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सोमवार, 10 नवंबर 2014

सफेद दाग की सरकारी हर्बल दवा बिक्री के लिए उपलब्ध हुई

A traditional drug developed by the Defence Research and Development Organisation (DRDO) for treating vitiligo or leucoderma is now available for commercial sale in India. 

The herbal drug, called Lukoskin, was developed by scientists of the Defence Bio-Energy Research (DIBER) centre at Haldwani in Uttarakhand. DIBER transferred the technology for the drug, which is being showcased at the ongoing Arogya Expo 2014, to AIMIL Pharmaceuticals India for commercial production and sale. The drug, developed in 2011, is also on sale at the expo that is being held alongside the World Ayurveda Congress.

Dr Mohammad Junail of AIMIL said his company had signed an agreement with DRDO for the commercial launch of three herbal products. "Lukosin has been launched. The two other products will soon be commercially launched in Indian markets," he said. 

Leucoderma is generally considered an incurable skin condition but Lukosin has been extremely effective against it, DRDO scientists said. "The quest to cure leucoderma has finally ended with the development of the new herbal product with extensive studies by scientists of DIBER," said Dr W. Selvamurthy of DRDO. 

Worldwide incidence of leucoderma is reported to be 1 to 2 per cent. In India, it's around 4 to 5 per cent while in some parts of Rajasthan and Gujarat it is as high as 5 to 8 per cent. 

"This skin disorder is considered a social stigma in our country and people confuse it with leprosy. Affected individuals always remain in constant depression with the feeling of being socially outcast. There are many remedies for this disorder, such as allopathic, surgical and adjunctive.

None of the therapies satisfactorily cure this condition. Secondly, these are either costly or single component based, with very low level of efficacy. People develop blisters, edema or irritation of the skin, and as a result, most patients discontinue the treatment," said a senior official of DRDO. 

DIBER scientists focussed on the causes of leucoderma and came up with a comprehensive formulation for the management of the condition by using Himalayan herbs. Clinically, Lukoskin is quite effective and helps in restoring the normal complexion in the affected area. 

Indian medicinal plants are said to be rich in disease-curing properties. An ethno-botanical survey on medicinal plants used for leucoderma by Sugali tribes of Yerramalais forest in Kurnool district of Andhra Pradesh was carried out in 2011-2012. Twenty-one plant species were found to be used specifically to treat leucoderma. 

Similarly, the Allahabad University established the efficacy of traditional treatment of leucoderma by Kol tribes of Vindhya region of Uttar Pradesh during a study. The traditional treatment used the latex of a plant called Telosma pallid (Roxb) Craib and the study found that the application of the paste of the bark treated the condition to 90 per cent in six months(http://indiatoday.intoday.in/story/drdo-lukoskin-leucoderma-drug-vitiligo-diber/1/399955.html 10 नवम्बर,2014 से साभार)


नोटः आपकी त्वचा का रंग एक संयोग मात्र है।



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बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

पेशेवरों के लिए त्वचा की देखभाल

जरा रुककर सोचिए। लोग सबसे पहले आपके बारे में क्या नोट करते हैं? सबसे पहले आपका चेहरा ही लोगों की नजर में आता है। आप चाहे किसी भी प्रोफेशन में क्यों न हों, चाहे फ्रंट डेस्क पर हों या बेक स्टेज में लेकिन चेहरे की त्वचा को आप लंबे समय तक दूसरों से छिपा नहीं सकते। स्वस्थ एवं चमकदार त्वचा रोज की देखभाल से हासिल होती है। आइए,जानते हैं कि अलग-अलग प्रोफेशन में काम कर रहे लोगों को इसके लिए क्या करना चाहिए। 

कई प्रोफेशन ऐसे हैं जिसमें रोज धूप और धूल का सामना करना पड़ता है। त्चचा के छिद्रों में धूल जमा हो जाने के कारण वह "साँस" नहीं ले पाती। दूसरे व्यावसायिकों को अधिकतर घंटे ऑफिसेस के बंद कमरों में बिताना पड़ते हैं। इससे भले ही उनकी त्वचा धूल और धूप से बच जाती है लेकिन फिर भी देखभाल की जरूरत पड़ती ही है। 

रिपोर्टर 
मीडिया रिपोर्टिंग एक ऐसा काम है जिसमें तनाव पूर्ण परिस्थितियों एवं वातावरण में तेजी से घूम-फिरकर खबरें इकट्ठा करना होती हैं। डेड लाइन होने के कारण एक स्थान से दूसरे तक लगभग दौड़ते हुए आना जाना पड़ता है। ऐसे व्यावसायिकों को त्चचा की देखभाल करने के लिए पर्याप्त समय ही नहीं मिल पाता है। 

क्या करें 
चेहरे को साबुन से साफ करने की बजाए फेसवॉश से साफ करें। जेल फेसवॉश का चयन करें। रोज सनस्क्रीन एसपीएफ-२५) का प्रयोग करें। यदि चेहरे पर बहुत पसीना आता है तो इसे बार-बार धोएँ। यदि त्वचा बहुत ऑइली है तो सनस्क्रीन में केलामाइन लोशन मिला लें। लिक्विड फाउंडेशन का भी इस्तेमाल कर सकते है। मिनरल पावडर मेकअप अच्छा होता है क्योंकि इसमें ३० एसपीएफ ग्रेड की सनस्क्रीन भी होती है। त्वचा की सफाई के लिए टोनर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं क्योंकि इससे रोमछिद्र से धूल निकल जाती है और वे टाइट हो जाते हैं। हर तरह की त्वचा के लिए रोज रात को सोते समय मॉइश्चराइजिंग क्रीम लगाना जरूरी है। ऑइली स्किन के लिए लोशन का प्रयोग करें जबकि ड्राय स्किन के लिए क्रीम वापरें। बालों को रोज माइल्ड बेबी शैम्पू से साफ करें। शैंपू करने के बाद कंडीशनर भी लगाएँ। बालों की लंबाई कम करें। महीने में एक बार क्लीनअप या फेशियल जरूर कराएँ। 

बीपीओ, कॉल सेंटर 
इस तरह की जॉब प्रोफाइल नाइट शिफ्ट में काम करने की माँग करती है। इससे बायोलॉजिकल क्लॉक शिफ्ट हो जाती है। अंडर आई सर्कल, तनाव के कारण एक्ने, डेंड्रफ, बाल गिरना, हमेशा एअरकंडीशन्ड वातावरण में बैठने से त्वचा में रूखापन आना आम समस्याएं हैं। जागते रहने के लिए कर्मचारी धूम्रपान भी करने लगते हैं। इन लोगों की भोजन की आदतें भी अस्वास्थ्यकर हो जाती हैं। दिन में कभी भी नींद पूरी नहीं हो पाती है। तनाव और जंकफूड खाने के कारण हमेशा पेट खराब रहता है। मल पूरी तरह साफ नहीं हो पाता। इससे त्वचा पर विपरीत असर पड़ता है। 

क्या करें 
एक्ने और एक्ने स्कार से निपटने के लिए विटामिन-सी का हाई डोज़ नियमित रूप से लें। नींबू का सेवन रोज़ करें। रात को ड्यूटी के समय सनस्क्रीन और मॉइश्चराइजर ज़रूर लगाएं। काम पर रहते समय फ्रूट जूस ज़रूर लेते रहें। हर महीने क्लीनअप और फेशियल ज़रूर कराएं।

मार्केटिंग 
इस प्रोफेशन में दिन भर भागम-भाग लगी रहती है। टारगेट पूरा करने का तनाव होता ही है। प्रदूषण और धूप के कारण त्वचा क्षतिग्रस्त होती है। इसी के साथ बाल गिरने की भी समस्या होती है। 

क्या करें 
एसपीएफ-30 का सनस्क्रीन नियमित रूप से हर दो से तीन घंटों बाद लगा लें। धूप में बाहर निकलते समय सनग्लास,टोप या छतरी का प्रयोग करें। विटामिन-सी और एंटीऑक्सीडेंट्स की गोलियां नियमित रूप से लें। हीट स्ट्रोक और डीहाइड्रेशन की समस्या भी हो सकती है। इसलिए पेयजल लेना न भूलें। हाइपर एसिडिटी की वजह से रैशेज और त्वचा फटने की शिकायत हो सकती है। सुबह खाली पेट एसिडिटी की गोली चिकित्सक की सलाह से ली जा सकती है। ख़राब फूट वेअर से गोखरू(कॉर्न) हो जाते हैं। इनसे बचने के लिए अच्छी क्वालिटी के फुटवियर पहलें। कॉटन की पोशाकें पहनने की कोशिश करें। इससे स्किन रैशेज नहीं होंगे। हर हफ़्ते स्क्रब और एक्सफोलिएंट का प्रयोग करें ताकि त्वचा के नीचे की तैल ग्रंथियों की रूकावट दूर हो जाए। 

आईटी प्रोफेशनल्स 
इन लोगों को लंबे समय तक एअरकंडीशनर वातावरण में बिताना पड़ते हैं। इन्हें नियमित रूप से कुछ घंटों बाद माइश्चराइजर का इस्तेमाल करना चाहिए। तनावपूर्ण काम के कारण आँखों के नीचे काले घेरे पड़ने लगते हैं। बाल शुष्क होकर गिरने लगते हैं। त्वचा रूखी-सूखी हो जाती है। की बोर्ड के लगातार प्रयोग करने से नाखून टूटने लगते हैं। 

क्या करें 
नियमित रूप से त्वचा की देखभाल के लिए समय निकालें। अच्छे दर्जे का जेल फेस वॉश (ऑइली स्किन) तथा क्रीम फेसवॉश (ड्राय स्किन) वापरें। जिनकी त्वचा नॉर्मल या ड्राय है उन्हें टोनिंग नहीं करना चाहिए। अगर त्वचा बहुत शुष्क है तो एक चम्मच अलसी रोज लें। इवनिंग प्राइमरोज ऑइल १००० एमजी भी ले सकते हैं। इससे त्वचा को अंदर से माइश्चराइजर मिलेगा। रात को सोते समय कोजिक एसिड और विटामिन-सी का मिश्रण आँखों के नीचे लगाएं। इससे त्वचा टाइट होगी। कम्प्यूटर पर काम के दौरान हर एक घंटे बाद १० मिनट का ब्रेक लें। रात को सोते समय कोल्ड आई पैड्स या खीरे के स्लाइस लगाएँ। नाखूनों को छोटे रखें क्योंकि कीबोर्ड से टकराकर लंबे नाखून क्षतिग्रस्त होते हैं। सोते समय उंगलियों में ऑलिव ऑइल का मसाज करें। हर महीने क्लीनअप कराएं। पेट साफ रखें और कम से कम दो लीटर पानी दिन भर में जरूर पिएँ।

कॉरपोरेट,फ्रंट डेस्क 
इस तरह की जॉब में भारी मेकअप का इस्तेमाल करना पड़ता है। इसकी वजह से एक्ने, एक्ने स्कार, ब्लेक हैड्स, व्हाइट हैड्स आदि त्वचा संबंधी समस्याएं हो जाती हैं। नियमित रूप से त्वचा की साफ सफाई तथा अच्छी क्वालिटी का स्किन केअर प्रॉडक्ट वापरना लाजिमी हो जाता है। घंटों तक एसी में रहने के कारण पूरे शरीर में ड्रायनेस आ जाती है। हैवी सूट और टाई गर्म और नमीयुक्त वातावरण में तकलीफ दायक हो जाते हैं। जो लोग कार्पोरेट सीढ़ी की उँची पायदानों पर हैं उन्हें अक्सर हवाई जहाजों में भी सफर करना पड़ता है। एअर ट्रेवल पूरे शरीर की नमी सोख लेती है। 

क्या करें 
सोते समय मेकअप रिमूवर के जरिए रोज चेहरा साफ करें। फेसवॉश और टोनर का इस्तेमाल करें। एसपीएफ-१५ सनस्क्रीन लगाएँ। माइश्चराइजर के साथ एंटी रिंकल क्रीम भी लगाएँ। हर महीने रिजुविनेटिंग फेशियल जरूर कराएं(अप्रतिम गोयल,सेहत,नई दुनिया,अक्टूबर प्रथमांक 2012)।

