ली आए थे लेकिन वे अब उन संस्थानों में नहीं जाते। वे थक चुके हैं। दिल्ली में पोलियोग्रस्त ४ मरीजों को दवा देने आए पंचम दास ने नईदुनिया ऑफिस आकर अपनी व्यथा सुनाई। करीब ६ महीने पहले मुंबई के एक पोलियोग्रस्त आयुर्वेदिक डॉक्टर को अपनी दवा दे आए हैं। वह आयुर्वेदिक डॉक्टर अपने ऊपर दवा के प्रभाव को देख कर चमत्कृत हैं। वे बिहार में पोलियोग्रस्त दर्जनों लड़कियों का इलाज कर चुके हैं और उनका दावा है कि उनमें कई ऐसी होंगी जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की दी हुई साइकिल तक चला रही होंगी। पंचम जड़ी बूटियों से कैंसर सहित अन्य रोगों की दवा की खोज भी करना चाहते हैं लेकिन पोलियो की दवा के अपने अनुभव के बाद उनके "अमृत" ढूंढ़ने के उत्साह ने जबाव दे दिया है। बिहार के फॉरबिसगंज के हरीपुर डाक गांव के वैद्य पंचम दास की दवा को १९९६ में ही आईसीएमआर की एक टीम परख चुकी है। टीम ने उनके दिए जांच सर्टिफिकेट में यह कहा है कि १० -१५ साल से पोलियोग्रस्त बच्चों पर भी यह दवा प्रभावी पाई गई। 

पत्रकार एम.जे. अकबर से लेकर पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. सी.पी. ठाकुर तक उनकी दवा को वैज्ञानिक मान्यता देने की पैरवी कर चुके हैं। बिहार के आरा में एसपी रह चुके राजेंद्र प्रसाद का बेटा अखिलेश इस दवा के प्रभाव का जीता-जागता प्रमाण है। १९९५ की शुरुआत में जब वे पोलियोग्रस्त अपने बेटे को पंचम दास के पास ले गए थे तो दास ने कहा था कि ६ महीने में दवा का प्रभाव सामने आएगा लेकिन २ महीने में ही जब वह ठीक होने लगा। उस समय से वह अपने पांव पर चल रहा है। लेकिन अंग्रेजी दवा पद्धति का समर्थन करने वाली सत्ता व्यवस्था ने पंचमदास को जो "विकलांग" बनाया है, वे चलने की अभी तक असफल कोशिश कर रहे हैं(धनंजय,नई दुनिया,दिल्ली,24.10.11)। 


 कल सुबह सात बजेः 


 क्या आपने कभी सोचा है दुखते हिप को रिप्लेस करने के बारे में?

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शनिवार, 5 नवंबर 2011

उत्तरप्रदेशःआयुर्वेद से उठ रहा है विश्वास

प्रदेश में आयुर्वेद की स्थिति का जायजा लें तो सूबे में इस चिकित्सा पद्धति की दशा और दिशा निराश करती है। हालांकि सरकार का यह दावा है कि हर साल करीब डेढ़ करोड़ लोग आयुर्वेद चिकित्सा का लाभ उठाते हैं। लेकिन आयुर्वेद चिकित्सा की दवाओं पर खर्च होने वाले पैसे पर नजर दौड़ाए तो एक मरीज के हिस्से में दस रुपए भी नहीं आते। हालांकि दवाओं के निर्माण में बढ़त लगातार जारी है। दवाओं के निर्माण में इस बार डेढ़ करोड़ रुपए का इजाफा हुआ है फिर भी अस्पतालों में न रोगी दिखाई पड़ते हैं और न ही रोग में इस्तेमाल करने वाली दवाओं की खरीददारी। वर्ष २००९-१० में प्रदेश के आयुर्वेदिक डॉक्टरों ने २ करोड़ ५२ लाख रुपए की दवाओं का निर्माण किया था लेकिन इस बार वर्ष २०१०-११ में डॉक्टरों ने ४ करोड़ ३ लाख की दवाओं का निर्माण किया है। इसकी खपत के लिए अब मंत्री भी परेशान हैं। 

 इस समय प्रदेश में २,२१० आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सालय हैं लेकिन इनमें से ११५९ चिकित्सालय किराए पर चल रहे हैं। इनका वार्षिक किराया २ करोड़ ४० लाख है। इन अस्पतालों में रोगियों की संख्या बेहद कम है। पूरे प्रदेश में जनपदवार दवाओं की आपूर्ति करने का जिम्मा लखनऊ और पीलीभीत निर्माणशालाओं को ही है क्योंकि सूबे की ये ही दो अकेली निमार्णशालाएं हैं। 

प्रदेश के राजकीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी औषधि निर्माणशाला को गुणवत्ता का मानक प्राप्त हो गया है। इनकी दवाओं को गुड मैन्यूफैर्क्चड प्रोडक्ट (जीएमपी) की मान्यता मिल गई है। लेकिन खपत को लेकर चिंताए बरकरार हैं। इसी प्रकार राजधानी के आयुर्वेद महाविद्यालय में भले ही बाल एवं प्रसूति विभाग का उद्घाटन हो गया हो पर बीते एक साल में यहां सिर्फ एक प्रसव हो पाया है। इसकी वजह अल्ट्रासाउंड व्यवस्था का अभाव और जननी सुरक्षा योजना के लाभ से इस अस्पताल का वंचित होना है। यही नहीं, तीन स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ एवं इतने ही बाल रोग विशेषज्ञ यहां तैनात हैं पर इस अस्पताल में नवजात बच्चों के टीकाकरण की अनुमति नहीं है। ऐसे में कोई इस ओर क्यों रुख करेगा। किसी भी चिकित्सा पद्धति की सफलता उसकी पढ़ाई पर निर्भर करती है। राज्य में आयुर्वेद की पढ़ाई की गति समझने के लिए सिर्फ यह जान लेना पर्याप्त होगा कि यहां प्रोफेसर के दस, रीडर के चार और प्रवक्ता के २३ पद रिक्त हैं। यही नहीं, पांच विषयों में स्नात्कोत्तर पाठ्यक्रम शुरू करने की घोषणा को भी कई सालों से अंजाम देने में सफलता हासिल नहीं हो पाई है(लखनऊ से योगेश मिश्र की यह रिपोर्ट नई दुनिया,दिल्ली संस्करण में 24.10.11 को प्रकाशित है)। 


 कल सुबह सात बजे पढ़िएः 


 कसरत कितना करें और किन सावधानियों के साथ

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बुधवार, 2 नवंबर 2011

बिहारःउपेक्षित है आयुर्वेद

आयुर्वेद का जिक्र आते ही हाथों में अमृत कलश लिए धन्वंतरि की तस्वीर जेहन में उभर आती है। आयुर्वेद में सभी असाध्य रोगों का इलाज उपलब्ध है लेकिन चिकित्सा की यह पद्धति बिहार में उपेक्षित ही रही है। गांवों में वैद्य परंपरा भी अब समाप्ति की ओर है। पहले लगभग हर गांव में ज़ड़ी-बूटी से इलाज करने वाले वैद्य होते थे। असाध्य रोग भी गांवों में ही ठीक हो जाते थे। लेकिन प्रोत्साहन के अभाव में गांवों से वैद्य परंपरा खत्म हो गई है। गांवों में अब हर जगह बिना डिग्री वाले एलोपैथ के झोलाछाप डॉक्टर दिखते हैं। आयुर्वेद शिक्षण का भी प्रदेश में बुरा हाल है। वैसे एलोपैथ में कई बीमारियों का इलाज नहीं होने के कारण लोग फिर से आयुर्वेद और होम्योपैथी की ओर मुखातिब हो रहे हैं। आयुर्वेदिक इलाज फिर चमकने लगा है लेकिन इसके लिए लोग बाबा रामदेव की दवाओं पर ही निर्भर हैं। 

बिहार में पहले ११ आयुर्वेदिक कालेज थे लेकिन एक-एक कर बंद होते गए। इन कालेजों को छात्र ही नहीं मिल पाते थे। मेडिकल काउंसिल के मानदंड पर खरे नहीं उतर पाने के कारण इन कालेजों की मान्यता रद्द हो गई। वर्तमान में पांच आयुर्वेदिक कॉलेज चल रहे हैं। पटना, बक्सर, भागलपुर, दरभंगा और बेगूसराय के आयुर्वेद कालेजों में बीएएमएस की प़ढ़ाई होती है। भारतीय चिकित्सा परिषद ने कालेजों को सशर्त मान्यता दी है। शर्तों को पूरा नहीं किए जाने पर मान्यता रद्द हो सकती है। अन्य छह कालेजों में दस वर्षों से छात्रों का नामांकन बंद है। पटना में आयुर्वेद के स्नातकोत्तर की प़ढ़ाई के लिए २०१० में मान्यता मिली थी लेकिन शर्तों को पूरा नहीं किए जाने पर मान्यता रद्द कर दी गई। 

