शनिवार, 5 नवंबर 2011

उत्तरप्रदेशःआयुर्वेद से उठ रहा है विश्वास

प्रदेश में आयुर्वेद की स्थिति का जायजा लें तो सूबे में इस चिकित्सा पद्धति की दशा और दिशा निराश करती है। हालांकि सरकार का यह दावा है कि हर साल करीब डेढ़ करोड़ लोग आयुर्वेद चिकित्सा का लाभ उठाते हैं। लेकिन आयुर्वेद चिकित्सा की दवाओं पर खर्च होने वाले पैसे पर नजर दौड़ाए तो एक मरीज के हिस्से में दस रुपए भी नहीं आते। हालांकि दवाओं के निर्माण में बढ़त लगातार जारी है। दवाओं के निर्माण में इस बार डेढ़ करोड़ रुपए का इजाफा हुआ है फिर भी अस्पतालों में न रोगी दिखाई पड़ते हैं और न ही रोग में इस्तेमाल करने वाली दवाओं की खरीददारी। वर्ष २००९-१० में प्रदेश के आयुर्वेदिक डॉक्टरों ने २ करोड़ ५२ लाख रुपए की दवाओं का निर्माण किया था लेकिन इस बार वर्ष २०१०-११ में डॉक्टरों ने ४ करोड़ ३ लाख की दवाओं का निर्माण किया है। इसकी खपत के लिए अब मंत्री भी परेशान हैं। 

 इस समय प्रदेश में २,२१० आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सालय हैं लेकिन इनमें से ११५९ चिकित्सालय किराए पर चल रहे हैं। इनका वार्षिक किराया २ करोड़ ४० लाख है। इन अस्पतालों में रोगियों की संख्या बेहद कम है। पूरे प्रदेश में जनपदवार दवाओं की आपूर्ति करने का जिम्मा लखनऊ और पीलीभीत निर्माणशालाओं को ही है क्योंकि सूबे की ये ही दो अकेली निमार्णशालाएं हैं। 

प्रदेश के राजकीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी औषधि निर्माणशाला को गुणवत्ता का मानक प्राप्त हो गया है। इनकी दवाओं को गुड मैन्यूफैर्क्चड प्रोडक्ट (जीएमपी) की मान्यता मिल गई है। लेकिन खपत को लेकर चिंताए बरकरार हैं। इसी प्रकार राजधानी के आयुर्वेद महाविद्यालय में भले ही बाल एवं प्रसूति विभाग का उद्घाटन हो गया हो पर बीते एक साल में यहां सिर्फ एक प्रसव हो पाया है। इसकी वजह अल्ट्रासाउंड व्यवस्था का अभाव और जननी सुरक्षा योजना के लाभ से इस अस्पताल का वंचित होना है। यही नहीं, तीन स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ एवं इतने ही बाल रोग विशेषज्ञ यहां तैनात हैं पर इस अस्पताल में नवजात बच्चों के टीकाकरण की अनुमति नहीं है। ऐसे में कोई इस ओर क्यों रुख करेगा। किसी भी चिकित्सा पद्धति की सफलता उसकी पढ़ाई पर निर्भर करती है। राज्य में आयुर्वेद की पढ़ाई की गति समझने के लिए सिर्फ यह जान लेना पर्याप्त होगा कि यहां प्रोफेसर के दस, रीडर के चार और प्रवक्ता के २३ पद रिक्त हैं। यही नहीं, पांच विषयों में स्नात्कोत्तर पाठ्यक्रम शुरू करने की घोषणा को भी कई सालों से अंजाम देने में सफलता हासिल नहीं हो पाई है(लखनऊ से योगेश मिश्र की यह रिपोर्ट नई दुनिया,दिल्ली संस्करण में 24.10.11 को प्रकाशित है)। 


 कल सुबह सात बजे पढ़िएः 


 कसरत कितना करें और किन सावधानियों के साथ

11 टिप्‍पणियां:

  1. आयुर्वेद की अपनी सीमाएं हैं । एलोपेथी में जो निरंतर शोध और विकास हो रहा है , उसकी वज़ह से बाकि पद्धतियों में कमी तो आएगी ही । हालाँकि कुछ स्थितयों में आयुर्वेद काफी फायदेमंद होता है ।

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  2. राम भरोसे चलने दीजिए जी.

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  3. समर्पण के बिना कुछ भी चलता नहीं।

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  4. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 07-11-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  5. आयुर्वेद की अपनी महत्ता है जिसे अक्षुण्य रखने के सकारात्मक प्रयास होने ही चाहिये... सुन्दर विश्लेषनात्मक आलेख...
    सादर...

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  6. achche swasthay ki jaankari hetu aapke blog ka anusaran kar rahi hoon.

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  7. 'आयुर्वेद''अथर्ववेद' का उप-वेद है। 'आयु' का ज्ञान कराने के कारण इसे आयुर्वेद कहा गया है। आयुर्वेद का पतन योजनाबद्ध ढंग से विदेशी शासकों ने कराया है जिससे कि हमारे देशवासी विदेशों पर मोहताज बने रहे। आजाद भारत मे भी एलोपैथी को बढ़ावा विदेश-प्रशंसक लोगो ने दिलवाया है और निजी हित मे उस पर इठलाते हैं। 'एलोपैथी' की लूट-पद्धति के कारण ही जर्मनी के डॉ हनीमेन ने 'होम्योपैथी' का आविष्कार किया था।

    गौतम बुद्ध के काल तक आयुर्वेद-सर्जरी का लोहा सम्पूर्ण विश्व मानता था। षड्यंत्र के तहत आयुर्वेद को बढ्ने नहीं दिया जा रहा है और जनता की लूट-शोषण जारी है। जा-समर्थक सत्ता स्थापित हो तभी आयुर्वेद को उसका अपना असली हक हासिल हो सकेगा।

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  8. बहुत हि अच्छा आलेख!
    चिंतनीय स्थिति में पंहुंच चूका है आयुर्वेद...

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