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बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

इलाज़ की क़ीमत

गनीमत है कि सुधारों की दूसरी लहर देश के हेल्थकेयर सेक्टर तक भी पहुंचनी शुरू हो गई है। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक (डीजीएचएस) के एक बयान पर यकीन करें तो आने वाले दिनों में प्राइवेट अस्पतालों को अपनी चिकित्सा सेवाओं की कीमत तय करके बाकायदा उन्हें अपने परिसर में बोर्ड पर प्रदर्शित करना होगा। अभी तो हालत यह है कि नामी-गिरामी अस्पताल अपने मरीज से या उसके रिश्तेदारों से जितना भी मांग लें उतना उन्हें देना पड़ता है। किस बीमारी में वे कितने और कौन-कौन से टेस्ट करा डालेंगे, इसका कोई ठिकाना नहीं है। बाजार में जिस दवा का जेनेरिक वर्जन तीन रुपए में मिलता है, उसकी कीमत अस्पताल के बिल में 300, बल्कि 3 हजार रुपए भी दर्ज पाई जा सकती है। 

यह सब भारत के चिकित्सा क्षेत्र में पहले दौर के रिफॉर्म की उपज है, जिसके तहत स्वास्थ्य सेवाओं को बड़े पैमाने पर निजी क्षेत्र में लाया गया था। अलबत्ता इसकी गड़बडि़यां गिनाते वक्त इसके फायदों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। प्राइवेट हेल्थकेयर चेन्स के अस्तित्व में आने के बाद से कई बीमारियों को लाइलाज मानने का सिलसिला खत्म हो गया है। सुपर स्पेशलिटी एक्सपर्टाइज का लाभ अब गिने-चुने लोगों तक सीमित नहीं रह गया है, क्योंकि अपनी विशेषज्ञता की कदर देखकर ऊंचे पाए के ज्यादातर भारतीय डॉक्टर अब भारत में ही रहना पसंद करते हैं। टू-टियर शहरों में गुर्दा प्रत्यारोपण, कैंसर का इलाज और एमआरआई जैसी डायग्नोस्टिक सुविधाओं की कल्पना भी अभी 10-15 साल पहले तक नहीं की जाती थी। लेकिन अब थ्री-टियर शहरों में भी इनमें से ज्यादातर सेवाएं उपलब्ध हैं।

हेल्थकेयर सेक्टर की आलोचना का मकसद उसकी इन उपलब्धियों की आलोचना करना या उन पुराने दिनों का गुणगान करना नहीं है, जब असाध्य बीमारियों के शिकार मरीज अपने ऑपरेशन के लिए सरकारी डॉक्टरों की हड़ताल खत्म होने का इंतजार करते थे। दरअसल, किसी भी व्यवस्था की गड़बड़ी वहां से शुरू होती है, जब उसे चलाने वाले लोग खुद को खुदमुख्तार समझने लगते हैं और कानून के डर या नैतिकता की बाधा को अपने लिए पूरी तरह बेमानी मान बैठते हैं। उम्मीद करें कि केंदीय स्वास्थ्य मंत्रालय और स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय की नई पहल के बाद यह गलती सुधार ली जाएगी। दरअसल, भारत की स्वास्थ्य सेवाओं को ठीक उसी तरह एक नियामक मेकेनिज्म या रेगुलेटिंग एजेंसी के तहत लाने की जरूरत है, जैसे टेलिकॉम सेवाओं को ट्राई और उड्डयन सेवाओं को एएआई के तहत लाया गया है। हेल्थकेयर सेक्टर के जिम्मेदार लोगों को लेकर एक ऐसी संस्था बनाई जानी चाहिए, जो सरकारी और निजी, हर तरह की स्वास्थ्य सेवाओं पर, उनकी कीमतों, नीचे तक उनके फैलाव और उनकी सहज उपलब्धता पर नजर रखे। देश के सबसे गरीब आदमी को इनसे लाभान्वित करने का मामला इससे आगे का है, हालांकि यथास्थिति बनाए रखने के लिए सबसे ज्यादा हवाला उसी का दिया जाता है(संपादकीय,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,9.10.12)।

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मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

दवा-परीक्षणःमुनाफ़े के खेल में पिसते सरोकार

दवा कंपनियों द्वारा अपनी दवाओं के क्लीनिकल परीक्षण के लिए इंसानों को कथित रूप से ‘बलि का बकरा’ बनाए जाने पर गंभीर रूख अपनाते हुए सुप्रीमकोर्ट ने कल यानी 8 सितम्बर,2012 को केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों से इन आरोपों पर जवाब-तलब किया है। न्यायाधीश आरएम लोढा और न्यायाधीश एआर दवे की पीठ ने इस मसले पर केंद्र सरकार से ऐसे मामलों में अब तक यदि कुछ मौतें हुई हैं तो उनका भी ब्योरा मांगा है। इसके साथ ही पीठ ने केंद्र से ऐसी दवाओं के दुष्प्रभावों और पीडि़तों या उनके परिजनों को दिए गए मुआवजे की भी जानकारी चाही है। न्यायालय ने गैर सरकारी संगठन स्वास्थ्य अधिकार मंच द्वारा दाखिल की गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि विभिन्न फार्मा कंपनियों द्वारा देशभर में बड़े पैमाने पर अपनी दवाओं के क्लीनिकल परीक्षण में भारतीय नागरिकों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। 

सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त महाधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा से कहा, ‘हम एक पंक्ति का निर्देश भी जारी कर सकते हैं कि बहुत से लोगों को प्रभावित करने वाले इस प्रकार के सभी क्लीनिकल परीक्षणों पर आगे रोक लगाई जाए। हम इस बारे में बेहद गंभीर हैं।’ पीठ ने हालांकि इस मसले पर गंभीर चिंता जाहिर की, लेकिन परीक्षणों पर सीधे पूर्ण रोक लगाने से बचते हुए केंद्र सरकार से विस्तृत जवाब मांगा। इस मुद्दे के चिंताजनक पहलुओं पर,दैनिक ट्रिब्यून के 7 अक्टूबर,2012 के अंक में विचार किया हैः

"एक तरफ यूरोपीय देशों में जानवरों पर भी दवाओं का परीक्षण करने के खिलाफ आवाजें उठने लगी हैं और दूसरी तरफ हमारे देश में न सिर्फ जानवरों पर, बल्कि इंसानों पर भी क्लीनिकल ट्रायल यानी दवाओं के परीक्षण हो रहे हैं। भोले-भाले लोगों को घातक दवाओं के परीक्षण के लिए गिनी पिग के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है और जाहिर है कि ऐसे अनेक लोग असमय ही काल का ग्रास बन रहे हैं। इंसान से चूहों की तरह व्यवहार किया जा रहा है। उन पर दवाओं का परीक्षण किया जाता है, जिसकी वजह से कई लोगों की जान भी जा चुकी है। अनैतिकता की पराकाष्ठा देखिए कि जिन लोगों पर दवाओं के परीक्षण किए जा रहे हैं, उन्हें इस बारे में कोई जानकारी भी नहीं कि किस तरह बड़ी कंपनियां अपने फायदे के लिए उनकी जिंदगी को दांव पर लगा रही हैं। अफसोस की बात तो यह है कि क्लीनिकल ट्रायल के मामले में अंतरराष्ट्रीय हेलसिंकी घोषणा पत्र (देखें, बॉक्स) के प्रावधानों की धज्जियां भी उड़ाई जा रही हैं। पिछले दिनों एक मामले की सुनवाई करते हुए जब देश की शीर्ष अदालत ने कुछ दवा कंपनियों पर यह टिप्पणी की कि वे इंसानों को बलि का बकरा बना रही हैं, तो कम से कम उन लोगों को कोई हैरानी नहीं हुई, जो दवाओं के कारोबार से गहराई से जुड़े हैं। इत्तिफाक से मानवाधिकार संगठनों ने भी सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी पर कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं जताई। इसकी वजह शायद यह है कि इन संगठनों को दवा कंपनियों के उस गोरखधंधे की पूरी जानकारी है, जो गैरकानूनी तो है ही, अनैतिक भी है और मानवता के खिलाफ भी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की ताजा रिपोर्ट कहती है कि देश में हर हफ्ते करीब 10 लोग दवा परीक्षण की वजह से मर रहे हैं और यह सिलसिला कम से कम दस साल से चल रहा है। वर्ष 2008 से 2011 के बीच 1971 लोग दवा परीक्षण की वजह से मारे गए। 2012 की शुरुआत में ऐसे 12 डॉक्टरों का पर्दाफाश हुआ, जो गुपचुप तरीके से बच्चों पर दवा परीक्षण कर रहे थे। बाद में इन्हें सिर्फ 5,000 रुपए का आर्थिक जुर्माना लगाकर छोड़ दिया गया।

इस मामले को बेहद गंभीर मानते हुए स्वास्थ्य अधिकार मंच नामक एक संगठन ने कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। संगठन का कहना है कि मध्य प्रदेश में ऐसे 200 मामले सामने आए हैं, जिनमें बिना इजाजत लिए मरीजों पर दवा परीक्षण किया गया। जाहिर है कि यह सारा खेल अनैतिक और गैरकानूनी है। वर्ष 2004 से 2006 के बीच कई दवा कंपनियों ने लोगों पर परीक्षण किए और इस मामले में बनाए गए नियम-कानूनों का उल्लंघन किया। अफसोस की बात यह है कि इस बारे में किसी को सजा तक नहीं हुई। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि भारत दवा परीक्षण का सबसे बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। कम लागत, लचर नियम-कानून और सजा न हो पाने की वजह से दवा कंपनियां लोगों की जान से खिलवाड़ कर रही हैं। इसके उलट यूरोप में अब जानवरों पर भी परीक्षण के खिलाफ बवाल हो रहा है और जर्मनी सहित कई देश धीर-धीरे जानवरों की जगह अब कंप्यूटर पर दवा टेस्ट करने लगे हैं। 

स्वास्थ्य अधिकार मंच का कहना है कि मध्यप्रदेश में ऐसे 200 मामले सामने आए हैं, जहां मरीजों पर बिना उनकी इजाजत के दवा परीक्षण किया गया। मंच के पुनीत सिंह कहते हैं, ‘स्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैं। पिछले तीन वर्षों के बीच कई दवा कंपनियों ने लोगों पर परीक्षण किए और इस मामले में बनाए गए नियम-कानूनों का उल्लंघन किया। अफसोस की बात तो यह है कि इस बारे में किसी को सजा तक नहीं हुई।’वे जोर देकर यह बात भी कहते हैं कि यूरोप में तो अब जानवरों पर परीक्षण के खिलाफ भी बवाल हो रहा है और जर्मनी सहित कई देश धीरे-धीरे जानवरों की जगह कंप्यूटर पर दवा टेस्ट करने लगे हैं। लेकिन हमारे देश में लचर कानून और आम लोगों में जागरूकता की कमी के कारण गैर-कानूनी तरीके से दवा परीक्षण का धंधा चल रहा है। 

दवाओं का बाजार कितने तगड़े मुनाफे पर टिका है, यह हम सभी जानते हैं। इसी मुनाफे के फेर में दवा कंपनियां लोगों की जान से खिलवाड़ कर रही हैं। कई बार तो अस्पताल में भर्ती मरीज को भी परीक्षण के लिए दवाई खिला दी जाती है। एक मामला हरियाणा का है। प्रभा देवी के बेटे मनीष के शरीर पर दवा परीक्षण की वजह से सफेद दाग बनने लगे, जो अभी तक ठीक नहीं हुए। मनीष की दवाई चल रही है। उनके पिता जगन दास का कहना है, ‘हमारे गांव में कुछ लोग आए और उन्होंने कहा कि नवजात बच्चों को कोई नया टीका लगाना है और यह मुफ्त है। अगर इसे पैसा देकर लगवाते तो 6000 रुपए लगते।’ इसी तरह की एक घटना आंध्र प्रदेश में भी सामने आई। गुंटूर जिले की 35 महिलाओं पर स्तन कैंसर की दवा के असर का परीक्षण किया गया। महिलाओं को इसके बदले में पैसा भी दिया गया। जब महिलाओं ने दर्द और बेहोशी की शिकायत की, तो डॉक्टरों ने अचानक दवाई देना बंद कर दिया। इलाके में काम करने वाले एक डॉक्टर का कहना है कि स्वास्थ्य अधिकारियों की लापरवाही से उन डॉक्टरों को अपने आप सुरक्षा मिल जाती है, जो दवा कंपनियों के लिए काम करते हैं। 

हाल ही प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय क्लिनिकल परीक्षण और शोध का बाजार करीब 20 अरब डॉलर का है। भारत में यह बाजार करीब दो अरब डॉलर का हो गया है और यह 50 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। दवा बाजार से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि, ज्यादातर नई दवाओं का आविष्कार अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, स्विट्जरलैंड जैसे विकसित देशों में होता है लेकिन इनका परीक्षण भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, अफ्रीकी देश, श्रीलंका जैसे विकासशील और गरीब देशों में किया जाता है। 

हालांकि दवा कंपनियों ने दावा किया है कि वे उन्हीं लोगों पर परीक्षण करती हैं, जो असाध्य बीमारी से ग्रस्त हैं। इस मामले में हो रही मौत के लिए उन्हें दोष नहीं देना चाहिए। एक बहुराष्ट्रीय दवा कंपनी से जुड़े अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि दवा परीक्षण के लिए भारत में भी वही नियम-कानून हैं, जो अमेरिका और दूसरे यूरोपीय देशों में हैं। 