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मंगलवार, 28 अगस्त 2012

कई रोगों का इलाज़ हो रहा है फोटोथैरेपी से

फोटोथैरेपी त्वचा संबंधी परेशानियों में लाभकारी हो सकती हैं। अब विशेषज्ञ रोशनी का उपयोग विभिन्न रोगों के इलाज के लिए कर रहे हैं। इन दिनों स्ट्रोक, मुँह की दुर्गंध और कैंसर जैसे रोगों के इलाज के लिए भी रोशनी को उपयोग में लिया जा रहा है। शुरूआत में त्वचा रोग विशेषज्ञ लाइट थैरेपी का उपयोग सोराइसिस के इलाज के लिए करते थे। इसके बाद सर्दी के मौसम में होने वाले सीज़नल डिप्रेशन के उपचार के लिए भी इसका उपयोग किया गया। अब विभिन्न तकलीफों में राहत के लिए लाइटथैरेपी का इस्तेमाल किया जा रहा है।

कमर दर्द 
कमर दर्द से निजाद दिलाने के लिए चिकित्सक नीली रोशनी का उपयोग कर रहे हैं। सफेद रोशनी के बिखरने पर इसके सात अलग-अलग रंगों को देखा जा सकता है। नीली रोशनी बहुत शक्तिशाली होती है, यह ऊतकों को नुकसान पहुँचााए बिना शरीर पर प्रभाव डालती है। इसीलिए इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के उपचार के लिए किया जा रहा है। युनिवर्सिटी हॉस्पिटल ऑफ हेडिल्बर्ग के चिकित्सकों ने नीली रोशनी उत्सर्जित करने वाला पैच विकसित किया है। इस पैच को दर्द की मदद से चिकित्सक दर्द का उपचार कर रहे हैं। 

यह पद्धति शुरूआती अध्ययनों पर आधारित है जिनमें यह सामने आया था कि रोशनी से शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड का उत्पादन बढ़ता है। नाइट्रिक ऑक्साइड माँसपेशियों के तनाव को दूर करता है। इससे रक्त धमनियाँ चौड़ी हो जाती है जिससे रक्त संचार बेहतर होता है। हेडिल्बर्ग में पैच पर अध्ययन जारी है, नई ट्रायल में १४ दिनों में पैच का उपयोग ५ बार किया जाएगा। मरीज़ों को इसे हर बार आधे घंटे के लिए लगाया जाएगा। अमेरिका में रोशनी के ज़रिए ओस्टियोआर्थ्राइटिस के कारण घुटने में होने वाले दर्द का इलाज खोजा जा रहा है। एक अन्य शोध से सामने आया कि कंधे का दर्द दूर करने के लिए फोटोथैरेपी असरदार है, वो भी बिना किसी दुष्प्रभाव के।  

पेट के छाले 
पेट के छालों के इलाज के लिए एक ऐसा उपकरण मददगार हो सकता है जिसके ज़रिए पेट के अंदर तक नीली रोशनी पहुँचाई जा सके। इस रोशनी के प्रभाव से अल्सर के लिए ज़िम्मेदार बैक्टीरिया नष्ट होने लगते हैं। यह तकनीक पेट के कैंसर के इलाज में भी फायदेमंद हो सकती है। अध्ययन बताते हैं कि प्रभावित हिस्से पर एक घंटे से भी कम समय के लिए यदि नीली रोशनी डाली जाए तो यह हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने के लिए पर्याप्त होती है। ख़ास बात यह है कि इससे बैक्टीरिया तो नष्ट हो जाता है लेकिन शरीर के स्वस्थ ऊतकों पर कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है। यह नया उपकरण हाल ही में विकसित किया गया है और इसपर शोध-अध्ययन व ट्रायल जारी हैं। अमेरिका में हुए शोध बताते हैं कि इस इलाज के बाद बैक्टीरिया की संख्या में ९१ प्रतिशत तक की कमी देखी गई है।

मिर्गी 
मिर्गी के उपचार के लिए फोटोथैरेपी को विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। जिन मरीज़ों को मिर्गी-रोधी दवाओं से ख़ास फायदा नहीं होता है, उनके लिए फोटोथैरेपी फायदेमंद साबित हो सकती है। युनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में हुई एक ट्रायल में मिर्गी के मऱीजों को तीन महीने तक रोज़ ३० मिनिट के लिए लाइट-बॉक्स से एक्सपोज़ किया गया। इस लाइट बॉक्स से तेज़ सफेद रौशनी निकलती है। मिर्गी का यह उपचार पहले हुए शोध-अध्ययनों पर आधारित है जिससे यह पता चलता है कि जिन दिनों में बादल छाए रहते हैं, तब मरीज़ों को मिर्गी के दौरे अधिक पड़ते हैं। जिन दिनों में तेज़ धूप निकलती है, तब मरीज़ों को कम दौरे पड़ते हैं। कुछ वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि तेज़ रोशनी के प्रभाव से विटामिन-डी और मेलाटोनिन आदि का स्तर बढ़ जाता है जिससे दिम़ाग में दौरों को नियंत्रित करने वाले रसायन स्त्रावित होने लगते हैं।

घाव  
मधुमेह रोगियों के पैरों में बने गंभीर घाव, अधिक दबाव पड़ने पर बनने वाले घाव व अन्य प्रकार के गंभीर घावों के इलाज के लिए लाइट थैरेपी असरकारी है। स्टॉकहोम में हुए इस शोध अध्ययन के अनुसार लाल रोशनी और इंफ्रारेड रोशनी के कॉम्बिनेशन से घाव तेज़ी से भरते हैं। इससे प्रेशर अल्सर ५४ प्रति तेज़ी से ठीक हो गए थे। प्रेशर अल्सर का ९० प्रतिशत हिस्सा केवल ५ हफ्तों में ही भर गया था। जिन मरीज़ों को लाइट थैरेपी नहीं दी गई थी, उनमें घाव भरने के लिए ९ हफ्तों का समय लगा था। 

मुँह की दुर्गंध  
जेरूसलम की हीब्रू युनिवर्सिटी के डेंटल स्कूल के अध्ययनकर्ताओं ने एक शोध में पाया कि नीली रोशनी से मुँह की दुर्गंध को कम किया जा सकता है। दंत चिकित्सक अक्सर दाँतो को सफेद बनाने के लिए इन पर दो मिनिट तक नीली रोशनी डालते हैं। नीली रोशनी न सिर्फ दाँतों को सफेद बनाती है बल्कि थूक में मौजूद दुर्गंधकारी बैक्टीरिया भी इससे ख़त्म होते हैं। इसीलिए अब इसे मुँह की दुर्गंध के इलाज के रूप में देखा जा रहा है। अध्ययनकर्ताओं ने थूक के ५० नमूनों पर शोध कर पाया कि इनपर नीली रोशनी डालने पर दुर्गंध काफी कम हो जाती है। उन्होंने पाया कि रोशनी डालने के बाद थूक के नमूनों में दुर्गंधकारी बैक्टीरिया की संख्या काफी कम हो गई थी। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने शोध अध्ययन में पायाका कि नीली रोशनी से मसूड़ों में बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया को ख़त्म किया जा सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह रोशनी मुंह में होने वाले पेरियोडोन्टिस नामक संक्रमण से बचाव और उपचार के लिए भी असरकारी हो सकती है। इस संक्रमण से दांत और हड्डियां क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। 

शोध प्रमुख डॉ. निकोस सूकोज के अनुसार,रोशनी डालने पर मुंह में मौजूद कई नुकसानकारी बैक्टीरिया कुछ सेकेंड्स में ही ख़त्म हो जाते हैं। रोशनी से बैक्टीरिया का सुरक्षा-कवच नष्ट हो जाता है जिससे ये नष्ट होने लगते हैं। 

कैंसर का इलाज़ 
लाइट के उपयोग से कैंसर के इलाज के लिए एक विशेष प्रकार के ट्रीटमेंट का उपयोग किया जा रहा है, इसे फोटो-डायनामिक थैरेपी कहा जाता है। इसका सबसे अधिक उपयोग त्वचा कैंसर के इलाज के लिए किया जाता है। इस ट्रीटमेंट में रौशनी के साथ ही एक विशेष प्रकार के ड्रग का इस्तेमाल किया जाता है। यह ड्रग कैंसर की असामान्य कोशिकाओं को रोशनी के प्रति संवेदशील बनाता है। कैंसर के मरीज़ों को दिए जाने वाले इस ड्रग की विशेषता यह है कि इसे केवल कैंसर की कोशिकाएँ ही अवशोषित करती हैं। 

इसके बाद मरीज़ के प्रभावित हिस्से पर नीली रोशनी डाली जाती है। रोशनी के प्रभाव में कैंसर कोशिकाओं द्वारा अवशोषित यह ड्रग एक विशेष प्रकार की ऑक्सीजन उत्सर्जित करने लगता है, जिससे कैंसर की कोशिकाएँ मरने लगती हैं। यह ट्रीटमेंट ट्यूमर को सिकोड़ने और नष्ट करने के लिए प्रभावी है। शरीर के भीतरी हिस्सों में मौजूद कैंसर के लिए ऑप्टिक फाइबर द्वारा रोशनी को शरीर के अंदरूनी हिस्सों में भेजा जा सकता है(सेहत,नई दुनिया,अगस्त,2012 द्वितीयांक)।

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गुरुवार, 23 अगस्त 2012

मानसून में पैरों को चाहिए ख़ास ख्याल

गर्म और उमस भरे मौसम की सबसे बड़ी समस्या पसीने की होती है। पैरों का एरिया ऐसा होता जहां कीटाणु पनपते हैं और बदबू का कारण बनते हैं। हानिकारक चीजें जो पसीने में छिपी होती हैं, को प्रतिदिन धोने से पसीने की बदबू दूर होती है और स्वच्छ-तरोताजा महसूस करते हैं। नहाने के दौरान पैरों पर खास ध्यान दें। पैरों को अच्छी तरह धोने के बाद अच्छी तरह पोंछ लें और फिर इन पर टेल्कम पाउडर छिड़कें । अगर आप बंद जूते पहनती हैं तो जूतों के अंदर भी टेल्कम पाउडर छिड़क सकती हैं। हालांकि गर्मियों में स्लीपर और ओपन सेंडल ही बेस्ट होते हैं क्योंकि इनसे पैरों को हवा मिलती रहती है और पसीना भी सूख जाता है । लेकिन खुले फुटवियर डस्ट को आकषिर्त करते हैं, जिससे पैरों का हाइजिन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाता है। गर्मी और उमस भरे मौसम में पैरों की आम समस्या आसानी से शुरू हो जाती है जिसे ‘एथलीट्स फुट’ कहते हैं क्योंकि यह सूखी त्वचा पर होती है। अगर इन्हें नजरअंदाज किया गया तो यह खुजली के साथ बड़ी समस्या बन सकता है। एथलीट्स फुट की शुरुआत फंगल इंफेक्शन के साथ होती है। इसलिए अगर पैरों में सूखापन नजर आए, खासकर पंजों के बीच खुजली के साथ तो आपको बिना देर किये डर्मेटोलॉजिस्ट से संपर्क करना चाहिए। 

इस समस्या से निबटने के लिए शुरुआती दौर में एंटी फंगल प्रिपरेशन फायदेमंद साबित होता है। हालांकि पसीने का कारण अत्यधिक मॉइश्चर, कसे जूते और उमस भरा मौसम बैक्टिरियल एक्टिविटी का कारण होता है और यह स्थिति को और ज्यादा खराब कर देता है। इसलिए मोजों को अवाइड करते हुए खुले जूते पहनें, टेल्कम पाउडर का प्रयोग करें और पैरों को जहां तक संभव हो पैरों को सूखा रखें। साप्ताहिक पैडिक्योर भी पैरों और नाखूनों को साफ रखने में सहायता करता है और फंगल इंफेक्शन से बचाता है, खासतौर से गर्म और उमस भरे मौसम में। 

