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शनिवार, 26 मई 2012

खुलासाःटूथ पेस्ट और टूथ पाउडर में मिलाया जा रहा है निकोटीन

सिगरेट, तंबाकू और गुटखा से परहेज कर अगर आप सोच रहे हैं कि निकोटीन के दुष्प्रभाव से आप मुक्त हैं तो आप गलत हैं। दरअसल, बाजार में ऐसे पदार्थ धड़ल्ले से बिक रहे हैं, जिनमें छोरी-छुपे निकोटीन मिलाया जा रहा है। हैरत कि बात यह है कि टूथ पेस्ट और टूथ पाउडर जैसी रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं भी इस गोरखधंधा की चपेट में हैं। 

यह खुलासा दिल्ली इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल साइंस एण्ड रिसर्च (डिप्सार) के एक अध्ययन में हुआ है। चिंताजनक बात यह है कि डिप्सार ने इसी तरह का एक सर्वे पहले भी किया था और विस्तृत रिपोर्ट दिल्ली ड्रग्स कंट्रोल विभाग और अन्य स्वास्थ्य एजेंसियों को सौंपी थी, पर दोषी कंपनियों के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। 

बीते एक वर्ष से डिप्सार दिल्ली-एनसीआर के अलग-अलग इलाकों में बिक रहे उत्पादों की जांच कर रही थी। इंस्टीट्यूट के प्रिंसिपल प्रो. एसएस अग्रवाल ने भास्कर को बताया कि दिल्ली-एनसीआर में बिक रहे टूथ पाउडर में निकोटीन की मात्रा पाई गई। जिन उत्पादों में निकोटीन मिले होने की बात सामने आई है, वे सभी राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रोडक्ट हैं। उन्होंने चिता व्यक्त करते हुए कहा कि बीते वर्ष भी संस्थान ने इसी तरह का अध्ययन किया था। 

विस्तृत रिपोर्ट स्वास्थ्य एजेंसियों को सौंपी गई थी, पर गोरखधंधे पर नकेल कसने के बजाय कई नई कंपनियां इस सूची में शामिल हो गईं हैं। उन्होंने बताया कि निकोटीन को लेकर सर्वे पूरा हो चुका है और उम्मीद है कि अगले एक महीने के अंदर रिपोर्ट सरकार और स्वास्थ्य एजेंसियों को सौंप दी जाएगी। 

गोरखधंधा रोकने को नहीं है कानून 
उधर, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि भारत में तमाम तरह के खाद्य व अखाद्य पदार्थो में मिलाए गए तत्वों का विवरण लिखना अनिवार्य है। फिर भी किसी उत्पाद में निकोटीन की जांच करने की जिम्मेदारी ड्रग कंट्रोल विभाग की है। लेकिन, विभाग की लालफीताशाही की वजह से इस गोरखधंधे पर काबू पाना संभव नहीं हो पा रहा है। उन्होंने भी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सरकारी एजेंसियों के पास भी इस गोरखधंधा को रोकने के लिए कोई विशेष कानून नहीं है(धनंजय कुमार,दैनिक भास्कर,दिल्ली,26.5.12)।

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बुधवार, 16 मई 2012

मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज का अध्ययनःमोबाइल से बहरेपन का ख़तरा

मोबाइल फोन खासकर इयर फोन का ज्यादा इस्तेमाल आपको या आपके बच्चों को बहरा कर सकता है। रोज 6 से 7 घंटे मोबाइल का इस्तेमाल करने वाले तो बहरेपन की गिरफ्त में हैं ही। इन 6 से 7 घंटों में बात करने के साथ ही इयरफोन से गाने सुनना भी शामिल है। वहीं जो लोग मोबाइल का कम यूज करने वालों में भी सामान्य लोगों की अपेक्षा सुनने की क्षमता 15 पर्सेंट कम हो रही है। ऐसे लोगों की संख्या 70 फीसदी है। अध्ययन में शामिल लोगों को तीन वर्ग में बांटा गया, जिसमें 13 से 19 साल, 20 से 45 साल और 46 से 65 साल के लोग थे। बच्चों में यह समस्या अन्य की तुलना में ज्यादा पाई गई है। गौरतलब है कि इन दिनों राजधानी में ज्यादातर बच्चे और युवा कानों में इयरफोन लगाए मिल जाएंगे। इनमें से ज्यादातर को सुनने की क्षमता बढ़ाने के लिए मशीन लगाने की जरूरत है। 

यह जहां 13 साल तक के बच्चों के लिए खतरनाक है, वहीं 65 साल के बुजुर्ग भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के ईएनटी डिपार्टमेंट ने यह स्टडी की है, जिसमें 13 साल से 65 साल तक के करीब 400 लोगों को शामिल किया गया। 

अस्पताल के डीन और ईएनटी विभाग के हेड डॉ. अरूण अग्रवाल का कहना है कि कान में करीब 15 हजार स्पेशल हेयर सेल्स होते हैं। इसके बाद नर्व्स होते हैं। ये जब खराब होने लगते हैं तो सुनने की क्षमता कम होने लगती है। एक बार सेल्स खराब हो गए तो इनका दोबारा बनना मुश्किल होता है। सुनने की क्षमता में कमी आने का शुरू में पता नहीं चलता है। जब तक पता चलता है करीब 30 फीसदी सेल्स खराब हो चुकी होती हैं। हालांकि उम्र बढ़ने के साथ और ज्यादा दवाइयां भी इसका कारण हैं, लेकिन मोबाइल फोन की भूमिका इसमें बहुत ज्यादा हो गई है। अगर हम आईपॉड को एक घंटे के लिए सिर्फ 60 वॉल्यूम पर सुनें या थोड़ी थोड़ी देर में ब्रेक लें तो इसमें शुरू से ही कुछ कंट्रोल हो सकता है(सुशील कुमार त्रिपाठी,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,15.5.12)।

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शुक्रवार, 16 मार्च 2012

विदेशी भी आ रहे हैं मातृत्व सुख के लिए भारत

मातृत्व को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है । भारत की टेस्ट ट्यूब प्रयोगशालाओं में जन्मे विदेशी बच्चे इस बात को बखूबी साबित भी कर रहे हैं। भले ही ये बच्चे अभी यहां से दूर अपने-अपने देशों में खेल कूद रहे होंगे लेकिन उन्हें इस बात का एहसास भी है कि उनकी "मांएं" भारत में भी हैं । वे मदर्स डे में अपने-अपने आईवीएफ विशेषज्ञों को मां के संबोधन के साथ थैंक्यू कार्ड भेजना नहीं भूलते । यहां आईवीएफ का अंतर्राष्ट्रीय स्तर तो है ही, इसके बेहद सस्ता होने एवं सरोगेट मदर (किराए की कोख) मिलना आसान होने की वजह से भारत मातृत्व का भी दुनिया का सबसे बड़ा हब बनने की राह पर है । यहां अफगानिस्तान एवं मध्य-पूर्व के देशों से ही नहीं बल्कि अमेरिका एवं यूरोपीय देशों के निस्संतान दंपति भी संतान सुख पाने भारी संख्या में यहां आ रहे हैं । विदेशों के कई आंगन भारत की वजह से रोशन हो रहे हैं । 

कैलाश कॉलोनी स्थित आईसिस प्रजनन केंद्र की प्रमुख एवं जानी-मानी प्रजनन विशेषज्ञ डॉ. शिवानी सचदेव ने दावा किया कि अभी तक उनके यहां १,००० से अधिक टेस्ट ट्यूब बेबी जन्म ले चुके हैं । इनमें करीब ४०० विदेशी दंपतियों के हैं । उन्होंने बताया कि यहां आईवीएफ के एक चक्र की कीमत अगर डेढ़ लाख रुपए है तो अमेरिका में उसकी कीमत ७ लाख रुपए की होगी । डॉ. शिवानी सचदेव ने दावा किया कि उनके यहां हर रोज कम से कम एक विदेशी निस्संतान दंपति जरूर आते हैं । इन विदेशी दंपतियों में अफगानिस्तान एवं खाड़ी देशों सहित आस्ट्रेलिया, अमेरिका, यूके, जर्मनी एवं अन्य यूरोपीय देशों के दंपति भी होते हैं । 

राजौरी गार्डन स्थित नर्चर प्रजनन केंद्र की प्रजनन विशेषज्ञ डॉ. अर्चना धवन बजाज ने दावा किया कि लंबे समय तक युद्धग्रस्त रहने की वजह से अफगानिस्तान में बांझपन बहुत ज्यादा है । यहां मर्दों में स्पर्म की कमी दंपतियों के निस्संतान होने का बड़ा कारण बन रहा है । उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान से उनके पास हर महीने कम से कम ५० निस्संतान दंपति टेस्ट ट्यूब बेबी की चाह में आते हैं । नर्चर अफगानिस्तान के निस्संतान दंपतियों के लिए मातृत्व की खुशी का सबसे बड़ा निर्यातक साबित हो रहा है । टेस्ट ट्यूब बेबी का एक उदाहरण तो मर्म छूने वाला है । 

अफगानिस्तान की एक महिला को भारत की प्रयोगशाला में गर्भ ठहरा और उसने बच्चे को जन्म दिया पाकिस्तान में। डॉ. अर्चना धवन बजबजाज ने बताया कि पिछले साल एक अफगानी दंपत्ति 25 वर्षीय सूफिया और 33 वर्षीय हामिद नर्चर क्लिनिक आए। यह दम्पत्ति लम्बे समय से संतान के लिए भटक रहा था। इस साल पाकिस्तान में सूफिया को बच्चा हुआ है। डॉ. बजाज कहती हैं कि प्यार और स्नेह के बंधन में मातृत्व ही इन तीनों देशों को बंधन में बांध सकता है। कूटनीति के स्तर पर इस तरह के प्रेम त्रिकोण की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। 

टेस्ट ट्यूब बेबी सहित प्रजनन संबंधी तमाम स्पेशियैलिटी की विदेशी मांग को देखते हुए,देश के महानगरों के सभी अस्पतालों ने अपने यहां अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं स्थापित कर रखी है। पूसा रोड स्थित बी.एल. कपूर सुपरस्पैशिएलिटी अस्पताल की प्रजनन विशेषज्ञ डॉ. संदीप तलवार ने कहा कि विदेशी क्लाइंट को ध्यान में रखकर ही इस अस्पताल ने अत्याधुनिक आईवी प्रयोगशाला की स्थापना कराई है। लीलावती अस्पताल के जाने-माने डाक्टर डॉ. ऋषिकेश पई ने कहा कि इस देश में टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक का स्तर अब दुनिया में किसी भी देश से कम नहीं है। उन्होंने बताया कि उनके पास भी भारी संख्या में विदेशी मरीज़ आ रहे हैं। 

वैशाली(गाजियाबाद) स्थित पुष्पांजलि क्रॉसले ने हाल ही में टेस्ट ट्यूब बेबी के देश के सबसे बड़े केंद्र केरल के सिमार(सीआईएमएआर) के जाने-माने प्रजनन विशेषज्ञ डाक्टर के.के. गोपीनाथन की देखरेख में आईवीएफ स्पैशियलिटी शुरू की है। उन्होंने कहा कि आसान सरोगेसी तो विदेशियों के यहां आने का कारण है ही,सस्तेदर में हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सेवा मुहैया कराने में भी सफल हो रहे हैं। मेडिकल टूरिज्म में आईवीएफ का एक बेहद महत्वपूर्ण स्थान बनता जा रहा है(धनंजय,संडे नई दुनिया,11 मार्च,2012)

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सोमवार, 12 मार्च 2012

भारत बन रहा है दुनिया की वेलनेस राजधानी

अमेरिकी मरीज सैम बुकनन को दिल्ली के मूलचंद मेडिसिटी से जब घुटने बदलने (नी रिप्लेसमेंट) की सर्जरी के बाद छुट्टी दी गई तो उन्हें एकबारगी यकीन ही नहीं हुआ कि इतने कम पैसे में अमेरिका के स्तर का इलाज भारत में भी हो सकता है । ६१ वर्ष और १६७ किलोग्राम के इस विशुद्ध अमेरिकी की मूलचंद में पिछले १५ फरवरी को जोड़ बदलने के सीनियर कंसलटेंट डॉ. संजय गुप्ता ने यह सर्जरी की । २३ फरवरी को त्रिची के. वासन आई केयर नेत्र अस्पताल में न्यूजीलैंड की २५ वर्षीय सुजैन ने आंखों का रंग बदलने की सर्जरी कराई । एक विदेशी से शुरू भारत की यह पहली सर्जरी वासन आईकेयर के डॉ. शिबू वर्के ने की । जिस दूसरे मरीज ने इस सर्जरी के लिए उनके अस्पताल में पंजीकरण कराया है, वह ब्रिटेन का है । 

