बुधवार, 14 दिसंबर 2011

चंडीगढ़ में बढ़ रहे हैं किराए पर कोख देने के मामले

किरन राव और आमिर खान सरोगेसी के जरिये अब मां-बाप बने हैं, लेकिन सरोगेसी के जरिए पिछले दो साल में चंडीगढ़ में करीब दो दर्जन से ज्यादा बेऔलाद दंपती मां-बाप बन चुके हैं। भागदौड़ और तनाव भरी जिंदगी में बांझपन के मामले बढ़े हैं, तो किराए की कोख यानी सरोगेट मदर्स का चलन भी बढ़ा है। 

सेक्टर 38 में जननी फर्टीलिटी सेंटर की आईवीएफ तकनीक विशेषज्ञ डॉ. निर्मल भसीन मानती हैं चंडीगढ़ में सरोगेसी का मार्केट बढ़ रहा है। यहां औरतें सुंदर और स्वस्थ हैं, जो इस तकनीक से बच्चा चाहने वाले किसी भी दंपती की पहली शर्त होती है। डॉ. भसीन बताती हैं, ‘पिछले दिनों अमेरिका से आए एक डॉक्टर दंपती ने सरोगेसी के जरिये बच्चा हासिल किया। उन्होंने सरोगेट मदर के फीचर्स को काफी महत्व दिया। इसी तरह नॉर्वे के दंपती ने भी सरोगेट मदर वालंटियर के फीचर्स देखने चाहे ताकि बच्चे के फीचर्स शार्प हों।’ 

क्यों बढ़ रही है मांग 
चंडीगढ़ में सरोगेसी के जितने मामले हुए हैं, उनमें से अधिकतर दंपती ऐसे एनआरआई हैं जो अपने बच्चे में भारतीय फीचर चाहते हैं। बच्चे के इच्छुक दंपती पंजाबी नैन-नक्श और बेहतरीन व्यक्तिगत आदतों वाली सरोगेट मदर्स ढूंढ़ते हैं। बेदी नर्सिग होम एंड इनफर्टिलिटी सेंटर की डॉ. जीके बेदी का मानना है कि पंजाब और हरियाणा की औरतें शारीरिक तौर पर जेनेटिकली मजबूत हैं। उनकी खानपान की आदतें भी अच्छी हैं। इसके चलते उनमें गर्भस्थ बच्चे को संभालने की क्षमता भी बेहतर है। 

सरोगेट स्टेटस और आईवीएफ-सरोगेसी 
किसी और के बच्चे को जन्म देने के लिए कोख किराए पर देने वाली औरत का स्टेटस सरोगेट मदर का होता है। जिन मामलों में अंडाणु-शुक्राणु खुद दंपती के ही होते हैं और कोख किराए की, ऐसे मामलों को आईवीएफ-सरोगेसी कहा जाता है। 

कौन बन रही हैं सरोगेट वॉलंटियर 
सरोगेसी के लिए उम्रदराज दंपती ही नहीं, बल्कि युवा दंपती भी आगे आ रहे हैं। डॉ. भसीन के मुताबिक कई विवाहित औरतें पति की सलाह और मर्जी के साथ सरोगेट वालंटियर बनती हैं। इनको अच्छा मुआवजा मिलता है। ये औरतें युवा और मिडिल क्लास से हैं। अच्छी-खासी पढ़ी-लिखी होने के चलते पेरेंट्स उन्हें प्राथमिकता देते हैं। 

क्यों होती है जरूरत 
कामकाजी महिलाओं को प्रेगनेंसी के दौरान छुट्टी मिलने में मुश्किल होना भी सरोगेसी केस बढ़ने की एक वजह है। इसके अलावा बहुत सी महिलाओं में ओवम यानी अंडाणु बनने बंद हो जाते हैं और गर्भवती होने की संभावना खत्म हो जाती है, या उनका गर्भाशय इतना कमजोर हो जाता है कि बच्चा संभालने लायक नहीं रहता। थ्रेटेंड एबरेशन और हैबिचुअल मिसकैरिज जैसे मामलों में भी यही एकमात्र रास्ता रह जाता है। 

ऐसे पेरेंट्स के लिए स्वस्थ महिला डोनर्स की मदद से अंडाणु लिए जाते हैं। इन अंडाणुओं को फर्टीलाइज करने के लिए एक स्वस्थ गर्भाशय की जरूरत होती है। ऐसे में रिप्रोडक्टिव एज यानी 18 से 40 साल तक की औरत का चयन करके अंडाणु उसके गर्भ में ट्रांसफर कर दिया जाता है। बच्चे के जन्म के बाद उसे उसके बायोलॉजिकल और लीगल पेरेंट्स को सौंप दिया जाता है(रवि शर्मा,दैनिक भास्कर,चंडीगढ़,13.12.11)।

4 टिप्‍पणियां:

  1. किसी शारीरिक विकृतियों की वजह से यह विकल्प ठीक है पर,
    मातृत्व एक महिला के लिये दुनिया में सबसे सुंदर अनुभव है !
    बहुत रोचक जानकारी दी है ! आभार ....

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  2. इंसान हर जगह दखल कर रहा है ... सुमन जी कि बात से सहमत ... माँ बनने का अनुभव नारी को पूर्ण करता है ..

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  3. चंडीगढ़ तो पहले भी कई मामलों में अग्रणी रहा है ।

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  4. आपकी इस सुन्दर प्रस्तुति पर हमारी बधाई ||

    terahsatrah.blogspot.com

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