आयुर्वेदिक अस्पतालों में संसाधनों की भारी कमी है। राज्य सरकार ने सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर भी आयुष डक्टरों की भर्ती का फैसला लिया था लेकिन यह लागू नहीं हो पाया। आयु्‌र्वेद, होम्योपैथ और यूनानी डाक्टरों के अधिकांश स्वीकृत पद खाली प़ड़े हैं। सरकारी अस्पतालों में आयुर्वेद और होम्योपैथ की दवाएं नहीं रहती हैं। आयुष डाक्टरों के आंदोलनों से भी कोई फर्क नहीं प़ड़ा है। आम लोग आयुर्वेद और होम्योपैथ की शरण में तभी जाते हैं जब एलोपैथ से उन्हें निराशा होती है। 

भाग-दौ़ड़ की वर्तमान जीवनशैली में अधिकांश लोग डिप्रेशन, डाइबिटीज, स्पॉन्डेलाइटिस जैसी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। एलोपैथ में इन बीमारियों से समूल नाश करने वाली दवाओं का अभाव है। लिहाजा लोगबाग आयुर्वेद की शरण लेने लगे हैं। लेकिन ऐसे मरीजों को कुशल डाक्टरों के परामर्श के लिए काफी भटकना प़ड़ता है। आयुर्वेद कालेजों की स्थिति दयनीय है और कुशल डॉक्टर तैयार नहीं हो पा रहे हैं। बक्सर, भागलपुर और दरभंगा के आयुर्वेद कालेजों में भी नामांकन बंद हैं। २००८-०९ में बेगूसराय आयुर्वेद कालेज को मान्यता मिली थी जो बाद में रद्द हो गई। बिहार राज्य आयुर्वेदिक एवं यूनानी परिषद कालेजों का निबंधन करता है और मान्यता अखिल भारतीय चिकित्सा परिषद देती है। यूनानी निदेशालय से ही आयुर्वेद कालेज भी संचालित होते हैं। गया में दो निजी आयुर्वेद कालेज हैं जिनमें से एक की मान्यता रद्द हो गई है। मुजफ्फरपुर और मोतिहारी में निजी आयुर्वेद कालेज चल रहे हैं। आयुर्वेदिक कालेजों में प्रोफेसर, रीडर और लेक्चरार के १८० पद हैं जिनमें से १३५ पद पर ही लोग काम कर रहे हैं। ४५ पद खाली हैं। छपरा और सीवान में भी एक-एक निजी आयुर्वेद कालेज हैं। एक सरकारी आयुर्वेद कालेज को चलाने में सलाना लगभग तीन करो़ड़ रुपए का खर्च आता है(राघवेन्द्र नारायण सिंह,नई दुनिया,दिल्ली,14.10.11)। ---------------------------------------------------------------------------------------------------- 


कल सुबह सात बजे के मुख्य आकर्षणः 




क्यों रामदेव जी के अनुसार लौकी के जूस से डरने की ज़रूरत नहीं है

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शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ःआयुर्वेद के विकास का लाभ नहीं मिल रहा लोगों को

बाबा रामदेव का असर कहें या एलोपैथी दवाओं से उपजी असंतुष्टि, मध्य प्रदेश में आयुर्वेद के प्रति रूझान बढ़ा है। आयुर्वेद दवा कंपनियों की बढ़ती बिक्री इसकी गवाह है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में औषधीय पौधों की खेती बढ़ी है और आयुर्वेद औषधियों का निर्माण भी बढ़ा है लेकिन नियमों की जटिलताओं के चलते राज्य "एक्सपोर्ट" में पिछड़ रहा है। दूसरी तरफ, एलोपैथी डॉक्टरों को गावों में भेज पाने में हर तरह से विफल रही सरकार बार-बार कहती है कि अस्पतालों के खाली पदों पर आयुर्वेद चिकित्सकों की नियुक्ति होगी लेकिन २००२ के गजट नोटिफिकेशन के बाद भी यह काम नहीं हो पाया है। यानी प्रदेश में आयुर्वेद के विस्तार के लिए मौका भी है, दस्तूर भी है लेकिन प्रशासन ही तैयार नहीं है। 

प्रदेश में औषधीय फसलों जैसे आंवला, बेल, अश्वगंधा, शतावर, कालमेघ, इसबगोल, कलौंजी, सर्पगंधा, गुड़मार, नागरमोथा, गिलोय और सफेद मूसली का उत्पादन बढ़ा है। जबलपुर, मंडला, पन्ना, सतना, छिंदवाड़ा, इंदौर, मंदसौर आदि जिलों में किसानों ने इन फसलों के उत्पादन में रुचि दिखाई है। वन मंत्री सरताज सिंह कहते हैं कि आयुर्वेद की लोकप्रियता को देखते हुए हम लुप्त हो रही जड़ी-बूटियों को बचाने के लिए विशेष अभियान चला रहे हैं। वन विभाग ने औषधीय पौधों को लगाने के साथ अमरकंटक और तामिया में लुप्त होती जड़ी-बूटियों के उत्पादन के लिए विशेष प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। इसके साथ ही भोपाल में बड़ा आयुर्वेदिक नेत्र अस्पताल प्रारंभ किया गया है। मध्य प्रदेश सरकार ने औषधीय पौधों के उत्पादन और इनके क्रय-विक्रय के लिए बाजार तैयार करने के उद्देश्य से १९९६ में मेडिसिनल प्लांट टास्क फोर्स का गठन किया था। इसके बाद वर्ष २००३-०४ में एनएमपीबी ने मध्य प्रदेश के ३६७ औषधीय फसलों के प्रोजेक्ट के लिए ८७७ लाख रुपए की मंजूरी दी। उत्पादन में वृद्धि के बाद भी प्रदेश से औषधियों का "एक्सपोर्ट" नहीं हो पा रहा है जबकि विदेशों में मांग को देखते हुए भारत से प्रतिवर्ष २५० प्रकार के औषधीय पौधों, उनकी जड़, फल और पत्तियों का एक्सपोर्ट किया जाता है। प्रदेश में कुछ दवाओं का उत्पादन तो बढ़ा लेकिन एक्सपोर्ट के हाल नहीं सुधरे हैं। इसका कारण अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का पूरा न होना है। सूत्र बताते हैं कि एक्साइज, वेट सहित अन्य कर और वन विभाग की कठिन औपचारिकताओं के कारण भी इंडस्ट्री अपेक्षित गति से विस्तार नहीं कर पा रही है। दवाओं की जांच सहित दूसरे सर्टिफिकेशन के अभाव में प्रदेश की कंपनियों को आर्डर नहीं मिल पाते।

उधर,छत्तीसगढ़ में भी राज्य के गठन के बाद के एक दशक में आयुर्वेद का तेजी से विकास हुआ है। हालांकि इसमें विकास की अभी और संभावना है। एक मात्र शासकीय आयुर्वेद कॉलेज के अलावा राजनांदगांव के मनकी में छत्तीसगढ़ आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज तथा दुर्ग के चंद्रपुरी में राजीव लोचन आयुर्वेद कॉलेज की स्थापना हुई है। इन तीनों कॉलेज से प्रतिवर्ष १८० बीएएमएम (आयुर्वेद) डॉक्टर तैयार होते हैं। राजधानी के नगपुरा में महावीर आयुर्वेद कॉलेज प्रस्तावित है। इस कॉलेज के चालू होने से प्रतिवर्ष २५० डॉक्टर तैयार होंगे। शासकीय आयुर्वेद कॉलेज में पहले मात्र कायचिकित्सा में एमडी होती थी, लेकिन अब पांच विषयों में एमडी हो रही है। इनमें कायचिकित्सा, शरीर रचना विज्ञान (एनाटॉमी), रसशास्त्र, आयुर्वेद सिद्धांत, शल्यतंत्र सामान्य विषय शामिल हैं। 

राज्य शासन द्वारा शासकीय आयुर्वेद कॉलेज को मॉडल कॉलेज के रूप विकसित किया जा रहा है। इसके तहत कॉलेज में २०० बिस्तरों वाला अस्पताल, कॉलेज के लिए नया भवन व हर्बल गार्डेन का विकास किया जा रहा है(भोपाल से पंकज शुक्ला तथा रायपुर से जयप्रकाश मिश्र की ये रिपोर्टें दैनिक नई दुनिया के दिल्ली संस्करण में 24.10.11 को प्रकाशित हैं)। 


कल सुबह सात बजे जानिएः 


स्तनपान के दिनों में माताओं का खान-पान कैसा हो

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गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011