ये उदाहरण भूले-भटके भारत के पंचतारा अस्पतालों में भर्ती हुए विदेशी मरीजों के नहीं हैं । अमेरिका एवं यूरोपीय देशों के मरीज भी अब इलाज के लिए भारत के अस्पतालों का धड़ल्ले से रुख कर रहे हैं । पहले ट्रेंड था -भारत घूमना है तो चलो लगे हाथों इलाज भी करा लेते हैं। अब उलटा है । अब अंकल सैमअमेरिका एवं यूरोपीय देशों के मरीज भी अब इलाज के लिए भारत के अस्पतालों का धड़ल्ले से रुख कर रहे हैं। पहले ट्रेंड था - भारत घूमना है तो चलो लगे हाथों इलाज भी करा लेते हैं। अब उलटा है । अब अंकल सैम (अमेरिकी नागरिक) भी बीमार पड़ते हैं तो सीधे इंडिया डायल करते हैं । विदेशी मरीज यात्रा के बहाने नहीं, सीधे इलाज कराने के लिए भारत आ रहे हैं । अपने देशों की तुलना में बेहद सस्ती दर में इलाज हो जाने की वजह से खुशी के मारे भारत घूम भी लेते हैं । भारत मधुमेह सहित अन्य कई रोगों की दुनिया की "राजधानी" जरूर बनता जा रहा है लेकिन साथ ही वह दुनिया की "वेलनेस" राजधानी भी बन रहा है। विदेशी मरीजों की अकूत संभावना देखते हुए ही हर महानगर में मेडिसिटीज बन रहे हैं । विकसित देशों के मरीज बड़े चूजी होते हैं इसलिए भारत के सभी अस्पताल अपने को उन्हीं को लुभाने वाले मानकों में ढाल रहे हैं । 

जांच एवं इलाज की तमाम अत्याधुनिक मशीनों से लैस पूसा रोड स्थित बी.एल. कपूर सुपरस्पेशियैलिटी अस्पताल की चेयरमैन रीता चौधरी ने कहा, "अब उनके अस्पताल में आने वाले कुल मरीजों में १० से १५ प्रतिशत विदेशी मरीज होते हैं । अमेरिका एवं यूरोपीय देशों के मरीजों की संख्या भी बढ़ती जा रही है । पिछले करीब ६ महीने से हर महीने विदेशी मरीजों की संख्या में ३-४ प्रतिशत की वृद्धि देखी जा रही है ।" चौधरी ने "नईदुनिया" को बताया कि अस्पताल को लैबोरेटरी के लिए देश की सबसे बड़ी सरकारी एक्रेडिटेटिंग सर्टिफिकेट एनएबीएच मिल चुका है । अस्पताल की दुनिया की सबसे बड़ी रेटिंग एंजेंसी जेसीआई (ज्वाइंट काउंसिल इंटरनेशनल) के लिए भी जल्द ही आवेदन करने की योजना है । लगता है, ३ साल पहले स्थापित वैशाली स्थित पंचतारा अस्पताल पुष्पांजलि क्रॉसले के सारे ही प्रोटोकॉल विकसित देशों के अस्पतालों की कॉपी हैं । पुष्पांजलि क्रॉसले के इंटरनेशनल मार्केटिंग के प्रवक्ता गौरव पांडे ने बताया कि यह देश का एकमात्र अस्पताल है जो विश्व की सबसे बड़ी ग्लोबल हाइजीन काउंसिल का सदस्य है । इस अस्पताल ने जेसीआई सर्टिफिकेशन लेने की भी सारी तैयारी कर ली है । इस रेटिंग एजेंसी के मानक बड़े कड़े हैं । यह अस्पताल अपने को मर्करी फ्री एवं ग्रीन अस्पताल के रूप में भी प्रोजेक्ट कर रहा है । विदेशी, खासकर विकसित देशों के मरीज किसी भी अस्पताल का रुख करने के पहले इन मानकों को लेकर अपने को आश्वस्त कर लेते हैं। इन्द्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल हो या गुड़गांव स्थित मेडांटा मेडिसिटी हो,फोर्टिस हो या पुष्पांजलि क्रॉसले हो या बी.एल. कपूर सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल हो,उनके इंटरनेशनल पेशेंट लाउंज में चले जाइए तो पता चलेगा कि वे भरे हुए तो रहते ही हैं,उनकेलिए वहां मनोरंजन के भी कई साधन मिलेंगे। मेडंटा मेडिसिटी के चेयरमैन डॉ. नरेश त्रेहन ने कहा कि अब अमरीका एवं तमाम यूरोपीय देशों के मरीज़ यहां इलाज़ के लिए आने लगे हैं लेकिन यह सही है कि नम्बर के हिसाब से खाड़ी देशों,अफगानिस्तान आदि से ज्यादा मरीज़ आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि अब उनके कुल मरीज़ों में विदेशी मरीज़ों की संख्या 15 प्रतिशत से भी अधिक हो गई है। चाणक्यपुरी स्थित अस्पताल परिसर में मोटापे की बैरिएट्रिक सर्जरी के विशेषज्ञ डॉ. अतुल पीटर्स ने मीडिया को 171 मरीज़ों का जो आंकड़ा पेश किया है,उसमें ७१ विदेशी मरीजों के हैं । अपोलो अस्पताल की इंटरनेशनल मार्केटिंग प्रमुख अंजलि कपूर ने कहा, "अमेरिका और यूरोप के मरीज क्यों नहीं आएंगे यहां इलाज कराने । अपोलो तो विदेशी मरीजों से भरा रहता है । इतना सस्ता और विश्वस्तरीय इलाज कहां मिलेगा । अब विकसित देशों के मरीज भी धड़ल्ले से आ रहे हैं । अपोलो देश के चंद उन अस्पतालों में एक है जो वर्षों पहले ज्वाइंट काउंसिल इंटरनेशनल की रेटिंग पा चुका है ।" 

आंकड़े के हिसाब से देखें तो उद्योग जगत के एक अनुमान के अनुसार भारत के मेडिकल टूरिज्म सेक्टर में हर साल ३० प्रतिशत का इजाफा होने वाला है । माना जा रहा है कि २०१५ तक यह ९,५०० करोड़ का उद्योग हो जाएगा । अमेरिका एवं यूरोप में सर्जरी का जो खर्च है वही सर्जरी भारत में दसवें हिस्से के खर्च में हो जाती है । जाहिर है, हर साल भारत आने वाले विदेशी मरीजों की संख्या लाखों में पहुंच रही है । यहां इलाज कितना सस्ता है इसकी बानगी देखिए- अमेरिका में हार्ट वाल्व बदलने का खर्च ०.२ मिलियन डॉलर है, वहीं भारत में मात्र १०,००० डॉलर में यह इलाज हो जाएगा । साथ में, छुट्टी का पैकेज सो अलग। अंग्रेजी में कहें तो अमेरिका की तुलना में भारत में यह खर्च "डॉग चीप" ही हुआ । इसलिए जाहिर है कि फिजी, अफगानिस्तान, इराक, नाइजीरिया, थाईलैंड, सऊदी अरब, मलेशिया के साथ-साथ यूएसए एवं यूके के मरीज भी धड़ल्ले से आ रहे हैं । मूलचंद मेडिसिटी ने दावा किया कि वहां हर साल करीब १०,००० इंटरनेशनल मरीज आ रहे हैं । 

गुड़गांव स्थित विश्वस्तरीय वेलनेस हब मेडांटा मेडिसिटी में गत क्रिसमस में जो मेडिकल उपलब्धि हासिल हुई वह हेल्थकेयर में भारत की हैसियत के बारे में बहुत कुछ कहता है । यह दुनिया का पहला सफल चेन लीवर प्रत्यारोपण था जिसमें एक साथ लीवर फेल ३ बच्चों को जीवन का गिफ्ट दिया गया लेकिन दाम देखें तो यह डॉग चीप ही लगेगा । यहां एक लीवर ट्रांसप्लांट में ३० लाख रुपए लगते हैं तो अमेरिका-ब्रिटेन में डेढ़ करोड़ रुपए से कम खर्च नहीं होंगे । अंतर्राष्ट्रीय स्तर के बाइपास हार्ट सर्जन डॉ. नरेश त्रेहन अब हेल्थ होंचो (कारोबारी) हो गए हैं और आने वाले समय में मेडांटा मेडिसिटी को दुनिया का सबसे बड़ा वेलनेस सेंटर बनाने की तरफ अग्रसर हैं । अब एयर एंबुलेंस की सेवा भी भारत में आम होती जा रही है । 

भारत के तेजी से बढ़ते हेल्थकेयर उद्योग के संदर्भ में देखें तो चीन भी पीछे दिखेगा । भारतीय हेल्थकेयर की विश्वसनीयता का सूचकांक चीन से कहीं ज्यादा है । एक उदाहरण इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि हेल्थकेयर विशेषज्ञता में भारत का कद कितना कद्दावर है । मैक्स हेल्थकेयर में मिनिमल एक्सेस सर्जरी विभाग के चेयरमैन एवं गिनीज बुक में दर्ज डॉ. प्रदीप चौबे दलाई लामा और चीन दोनों के लिए अपरिहार्य हैं। उन्होंने दलाई लामा की सर्जरी की है और साथ ही चीन भी उन्हें अपने डाक्टरों को प्रशिक्षित करने के लिए बुलाता है। युवराज सिंह भले कैंसर का इलाज़ कराने अमरीका चले गए हों,लेकिन अमरीकी कैंसर का इलाज़ कराने भारत आ रहे हैं। भारत ने दुनिया के लिए सेहत की एक खिड़की खोल दी है और वसुधैव कुटुम्बकम् कहावत को बखूबी चरितार्थ कर रहा है। हमारे विशेषज्ञों को इलाज़ के लिए विदेश भी बुलाया जा रहा है। वहीं सभी अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस भारतीय अस्पतालों में इलाज़ करने वे खुशी-खुशी आ भी रहे हैं। भारतीय विशेषज्ञों को अंतर्राष्ट्रीय फोरम के बड़े-बड़े पदों पर आसीन भी किया जा रहा है। आयुर्वेदिक पद्धति पश्चिम एवं पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ा भारतीय निर्यात है। होम्योपैथी जर्मनी मेंे जन्मी लेकिन अभी भारत होम्योपैथी में दुनिया का लीडर है। पिछले दिनों दिल्ली में हुए लीगा होम्योपैथी वर्ल्ड कांग्रेस में यह साफ जाहिर हुआ। उच्च स्तरीय मार्केट विश्लेषणों में हेल्थकेयर उद्योग में भारत को ेज़ी से बढ़ते देश का दर्जा दिया जा रहा है। विदेशी हेल्थकेअर कम्पनियां भारत में घुसने कयययह बेताब हो रही हैं। यह सब वैसे ही नहीं है(धनंजय,संडे नई दुनिया,11 मार्च,2012)

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रविवार, 18 दिसंबर 2011

प्रयोगशालाओं की जांच में नहीं होता कोलेस्ट्रॉल का सही आकलन

दिल्ली की जांच प्रयोगशालाओं (पैथ लैब) की रिपोर्ट अपडेट नहीं होती। राजधानी के हृदय रोग विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे अधिक उल्लंघन बैड व गुड कोलेस्ट्रॉल की मात्रा दर्शाने में सामने आता है। जांच रिपोर्ट के एक ओर गुड व बैड कोलेस्ट्रॉल की जो न्यूनतम/अधिकतम मात्रा आज दर्शाई जा रही है, वह वर्षों पुरानी है।

फोर्टिस एस्कॉर्ट के वरिष्ठ इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. विनय सांघी के अनुसार, जांच प्रयोगशालाओं को लेकर भारत में कोई स्पष्ट मानक नहीं है। कोलेस्स्ट्रॉल को लेकर तो कोई मानक ही तय नहीं है। पूरी दुनिया में अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन और अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी द्वारा तय मानक ही चलते हैं। इन दोनों संस्थाओं द्वारा वर्षों पूर्व तय किए गए मानक ही राजधानी दिल्ली सहित पूरे देश के प्रयोगशालाओं की रिपोर्ट में दर्शाया जाता है। 