एक तरफ दवा के परीक्षण के दौरान देश में हर दो दिन में तीन लोगों की मौत हो रही है, वहीं दूसरी तरफ ऐसी दवाओं को भी हमारे देश में बेचा जा रहा है, जिन्हें अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय देशों में प्रतिबंधित किया गया है। और यह सब हो रहा है दवा कंपनियों और कुछ चिकित्सकों की मिलीभगत के कारण। स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार, दवा के साइड इफेक्ट के कारण जिन दवाओं पर अमेरिका, यूरोप और अधिकांश विकसित देशों में प्रतिबंधित लगाया गया है, उन्हें खुले तौर पर भारत में बेचा जा रहा है। समिति का कहना है कि इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि मिलीभगत के कारण कई दवाओं को बिना जांचे-परखे मंजूरी भी दी जा रही है। समिति को यह जानकारी भी मिली है कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों में होने के बावजूद चुनिंदा दवाओं के बारे में कुछ चिकित्सा विशेषज्ञों ने एक ही प्रकार की सिफारिश की। यहां तक कि उनके पत्रों की भाषा और सुझाव भी एक ही प्रकार के थे। 

क्या है हेलसिंकी घोषणापत्र? 
क्लीनिकल परीक्षण से संरक्षण प्रदान करने और इसके नियमन के लिए साल 1964 में हेलसिंकी घोषणापत्र जारी किया गया था। इस घोषणा पत्र पर भारत समेत दुनिया के सभी प्रमुख देशों ने हस्ताक्षर किए हंै। इस घोषणापत्र में छह बार संशोधन भी किए गए हैं, लेकिन इस पर प्रभावी ढंग से अमल नहीं किया जा रहा है। हेलसिंकी घोषणापत्र में क्लीनिकल परीक्षण के लिए आचार संहिता का पालन करने के साथ यह सुनिश्चित करने का बात कही गई है कि लोगों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़े और क्लीनिकल परीक्षण से होने वाले मुनाफे से ऐसे लोगों को वंचित नहीं किया जाए, जिन पर दवाओं का परीक्षण किया गया हो। दवाओं का परीक्षण दबाव, जोर-जबरदस्ती या लालच देकर नहीं कराया जाए। 

तगड़े मुनाफे का खेल 
आप यकीन करें या नहीं, कई आम दवाएं जिनकी कीमत 10 रुपए है, उनकी कीमत आपको 100 या इससे भी ज्यादा चुकानी पड़ रही है। कहने का मतलब है कि देशी-विदेशी दवा कंपनियां आपकी जेब पर डाका डालकर कई सौ फीसदी मुनाफा कमा रही हैं। यह खुलासा केंद्रीय कंपनी मंत्रालय की रिपोर्ट में हुआ है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने दवाओं पर अधिकतम मुनाफा कमाने की सीमा सौ फीसदी निर्धारित कर रखी है, लेकिन कंपनियां इस नियम का खुलेआम उल्लंघन करती हैं। कंपनी मामलों के मंत्रालय की एक रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि कुछ भारतीय फार्मा. कंपनियां जबरदस्त मुनाफा कमा रही हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई दवाओं का बाजार मूल्य लागत मूल्य से 200 फीसदी से लेकर 500 फीसदी अधिक है। एक नामी कंपनी तो भारतीय बाजार में दवाएं बेचकर 1122 फीसदी तक मुनाफा कमा रही है। इस सर्वेक्षण में भारतीय बाजार में सर्वाधिक बिकने वाली देशी और विदेशी कंपनियों की दवाओं को शामिल किया गया है। एंटी हाइपरटेंशन जैसी बीमारी के लिए तीन बड़ी कंपनियों की दवाएं लागत मूल्य से 1078 फीसदी अधिक मुनाफे पर बेची जा रही हैं।"

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सोमवार, 4 जून 2012

समय आ गया है कि किराए की कोख पर सामूहिक राय बनाई जाए

सरोगेट मदर्स यानी वे माएं, जो किराए की कोख उपलब्ध कराती हैं। इन मांओं के बारे में सबसे ज्यादा वे दंपत्ति खोजबीन करते हैं, जिनके संतान नहीं। सरोगेट मदर्स तय रकम पर ऐसे दंपत्तियों के लिए बच्चे जनती हैं। पहली निगाह में औरों की तरह मुझे भी यह जनकल्याण ही लगा। भले इसमें किराए पर कोख ही क्यों न दी जाती हो, जोकि अपने को परम नैतिक मानने-बताने वाले भारतीय समाज में एक अपवाद सरीखा है। हालांकि इसी परंपरागत भारतीय पारिवारिक ढांचे में यह भी मुमकिन होता रहा है कि जिन दंपत्तियों के बच्चे नहीं होते थे, उनके लिए उनके भाई आदि अपने बच्चे छोड़ देते थे। उसमें एक भावनात्मक तार बंधा रहता था। लेकिन जैसे-जैसे भारतीय परिवार का ताना-बाना टूटा है, यह आपसदारी भी खत्म हुई है। 

सरोगेसी ने इस आपसदारी को एक प्रफेशनल स्वरूप दिया। दूसरों के लिए बच्चे जनने के लिए बाकायदा डील होने लगी। लेकिन इसके साथ कुछ दिक्कतें भी सामने आ रही हैं। सबसे पहली और बड़ी दिक्कत यह है कि प्रफेशनल सरोगेसी के अब धंधे चल पड़े हैं। गुजरात के आणंद में एक हवेलीनुमा घर में महिलाओं को जुटा उन्हें औने-पौने दाम देकर सरोगेसी के लिए राजी करा लिया जाता था। ऐसा करके सरोगेसी के ठेकेदार हर जगह खूब पैसे बना रहे हैं। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे गरीब मुल्कों में यह बतौर धंधा बहुत तेजी से फल-फूल रहा है। ठेकेदारों को विदेशों से क्लाइंट मिल रहे हैं। उन्हें बड़ी रकम दी जा रही है। रिपोर्ट कहती हैं कि डॉक्टर और सरोगेसी के ठेकेदारों की मिलीभगत से इस धंधे ने इतना जोर पकड़ा हुआ है कि अकेले भारत से हर साल करीब 25 हजार बच्चे सरोगेसी के जरिए पैदा हो रहे हैं। इनमें से ज्यादातर को विदेश भेजा जाता है। यानी मामला सिर्फ पस-पड़ोस में नि:संतान दंपत्तियों की दिक्कतें कम करने की जनकल्याण वाली भावना से कहीं आगे का हो चला है। 

इसी से जुड़ा एक दूसरा पहलू यह है कि आणंद में ही जब एक सरोगेट मदर को प्रेग्नेंसी के दौरान दिल का दौरा पड़ा तो डॉक्टरों ने मां को बचाने की बजाय सबसे पहले उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को बचाने की कोशिश की और इस तरह मां की जान चली गई। जाहिर है, यह उस डील के तहत ही हुआ, जिसमें हर हाल में सरागेट मदर से एक स्वस्थ बच्चा पा लेने के लिए डॉक्टर को एक मोटी रकम अदा की गई थी। 

इन सबसे जुदा बात यह है कि एक बच्चा जनने में औरत को जिन तकलीफों से दो-चार होना पड़ता है, उसके शरीर के भीतर जितने हॉर्मोनल बदलाव होते हैं, उसके मन में बच्चे के प्रति जो एक भावनात्मक लगाव पैदा होता है, उसे सरोगेसी के नजरिए से कितना समझा गया है? क्या मां और बच्चे के कुदरती रिश्ते को साइंस के जरिए या चंद रुपयों के बूते बदला जा सकता है? 

मुझे लगता है कि सरोगेसी पर दबे-छुपे जो धंधे चल रहे हैं, उस पर स्थानीय प्रशासन को सख्त होना चाहिए। इस पर सरकार ने एक बिल लाने का प्रस्ताव किया है, जिसमें किसी भी महिला को सरोगेट मदर बनने का हक सिर्फ 3 दफा ही होगा। मेरा खयाल है कि एक ऐसे समय में, जब हमारे पास बहस के कई फोरम हैं, हमें सरोगेसी पर भी एक सामूहिक राय जरूर बनानी चाहिए। एक ऐसी राय , जो जनकल्याण को जनकल्याण ही रहने दे, उसे किसी धंधे या ठेकेदारी में तब्दील होने से रोके। (प्रसून जोशी,नभाटा,दिल्ली,3.6.12)।

इंडिया को नया नाम मिला है- सरोगेसी के लिए सबसे पसंदीदा मुल्क। यहां के आसान कानून, बल्कि कहें कि कानून की गैरमौजूदगी, बढ़िया हेल्थ सर्विस और किफायत के चलते दुनिया भर से बेऔलाद माता-पिता भारत आ रहे हैं और अपना सपना पूरा कर रहे हैं। गुजरात का आणंद तो सरोगेसी की वर्ल्ड कैपिटल बन गया है। 

क्या है सरोगेसी 
गर्भधारण में दिक्कत होने की वजह से जो लोग मां-बाप नहीं बन पाते, वे किराए की कोख से बच्चा पैदा करते हैं। यही सरोगेसी है। पैरेंट्स के स्पर्म और एग को बाहर फर्टिलाइज करके सरोगेट मदर के गर्भ में पहुंचा दिया जाता है। 

पैदा हो गईं दिक्कतें केस एक: जापानी पैरंट्स के लिए एक सरोगेट मदर ने गुजरात में मांजी यामादा को जन्म दिया। प्रेग्नेंसी के दौरान पैरेंट्स का तलाक हो गया। मांजी की नानी ने उस पर अपना दावा जताया और भारत आई। एक एनजीओ ने जयपुर हाई कोर्ट से गुजारिश की कि मांजी पर किसी का हक नहीं होना चाहिए, क्योंकि भारत में सरोगेसी का कोई कानून है ही नहीं। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया, जिसने मांजी को जापान जाने के लिए कागजात जारी करने का आदेश दिया। 

केस दो: जर्मनी के जान बलाज और सूसन ने गुजराती सरोगेट मदर के जरिए जुड़वां बच्चों को जन्म दिया। अचानक अड़चन खड़ी हो गई, क्योंकि जर्मनी में सरोगेसी को मान्यता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने सलाह दी कि दंपती बच्चों को अडॉप्ट कर लें। 

मिल्क कैपिटल से सरोगेसी कैपिटल 

 -गुजरात का आणंद शहर अब दुनिया की सरोगेसी कैपिटल के तौर पर फेमस हो चुका है। अब तक इसे अमूल के हेडक्वॉर्टर के तौर पर जाना जाता था। 

 -यहां करीब 160 फर्टिलिटी सेंटर सरोगेसी सर्विस देते हैं। हर साल करीब 300 सरोगेसी के मामले होते हैं। मुंबई इस होड़ में दूसरे नंबर पर है। 

 -नैशनल जियोग्राफिक चैनल ने आणंद पर डॉक्युमेंटरी बनाई है। इसमें आणंद को वूंब ऑफ द वर्ल्ड (दुनिया का गर्भ) कहा गया है। 

सरोगेसी के लिए भारत क्यों हिट है  

-अमेरिका में सरोगेसी की लागत 1.20 लाख डॉलर (54.67 लाख रु.) तक हो सकती है, जबकि भारत में इसका खर्च 10 से 25 लाख रुपये के बीच ही है। इसमें पैरंट्स की भारत यात्रा, रिहाइश, खातिरदारी, सैर, सरोगेट मदर का मेहनताना, हॉस्पिटल कॉस्ट और मां की देखरेख सभी खर्चे शामिल हैं। सिंपल सरोगेसी की लागत आणंद में 7 लाख रुपये है। 

 -भारत में सरोगेसी पर किसी तरह की पाबंदी लगाने वाला कोई कानून नहीं है। ब्रिटेन और कुछ दूसरे देशों में सरोगेट मदर को मां का दर्जा मिलता है, जबकि भारत में इच्छुक पैरंट्स का नाम बर्थ सटिर्फिकेट पर होता है। फिर समझौते से मुकरने का खतरा भी यहां नहीं है। अमेरिका में सरोगेसी का समझौता बाध्यकारी नहीं होता। 

 -फ्रांस, नीदरलैंड्स और नॉर्वे यूरोपीय देशों में कमर्शल सरोगेसी की इजाजत नहीं है। 

 -2008 का ड्राफ्ट एआरटी बिल एक गाइडलाइन पेश करता है। इसके मुताबिक, बर्थ सर्टिफिकेट में इच्छुक पैरंट्स का नाम होना चाहिए, जिससे उनका हक मान्य हो जाएगा। सिंगल पैरंट्स को भी सरोगेसी के जरिए बच्चा पाने का हक होगा। 

सरोगेट मदर की जिंदगी 
 -सरोगेट मदर को 2 से 3 लाख रुपये मिलते हैं। 
 -ये महिलाएं लोअर इनकम ग्रुप से होती हैं। यह इनके लिए आमदनी का अच्छा जरिया बन रहा है। 
-प्रेग्नेंसी के दौरान उनका पूरा खयाल रखा जाता है। बेहतरीन डाइट दी जाती है। आणंद में इनकी तादाद 300 है। 

सरोगेसी टूरिज़म
-सरोगेसी ने टूरिजम की शक्ल अख्तियार कर ली है। इच्छुक पैरेंट्स को टूर ऑपरेटर पूरा पैकेज ऑफर करते हैं। भारत के नर्सिंग होम्स से उनका संपर्क रहता है।