उत्तराखंड में फल-फूल रही है धन्वंतरि पद्धति

धन्वंतरि की प्राचीन चिकित्सा पद्धति उत्तराखंड में आज भी न सिर्फ जीवित है बल्कि फल-फूल रही है। उत्तरकाशी से लेकर हरिद्वार तक उत्तराखंड के गंगा तट पर बसे नगरों में धन्वंतरि की प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति न सिर्फ संरक्षित है बल्कि फल-फूल भी रही है। हरिद्वार और ऋषिकेश तो प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति से उपचार के ब़ड़े केंद्र के रूप में विकसित हैं। यहां उपचार का लाभ पाने के लिए विदेशों से भी ब़ड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। ऋषिकेश के राज्य आयुर्वेदिक कॉलेज, आर एंड डी आयुर्वेदा, हरिद्वार के पतंजलि विवि और देव संस्कृति विवि में प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति के विभिन्न कोर्स भी प़ढ़ाए जा रहे हैं। कम अवधि के इन डिप्लोमा कोर्स की प़ढ़ाई कर छात्र विदेशों में अच्छी कमाई कर रहे हैं। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति को विदेशों में लोकप्रिय बनाने में ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन का भी ब़ड़ा योगदान है। 

प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति के तहत विभिन्न प्राकृतिक तरीकों से १६ से अधिक बीमारियों का इलाज किया जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति के तरीकों में सूर्य स्नान, कीच़ड़ स्नान, शिरोधारा, आयुर्वेदिक मसाज, भाप से उपचार व चूर्ण उपचार प्रमुख हैं। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति के तहत ऋषिकेश के राज्य आयुर्वेदिक कालेज में विभिन्न बीमारियों का इलाज सफलतापूर्वक किया जाता है। धूप, मिट्टी, तेल, दूध व आटे जैसी प्राकृतिक वस्तुओं के मसाज से यहां पुराने सिरदर्द, कमर दर्द, गर्दन दर्द, आखों की तकलीफ, श्वसन तंत्र की दिक्कत, हृदय व पाचन तंत्र संबंधी बीमारियों का इलाज किया जाता है। हरिद्वार स्थित शांतिकुंज पहुंचने वाले हजारों लोग प्रतिवर्ष प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति से उपचार कराते हैं। इसी प्रकार हरिद्वार में पतंजलि योगपीठ और भूमा निकेतन आश्रम भी प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति से उपचार करते हैं। इनके अलावा राज्य के अनेक होटल भी प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति के लिए प्रसिद्ध हैं। जिंदल नेचर केयर, लिजायर रिजार्ट, कनाटा रिजार्ट, होटल ग्रीन में प्राकृतिक चिकित्सा की व्यवस्था है। इतना ही नहीं बालीवुड के सितारे आमिर खान और राजनीति के दिग्गज लालकृष्ण आडवाणी भी उत्तराखंड में प्राकृतिक चिकित्सा का लाभ उठाकर तरोताजा होने पहुंचते रहे हैं। 

दोनों ही पूर्व में ग़ढ़वाल के होटल आनंदा में प्राकृतिक थैरेपी से लाभ ले चुके हैं। उत्तराखंड सरकार ने भी प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद को ब़ढ़ाने के लिए पंचकर्म केंद्र के नाम से आयुर्वेदिक अस्पताल खोले हैं। जहां मरीजों का प्राकृतिक तौर तरीकों से इलाज किया जाता है(महेश पाण्डे और प्रवीन कुमार भट्ट,नई दुनिया,दिल्ली,24.10.11)। 
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कल सुबह सात बजे पढ़िएः 


आर्थराइटिस केवल उम्रदराज़ों की बीमीरी नहीं है

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गुरुवार, 22 सितंबर 2011

आयुर्वेद में अल्सर का उपचार

पेट में अल्सर की समस्या बेहद आम है । कई बार सही समय पर इसका उपचार न करने पर यह जानलेवा भी साबित होता है । बात करें अल्सर के मुख्य कारणों की तो सबसे पहले ध्यान देना चाहिए आहार पर । भोजन में अधिक उड़द व कुल्थी की दाल, खट्टी दही, सरसों, लहसुन, भारी व बादी भोजन, भैंस, सूअर व मछली का मांस, अति कड़वा और तीखा भोजन, सिरका, मदिरा आदि के सेवन से अल्सर की स्थिति पैदा हो सकती है । न सिर्फ भोजन बल्कि आपकी दिनचर्या का भी इसपर प्रभाव पड़ता है । आवश्यकता से अधिक व्यायाम या भागदौड़, बहुत ज्यादा पैदल चलना, अधिक बोलना, धूप व अग्नि से अधिक संपर्क, अत्यधिक क्रोध एवं भय भी इस बीमारी की आशंका को बढ़ाते हैं । इन सब कारणों से रक्त दूषित होता है और इसमें पित्त की मात्रा बढ़ जाती है जिससे अल्सर की उत्पत्ति होती है। 

इसकी चिकित्सा के लिए सबसे अधिक जरूरी है खान-पान व दिनचर्या पर संयम जिसपर ध्यान देकर इसे प्रारंभिक अवस्था में भीतर ही दबाया जा सकता है । भोजन में मीठे और कड़वे आहार का संयमित रूप से सेवन करें । नहाने व पीने के लिए शीतल जल का ही उपयोग करें । शरीर की मालिश करवाते रहें । भोजन में पुराना साठी चावल, जौ, मूंग-मसूर की दाल, परवल, लौकी, पतली मूली, प्याज, खरगोश, तीतर व बटेर के मांस का सेवन हितकारी है । बकरी व गाय के दूध और उसके बने घी व मक्खन लें । इसके अलावा आंवला, खजूर, सिंग्घाड़ा, मुनक्का, किशमिश, नारियल का पानी, गन्ने का रस, चीनी व मिश्री आदि का सेवन करें । मल-मूत्र के वेग को रोकना, अत्यधिक मैथुन, धूम्रपान, मद्यपान, अत्यधिक व्यायाम आदि इस बीमारी में बहुत घातक सिद्ध हो सकते हैं इसलिए इनसे बचने की कोशिश करें। आयुर्वेद में इस बीमारी के उपचार के लिए कुछ कारगर औषधियां हैं जिन्हें चिकित्सक की देखरेख में लेना लाभकारी है । ये दवाएं हैं - उषीर आदि चूर्ण, प्रवाल पंचामृत, स्वर्ण गैरिक, प्रवाल पिष्टी, मुक्ता पिष्टी, स्वर्ण माणिक भस्म, शतावरी घृत आदि (डॉ. आकाश परमार,संडे नई दुनिया,18 सितम्बर,2011)

पेट के अल्सर के कई रूप हैं लेकिन सामान्यतया पेप्टीक या गैस्ट्रीक अल्सर हमारे शरीर के पाचन तंत्र में होने वाली सूजन और अल्सर या जख्म का मिला-जुला रूप है । यह अल्सर भोजन की थैली से लेकर छोटी या बड़ी आंत में, कहीं भी हो सकता है लेकिन यहां ज्यादातर छोटी आंत में होने वाली सूजन या खाने की थैली में होने वाला अल्सर आजकल सामान्य रोग होता जा रहा है । यदि इसका समय पर उपचार और प्रबंधन न हो तो यह और गंभीर हो सकता है । इसके गंभीर रूपों में अल्सरेटिव कोलाइटिस, क्रांस सिंड्रोम, टॉक्सिक मेगाकॉलन आदि हो सकते हैं ।

 इसके मुख्य लक्षणों में डायरिया, मल के साथ म्यूकस अथवा खून, पेट में दर्द, बुखार, चिड़चिड़ापन, वजन में कमी, कमजोरी, जोड़ों में दर्द आदि प्रमुख हैं । गैस्ट्रीक अल्सर के मरीज को नियमित अपने चिकित्सक के संपर्क में रहना चाहिए ताकि मरीज को समय पर उचित उपचार मिलता रहे । यों तो इस रोग का कारण ज्ञात नहीं होता फिर भी अनियमित खान-पान, तनाव, बिगड़ी जीवनशैली आदि को इस रोग का कारक माना जाता है ।

गैस्ट्रीक अल्सर की आरंभिक अवस्था का होम्योपैथी में बेहतर उपचार है बशर्ते किसी अनुभवी व योग्य होम्योपैथिक चिकित्सक से समय-समय पर नियमित परामर्श लिया जाए । रोग के गंभीर होने पर जैसे एलोपैथी में इसकी मुक्कमल चिकित्सा नहीं हो पाती, वैसे ही होम्योपैथी में भी दिक्कतें आती हैं, फिर भी होम्योपैथिक उपचार को इसलिए बेहतर बताया जा सकता है कि इसमें दवा का कुप्रभाव शून्य होता है । होम्योपैथी की दवाओं में आर्जेंटम नाइट्रिकम, आर्सेमिक अल्ब, विस्मथ, क्रोटेलस एच, जिरेमियम, हेमामेलिस, सल्फर सहित सैकड़ों प्रभावी दवाएं गैस्ट्रीक अल्सर के उपचार में प्रभावी हैं लेकिन इसका चयन रोगी की शारीरिक और मानसिक लक्षणों के साम्यता के आधार पर किया जाता है। इसलिए सलाह है कि सही समय पर किसी अच्छे होम्योपैथिक चिकित्सक से उपचार का परामर्श अवश्य ले लें । (डॉ. ए.के. अरुण ,संडे नई दुनिया,18 सितम्बर,2011)। प्रस्तुतिःप्रियंका पांडेय पाडलीकर।