होम पेडिक्योर 
-पॉलिश को रिमूव करने के बाद पैरों को एक चौथाई गुनगुने पानी से भरी बाल्टी में डुबोयें। इसमें आधा कप दरदरा नमक और 10 बूंदें नींबू या ऑरेंस एसेंशियल ऑयल (अगर आपके पास एसेंशियल ऑयल नहीं है तो आधा कप नींबू या ऑरेंज जूस का प्रयोग कर सकती हैं) मिलाएं। 

-अगर आपके पैरों की प्रवृत्ति अत्यधिक पसीने वाली है तो कुछ बूंदे टी ट्री ऑयल का प्रयोग करें क्योंकि इसमें जर्मिशियल प्रॉपर्टी पाई जाती है। यह दुर्गध से बचाती है। पैरों को 10 से 15 मिनट तक डुबो कर रखें। नाखूनों को ब्रश की सहायता से साफ करें। यह बहुत ज्यादा हार्ड नहीं होना चाहिए। 

-पैरों के किनारों और तालुओं पर प्यूमिक स्टोन का प्रयोग करें। आप चाहें तो पूरे पैरों पर रफ टॉवल या लूफा से स्क्रब कर सकती हैं। स्क्रबिंग से र्जम्स रिमूव होते हैं। जब यह हो जाए तो पैरों को साफ पानी से धो लें। फिर टॉवल की सहायता से अच्छी तरह पोंछ लें। 

-अगर आपके नाखूनों के कटिंग की आवश्यकता है तो नेल क्लिपर का प्रयोग करें। अंगूठे के नाखून को स्क्वायरली काटे। इन्हें स्मूद करने के लिए इमरी बोर्ड का प्रयोग करें। बढ़ते नाखूनों को बचाने के लिए गोलाई में काटने से बचे। नाखूनों के क्यूटिकल्स न काटें। इनमें क्रीम लगाएं और कॉटन बड की सहायता से पीछे की ओर धकेल दें। 

-पैरों और नाखूनों पर क्रीम लगाएं और त्वचा पर मसाज करें, यह क्यूटिकल्स पर भी काम करेगा। नाखूनों को साफ करने के लिए शार्प इंस्ट्रूमेंट्स का प्रयोग न करें। हील्स पर खास ध्यान दें, अगर आवश्यकता हो तो यहां ज्यादा क्रीम लगाएं। 

-मसाज के लिए नाखून से एड़ी तक अपर्वड स्ट्रोक का प्रयोग करें। फिर गीले तौलिये से पैरों को पोंछ लें और पैरों पर टेल्कम पाउडर लगाएं। 

-अगर आप पॉलिश लगाना चाहती हैं तो अंगुलियों के बीच में कॉटन वूल लगाएं। नाखून के बेस से नाखून के टिप्स तक नेल वार्निश के लंबे स्ट्रोक्स लगाएं। जब पहला कोट सूख जाए, तब कलर का दूसरा कोट लगाएं।


घरेलू उपाय : 
फुट लोशन : तीन टेबलस्पून ऑफ रोज वाटर, दो टेबलस्पून नींबू का रस और एक टीस्पून शुद्ध ग्लिसरीन को अच्छी तरह मिलाएं। इसे पैरों पर लगाएं और आधे घंटे के लिए छोड़ दें। 

कूलिंग फुट बाथ : गुलाब जल, नींबू का रस और यू डी कोलोन के छींटें ठंडे पानी में डालें और पैरों को इसमें डुबोयों। यह पैरों को साफ, ठंडा और बदबू से दूर करेगा। 

कूलिंग मसाज ऑयल : 100 एमएल ऑलिव ऑयल और दो ड्रॉप्स यूकोलिप्टस ऑयल, दो ड्रॉप्स रोजमेरी ऑयल और तीन ड्रॉप्स खस या रोस ऑयल लें। इन्हें एक साथ मिलाएं और एयर टाइट ग्लास जार में रखें। इसका थोड़ा भाग फुट मसाज के लिए प्रयोग करें। यह त्वचा को ठंडा और उसकी रक्षा करता है(आधी दुनिया,राष्ट्रीय सहारा,16.8.12)।

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मंगलवार, 21 अगस्त 2012

देसी नुस्खों से लाएं त्वचा में निखार

चेहरे पर जरा सा ध्यान मन में खूबसूरती का अहसास भर देता है। आपकी त्वचा का रोम-रोम हो प्यारा-प्यारा और छू लेने पर त्वचा लगे रेशम सी मुलायम। आप अपने रसोईघर की कुछ वस्तुओं का उपयोग करें और पायें साफ सुन्दर कोमल त्वचा। जरूरत है तो बस थोड़ा ध्यान देने की और उनका सही ढंग से इस्तेमाल करने की। 

-मलाई और सेब का रस मिलाकर चेहरे पर लगायें। 20 मिनट बाद पानी से धो डालें और पायें कोमल चेहरा। 

-मलाई,नीबू का रस, शहद बराबर मात्रा में लेकर चेहरे पर गर्दन व हाथों पर लगायें। सूखने पर रगड़कर निकालें। फिर पानी से धो डालें। पायें खूबसूरत व साफ त्वचा। 

-संतरे के सूखे छिलके के पाउडर में अंडा मिलाकर लगायें। चेहरा साफ तो होगा ही,साथ में मुंहासों से भी छुटकारा पायेंगे। 

-संतरे के छिलके के पाउडर में शहद,मलाई मिलाकर उबटन तैयार करें। त्वचा को साफ व सुन्दर बनाने में सहायक है। 

-संतरे के रस को जौ, मलका के पाउडर में मुलतानी मिट्टी मिलाकर पैक तैयार करें। 20मिनट बाद धो डालें। 

-मुलतानी मिट्टी,नीबू या संतरे का रस मिलाकर चेहरे पर लगायें। सूखने पर धो डालें और पायें साफ सुन्दर त्वचा। 

-मूली का रस चेहरे पर नियमित रूप से लगायें। झाइयां कम होंगी। 

-मूली का रस व मक्खन मिलाकर लगायें। झाइयां तो कम होंगी ही, साथ ही झुर्रियों से भी राहत पायेंगे। 

-मूली के रस में मलाई मिलाकर लगायें। ब्लीच का काम करेगा। 

-चेहरे पर क्रीम लगाते उसमें 3-4 बूंदें नीबू के रस की मिलाकर लगायें। इससे चेहरे की गंदगी तो निकलेगी ही, साथ में मुहांसों से बचाव होगा। 

-बेसन, अंडा, नीबू का रस मिलाकर लगायें। मुंहासों से राहत पायेंगे। साथ में त्वचा में कसाव भी आयेगा। 

-बेसन, अंडा,टमाटर का गूदा, मैदा मिलाकर चेहरे पर लगायें। चेहरा साफ होगा और आप पायेंगे खूबसूरत त्वचा। 

-खीरे का रस, नीबू का रस एक चुटकी हल्दी मिलाकर चेहरे पर लगायें। रंग साफ होगा व दागों से राहत पायेंगे।

-कच्चा दूध, हल्दी मिलाकर चेहरे पर लगायें। रंग साफ होगा।

-चंदन पाउडर, गुलाब जल व मुलतानी मिट्टी मिलाकर चेहरे पर लगायें। रंग साफ होगा। 

-चावल का आटा और जौ का आटा मिलाकर उसमें अंडे का पीला भाग डालकर चेहरे पर लगायें। पायें चेहरे पर नयी चमक। त्वचा में कसाव आयेगा। 

-जौ, मलका मसूर की दाल का पाउडर मिलाकर दो चुटकी मैदा मिलाकर उसमें संतरे का रस मिलाकर पैक तैयार करें और चेहरे पर लगायें। दाग धब्बे दूर होंगे व रंग साफ होगा। 

-जौ का आटा, चने का आटा, दूध पाउडर, खीरे के रस में मिलाकर चेहरे पर लगायें(नीतू सिंह,दैनिक ट्रिब्यून,30.8.12)।

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मंगलवार, 26 जून 2012

सनस्क्रीन : मिथ और सच्चाई

सनस्क्रीन कौन-सी यूज करें, कितनी अप्लाई करें, एसपीएपफ कितना हो, इस सब को लेकर कई तरह के कॉमन मिथ हैं। आइए,जानते हैं इनकी असलियत : 

मिथ: सनसेफ रहने के लिए ज्यादा से ज्यादा एसपीएफ वाली सनस्क्रीन यूज करनी होगी। 
फैक्ट: एसपीएफ यानी सन प्रोटेक्शन फैक्टर यूवीबी की प्रोटेक्शन होती है। यह यूवीबी आपको सनबर्न और स्किन कैंसर से प्रोटेक्ट करती है। दरअसल, इसकी जरूरत इंडिया जैसे देशों में नहीं है। सर गंगाराम अस्पताल के कंसलटेंट डर्मेटॉलजिस्ट डॉ. रोहित बतरा का कहना है कि एसपीएफ चाहे 18 हो या फिर 90, इससे तकरीबन 1 पर्सेंट का ही फर्क पड़ता है। ज्यादातर महिलाओं के लिए 25 से 30 एसपीएफ काफी है। 

इंडिया में हमें यूवीए प्रोटेक्शन चाहिए। यूवीए प्रोटेक्शन मौजूद है या नहीं, इसके लिए बूट स्टार रेटिंग देखना चाहिए। मैक्सिमम बूट स्टार रेटिंग फाइव होती है। जो मेडिकेटेड सनस्क्रीन होती है, उनमें यह रेटिंग मौजूद होती है। हालांकि कॉस्मेटिक कंपनियों के सनस्क्रीन के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। 

मिथ: क्लाउडी वेदर में सनस्क्रीन के बिना भी काम चल सकता है। 
फैक्ट: चाहे क्लाउडी वेदर हो या फिर विंटर सीजन हो, धूप की किरणें स्कैटर्ड होकर पहुंचती ही हैं। सच तो यह है कि अगर आप लाइट वाले कमरे में बैठे हैं, तो वहां भी यूवीए रेज पहुंच जाते हैं। गौरतलब है कि सूरज की 80 पर्सेंट यूवीए रेज क्लाउड्स को पार कर सकती हैं। 

मिथ: सनस्क्रीन जेल हो या क्रीम, बात एक ही है। 
फैक्ट : यह देखने की जरूरत है कि आपकी सनस्क्रीन आपकी स्किन टाइप को सूट करती है या नहीं। डॉ . बतरा का कहना है कि अगर आपकी स्किन ऑयली है तो आपको सनस्क्रीन जेल लगानी चाहिए। जबकि ड्राई स्किन के लिए सनसेफ क्रीम या लोशन अप्लाई करना चाहिए। वहीं , अगर स्विमिंग के लिए जा रहे हैं , तो वॉटरप्रूफ सनसेफ यूज करना होगा। 

मिथ : इन - बिल्ट एसपीएफ वाले मॉइश्चराइजर से फेस सेफ रहता है। 
फैक्ट : इन - बिल्ट मॉइश्चराइजर में अक्सर एसपीएफ तो होता है , लेकिन यूवीए प्रोटेक्शन नहीं होता। जाहिर है कि इससे आपको टैनिंग तो होगी ही। इस बारे टॉप सेलिंग मॉइश्चराइजर्स की एनालिसिस भी की गई। इस रिसर्च से यही सामने आया कि इनका कॉम्बिनेशन सनसेफ्टी के लिए अच्छी तरह काम नहीं कर पाता। एक्सपर्ट्स की मानें तो , आपकी सनस्क्रीन में फिजिकल और केमिकल दोनों इंग्रेडिएंट्स हों , इसका खयाल रखें। जिंक ऑक्साइड , टाइटैनियम डाइऑक्साइड जैसे कॉम्पोनेंट आपकी स्क्रिन के ऊपर मेटल की एक शीट बना देते हैं। और प्रोटेक्शन देते हैं। एवोबेंजीन जैसे केमिकल इंग्रेडिएंट भी हों , यह चेक करें। 