-पैरेंट्स इस दौरान सरोगेट मदर से मिलते रह सकते हैं, अपने बच्चे को बढ़ता देख सकते हैं, धार्मिक कर्मकांड भी पूरे कर सकते हैं(नभाटा,दिल्ली,18.5.12)।

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रविवार, 15 अप्रैल 2012

प्लेस्टेशन के वर्चुअल वर्ल्ड में बिखरता बचपन

प्लेस्टेशन और कम्प्यूटर के वर्चुअल वर्ल्ड में चल रहे खेल उत्तेजना से भरे हैं, बच्चे घंटों उनके सामने से हटना नहीं चाहते। गैजेट्स की दुनिया इतनी तेज़ी से बदल रही है कि उनके साथ कदम ताल करना आर्थिक रूप से सक्षम पालकों के लिए भी कठिन होता जा रहा है। कम्प्यूटर केंद्रित इस आभासीय दुनिया ने बच्चों को बाहरी दुनिया से काटकर रख दिया है। हर दिन बदलते जा रहे खिलौनों ने बच्चों को घर के अंदर समेट कर रख दिया है। आज के बच्चे एक ऐसी काल्पनिक दुनिया में बस चुके हैं जहाँ से वास्तविक दुनिया धुंधली नज़र आती है। बच्चे अब घर के बाहर खेलने नहीं जाते। माता-पिता की यही ख्वाहिश है कि उनका बच्चा हर क्षेत्र में जीनियस हो सिवाए खेलकूद के। आज के बच्चे माता पिता की इसी नाज़ायज़ ख्वाहिश की भेंट चढ़ रहे हैं। वे बचपन की कच्ची उम्र में शरीर से मोटे और स्वभाव से आक्रामक होते जा रहे हैं। 

आज समाजशास्त्रियों की चिंताएं लगतार बढ़ रही हैं क्योंकि आधुनिक बच्चे तेजी से समाज से दूर होते जा रहे हैं। यदि उन्हें फुटबॉल या क्रिकेट और प्लेस्टेशन से कोई गेम खेलने का विकल्प दिया जाए तो वे प्लेस्टेशन पर बैठना अधिक पसंद करेंगे। आधुनिक टैक्नोलॉजी का सामिप्य बच्चों को मोटा बना रहा है। चाहे टेलिविजन की चैनल सर्फिंग हो या नेटसर्फिंग दोनों बच्चों को घंटों तक शारीरिक रूप से बांधे रखते हैं। प्लेस्टेशन पर अधिकांश गेम्स युद्ध जैसे आक्रामक माहौल की सृष्टि करते हैं। जीतने के तनाव से ग्रस्त बच्चा बहुत देर तक उसी मानसिक अवस्था में रहता है। जंक फूड बहुत सम्मानित और "कूल" समझा जाने लगा है। बच्चे आउटडोर गेम्स से दूर होने के साथ ही चिढ़-चिड़े होते जा रहे हैं। शारीरिक मशक्कत कम होने के साथ ही उनकी रोग प्रतिरोधक शक्ति भी क्षीण होती जा रही है। किसी भी बच्चे के स्वस्थ जीवन की मजबूत नींव रखने की जिम्मेदारी पालकों की होती है। वे आजीविका के तनाव को घर से बाहर रखें और बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं। बच्चों को वर्चुअल वर्ल्ड से दूर खींच कर ले जाने से बच्चों के साथ समाज का भी भला होगा। शारीरिक रूप से स्वस्थ समाज ही विकास की राह पर अग्रसर हो सकता है(संपादकीय,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल द्वितीयांक 2012)।

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शनिवार, 31 दिसंबर 2011

होश में रहकर करें नववर्ष का स्वागत

देश में शराबखोरी का चलन बीते दो दशकों में काफी बढ़ गया है। पहले शराब की नई दुकानें खुलने पर उस बस्ती के लोग और खासकर महिलाएँ इसका जमकर विरोध करते थे। आज ऐसा नहीं है, आज शराब की दुकानें लगातार बढ़ रही हैं। युवाओं को शराबखोरी के प्रति आकर्षित करने के लिए विदेशी शराब कंपनियाँ मिनरल वाटर से लेकर एपल ज्यूस तक अपने ब्रांड के नाम पर बेचती हैं। युवाओं को टारगेट करने की इसी व्यापारिक कुटिलता का परिणाम है कि शराबखोरी शुरू करने की न्यूनतम उम्र १९ से घटकर १३ तक आ पहुँची है। अब बच्चे किशोरावस्था की शुरुआत शराब से कर रहे हैं। 

बीते तीन सालों में शराब बिक्री की दर ८ प्रतिशत हो गई है। शेष दुनिया से तुलना करें तो अभी हम भले ही बहुत पीछे हों लेकिन २१ प्रतिशत वयस्क पुरुष शराबखोरी की ओर प्रवृत्त हो चुके हैं। इसमें से १४० लाख लोग अब भी ऐसे हैं जो शराब पर निर्भर हो चुके हैं और उन्हें चिकित्सकीय सहायता की जरूरत है। अब तक महिलाओं में शराबखोरी केवल निम्न तबके की महिलाओं तक ही सीमित थी लेकिन कमसिन उम्र की युवा लड़कियां भी शराबखोरी में लिप्त पाई जा रही हैं। लड़कियाँ अपने पुरुष दोस्तों के साथ उन होटलों या पब्स में जाने से परहेज नहीं कर रही हैं जहाँ शराब परोसी जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि हमारे देश में शराबखोरी का पैटर्न ही खतरनाक है। आमतौर पर यहाँ लोग थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद जमकर शराबखोरी करते हैं। यही वजह है कि आधे से अधिक शराबखोर खुद को नुकसान पहुँचाने की हद तक शऱाब पीते हैं। सोशल ड्रिंकिंग का चलन तो बढ़ा ही साथ ही अकेले बैठकर पीने वालों की संख्या कम नहीं है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इशारा किया है कि नकली शराब पीने वालों के कारण समाज पर इससे संबंधित बीमारियों के इलाज का आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। इसी अध्ययन के मुताबिक देश भर के अस्पतालों की इमरजेंसी वार्डों में भरती होने वाले ६० प्रतिशत मरीज शराबखोरी के कारण आई चोटों की वजह से यहाँ पहुँचते हैं। इनमें से २० प्रतिशत को मस्तिष्क की संघातिक चोट होती है। यह भी जाहिर हुआ है निम्न तबके के लोग अपनी आय से अधिक की शराबखोरी करते हैं जिससे वे कर्ज के अंधेरे जाल में बिंधते चले जाते हैं। 

देश के नेशनल ड्रग डी-एडिक्शन प्रोग्राम के तहत 483 नशामुक्ति केंद्रों और 90 काउंसिलिंग सेंटरों को आर्थिक अनुदान दिया गया है। यह कदम केवल खानापूर्ति के लिए उठाया गया लगता है क्योंकि न तो यहां ट्रेंड स्टाफ है,न नशामुक्ति के लिए ज़रूरी दवाएं हैं। सरकार का इरादा केवल उन लोगों को इलाज़ मुहैया कराने का है जो शऱाबखोरी के चंगुल में गहरे तक उतर गए हैं। शराबखोरी पर नियंत्रण करने का कोई कार्यक्रम उसके हाथ में नहीं है। शराब की दुकानों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। शऱाब की कीमतों को वह इतना नहीं बढ़ा रही है कि लोगों की पहुंच से ही दूर हो जाए। इस सामाजिक बुराई पर नकेल कसने की मंशा ही नज़र नहीं आ रही है। प्रादेशिक सरकारों की चिंता अधिक से अधिक राजस्व प्राप्त करने तक सीमित है। स्कूलों,अस्पतालों और इबादतगाहों के नज़दीक शराब की दुकानें बंद कराने की इच्छाशक्ति ही नहीं है। विदेशी शराब माफिया इस क़दर ताक़तवर हो गया है कि वे अपने हक़ में नीतियों में परिवर्तन करा लेते हैं। 

नववर्ष के आगमन की शुरुआत ही ख़ूब शऱाब पीकर करने में कोई समझदारी नहीं है। अच्छी सेहत पाने की राह में संयम सबसे ताक़तवर औजार है। 31 दिसम्बर की रात शऱाब के बगैर भी उतने ही जोश से मनाई जा सकती है। खुशी प्रकट करने के लिए शराब के अलावा भी कई जरिए हैं(संपादकीय,सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर पंचमांक 2011)

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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

फालतू भ्रूण से ही प्राप्त किया जा सकेगा स्टेम सेलःसार्वजनिक बहस कल से

जब चीनी एजेंट भारत से मरीजों को स्टेम सेल थेरेपी के लिए अपने देश ले जाने लगे हैं, बराक ओबामा ने स्टेम सेल रिसर्च से प्रतिबंध हटा कर अमेरिका में इसकी प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर दिया है, तब कहीं जाकर देश की मेडिकल शोध की सबसे बड़ी संस्था इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की नींद टूटी है।

आईसीएमआर १७ दिसंबर से स्टेम सेल रिसर्च दिशा-निर्देश पर सार्वजनिक बहस ही शुरू कराने जा रही है। लेकिन स्टेम सेल विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने इस मामले में दुनिया के नेतृत्व का मौका अब खो दिया है। अब तक स्टेम सेल रिसर्च का दिशा-निर्देश तक जारी नहीं हो पाने की वजह से यहां इसकी प्रगति की राह एक अरसे से रुकी पड़ी है। स्टेम सेल थेरेपी वह अत्याधुनिक विधा है जिसमें शरीर में बीज कोशिकाओं ( स्टेम सेल) से हृदय रोग, स्ट्रोक, रीढ़ में चोट, मधुमेह, पार्किंसन एवं अलजाइमर रोग, रेटिना की खराबी आदि की वजह से क्षतिग्रस्त उतकों या कोशिकाओं की मरम्मत कर उसे पूर्व की अवस्था में ले आया जा सकता है। आईसीएमआर और डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी ने २००७ में ही तैयार गाइडलाइंस को अपनी वेबसाइट पर डाल दिया है। इस मुद्दे पर सर्वसम्मति के लिए लोदी रोड स्थित चिन्मय मिशन में १७ दिसंबर को उत्तरी क्षेत्र के लिए सार्वजनिक बहस होगी। ऐसी बहस पूरे देश में होगी। इनमें फालतू भ्रूणों के प्रयोग, शोध के लिए भ्रूण के निर्माण, इलाज के लिए अंगों की क्लोनिंग जैसे पहलुओं पर विचार होगा। 

इस मामले में भारत ने बहुत बड़ा मौका गंवा दिया। दिशा-निर्देश में देरी की वजह से चीन पहले ही आगे निकल गया है। अमेरिका का आगे निकलना भी तय है। अमेरिका में बराक ओबामा के राष्ट्रपति चुने जाने तक नैतिक सवालों की वजह से स्टेम सेल पर प्रतिबंध लगा हुआ था। 

बहरहाल, दिशा निर्देश में कहा गया है कि इलाज की अकूत संभावना को देखते इस रिसर्च को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उचित अनुमति एवं पर्याप्त सुरक्षा मानकों के साथ वयस्क, रक्त मज्जा या नाल रक्त से प्राप्त स्टेम सेल पर आधारित रिसर्च किए जा सकेंगे। 

कहा गया है कि सिर्फ स्टेम सेल प्राप्त करने के लिए भ्रूण पैदा नहीं किया जाना चाहिए। पति-पत्नी की अनुमति के बाद केवल फालतू, बचे हुए या पूरक भ्रूणों का ही उपयोग किया जाना चाहिए। ये भ्रूण केवल पंजीकृत कृत्रिम प्रजनन तकनीक केंद्रों से ही जुटाए जाने चाहिए। स्टेम सेल अध्ययन को तीन समूहों में बांटा गया है। एक जिसमें शोध की पूरी छूट होगी। दूसरे समूह में सीमित शोध ही किए जा सकेंगे एवं कुछ शोध पूरी तरह प्रतिबंधित रहेंगे। स्टेम सेल रिसर्च को नियंत्रित करने की पूरी व्यवस्था का भी खुलासा किया गया है(धनंजय,नई दुनिया,दिल्ली,16.12.11)।

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बुधवार, 14 दिसंबर 2011

चंडीगढ़ में बढ़ रहे हैं किराए पर कोख देने के मामले

किरन राव और आमिर खान सरोगेसी के जरिये अब मां-बाप बने हैं, लेकिन सरोगेसी के जरिए पिछले दो साल में चंडीगढ़ में करीब दो दर्जन से ज्यादा बेऔलाद दंपती मां-बाप बन चुके हैं। भागदौड़ और तनाव भरी जिंदगी में बांझपन के मामले बढ़े हैं, तो किराए की कोख यानी सरोगेट मदर्स का चलन भी बढ़ा है। 

सेक्टर 38 में जननी फर्टीलिटी सेंटर की आईवीएफ तकनीक विशेषज्ञ डॉ. निर्मल भसीन मानती हैं चंडीगढ़ में सरोगेसी का मार्केट बढ़ रहा है। यहां औरतें सुंदर और स्वस्थ हैं, जो इस तकनीक से बच्चा चाहने वाले किसी भी दंपती की पहली शर्त होती है। डॉ. भसीन बताती हैं, ‘पिछले दिनों अमेरिका से आए एक डॉक्टर दंपती ने सरोगेसी के जरिये बच्चा हासिल किया। उन्होंने सरोगेट मदर के फीचर्स को काफी महत्व दिया। इसी तरह नॉर्वे के दंपती ने भी सरोगेट मदर वालंटियर के फीचर्स देखने चाहे ताकि बच्चे के फीचर्स शार्प हों।’ 