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सोमवार, 29 अगस्त 2011

दुर्लभ जड़ी बूटियों के संरक्षण के लिए बना जीन बैंक

उत्तराखंड में औषधीय गुणों वाली दुर्लभ और सामान्य प्रजातियों की जड़ी बूटियों को संरक्षित करने के लिए सात जिलों में जीन बैंकों ने काम करना शुरू कर दिया है। इन बैंकों में दुर्लभ प्रजातियों की जड़ी बूटियों को संरक्षित करने का काम शुरू कर दिया गया है। राज्य में उद्यान और जड़ी बूटी औषधि पादप बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी तथा राज्य सरकार के अपर सचिव विद्याशंकर पांडेय ने बताया कि जीन बैंक बनाने की योजना वर्ष 2009 में शुरू की गई थी। पांडेय ने बताया कि अब तक सात जिलों के वन क्षेत्रों में जीन बैंक काम शुरू कर चुके हैं। इनमें कई दुर्लभ प्रजाति की जड़ी बूटियों को संरक्षित भी किया जा चुका है। इन बैंकों में उन जड़ी बूटियों के दोहन पर सख्त प्रतिबंध लगा दिया गया है। हालांकि शोध तथा प्रजाति की मात्रा को और अधिक विकसित करने के लिए सीमित तरीके से उनके दोहन की अनुमति दे दी जाती है। उन्होंने बताया कि टिहरी जिले के गंगी, उत्तरकाशी के कंडारा, बागेश्वर के झूनी, पिथौरागढ़ के खलिया, चमोली जिले के मंडल, अल्मोड़ा के मोहान और चंपावत के बतिया इलाके में 200 हेक्टेयर क्षेत्र में इन बैंकों को शुरू किया गया है। इसके साथ साथ 1,500 से 2,000 हेक्टेयर क्षेत्र में औषधीय जड़ी बूटी को और अधिक विकसित करने के लिए नर्सरी भी बनाई गई है। पांडेय ने बताया कि राज्य में करीब 700 किस्म की सामान्य और दुर्लभ जड़ी बूटियां हैं। जड़ी बूटियों का उपयोग प्राचीन काल से ऐसी दवाओं को बनाने के लिए किया जाता रहा है जिससे असाध्य रोग भी ठीक हो सकते हैं(दैनिक जागरण,देहरादून,29.8.11)।

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शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

पंचकर्म

पंचकर्म का प्रयोजन
पंचकर्मस्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य एवं सौंदर्य संवर्धन व रुग्ण के व्याधि निर्मूलन के लिए किया जाता है।

स्वस्थ व्यक्ति में पंचकर्म : स्वस्थ शरीर मन और बुद्घिपरक प्रयोजन।

रुग्णों में पंचकर्म : व्याधिनुसार पंचकर्म, चिकित्सापरक पंचकर्म।

रसायन : वाजीकरण प्रयोग से पूर्व पंचकर्म, स्वास्थ्य संरक्षण व व्याधि प्रतिषेधनार्थ एवं उत्तम संतान प्राप्ति हेतु पंचकर्म।
-जनपदोध्वंस (एपिडेमिक्स) में पंचकर्म।
-अष्टांग आयुर्वेद में पंचकर्म।

स्वस्थ व्यक्ति में पंचकर्म -स्वस्थ व्यक्ति में स्वास्थ्य संरक्षण, व्याधियों को रोकने और सौंदर्य वर्धन के लिए पंचकर्म के विधान का वर्णन है। इसके निम्न प्रयोजन हैं-

दिनचर्या में पंचकर्म : दिनचर्या के अनुसार प्रतिदिन अभ्यंग, उद्वर्तन, मूर्धतौल, अंजन, प्रतिमर्श नस्य, कर्णपुरण्य, पादाभ्यंग आदि पंचकर्म के अंतर्गत वर्णित हैं। इन कर्मों के नियमित प्रयोग से व्यक्ति स्वस्थ, बलवान और सुदृढ़ बनता है।

ऋतुचर्या में पंचकर्म : आयुर्वेद का एक अतिमहत्वपूर्ण सिद्घांत ऋतु परिवर्तनजन्य विकार व उनका प्रतिषेध है। अलग-अलग ऋ तुओं में वात, पित्त और कफ का संचय, प्रसार और प्रकोप प्राकृतिक रूप से होता है। इन दोषों को प्रकोपजन्य विकारों (जैसे अस्थमा, एलर्जी, एसिडिटी, माइग्रेन, साइनसाइटिस, पेट के विकार, जोड़ों का दर्द आदि) से बचाव के लिए प्रत्येक ऋ तु के अनुसार दोष का शरीर से पंचकर्म चिकित्सा द्वारा निर्हरण किया जाता है।

वर्षा ऋतु में प्रकुपित वात दोष का बस्ति कर्म द्वारा निर्हरण। शरद ऋतु में प्रकुपित पित्त दोष का विरेचन कर्म द्वारा निर्हरण। बसंत ऋतु में प्रकुपित कफ दोष का वमन कर्म द्वारा निर्हरण।

वेगारोधजन्य लक्षणों में पंचकर्मः
देर रात तक जागना और सुबह देर से उठना अधिकतर लोगों की जीवनशैली में शामिल हो चुका है। इसके कारण मल-मूत्रादि प्राकृतिक वेगों का उचित समय पर शरीर से निष्कासन नहीं हो पाता है। इसके अलावा,लंबे समय तक चलने वाली मीटिंग्स और ट्रैफिक आदि के कारण भी मल-मूत्रादि धारण करके रखना पड़ता है। अधारणीय वेगों को लंबे समय तक धाररण करना अनेक प्रकार की कष्टप्रद व प्राणघातक व्याधियों के कारण बन जाते हैं। परिस्थितिवश मल-मूत्रादि अधिक समय तक शरीर में धारण करने से जो लक्षण या व्याधियां उत्पन्न होती हैं,उनके निवारणार्थ अभ्यंग,स्वेदन बस्ति आदि उपकर्म पंचकर्म के अंतर्गत स्पष्ट किए गए हैं(डॉ. प्रीति कुलकरणी,सेहत,नई दुनिया,जुलाई 2011 प्रथमांक)

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सोमवार, 4 जुलाई 2011

बीएचयू में पंचकर्म चिकित्सा इसी महीने से

मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए बीएचयू महत्वपूर्ण पहल करने जा रहा है। केरल की तर्ज पर जुलाई अंत से बीएचयू में पंचकर्म थिरैपी की सुविधा शुरू की जा रही है। अब तक पंचकर्म से इलाज की पूरी सुविधा न होने से ज्यादातर मरीजों को केरल रेफर किया जा रहा था। लेकिन अब यह सुविधा यहीं मिलेगी।

केरल की कंपनी केरल आयुर्वेद लिमिटेड के साथ एमओयू ( मेमोरेंड़ा ऑफ अंडरस्टैंडिंग) भी हो चुका है। आयुर्वेद विभाग के पूर्व संकाय प्रमुख डॉ. वीके जोशी ने बताया कि बीएचयू ने पहली बार आयुर्वेद में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के तहत इस कंपनी से समझौता किया है। अब यह कंपनी हमारे यहां पंचकर्म थिरैपी से मरीजों का इलाज करेगी।बताया कि कंपनी से समझौते का मुख्य उद्देश्य मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देना है। क्योंकि जिस सुविधा के लिए विदेशों से मरीज यहां आते हैं वह उन्हें नहीं मिल पाती।

खासतौर पर पंचकर्म के लिए विदेशों से आने वाले मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा है। इसके लिए आयुर्वेद विभाग के वार्ड में ही दो स्पेशल कमरे बनाये जा रहे हैं। केरल की कंपनी अपने अनुसार वहां निर्माण कार्य करा रही है। जुलाई 20 तक कार्य पूरा कर लिया जायेगा और महीने के अंत तक इसे शुरू भी कर दिया जायेगा।

मरीजों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए इलाज में लगभग 50 फीसदी की छूट भी दी जायेगी। 

क्या होगा खास
-पंचकर्म की तकनीक के सहारे विदेशी मरीजों को करेंगे आकर्षित
-केरल से भी मरीज किये जायेंगे यहां रेफर
-आधे खर्च पर मिलेगी पूरी सुविधा 
-बीएचयू के काय चिकित्सा के डॉक्टरों की सलाह पर केरल के विशेषज्ञ करेंगे पंचकर्म 
-लाइलाज बीमारियों के इलाज में होगी आसानी(हिंदुस्तान,वाराणसी,4.7.11)