कोई मरीज जब डॉक्टर के कहने पर जांच कराने जाता है तो उसकी रिपोर्ट में एक ओर न्यूनतम व अधिकतम की सीमा दर्शाई गई होती है, जिसके आधार पर मरीज खुद को स्वस्थ्य मान लेता है जबकि आज की जीवनशैली व परिस्थितियों में बेहद बदलाव आ चुका है। 

डॉक्टर द्वारा इलाज की सलाह पर मरीज खुद को जांच रिपोर्ट के आधार पर सामान्य बताते हैं, लेकिन वास्तव में बीमारी की शुरुआत उनमें हो चुकी होती है। यदि ऐसे मरीज सही समय पर इलाज ले लें तो हृदय की धमनियों में रुकावट, हृदयाघात और लकवा जैसी स्थितियों से बच सकते हैं, लेकिन गलत रिपोर्ट के कारण वह सही समय पर इलाज नहीं ले पाते। 

अमेरिका में विशेषज्ञ की हैसियत से काम कर चुके डॉ. विनय सांघी के अनुसार, वर्तमान में प्रयोगशालाओं की रिपोर्ट में लो डेंसिटी कोलेस्ट्रॉल की मात्रा १०० से १५० एमजी परसेंट तक दर्शाई गई होती है जबकि यह ७० से कम होना चाहिए। 

इसी तरह टोटल कोलेस्ट्रॉल की मात्रा रिपोर्ट में २५० से ३०० एमजी परसेंट दर्शाई गई होती है जबकि यह १८० से नीचे होनी चाहिए। डॉ. सांघी के अनुसार, लो डेंसिटी कोलेस्ट्रॉल यदि अधिक होगा तो धमनियों में ब्लॉकेज, हार्टअटैक और लकवा का अटैक आ सकता है। 

वहीं हाई डेंसिटी कोलेस्ट्रॉल एक सफाईकर्मी की तरह है तो धमनियों की सफाई करता है। इसकी मात्रा ५० एमजी परसेंट से अधिक होनी चाहिए, लेकिन लैब की रिपोर्ट पर ४०-४५ दर्ज होता है। प्रयोगशाला प्रबंधकों को चाहिए कि वह इस रिपोर्ट को या तो अपडेट करते रहें या फिर कुछ लिखे ही नहीं। इससे मरीजों में दुविधा की स्थिति उत्पन्न नहीं होगी। 

इस बारे में दिल्ली के बड़े प्रयोगशालाओं में शुमार एक के प्रबंधक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि जब सरकार का इस बारे में कोई दिशानिर्देश ही नहीं है तो जो चल रहा है वह चल रहा है। यह हमारी जिम्मेवारी नहीं है(नई दुनिया,दिल्ली,13.12.11)।

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बुधवार, 14 दिसंबर 2011

चंडीगढ़ में बढ़ रहे हैं किराए पर कोख देने के मामले

किरन राव और आमिर खान सरोगेसी के जरिये अब मां-बाप बने हैं, लेकिन सरोगेसी के जरिए पिछले दो साल में चंडीगढ़ में करीब दो दर्जन से ज्यादा बेऔलाद दंपती मां-बाप बन चुके हैं। भागदौड़ और तनाव भरी जिंदगी में बांझपन के मामले बढ़े हैं, तो किराए की कोख यानी सरोगेट मदर्स का चलन भी बढ़ा है। 

सेक्टर 38 में जननी फर्टीलिटी सेंटर की आईवीएफ तकनीक विशेषज्ञ डॉ. निर्मल भसीन मानती हैं चंडीगढ़ में सरोगेसी का मार्केट बढ़ रहा है। यहां औरतें सुंदर और स्वस्थ हैं, जो इस तकनीक से बच्चा चाहने वाले किसी भी दंपती की पहली शर्त होती है। डॉ. भसीन बताती हैं, ‘पिछले दिनों अमेरिका से आए एक डॉक्टर दंपती ने सरोगेसी के जरिये बच्चा हासिल किया। उन्होंने सरोगेट मदर के फीचर्स को काफी महत्व दिया। इसी तरह नॉर्वे के दंपती ने भी सरोगेट मदर वालंटियर के फीचर्स देखने चाहे ताकि बच्चे के फीचर्स शार्प हों।’ 

क्यों बढ़ रही है मांग 
चंडीगढ़ में सरोगेसी के जितने मामले हुए हैं, उनमें से अधिकतर दंपती ऐसे एनआरआई हैं जो अपने बच्चे में भारतीय फीचर चाहते हैं। बच्चे के इच्छुक दंपती पंजाबी नैन-नक्श और बेहतरीन व्यक्तिगत आदतों वाली सरोगेट मदर्स ढूंढ़ते हैं। बेदी नर्सिग होम एंड इनफर्टिलिटी सेंटर की डॉ. जीके बेदी का मानना है कि पंजाब और हरियाणा की औरतें शारीरिक तौर पर जेनेटिकली मजबूत हैं। उनकी खानपान की आदतें भी अच्छी हैं। इसके चलते उनमें गर्भस्थ बच्चे को संभालने की क्षमता भी बेहतर है। 

सरोगेट स्टेटस और आईवीएफ-सरोगेसी 
किसी और के बच्चे को जन्म देने के लिए कोख किराए पर देने वाली औरत का स्टेटस सरोगेट मदर का होता है। जिन मामलों में अंडाणु-शुक्राणु खुद दंपती के ही होते हैं और कोख किराए की, ऐसे मामलों को आईवीएफ-सरोगेसी कहा जाता है। 

कौन बन रही हैं सरोगेट वॉलंटियर 
सरोगेसी के लिए उम्रदराज दंपती ही नहीं, बल्कि युवा दंपती भी आगे आ रहे हैं। डॉ. भसीन के मुताबिक कई विवाहित औरतें पति की सलाह और मर्जी के साथ सरोगेट वालंटियर बनती हैं। इनको अच्छा मुआवजा मिलता है। ये औरतें युवा और मिडिल क्लास से हैं। अच्छी-खासी पढ़ी-लिखी होने के चलते पेरेंट्स उन्हें प्राथमिकता देते हैं। 

क्यों होती है जरूरत 
कामकाजी महिलाओं को प्रेगनेंसी के दौरान छुट्टी मिलने में मुश्किल होना भी सरोगेसी केस बढ़ने की एक वजह है। इसके अलावा बहुत सी महिलाओं में ओवम यानी अंडाणु बनने बंद हो जाते हैं और गर्भवती होने की संभावना खत्म हो जाती है, या उनका गर्भाशय इतना कमजोर हो जाता है कि बच्चा संभालने लायक नहीं रहता। थ्रेटेंड एबरेशन और हैबिचुअल मिसकैरिज जैसे मामलों में भी यही एकमात्र रास्ता रह जाता है। 

ऐसे पेरेंट्स के लिए स्वस्थ महिला डोनर्स की मदद से अंडाणु लिए जाते हैं। इन अंडाणुओं को फर्टीलाइज करने के लिए एक स्वस्थ गर्भाशय की जरूरत होती है। ऐसे में रिप्रोडक्टिव एज यानी 18 से 40 साल तक की औरत का चयन करके अंडाणु उसके गर्भ में ट्रांसफर कर दिया जाता है। बच्चे के जन्म के बाद उसे उसके बायोलॉजिकल और लीगल पेरेंट्स को सौंप दिया जाता है(रवि शर्मा,दैनिक भास्कर,चंडीगढ़,13.12.11)।

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गुरुवार, 10 नवंबर 2011

पंचम दासःपोलियो के रामबाण इलाज की मान्यता के लिए भटकता एक धन्वंतरि पुत्र

क्षीर सागर मंथन में आयुर्वेद के जन्मदाता देव धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। जंगलों और पहाड़ों की कंदराओं की जड़ी बूटियों में "अमृत" ढूंढ़ने का सिलसिला बदस्तूर जारी है लेकिन धन्वंतरि के इन "बेटों" को आज पहचान पाने के लिए एड़ी-चोटी का पसीना एक करना पड़ता है। २४ अक्टूबर को हम एक बार फिर धन्वंतरि को याद करने की रस्म अदा कर लेंगे लेकिन पोलियो ठीक करने की रामबाण दवा खोजने वाले बिहार के ४७ वर्षीय पंचम कुमार दास जैसे धन्वंतरि पुत्र को पहचान कब मिलेगी, आयुर्वेद को बढ़ावा देने के सरकार के बड़े-बड़े दावों के बीच यह सवाल आज भी यक्ष प्रश्न बना हुआ है। 

वे पिछले २२ साल से अपनी उस बेहद प्रभावी दवा के फार्मूले को सहेजते हुए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च सहित सरकारी शोध संस्थानों के चक्कर लगा रहे हैं लेकिन पूरे देश में घूम-घूम कर पोलियों के कई मरीजों को ठीक कर चुके पंचम दास अब भी गुमनामी के अंधरे में भटक रहे हैं। चिकित्सा शोध की देश की सर्वोच्च सरकारी संस्था आईसीएमआर की टीम ने दवा के प्रभाव को परखने के बाद वैद्य पंचम के दावे को सही भी पाया। लेकिन वह रिपोर्ट संस्थान की फाइलों में वर्षों से धूल फांक रहा है। इन संस्थानों में जाने पर उन्हें बार-बार यह तल्ख अहसास भी हुआ है कि सबकी रुचि उनके फॉर्मूले को हड़पने में ज्यादा है। समुद्र मंथन में अमृत के निकलने पर दानवों ने भी उसे देवों से छीनना चाहा था। इन संस्थानों में अपने अनुभव के बाद पंचम दास अपने फार्मूले को पेटेंट कराने का आवेदन करने का साहस भी नहीं जुटा पा रहे। कोई मल्टीनेशनल फार्मास्यूटिकल कंपनी कोई दवा या टीका लेकर आ जाए तो आईसीएमआर जैसे संस्थानों को बिना जरूरी शोध के भी उसे हरी झंडी देने की हड़बड़ी रहती है लेकिन पंचम दास की पोलियो की प्रभावी दवा को लेकर उनमें कोई तत्परता नहीं दिखती। 

नवरात्र के दौरान अभी अपने दस्तावेजों की पोटली लिए पंचम दास दिल्ली आए थे लेकिन वे अब उन संस्थानों में नहीं जाते। वे थक चुके हैं। दिल्ली में पोलियोग्रस्त ४ मरीजों को दवा देने आए पंचम दास ने नईदुनिया ऑफिस आकर अपनी व्यथा सुनाई। करीब ६ महीने पहले मुंबई के एक पोलियोग्रस्त आयुर्वेदिक डॉक्टर को अपनी दवा दे आए हैं। वह आयुर्वेदिक डॉक्टर अपने ऊपर दवा के प्रभाव को देख कर चमत्कृत हैं। वे बिहार में पोलियोग्रस्त दर्जनों लड़कियों का इलाज कर चुके हैं और उनका दावा है कि उनमें कई ऐसी होंगी जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की दी हुई साइकिल तक चला रही होंगी। पंचम जड़ी बूटियों से कैंसर सहित अन्य रोगों की दवा की खोज भी करना चाहते हैं लेकिन पोलियो की दवा के अपने अनुभव के बाद उनके "अमृत" ढूंढ़ने के उत्साह ने जबाव दे दिया है। बिहार के फॉरबिसगंज के हरीपुर डाक गांव के वैद्य पंचम दास की दवा को १९९६ में ही आईसीएमआर की एक टीम परख चुकी है। टीम ने उनके दिए जांच सर्टिफिकेट में यह कहा है कि १० -१५ साल से पोलियोग्रस्त बच्चों पर भी यह दवा प्रभावी पाई गई। 

पत्रकार एम.जे. अकबर से लेकर पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. सी.पी. ठाकुर तक उनकी दवा को वैज्ञानिक मान्यता देने की पैरवी कर चुके हैं। बिहार के आरा में एसपी रह चुके राजेंद्र प्रसाद का बेटा अखिलेश इस दवा के प्रभाव का जीता-जागता प्रमाण है। १९९५ की शुरुआत में जब वे पोलियोग्रस्त अपने बेटे को पंचम दास के पास ले गए थे तो दास ने कहा था कि ६ महीने में दवा का प्रभाव सामने आएगा लेकिन २ महीने में ही जब वह ठीक होने लगा। उस समय से वह अपने पांव पर चल रहा है। लेकिन अंग्रेजी दवा पद्धति का समर्थन करने वाली सत्ता व्यवस्था ने पंचमदास को जो "विकलांग" बनाया है, वे चलने की अभी तक असफल कोशिश कर रहे हैं(धनंजय,नई दुनिया,दिल्ली,24.10.11)। 