क्यों बढ़ रही है मांग 
चंडीगढ़ में सरोगेसी के जितने मामले हुए हैं, उनमें से अधिकतर दंपती ऐसे एनआरआई हैं जो अपने बच्चे में भारतीय फीचर चाहते हैं। बच्चे के इच्छुक दंपती पंजाबी नैन-नक्श और बेहतरीन व्यक्तिगत आदतों वाली सरोगेट मदर्स ढूंढ़ते हैं। बेदी नर्सिग होम एंड इनफर्टिलिटी सेंटर की डॉ. जीके बेदी का मानना है कि पंजाब और हरियाणा की औरतें शारीरिक तौर पर जेनेटिकली मजबूत हैं। उनकी खानपान की आदतें भी अच्छी हैं। इसके चलते उनमें गर्भस्थ बच्चे को संभालने की क्षमता भी बेहतर है। 

सरोगेट स्टेटस और आईवीएफ-सरोगेसी 
किसी और के बच्चे को जन्म देने के लिए कोख किराए पर देने वाली औरत का स्टेटस सरोगेट मदर का होता है। जिन मामलों में अंडाणु-शुक्राणु खुद दंपती के ही होते हैं और कोख किराए की, ऐसे मामलों को आईवीएफ-सरोगेसी कहा जाता है। 

कौन बन रही हैं सरोगेट वॉलंटियर 
सरोगेसी के लिए उम्रदराज दंपती ही नहीं, बल्कि युवा दंपती भी आगे आ रहे हैं। डॉ. भसीन के मुताबिक कई विवाहित औरतें पति की सलाह और मर्जी के साथ सरोगेट वालंटियर बनती हैं। इनको अच्छा मुआवजा मिलता है। ये औरतें युवा और मिडिल क्लास से हैं। अच्छी-खासी पढ़ी-लिखी होने के चलते पेरेंट्स उन्हें प्राथमिकता देते हैं। 

क्यों होती है जरूरत 
कामकाजी महिलाओं को प्रेगनेंसी के दौरान छुट्टी मिलने में मुश्किल होना भी सरोगेसी केस बढ़ने की एक वजह है। इसके अलावा बहुत सी महिलाओं में ओवम यानी अंडाणु बनने बंद हो जाते हैं और गर्भवती होने की संभावना खत्म हो जाती है, या उनका गर्भाशय इतना कमजोर हो जाता है कि बच्चा संभालने लायक नहीं रहता। थ्रेटेंड एबरेशन और हैबिचुअल मिसकैरिज जैसे मामलों में भी यही एकमात्र रास्ता रह जाता है। 

ऐसे पेरेंट्स के लिए स्वस्थ महिला डोनर्स की मदद से अंडाणु लिए जाते हैं। इन अंडाणुओं को फर्टीलाइज करने के लिए एक स्वस्थ गर्भाशय की जरूरत होती है। ऐसे में रिप्रोडक्टिव एज यानी 18 से 40 साल तक की औरत का चयन करके अंडाणु उसके गर्भ में ट्रांसफर कर दिया जाता है। बच्चे के जन्म के बाद उसे उसके बायोलॉजिकल और लीगल पेरेंट्स को सौंप दिया जाता है(रवि शर्मा,दैनिक भास्कर,चंडीगढ़,13.12.11)।

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सोमवार, 5 दिसंबर 2011

ब्रेन डेथ की जानकारी देना बनेगा अनिवार्य

अंग प्रत्यारोपण के इंतजार में बरसों से पीड़ादायक जीवन जी रहे मरीजों के लिए राहत की खबर है। अगले वर्ष से अंगदान के लिए केंद्र सरकार व्यापक अभियान चलाने की तैयारी में है। अभियान के तहत हर राज्य में एक नोडल सेंटर बनाया गया है। उत्तर प्रदेश में अभियान की शुरूआत लखनऊ से होगी। इसके लिए संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआइ) का चयन नोडल सेंटर के तौर पर किया गया है। इस सेंटर के अंतर्गत राजधानी के विभिन्न इलाकों में सब-सेंटर होंगे। निजी व सरकारी अस्पतालों को अपने यहां आने वाले ब्रेन डेथ मामलों की जानकारी इन सब-सेंटरों पर देना जरूरी होगा। एसजीपीजीआइ में करीब दो दशक पहले किडनी प्रत्यारोपण की सुविधा शुरू हुई थी, लेकिन अब तक केवल चार कैडेवर डोनर्स ही सामने आए। ब्रेन डेड की स्थिति में अंगदान की यह निराशाजनक तस्वीर अमूमन पूरे देश में है। अंगदान को लेकर समाज में जागरूकता की कमी, अस्पतालों के बीच सामंजस्य का अभाव और किसी नियंत्रक संस्था का न होना इसकी बड़ी वजह है। इसे दूर कर कैडेवर डोनर की संख्या बढ़ाने का रोड मैप तैयार है। नेशनल ट्रांसप्लांटेशन एक्ट के तहत उप्र केएसजीपीजीआइ को नोडल सेंटर बनाया गया है। इस सेंटर से कई अन्य सब-सेंटरों को जोड़ा जाएगा। यह अस्पतालोंमें होने वाले ब्रेन डेथ के मामलों की जानकारी मिलने पर वहां पहुंचकर परिवार वालों की काउंसिलिंग कर उन्हें अंगदान के लिए प्रेरित करेंगे। सहमति के बाद अंग निकाल कर एसजीपीजीआइ लाया जाएगा, जहां उसे प्रत्यारोपित किया जाएगा। 

क्या है ब्रेन डेथ : 
गंभीर दुर्घटनाओं या लम्बी असाध्य बीमारियों के इलाज के दौरान कई मरीज ऐसी स्थिति में आ जाते हैं जिन्हें बचाना नामुमकिन होता है। वेंटीलेटर पर सांस और हृदय की धड़कन तो चलती रहती है लेकिन मेरूदंड को दिमाग से जोड़ने वाली नसें पूरी तरह से मृत हो जाती हैं, जिन्हें किसी किसी भी सूरत में सक्रिय नहीं किया जा सकता। विभिन्न जांचों से इस बात की पुष्टि हो जाती है, जिसके बाद मरीज को ब्रेन डेड घोषित कर दिया जाता है। ऐसी स्थिति में उसके परिजन मृतक का अंगदान कर सकते हैं। ऐसे दानदाता को कैडेबर डोनर कहा जाता है। 

देना होगा प्रमाणपत्र : 
एक्ट के तहत सरकारी और निजी अस्पतालों को ब्रेन डेथ होने की स्थिति में मरीज के परिजनों को इस आशय का प्रमाणपत्र जारी करना होगा। इसके साथ ही यह जानकारी संबंधित सब-सेंटरों पर भेजनी होगी। फिलहाल अस्पतालों में ऐसे मरीजों को हृदय की धड़कन रुकने का इंतजार किया जाता है, और ऐसा होते ही उसे मृत घोषित कर दिया जाता है। 

होगी निगरानी : 
कैडेवर डोनर से मिले अंगों के प्रत्यारोपण के लिए निगरानी संस्था भी बनेगी। दान में मिले अंगों के प्रत्यारोपण में पारदर्शिता बनाए रखने की जिम्मेदारी इस संस्था की होगी(रणविजय सिंह,दैनिक जागरण,लखनऊ,5.12.11)।

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मंगलवार, 15 नवंबर 2011

सस्ती दवाएं ही देगीं जीवन का अधिकार

पिछले कुछ दशकों में भारत को एक बहुत गौरवशाली स्थान मिला है। इसे विकासशील और गरीब देशों की फार्मेसी समझा जाने लगा है। दूसरे शब्दों में कहें तो कम आय के देशों में सस्ती दवाओं की उपलब्धि के लिए भारत से होने वाले निर्यात की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका बन गई है। भारत की अनेक दवा कंपनियों ने सस्ती ' जिनेरिक ' दवाएं बनाने में विशेष ख्याति प्राप्त की है। पर हाल के समय में कुछ ऐसी प्रवृत्तियां सामने आई हैं , जिनसे लग रहा है कि कहीं भारत से यह खिताब छिन न जाए। मुद्दा केवल भारतीय दवा कंपनियों की प्रतिष्ठा का नहीं है। सबसे बड़ा सवाल जरूरतमंद मरीजों को जीवनरक्षक दवाएं उपलब्ध करवाने का है। कैंसर और एड्स एचआईवी जैसी गंभीर बीमारियों के लाखों मरीज यदि भारतीय कंपनियों की बनाई सस्ती दवाएं प्राप्त न करें तो उनका इलाज जारी नहीं रह सकेगा। 

पेटेंट का प्रपंच 
गरीब व विकासशील देशों में सेवाभाव से कार्यरत अनेक संगठन भी अपने अपेक्षाकृत कम बजट में भारतीय कंपनियों की जिनेरिक व सस्ती दवाएं खरीदकर ही मरीजों का इलाज कर पाते हैं। अमीर व विकसित देशों में प्राय : सरकारी सहायता प्राप्त स्वास्थ्य सेवाओं से दवाओं की आपूर्त्ति हो जाती है , अत : वहां पेटेंट की गई महंगी दवाएं भी मरीजों को बिना किसी विशेष बोझ के मिल जाती हैं। पर गरीब व विकासशील देशों के अधिकतर मरीजों को यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। ऐसे में पेटेंट मुक्त जिनेरिक दवाओं का सस्ती कीमत पर मिल जाना वहां बहुत जरूरी है। इस जरूरत को पूरा करने में भारतीय दवा कंपनियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने महंगी दवाओं के सस्ते मगर अच्छी गुणवत्ता के जिनेरिक संस्करण उत्पादन करने व बेचने में प्रतिष्ठा प्राप्त की है। इस वजह से ही भारत को विकासशील देशों की फार्मेसी कहलाने का गौरव भी प्राप्त हुआ है। 

क्या है ट्रिप्स 
भारत की यह प्रतिष्ठा अनेक बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों को चुभती रही है। ये कंपनियां चाहती हैं कि दुनिया भर में केवल उनकी पेटेंट की गई महंगी दवाओं की ही बिक्री हो। पर वे इस सचाई से मुंह फेर लेती है कि जिस कीमत पर वे दवा बेच रही हैं , उसको अदा करने में अधिकांश जरूरतमंद मरीज असमर्थ हैं। इन मरीजों के हितों की परवाह न करते हुए ये कंपनियां बहुत समय से यह प्रयास कर रही थीं कि जरूरत से ज्यादा सख्त पेटेंट कानूनों का प्रसार विकासशील व गरीब देशों में भी किया जाए , ताकि उन्हें पूरी दुनिया में ऊंचा मुनाफा कमाने का अवसर मिले। विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के दौर में बड़ी चालाकी से पेटेंट कानून या बौद्धिक अधिकार संपदा कानूनों के मुद्दे को व्यापार से जोड़ लिया गया। इसका फायदा बहुराष्ट्रीय कंपनियों को यह मिला कि पूरी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियमन संबंधी समझौते किए गए तो उसके साथ पेटेंट कानूनों का समझौता भी हो गया , जिसे ट्रिप्स समझौते के नाम से जाना जाता है। 

ट्रिप्स समझौता हो जाने के बाद विकासशील देशों पर यह दबाव अपने आप पड़ गया कि वे एक विशेष समय अवधि के बीच अपने पेटेंट कानूनों में बदलाव कर उन्हें ट्रिप्स समझौते की शर्तों के अनुकूल बनाएं। भारत में भी यही स्थिति रही। जन - संगठनों द्वारा काफी विरोध होने के बावजूद भारत के पेटेंट कानून में भी ट्रिप्स समझौते के अनुरूप महत्त्वपूर्ण बदलाव किए गए। वर्ष 2005 में हुए इस बदलाव के साथ ही विकासशील देशों की फार्मेसी के रूप में भारत की पहचान क्षतिग्रस्त होने लगी। सस्ती व जिनेरिक दवाओं की उपलब्धि के पक्षधरों ने इन प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने प्रयास जारी रखे। अदालतों में कानूनी लड़ाइयां लड़कर उन्होंने कानून की ऐसी व्याख्या प्राप्त करने का प्रयास किया , जिससे सस्ती , जिनेरिक दवाओं की उपलब्धि पर आंच न आए। 

यहां यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि ट्रिप्स समझौता होने के समय दुनिया भर में जन - स्वास्थ्य की रक्षा संबंधी जो चिंताएं उठाई गई थीं , उसके कारण बचाव के कुछ प्रावधान विश्व व्यापार संगठन में भी मौजूद रह सके हैं। इसी तरह जब भारतीय पेटेंट कानून में बदलाव करना एक मजबूरी बन गई थी , तब भी जन - अभियान के दबाव में इस कानून में सस्ती दवाओं के लिए कुछ प्रावधान किए जा सके थे। वर्ष 2005 के बाद इस मुद्दे पर अदालती संघर्षों को देखें तो पता चलता है कि सस्ती दवाओं की उपलब्धता लिए स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने कई बार अदालतों के दरवाजे खटखटाए हैं , जबकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भी अपने पेटेंट की मान्यता बढ़ाने के लिए अदालतों का भरपूर उपयोग किया है। इन कंपनियों के साधन असीमित हैं जबकि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के पास बहुत कम साधन हैं। 

बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने पेटेंट संबंधी अपने मुकदमों में देश के सबसे महंगे वकील खड़े किए हैं। बहुत बड़ी फीस लेने वाले वकील , जो राजनीतिक व सामाजिक मंचों पर आगे रहते हैं , बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ओर से सक्रिय हैं। पर आम लोगों के जिंदा रहने का अधिकार इस पक्ष बात पर निर्भर करता है कि सस्ती जिनेरिक दवाओं की उपलब्धता बनी रहे। 

कीमत बारह गुनी 
उदाहरण के लिए इस समय इस संघर्ष में जो मुकदमा सबसे चर्चित है , उसमें एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने ल्यूकेमिया के मरीजों के लिए जीवनरक्षक दवा का सस्ता , जिनेरिक संस्करण रोकने का प्रयास किया है। इस प्राणघातक बीमारी के मरीजों को महंगी पेटेंट की दवा बहुराष्ट्रीय कंपनी से खरीदनी पड़े तो उसका खर्च 12 गुना तक बढ़ जाता है। हालांकि इस समय यह कंपनी कुछ मरीजों को दवा नि:शुल्क भी देती है , किंतु इससे इस हकीकत पर पर्दा नहीं डाला जा सकता कि यदि जिनेरिक दवा पर रोक लग गई तो यह दवा विकासशील देशों के अधिकांश मरीजों की पहुंच से बाहर हो जाएगी। मनुष्य के सबसे बड़े अधिकार, जीवन के अधिकार को प्रतिष्ठित करते हुए सस्ती जिनेरिक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के प्रयासों को व्यापक समर्थन मिलना चाहिए। इस समय इन प्रयासों के केंद्र में भारत है और उसे मिली सफलता का लाभ विश्व स्तर तक पहुंचेगा(भारत डोगरा,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,10.11.11)।

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मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

पर्व-त्यौहार पर मिलावट की महामारी

खाद्य पदार्थो में मिलावट का मामला महज राजधानी दिल्ली या किन्हीं दो-चार राज्यों का ही नहीं है, यह एक अखिल भारतीय बीमारी या यों कहे कि महामारी की शक्ल अख्तियार कर चुका है। इस पर लगाम लगाने के दावे तो केंद्र और राज्य सरकारें जब-तब करती रहती हैं, लेकिन व्यावहारिक तौर पर वे कुछ करती दिखाई नहीं देतीं। हालांकि मिलावट और मिलावटखोरों पर अंकुश के लिए देश में पहले से ही खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम १९५४ मौजूद है, लेकिन या तो इस कानून की धार भोथरी है या इस पर अमल करवाने वाला सरकारी अमला इतना नाकारा और भ्रष्ट है कि मिलावटखोरों को इस कानून का कोई भय नहीं है। 

यही वजह है कि बाजार में मौजूद खाने-पीने की किसी भी चीज के शुद्ध होने का भरोसा नहीं किया जा सकता खासकर दीपावली, रक्षाबंधन जैसे त्योहारों पर बाजार में बिकने वाली मिठाइयों और व्यंजनों पर तो बिलकुल भी नहीं। दीपावली जैसे पर्व पर क्या अमीर, क्या गरीब सभी अपनी-अपनी हैसियत के मुताबिक बाजार से मिठाइयां खरीदते हैं और खाते -खिलाते हैं लेकिन सदियों से चली आ रही मिठास की यह परंपरा अब मिलावटखोरों की अनैतिक तरीके से पैसा कमाने की भूख के चलते लोगों की सेहत और जान की दुश्मन साबित हो रही है। कुछ महीने पूर्व दिल्ली तथा देश के अन्य भागों में सब्जियों और फलों में घातक रसायनों और रंगों के इस्तेमाल की खबरें सामने आई थीं। इसके बाद दिल्ली में राज्य सरकार के निर्देश पर हुई छापेमारी में बरामद खाद्य पदार्थों के नमूनों की जांच में भी बड़े पैमाने पर मिलावट उजागर हुई थी। इस सबके चलते तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री दिनेश त्रिवेदी ने अपने महकमे के सचिव को पत्र लिखकर ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का आदेश दिया था जो फलों और सब्जियों का उत्पादन और उनका आकार बढ़ाने के लिए घातक रसायनों का इस्तेमाल करते हैं। 

लोग भोजन में विटामिनों और अन्य प्राकृतिक पोषक तत्वों के लिए फल, हरी सब्जियां और दूध लेते हैं लेकिन इन वस्तुओं के कारोबार में सक्रिय मिलावट के धंधेबाज इन वस्तुओं को अपनी बेलगाम मुनाफाखोरी का माध्यम मानते हुए इसके लिए धड़ल्ले से असामान्य और अनैतिक हथकंडों का सहारा लेते हैं। यह सही है कि कई छोटी-बड़ी बीमारियों का कारण व्यक्ति की जीवनशैली से जुड़ा होता है लेकिन जिस तेजी से हमारे समाज में दिल, गुर्दे और पाचन तंत्र से संबंधित बीमारियां फैल रही हैं उसकी एक बड़ी वजह खाने-पीने की वस्तुओं के साथ व्यक्ति के शरीर में जा रहे घातक रसायन भी हैं। सच तो यह है कि खान-पान की वस्तुओं में मिलावट भी एक तरह से हत्या की साजिश रचने जैसा अपराध ही है। इसलिए ऐसे जघन्य अपराध के लिए कठोर सजा वाले कानून की दरकार तो है ही, कानून पर अमल करने में कोताही बरतने वाले सरकारी मुलाजिमों को दंडित करने की व्यवस्था भी बहुत जरूरी है(संपादकीय,नई दुनिया,दिल्ली,21.10.11)। 
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ध्यानार्थः 
-कल सुबह सात बजे जानिए ऐसी मिठाइयों के बारे में जो कम कैलोरी वाली हैं और यह भी कि मिठाइयों में मिलावट की पहचान कैसे की जाए। 
-शाम चार बजे पढ़ें कि पटाखे जलाते वक्त क्या सावधानियां ज़रूरी हैं और बीमारों को क्यों इनसे दूर रहना चाहिए

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शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

150 साल तक उम्र बढ़ाने वाली ’जादुई गोली‘ का सिडनी में दावा;भारतीय वैज्ञानिकों ने कहा "शिगूफा"

वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उम्र बढ़ने की प्रक्रि या को कम करने वाली यानी बुढ़ापे को रोकने वाली तथा जीने की उम्र 150 वर्ष तक पहुंचाने वाली ‘जादुई’ दवा अब बस कुछ ही सालों में हासिल हो सकती है। वैज्ञानिकों ने सिडनी में एक सम्मेलन में कहा कि शरीर को गठीला बनाने वाली यह ‘वंडर पिल’ (जादुई गोली) विकसित होने के शुरुआती चरण में है और इसके सेवन के बाद 150 वर्ष से अधिक जीवन जीने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि इस दवा के सेवन से स्टेम कोशिका थैरेपी जीवन की गुणवत्ता बढ़ा देगी। न्यूसाउथ वेल्स विविद्यालय में ‘डीन आफ मेडिसिन’ के प्रोफेसर पीटर स्मिथ ने कहा कि मेडिसिन डीन ने ढलती उम्र में खुश और स्वस्थ रहने की संभावनाओं पर व्याख्यान दिया जो व्यक्ति की उम्र बढ़ाने की दिशा में अहम कड़ी साबित होगा। 

उनके हवाले से ‘डेली मेल’ ने कहा, ‘मुझे पूरी आशा है कि हम मानव जीवन को कुछ दशकों के लिए बढ़ा सकते हैं। लेकिन उद्देश्य केवल आयु बढ़ाना नहीं बल्कि लंबा स्वस्थ जीवन जीना है।’ हार्वर्ड के वैज्ञानिक प्रोफेसर डेविड सिनक्लेयर ने दावा किया, ‘हम ऐसी नई तकनीक की शुरुआत देख रहे हैं जिससे एक दिन 150 वर्ष तक जीवन देख सकते हैं।’ इसी तरह ऑक्सफोर्ड विवि की न्यूरोसाइंटिस्ट बेरोनेस सूसन ग्रीनफील्ड ने सिडनी सम्मेलन में कहा कि लोग जब 65 वर्ष की उम्र में पहुंचेंगे, तब वे दूसरा करियर शुरू कर सकेंगे। उम्रदराज लोगों की यह श्रमशक्ति शारीरिक कामों से अलग, ज्ञान आधारित कायरे में योगदान देगी(राष्ट्रीय सहारा,21.10.11 में लंदन की रिपोर्ट)। 

मगर इस बारे में इसी तारीख के नई दुनिया की रिपोर्ट कहती है कि इलाज के शिगूफे (होप सेलिंग) छोड़ना चिकित्सा क्षेत्र की एक "उम्रदराज" फितरत है। गोली से १५० वर्ष की उम्र की बात उस शिगूफे की इंतिहा ही है। जीवन शैली के विशेषज्ञों का कहना है कि गुरुवार को सिडनी में हुए सेहत सम्मेलन में स्वास्थ्य वैज्ञानिकों के ताजा दावे को भी उसी आलोक में देखना चाहिए। दावा है कि १५० वर्ष से भी अधिक जीने की चमत्कारी दवा से हम बस कुछ ही साल दूर हैं। शिगूफों के इतिहास के पन्नों को उलटें तो पता चलेगा कि लाइलाज रोगों की चमत्कारी गोलियों के कई दावे अब खुद बूढ़े हो चले हैं। ताजा शिगूफे में नया यह है कि इतनी बड़ी उम्र तक भी लोग स्वस्थ एवं खुशगवार जीवन जीएंगे। दुखदायी रोगों की बड़ी वजहों में आज एक अधिक उम्र का होना भी है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि यह गोली बूढ़े होने की प्रक्रिया (एजिंग) की गति धीमी कर यह चमत्कार करेगी। उन वैज्ञानिकों ने कहा है कि गोली से उम्र बढ़ेगी और सेल थेरेपी जीवन की गुणवत्ता बढ़ाएगी। यानी उनकी चमत्कारी गोली एवं सेल थेरेपी मिल करके एक और चमत्कार करेंगे कि १५० साल की उम्र तक भी हम मजे से जी सकेंगे। 

न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी के डीन ऑफ मेडिसिन प्रोफेसर पीटर स्मिथ ने कहा है कि यह महज शिगूफा नहीं है। हावर्ड के जेनेटिस्ट प्रो. डैविड सिनक्लेयर ने कहा कि हमें वह वंडर ड्रग दिख रहा है। सिन्क्लेयर रेड वाइन में मिलने वाले एक यौगिक रेसवेराटॉल पर शोध कर रहे हैं। यह उम्रदराज होने की गति को कम करता है। उन्होंने कहा है कि एक नए यौगिक का परीक्षण हो रहा है जो रेसवेराटॉल से १००० गुने अधिक शक्तिशाली है। फोर्टिस अस्पताल में मेटाबॉलिज्म, मधुमेह एवं पोषण प्रभाग के चेयरमैन डॉ. अनुप मिश्रा ने कहा कि चिकित्सा की दुनिया में उम्र को बढ़ाने वाली गोली की खोज एक "शाश्वत" खोज रही है। यही कभी पूरी नहीं होने वाली। आप आंतरिक एजिंग यानी किडनी और लीवर की एजिंग कम नहीं कर सकते। एमटीएनएल हेल्थ मेले में हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल ने कहा कि ऐसी गोली खाम खयाली भर है। जीवन शैली में परिवर्तन कर ही उम्र लंबी की जा सकती है। आजादी के समय हमारी औसत उम्र ४५ साल थी, अब ६५ हो गई है।

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गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

शरीर की शक्ति

इस बार चिकित्सा शास्त्र का नोबेल तीन ऐसे वैज्ञानिकों को मिला है , जिनकी खोजें आने वाले समय में दवा उद्योग के एक हिस्से पर ताला लगा सकती हैं। ये खोजें शरीर की अपनी प्रतिरोध प्रणाली ( इम्यून सिस्टम ) के बारे में हैं। जिंदा देह बगैर किसी दवा के बीमारियों का मुकाबला कैसे करती है , इसके बारे में। 

इनसे पता चलता है कि दिन - रात तमाम बैक्टीरिया , वाइरस , फफूंद और बीमारी पैदा करने वाली दूसरी चीजों से घिरे रहने के बावजूद जंगली या आवारा जानवर बीमार क्यों नहीं पड़ते , जबकि सुरक्षित परिवेश में रहने वाले खाते - पीते घरों के इंसान आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के बावजूद अक्सर बीमारियां झेलते हुए ही नजर आते हैं। 

राल्फ स्टाइनमैन , जूल हॉफमैन और ब्रूस ब्यूटलर द्वारा अलग - अलग जगहों और समयों में की गई ये खोजें बुनियादी महत्व की हैं। इन्हें आधार बनाकर कैंसर , एड्स और गठिया जैसी असाध्य बीमारियों से लेकर रोजमर्रा की छोटी - मोटी बीमारियों तक का इलाज शरीर की अपनी क्षमता से ही कर लिए जाने पर दुनिया भर में काम जारी है। फार्मेकोलॉजी यानी भेषज शास्त्र की भाषा में इसे थेरैप्यूटिक वैक्सीनों का क्षेत्र कहा जा रहा है। यानी ऐसे वैक्सीन , जिनका इस्तेमाल बचाव की तरह नहहीं बल्कि बीमारी हो जाने के बाद उसके इलाज के रूप में किया जा सके। 