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बुधवार, 22 जून 2011

आयुर्वेदःविश्वास में है करिअर

21वीं सदी में भी आयुर्वेद ने अपना अस्तित्व नहीं खोया है। इसके उलट इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी एलोपैथी पूर्ण रूप से नहीं पहुंच पायी है, ऐसे क्षेत्रों में आयुर्वेद ने अपना विजयी परचम फहराया है। आयुर्वेद प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति है। हालांकि एलोपैथी में तेजी से वृद्धि हो रही है। इसके बावजूद आयुर्वेद की लोकप्रियता में कोई खास फर्क नहीं पड़ा। हालांकि आयुर्वेद को अब भी बतौर करिअर चुनने से लोग हिचकिचाते हैं। ऐसा कतई नहीं है कि इसमें पर्याप्त आमदनी नहीं होती या फिर इसमें तरक्की के अवसर कम हैं। लेकिन साथ जुड़ी कुछ भ्रांतियां लोगों को इससे दूर रखती हैं। इसमें से मुख्य भ्रांति है संस्कृत का पूरा ज्ञान होना। छात्र यह सुनकर ही घबरा जाते हैं और किसी और क्षेत्र में करिअर खोजन की ठान लेते हैं। जबकि यह सिर्फ एक मिथ है जिसका सच्चाई से कोई सरोकार नहीं।
बहरहाल चिकित्सा के लिहाज से आयुर्वेद की तुलना नहीं की जा सकती। एलोपैथी के प्रशंसकों ने हमेशा आयुर्वेद में किसी न किसी तरह से नुक्स निकालने की कोशिश की है। लेकिन सरकारी मान्यता मिलने के बाद उन सबकी बोलती बंद हो चुकी है। यहां एलोपैथी प्रशंसकों से यह पूछा जा सकता है कि क्या छोटे से छोटे रोग में भी दवाई का सेवन बगैर रिस्क होता है? नहीं, ऐसा कतई नहीं होता। इसके विपरीत आयुर्वेद छोटी से लेकर बड़ी से बड़ी बीमारी को बगैर साइड इफेक्ट के निजात दिलाने में सहायक होता है। देश-विदेश में आयुर्वेद के तेजी से बढ़ रहे संस्थान इस ओर इशारा करते हैं कि इसकी तरफ रुझान दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है।
आयुर्वेद में करिअर बनाने से पहले हमारे सामने मुख्य सवाल खड़ा होता है कि आखिर आयुर्वेद पद्धति है क्या? इस चिकित्सा पद्धति में किसी प्रकार का यंत्र या फिर तकनीकी उपकरणों का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसमें आहार, व्यायाम, जड़ी-बूटी व अन्य तकनीकों के जरिये रोगी का उपचार किया जाता है। हालांकि आयुर्वेद एलोपैथी की तरह तुरंत असर नहीं दिखाता। बावजूद इसके ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इस पर पूरा विश्वास करते हैं। असल में यह किसी भी रोग से सिर्फ निजात नहीं दिलाता बल्कि उसे जड़ से खत्म कर देता है। यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है। आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है कि जीवन, ऊर्जा, जल, वायु, अग्नि को मिलकर बना है। यदि किसी मानव में इनका असंतुलन होता है तो वह रोग की चपेट में आ जाता है। आयुर्वेद इस असंतुलन को व्यवस्थित करता है। रोगियों के आहार में बदलाव किये जाते हैं।
अन्य चिकित्सा पद्धति की तरह आयुर्वेद में भी विशेषज्ञता पायी जा सकती है। इसके लिए अलग-अलग विधाएं उपलब्ध है। इन विधाओं में काया चिकित्सा (इंटरनल मेडिसिन), बाल चिकित्सा (पेड्रियाट्रिक्स), ग्रह विद्या (साइकिएट्री), ऊध्र्वांग चिकित्सा (ऑटो राइनोलैरिंगलॉजी), शल्य चिकित्सा (सर्जरी), दमस्त्र चिकित्सा (टॉक्सीकोलॉजी), जरा चिकित्सा (गेरेंटोरोलॉजी), वृश्य चिकित्सा (ऐफ्रडिजिऐक) आदि शामिल हैं। हालांकि ये सभी शाखाएं अब तक सभी कालेजों तक नहीं पहुंच पायी हैं। लेकिन यह तय है कि तेजी बढ़ती इनकी मांग के चलते जल्द ही इनका विस्तार हो जाएगा। सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन में विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों और उपक्षेत्रों को मान्यता दी गई है।
आयुर्वेद के कोर्स के लिए बाकायदा छात्र को प्रवेश परीक्षाओं में उत्तीर्ण होना पड़ता है जिसके बाद उन्हें आयुर्वेद में करिअर बनाने के अवसर प्राप्त होते हैं। इसके लिए न्यूनतम योग्यता 10+2 जीव विज्ञान के साथ अन्य विज्ञान विषयों में उत्तीर्ण होना जरूरी है। बैचलर ऑफ आयुर्वेदिक मेडिसिन एंड सर्जरी या आयुर्वेदाचार्य के कोर्स में प्रवेश चयन परीक्षा के आधार पर दिया जाता है। हालांकि कुछ संस्थान 10+2 के अंकों के आधार पर भी दाखिला दे देते हैं। यह कोर्स 5 वर्ष का होता है जिसमें डेढ़ वर्ष की इंटर्नशिप भी शामिल है। यही नहीं इसमें कुछ ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कोर्सेज भी उपलब्ध हैं। आयुर्वेद में करिअर बनाने के दौरान यह ध्यान रखें कि किसी फर्जी संस्थान से कोर्स न करें। क्योंकि यह मान्यता प्राप्त नहीं होते और आपको आयुर्वेद चिकित्सक के रूप में मान्यता हासिल नहीं हो सकती।
चिकित्सा विज्ञान को बतौर करिअर चुनने से पहले यह जानें कि क्या आप इस क्षेत्र के लिए उपयुक्त हैं? इस क्षेत्र में करिअर बनाने से पहले यह जान लें कि क्या आप इस क्षेत्र में खुद को फिट कर पाते हैं? दरअसल यह प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति हैं जहां आपको प्राचीन काल की जानकारी होना अनिवार्य है। यह प्राचीन परम्पराओं व आस्था से जुड़ी हुई है। यदि आप इसकी अच्छाइयों व बुराइयों से अवगत नहीं हैं तो आपके लिए इस क्षेत्र में करिअर बनाना सही नहीं होगा। साथ ही आपका सहनशील होना भी अनिवार्य है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि अब आयुर्वेद को प्राथमिकता दी जाने लगी है। हालांकि अभी भी सरकार को इस क्षेत्र के विकास के लिए कड़ी मेहनत करने की जरूरत है। कई क्षेत्रों में अब तक इसका विकास नहीं हो पाया है। लेकिन हम इस बात को नकार नहीं सकते कि विदेशों में भी इसके प्रति रुचि बढ़ती जा रही है। तमाम एलोपैथी अस्पतालों में आयुर्वेदिक इलाज भी किये जा रहे हैं। विदेशों में भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सकों की मांग में बढ़ोतरी हो रही है। इसलिए हम कह सकते हैं कि इसमें रोजगार की संभावना बढ़ती जा रही है। इस क्षेत्र को करिअर के रूप में अपनाने वाले आयुर्वेदिक चिकित्सक बनने के अलावा आयुर्वेदिक औषधिक निर्माता कंपनियों के आर एंड डी विभागों में विभिन्न रोगों के लिए प्रभावी औषधि तैयार कर सकते हैं, शोध वैज्ञानिक तथा आयुर्वेदिक कालेजों में अध्यापन जैसे विकल्पों को चुन सकते हैं। चूंकि अब आयुर्वेद के क्षेत्र में विकास हो रहा है। सो, आयुर्वेदिक दवाइयों के बाजार का विस्तार भी तेजी से होता नजर आ रहा है। डिग्री के आधार पर आयुर्वेदिक औषधियों के विक्रय का लाइसेंस प्राप्त किया जा सकता है। यहां यह बताना जरूरी है कि कुछ राज्यों में सिविल अस्पतालों में, सरकारी अस्पतालों में कम से कम एक आयुर्वेदिक चिकित्सक नियुक्त करना अनिवार्य है। अंतत: विशेषज्ञ बनने के बाद आप अपना क्लिनिक खोल उसमें खुद प्रैक्टिस कर सकते हैं(जी एस नंदिनी,दैनिक ट्रिब्यून,22.6.11)।