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शनिवार, 5 नवंबर 2011

उत्तरप्रदेशःआयुर्वेद से उठ रहा है विश्वास

प्रदेश में आयुर्वेद की स्थिति का जायजा लें तो सूबे में इस चिकित्सा पद्धति की दशा और दिशा निराश करती है। हालांकि सरकार का यह दावा है कि हर साल करीब डेढ़ करोड़ लोग आयुर्वेद चिकित्सा का लाभ उठाते हैं। लेकिन आयुर्वेद चिकित्सा की दवाओं पर खर्च होने वाले पैसे पर नजर दौड़ाए तो एक मरीज के हिस्से में दस रुपए भी नहीं आते। हालांकि दवाओं के निर्माण में बढ़त लगातार जारी है। दवाओं के निर्माण में इस बार डेढ़ करोड़ रुपए का इजाफा हुआ है फिर भी अस्पतालों में न रोगी दिखाई पड़ते हैं और न ही रोग में इस्तेमाल करने वाली दवाओं की खरीददारी। वर्ष २००९-१० में प्रदेश के आयुर्वेदिक डॉक्टरों ने २ करोड़ ५२ लाख रुपए की दवाओं का निर्माण किया था लेकिन इस बार वर्ष २०१०-११ में डॉक्टरों ने ४ करोड़ ३ लाख की दवाओं का निर्माण किया है। इसकी खपत के लिए अब मंत्री भी परेशान हैं। 

 इस समय प्रदेश में २,२१० आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सालय हैं लेकिन इनमें से ११५९ चिकित्सालय किराए पर चल रहे हैं। इनका वार्षिक किराया २ करोड़ ४० लाख है। इन अस्पतालों में रोगियों की संख्या बेहद कम है। पूरे प्रदेश में जनपदवार दवाओं की आपूर्ति करने का जिम्मा लखनऊ और पीलीभीत निर्माणशालाओं को ही है क्योंकि सूबे की ये ही दो अकेली निमार्णशालाएं हैं। 

प्रदेश के राजकीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी औषधि निर्माणशाला को गुणवत्ता का मानक प्राप्त हो गया है। इनकी दवाओं को गुड मैन्यूफैर्क्चड प्रोडक्ट (जीएमपी) की मान्यता मिल गई है। लेकिन खपत को लेकर चिंताए बरकरार हैं। इसी प्रकार राजधानी के आयुर्वेद महाविद्यालय में भले ही बाल एवं प्रसूति विभाग का उद्घाटन हो गया हो पर बीते एक साल में यहां सिर्फ एक प्रसव हो पाया है। इसकी वजह अल्ट्रासाउंड व्यवस्था का अभाव और जननी सुरक्षा योजना के लाभ से इस अस्पताल का वंचित होना है। यही नहीं, तीन स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ एवं इतने ही बाल रोग विशेषज्ञ यहां तैनात हैं पर इस अस्पताल में नवजात बच्चों के टीकाकरण की अनुमति नहीं है। ऐसे में कोई इस ओर क्यों रुख करेगा। किसी भी चिकित्सा पद्धति की सफलता उसकी पढ़ाई पर निर्भर करती है। राज्य में आयुर्वेद की पढ़ाई की गति समझने के लिए सिर्फ यह जान लेना पर्याप्त होगा कि यहां प्रोफेसर के दस, रीडर के चार और प्रवक्ता के २३ पद रिक्त हैं। यही नहीं, पांच विषयों में स्नात्कोत्तर पाठ्यक्रम शुरू करने की घोषणा को भी कई सालों से अंजाम देने में सफलता हासिल नहीं हो पाई है(लखनऊ से योगेश मिश्र की यह रिपोर्ट नई दुनिया,दिल्ली संस्करण में 24.10.11 को प्रकाशित है)। 


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 कसरत कितना करें और किन सावधानियों के साथ

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बुधवार, 2 नवंबर 2011

बिहारःउपेक्षित है आयुर्वेद

आयुर्वेद का जिक्र आते ही हाथों में अमृत कलश लिए धन्वंतरि की तस्वीर जेहन में उभर आती है। आयुर्वेद में सभी असाध्य रोगों का इलाज उपलब्ध है लेकिन चिकित्सा की यह पद्धति बिहार में उपेक्षित ही रही है। गांवों में वैद्य परंपरा भी अब समाप्ति की ओर है। पहले लगभग हर गांव में ज़ड़ी-बूटी से इलाज करने वाले वैद्य होते थे। असाध्य रोग भी गांवों में ही ठीक हो जाते थे। लेकिन प्रोत्साहन के अभाव में गांवों से वैद्य परंपरा खत्म हो गई है। गांवों में अब हर जगह बिना डिग्री वाले एलोपैथ के झोलाछाप डॉक्टर दिखते हैं। आयुर्वेद शिक्षण का भी प्रदेश में बुरा हाल है। वैसे एलोपैथ में कई बीमारियों का इलाज नहीं होने के कारण लोग फिर से आयुर्वेद और होम्योपैथी की ओर मुखातिब हो रहे हैं। आयुर्वेदिक इलाज फिर चमकने लगा है लेकिन इसके लिए लोग बाबा रामदेव की दवाओं पर ही निर्भर हैं। 

बिहार में पहले ११ आयुर्वेदिक कालेज थे लेकिन एक-एक कर बंद होते गए। इन कालेजों को छात्र ही नहीं मिल पाते थे। मेडिकल काउंसिल के मानदंड पर खरे नहीं उतर पाने के कारण इन कालेजों की मान्यता रद्द हो गई। वर्तमान में पांच आयुर्वेदिक कॉलेज चल रहे हैं। पटना, बक्सर, भागलपुर, दरभंगा और बेगूसराय के आयुर्वेद कालेजों में बीएएमएस की प़ढ़ाई होती है। भारतीय चिकित्सा परिषद ने कालेजों को सशर्त मान्यता दी है। शर्तों को पूरा नहीं किए जाने पर मान्यता रद्द हो सकती है। अन्य छह कालेजों में दस वर्षों से छात्रों का नामांकन बंद है। पटना में आयुर्वेद के स्नातकोत्तर की प़ढ़ाई के लिए २०१० में मान्यता मिली थी लेकिन शर्तों को पूरा नहीं किए जाने पर मान्यता रद्द कर दी गई। 

आयुर्वेदिक अस्पतालों में संसाधनों की भारी कमी है। राज्य सरकार ने सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर भी आयुष डक्टरों की भर्ती का फैसला लिया था लेकिन यह लागू नहीं हो पाया। आयु्‌र्वेद, होम्योपैथ और यूनानी डाक्टरों के अधिकांश स्वीकृत पद खाली प़ड़े हैं। सरकारी अस्पतालों में आयुर्वेद और होम्योपैथ की दवाएं नहीं रहती हैं। आयुष डाक्टरों के आंदोलनों से भी कोई फर्क नहीं प़ड़ा है। आम लोग आयुर्वेद और होम्योपैथ की शरण में तभी जाते हैं जब एलोपैथ से उन्हें निराशा होती है। 

भाग-दौ़ड़ की वर्तमान जीवनशैली में अधिकांश लोग डिप्रेशन, डाइबिटीज, स्पॉन्डेलाइटिस जैसी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। एलोपैथ में इन बीमारियों से समूल नाश करने वाली दवाओं का अभाव है। लिहाजा लोगबाग आयुर्वेद की शरण लेने लगे हैं। लेकिन ऐसे मरीजों को कुशल डाक्टरों के परामर्श के लिए काफी भटकना प़ड़ता है। आयुर्वेद कालेजों की स्थिति दयनीय है और कुशल डॉक्टर तैयार नहीं हो पा रहे हैं। बक्सर, भागलपुर और दरभंगा के आयुर्वेद कालेजों में भी नामांकन बंद हैं। २००८-०९ में बेगूसराय आयुर्वेद कालेज को मान्यता मिली थी जो बाद में रद्द हो गई। बिहार राज्य आयुर्वेदिक एवं यूनानी परिषद कालेजों का निबंधन करता है और मान्यता अखिल भारतीय चिकित्सा परिषद देती है। यूनानी निदेशालय से ही आयुर्वेद कालेज भी संचालित होते हैं। गया में दो निजी आयुर्वेद कालेज हैं जिनमें से एक की मान्यता रद्द हो गई है। मुजफ्फरपुर और मोतिहारी में निजी आयुर्वेद कालेज चल रहे हैं। आयुर्वेदिक कालेजों में प्रोफेसर, रीडर और लेक्चरार के १८० पद हैं जिनमें से १३५ पद पर ही लोग काम कर रहे हैं। ४५ पद खाली हैं। छपरा और सीवान में भी एक-एक निजी आयुर्वेद कालेज हैं। एक सरकारी आयुर्वेद कालेज को चलाने में सलाना लगभग तीन करो़ड़ रुपए का खर्च आता है(राघवेन्द्र नारायण सिंह,नई दुनिया,दिल्ली,14.10.11)। ---------------------------------------------------------------------------------------------------- 


कल सुबह सात बजे के मुख्य आकर्षणः 




क्यों रामदेव जी के अनुसार लौकी के जूस से डरने की ज़रूरत नहीं है

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शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ःआयुर्वेद के विकास का लाभ नहीं मिल रहा लोगों को

बाबा रामदेव का असर कहें या एलोपैथी दवाओं से उपजी असंतुष्टि, मध्य प्रदेश में आयुर्वेद के प्रति रूझान बढ़ा है। आयुर्वेद दवा कंपनियों की बढ़ती बिक्री इसकी गवाह है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में औषधीय पौधों की खेती बढ़ी है और आयुर्वेद औषधियों का निर्माण भी बढ़ा है लेकिन नियमों की जटिलताओं के चलते राज्य "एक्सपोर्ट" में पिछड़ रहा है। दूसरी तरफ, एलोपैथी डॉक्टरों को गावों में भेज पाने में हर तरह से विफल रही सरकार बार-बार कहती है कि अस्पतालों के खाली पदों पर आयुर्वेद चिकित्सकों की नियुक्ति होगी लेकिन २००२ के गजट नोटिफिकेशन के बाद भी यह काम नहीं हो पाया है। यानी प्रदेश में आयुर्वेद के विस्तार के लिए मौका भी है, दस्तूर भी है लेकिन प्रशासन ही तैयार नहीं है। 

प्रदेश में औषधीय फसलों जैसे आंवला, बेल, अश्वगंधा, शतावर, कालमेघ, इसबगोल, कलौंजी, सर्पगंधा, गुड़मार, नागरमोथा, गिलोय और सफेद मूसली का उत्पादन बढ़ा है। जबलपुर, मंडला, पन्ना, सतना, छिंदवाड़ा, इंदौर, मंदसौर आदि जिलों में किसानों ने इन फसलों के उत्पादन में रुचि दिखाई है। वन मंत्री सरताज सिंह कहते हैं कि आयुर्वेद की लोकप्रियता को देखते हुए हम लुप्त हो रही जड़ी-बूटियों को बचाने के लिए विशेष अभियान चला रहे हैं। वन विभाग ने औषधीय पौधों को लगाने के साथ अमरकंटक और तामिया में लुप्त होती जड़ी-बूटियों के उत्पादन के लिए विशेष प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। इसके साथ ही भोपाल में बड़ा आयुर्वेदिक नेत्र अस्पताल प्रारंभ किया गया है। मध्य प्रदेश सरकार ने औषधीय पौधों के उत्पादन और इनके क्रय-विक्रय के लिए बाजार तैयार करने के उद्देश्य से १९९६ में मेडिसिनल प्लांट टास्क फोर्स का गठन किया था। इसके बाद वर्ष २००३-०४ में एनएमपीबी ने मध्य प्रदेश के ३६७ औषधीय फसलों के प्रोजेक्ट के लिए ८७७ लाख रुपए की मंजूरी दी। उत्पादन में वृद्धि के बाद भी प्रदेश से औषधियों का "एक्सपोर्ट" नहीं हो पा रहा है जबकि विदेशों में मांग को देखते हुए भारत से प्रतिवर्ष २५० प्रकार के औषधीय पौधों, उनकी जड़, फल और पत्तियों का एक्सपोर्ट किया जाता है। प्रदेश में कुछ दवाओं का उत्पादन तो बढ़ा लेकिन एक्सपोर्ट के हाल नहीं सुधरे हैं। इसका कारण अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का पूरा न होना है। सूत्र बताते हैं कि एक्साइज, वेट सहित अन्य कर और वन विभाग की कठिन औपचारिकताओं के कारण भी इंडस्ट्री अपेक्षित गति से विस्तार नहीं कर पा रही है। दवाओं की जांच सहित दूसरे सर्टिफिकेशन के अभाव में प्रदेश की कंपनियों को आर्डर नहीं मिल पाते।