मिथ : जरा सी सनस्क्रीन लगाने से ही बात बन जाती है ।
फैक्ट : ऐसा नहीं है। डॉ . बतरा का कहना है कि प्रोटेक्शन सही मायनों में क्वांटिटी पर डिपेंड करता है। अगर आप क्रिकेटर्स को देखेंगे , तो पाएंगे कि उन्होंने इतनी सनस्क्रीन लगा रखी होती है कि एक वाइट फिल्म सी बन जाती है। अगर सही क्वांटिटी की बात करें , तो एक रुपये के क्वाइन जितनी क्वांटिटी फेस को चाहिए होती है। धूप में जाने से आधा घंटा पहले लगाएंगे , तब आपकी क्रीम काम करना शुरू करती है। 

मिथ : दिन में एक बार सनस्क्रीन अप्लाई करना काफी है 
फैक्ट : नहीं। आप चाहे कितनी भी एक्सपेंसिव सनब्लॉक यूज करजे हों , उसका असर एक से डेढ़ घंटे ही रहता है। डेढ़ - दो घंटे बाद इसे रिअप्लाई जरूर करें। बगैर फेस वॉश किए भी इसे रिअप्लाई किया जा सकता है। स्वेटिंग हो रही हो , तब भी सनस्क्रीन फिर से लगाएं। गौरतलब है कि ' वाटर - रेस्स्टिेंट ' कहलाने वाले सनस्क्रीन भी 40 मिनट के बाद इफेक्टिव नहीं रहते। 

मिथ : होठों को सनब्लॉक की जरूरत नहीं होती। 
फैक्ट : होठों को भी सनस्क्रीन चाहिए। क्योंकि यहां की स्किन भी सनरेज से डैमेज होती है। इसके लिए स्पेसिफिक सनस्क्रीन यूज करें। 

मिथ : सनस्क्रीन बॉडी के विटामिन डी मेकिंग एबिलिटी को ब्लॉक कर देती है। 
फैक्ट : कई लोग केवल इसलिए सनगार्ड यूज नहीं करते , क्योंकि उन्हें लगता है कि यह बॉडी के विटामिन डी डिवेलपमेंट को ब्लॉक कर देता है। क्योंकि इस प्रोसेस के लिए सन एक्सपोजर की जरूरत होती है। दरअसल , रोजाना की आउटडोर एक्टिविटीज में आपको खासा सन एक्सपोजर मिल जाता है। जैसे कि मॉनिंग वॉक। बता दें कि विटामिन डी प्रॉडक्शन में डाइट सप्लिमेंट्स का भी खासा रोल होता है। 

मिथ : अगर आप बचपन में बहुत सारा समय धूप में रह चुके हैं , तो आपकी स्किन पहले ही डैमेज हो चुकी है। अब सनब्लॉक से फायदा नहीं होगा। 
फैक्ट : ऑस्ट्रेलिया में हुई एक स्टडी बताती है कि 25 से लेकर 75 की उम्र वालों ने भी जब डेली सन प्रोटेक्शन यूज करना शुरू किया , तब इसका खासा असर पड़ा। ब्रिसबेन के क्वींसलैंड इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल रिसर्च के लीड राइटर एडले ग्रीन के मुताबिक , रूटीन सन - प्रोटेक्शन किसी भी उम्र में शुरू किया जा सकता है(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,19.6.12)।

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शनिवार, 16 जून 2012

आँखें बताती हैं त्वचा रोग का हाल

कहते हैं कि आँखे मन का झरोखा होती है। अब एक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि आँखों के रंग से कई गंभीर त्वचा रोगों का भी पता लगाया जा सकता है। 

शोध बताते हैं कि आँखों के रंग से मेलेनोमा (त्वचा का गंभीर कैंसर) होने की आशंकाओं का सतही अनुमान लगाया जा सकता है। इन दोनों ही बीमारियों के लिए आनुवांशिक कारण भी ज़िम्मेदार होते हैं। प्रायः देखा गया है कि नीली आँखों वाले लोगों को सफेद दाग़ होने की आशंका भूरी आँखों वालों की अपेक्षा कम होती है।

कोलाराडो युनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ मेडिसिन के ह्यूमन मेडिकल जेनेटिक्स एंड जेनोमिक्स प्रोग्राम के शोधकर्ता रिचर्ड स्प्रिट्ज़ के मुताबिक सफेद दाग़ और मेलेनोमा दोनों एक-दूसरे के ठीक विपरीत हैं। आनुवांशिक परिवर्तनों के कारण मेलेनोमा से पीड़ित व्यक्ति को सफेद दाग़ और सफेद दाग़ से पीड़ित व्यक्ति को मेलेनोमा होने की आशंका कम होती है। सफेद दाग़ एक ऑटोइम्यून डिसीज़ है जिसमें मरीज़ की प्रतिरक्षा प्रणाली सामान्य पिगमेंट कोशिकाओं पर आक्रमण करने लगती है। इसी वजह से त्वचा पर अलग-अलग स्थानों पर सफेद दाग़ उभरने लगते हैं। सफेद दाग़ से पीड़ित मरीजों में कई और ऑटोइम्यून डिसीज़ जैसे थॉयराइड, टाईप १ डाइबीटिज़, रूमेटॉइड आर्थ्राइटिस आदि की आशंका भी सर्वाधिक होती है। मेलेनोमा एक गंभीर प्रकार का त्वचा का कैंसर है। नेचर जेनेटिक्स में प्रकाशित शोध के अनुसार शोधकर्ताओं ने सफेद दाग़ से पीड़ित ४५० लोगों में मौजूद जीन की तुलना ३२०० ऐसे अमेरिकी लोगों से की जिनके पूर्वज यूरोपियन मूल के नहीं थे। 

परिणामों में १३ ऐसे नए जीन सामने आए जो लोगों में सफेद दाग़ के जोखिम बढ़ाते हैं। शोध से यह भी पता चला कि नीली और स्लेटी रंग की आंख वालों में भूरी आंख वालों की अपेक्षा सफेद दाग की आशंका अधिक होती है। 

शोध में टैन या भूरी आंख वाले 43 प्रतिशत लोगों की तुलना में,27 प्रतिशत यूरोपीय मूल के अमरीकी लोगों से की गई। इसी तरह,हरी या हेजेल आंख वाले 30 प्रतिशत लोगों की तुलना 22 प्रतिशत यूरोपीय मूल के अमरीकी लोगों से की गई। 

शोध में यह भी सामने आया कि जिन लोगों में प्रतिरोधक प्रणाली के असामान्य रूप से कार्य करने की शिकायत होती है,उनमें मेलेनोमा होने का जोखिम घट जाता है। प्रतिरोधक तंत्र का असामान्य रूप से कार्य करना सफेद दाग से जुड़ा है। 

यानी,सफेद दाग से प्रभावित किसी भी व्यक्ति में मेलेनोमा की आशंका स्वतः कम हो जाती है। एक ही व्यक्ति के सफेद दाग और मेलेनोमा- दोनों बीमारियों से पीड़ित होने के मामले बेहद दुर्लभ होते हैं। दोनों बीमारियों के कारण एक-दूसरे से बिल्कुल उलट हैं(सेहत,नई दुनिया,जून द्वितीयांक 2012)

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रविवार, 3 जून 2012

सफेद दाग एक कॉस्मेटिक समस्या है,बीमारी नहीं

सफेद दाग को लेकर लोगों के मन में तरह-तरह की गलत धारणाएं हैं। सचाई यह है कि हमें-आपको यह बेशक कोई बीमारी लगती हो, डॉक्टरों की निगाह में महज कॉस्मेटिक प्रॉब्लम है। ऐसे में आप अपने मन से दाग निकालिए क्योंकि सफेद दाग वाला शख्स पूरी तरह नॉर्मल है। आइए,जानते हैं सफेद दाग को बढ़ने से रोकने और ठीक करने के लिए विशेषज्ञों के सुझावः 

क्या है सफेद दाग? 
-एक ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर है। ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) उलटा असर यानी शरीर को ही नुकसान पहुंचाने लगती है। 

-सफेद दाग के मामले में खराब इम्यूनिटी की वजह से शरीर में स्किन का रंग बनाने वाली कोशिकाएं मेलानोसाइट(melanocyte)मरने लगती हैं। इससे शरीर में जगह-जगह उजले धब्बे बन जाते हैं। 

-सफेद दाग को वीटिलिगो, ल्यूकोडर्मा, फुलेरी और श्वेत पात नाम से भी जाना जाता है। 

कितने तरह के सफेद दाग 
शरीर में फैलाव के आधार पर सफेद दाग को नीचे लिखी कैटगरी में बांटा जा सकता है: 

-लिप-टिप: होठों और हाथों के ऊपर 

-फोकल: शरीर में एक-दो जगह पर छोटे-छोटे सफेद दाग 

-सेग्मेंटल: एक पूरे हिस्से में, मिसाल के लिए पूरे हाथ या पांव में सफेद दाग होना 

-जनरलाइज्ड: शरीर के कई हिस्सों में सफेद दाग का फैलना 

क्या हैं लक्षण? 
-जब स्किन का रंग हल्का पड़ना शुरू हो जाए और उस हिस्से के बाल भी सफेद होना शुरू हो जाएं तो समझिए कि यह सफेद दाग है। 

-अगर एक जगह पहले से ही सफेद दाग बन गया हो और उसके बाद कहीं चोट, खरोंच या ठोकर लगती है और वह जगह भी सफेद होने लगे तो मान लेना चाहिए कि सफेद दाग शरीर में तेजी से फैल रहा है। 

-इन सफेद दागों के ऊपर कोई खुजली, दर्द और स्राव (सेक्रिशन) नहीं होता और संवेदनशीलता भी सामान्य रहती है। हालांकि पसीने और ज्यादा गर्मी से जलन पैदा हो सकती है। 

-अगर सफेद दाग बनें, पर उस एरिया की स्किन के बाल काले रहें तो उस स्टेज में इलाज की गुंजाइश ज्यादा और जल्दी होती है। 

इलाज है मुमकिन 
-सफेद दाग न फैले इसके लिए आमतौर पर तीन दवाएं दी जाती हैं: मिनी स्टेरॉयड पल्स(mini steroid pulse), लिवामिसोल(levamisole), एजोरान (Azoran)। मिनी स्टेरॉयड पल्स से हालांकि कई बार वजन बढ़ जाता है। 

-स्किन का रंग वापस लाने के लिए बाबची सीड्स (babchi seeds-8 methody psoralence), एपिफरमल फाइब्रोकास्ट ग्रोथ फैक्टर (epiphermal fibroblast growth factor), कैल्सिन्युरिन इन्हिबिटर ऑइंटमेंट (calcineurin inhibitor ointment), वीक कॉर्टिको स्टेरॉयड क्रीम (weak cortico steroid cream), ऑर्गन प्लैसेंटल एक्सट्रैक्ट क्रीम (organ placental extract cream)। 

-फोटो थेरपी का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। इसके तहत सूर्य की किरणों UVA और नैरोबैंड UVB का इस्तेमाल स्किन का रंग फिर से सामान्य बनाने के लिए किया जाता है। इस थेरपी का साइड इफेक्ट यह है कि इसे करते हुए सावधानी न बरती जाए तो स्किन काली पड़ सकती है। 

-यूं यह बीमारी 1000-1500 रुपए महीने के खर्च के हिसाब से ठीक की जा सकती है। ठीक होने में कितना समय लगेगा, यह इस पर निर्भर करता है कि शरीर का कितना भाग प्रभावित है? 