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गुरुवार, 2 जून 2011

देहरादूनःएक ही छत के नीचे आयुर्वेद के सभी उपचार

दून अस्पताल में एक छत के नीचे बनी आयुष विंग में आयुर्वेद के सभी उपचार की व्यवस्था बना दी गई है। इस संबंध में अस्पताल में डिस्पले पर सप्ताह में दिनवार होने वाले उपचारों को भी प्रदर्शित कर दिया गया है। दून अस्पताल में आयुष विंग का पूरी तरह से विस्तार हो गया है। आयुर्वेद ओपीडी, पंचकर्मा सेंटर से लेकर योग कक्ष तक यहां पर बना हुआ है। लोगों को आयुष विंग में मौजूद सुविधाओं की जानकारी देने के लिए अस्पताल में जगह-जगह बोर्ड में उपचार के प्रकार अंकित कर दिए गए हैं। वरिष्ठ नागरिकों का भी ख्याल रखा गया है। इन सुविधाओं का लाभ देने के लिए मंगलवार का दिन वरिष्ठ नागरिकों के लिए रखा गया है। दून अस्पताल प्रशासन के मुताबिक सामान्य रोग चिकित्सा, जीर्ण रोग चिकित्सा व पंचकर्मा की सुविधा हर दिन है। नारी परीक्षण के लिए सोमवार सुबह नौ से दस बजे के बीच का समय तय किया हुआ है। अग्निकर्म चिकित्सा बुधवार को, मंगलवार को कर्ण मेदन चिकित्सा का लाभ मिलेगा। प्रत्येक शुक्रवार को त्वचा, सौंदर्य व गुप्त रोग से संबंधित मरीजों को देखा जाएगा। युवा परार्मश शनिवार को है। आहार प्रबंधन व स्वस्थ वृत की सुविधा प्रत्येक दिन है। उधर योग कक्ष में हर दिन मरीजों को काउंसिलिंग व उपचार की सुविधा दी हुई है। दून अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डा. बीसी पाठक का कहना है कि मरीजों को एक ही जगह पर आयुव्रेद व योग से संबंधित सुविधा मुहैया कराई गई है(राष्ट्रीय सहारा,देहरादून,2.6.11)।

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सोमवार, 18 अप्रैल 2011

पंजाब का पहला सरकारी आयुर्वेदिक अस्पताल अमृतसर में खुला

अमृतसर में पंजाब का पहला आयुर्वेदिक अस्पताल खोल कर महानगर वासियों को सरकार ने उपहार दिया है। इस का उद्घाटन स्वास्थ्य मंत्री पंजाब लक्ष्मी कांता चावला ने रविवार को वेरका में किया । लक्ष्मी कांता चावला ने बताया कि पंजाब सरकार ने पांच आयुर्वेदिक अस्पताल खोलने का फैसला किया हैं जिनमें से अमृतसर में पहला अस्पताल आज खोल दिया गया है। उन्होंने बताया कि इन अस्पतालों में मरीजों का इलाज मुफ्त किया जाएगा और उन्हें दवाइयां भी फ्री में वितरित की जायेंगी। चावला के अनुसार यहां पर गंभीर बिमारियों का भी इलाज किया जाएगा, जिसके लिए विशेषज्ञ डाक्टरों की भर्ती की जाएगी।
एक प्रश्न के उत्तर में प्रोफेसर चावला ने बताया कि इन अस्पतालों में भारत सरकार की तरफ से चलाए जा रहे जैरीएटरिक केयर( बुढ़ापे में होने वाले रोग) तथा खून की कमी वाले रोगियों के इलाज को मुहिम के रूप में करवाया जाएगा। स्वास्थ्य मंत्री ने एक प्रश्न का उत्तर देते हुए बताया कि यह सही बात है कि अब आयुर्वेदिक इलाज में लोगों की रुचि बड़ी हैं। इस का कारण यह बताया कि पंजाब में पिछले चार, सालों से आयूष मेले करवाए जा रहे हैं। जिन में पूरे देश से आयुर्वेदिक दवाइयों के स्टाल और डाक्टर हिस्सा लेकर आयुर्वेदिक चिकित्सा संबंधी जानकारी लोगों को दे रहे हैं। चावला ने बताया कि इस कड़ी में दूसरा अस्पताल जालंधर,तीसरा बठिंडा चौक, लुधियाना तथा पांचवां होशियारपुर में खोला जाएगा। इसके अलावा पंजाब के प्राइमरी हैल्थ सेंटरों में 205 आयुर्वेदिक डाक्टर काम कर रहे हैं(दैनिक ट्रिब्यून,अमृतसर,18.4.11)।

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शनिवार, 5 मार्च 2011

आयुर्वेद और कैंसर

कैंसर पर फतह पाने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों को आयुर्वेद ने एक नई दिशा दी है। आयुर्वेदाचार्यों के दावों पर यकीन करें तो कैंसर प्रभावित कोशिकाओं पर औषधियों के असर से अब आसानी से नियंत्रण पाया जा सकता है। इलाहाबाद के राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय, हंडिया में किए गए शोध के दौरान यह पता लगा है कि कैंसर प्रभावित अंगों पर किस तरह औषधियों का त्वरित और सीधा असर पहुंचाया जा सकता है। आयुर्वेदाचार्यों ने इस विधि को मॉलिकुलरली टारगेटेड थिरैपी का नाम दिया है। शोध के उत्साहजनक परिणामों के बाद आयुर्वेदाचार्यो का दावा तो यह भी है कि कैंसर के दूसरे और तीसरे चरण में पहुंच चुके ऐसे मरीज जो इलाज के लिए सर्जरी और कीमोथिरैपी कराने में असमर्थ हैं, उनका इलाज इस इस थिरैपी से सफलतापूर्वक किया जा सकता है। महाविद्यालय के काय चिकित्सा विभाग के अध्यक्ष डॉ.जीएस तोमर के मुताबिक शोध में इस बात का पता चला कि जिस अंग में कैंसर है, यदि उससे संबंधित बीमारी में दी जाने वाली औषधि के साथ ही कैंसर की औषधियां दी जाती हैं, तो वे प्रभावित अंगों तक जल्दी पहुंचती हैं और त्वरित अपना असर दिखाती हैं। कालेज में किए गए इस शोध के दौरान मुख, फेफड़े और प्रॉस्टेट के कैंसर के 34 मरीजों पर मॉलिकुलरली टारगेटेड थिरैपी का प्रयोग किया गया। इनमें 24 मरीजों में बेहतर परिणाम देखने को मिले। हरदोई जिले से आए मुख कैंसर के एक मरीज में तो 98 प्रतिशत सुधार हुआ। डॉ.जीएस तोमर के मुताबिक इस थिरैपी के जरिए अब दूसरे और तीसरे चरण के मरीजों का भी इलाज बिना सर्जरी और कीमोथिरैपी के ही किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि अभी तक आयुर्वेद में प्रथम चरण में ही आयुर्वेदिक औषधियों से कैंसर का इलाज संभव था। इसके अलावा अन्य चरणों में पहुंच चुके मरीजों में सर्जरी और कीमोथिरैपी के सिवा कोई और चारा नहीं था। हालांकि ऐसे मरीजों को आयुर्वेदिक औषध के जरिए कीमोथिरैपी के साइड इफैक्ट से बचाते हुए आयु के साथ ही जीवन गुणवत्ता बढ़ाया जा सकता है। डॉ.तोमर ने बताया कि इस शोध के तहत एक वैज्ञानिक प्रोजेक्ट बना वैज्ञानिक प्रमाणिकता के लिए भेजने की तैयारी चल रही है(अमित पांडेय,दैनिक जागरण,इलाहाबाद,5.3.11)।

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बुधवार, 2 मार्च 2011

आयुर्वेदिक दवाओं पर उठती उंगली

यूरोपीय यूनियन ने स्पष्ट किया है कि 30 अप्रैल 2011 के बाद भारत की आयुव्रेदिक दवाएं उनके क्षेत्र में नहीं बिक पाएंगी। इनके दुष्प्रभावों की बढ़ती शिकायतों के चलते एक मई के बाद यूरोपीय देशों में हर्बल दवाओं की बिक्री से पहले उनकी कड़ी जांच होगी। वे उनके वैज्ञानिक मानकों पर खरा उतरने के बाद ही बिक पाएंगी। माना जा रहा है कि आयुव्रेदिक दवाओं के नाम पर बाजार में जो बेचा जा रहा है, उसके कुप्रभाव अंग्रेजी दवाओं से अधिक घातक हैंं। पिछले दिनों अमेरिका के हार्वड मेडिकल स्कूल ने अमेरिका में बिक रही कोई 70 भारतीय आयुव्रेदिक दवाओं के अध्ययन में सीसा, पारा, संखिया आदि की मात्रा जानलेवा स्तर तक पायी। इनमें से अधिकांश दवाएं भारत की नामी-गिरामी कंपनियों की थीं। जाहिर है, देसी दवा उद्योग अंतरराष्ट्रीय बाजार में टिक नहीं पाएगा। जब आम लोग त्वरित रोग मुक्ति के लालच में सस्ती अंग्रेजी दवाओं की ओर दौड़ रहे थे, तो भारत के अभिजात्य वर्ग और पश्चिमी देशों ने इस चिकित्सा पद्धति के कुप्रभावों को ताड़ जड़ी-बूटियां (फैशन में हर्बल) अपना ली थीं। उधर विदेशी कंपनियों ने जब देखा कि भारत की अधिसंख्य आबादी उनकी ‘जहरीली’ दवाओं की आदी हो गई है तो उन्होंने धीरे-धीरे दाम बढ़ाने शुरू किए। जब आम लोगों को इस विदेशी कुचक्र की सुध लगी, तो काफी देर हो चुकी थी। हमारे ऋषि मुनियों की सालों-साल की तपस्या और परिश्रम से तैयार जड़ी-बूटियों से निर्मित दवाओं का व्यावसायीकरण हो चुका था। आज कोई सौ आयुव्रेदिक दवाओं में मानव शरीर के लिए घातक धातु पारद का धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है। अधिकांश आयुव्रेद दवाएं, जिनके नाम के साथ ‘रस’