उधर,छत्तीसगढ़ में भी राज्य के गठन के बाद के एक दशक में आयुर्वेद का तेजी से विकास हुआ है। हालांकि इसमें विकास की अभी और संभावना है। एक मात्र शासकीय आयुर्वेद कॉलेज के अलावा राजनांदगांव के मनकी में छत्तीसगढ़ आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज तथा दुर्ग के चंद्रपुरी में राजीव लोचन आयुर्वेद कॉलेज की स्थापना हुई है। इन तीनों कॉलेज से प्रतिवर्ष १८० बीएएमएम (आयुर्वेद) डॉक्टर तैयार होते हैं। राजधानी के नगपुरा में महावीर आयुर्वेद कॉलेज प्रस्तावित है। इस कॉलेज के चालू होने से प्रतिवर्ष २५० डॉक्टर तैयार होंगे। शासकीय आयुर्वेद कॉलेज में पहले मात्र कायचिकित्सा में एमडी होती थी, लेकिन अब पांच विषयों में एमडी हो रही है। इनमें कायचिकित्सा, शरीर रचना विज्ञान (एनाटॉमी), रसशास्त्र, आयुर्वेद सिद्धांत, शल्यतंत्र सामान्य विषय शामिल हैं। 

राज्य शासन द्वारा शासकीय आयुर्वेद कॉलेज को मॉडल कॉलेज के रूप विकसित किया जा रहा है। इसके तहत कॉलेज में २०० बिस्तरों वाला अस्पताल, कॉलेज के लिए नया भवन व हर्बल गार्डेन का विकास किया जा रहा है(भोपाल से पंकज शुक्ला तथा रायपुर से जयप्रकाश मिश्र की ये रिपोर्टें दैनिक नई दुनिया के दिल्ली संस्करण में 24.10.11 को प्रकाशित हैं)। 


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स्तनपान के दिनों में माताओं का खान-पान कैसा हो

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शनिवार, 24 सितंबर 2011

उत्तरप्रदेश में प्रयोग सफल रहा तो दूसरे राज्यों में भी वैद्यजी करेंगे उपचार

गांवों के लिए दोयम दर्जे के डाक्टरों की फौज तैयार करने में विफल यूपीए सरकार ने अब ग्रामीण जनता का उपचार ‘वैद्य जी’ से कराने की सोची है। फिलहाल यह व्यस्वस्था सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से शुरू की गई है और सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो धीरे-धीरे सभी राज्यों के गांवों में ‘वैद्य जी’ तैनात हो जाएंगे। गौरतलब है कि सबसे ज्यादा डाक्टरों की कमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में है। गांवों में ‘वैद्य जी’ तैनात करने के लिए केंद्र सरकार ने 27.35 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। पैसा राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के खाते से दिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि गांवों में डाक्टरों की कमी को पूरा करने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने मेडिकल स्कूल खोलने की योजना बनाई थी जिसके तहत साढ़े तीन वर्ष की पढ़ाई पूरी करने के बाद मेडिकल स्कूल के छात्र को उपचार करने की डिग्री दी जानी थी। इस योजना को मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया के तत्कालीन अध्यक्ष डा. केतन देसाई ने मंजूरी भी दे दी थी और दावा किया गया था कि जिला स्तर पर खुलने वाले मेडिकल स्कूलों में चार वर्ष बाद हर वर्ष कम से कम पांच हजार डाक्टर निकलने लगेंगे और दस वर्ष बाद गांवों में डाक्टरों की कमी समाप्त हो जाएगी। एमसीआई ने इन डाक्टरों का पंजीकरण करने के लिए एक शर्त लगाई थी जिसके तहत डाक्टरों को जिंदगी भर गांव में ही प्रैक्टिस करना था, मगर अंग्रेजी डाक्टरों के विरोध के चलते यह योजना फिलहाल रोक दी गई है। इस समय ग्रामीण इलाकों में करीब 16 हजार डाक्टरों की कमी है जिनमें 12,263 विशेषज्ञ व 3,789 परामर्शदाता हैं। इनमें सबसे ज्यादा कमी उत्तर प्रदेश में है। यहां के गांवों में 1,442 विशेषज्ञ व 1,689 परामर्शदाता हैं जबकि योजना आयोग की 2008 की रिपोर्ट के मुताबिक पूरे देश में 6 लाख डाक्टरों की कमी है। इस समय प्रति 30 हजार ग्रामीण जनता पर एक डाक्टर का औसत चल रहा है। बहरहाल डाक्टरों की इस कमी को पूरा करने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने वैकल्पिक व्यवस्था करने को सोची है जिसके तहत गांवों में अब आयुर्वेदाचार्यों को तैनात किया जाएगा। मंत्रालय ने उत्तर प्रदेश के परिवार कल्याण सचिव को निर्देश दिए हैं कि ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत इस वर्ष 1140 आयुर्वेदिक पुरुष डाक्टरों और 759 आयुर्वेदिक फार्मासिस्टों को तैनात कर दिया जाए। इस काम के लिए मंत्रालय ने दो मदों में 21.89 करोड़ रुपए एवं 5.46 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। यह अतिरिक्त धनराशि आयूष विभाग के नाम पर मिशन के खाते से उत्तर प्रदेश को दी गई है। यह भी पता चला है कि यदि उत्तर प्रदेश में इन डाक्टरों से ग्रामीण जनता को राहत मिली तो बाद में इसे मध्य प्रदेश में भी लागू किया जाएगा, क्योंकि उत्तर प्रदेश के बाद मध्य प्रदेश के गांवों में डाक्टरों की सर्वाधिक कमी है। मंत्रालय इस बात पर भी विचार कर रहा है कि यदि आयूष के डाक्टरों से ग्रामीण जनता संतुष्ट नजर आई तो धीरे-धीरे यह व्यस्वस्था सभी राज्यों के ग्रामीण इलाकों में लागू कर दी जाएगी(ज्ञानेन्द्र सिंह,राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,21.9.11)। 

रिसर्च बिना "वैद्यकी" 
सहारा की इसी दिन की एक अन्य रिपोर्ट कहती है कि अभी आम आदमी की सेहत दुरुस्त रखने की सुविधाओं के मामले में देश की स्थिति बहुत कमजोर है। तीन साल पूर्व के अनुमानों के आधार पर आबादी को स्वस्थ रखने के लिए देश में छह लाख डॉक्टरों की कमी है। अभी महज 335 मेडिकल कॉलेज हैं जिनमें 181 निजी व 154 सरकारी हैं। इनमें क्रमश: 22,770 तथा 18,799 (कुल 41 हजार, 569) युवकों को चिकित्सा शिक्षा दी जा रही है। 2011 में आकर यह हालात तब बने हैं जब 2008 से लगातार सीटों में इजाफा हुआ। अन्यथा, 2010 में तो सिर्फ 32,356 सीटें चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई के लिए उपलब्ध थीं। देश में इस समय सभी तरह के रजिस्र्टड डॉक्टरों की कुल तादाद 8 लाख, 56 हजार है मगर आंकड़ों के अनुसार छह लाख डॉक्टर ही सही मानकों पर सक्रिय हैं। छह लाख डॉक्टरों की कमी है और अभी औसतन हर 30 हजार ग्रामीण आबादी पर एक डॉक्टर है। सरकार का मानना है कि मौजूदा हालात में आम जनता की चिकित्सा चुनौतियों से तब निपटा जा सकता है जब हर साल एक लाख डॉक्टर तैयार किये जा सकें। पर इसके लिए जो जरूरी संसाधन बनाने होंगे, उस मोच्रे पर हालत बहुत पतली है। 12वीं योजना का अंतिम मसौदा पूरी तरह प्रकट नहीं हुआ है। लेकिन जन- स्वास्थ्य इसकी शीर्ष प्राथमिकता नहीं है। दूसरी ओर मेडिकल की पढ़ाई कितनी महंगी होती जा रही है, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि निजी क्षेत्र के मेडिकल कॉलेजों में एक डॉक्टर तैयार होने की लागत सरकारी कॉलेजों की तुलना में 20 गुना अधिक है। उनमें ट्यूशन फीस काफी ज्यादा है, अन्य मदों में भी भारी शुल्क लेकर छात्रों व उनके अभिभावकों का ‘उत्पीड़क दोहन’ किया जाता है। इसका जिम्मेदार पहले तो सम्बंधित नियामक- मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया की लचर व्यवस्था है और उस पर मुलम्मा चढ़ाते हैं स्पष्ट दिशा-निर्देशों एवं कड़े नियम-कानूनों के अभाव और सरकारी मशीनरी की ‘सुविधा शुल्क’ पर चलने वाली कार्यपण्राली। इस दशा में आयुर्वेद का पल्ला थामने की बात कुल जमा सरकारी मजबूरी अधिक दिखती है। नतीजे तो बाद में दिखेंगे, लेकिन अभी यह कवायद उत्तर प्रदेश में होने जा रहे चुनावों की रोशनी में भी ज्यादा लगती है। नहीं तो योजना के लिए केवल इस राज्य को चुनने की विवशता क्या थी? यूपीए सरकार के दौर में गांवों को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए ‘खुली लैब’ जैसा बना दिया गया है। सुबूत केंद्र सरकार की वह योजना है जिसके अंतर्गत सिर्फ गांवों के लिए साढ़े तीन साल की पढ़ाई के आधार पर ‘डिग्रीधारी डॉक्टर’ बनाये जाने थे। भला हो, उन लोगों का जिनके चलते दोयम दज्रे के डॉक्टर बनाने की यह योजना परवान न चढ़ सकी। आयुर्वेद भारतीय चिकित्सा प्रणाली है और इसके भैषज्य अचूक होने की बात हमारे ग्रंथों तथा संहिताओं में है। बावजूद इसके पर्यावरण और बीमारियों की नयी चुनौतियों के बरक्स आयुर्वेद में अध्ययन-अनुसंधान की कमी इस प्रयोग के प्रति विश्वस्त नहीं करती। इस ओर भी ध्यान देने की जरूरत है!