-यह अहम है कि सफेद दाग के असर में आने के बाद कोई शख्स कितनी जल्दी सफेद दाग एक्सपर्ट के पास ट्रीटमेंट के लिए पहुंचता है। लेकिन ऐसा देखा गया है कि अमूमन लोग डॉक्टर के पास तब जाते हैं, जब उनकी शादी-ब्याह की बात चलती है और सफेद दाग की वजह से उनके रिश्ते में अड़चन आती है। सचाई यह है कि जितनी देर से कोई शख्स डॉक्टर के पास जाएगा, इलाज में उतनी ही दिक्कत और देरी होगी। 

नोट: इलाज के दौरान यह बात अहम है कि डॉक्टर सफेद दाग होने के कारण के बारे में पता करे। मिसाल के तौर पर अगर यह ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर की वजह से हुआ है तो उस डिसऑर्डर के बेहतर इलाज पर सफेद दाग का इलाज निर्भर करेगा। 

गलतफहमियां और तथ्य 
-यह कैंसरस नहीं है और न ही इसमें जान का कोई खतरा है। 

-सफेद दाग का कोढ़ (लेप्रसी) से भी कोई लेना-देना नहीं है। 

-कुछ लोग इसे सोराइसिस(Psoraisis) भी समझ लेते हैं, जिसमें स्किन पर धब्बे तो बनते हैं, लेकिन वे उजले नहीं, लाल धब्बे होते हैं। इन धब्बों पर सफेद रंग के बुरादे के रूप में जैसे डैंड्रफ झड़ता है, वैसे ही निशान बन जाते हैं। इसलिए लोगों को लगता है कि उन्हें सफेद दाग हो गया है। सोराइसिस और सफेद दाग अलग हैं। 

-कुछ लोगों का शरीर पूरा का पूरा उजला होता है। उसकी वजह यह होती है कि उनके शरीर में रंग बनाने वाले कण (मेलानोसाइट) जन्म से ही पूरी तरह नहीं पाए जाते। ऐसे लोगों को एल्बीनो और उनकी बीमारी को एल्बीनिज्म कहा जाता है। यह बीमारी वंशानुगत और लाइलाज है। 

नोट: सफेद दाग साफ लफ्जों में कहें तो हमारे-आपके नजरिए की बीमारी ज्यादा है, क्योंकि शरीर के स्किन के कुछ हिस्से के सफेद हो जाने से न तो उस शख्स की काम करने की क्षमता पर असर पड़ता है और न ही किसी और तरह की दिक्कत पेश आती है। सफेद दाग से प्रभावित शख्स किसी भी आम इंसान की तरह ही है।

क्यों होता है सफेद दाग? 
सफेद दाग अलग-अलग लोगों में अलग-अलग वजहों से हो सकता है: 

-कुछ लोगों में यह सफेद दाग से पीड़ित पैरंट्स से हो सकता है। हालांकि ऐसे मामले 2 से 4 फीसदी ही होते हैं। 

-बच्चों में यह ज्यादातर क्रॉनिक इन्फेक्शन की वजह से यानी लगातार गला खराब होने, पेट खराब होने और अनीमिया की वजह से होता है। इन बीमारियों के इलाज के लिए दी जाने वाली दवाओं से बॉडी की इम्यूनिटी प्रभावित होती है और ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर पैदा होता है। 

-बड़े लोगों में ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर की वजह से थाइरॉयड की समस्या पैदा हो सकती है, जिससे सफेद दाग होने की आशंका रहती है। 

-एलोपेशिया एरियाटा (alopecia areata) भी एक ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर है, जिसमें सिक्के के रूप में शरीर से बाल जाने लगते हैं। यह भी सफेद दाग की वजह बन सकता है। 

-कुछ मामलों में सफेद दाग मस्से या बर्थ मार्क (halo nevus) की वजह से हो सकता है। मस्सा या बर्थ मार्क बच्चे के बड़े होने के साथ-साथ आसपास की स्किन का रंग खाना शुरू कर देता है। शरीर के एक हिस्से में शुरू होकर यह दूसरे हिस्से पर भी फैल सकता है। 20-30 फीसदी लोगों को सफेद दाग इसी तरह होता है। 

-इसके अलावा केमिकल ल्यूकोडर्मा (chemical leucoderma) भी हो सकता है, खास तौर से उन औरतों में, जो चिपकाने वाली बिंदी का लगातार इस्तेमाल करती हैं। इससे चेहरे पर सफेद दाग होने का खतरा रहता है। दरअसल, खराब क्वॉलिटी की बिंदी में मोनोबंजाइल ईस्टर्स ऑफ हाइड्रोक्यूनोन (monobenzyl esters of hydroquinone) पदार्थ पाया जाता है, जिससे सफेद दाग होता है, इसलिए अच्छी क्वॉलिटी की बिंदी ही लगाएं। इसी तरह हवाई या प्लास्टिक की खराब क्वॉलिटी की चप्पलों से भी पैरों पर सफेद दाग हो सकता है। 

-ज्यादा केमिकल एक्सपोजर यानी प्लास्टिक, रबर या केमिकल फैक्ट्री में काम करने वाले लोगों को सफेद दाग हो सकता है। कीमोथेरपी कराने वाले लोगों में भी सफेद दाग होने की आशंका रहती है। 

जान लें 
-छूने से नहीं फैलता सफेद दाग। 

-चूमने या शारीरिक संबंध बनाने से भी नहीं फैलता। 

-प्राइवेट पार्ट पर सफेद दाग हो तो न तो सेक्सुअल प्लेजर में कमी आती है और न ही पार्टनर को यह बीमारी होती है। 

-खट्टी चीजें ज्यादा खाने या मछली खाने के बाद दूध पीने से सफेद दाग होने की बात को मॉर्डन साइंस गलत और मनगढंत मानता है। 

-सफेद दाग हैं तो तेज केमिकल वाले साबुन और डिटर्जेंट के इस्तेमाल से बचें। साथ ही पर्फ्यूम, डियोड्रंट, हेयर डाई, पेस्टीसाइड को शरीर को सीधे संपर्क में आने से बचाएं। तेज केमिकल एक्सपोजर से सफेद दाग फैलता है। 

झूठे दावों से बचें 
-सफेद दाग का हल्का-सा भी शक हो तो बिना नीम-हकीमी में पड़े किसी सफेद दाग के एक्सपर्ट (वीटिलिगो एक्सपर्ट) से मिलें। सफेद दाग से शर्तिया छुटकारा दिलाने वाले अलीगढ़ से लेकर दिल्ली तक दीवारों पर लिखे तमाम दावे फर्जी हैं। जितनी जल्दी किसी सफेद दाग के एक्सपर्ट के पास जाएंगे, उतनी जल्दी इससे छुटकारा मिलेगा। 

एक्सपर्ट कौन 
वीटिलिगो एक्सपर्ट भी डर्मटॉलजिस्ट या स्किन स्पेशलिस्ट ही होते हैं, लेकिन उनका सफेद दाग के इलाज करने का अनुभव सामान्य स्किन की बीमारियों को ठीक करने वाले डर्मटॉलजिस्ट की तुलना में कहीं ज्यादा होता है और वे मरीज की दिक्कतों का ज्यादा सही आकलन कर पाते हैं। 

माइकल जैक्सन को भी थे सफेद दाग अगर आपको लगता है कि सफेद दाग होने पर निराशा के अलावा कुछ नहीं बचता तो पॉप म्यूजिक के शहंशाह रहे माइकल जैक्सन का उदाहरण आपके सामने है। जी हां, दुनिया पर राज करने वाले माइकल जैक्सन भी इस समस्या से पीड़ित थे। लेकिन इससे उनका मनोबल कम नहीं हुआ और वह पूरी दुनिया पर छा गए। 

जानें नई तकनीकों को 
सफेद दाग के लिए आजकल कुछ नई तकनीकों का इस्तेमाल भी किया जाता है। ये तकनीक हैं: 

सक्शन ब्लिस्टर एपिडरमल ग्राफ्टिंग (Suction blister epidermal grafting) 

-इसमें सफेद दाग से प्रभावित शरीर के छोटे हिस्से को कवर किया जाता है। 

-स्किन को वैक्यूम के जरिए दो भाग में अलग करके जहां सफेद दाग है, वहां ऊपरी भाग को रखा जाता है। 

-ऊपरी भाग के जो रंग बनाने वाले कण (मेलानोसाइट्स) हैं, वे सफेद दाग स्किन के अंदर जाकर सामान्य रंग ले आते हैं। 

मेलानोसाइट इपिडरमल सेल सस्पेंशन (Melanocyte epidermal cell suspension) 
-इसमें बिना किसी टांके-चीरा के सफेद दाग से प्रभावित बड़े हिस्से को कवर किया जाता है। 

-शरीर से सामान्य स्किन के एक छोटे-से टुकड़े को लेकर उसके रंग बनाने वाले कणों को अलग करके उसे तरल पदार्थ में तब्दील किया जाता है। 

-जहां सफेद दाग है, वहां इस लिक्विड को लगा दिया जाता है। इससे सामान्य रंग वापस लौट आता है।

मिलानोसाइट कल्चर (Melanocyte culture) 

-इसके तहत सामान्य स्किन की बायॉप्सी कर उसके एक बहुत छोटे टुकड़े को स्पेशलाइज्ड लैब में कल्चर किया जाता है और उसे सफेद दाग वाली स्किन पर लगाया जाता है। 

प्लैटलेट रिच प्लाज्मा (Platelet rich plasma) 
-इसके तहत शरीर के अंदर ब्लड से प्लाज्मा निकाल कर उसे ट्रीट किया जाता है। इसके बाद शरीर के जिस हिस्से पर सफेद दाग है, वहां इसे इंजेक्ट किया जाता है। 

-दरअसल, प्लाज्मा में स्टेम सेल्स होते हैं, जिससे हमारे शरीर के बाकी सेल्स बनते हैं। ट्रीट किए हुए प्लाज्मा को सफेद दाग प्रभावित हिस्से में इंजेक्ट करने से स्किन का रंग बनाने वाली कोशिकाओं के नए सिरे से बनने की संभावना बढ़ जाती है। 

-यह सबसे लेटेस्ट तकनीक है और इसके अच्छे रिजल्ट आ रहे हैं। इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं है।

असरदार हैं ये तकनीकें 
-इन तकनीकों के जरिए सफेद दाग पर काबू बहुत कामयाबी से पाया जा सकता है। वहां भी, जहां चमड़ी के नीचे मांस के बिना हड्डियां होती हैं और दवाइयों का असर कम होता है (मसलन उंगलियों पर), ऐसी जगहों पर सफेद दाग पनपने पर उसे दूर करने के लिए यह तकनीक और भी कारगर है। 

-लेकिन इन तकनीकों का फायदा तभी होता है, जब डॉक्टर ऊपर के इलाज यानी दवाइयों और थेरपी के जरिए सफेद दाग को फैलने से रोक लें। दवाइयों के जरिए सफेद दाग को बढ़ने से रोकने में करीब साल भर लग सकता है, इसलिए नई तकनीक से इलाज की शुरुआत के लिए एक साल का यह वक्त बहुत अहम है। 

-इन तकनीकों की खास बात यह है कि इनमें कोई टांका नहीं लगता, न ही डायरेक्ट स्किन ग्राफ्टिंग की जाती है। ये सफेद दाग से प्रभावित शरीर के बड़े हिस्से को भी कम वक्त में कवर कर सकती हैं। 

ध्यान दें 
-इन तमाम ट्रीटमेंट के दौरान डॉक्टर सफेद दाग से प्रभावित शख्स का रूटीन ब्लड टेस्ट करवाते रहते हैं। इसका मकसद यह जानना होता है कि किसी भी ट्रीटमेंट का शरीर पर साइड इफेक्ट तो नहीं हो रहा। यह टेस्ट महीने में एक बार कर लिया जाना चाहिए। 