ध्यान रहे , इम्यून सिस्टम के बारे में हाल - हाल तक चिकित्सा शास्त्र की जानकारियां बहुत मामूली रही हैं। खून में मौजूद श्वेत रक्त कणिकाएं ( डब्लूबीसी ) शरीर में बाहर से आए हानिकारक तत्वों से लड़ती हैं , यह जानकारी पुरानी है। लेकिन वे हानिकर और अहानिकर तत्वों की पहचान कैसे करती हैं , गफलत में आकर शरीर की अपनी ही कोशिकाओं को क्यों नहीं मार डालतीं - और ऑटो इम्यून बीमारियों में ऐसा करने क्यों लगती हैं , एड्स होने पर सभी बीमारियों से लड़ने की क्षमता खत्म कैसे हो जाती है , और बिना किसी बाहरी इनफेक्शन के लोग गठिया जैसी असाध्य बीमारी के शिकार कैसे हो जाते हैं - ऐसे न जाने कितने सवाल हैं , जिनका जवाब अभी ढूंढा जा रहा है। 

जवाब तलाशने की यह प्रक्रिया उलटे ढंग से चली है। नोबेल घोषित होने के मात्र तीन दिन पहले दिवंगत हुए राल्फ स्टाइनमैन ने 1973 में डेंड्राइटिक कोशिकाओं की खोज की और बताया कि ये जन्मजात इम्यूनिटी और बाद में आने वाली सेकंडरी इम्यूनिटी के बीच की कड़ी का काम करती हैं। इसके लगभग चौथाई सदी बाद क्रमश : फलमक्खियों और चूहों की जेनेटिक्स पर काम करते हुए जूल हॉफमान और ब्रूस ब्यूटलर ने जन्मजात इम्यूनिटी के रहस्य का पर्दाफाश कर दिया। 

संसार के कम ही वैज्ञानिक हैं , जिन्हें खुद की ईजाद की हुई पद्धति से अपना इलाज कराने का मौका मिला है। राल्फ स्टाइनमैन का नाम ऐसे गिने - चुने लोगों के साथ ही लिया जाएगा , हालांकि यह इलाज उनके पैंक्रियाटिक कैंसर में उन्हें सिर्फ चार साल की जिंदगी बख्श पाया। उम्मीद करें कि इम्यूनिटी से जुड़ी ये खोजें एक दिन मानव शरीर को खतरनाक रसायनों का गोदाम बनाने का धंधा बंद कर देंगी और इसे वह गरिमा प्रदान करेंगी , जिसका यह सचमुच हकदार है(संपादकीय,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,5.10.11)।

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बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

महिलाओं में अवसाद

मनोविज्ञानियों को यह सवाल अक्सर परेशान करता है कि कोई मां आखिर कैसे खुद के जने स्वस्थ बच्चे को किसी कागज या कपड़े में लपेट कर अस्पताल , अनाथालय या किसी अन्य ऐसी सार्वजनिक जगह पर छोड़ आती है जहां उस पर किसी और नजर पड़ जाए और वह उसे पालने - पोसने के लिए ले जाए। 

अनचाही संतान या गरीबी जैसे सामाजिक कारणों के अलावा इसका एक और बड़ा कारण है प्रसव के बाद माता - पिता में पैदा होने वाला अवसाद। ब्रिटेन की एक बड़ी रिसर्च में दावा किया गया है कि उन लोगों ( महिलाओं - पुरुषों , दोनों ) में ऐसे अवसाद का काफी खतरा है जिन्हें मां - बाप बने ज्यादा अरसा न हुआ हो। करीब 90 हजार लोगों के डेटा के आधार पर की गई इस रिसर्च में यह नतीजा निकाला है कि प्रसव के पश्चात 13.9 प्रतिशत महिलाएं और 3.6 प्रतिशत पिता अवसाद की चपेट में आते हैं। 

पहली बार मां - बाप बने लोगों में यह संभावना 10 प्रतिशत से भी अधिक होती है कि वे अपने बच्चे को लेकर डिप्रेस हो जाएं। खासकर बच्चे के जन्म के बाद के 3 से 6 महीने की अवधि मां - बाप के लिए बहुत कष्टकारी होती है। महिलाओं को इस तरह के मानसिक अवसाद से खुद को बाहर निकाल पाना आसान नहीं होता। कई बार ऐसी हालत में वे आत्महत्या जैसा कदम उठा लेती हैं। इस अवसाद की कई वजहें हो सकती हैं। जैसे बच्चे की देखभाल के कारण नींद पूरी न होना , दिनचर्या अस्त - व्यस्त होना , दफ्तर या व्यवसाय में पूरा ध्यान न दे पाना या फिर बच्चे अथवा स्वयं की ही कोई बीमारी। 

भारत जैसे देशों में स्थिति और भी भयावह हो सकती है क्योंकि यहां माताओं की प्रसव पूर्व सेहत पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है। बच्चा पैदा होने के बाद उनकी शारीरिक - मानसिक सेहत कैसी रहेगी , यह देखने की कोई खास जरूरत यहां नहीं समझी जाती। शायद यही वजह है कि भारत उन देशों में शामिल है जहां मातृ मृत्यु दर काफी ज्यादा है। 

फिलहाल यह दर एक लाख माताओं में 212 है जो 2007-09 के 254 के मुकाबले कम है। संयुक्त राष्ट्र के मिलेनियम डिवेलपमेंट लक्ष्य के मुताबिक 2015 तक इसे 109 तक लाकर ही राहत महसूस की जा सकती है। बच्चे के जन्म से पहले और बाद में यहां पुरुषों के अवसादग्रस्त होने का खतरा भले कम हो , लेकिन महिलाओं को तो हर हाल में सौ कष्ट सहने हैं। उन्हें तो यहां इसलिए भी कोसा जाता है कि उन्होंने लड़की क्यों जनी ? यह एक ताना ही उन्हें डिप्रेस करने के लिए काफी है(संपादकीय,नवभारत टाइम्स,4.10.11)।

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मंगलवार, 16 अगस्त 2011

खून जांच से लिंग निर्धारण के ख़तरे

खून जांच बताएगा बेटा या बेटी.., भले ही दुनिया भर के लोग इस जांच को चिकित्सा जगत की कामयाबी मान रहा हों, लेकिन सच तो यह है कि भारत जैसे देश के लिए यह जांच किसी अभिशाप से कम नहीं होगी। यह कहना है राजधानी की स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों का। इनका कहना है कि जब अल्ट्रासाउंड ही कन्या भ्रूण हत्या की एक बड़ी वजह बनी हुई है ऐसे में खून जांच कन्या भ्रूण हत्या को और बढ़ावा देगी। भारत में यह जांच किसी भी सूरत में शुरू नहीं होनी चाहिए। रॉकलैंड अस्पताल की डॉक्टर आशा शर्मा की मानें तो हमारा समाज पहले से ही महिलाओं का विरोधी रहा है। चाहे वह पढ़ा लिखा तबका ही क्यों न हो। अगर ऐसे में सेल-फ्री फीटस डीएनए नामक यह जांच अगर भारत में शुरू होती है तो खतरनाक रूप धारण कर सकता है। यूरोप में यह इसलिए मान्य है क्योंकि वहां इसका मतलब लिंग जांच से नहीं है, बल्कि हीमोफीलिया जैसे लिंग से जुड़े जेनेटिक रोग का पता लगाना मकसद है क्योंकि यह रोग ज्यादातर लड़कों में होता है। फोर्टिस अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. उर्वशी झा का कहना है कि यह जांच नहीं गर्भ में पल रहे लड़कियों की मौत का फरमान है। बेटियों के लिए यह जांच अभिशाप बन जाएगी। ऐसी जांच तो अपने देश में किसी भी सूरत में शुरू नहीं होनी चाहिए। जबकि मैक्स की डॉ. अनुराधा कपूर का मानना है कि अपने समाज में आज भी महिलाएं उपेक्षित हैं। यहां लड़कियों को आज भी लड़कों जैसा हक नहीं मिलता। अगर यह जांच शुरू हो जाती है तो लोगों को भ्रूण जांच कराना और आसान हो जाएगा। गर्भ में बेटियां और भी दम तोड़ती नजर आएंगी। वहीं दूसरी ओर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. विनय भी यह मानते हैं कि अगर यह जांच भारत में आती है तो इसका बहुत बुरा असर पड़ेगा। भले ही इस तकनीक का इजाद अच्छे मकसद से किया गया हो लेकिन अपने देश में इसका दुरुपयोग होगा इसमें कोई संदेह नहीं है। बता दें कि भारत में कन्या भ्रूण हत्या पहले से ही परेशानी का सबब बना हुआ है और इसलिए गर्भस्थ शिशु लिंग जांच यहां गैरकानूनी है। हालांकि 11-12 सप्ताह के बाद गर्भ में बच्चे की जांच अल्ट्रासाउंड से यह पता चल जाता है। जब कि सेल-फ्री फीटस डीएनए जांच में गर्भ के सात सप्ताह बाद ही इसका पता चल जाता है। फिलहाल इसका प्रयोग इन दिनों यूरोप में खूब हो रहा है। एक जांच पर लगभग 18 हजार रुपये खर्च आता है(दैनिक जागरण,दिल्ली,16.8.11)।

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बुधवार, 10 अगस्त 2011

अंडमान-निकोबार की आदिवासी दवाओं के पेटेंट की तैयारी

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में रहने वाले दुर्लभ आदिवासियों के संरक्षण के साथ-साथ उनके पारंपरिक ज्ञान और तौर-तरीकों को सहेज कर रखना बहुत जरूरी है। इन द्वीप समूहों की जैव-विविधता दुनिया में सबसे अनूठी है। यहां सैकड़ों किस्म की जड़ी-बूटियां और औषधि गुण वाले पेड़-पौधे पाए जाते हैं। यहां के आदिवासियों ने इन जड़ी-बूटियों के मिश्रण से कई तरह की दवाएं विकसित की हैं और वे सैकड़ों वर्षों से विभिन्न रोगों के उपचार के लिए इन दवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं। आदिवासियों की इन पारंपरिक चिकित्सा विधियों की तरफ अब सरकार का भी ध्यान गया है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने इन अनोखी चिकित्सा विधियों के पेटेंट हासिल करने की योजना बनाई है। परिषद के क्षेत्रीय चिकित्सा अनुसंधान ने अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के आदिवासियों के लिए एक "सामुदायिक जैव विविधता रजिस्टर" बनाने का काम शुरू किया है। इसमें पारंपरिक उपचार विधियों का ब्यौरा दर्ज किया जाएगा। रजिस्टर में यह रिकॉर्ड रखा जाएगा कि जड़ी-बूटियों के स्थानीय नाम क्या हैं। जड़ी-बूटियों के मिश्रण से दवाएं किस तरह तैयार की जाती हैं और कितने लोगों का इन विधियों से सफल इलाज किया गया। भारतीय वैज्ञानिकों के एक दल ने हाल ही में कार निकोबार द्वीप के ११ गांवों का दौरा किया था, जहां आदिम निकोबारी आदिवासी रहते हैं। वैज्ञानिकों ने यहां आदिवासियों द्वारा प्रयोग में लाई जा रही १२४ प्रकार की जड़ी-बूटियों का ब्यौरा एकत्र किया। आदिवासी इनका इस्तेमाल ३४ बीमारियों के इलाज के लिए करते हैं। उदाहरण के तौर पर आदिवासियों द्वारा पेट दर्द, जोड़ों के दर्द और फ्रैक्चर के इलाज के लिए विकसित दवाएं बहुत ही कारगर पाई गई हैं। वैज्ञानिकों ने ४२ ऐसे लोगों अथवा ओझाओं के भी इंटरव्यू लिए, जो इन दवाओं से मरीजों का इलाज करते हैं। वैज्ञानिक विभिन्न बीमारियों के इलाज में प्रयुक्तकिए जाने वाले पौधों को संग्रहीत भी कर रहे हैं। उन्होंने अनुसंधान करने के लिए इनका बगीचा भी लगाया है। आदिवासियों की चिकित्सा विधियों का रिकॉर्ड तैयार करने के लिए सभी आदिवासी समूहों तक पहुंचना जरूरी होगा। आदिवासियों द्वारा तैयार की जाने वाली ज्यादातर दवाएं पेड़-पौधों के विभिन्न हिस्सों का मिश्रण होती हैं। हर बीमारी के लिए दवा अलग होती है और इनके प्रयोग की अवधि भी हर बीमारी में अलग-अलग होती है। वैज्ञानिकों को हर चीज को बारीकी से नोट करना पड़ेगा और खुद अनुसंधान करके यह बताना पड़ेगा कि ये पारंपरिक औषधियां कारगर क्यों होती हैं। पूरा विवरण तैयार होने और वैज्ञानिक पुष्टि के बाद ही चिकित्सा अनुसंधान परिषद इन दवाओं के पेटेंट के लिए आवेदन करेगी(मुकुल व्यास,नई दुनिया,10.8.11)।

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मंगलवार, 28 जून 2011

कैसे रूके लिंग-परिवर्तन?