शब्द जुड़ा होता है, में पारे की बहुत मात्रा होती है। बावजूद इसके इनके कुप्रभाव जांचने के कोई प्रयास नहीं किए गए हैं। सालों से पश्चिमी देश हमारे दवा बाजार को बंद करने की कोशिश में थे। प्रयोगशालाओं में ऐसी दवाओं के परीक्षण चूहों पर हुए तो उनकी आंतरिक कार्यपण्राली पर खतरनाक असर दिखा। दावा किया गया कि ये दवाएं चूहों की तरह मानव शरीर पर भी विपरीत प्रभावकारी हैं। भारत सरकार ने इन रिपोटरें को गंभीरता से नहीं लिया पर जब लगभग यही बात हार्वड मेडिकल स्कूल ने कही तो सरकार में बैठे लोगों को देश की छवि का ध्यान आया। कतिपय आयुव्रेदाचार्य दावा करते हैं कि उनकी दवाइयों में प्रयुक्त पारा परिष्कृत होता है, जिससे उसका नुकसानदायक तत्व समाप्त हो जाता है लेकिन परीक्षणों से यह दावा गलत सिद्ध बताया गया है। ‘कजली’ अधिकांश आयुव्रेदिक दवाओं का आधाभूत हिस्सा है। कोई 200 दवाएं होंगी, जिनमें ‘कजली’ प्रमुख घटक है । शोध के दौरान जिन चूहों को ‘कजली’ दी गई उनके शरीर में कई परिवर्तन दिखे। इसमें मौजूद पारद के कारण चूहों की भूख, रक्त, सक्रियता और वजन घट गया। पाया गया कि यह धातु शरीर की कोशिकाओं द्वारा आसानी से अवशोषित हो रही है। ‘कजली’


न देने के कुछ दिनों बाद पाया गया कि उनके गुर्दे और यकृत की कार्य पण्राली ना सुधरने की हद तक बिगड़ चुकी थी। कजली में 49 प्रतिशत पारद और 40 फीसद गंधक होता है। सनद रहे कजली आमतौर पर प्रतिदिन 1000 मिग्राकी मात्रा में दी जाती है। आयुव्रेदिक दवाओं में समस्या केवल पारद की मौजूदगी ही नहीं है। कुछ समय पूर्व मुंबई के भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर (बीएआरसी) ने कुछ आयुर्वेद दवाओं के नमूनों में सीसे की मात्रा खतरनाक स्तर पर पाई थी। बीएआरसी के वैज्ञानिकों ने ऐसे चार मरीजों का गहन परीक्षण किया जो आर्थराइटिस या मधुमेह के कारण आयुव्रेद दवाएं खा रहे थे। इनमें सीसे की मात्रा लगभग आठ मिलीग्राम थी, जो रोजाना खाने या हवा के जरिए शरीर में पहुंच रहे सीसे की मात्रा से 80 गुना अधिक है। बीएआरसी की टीम ने अन्य विषैली धातु केडमियम को भी ऐसी दवाओं में पाया। चार साल पहले नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ ओक्यूपेशनल हेल्थ, अहमदाबाद ने भी कुछ पारंपरिक दवाओं के नमूनों में सीसे की मात्रा पाई थी। इसके शोधकर्ताओं ने एक दवा में 27,500 पीपीएम और दूसरी में 9700 पीपीएम सीसे की मात्रा मापी थी । एक स्थापित बहुराष्ट्रीय कंपनी का उत्पाद ‘इसेन्सल’

लीवर की बीमारियों की दवा के नाम पर बेचा जाता है। स्वतंत्र संस्था ‘फाउंडेशन आफ हेल्थ एक्शन’ (एफएचए) के मुताबिक इसमें ऐसी कोई क्षमता नहीं हैं। तभी दो राज्य महाराष्ट्र और गुजरात के खाद्य और औषधि नियंत्रक महकमे इसका लाइसेंस निरस्त कर चुके हैं। ‘एफएचए’

बताता है कि बहुप्रचारित ‘थर्टीप्लस’ भी हानिकारक दवा है। ‘कपूर्रआसव’ में मौजूद अल्कोहल की अधिक मात्रा के कारण शराबी भी इसका सेवन खुल कर करते हैं। आयुव्रेद की शाश्वत मान्यता आज भी पूर्णरूपेण खरी उतर सकती है, बशत्रे सुरक्षित और प्रभावी दवाओं के उत्पादन और पारंपरिक जड़ी-बूटियों के सही उपयोग की पद्धति बरकरार रहे। यूरोपीय देशों की प्रयोगशालाओं में परीक्षण की गई दवाएं कारखानों में बनी थीं। उनकी विपरीत रिपोर्ट से भारत के पारंपरिक ज्ञान पर सवालिया निशान खड़े हुए हैं। सरकार को आयुव्रेदिक दवाओं के उत्पादन के कड़े मानक बनाने चाहिए। हमारे वैद्यगण कारखानों में बनी दवाओं का मोह त्याग दें तो आयुव्रेद की पारंपरिक प्रतिष्ठा बरकरार रखी जा सकती है(पंकज चतुर्वेदी,राष्ट्रीय सहारा,1.3.11)।

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शनिवार, 1 जनवरी 2011

पंचकर्म चिकित्सा

पंचकर्म शरीर शुद्धि की प्राचीन आयुर्वेदिक विधा है। इसमें शरीर के समस्त विषैले पदार्थ विभिन्न क्रियाओं के माध्यम से बाहर कर दिए जाते हैं। इससे शरीर के सभी सिस्टम ठीक से काम करने लगते हैं। इसमें पाचन क्रिया, रक्त संचार, फेफड़े, गुर्दे, चयापचय आदि प्रक्रियाएँ शामिल हैं। शरीर को पुनः संतुलित अवस्था लाने के लिए पंचकर्म में अनेक प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया जाता है।

आयुर्वेद की प्राचीनतम विधाओं में से पंचकर्म एक माना जाता है। रोग को केवल औषधियों के जरिए ही ठीक करने की बजाए विषैले पदार्थों को बाहर निकालने का काम किया जाता है। जठराग्नि को चरम स्तर पर पहुँचाना और दोष जैसे मल-मूत्र, स्वेद को दूर करना। शरीर से इनका निष्कासन किया जाना जरूरी है। पंचकर्म द्वारा जननेंद्रियों और कर्मेंद्रियों तथा मन और आत्मा को स्थायित्व प्रदान किया जाता है।

पंचकर्म क्या है?
पंचकर्म का अर्थ है पाँच तरह के कर्म जिनसे शरीर को स्वस्थ रखा जा सकता है। देश के दक्षिणी हिस्से को छोड़कर सभी जगह यह माना जाता है कि पंचकर्म यानी मालिश करना है, लेकिन ऐसा नहीं है। पंचकर्म का अर्थ है शोधन क्रिया। तेल द्वारा की जा रही अन्य क्रियाएँ उपकर्म के नाम से जानी जाती हैं। यह चिकित्सा पद्धति हर मरीज के रोग के आधार पर तय की जाती है। हर मरीज की प्रकृति और विकृति एक समान नहीं होती।

तीन तरह से होती है शरीर की शुद्धि
पूर्वकर्म (जठराग्नि को संतुलित करना) : जठराग्नि को संतुलित रखने में सहायक तथा पाचनक्रिया को बढ़ाने वाली औषधियाँ खाने की सलाह दी जाती है। औषधियाँ चयापचय को भी ठीक रखती हैं। औषधियों के बाद घी, तेल आदि पिलाए जाते हैं। तेल मालिश के बाद भाप स्नान कराया जाता है ताकि वसा के स्तर तक के विषैले पदार्थ अलग हो सकें और पाचन प्रणाली तथा मलद्वार तक आ सकें।

प्रधानकर्म : इस क्रिया में भी औषधियों और आहार के माध्यम से शरीर की विभिन्ना प्रणालियों में से शेष रह गए पदार्थों को बाहर निकाला जाता है। इस दौरान मरीज से अपेक्षा की जाती है कि वह आहार के प्रति लापरवाह न हो तथा वही खाए जिसकी सलाह दी गई है।

पश्चात कर्म : मरीज के स्वास्थ को चरम की प्रक्रिपंचकर्म शरीर शुद्धि की प्राचीन आयुर्वेदिक विधा है। शरीर के समस्त विषैले पदार्थ विभिन्ना क्रियाओं के माध्यम से बाहर कर दिए जाते हैं। इससे शरीर के सभी सिस्टम ठीक से काम करने लगते हैं। इसमें पाचन क्रिया, रक्त संचार, फेफड़े, गुर्दे, चयापचय आदि प्रक्रियाएँ शामिल हैं। शरीर को पुनः संतुलित अवस्था लाने के लिए पंचकर्म में अनेक प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया जाता है।