- अगर किसी शख्स के शरीर के सिर्फ कुछ हिस्से ही नॉर्मल स्किन कलर के रह जाते हैं तो डॉक्टर की सलाह होती है कि पूरे शरीर को वाइट बना दें। अमूमन ऐसा तब किया जाता है, जब सफेद दाग 60 फीसदी से ज्यादा फैल चुका हो। इस स्टेज में नॉर्मल स्किन कलर लौट आने की गुंजाइश कम ही होती है। स्किन को वाइट करने के लिए मोनोबेंजाइल ईस्टर्स ऑफ हाइड्रोक्यूनोन(Monobenzyl esters of hydroquinone) पदार्थ का ही इस्तेमाल किया जाता है, जिससे शरीर में सफेद दाग पनपता है। 

-ऐसा मुमकिन है कि एक बार दवाओं से ठीक होने के बावजूद एक से डेढ़ साल के भीतर सफेद दाग फिर से पनप जाए। लेकिन अगर डेढ़ साल तक सफेद दाग नहीं लौटे तो बहुत हद तक आप इत्मीनान रख सकते हैं कि आपको इनसे छुटकारा मिल गया है। 

-एक बार अगर आप सफेद दाग से छुटकारा पा गए हैं तो यह मान लेना सही नहीं है कि आपकी आनेवाली पीढ़ी को भी इससे छुटकारा मिल गया है। सच तो यह है कि आप अपने जींस(genes) से नहीं लड़ सकते। यही वजह है कि भाई-बहनों में कुछ लोग सफेद दाग से प्रभावित होते हैं, कुछ नहीं। जिनेटिक कारणों से एक या एक से ज्यादा बच्चों को भी उनके पैरंट्स के जरिए सफेद दाग हो सकता है। 

इससे बचें 

प्लास्टिक सर्जरी 
-सफेद दाग को ठीक करने के लिए पहले प्लास्टिक सर्जरी की जाती थी। 

-इसमें स्किन के मिस-मैच होने की आशंका ज्यादा रहती थी। साथ ही, टांकों के निशान रह जाते थे। 

-अगर सफेद दाग से शरीर का ज्यादा बड़ा हिस्सा प्रभावित है, तो प्लास्टिक सर्जरी के जरिए उतने बड़े हिस्से को ट्रीट करना नामुमकिन है। 

-यही वजह है कि प्लास्टिक सर्जरी को आजकल डॉक्टर तवज्जो नहीं देते। 

कलर 
कुछ लोग फौरी तौर पर स्किन कलर भी लगाते हैं। इससे कुछ घंटों के लिए सफेद दाग छिप तो जाते हैं, लेकिन स्किन के पोर्स (छेद) भर जाते हैं। पोर्स बंद होने से मेडिकली सफेद दाग का इलाज करने में दिक्कत आती है। 

टैटूज 
कुछ लोग सफेद दाग पर टैटू बनवाते हैं। टैटू बनवाना अपने आप में बहुत तकलीफदेह प्रॉसेस है। इससे सफेद दाग के आसपास के हिस्से में फैलने की आशंका भी बढ़ जाती है। 

आयुर्वेद 
-आयुर्वेद मानता है कि सफेद दाग उन बीमारियों में से है, जिनके होने के कारणों के बारे अब भी बहुत कुछ पता नहीं किया जा सका है। 

-देश की रक्षा अनुसंधान विकास संस्थान(DRDO) ने सफेद दाग के निदान के लिए आयुर्वेद में रिसर्च को बढ़ावा दिया, जिसका नतीजा है ल्यूकोस्किन (lokoskin)। 

-ल्यूकोस्किन को तैयार करने में जिन जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया जाता है, वे हैं: विषनाग, बाकुची, कौंच, मंडूकपणीर्, अर्क और एलोविरा। 

-ल्यूकोस्किन ओरल लिक्विड और ऑइन्टमेंट, दोनों रूप में मौजूद है। ओरल लिक्विड का फायदा यह है कि इससे नए सफेद दाग नहीं बनते, शरीर की इम्यूनिटी बढ़ती है और स्ट्रेस में कमी आती है, जबकि ऑइन्टमेंट से मौजूदा सफेद दाग ठीक होते हैं। 

-ल्यूकोस्किन के अच्छे नतीजे तीन महीने में दिखने लगते हैं, जबकि पूरी तरह ठीक होने में दो साल तक का वक्त लग सकता है। 

-लिक्विड और ऑइन्टमेंट पर एक महीने का खर्च करीब 700 रुपए बैठता है। 

हिदायतें 
आयुर्वेद मानता है कि सफेद दाग का ठीक होना इस बात पर बहुत हद तक निर्भर करता है कि आप कुछ जरूरी हिदायतों और खान-पान को लेकर सतर्क रहें। आइए जानें कि क्या हैं हिदायतें, जिनसे आप फायदा पा सकते हैं: 

क्या करें  

-तांबे के बर्तन में पानी को 8 घंटे रखने के बाद पीएं। 

-हरी पत्तेदार सब्जियां, गाजर, लौकी, सोयाबीन, दालें ज्यादा खाएं। 

 -पेट में कीड़ा न हो, लीवर दुरुस्त काम करे, इसकी जांच कराएं और डॉक्टर की सलाह के मुताबिक दवा लें। 

 -30 से 50 ग्राम भीगे हुए काले चने और 3 से 4 बादाम हर रोज खाएं। 

 -ताजा गिलोय या एलोविरा जूस पीएं। इससे इम्यूनिटी बढ़ती है। 

क्या न करें  

-खट्टी चीजें जैस नीबू, संतरा, आम, अंगूर, टमाटर, आंवला, अचार, दही, लस्सी, मिर्च, मैदा, उड़द दाल न खाएं। 

-मांसाहार और फास्ट फूड कम खाएं। 

 -सॉफ्ट डिंक्स के सेवन से बचें। 

-तेज केमिकल वाले साबुन और डिटर्जेंट का इस्तेमाल न करें। 

-पर्फ्यूम, डियोड्रेंट, हेयर डाई, पेस्टिसाइड को शरीर को सीधे संपर्क में आने से बचाएं। 

-नमक, मूली और मांस के साथ दूध न पीएं। 

होम्योपैथी  
-एक बार सफेद दाग होने पर इसके फैलने की आशंका बनी रहती है। होम्योपैथी इसलिए इसके सिस्टमैटिक इलाज पर जोर देती है यानी इलाज सही कारण के आधार पर हो और पूरा हो। 

-जान लेना जरूरी है कि इलाज में अमूमन 2 से 3 साल तक का समय लगता है और होम्योपैथी से 100 में से 70 मामलों में सफेद दाग ठीक होते पाया गया है। 

क्या है इलाज 
अगर सफेद दाग ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर की वजह से हुआ है तो शरीर के बीमारी से लड़ने की क्षमता को बढ़ाकर इलाज शुरू किया जाता है। ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर के कई कारणों में से एक स्ट्रेस और इमोशनल सेट बैक भी हो सकता है। इसके लिए जो दवाइयां दी जाती हैं, वे हैं: 

1. इग्नेशिया-30 (Ignatia-30) 
2. नेट्रम म्यूर-30 (Natrum mur-30) 
3. पल्सेटिल्ला-30 (Pulsatilla-30) 
4. नक्स वॉमिका-30(Nux vomica-30) (खासतौर से स्ट्रेस की वजह से सफेद दाग पनपने पर) 

अगर केमिकल एक्सपोजर से सफेद दाग हुआ है तो ये दवाइयां दी जाती हैं: 
1. सल्फर-30 (Sulphur-30) 
2. आर्सेनिक एल्बम-30(Arsenic album-30) 

अगर यह जिनेटिक कारणों से है तो सिफलिनम-200 (Syphllinum-200) कारगर है। 
-आर्सेनिक सल्फ फ्लेवम-6(Arsenic sulph Flevum-6) ऐसी दवा है, जिसे किसी भी कारण से सफेद दाग होने पर दिया जा सकता है(अनुराग वत्स,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,6 मई,2012)।


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रविवार, 13 मई 2012

सुंदर दिखने की चाहत और आंतरिक दमक

सुंदर दिखने की चाहत को पूरा करने के लिए क्या-क्या नहीं किया जाता। शादी से पहले कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट कराने की बात कुछ दशक पहले तक विज्ञान कथाओं की फंतासी जैसी लगती थीं। अब ऐसा नहीं है। आधुनिक सौंदर्य चिकित्सा विज्ञान की कई नई खोजें अब देश में इलाज के तौर पर उपलब्ध हैं। चेहरे के छोटे से छोटे दाग़ या धब्बे को अब आसानी से हटाया जा सकता है। कोई यह नहीं जान पाता है कि रिसेप्शन के मौके पर मुस्कुराकर दोस्तों और रिश्तेदारों का स्वागत करने वाले इस दंपति ने चेहरे की दमक हासिल करने के लिए कौन सा कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट लिया है। चेहरे को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए किए जा रहे इस तरह के उपचार की अपनी सीमाएँ हैं और परिणाम भी मिले-जुले होते हैं। किसी ज़माने में शादी से पहले देशी उबटन और लेप लगाना ही पर्याप्त होता था। कुछ वर्षों पहले तक दूल्हे और दुल्हनों के फेशियल, पेडिक्योर और मेनिक्योर से ही काम चल जाता था। आज पूरे शरीर के लिए सौंदर्य वृद्धि के संसाधन मौजूद हैं(संपादकीय,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल चतुर्थांक 2012)।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जो व्यक्ति स्वस्थ होता है वह स्वाभाविक तौर पर सुंदर दिखता है। आंतरिक सौंदर्य की दमक चेहरे से झलकती है। ऊपरी तौर पर कराए गए किसी भी उपचार का असर स्थाई नहीं होता। योग, ध्यान, साधना नाड़ी एवं रक्तशुद्धि के लिए की गई क्रियाएँ दीर्घकालीन स्वास्थ का रास्ता साफ करती हैं। कांतिवान चेहरा भरपूर नींद और स्वस्थ पाचन क्रिया की पहचान है। सौंदर्य प्रसाधन एवं सुंदरता बढ़ाने के लिए कराए गए उपचार से कुछ देर तक काम चलाया जा सकता है लेकिन दीर्घकालीन नतीजे संपूर्ण स्वास्थ से ही हासिल किए जा सकते हैं। 

शादियों का मौसम फिर लौट आया है। किसी भी युवा के जीवन में शादी की तैयारियों के दिन बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। सगाई से लेकर रिसेप्शन और बाद में मुंह दिखाई तक सभी रिश्तेदारों और दोस्तों की नज़रें भावी जोड़े पर ही टिकी रहती हैं। रस्मों रिवाज़ भले ही एक या दो दिन में निपट जाएँ लेकिन इस दौरान लिए गए फोटोग्राफ्स जीवन भर के लिए होते हैं, परिवार के लिए इतिहास बन जाते हैं। इसीलिए दूल्हों और दुल्हनों में कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं। 

किसी ज़माने में भाभियाँ या बड़ी बहनें दुल्हन को सुंदर दिखने की टिप्स दिया करती थीं। अब टिप्स से काम नहीं चलता। अब सुंदर दिखने के लिए कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट का सहारा लिया जाता है। कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट का अर्थ यह नहीं है कि हर दुल्हे अथवा दुल्हन को सर्जरी की ज़रूरत होती है। ऐसे कई नॉन सर्जिकल ट्रीटमेंट भी हैं जिनके स्पर्श भर से किसी की भी सुंदरता में चार चांद लग सकते हैं। शादी से पहले कई युवा एक्ने ट्रीटमेंट, एक्ने स्कार, केमिकल पील, माइक्रोडर्माब्रेजन, लेजर हेअर रिमूवल, इंस्टंट फेसलिफ्ट, नॉन सर्जिकल बॉडी कलरिंग, दाँतों की सफाई और सफेदी, बोटोक्स ट्रीटमेंट और फिलर्स जैसे नॉन सर्जिकल कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट करा रहे हैं। 

लड़कियों के लिए प्राथमिकता के आधार पर नॉन सर्जिकल ट्रीटमेंट 

-स्किन व्हाइटनिंग, माइक्रोडर्माब्रेजन और मैसोथेरेपी। 

-एक्ने एवं एक्ने स्कार ट्रीटमेंट। 

-लेज़र हेअर रिमूवल (अनचाहे बालों को चेहरे, बाहों और टाँगों से हटाने की प्रक्रिया)। 