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सोमवार, 8 अगस्त 2011

भारत में दवाओं के परीक्षण में सैकड़ों की मौत

भारत में पिछले चार सालों में दवाओं के असर की जांच करने के लिए किए जा रहे परीक्षणों में सैकड़ों लोगों की मौत हुई है. स्वास्थ्य मंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद ने संसद को जानकारी दी है कि पिछले चार वर्षों में ऐसे परीक्षणों के दौरान क़रीब 1500 मरीज़ों की मौत हुई है. स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि पिछले साल इन परीक्षणों में भाग ले रहे लोगों में से क़रीब 500 की मौत हुई और इनमें से केवल 22 मामलों में दवा कंपनियों ने मृतकों के परिजनों को मुआवज़ा दिया. भारत में फिलहाल क़रीब 1500 दवाओं के परीक्षण किए जा रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दवाओं के परीक्षण के लिए दवा कंपनियां भारत की ओर आकर्षित हैं क्योंकि यहां चिकित्सा क्षेत्र में प्रशिक्षित लोग और परीक्षण करवाने के इच्छुक मरीज़ कम ख़र्च पर मिल जाते हैं और साथ ही परीक्षण प्रणाली पर सरकारी नियंत्रण कम है. ग़ैर-सरकारी संस्थाएं लगातार दवाओं के लिए किए जा रहे परीक्षणों में भाग लेने वाले मरीज़ों को इससे जुड़े ख़तरों की पूरी जानकारी देने और उनकी सहमति लेने पर बल देती रही हैं. सरकारी नीति भारत में दवाओं का परीक्षण वर्ष 2005 में शुरू हुआ और इसके लिए क़ानूनी स्वीकृति लेना वर्ष 2009 में अनिवार्य किया गया. अब कंपनियों को परीक्षण के लिए सेंट्रल ड्रग्स स्टैन्डर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइज़ेशन (केंद्रीय दवा मानक नियंत्रण संस्थान) से अनुमति लेनी होती है. इसके लिए हर दरख़्वास्त पर ग़ौर करने के लिए एक आचार समिति बनाई जाती है. ये समिति दवा कंपनी से परीक्षण के मक़सद, दायरे, अवधि और तरीक़े के बारे में पूरी जानकारी लेती है. इसके बावजूद स्वास्थ्य क्षेत्र में काम कर रहे लोगों का दावा है कि कई परीक्षणों को नियमों की अनदेखी कर स्वीकृति दे दी जाती है. इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल एथिक्स की प्रबंध संपादक संध्या श्रीनिवासन भारत में दवाओं के परीक्षण में आचार से जुड़े सरोकार पर शोध कर चुकीं हैं. वो कहती हैं, “भारत की मौजूदा व्यवस्था में जवाबदेही का अभाव है, मसलन, दवा कंपनियां अगर मरीज़ों को पूरी जानकारी दिए बग़ैर उन पर परीक्षण कर रही हैं या किसी भी और नियम का उल्लंघन कर रही हैं, तो उन्हें स्वीकृति देने वाली आचार समितियों से सवाल नहीं पूछे जा सकते.” श्रीनिवासन बताती हैं कि ख़र्चीले इलाज वाली गंभीर बीमारियों के लिए जब दवा कंपनियां किसी स्थानीय डॉक्टर के ज़रिए मरीज़ों को नई दवा के बारे में बताती हैं तो मरीज़ अक्सर इससे जुड़े जोख़िम को नहीं समझ पाते और इसे मुफ़्त इलाज मान कर हामी भर देते हैं. वर्ष 2008 में एक अमरीकी ग़ैर-सरकारी संस्था ‘पाथ’ ने आंध्र प्रदेश में सर्विकल कैंसर से बचाव के लिए बनाए गए एचपीवी टीके का परीक्षण करने की अनुमति ले ली. लेकिन स्वयंसेवी संस्थाओं के इसके ख़िलाफ विरोध व्यक्त किया और आरोप लगाया कि जिन बच्चियों को ये टीका दिया जा रहा है उन्हें उस बारे में जानकारी नहीं है और उनसे परीक्षण का हिस्सा बनने की अनुमति भी नहीं ली गई है. इस परीक्षण के दौरान सात लड़कियों की मौत हो गई. दबाव पड़ने पर आखिरकार ये मुद्दा संसद में उठा और एक जांच समिति का गठन किया. समिति ने पाया कि इन बच्चियों से नहीं बल्कि इनके हॉस्टल के वॉर्डन से बच्चियों पर परीक्षण की अनुमति ली गई थी. इस परीक्षण को फौरन रोकने का आदेश दिया गया और इससे जुड़े सभी कार्यों के रोककर उनकी समीक्षा करने का आदेश दिया गया. भारतीय वाणिज्यिक उद्योग संघ यानी एसोचैम के मुताबिक़ भारत में दवाओं के परीक्षण का उद्योग आठ हज़ार करोड़ रुपए तक अनुमानित है. एसोचैम के आकलन के मुताबिक़ अगले पांच सालों में इस उद्योग में 50,000 लोगों को व्यवसाय मिलेगा. 
 “भारत की मौजूदा व्यवस्था में जवाबदेही का अभाव है, मसलन, दवा कंपनियां अगर नियम का उल्लंघन कर रही हैं तो उन्हें स्वीकृति देने वाली आचार समितियों से सवाल नहीं पूछे जा सकते”- इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल एथिक्स की प्रबंध संपादक संध्या श्रीनिवासन(दिव्या आर्य,बीबीसी).

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मंगलवार, 26 जुलाई 2011

हैल्थ-सन,मुसली पावर एक्स्ट्रा और डी-गोल्ड से सावधान रहें

सैक्स पावर बढ़ाने के लिए आयुर्वेदिक कैप्सूल का इस्तेमाल करने वालों को सावधान होना पड़ेगा। राजस्थान में,तीन आयुर्वेदिक औषधियों में एलोपैथी दवा 'वियाग्रा' के साल्ट 'सिल्डेनाफिल' की मिलावट पाई गई है। आयुर्वेद विभाग तीनों फर्मों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेगा। वहीं इन फर्मो के खिलाफ कार्रवाई में लापरवाही बरतने वाले उदयपुर के ड्रग इंस्पेक्टर को चार्जशीट दी गई है।
आयुर्वेद विभाग को पिछले दिनों कुछ दवाओं में एलोपैथी दवाओं के साल्ट मिले होने की शिकायत मिली। इस विभाग ने इसकी जांच करवाई तो तीन दवाओं में मिलावट पाई गई। इनमें 'हैल्थ-सन' (बैच नम्बर एचएस 152), मूसली पावर एक्सट्रा (बैच नम्बर एमपी, जी, 118/10) और 'डी-गोल्ड 8000' (बैच नम्बर 1115) शामिल है।
विभाग ने इस संबंध में उदयपुर के ड्रग इंस्पेक्टर रामपाल सोमानी को कार्रवाई के लिए कहा। लेकिन उन्होंने चार महीने तक मामला दबाए रखा। लापरवाही उजागर होने पर विभाग ने सोमानी को चार्जशीट थमा दी है।
रिपोर्ट आए चार महीने
राज्य के औषधि नियंत्रक डी.के.श्रृंगी ने 7 अप्रेल 2011 को भेजी रिपोर्ट में आयुर्वेद विभाग को लिखा था कि उदयपुर से जांच के लिए भेजी गई उक्त तीनों दवाओं में वियाग्रा टेबलेट के प्रमुख घटक सिल्डेनाफिल की मिलावट किए जाने की पुष्टि हुई है। उक्त तीनों औषधियों में मिलावट की रिपोर्ट 7 अप्रेल 2011 को ही विभाग को मिल गई। इसके बाद भी विभाग की ओर से आज तक कोई कोई कार्रवाई नहीं की गई।
यहां से निर्मित
जांच रिपोर्ट के अनुसार हैल्थ सन की निर्माता कम्पनी ज्योति हर्ब इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, मोहाबेवाला, देहरादून है। मूसली पावर एक्सट्रा का निर्माण कुनाथ फार्मासिटीकल्स मुवातपुझा, एर्नाकुलम में हुआ है जबकि डी गोल्ड 8000 की निर्माता डी-इंडिया हर्बल लासुधा मोरी, इंदौर है।
भीलवाड़ा और उदयपुर से नमूने
विभाग ने हैल्थसन और मूसली पावर एक्स्ट्रा के नमूने भीलवाड़ा से और डी-गोल्ड 8000 के नमूने उदयपुर से उठाए। दोनों ही स्थानों पर इस्तगासे दायर किए जाएंगे।
रोक की सिफारिश करेंगे
उदयपुर के ड्रग इंस्पेक्टर रामपाल सोमानी को मामले में संबंधित के खिलाफ इस्तगासा पेश करने को कहा गया लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। सोमानी को मामले में चार्जशीट दी गई है। तीनों कम्पनियां दूसरे राज्यों की हैं। वहां की राज्य सरकारों को पत्र लिखकर उक्त दवाओं की बिक्री पर रोक लगाने की सिफारिश भी की जा चुकी।
-एन.के.शर्मा, आयुर्वेद निदेशक
इस्तगासा दायर किया जाएगा। कुछ तकनीकी कमियां हैं जिन्हें पूरा किया जाना है। बिना सम्पूर्ण दस्तावेजों के इस्तगासा करना बेकार है। इसलिए देरी हुई। इस्तगासे में उन दुकानदारों को भी पार्टी बनाया जाएगा जिनके यहां से नमूने उठाए गए हैं।
-रामपाल सोमानी, ड्रग इंस्पेक्टर, आयुर्वेद, उदयपुर
(युगलेश शर्मा,राजस्थान पत्रिका,अजमेर,26.7.11)

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सोमवार, 4 जुलाई 2011

90 एंटीबायोटिक दवाओं की खुली बिक्री पर रोक

दिल्ली बग से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुई फजीहत के बाद केन्द्र सरकार एक बड़ा फैसला लेने जा रही है। वह 90 तरह की एंटीबायोटिक्स दवाओं की खुली बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी में है। इसमें से 16 तरह की दवाएं सिर्फ सरकारी और सरकार के अधीन चलने वाले अस्पतालों को ही सप्लाई की जा सकेंगी, वहीं 74 तरह की दवाएं एमबीबीएस चिकित्सक के पर्चे पर ही बेची जा सकेंगी। नये नियम को लागू करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने शेड्यूल एचएक्स में संशोधन कर उसे ड्रग ट्रायल एडवाइजरी बोर्ड (डीटीएबी) में पारित करने को भेज दिया है।
एंटीबायोटिक दवाओं की खुली बिक्री से गलत उपयोग हो रहा है, जो घातक है। ब्रिटेन में एक रिसर्च के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने दवाओं के शेडूयल एचएक्स में संशोधन किया गया है। संशोधित शेड्यूल के तहत इसे दो भागों में बांटा गया है। पहले भाग में 16 तरह की वे एंटीबायोटिक्स दवाएं शामिल की गई हैं, जिनकी बिक्री सरकारी अस्पतालो में या फिर सरकार के अधीन चलने वाले अस्पतालों में ही की जा सकेगी। इनकी बाजार बिक्री प्रतिबंधित रहेगी, निजी प्रैक्टिसनर्स भी इनको नहीं लिख सकेंगे।
दूसरे भाग में 74 तरह की वे एंटीबायोटिक दवाएं हैं, जिनकी बाजार में बिक्री के लिए शर्ते निर्धारित की जा रही हैं। मेडिकल स्टोर इन दवाओं को एमबीबीएस डॉक्टर का पर्चा देखने के बाद ही बेच सकेंगे। इसके लिए पर्चे की एक फोटो कॉपी मेडिकल स्टोरों को अपने पास रखनी होगी। यही नहीं पर्चे पर भी डॉक्टर द्वारा लिखी गई मात्रा के बराबर ही दवाएं दी जा सकेंगी।
ऑल इंडिया केमिस्ट एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स फेडरेशन के अध्यक्ष कैलाश गुप्ता के मुताबिक संशोधित शेड्यूल ड्रग ट्रायल एडवाइजरी बोर्ड को दिया जा चुका है। बोर्ड की स्वीकृति के बाद शीघ्र ही इसका नोटीफिकेशन कर दिया जाएगा।
विक्रय बंधित होने वाली 16 दवाएं
पार्ट ए-मेरोपैनम, इमीपैनम, अर्थापैनम, डोरीपैनम, फैरोपैनम, पॉलीमैक्सिन बी, कॉलिस्टिन, वेंकोमायसन, टैल्कोप्लानिम, लीनोजॉलिड, टेजीसिलीन, एथ्रियोनम, कैफेपाइम, कैफपिरोम, मॉक्सीफ्लोक्सिन, गैमीफ्लोक्सिन।
डॉक्टर पर्चे पर मिलने वाली दवाएं
एमिकासिन, जेंटामाइसन, कैनामाइसन, नियोमाइसन, पैरामोमिसिन, स्ट्रैप्टेामाइसिन, टोबरामाइसन, इजीपैमाइसन, फ्रामिसिटीन, कैफाजॅलिन, कैफडिनिर, कैफिक्सिम, कैफोपैराजॉन, कैफोटैक्साइम, कैफोपोडाक्सिम, कैफप्रोजिल, कैफ्टाजिडाइम, कैफ्टीब्यूटन, कैफ्ट्रियाक्जान, कैफ्यूरॉक्जिम, कैफेक्लर, कैफ्लेक्सिन, कैफ्डीटोरिन, कैफेटामेट, कैफ्टीजॉक्सिम, एजीथ्रोमाइसिन, क्लैरिथ्रोमाइसिन, एमॉक्सिलिन, इरीथ्रोमाइसिन, कोडाइन, डैक्स्ट्रोपॉक्सिपीन, डिपहैनॉक्जिलेट, प्रोपॉक्सिफीन, निट्राजेपॉम, पेंटाजोसाइन, ब्यूप्रैनॉफ्रिन, एल्प्राजॉलम, मिडजॉलम, एम्पिसिलीन, पैनिसिलीन, क्लॉक्सासिलीन, डिक्लॉक्सासिलीन, ओक्सासिलीन, कैफाड्राक्सिल, पिपेरासिलीन, बैलोफ्लॉक्सासिन, सिप्रोफ्लॉक्सासिन, गैटिफ्लॉक्सासिन, लीवोफ्लॉक्सासिन, लोमिफ्लॉक्सासिन, नालिडिसिक एसिड, नारफ्लोक्सासिन, ओफ्लॉक्सासिन, पैफ्लॉक्सासिन, प्रूलीफ्लॉक्सासिन, स्प्राफ्लॉक्सासिन, माइनोसाइक्लीन, ऑक्सीअेट्रासिलीन, टैट्रासिलीन, कैलोराम्फैनिकॉल, ट्रैमिथोफ्रिम एंड सल्फामैथोक्जॉल, कैफालोराइडिन, कार्बनसिलीन, लिंकोमाइसिन, क्लिंडामाइसिन, जॉल्पिडम, क्लोर्डियाजेपाकसइड, थर्माडॉल, रिफाम्पिसिन, आइसोनिजिड, पायराजाइनामाइड, इथैमब्यूटल।
 