विषैले पदार्थों से मुक्ति के लाभः
जठराग्नि संतुलित होती है और चयापचय ठीक होता है।
शरीर बलवान और पुष्ट होता है तथा नवजीवन मिलता है।
बीमारियों का प्रभाव क्षीण होता है।
शरीर की सभी क्रियाओं का संतुलन पुनः लौट आता है।
इन्द्रियों,मन और मेधा का चरम स्तर हासिल होता है।
रक्त शुद्धि होने से त्वचा कांतिमय हो जाती है।
उम्र के कारण शरीर के क्षतिग्रस्त होने की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है तथा बुढ़ापा देर से आता है।
जीवन लंबे काल तक नीरोग रहता है।

(डॉ. शारिका मेनन,आयुर्वेद कंसल्टेंट, श्री श्री आयुर्वेद पंचकर्म विभाग, आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल आश्रम,बेंगलुरू का यह आलेख नई दुनिया के सेहत परिशिष्ट में दिसम्बर,तृतीय अंक,2010 में प्रकाशित हुआ है)।

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मंगलवार, 9 नवंबर 2010

सिद्ध को नई पहचान दिलाने की तैयारी

ईसा से करीब 3000 साल पुरानी माने जाने वाली भारतीय चिकित्सा पद्धति सिद्ध को आम जनता में पॉपुलर बनाने पर सरकार अब खास ध्यान देने जा रही है। तमिलनाडु में मशहूर इस पद्धति को अब पूरे देश और विदेश में लोकप्रिय बनाने की कोशिश होगी। इसी के तहत सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन सिद्ध (सीएसआरएस) नाम से अलग इकाई बनाई गई है। यही नहीं सिद्ध को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए इसे नैशनल रूरल हेल्थ मिशन में भी शामिल किया जाएगा। पेटेंट की जंग से बचाने के लिए तो सरकार पहले ही इसके तमाम ज्ञात फॉर्म्युलों को ट्रडिशनल डिजिटल नॉलेज लाइब्रेरी में शामिल कर चुकी है, पर इसे जनता में पापुलर बनाने का काम अब भी बाकी है। इसी मकसद से सीएसआरएस में अब तक वैज्ञानिकों और प्रशासनिक स्टाफ समेत 153 पदों पर 280 लोगों को नियुक्त किया जा चुका है। इससे पहले आयुर्वेद और सिद्ध में रिसर्च के लिए एक ही काउंसिल थी, जिसके कारण सिद्ध उपेक्षित सी हो गई थी। पर अब नई काउंसिल में आयुर्वेद और सिद्ध, दोनों के विशेषज्ञों को भेजा गया है। माना जाता है कि सिद्ध पद्धति को खुद भगवान शिव ने शुरू किया था। पहला सिद्ध भी उन्हीं को कहा जाता है। आयुर्वेद की ही तरह इसमें भी प्राकृतिक चीजों से सैकड़ों दवाएं बनाई जाती हैं। तिब्बती चिकित्सा प्रणाली सोवा रिग्पा को आयुष विभाग के तहत भारतीय चिकित्सा पद्धति का दर्जा दिए जाने के बाद सरकार सिद्ध को देश के दूरदराज के इलाकों में भी पहुंचाना चाहती है। यह काम नैशनल रूरल हेल्थ मिशन के तहत किया जाएगा। इसमें भारतीय चिकित्सा पद्धतियों की दवाएं पिछड़े क्षेत्र की डिस्पेंसरियों में पहुंचाने के साथ ही वहां होम्योपैथी, आयुर्वेद, सिद्ध और सोवा रिग्पा के डॉक्टरों को भी तैनात करने की योजना है(सुरेश उपाध्याय,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,2.11.2010)। सिद्ध चिकित्सा पर विकीपीडिया का परिचयात्मक आलेख सिद्ध चिकित्सा पर एक अन्य महत्वपूर्ण आलेख

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गुरुवार, 4 नवंबर 2010

आयुर्वेदिक इलाज का भी खर्च भरेंगी बीमा कंपनियां

अगले दो तीन महीने बाद बीमा कंपनियां आयुर्वेदिक इलाज का भी खर्च भरेंगी। इस बार दीपावली में आयुर्वेद के देवता धन्वंतरि की पूजा के मौके पर इस पद्धति के भविष्य को लेकर यह एक बहुत बड़ी खबर है। बुधवार को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान महासम्मेलन द्वारा मनाई गई धन्वंतरि जयंती में केंद्र सरकार के आयुष विभाग में कार्यरत आयुर्वेद सलाहकार डॉ. एस. शर्मा ने यह जानकारी देकर पूरे देश से आए वैद्यों को खुश कर दिया। इसके पहले महासम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. देवेंद्र त्रिगुणा ने राष्ट्रपति भवन जाकर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को अमृत कलश भेंट किया। डॉ. शर्मा ने समारोह में जानकारी दी कि दो-तीन महीने के अंदर बीमा कंपनियां आयुर्वेद को भी अपना लेंगी। आयुष ने पिछले दिनों मुंबई में राष्ट्रीय बीमा निगम के सामने आयुर्वेद से लकवा, माइग्रेन, मोटापा, फिस्टुला जैसे उन बीस रोगों का ब्यौरा पेश किया जिसका एलोपैथी में इलाज ही नहीं है। निगम आयुर्वेद के इलाज का खर्च वहन करने पर लगभग राजी हो गया है। वैद्य देवेंद्र त्रिगुणा की अध्यक्षता में हुए समारोह में दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष एवं पूर्व स्वास्थ्य मंत्री योगानंद शास्त्री एवं केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय माकन भी शामिल हुए। माकन ने पेटेंट के माध्यम से देश की आयुर्वेदिक दवा विधियों को विदेशियों द्वारा हड़पने की कोशिशों को नाकाम करने का आह्वान किया। वहीं खुद भी आयुर्वेद के ज्ञाता योगानंद शास्त्री ने कहा कि असाध्य से असाध्य बीमारी का इलाज भी आयुर्वेद में है। वैद्य देवेंद्र त्रिगुणा ने इस मौके पर कहा कि दिल्ली में एम्स की तर्ज पर इस साल अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान का शुरू होना आयुर्वेद के स्वर्णिम भविष्य का आगाज है(नई दुनिया,दिल्ली,4.11.2010)।

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बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

बेंगलूरू का आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्र देश का पहला राष्ट्रीय मान्यताप्राप्त आयुर्वेदिक अस्पताल बना

अब आप आयुर्वेदिक अस्पतालों में इलाज के लिए जाने से पहले वहां के क्वालिटी मानकों के बारे में भी जान सकते हैं। अब तक सिर्फ एलोपैथिक अस्पतालों को मिल रही नेशनल एक्रिडेशन बोर्ड फॉर होस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स (एनएबीएच) की मान्यता मंगलवार को बेंगलूरू के आयुर्वेदिक अस्पताल आयुर-वैद को भी मिल गई। इस तरह यह क्वालिटी मानकों के लिए ऐसी मान्यता पाने वाला भारतीय चिकित्सा पद्धति का देश का पहला अस्पताल बन गया है। कल स्वास्थ्य राज्य मंत्री एस. गांधीसेल्वन ने बेंगलूरु में केंद्रीय आयुर्वेद शोध संस्थान में आयोजित कार्यक्रम के दौरान इस अस्पताल को क्वालिटी सर्टिफिकेट दिया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति पर लोगों का विश्वास कम होने की सबसे बड़ी वजह यहां मानकों को लेकर बरती जाने वाली लापरवाही रही है। लेकिन इसी तरह अगर दूसरे संस्थान भी अपनी सेवा के स्तर को सुधार लें तो दुनिया भर के लोगों का इस पद्धति में विश्वास और बढ़ेगा। आयुर-वैद अस्पताल की शाखाएं बेंगलूरू के अलावा मुंबई, चेन्नई, कोच्चि और हुबली में हैं। इनमें आयुर्वेदिक पद्धति से मरीजों के आपरेशन भी किए जाते हैं। अब तक देश के सिर्फ 50 से 60 एलोपैथिक अस्पतालों को ही यह मान्यता प्राप्त है। इस मान्यता देने से पहले अस्पताल में सेवा के स्तर, साफ-सफाई की व्यवस्था, संक्रमण रोकने के उपाय, कर्मचारियों के प्रशिक्षण का स्तर और ढांचागत सुविधाओं का आकलन किया जाता है। इस मौके पर स्वास्थ्य मंत्रालय के आयुष विभाग की सचिव एस. जलजा ने कहा कि उनका विभाग लगातार आयुर्वेदिक अस्पतालों को इसके लिए प्रेरित कर रहा है कि वे इस मानक को प्राप्त करें(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,27.10.2010)।

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