-बोटोक्स अथवा फिलर ट्रीटमेंट -चेहरे और शरीर के अन्य हिस्सों से झाइयों के दाग हटाना। 

लड़कों में इस तरह का इलाज लोकप्रिय है 

-त्वचा के दाग-धब्बे हटवाना, पील्स और लेज़र ट्रीटमेंट कराना। 

-कील-मुहाँसों के निशानों को लेजर अथवा डर्मा रोलर से ठीक कराना। 

-दोहरी ठुड्डी का आकार ठीक कराना। 

-बोटोक्स ट्रीटमेंट से चेहर के गड्ढों को ठीक कराना। 

-भौहों के बीच अथवा चिबुक पर जमे अनचाहे बालों को लेजर से हटवाना। 

क्या है हेअर रिमूवल 
लेज़र मशीन के जरिए अनचाहे बालों को स्थाई तौर पर हटाया जा सकता है। यह एक दर्द रहित प्रक्रिया है। नई सोप्रानो लेज़र मशीन से कई हफ्तों के लिए अनचाहे बालों को हटाया जा सकता है। शादी से चंद दिन पहले किए गए इस ट्रीटमेंट से आप आगामी कई हप्तों के लिए अनचाहे बालों से मुक्त रहेंगे। स्थाई तौर पर इस तरह के कई और ट्रीटमेंट लेना पड़ते हैं। 

बोटोक्स ट्रीटमेंट 
चेहरे पर कई तरह की झुर्रियाँ पड़ जाती हैं। मसलन जिन्हें लगातार मुस्कुराते रहने की आदत होती है उनके होठों और आँखों की किनोरों पर झुर्रियों का एक जाल सा बिछ जाता है। कई लोगों को दोनों भ्रकुटी के बीच दो रेखाएं उभर आती हैं। इन्हें बोटोक्स ट्रीटमेंट से दूर किया जा सकता है। यदि किसी को काँख से पसीना आने की शिकायत है तो वो बोटोक्स ट्रीटमेंट से राहत पा सकता है। बोटोक्स ट्रीटमेट शादी से दो हफ्ते पहले कराया जा सकता है। 

फिलर्स 
यह प्रक्रिया उन लोगों के लिए बेहरतीन विकल्प है जिन्हें चेहरे को फेसलिफ्ट कराने की बहुत अधिक आवश्यकता न हो लेकिन तरोताजा चेहरा चाहते हों। इसे शादी के तीन-चार हफ्ते पहले कराना चाहिए। चेहरे की बारीक झुर्रियों अथवा होठों को मादक उभार देने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। इसके लिए त्वचा को सुन्ना करने वाले इंजेक्शनों की जरूरत नहीं है। 

पीआरपी इंजेक्शन 
तत्काल नतीज़ों के लिए प्लेटलेट रिच प्लाज्मा का इंजेक्शन लगवाना बड़ा लोकप्रिय है। इस प्रक्रिया में इलाज़ करवाने वाले के रक्त से प्लेटलेट युक्त प्लाज्मा निकाला जाता है जिसे इंजेक्शन के जरिए चेहरे और गरदन के हिस्सों में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में डाला जाता है। चूँकि प्लेटलेट युक्त प्लाज्मा ग्रोथ फैक्टर से भरपूर होता है इसलिए चेहरे की त्वचा टाइट भी हो जाती है तथा उसमें नई जान आ जाती है। 

स्किन पॉलिशिंग 
चेहरे की त्वचा को चिकना बनाने के लिए माइक्रोडर्माब्रेजन या स्किन पॉलिशिंग भी एक और विकल्प है। इसमें मेडिकल ग्रेड के एल्यूमिनियम क्रिस्टल को वैक्यूम प्रेशर से मृत त्वचा की सतह को हटाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। माइक्रोडर्माब्रेजन से कराया गया एक ट्रीटमेंट आपके चेहरे से उम्र के कई साल चुटकियों में घटा देता है। इससे त्वचा के नए सेल्स को विकसित होने का मौका मिलता है। बॉडी पॉलिशिंग के अनेकों प्रकार हैं -

डर्मारोलर/ माइक्रोनीडलिंग 
डर्मारोलर अथवा माइक्रोनीडलिंग को मज़ाक में ग़रीब मरीज़ों के इलाज के तौर पर भी जाना जाता है। यह एक ऐसा बढ़िया औज़ार है जिससे चिकनी त्वचा हासिल की जा सकती है। यह कील-मुहाँसों के निशानों, खुले रोम छिद्रों और स्ट्रेच मार्क्स को हटाने का श्रेष्ठ औज़ार है। चूँकि इसे कई चरणों में पूरा किया जाता है इसलिए इसकी शुरुआत शादी से ३-४ महीनों पहले होनी चाहिए। 

नया आकार देना 
चेहरे या शरीर पर जमा अतिरिक्त चर्बी को हटाकर नया लुक दिया जा सकता है। शादी से पहले अल्ट्रासाउंड और रेडियो फ्रीक्वेंसी किरणों से शरीर की अतिरिक्त चर्बी हटाकर मनपसंद आकर दिया जा सकता है। लेज़र से गोरापन/पुनर्जीवन किशोरावस्था में निकलने वाले कील-मुंहाँसों के निशान स्थाई तौर पर चेहरे पर बने रहते हैं। इनके निशान किसी केचेहरे पर बहुत गहरे बन जाते हैं। इन निशानों को हटा दें तो एक नया खिला हुआ चेहरा निकल आता है। इसके अलावा भावी दूल्हे और दुल्हन गोरी और चमकदार त्वचा भी चाहते हैं। फ्रेक्शनल लेज़र, क्यू स्विच्ड याग्लेज़र, रेडियो फ्रीक्वेंसी और अल्ट्रा साउंड ऐसी मशीनें है जो आपकी मदद के लिए ही बनी हैं। कितनी बार ट्रीटमेंट लेना होगा यह त्वचा के प्रकार अथवा उसकी स्थिति पर निर्भर है। 

क्या करें और क्या नहीं 
-किसी भी कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट से पहले इलाज की पूरी जानकारी इकट्ठी करें। जो मरीज पहले इसका लाभ उठा चुके हैं उनसे उनके अनुभव जानें। इलाज की लागत और अवधि के बारे में भी पूछताछ कर लें। 

-ऐसा कोई कॉस्मेटिक इलाज मत कराइए जो आपके लिए अनुकूल न हो। मसलन किसी और की सलाह पर कोई इलाज न कराएं। चिकित्सक को तय करने दें कि आपको किस तरह के इलाज की जरूरत है। 

-किसी भी कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट में लगने वाले समय और साइड इफेक्ट्स की भी जानकारी लें। इलाज के बाद क्या-क्या सावधानियाँ रखना यह भी जान लें। 

-किसी भी कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट से बहुत चमत्कारिक नतीजों की उम्मीद मत लगा बैठिए। अपने डॉक्टर से इस बाबत पूरी जानकारी ले लें, उसी के बाद इलाज शुरु कराएं(डॉ. अप्रतिम गोयल,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल चतुर्थांक 2012)। 


आपकी त्वचा का रंग एक इत्तेफाक मात्र है। असली सुंदरता आंतरिक दमक में ही है।

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बुधवार, 2 मई 2012

सूरज की किरणें और त्वचा

गर्मी के मौसम में त्वचा से जुड़ी सबसे आम समस्या है टैनिंग की। सूरज अपना प्रकोप दिखाता है और भुगतना पड़ता है आपकी कोमल त्वचा को। सन्सक्रीन सूरज की रोशनी से आपको बचाने का दावा तो करते हैं फिर भी त्वचा की रंगत गर्मी के मौसम में कम हो ही जाती है। कौन-कौन से घरेलू उपायों को अपनाकर स्किन टैनिंग की समस्या से निजात पाई जा सकती है, बता रही हैं करुणा कृतिः 

सुंदर और कोमल त्वचा पाना हर व्यक्ति की चाहत होती है। त्वचा की रोज साफ- सफाई करने और उसे पोषण देने से त्वचा आकर्षक बनती है। ऐसे में अगर त्वचा को धूप की नजर लग जाए तो सन टैनिंग जैसी समस्याएं आपकी स्वस्थ व सुंदर त्वचा को नुकसान पहुंचा सकती हैं। धूप से त्वचा की रंगत सांवली हो जाती है। त्वचा के इस सांवलेपन को सन टैन कहते हैं। यह त्वचा से जुड़ी एक बेहद आम समस्या है, जिससे हम सब पीड़ित हैं। पर अक्सर हम इस समस्या को अनदेखा कर जाते हैं। सन टैन की समस्या जब बहुत ज्यादा बढ़ जाती है तो इससे कई दफा स्किन कैंसर का खतरा भी पैदा हो जाता है। अगर कुछ बातों का ध्यान रखें तो सन टैन दूर कर त्वचा की खूबसूरती को कायम रखा जा सकता है। हालांकि ये उपाय त्वचा को टैनिंग की समस्या से बचाते हैं, लेकिन ये ध्यान रखना जरूरी है कि कोई भी उपाय तभी कारगर होता है, जब आपकी त्वचा स्वस्थ हो। त्वचा पर होने वाले सन टैन की समस्या से बचने के लिए इन उपायों को अपनाएं: 

-त्वचा को रोज साफ करें। स्क्रबिंग करें। इससे काली पड़ी त्वचा को हटाने में मदद मिलती है। 

-आलू के रस का इस्तेमाल टैनिंग से बचने का एक अच्छा उपाय है। कच्चे आलू के रस में एक चम्मच नीबू का रस मिलाएं और झुलसी त्वचा पर लगाएं। फिर 15 मिनट बाद धो लें। 

-एक कप में नीबू का रस निचोड़ें, उसमें एक चम्मच चीनी और ग्लिसरीन की कुछ बूंदें मिलाकर त्वचा पर स्क्रब करें। इससे टैनिंग से छुटकारा मिलता है और त्वचा कोमल बनती है। सन टैन होने पर सलाद के पत्तों को उबाल कर ठंडा कर लें, फिर झुलसी हुई त्वचा पर लगाएं। 

-खीरे के टुकड़े को सन टैन पर मलने से फायदा मिलता है। 

-मिल्क पाउडर, नीबू का रस, शहद व बादाम का तेल बराबर मात्र में लें व मिलाएं। इस पैक को त्वचा पर लगाएं,फिर बीस मिनट बाद धो लें। 

-सन टैन होने पर आलू के छिलकों को त्वचा पर मलें। इसमें पाए जाने वाले एंटीऑक्सिडेंट्स टैनिंग की समस्या को जल्दी दूर करते हैं। 

-सन टैन से त्वचा के झुलस जाने पर एलोवेरा का प्रयोग एक अच्छा उपाय है। अगर हर दिन एलोवेरा के रस को त्वचा पर लगाया जाए तो एक हफ्ते में ही त्वचा की रंगत निखरने लगती है। 

-एक चम्मच बेसन लें। उसमें दो चम्मच कच्च दूध व दो-तीन बूंद नीबू का रस मिलाएं। इस पैक को चेहरे पर 15 मिनट तक लगाकर छोड़ दें, बाद में धो लें। हफ्ते में एक बार इसका इस्तेमाल न केवल सन टैन दूर करता है, बल्कि त्वचा को आकर्षक बनाता है(हिंदुस्तान,दिल्ली,19.4.12)। 