पुरुषप्रधान भारतीय समाज में स्त्री जाति कहीं भी सुरक्षित नहीं है। अब तक हमने सुना था कि गर्भ में पहचान होने के बाद कन्या-भू्रण को वहीं मार दिया जाता था, जिसके बाद सरकार ने गर्भ में लिंग की पहचान करने वाले एम्नीयोसिंटेसिस जैसे परीक्षणों पर रोक लगा दी थी। अब दिल्ली के एक अंग्रेजी दैनिक ने रहस्योद्घाटन किया है कि किस प्रकार इंदौर (मध्य प्रदेश) में पांच वर्ष तक की बालिकाओं का लिंग परिवर्तन कराकर उन्हें बालकों में रूपांतरित किया जा रहा है। इसके लिए जो ऑपरेशन होता है उसमें करीब डेढ़ लाख रुपए तक का खर्च आता है। जाहिर है, यह ऑपरेशन एक अधूरे शरीर या व्यक्तित्व को एक सामान्य शरीर या व्यक्तित्व देने के लक्ष्य से किया जाता है। मगर इंदौर के कुछ अस्पतालों और क्लिनिकों में लालची डॉक्टर इसका दुरुपयोग करके बेटी पर बेटे को ज्यादा तरजीह देने वाले बीमार मानसिकता के लोगों की मनोकामना पूरी करने के लिए उनकी एक से पांच वर्ष तक की आयु की सामान्य कन्याओं का लिंग परिवर्तन करके उन्हें बालकों के रूप में रूपांतरित कर रहे हैं। अब तक सैकड़ों सामान्य बालिकाओं को बालक बनाया जा चुका है। ये बालक आगे चलकर संतान तो पैदा नहीं कर सकेंगे मगर वे नामर्द भी नहीं होंगे। अब तक थाईलैंड आदि देशों में पुत्र प्राप्ति के इच्छुक माता-पिता इलाज के लिए जाया करते थे ताकि वैज्ञानिक पद्धति से वहीं क्लीनिक में गर्भाधान कराकर शर्तिया लड़का पाया जा सके। मगर अब तो इंदौर में बालिकाओं को ही बालकों में बदलवाने की सुविधा बन गई है और दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों के अभिभावक इंदौर की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। अब तक सिर्फ एक मामला ऐसा मिला है जिसमें एक बालक को कन्या बनवाया गया। ताज्जुब होता है कि हमारे देश में यह हो क्या रहा है और हमारा समाज जाहिल और लालची क्यों बनता जा रहा है? प्राकृतिक प्रक्रिया से लड़की के रूप में जगत में आई इन कन्याओं ने ऐसा क्या पाप किया है कि उन्हें बोझ मानकर उनके पूछे बिना ही उन्हें बालकों में तब्दील किया जारहा है? कल बड़ा होने पर जब वे अपने मां-बाप से उनके साथ हुए इस अत्याचार का जवाब मांगेंगी तो वे क्या कहेंगे? क्या ये मां-बाप अपने को उन अभागी कन्याओं की जगह रखकर देख सकते हैं जिनका लिंग बदला गया? पुत्र की चाह ने कुछ लोगों को शायद अंधा बना दिया है। वैसे ही कन्या-भ्रूण हत्याओं और लिंग-भेदभाव के कारण हरियाणा और पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्यों में पुरुष-स्त्री अनुपात बुरी तरह गड़बड़ा गया है। हरियाणा के कुछ समाजों में देश के दूसरे भागों से लड़कियां खरीदकर लाई जा रही हैं ताकि वधुओं की कमी पूरी की जा सके। जरा ऐसे समाज की कल्पना कीजिए जिसमें स्त्रियां न रहें और सर्वत्र नर मुंड ही मुंड दिखाई दें। एक मां, दादी-नानी, बुआ, ताई या चाची, बहन और बेटी, पत्नी या मित्र के बिना क्या यह दुनिया रहने लायक होगी? नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) ने अखबार की रिपोर्ट का संज्ञान लेकर इस पूरे कांड की जांच करने का राज्य सरकार को निर्देश दिया है। मगर लगता नहीं कि जांच से पूरा सच सामने आ पाएगा और दोषी डॉक्टरों और माता-पिताओं को दंडित किया जा सकेगा। आखिर लिंग-परीक्षण पर कानूनी रोक के बाद गर्भ में ही बालिकाओं को मार देने की घटनाएं बंद तो नहीं हुई हैं। स्त्री जाति के साथ हो रहे इस अमानुषिक अत्याचार से हर विवेकवान मनुष्य के मन में सिर्फ अपराधबोध ही पैदा नहीं होना चाहिए बल्कि मानसिकता में सुधार भी आना चाहिए। तभी बात बनेगी(संपादकीय,नई दुनिया,28.6.11)।

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बुधवार, 15 जून 2011

बिन टीके मरते बच्चे

कई अग्रणी दवा कंपनियों ने ऐलान किया है कि वह विकासशील देशों को आपूर्ति किए जाने वाले टीकों की कीमतों में भारी कटौती करने वाली हैं। ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन, मर्क, जॉनसन ऐंड जॉनसन और सनोफी-एवेंतिस आदि कई कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय टीकाकरण के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रम जीएवीआई यानी गावी के माध्यम से इस कदम को उठाने का निर्णय लिया है। यह सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के संगठनों के बीच की ऐसी पार्टनरशिप है जो विकासशील देशों में जनटीकाकरण कार्यक्रम को बढ़ावा देती हैं। याद रहे गावी वही नेटवर्क है जो खरबपति बिल गेट्स के चैरिटी कार्यक्रम का अहम हिस्सा है। जीएसके ने बताया कि वह रोटावायरस के लिए आवश्यक टीकों की कीमतों में 67 फीसदी की कमी करेगी। जानकार बताते हैं कि रोटावायरस से उपजे दस्त के चलते हर साल दुनिया भर में पांच लाख बच्चे काल कवलित होते हैं। कहा जा रहा है कि विकासशील देशों को दी जा रही सब्सिडी को विकासित देशों को आपूर्ति किए जाने वाली कीमतों से वसूली जाएगी। यह भी कहा जा रहा है कि जीएसके नामक अग्रणी कंपनी दुनिया का पहला मलेरियारोधी टीका जल्द ही बाजार में लाने वाली है। चूंकि विकसित देशों से इस बीमारी को समाप्त किया जा चुका है जिस वजह से क्रॉस सब्सिडी मुमकिन नहीं दिखती है। इस वजह से कंपनी ने तय किया है कि वह मामूली मुनाफे के साथ इस टीके को बेचेगी। इस बात को मद्देनजर रखते हुए कि हर साल दुनिया भर में लाखों बच्चे जीवनोपयोगी टीकों के अभाव में आज भी मर रहे हैं। इन टीकों की कीमतों में की जा रही कटौती निश्चित ही स्वागतयोग्य हैं। उम्मीद की जा सकती है कि बहुउद्देशीय कंपनियों का यह कदम तमाम मासूमों की जिंदगियों को बचाने में कारगर होगा, लेकिन यह सवाल उठाना आवश्यक है कि दवाओं के उद्योग से हर साल बिलियन डॉलर का मुनाफा कमाती इन बहुउद्देशीय कंपनियों को ऐसा कदम उठाने की जरूरत ही क्यों महसूस हुई? क्या शेयरधारकों की बैठक में उन्हें मजबूर किया गया कि वह भले कम मुनाफा कमाएं मगर बच्चों की जान अवश्य बचा लें। क्या कारपोरेट सम्राटों में अचानक चैरिटी की भावना जाग गई है जिसके चलते उन्होंने अपने अपने हिस्से में आ रहे मुनाफे को त्यागने का निर्णय लिया। दरअसल ऐसी कोई बात नहीं है। यह शुद्ध बाजार का तर्क है कि उन्हें यह कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा। दुनिया के विभिन्न देशों में टीकों का बाजार आज तेजी से बढ़ रहा है जहां मुनाफे की भी गारंटी रहती है। इसके चलते आज कई अन्य बड़ी कंपनियां जो अब तक इसके निर्माण से दूर रही हैं वह भी इसमें कूद रही हैं। पिछले दिनों खबर आई थी कि प्रख्यात बहुउद्देशीय कंपनी जॉनसन ऐंड जॉनसन भी टीकों के निर्माण के उद्योग में उतर रही है। स्वाभाविक है अगर कंपनियों को बाजार में टिकना है तो उन्हें मुनाफे की दर कम करके कीमतें कम करनी ही पड़ेंगी। दूसरा अहम पहलू यह है कि हाल ही में संयुक्त राष्ट्रसंघ से संबद्ध यूनिसेफ जिसे विश्व में जीवनोपयोगी टीकों का सबसे बड़ा खरीदार समझा जाता है। यूनिसेफ ने पहली बार उस धनराशि का उद्घाटन किया जो उसने पिछले एक दशक में इन दवा निर्माता कंपनियों को उन सोलह टीकों के लिए दी है जो उसके विभिन्न कार्यक्रमों में इस्तेमाल होते हैं। ये सभी ऐसे टीके हैं जो बेहद जीवनोपयोगीसमझे जाते हैं। यूनिसेफ द्वारा अपनी वेबसाइट इस राशि को उजागर किए जाने का साफ मकसद था कि समूचे सौदे में अधिक से अधिक पारदर्शिता लाई जाए ताकि भविष्य में दवानिर्माता कंपनियों को अपनी कीमतें कम करने के लिए मजबूर होना पड़े और वह उसी राशि में अधिक बच्चों का टीकाकरण कर सके ताकि अधिक मासूम जिंदगियों की रक्षा हो सके। उदाहरण के लिए उसने पाया कि पश्चिमी दवा कंपनियां उन्हीं टीकों के लिए यूनिसेफ से दोगुनी कीमतें लेती हैं जबकि भारत एवं इंडोनेशिया की कंपनियां आधे दाम लेती हैं। यह भी जानने योग्य है कि नोवार्टिस, मर्क ऐंड कंपनी जैसी बहुउद्देशीय कंपनियों ने अपने स्तर पर कभी उन दामों को उजागर नहीं किया था जो वह यूनिसेफ से वसूलती रही हैं। यूनिसेफ की तरफ से पारदर्शिता बनाए रखने के लिए उठाए गए कदमों के साथ ही यह कयास भी लगाए जा रहे थे कि बड़ी-बड़ी कंपनियां भी दामों को घटाने के लिए मजबूर होंगी। इस बात को आसानी से देखा जा सकता है कि जब तक मुमकिन था तब तक दवा कंपनियों ने भरसक दामों को उंचा बनाए रखा। मुख्य दवा बाजार में आ रहे ठहराव की पृष्ठभूमि में टीकों के बाजार के लगातार बढ़ते मुनाफे को कंपनियों ने बटोरने में संकोच नहीं किया भले मुनाफे की दर थोड़ी कम थी और अब जबकि दबाव पड़ रहा है तब वे मानवीय नजर आने की कोशिश में हैं। इसे संयोग ही कहेंगे कि यूनिसेफ की इस रिपोर्ट के प्रकाशन होने के चंद दिनों पहले भारत में टीकाकरण के विपरीत प्रभावों के चलते होने वाली मौतों की संख्या में अचानक आए उछाल के बारे में सूचना के अधिकार के तहत हासिल जानकारी सामने आई थी। अगर बारीकी में देखें तो इसके पीछे भी टीकों के निर्माण में लगी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में उत्पादन को बंद कर इसे निजी कंपनियों को सौंपने की नीति दिखती है। जीवनोपयोगी टीकों का सवाल किस तरह आज बड़ी-बड़ी कारपोरेट ताकतों के लिए मुनाफे की लूट का चरागाह बना है इसे अब अच्छी तरह समझा जा सकता है। बच्चों की मौतों में आए उछाल का यही वह समय है जब कसौली, कुनूर और चेन्नई स्थित सार्वजनिक क्षेत्र की तीन प्रमुख कंपनियों को यह कहते हुए बंद किया गया कि वह कथित तौर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों का पालन नहीं करती हैं। इसमें सेंट्रल रिसर्च इंस्टिीट्यूट-कसौली, पॉस्चर इंस्टिीट्यूट ऑफ इंडिया-कूनूर और साठ साल पुरानी बीसीजी वैक्सीन लैबोरेटरी-चेन्नई। जनवरी 2008 में बंद किए गए इन कंपनियों के चलते जीवनोपयोगी टीकों में जबरदस्त कमी आई जो टीकाकरण कार्यक्रम के लिए बेहद जरूरी थे। गौरतलब है कि जीवनोपयोगी टीकों का का बड़ा हिस्सा इन्हीं कंपनियों से प्राप्त होता था, लेकिन अचानक इन्हें बंद किए जाने के बाद निजी कंपनियों एवं विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा आपूर्ति किए गए टीके ही एकमात्र सहारा थे। हालांकि इन कंपनियों को अचानक बंद किए जाने को लेकर काफी हंगामा हुआ था और तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री पर निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के आरोप भी लगे थे। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा दी गई सूचना के मुताबिक वर्ष 2008 से टीकाकरण के विपरीत प्रभावों के चलते होने वाली मौतों में अचानक उछाल आया है। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के मुताबिक केरल में वर्ष 2001 से 2007 के बीच 136 बच्चों की मौत हुई। आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2001 में भारत में टीकाकरण के विपरीत प्रभाव के चलते एक भी मौत नहीं हुई थी, जबकि वर्ष 2010 में यह संख्या 128 तक पहुंच गई। इससे स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है(सुभाष गाताडे,दैनिक जागरण,13.6.11)।