विरोध में उतरेंगी दवा व्यापारी यूनियन
ऑल इंडिया केमिस्ट एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स के बैनर तले देशभर की दवा व्यापारी यूनियन इस संशोधन शेड्यूल का विरोध कर रही हैं। डॉक्टर के पर्चे पर दवा बिक्री को जटिल प्रक्रिया और व्यापार प्रभावित होना बता दिल्ली में 25 जुलाई को प्रदर्शन भी होने जा रहा है। फेडरेशन के अध्यक्ष कैलाश गुप्ता ने देश की समस्त यूनियन को इसमें आमंत्रित किया है(राहुल गुप्ता,दैनिक जागरण,आगरा,4.7.11)।

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रविवार, 12 जून 2011

देश में योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा की हालत खराब

योग को लेकर देश में एक तरफ निजी क्षेत्र एवं योग गुरुओं का बोलबाला बढ़ रहा है। योग पद्धति विदेशों में फैलती जा रही है। वहीं सरकारी क्षेत्र में योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा का बुरा हाल है। हालत यह है कि देश के आठ राज्यों में एक अदद योग केंद्र खोलने की सालों पुरानी योजना को आज तक अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। हाल ही में सरकार द्वारा कराए गए एक सव्रे से पता चला है कि कई रोगों के इलाज के लिए लोग योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा का सहारा ले रहे हैं। कई मर्ज ऐसे भी है जिनका दूसरी पद्धति में उपचार ही नहीं है। बावजूद इसके स्वास्थ्य मंत्रालय में योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा पूरी तरह से उपेक्षित है। सरकार ने पांच प्रमुख देशी पद्धतियों को प्रोत्साहित करने के लिए आयूस (आयुव्रेद, योग, यूनानी, सिद्धा एवं होम्योपैथी) नामक एक अलग विभाग बनाया है। स्थास्थ्य सचिव के समकक्ष अलग से सचिव (आयूस) की नियुक्ति कर दी गई थी मगर स्वास्थ्य का नब्बे फीसद से ज्यादा बजट अंग्रेजी (ऐलोपैथी) पद्धति के हिस्से में चले जाने के कारण मंत्रालय का नया महकमा कुछ खास नहीं कर पा रहा है। अधिकांश परियोजनाएं धन के आभाव में ज्यों की त्यों पड़ी हैं। सबसे ज्यादा उपेक्षा योग की हो रही है। जबकि इस समय देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी भारतीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा की मांग है। लेकिन सरकार इस मांग को पूरा नहीं कर पा रही है जिसका भरपूर फायदा निजी क्षेत्र और योग गुरु उठा रहे हैं। केंद्रीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा परिषद ने आठ राज्यों में योग अनुसंधान केंद्रों की स्थापना पर विचार शुरू किया था मगर अभी तक केवल झज्जर (हरियाणा) के निकट देवारखाना एवं मांडया (कनार्टक) के निकट नागमंगला में जमीन आवंटित हुई है। उड़ीसा सरकार ने एक केंद्र की स्थापना का प्रस्ताव परिषद के पास भेजा था मगर अभी तक उस पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। इस प्रस्ताव के लिए केंद्र सरकार ने 20 एकड़ जमीन की मांग की है। जबकि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार एवं उत्तराखंड में योग अनुसंधान केंद्रों की स्थापना के प्रस्तावों को भी ताक पर रख दिया गया है। आयूस के तहत आने वाली पांच पद्धतियों के देश भर में कुल 91 केंद्र व परिषदें हैं। इनमें योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा का मात्र एक केंद्र दिल्ली में है उसमें भी कई काम लंबित पड़े हुए हैं। देश भर में सर्वाधिक 31 केंद्र आयुव्रेद के हैं। उसके बाद होम्योपैथी के 30, यूनानी पद्धति के 23 और सिद्धा के छह केंद्र हैं। हालांकि आयुव्रेद में भी आठ राज्य और छह केंद्र शासित प्रदेश ऐसे हैं जहां आयुव्रेद का एक भी केंद्र नहीं है। ये हैं हरियाणा, छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, झारखंड, गोवा, चंडीगढ़, दादर, दमन, लक्षद्वीप एवं पुड्डुचेरी। देशी पद्धतियों के सर्वाधिक 10 केंद्र उत्तर प्रदेश में हैं। मगर राज्य में कोई भी योग केंद्र नहीं है। इसी तरह हरियाणा, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, चंडीगढ़, दादर, दमन एवं लक्षद्वीप में एक भी होम्योपैथी का अनुसंधान केंद्र नहीं है(ज्ञानेन्द्र सिंह,राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,12.6.11)।

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बुधवार, 1 जून 2011

आवश्यक दवा की सूची में निकोटिन के शामिल होने के आसार

सिगरेट सहित तंबाकू की लत छु़ड़ाने के लिए निकोटिन को आवश्यक दवा की सूची में शामिल किए जाने की संभावना है। स्वास्थ्य मंत्रालय के इस प्रस्ताव पर रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय गंभीरता से विचार कर रहा है। आवश्यक दवा की सूची में शामिल किए जाने के बाद ही निकोटिन सस्ता हो सकेगा।

स्मोकिंग छो़ड़ने के लिए प्रेरित करने के लिए इस थेरेपी का सस्ता होना जरुरी है। सिगरेट सहित तम्बाकू उत्पादों की लत छु़ड़ाने की विधि "निकोटिन रिप्लेसमेंट थेरेपी" की सिफारिश विश्व स्वास्थ्य संगठन ने की है। दवा की कीमत पर नियंत्रण करने वाले केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि नैशनल फार्मास्यूटिकल्स प्राइसिंग अथॉरिटी के पास स्वास्थ्य मंत्रालय का यह प्रस्ताव आया है। कई कंपनियां इस थेरेपी के तौर पर निकोटिन की टेबलेट लांच करने की तैयारी में है। एक कंपनी पिछले साल उसे लांच भी कर चुकी है लेकिन वह महंगी है। माना जा रहा है कि अथॉरिटी निकोटिन के बाजार को नियंत्रित करे तभी भारत में यह प्रभावी हो सकेगा। तंबाकू लॉबी की ताकत के सामने बेबस स्वास्थ्य मंत्रालय ने अब लत छु़ड़ाने पर अधिक जोर दिया है। सरकार पर तंबाकू लॉबी के प्रभाव की वजह से तंबाकू नियंत्रण के सारे प्रयास निष्प्रभावी साबित हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इस थेरेपी से दुनिया में लाखों लोगों की जान बच रही है। सिगरेट के खतरों से वाकिफ लोग आदत को छो़ड़ना तो चाहते हैं लेकिन दवा के बिना ऐसा करना आसान नहीं है। स्टडीज के अनुसार ४ से ७ प्रतिशत लोग ही बिना मेडिसिन के स्मोकिंग छो़ड़ने में सफल हो पाते हैं । वैसे विशेषज्ञों के अनुसार सबसे अच्छी विधि है बिना किसी दवा की सहायता के तंबाकू के सेवन को अचानक छो़ड़ देना। इसे "कोल्ड टर्की" विधि कहते हैं। निकोटिन रिप्लेसमेंट थेरेपी में दवा के तौर पर निकोटिन दी जाती है जिससे तंबाकू उत्पादों की "भूख" मिट जाती है। एक अनुमान के अनुसार भारत में १२ करो़ड़ लोग स्मोकिंग करते हैं । वयस्कों की आबादी में ३५ प्रतिशत किसी न किसी तंबाकू उत्पाद का सेवन करते हैं(धनंजय,नई दुनिया,दिल्ली,1.6.11)।

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शुक्रवार, 27 मई 2011

राजधानी एक्सप्रेस में सफर कर रहे हैं? तौलिए,चादर और कंबल का इस्तेमाल ज़रा संभल कर करें !

राजधानी एक्सप्रेस में मुंह पोछने से पहले कर्मचारी द्वारा दिए गए तौलिए को देख लें, उसमें गंदगी और मरी हुई मक्खी हो सकती है! कंबल बदबूदार हो सकता है और चादर पर चाय आदि का दाग हो सकता है। ऐसा किसी एक नहीं, बल्कि कई राजधानी गाड़ियों में हो रहा है। प्रस्थान स्टेशन की जगह किसी अन्य स्टेशन से गाड़ी पर चढ़ने वाले लोगों को किसी और के द्वारा ओढ़ा हुए कंबल दिया जाता है। यात्रियों के मांगने पर भी न तो साफ तौलिया मिलता है, न चादर और न ही कंबल।

नईदुनिया को राजधानी के एक यात्री ने ऐसी तस्वीर भेजी है, जिसमें दिल्ली मंडल का रैपर भी स्पष्ट दिख रहा है। रैपर में दिए गए तौलिए में मरी हुई मक्खी साफ दिख रही है। यात्री खुद रेलवे के एक अधिकारी हैं, इसलिए उनकी पहचान नहीं खोली जा सकती है। उन्होंने बताया कि वैसे तो परिचय देने पर मुझे दूसरा तौलिया दे दिया गया, लेकिन पहले बिना अपनी पहचान जाहिर किए मैंने तौलिया मांगा तो कर्मचारी ने मना कर दिया। उसका कहना था कि सीट संख्या के बराबर ही तौलिया दिया जाता है इसलिए नहीं मिल सकता है। उसका यह भी कहना था कि चूंकि तौलिया चोरी हो जाता है या छूट जाता है तो हमारे वेतन से पैसा काटा जाता है इसलिए हम तौलिया नहीं दे सकते हैं। ये अलग बात है कि अपना परिचय देते ही मुझे तौलिया मिल गया।

जानकारी के लिए बता दें कि राजधानी में ओढ़ने के लिए मिलने वाला कंबल महीने में सिर्फ एक बार धुलता है। १५ दिन पर कंबल की ड्राइक्लिनिंग होती है। चादर व तौलिया रोजाना धुलता है, लेकिन स्थिति देखकर तो यही लगता है कि इसे भी बिना धुले झाड़ कर ही काम चलाया जाता है। एक अन्य यात्री की शिकायत थी कि मैं धनबाद से राजधानी में चढ़ा था। उससे पहले मेरी सीट पर कोई और कंबल ओढ़े सोया था। मैंने कर्मचारी को कंबल बदलने को कहा तो उसने और कंबल न होने की बात कहते हुए किसी का ओढ़ा कंबल बदलने से मना कर दिया।

इस बारे में उत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी का कहना है कि दिल्ली डिवीजन में कंबल, चादर, तौलिया आदि कमी की सूचना मुझे भी है। इनकी धुलाई का ठेका भी नए सिरे से दिया जा रहा है, जो अगले एक माह में पूरा हो जाएगा। उनका कहना है कि यात्री यदि गंदगी की शिकायत करते हैं तो कार्रवाई जरूर होती है। 


इस बारे में उत्तर रेलवे के दिल्ली मंडल के वरिष्ठ मंडल यांत्रिक अभियंता जे के सिंह के अनुसार दिल्ली मंडल में ४.५ से ५ लाख बेडशीट, ७० हजार कंबल और २.७५ लाख तौलिया गाड़ियों में उपयोग में आ रहा है। बेडशीट व तौलिया रोजाना धुलता है जबकि कंबल महीने में एक बार धुलता है। उनका कहना है कि तौलिया के चोरी या छूट जाने के कारण ही शॉर्टेज की समस्या आती है, लेकिन यह समस्या बहुत अधिक नहीं है(नई दुनिया,दिल्ली,27.5.11)।