नोटः रंग गोरा हो या काला,इत्तेफाक मात्र है। आपका रंग ही सब कुछ    नहीं है।

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सोमवार, 23 अप्रैल 2012

त्वचा के लिए विटामिन थेरपी

अगर आप फेयर, सॉफ्ट और ग्लो करती हुई स्किन चाहती हैं, साथ ही रिंकल्स, एक्ने और पिंपल्स से छुटकारा चाहती हैं, तो आपकी हेल्प के लिए मार्केट में कई प्रॉडक्ट्स मिल जाएंगे। हालांकि इन सबमें केमिकल्स होते हैं, जिनका आगे चलकर कोई-न-कोई साइड इफेक्ट तो होता ही है। ऐसे में विटामिन थेरपी एक ऐसी चीज है, जिसका लॉन्ग टर्म में कोई भी नुकसान नहीं होता। दरअसल, अब विटामिंस अब सीरम और कैप्सूल के फॉर्म में मिलने लगी हैं, जिन्हें स्किन पर अप्लाई किया जा सकता है। 

गौरतलब है कि सही क्वॉन्टिटी में और सही तरीके से विटामिंस के इस्तेमाल से आपकी स्किन बेहद खूबसूरत बन सकती है। यही नहीं, स्किन एक्सपर्ट की गाइडेंस में इसे लेने से एजिंग के साइन को भी रिमूव किया जा सकता है। सर गंगाराम हॉस्पिटल के कंसलटेंट डर्मेटालजिस्ट डॉ. रोहित बतरा बताते हैं कि विटामिन थेरपी अभी इंडिया में ज्यादा पुरानी नहीं है। हालांकि वेस्टर्न कंट्रीज में ये बेहद पॉप्युलर हैं। दरअसल, डिवेलप्ड कंट्रीज में अब लोग दवाइयों से भाग रहे हैं। 

सॉफ्ट रखे विटामिन ई 
विटामिन ई एंटी एजिंग है और ड्राईनेस में दिया जाता है। यह सॉफ्टनेस और स्ट्रेच मार्क्स के लिए कारगर है। स्किन के टिश्यू रिपेयर में विटामिन ई का खास रोल है। यही नहीं, यह यूवी-बी एक्सपोजर से हुए नुकसान की भी भरपाई करता है। अगर आपकी स्किन बहुत ड्राई है तो विटामिन ई लगाने और खाने से गजब का बदलाव दिखाई देगा। देखा जाए तो, यह स्किन के अपर लेयर के ओवरऑल ग्लो के लिए जिम्मेवार है। 

स्मूद बनाए विटामिन ए 
विटामिन ए स्मूद बनाता है। विटामिन ए रिंकल्स को बनने से बचाता है। यह स्किन को क्रैक्स से बचाता है, इसे टाइट और स्मूद बनाए रखता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि कुछ विटामिंस अगर आपकी बॉडी में जरूरत से ज्यादा चले जाएं, तो आपको प्रॉब्लम भी हो सकती है। सरदर्द जैसी प्रॉब्लम्स आपको घेर सकती हैं। ऐसे में बगैर किसी गाइडेंस के इसे लेना बिल्कुल सही नहीं है। फिर जब रिंकल्स आपके फेस पर आ रहे हैं, तो पूरी बॉडी के लिए इसे खाने से क्या फायदा होगा? 

फेयर बनाए विटामिन सी 
बात अगर फेयरनेस की हो, तो विटामिन सी का रोल सबसे इंपॉर्टेंट होता है। इसे राइट क्वांटिटी में यूज करने से स्किन कलर में कमाल का बदलाव देखा जा सकता है। हालांकि इसके इस्तेमाल के बाद भी सन-एक्सपोजर से बचने की जरूरत होती है। वैसे तो, विटामिन सी को नॉर्मली चबाने वाले कैप्सूल के रूप में भी मिलती है। फिर आप जूस में भी इसे लेते हैं। लेकिन जब इसे फेस पर अप्लाई करने की बात आती है, तब यह जैसे ही हवा के कॉन्टैक्ट में आता है, ऑक्सीडाइज हो जाता है और असर नहीं कर पाता। ऐसे में, चेहरे पर लगाने के लिए खास तौर से बंद कैप्सूल आते हैं। इन्हें खोलते ही लगाना होता है। अगर यह खुला पड़ा रह जाए, तो बेकार हो जाता है। 

नैनो-टेक्नॉलजी 
गौरतलब है कि खाने वाला विटामिन कैप्सूल फेस पर नहीं लगाया जा सकता। डॉ. बतरा बताते हैं कि इन्हें फेस पर लगाने की टेक्नॉलजी नैनो-टेक्नॉलजी है। असल में, इनके अंदर जो विटामिन पार्टिकल होते हैं, वो बेहद स्मॉल होते हैं, ताकि आपकी स्किन के भीतर समा सकें। ये मीटर्ड डोज कैप्सूल इस तरह से बनाए गए होते हैं कि ट्विस्ट करके आसानी से इन्हें खोलकर फेस पर लगाया जा सकता है। 

चूंकि ये विटामिंस हैं, इसलिए इनका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। इन्हें आप अगर दोबारा भी लगाना चाहें, तो कोई नुकसान नहीं होता। जिन लोगों को मेडिसिन लेने या कोई सर्जरी कराने से ऐतराज है, उनके लिए तो यह बेहद फायदेमंद है। हां, यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि विटामिन थेरपी के लिए आपकी स्किन अनैलेसिस के साथ लाइफस्टाइल के बारे में भी पूरी जानकारी जरूरी होती है। इसलिए आप इसे किसी एक्सपर्ट की गाइडेंस में ही कराएं। 

जब करना हो इंजेक्ट 
आपको कोई शादी या पार्टी अटेंड करनी हो या फिर किसी वजह से चेहरे पर डलनेस आ गई हो, तो ग्लो लाने के लिए विटामिंस को आपकी स्किन में इंजेक्ट भी किया जाता है। विटामिन सी और ग्लूटाथाइऑन का इंजेक्शन अगर पांच-पांच दिन के गैप पर दो से तीन बार लिया जाए, तो बेहतरीन निखार आ जाता है। इसे किसी भी एज ग्रुप में कराया जा सकता है। इंजेक्शन देने में ध्यान रखा जाता है कि विटामिन सी सीधा ब्लड में ही जाए। ग्लूटाथाइऑन वैसे तो प्रोटीन ही है। लेकिन ये आपकी बॉडी के अंदर जाकर कॉम्प्लेक्शन के लिए काम करती हैं। बताते चलें कि विटामिन ई इंजेक्ट नहीं किया जाता। 

क्या है खर्च 
खास बात यह है कि विटामिंस का इस्तेमाल ज्यादा महंगा भी नहीं हैं। ये आपके ब्यूटी पार्लर के खर्चों वाले बजट में ही फिट बैठेंगे। जहां बोटॉक्स वगैरह में एक ही बार में 10-15 हजार रुपये खर्च हो जाते हैं, वहीं इस थेरपी में महीने में 1200 रुपए के करीब खर्च आएगा। हां, बोटॉक्स जैसे ट्रीटमेंट का असर आपको उसी वक्त दिखाई देता है, जबकि विटामिन थेरेपी का असर आपको महीने-डेढ़ महीने बाद दिखाई देगा(प्रीतंभरा प्रकाश,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,4.4.12)। 


 नोटःskin color is not of any significance;it can be dark or light.

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गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

एक्वा मेकअप

रखे ठंडा- ठंडा, कूल - कूल। यह बात किसी ड्रिंक की नहीं, बल्कि एक्वा मेकअप की है। कूल लुक और फ्रेशनेस के लिए इस समर में आप एक्वा मेकअप ट्राई कर सकती हैं। असल में, यह बेहद सॉफ्ट मेकअप होता है और इसमें सी वॉटर के तकरीबन सभी कलर्स का यूज किया जाता है : 

एक्वा मेकअप ठंडक और ताजगी का अहसास देता है। भले ही आपको सुनने में अटपटा लगे लेकिन स्किन को कूल रखने में यह मेकअप बेहद काम आता है। वैसे तो, यह बहुत सॉफ्ट होता है, पर इसमें ग्लैमर भी भरपूर होता है। ब्यूटीशियन रेखा श्रीवास्तव कहती हैं, एक्वा मेकअप में सी वॉटर के कलर्स यूज किए जाते हैं। स्काई ब्लू, स्काई ग्रीन जैसे कूल रंग इस मेकअप को खास बनाते हैं। 

मार्केट में फाउंडेशन से लेकर आई लाइनर तक में आपको इसी कलर थीम पर मेकअप प्रॉडक्ट्स मिल जाएंगे। दरअसल, ये कलर्स आपको गर्मियों में कूल बनाए रखते ही हैं, देखने वाले को भी कूल अहसास देते हैं।  

एक्वा कलर 
जैसे आपको बताया कि एक्वा मेकअप में सी वॉटर के सभी शेड्स का यूज किया जाता है। ड्रेस के मुताबिक, फाउंडेशन में फिश से मिलते-जुलते कलर भी यूज होते हैं। हालांकि लाउड और सॉफ्ट मेकअप इसके शेड्स के यूज पर डिपेंड करता है। वैसे तो, दिन के लिए आमतौर पर इसमें सॉफ्ट मेकअप ही चूज किया जाता है, लेकिन रात के लिए आप इसके सभी डार्क शेड्स चूज कर सकती हैं। 

रेखा कहती हैं, इस सीजन में डार्क कलर पसंद करने वालों के लिए पीच और ग्रीन कलर का खास कॉम्बिनेशन मौजूद है। वहीं लाइट कलर पसंद करने वालों के लिए स्काई ब्लू और मेटलिक के लाइट और डार्क शेड्स डिमांड में बने हुए हैं। बस, इन्हें यूज करते समय मिक्स एंड मैच का ध्यान जरूर रखें। 

कैसे करें 
सबसे पहले स्किन के रंग से मेल खाता फाउंडेशन लगाएं। इसमें मेटलिक और क्रीम कलर के ऑप्शन पर भी जा सकती हैं। इसके बाद वाइट आई पेंसिल आंखों की आउटलाइनिंग के लिए यूज करें। आईशैडो में सी ग्रीन और स्काई कलर का यूज करें। चाहें तो , लाइट स्काई कलर का ब्लशर भी यूज कर सकती हैं। एक्वा मेकअप में आप थोड़ा शिमर का भी टचअप दे सकती हैं। इसके साथ हल्की और ग्लॉसी लिपस्टिक लगाएं। लिपस्टिक आपके आईशैडो और ब्लशर से मेल खाती हो , यह ध्यान रखें। पाउडर ब्रॉन्ज लगाते समय बहुत भरा और मोटा पाउडर ब्रश का यूज करें। 

एक्वा जेट मसाज 
आप चाहती हैं कि आपकी स्किन की फ्रेशनेस व ग्लो बरकरार रहे , तो इसके लिए एक्वा मसाज ले सकती हैं। यह मसाज आपकी नेचरल ब्यूटी को मेंटेन रखता है। इसमें उंगलियों से एक खास डायरेक्शन में मसाज की जाती है। इसे तकरीबन 10 दिन में करवा लें , तो बेहतर है। 

ब्राइडल में भी डिमांड 
ब्राइडल ब्यूटी में भी एक्वा मेकअप खूब डिमांड में है। इसमें आपको चाहे कितना भी पसीना आ जाए , मेकअप जैसे का तैसा रहेगा। दिलचस्प यह है कि भले ही दुल्हन अपनी विदाई पर कितना रोए , मेकअप पर कोई असर नहीं पड़ेगा। तो हो जाएं तैयार , इस सीजन में कूल लुक के साथ फ्रेश रहने के लिए ! 

एक्वा फेशियल स्टिक 
एक्वा डे कूलिंग फेशियल स्टिक आपको मार्केट में रेडीमेड मिल जाएगी। 

 - यह स्टिक यूज करने में कम्फर्टेबल है। 

 - लगाते ही इसे स्किन ऑब्जर्व कर लेती है। 

 - स्किन को सॉफ्ट , टोंड और हेल्दी बनाता है। 

 - मेकअप को टचअप करने के लिए स्किन को तैयार करता है। 

एक्वा लोशन 
- स्किन के टोन को ठीक करता है। 

- स्किन को हाइड्रेट करने में मदद करता है। 

- स्किन को क्लीन , सॉफ्ट फ्रेश और कंफर्टेबल फील करवाता है(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,11.4.12)।

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