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बुधवार, 8 जून 2011

घर और समाज की धुरी हैं महिलाएँ;कोई उनका भी ध्यान रखे

घर और महिलाएँ दोनों को अलग करके नहीं देखा जा सकता। घर परिवार के हर सदस्य की शुभचिंतक महिलाओं संख्या दिन ब दिन कम होती जा रही है। बीते तीन दशकों से लगातार हो रही कन्याभ्रूण हत्याओं के कारण समाज में लिंगानुपात गड़बड़ा गया है। मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि जिस समाज में महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले अधिक रहती है वहाँ अपराध कम होते हैं। समाज और घर दोनों महिलाओं के कारण स्वस्थ रहा हैं। कहते हैं महिला परिवार की धुरी है लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं पाया जाता। कहने को हर घर में महिलाओं की चलती है लेकिन यह पूरा सच नहीं है। जो सास अपनी बहू पर कन्याभ्रूण हत्या जैसे पाप के लिए दबाव बना रही है, क्या वह घर या समाज के पुरुषों के दबाव में नहीं है? यह जानते हुए भी कि गर्भपात की प्रक्रिया में माँ की जान पर भी बन आती है, क्या पुत्र पाने के लालच में परिवार यह जोखिम नहीं उठाता? कहने को यह बात बड़ी सीधी लगती है कि गर्भवती महिला की सहमति के बिना कन्याभ्रूण हत्या हो ही नहीं सकती, लेकिन क्या कोई उसके मन की बात जानता है? जो सास अपनी बहू का गर्भपात करवाने के लिए सबसे आगे है, क्या वह अपने घर की धुरी नहीं है? कारण स्पष्ट है कि केवल साक्षर होने से जागरूकता नहीं आती। आज भी साक्षर और आधुनिक समझे जाने वाले कई घरों में गर्भवती बहू की उतनी देखभाल नहीं होती जितनी चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से जरूरी है। किसी भी महिला के जीवन में गर्भधारण के बाद बिताए एक हजार दिन बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इस दो साल सात महीनों की अवधि में वह माँ भी बनती है और बच्चे की परवरिश भी करती है।

इस अवधि में उसे बच्चे को निरंतर देखभाल की ज़रूरत होती है। गर्भकाल एवं प्रसव-पश्चात् देखभाल में रह गई किसी भी तरह की कमी महिला का जीवन भर पीछा नहीं छोड़ती। सक्रिय प्रजनन प्रक्रिया से दूर होकर रजोनिवृत्ति की ओर बढ़ रही महिलाओं में कई तरह की शारीरिक समस्याएं होती हैं। यकायक तपन के आवेग आना इनमें से एक बड़ी समस्या है। हैरानी की बात है कि कोई इसे गंभीरता से नहीं लेता। खुद महिला भी इसे मामूली बात मान लेती है। रजोनिवृत्ति शुरू होने की अवधि में महिलाएँ कई तरह के मानसिक और शारीरिक परिवर्तनों से गुजरती हैं। अस्थि-क्षरण जैसी स्थाई समस्याएं इसी दौरान उनके शरीर में घर कर लेती है। ज़रा सी सावधानी से इन्हें टाला जा सकती है। महिलाओं की भूमिका केवल समाज के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। समाज की प्रथम इकाई एक परिवार,एक घर भी महिला पर केंद्रित होते हैं। मसलन,घर की स्वच्छता में महिला ही अहम भूमिका निभाती है।

घरों में कई तरह के प्रदूषण पनपते हैं लेकिन हम उसके प्रति अनजान रहते हैं। देखभाल न हो,तो गादी,बिस्तर,तकिए,सोफे कीटों की कॉलोनियां बन जाते हैं। घरों की साफ-सफाई नियमित रूप से होनी चाहिए। इसमें घर के सभी सदस्यों के सक्रिय योगदान की ज़रूरत होती है,केवल महिलाओं से इसकी उम्मीद नहीं की जानी चाहिए,हालांकि सभी के लिए प्रेरणा-स्रोत महिला ही होती है। तात्पर्य यह है कि महिला स्वस्थ तो परिवार,घर स्वस्थ औऱ परिवार स्वस्थ तो समाज स्वस्थ,देश स्वस्थ। इतनी महत्वपूर्ण भूमिका को हम नज़रंदाज़ क्यों करते हैं?(संपादकीय,सेहत,नई दुनिया,जून प्रथमांक 2011)

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सोमवार, 6 जून 2011

मोबाइल के ख़तरे और लापरवाही का आलम

जब से मोबाइल फोन का प्रचलन शुरू हुआ है, रह-रहकर यह समाचार सुनने में आते हैं कि इससे स्वास्थ्य को खतरा है। आधुनिक जीवन में यह इतना जरूरी हो गया है कि कोई खतरे की आशंका की ज्यादा परवाह नहीं करता। अब विश्व स्वास्थ्य संगठन की अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी (आईएआरसी) ने रेडियो फ्रीक्वेंसी इलेक्ट्रोमैगनेटिक फील्ड्स को मस्तिष्क के कैंसर का एक संभावित कारण मान लिया है। इस एजेंसी ने कहा है कि वायरलेस फोन का काफी समय से देर तक प्रयोग होने से ग्लीओमा यानी एक तरह का मस्तिष्क का कैंसर हो सकता है। एजेंसी ने इसके खतरे को ग्रुप २वी के अंतर्गत रखा है। इस ग्रुप में २४० अन्य चीजें भी शामिल हैं, जिसमें निम्न स्तरीय चुम्बकीय क्षेत्र का भी समावेश है जो मोबाइल फोन के प्रयोग से पैदा होता है। मगर अभी इससे होने वाले शारीरिक नुकसान का कोई निश्चित प्रमाण नहीं मिला है। एजेंसी ने माना है कि मोबाइल फोन इस्तेमाल करने वालों में बहुत सीमित रूप में मस्तिष्क के कैंसर के उदाहरण देखने में आए हैं लेकिन इसी बात से मोबाइल फोन के प्रयोग और मस्तिष्क के कैंसर में एक संबंध तो स्थापित हो ही जाता है, भले ही उसके उदाहरण बहुत सीमित संख्या में देखने में आएं। तम्बाकू के साथ भी तो ऐसा ही है। अनेक लोग लंबी उम्र तक सिगरेट-बीड़ी पीते रहते हैं, तम्बाकू-खैनी खाते रहते हैं और उन्हें कुछ नहीं होता मगर इस बात से तम्बाकू सेवन और कैंसर का संबंध गलत भी साबित नहीं होता। इस रिपोर्ट से एक साल पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दस से ज्यादा देशों में एक अध्ययन कराया था, जिसमें ऐसे लोगों को शामिल किया गया था, जो पिछले दस वर्षों से मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते आए थे। इस अध्ययन में मोबाइल फोन से इस तरह के किसी खतरे की कोई जानकारी नहीं मिली थी। इसलिए लोगों को निर्भय होकर मोबाइल फोन का प्रयोग करने का भरोसा मिला था लेकिन ताजे अध्ययन के बाद मोबाइल फोन को लेकर शक या भय की गुंजाइश पैदा हो गई है। विज्ञान के अगर अपार लाभ हैं तो कुछ हानियां भी हैं। मसलन मोबाइल फोन ने हमारी जिंदगियों को बदलकर रख दिया है। भारत में तो जितने लोगों के घरों में स्नान घर और शौचालय की सुविधाएं नहीं हैं, उससे कहीं ज्यादा लोगों के पास मोबाइल फोन हैं। वे मोबाइल फोन के बिना अपनी जिंदगियों की कल्पना भी नहीं कर सकते। वे इसके जरिए हर वक्त अपने कारोबार, अपने लोगों और अपने घर से जुड़े रहते हैं, चाहे वे भारत के किसी भी कोने में क्या, विदेश में भी हों। अतः मोबाइल फोन को उठाकर फेंका तो नहीं जा सकता। उसके इस्तेमाल में एक तरह का संतुलन बनाना ही ज्यादा उचित और तर्क संगत होगा। भारत ने भी इस रिपोर्ट को अभी स्वीकार नहीं किया है और खुद अपना अध्ययन कराकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की बात कही है। दरअसल, अलग-अलग अध्ययनों का निष्कर्ष एक सा नहीं निकला है। मसलन डेनमार्क में २००१ और फिर २००६ में ४ लाख मोबाइल उपभोक्ताओं का अध्ययन किया गया तो कैंसर का कोई भी सबूत नहीं मिला, जबकि अभी एक दो वर्ष पहले स्वीडन में किए गए एक अध्ययन में पता चला कि जो लोग और खासकर २० वर्ष से कम आयु के लोग पिछले दस वर्षों से मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें मस्तिष्क के कैंसर का खतरा ज्यादा है। कभी सुनने में आता है कि मोबाइल फोन के अधिक प्रयोग से सुनने की ताकत पर असर पड़ता है तो कभी यह कि शर्ट की जेब में रखने से दिल पर असर पड़ता है। एक बार तो यह भी रिपोर्ट आई कि बेल्ट में आगे लटकाने से चुम्बकीय तरंगें पुरुषत्व को प्रभावित कर सकती हैं। जो भी हो, विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट से अत्यधिक मोबाइल का प्रयोग करने और मस्तिष्क कैंसर के बीच पहली बार एक रिश्ता साबित हुआ है। इसलिए एक तरफ तो हमें खुद उसके प्रयोग में संयम बरतना चाहिए और दूसरी तरफ विश्व स्तर पर और ज्यादा अध्ययन होने चाहिए ताकि मोबाइल खतरे के स्वास्थ्य पर पड़नेवाले दुष्परिणामों के बारे में स्थिति और ज्यादा स्पष्ट हो सके। यों तो एक्सरे से भी स्वास्थ्य के लिए खतरा है और गामा रे से भी लेकिन मेडिकल सेवाओं में न एक्सरे के बिना गुजारा चलता है न एमआरआई के बिना। मोबाइल फोन से उतना भी प्रभाव सेहत पर नहीं पड़ता जितना कि एक्सरे और गामा रे से पड़ता है। इसलिए होना यह चाहिए कि कुछ मार्गदर्शक नियम या सिद्धांत तय कर दिए जाएं। बच्चों के हाथों से मोबाइल फोन दूर रखा जाए और हर समय कान पर मोबाइल रखे घूमनेवाली युवा पीढ़ी को बताया जाए कि इतनी देर तक इसका इस्तेमाल लगातार करते रहोगे तो अमुक-अमुक खतरे हैं। मोबाइल से पैदा होने वाले रेडिएशन की उच्च सीमा को और कम करने के बारे में सोचा जाना चाहिए। साथ ही एहतियात के तौर पर जहां लैंड लाइन उपलब्ध हो, उसके प्रयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। या फिर मोबाइल फोन को सीधे कान पर लगाने के बजाय ईयर फोन से सुना जाना चाहिए। वैसे विज्ञान मोबाइल फोन के दुष्प्रभावों को न्यूनतम से न्यूनतम स्तर पर लाने में सक्षम है। मोबाइल फोन तेजी से कंप्यूटर, कैलकुलेटर, इंटरनेट में तब्दील हो रहा है और ऐसा समय आ रहा है जब व्यक्ति अपने सारे काम मोबाइल फोन के जरिए संपन्न करने लगेगा। घर के सारे बिल, बैंक का काम, घरों के उपकरणों को दिशा दिर्नेश देने, शॉपिंग करने जैसे तमाम काम मोबाइल फोन के जरिए होने लगेंगे। इसलिए मोबाइल फोन को ज्यादा से ज्यादा निरापद, ज्यादा से ज्यादा खतरों से मुक्त बनाया जाना चाहिए(संपादकीय,नई दुनिया,6.6.11)।

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रविवार, 5 जून 2011

लिंग परीक्षण पर कठोर कार्रवाई की अपील

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नबी आजाद ने मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया से लिंग परीक्षण करने वाले डाक्टरों और क्लीनिकों पर कठोर कार्रवाई करने की अपील की है। लड़कियों की घटती संख्या पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि एमसीआइ अवैध लिंग परीक्षण और इसके बाद गर्भपात के मामलों पर तुरंत संज्ञान ले। उन्होंने कहा कि एमसीआइ को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि पीसी और पीएनडीटी अधिनियम का उल्लंघन करने वाले दोषी चिकित्सकों का पंजीकरण अधिनियम के प्रावधानों के तहत निलंबित या रद किया जाए।आजाद गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व लिंग निर्धारण तकनीक कानून (पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट), 1994 के नवगठित केंद्रीय अधीक्षण बोर्ड (सीएसबी) की पहली बैठक को संबोधित कर रहे थे। बैठक की अध्यक्षता करते हुए मंत्री ने कहा कि लड़कियों को लेकर हमें अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत है। समाज को इसके लिए पहल करनी होगी और नेताओं को अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में उत्प्रेरक का काम करना होगा। आजाद ने कहा कि लिंग परीक्षण के लिए चिकित्सकीय तकनीकों के गलत उपयोग को रोकने के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय प्रतिबद्ध है जबकि पीसी एवं पीएनडीटी अधिनियम लागू करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। उन्होंने कहा कि राज्यों में इसके लिए ढांचों एवं प्रणाली को मजबूत किए जाने की जरूरत है। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार एनआरएचएम के तहत पीसी एवं पीएनडीटी पर गौर कर रही है। उन्होंने कहा कि राज्यों में एवं जिला स्तर पर पीएनडीटी प्रकोष्ठ का गठन करने के लिए हम राज्यों को कोष मुहैया करा रहे हैं। लिंगानुपात में सबसे पीछे रहने वाले 18 राज्यों पर केंद्र सरकार ने ध्यान देना शुरू कर दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार राष्ट्रीय निरीक्षण एवं निगरानी समिति गठित कर रहा है जो कही भी आकस्मिक निरीक्षण कर सकती है। हालांकि उन्होंने कहा कि लिंगानुपात पर कानूनों के पालन की जिम्मेदारी राज्यों पर ही है। उन्होंने कहा कि सरकार लिंगानुपात के घटते स्तर के खिलाफ काम कर रहे गैर सरकारी संगठनों को वित्तीय मदद बढ़ाने के विकल्प पर विचार हो रहा है(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,5.6.11)।

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