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शनिवार, 16 अप्रैल 2011

16 एंटीबायोटिक दवाओं पर लगेगी रोक

राजधानी दिल्ली के आसपास स्थित अस्पतालों और सप्लाई वाले पानी में एनडीएम-1 बैक्टीरिया (दिल्ली सुपरबग) पाए जाने की खबर के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय हरकत में आ गया है।

‘सुपरबग’ जैसे और बैक्टीरिया पैदा न हों, इसके लिए मंत्रालय देश में पहली बार थर्ड जेनरेशन की सभी एंटी-बायोटिक दवाओं की सार्वजनिक बिक्री पर अंकुश लगाने जा रही है।

इस तरह की 16 एंटी-बायोटिक दवाओं की आम बिक्री पर रोक की अधिसूचना सोमवार को जारी होने वाली है। यह जानकारी ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) के प्रमुख सुरिंदर सिंह ने एक विशेष बातचीत में दी।

उन्होंने बताया कि एक बार अधिसूचना जारी होने के बाद इस श्रेणी की दवाएं सिर्फ ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) अपोलो, लीलावती और क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज (सीएमसी) जैसे मल्टी स्पेशिएलिटी अस्पतालों में ही वितरित की जा सकेगी।’

सुरिंदर सिंह ने आगे कहा कि ये सभी एंटी-बायोटिक दवाओं के पैकिंग में भी खास बदलाव किया जा रहा है। इस श्रेणी की सभी लाल रंग की विशेष पैकिंग में ही वितरित की जाएंगी।
‘भास्कर’ के पास मौजूद अधिसूचना के अंतिम प्रारूप की प्रति के अनुसार, थर्ड जेनरेशन की इन 16 एंटी-बायोटिक दवाओं में मेरोपेनन, इमीपेनम, एरटापेनम, डोरीपेनम, फेरोपेनम, पोलिमिक्सिन बी, कोलिस्टिन, वेंकोमाइसिन, टैकोप्लेनिन, लिनजोलिड, टाइसाइक्लिन, एजट्रिओनम, केफेपाइम, सेफाइरोम, मॉक्सीफ्लोक्सिन और गैमीफ्लैक्सोसिन हैं।

एम्स में मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ. रणदीप गुलेरिया का कहना है कि देश में सुपरबग जैसे बैक्टीरिया के पैदा होने का सबसे बड़ा कारण थर्ड और फोर्थ जेनरेशन की एंटी-बायोटिक दवाओं का धड़ल्ले से इस्तेमाल ही है।

किसी भी छोटे-मोटे संक्रमण के लिए भी एक नर्सिग होम से लेकर मामूली अस्पताल तक में सबसे ताकतवर एंटी-बायोटिक दवाएं दे दी जा रही हैं। डॉ. गुलेरिया का कहना है कि एक बार कोई बैक्टीरिया सबसे ताकतवर एंटी-बायोटिक दवाओं का आदी हो जाता है, तभी वह सुपरबग जैसे बैक्टीरिया का रूप लेता है।

यही वजह है कि इन एंटी-बायोटिक दवाओं के सार्वजनिक इस्तेमाल पर रोक का कदम एकदम सही है(प्रदीप सुरीन, दैनिक भास्कर,दिल्ली,16.4.11)।

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सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

सावधान! यह केला आपको डस सकता है...

फलों में जहर की बात भले ही कुछ अटपटी लगे, लेकिन इस बात में कोई शक नहीं कि आप फलों के नाम पर जहर खा रहे हैं। यह खुलासा हाल ही में स्वास्थ्य विभाग की ओर से की गई फलों की जांच में हुआ है। विभाग ने अमृतसर के विभिन्न बाजारों से फलों के 24 सैंपल लिए थे, जिनमें से 20 फेल पाए गए।

इनमें ज्यादातर केले के थे, जबकि कुछ पपीता और आम के भी थे। फेल सैंपलों में पाया गया है कि फलों को ऐसे कैमिकल से पकाया गया है, जो स्वास्थ्य के भारी नुकसानदायक है।इन्हें कैल्शियम कार्बाइड पाउडर से पकाया गया था। इस पाउडर पर पानी का छिड़काव करने से एस्टलीन गैस पैदा होती है, जो वैल्डिंग करने में प्रयोग होती है।

इस तरह आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि यह गैस आपके शरीर के लिए कितनी हानिकारक सिद्ध होगी। यह गैस गर्मी पैदा करती है और इसी गर्मी से ही फल पकते हैं।

लीवर व आंखों पर हमला
फूड इंस्पेक्टर सुखराव सिंह बताते हैं कि इस तरह के फल शरीर में अल्सर पैदा करते हैं। साथ ही इसका बुरा असर लीवर और आखों की रोशनी सहित अन्य हिस्सों पर भी पड़ता है। प्रिवेंशन ऑफ फूड एल्ट्रेशन एक्ट 1955 के तहत अप्राकृतिक ढंग से फलों का पकाना अपराध है। अप्राकृतिक ढंग से पकाए गए फलों में विटामिन की मात्रा न के बराबर होती है, क्योंकि इन्हें सूर्य का प्रकाश नहीं मिलता।

सूर्य के रोशनी की गर्मी के कारण इनमें विटामिन पाया जाता है। बाजार में आने वाले ज्यादातर केले कैल्शियम कार्बाइड पाउडर से पकाए जाते हैं।

इथलीन गैस का इस्तेमाल सही
पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी और हार्टिकल्चर विभाग ने फलों को इथलीन गैस से पकाने की विधि खोजी है, जिससे पकाए गए फल शरीर पर हानिकारक प्रभाव नहीं डालते। विभाग ने इस विधि के जरिए फलों को पकाने के लिए लुधियाना में एक यूनिट लगाया है। वहीं होशियारपुर मंडी में भी ऐसा ही एक प्राइवेट यूनिट है।

बाकी जिलों में ऐसा यूनिट न होने के चलते ज्यादातर फल विक्रेता कैल्शियम कार्बाइड से ही फलों को पकाते हैं, जो इन जिलों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए खतरनाक है।

पाउडर करता है कैलोरीज का खात्मा
एक केले में 100 कैलोरीज होती हैं। कसरत के लिए शरीर को सोडियम पोटाशियम की जरूरत होती है, जो केला में भरपूर मात्रा में पाई जाती है। इसी के चलते खिलाड़ियों को दिन में दो केले खाने के लिए कहा जाता है, लेकिन अप्राकृतिक ढंग से पकाए गए केले को खाने का कोई फायदा नहीं होता।


खिलाड़ियों का मुख्य आहार है यह फल
फलों में जहर खिलाड़ियों व बॉडी बिल्डिंग करने वालों के लिए सबसे बड़ी चिंता का कारण है, क्योंकि फल उनकी डाइट का अहम हिस्सा हैं। अकेला खेल विभाग ही रिफ्रेशमेंट के तौर पर खिलाड़ियों को दो केले प्रतिदिन मुहैया करवाता है।

इसके अलावा खेल आयोजन एवं प्रतियोगिताओं के दौरान भी अलग से केलों की डाइट दी जाती है।

खेल विभाग के सुखदीप सिंह के अनुसार खिलाड़ियों को बड़ी मात्रा में केला दिया जाता है। खेल एक्सपर्ट बलबीर सिंह रंधावा मानते हैं कि विभाग का ऐसा सेंटर एवं मैस जरूर होनी चाहिए, जहां डाइटीशियन की देखरेख में खिलाड़ियों को फल मुहैया करवाए जाएं।

उन्होंने बताया कि यह काम पूरी तरह से ठेकेदारों पर है, जो मुनाफे के लिए खिलाडिय़ों को घटिया फल देने में गुरेज नहीं करते।

किडनी को खतरा
डा. रवि दत्त शर्मा ने बताया कि कैल्शियम कार्बाइड से पकाए जाने वाला फल स्वास्थ्य के लिए घातक है। इससे किडनी खराब होने तथा पेट से संबंधित बीमारियां हो सकती हैं।

ऐसे फल में न्यूट्रीशियन वैल्यू तो खराब होती है, उल्टा टॉक्सिन पैदा हो जाता है। ऐसे फल को खाने से लाभ की बजाय सेहत को नुकसान पहुंचता है।

प्रशासन करे सख्ती
बाजार में अप्राकृतिक ढंग से पकाए गए फल आ रहे हैं, जो नुकसानदेह हैं। इसके खिलाफ कार्रवाई करना जिला प्रशासन का काम है। डीसी को ही इस मामले में सख्ती करनी चाहिए। परेशानी यह भी है कि अगर ठेकेदार सही फल खरीदना भी चाहे तो ऐसे फल बाजार में मिलना मुश्किल हैं।परगट सिंह, डायरेक्टर, खेल विभाग, पंजाब(हरिचंद बब्बू,दैनिक भास्कर,अमृतसर,21.2.11)

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शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

इनहेल अब्यूज के शिकार हो रहे हैं जम्मू के बच्चे

अगर आपके लाड़ले का पढ़ाई में मन नहीं लग रहा, घर आते ही सुस्त हो जाता है या फिर स्कूल से खिसकने की शिकायतें आ रही हों, तो सावधान हो जाईए। आपका लाड़ला सूंघने का नशा(इनहेल अब्यूज) का शिकार भी हो सकता है।

शहर में ये बीमारी बच्चों में तेजी से बढ़ रही है। इसी का नतीजा है कि पहले कभी कभार नोटिस में आने वाले मामले अब रोज सामने आने लगे हैं। डॉक्टरों मानना है कि बहुत से मामले तो अस्पताल तक पहुंंच ही नहीं पाते।

क्या है इनहेल अब्यूज
थिनर, पेंट, फलूड, ग्लू आदि ये सब वो चीजें हैं, जिन्हें बच्चे सूंघने के नशे में इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि ये सब नया नहीं है। लेकिन बच्चे इसकी ओर काफी तेजी से आकर्षित हुए हैं। पहले युवा वर्ग के इसकी चपेट में थे। तीन तरीकों से इसे इस्तेमाल में लाया जा रहा है। इसमें स्नीफिंग(रुमाल में फेंक कर सूंघना) हाफिंग(मुंह खोल कर जोर जोर से इसकी सुगंध को अंदर लेना) बैगिंग( पॉलिथीन में ज्यादा मात्रा में डालकर उसमें पूरा मुंह डालना) शामिल है।

कारण
पांच कारणों से ये तेजी से फैल रहा है। पहला हर जगह आसानी से ये पदार्थ उपलब्ध हैं। दूसरा सस्ते हैं, तीसरा कोई कानूनी प्रतिबंध इन पर नहीं हैं, चौथा बच्चों को आकर्षित करता है और पांचवा ये डिटेक्ट नहीं हो पाता। ये सब कारण इसकी वजह बन रहे हैं।

नुकसान
इसका नशा करने से दिमाग, किडनी, नजर कमजोर होना, दिल का दौरा और काम में सुस्ती आ जाना आदि की समस्या हो जाती है।

आठवीं कक्षा का बच्चा भी
इस नशे का एक मामला स्टडी किया गया है। जम्मू के रमन (बदला नाम) के अभिभावक बच्चे की स्कूल परफार्मरमेंस से चिंतित थे। पूछताछ करने पर अभिभावकों ने बताया कि पिछले दो साल से उसकी परफारमेंस सही नहीं है। स्कूल के शिक्षक उसके स्कूल न आने की शिकायत भी कर रहे हैं। एक दिन उन्होंने सुस्त हालत में देखा। उसके पास पड़े डस्टबीन में फ्लयूड की दो बोतलें पड़ी थी। इस बच्चे की छह हफ्ते के लिए डॉक्टरों द्वारा कांउसलिंग की जा रही है।

डॉक्टर चिंतित
मनोचिकित्सक अस्पताल के डॉक्टर मनु अरोड़ा का कहना है कि पहले ये बीमारी युवाओं या स्ट्रीटचाइल्ड में थी। लेकिन अब अच्छे घरों के बच्चे इसके शिकार हो रहे हैं। पहले दो महीने में कोई एक केस अस्पताल आता था। लेकिन अब रोजाना इसके मरीज आ रहे हैं। इसमें 8 से 14 वर्ष के बच्चे शामिल हैं(अजय मीनिया,दैनिक भास्कर,जम्मू,12.2.11)।

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