शुक्रवार, 27 मई 2011

राजधानी एक्सप्रेस में सफर कर रहे हैं? तौलिए,चादर और कंबल का इस्तेमाल ज़रा संभल कर करें !

राजधानी एक्सप्रेस में मुंह पोछने से पहले कर्मचारी द्वारा दिए गए तौलिए को देख लें, उसमें गंदगी और मरी हुई मक्खी हो सकती है! कंबल बदबूदार हो सकता है और चादर पर चाय आदि का दाग हो सकता है। ऐसा किसी एक नहीं, बल्कि कई राजधानी गाड़ियों में हो रहा है। प्रस्थान स्टेशन की जगह किसी अन्य स्टेशन से गाड़ी पर चढ़ने वाले लोगों को किसी और के द्वारा ओढ़ा हुए कंबल दिया जाता है। यात्रियों के मांगने पर भी न तो साफ तौलिया मिलता है, न चादर और न ही कंबल।

नईदुनिया को राजधानी के एक यात्री ने ऐसी तस्वीर भेजी है, जिसमें दिल्ली मंडल का रैपर भी स्पष्ट दिख रहा है। रैपर में दिए गए तौलिए में मरी हुई मक्खी साफ दिख रही है। यात्री खुद रेलवे के एक अधिकारी हैं, इसलिए उनकी पहचान नहीं खोली जा सकती है। उन्होंने बताया कि वैसे तो परिचय देने पर मुझे दूसरा तौलिया दे दिया गया, लेकिन पहले बिना अपनी पहचान जाहिर किए मैंने तौलिया मांगा तो कर्मचारी ने मना कर दिया। उसका कहना था कि सीट संख्या के बराबर ही तौलिया दिया जाता है इसलिए नहीं मिल सकता है। उसका यह भी कहना था कि चूंकि तौलिया चोरी हो जाता है या छूट जाता है तो हमारे वेतन से पैसा काटा जाता है इसलिए हम तौलिया नहीं दे सकते हैं। ये अलग बात है कि अपना परिचय देते ही मुझे तौलिया मिल गया।

जानकारी के लिए बता दें कि राजधानी में ओढ़ने के लिए मिलने वाला कंबल महीने में सिर्फ एक बार धुलता है। १५ दिन पर कंबल की ड्राइक्लिनिंग होती है। चादर व तौलिया रोजाना धुलता है, लेकिन स्थिति देखकर तो यही लगता है कि इसे भी बिना धुले झाड़ कर ही काम चलाया जाता है। एक अन्य यात्री की शिकायत थी कि मैं धनबाद से राजधानी में चढ़ा था। उससे पहले मेरी सीट पर कोई और कंबल ओढ़े सोया था। मैंने कर्मचारी को कंबल बदलने को कहा तो उसने और कंबल न होने की बात कहते हुए किसी का ओढ़ा कंबल बदलने से मना कर दिया।

इस बारे में उत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी का कहना है कि दिल्ली डिवीजन में कंबल, चादर, तौलिया आदि कमी की सूचना मुझे भी है। इनकी धुलाई का ठेका भी नए सिरे से दिया जा रहा है, जो अगले एक माह में पूरा हो जाएगा। उनका कहना है कि यात्री यदि गंदगी की शिकायत करते हैं तो कार्रवाई जरूर होती है। 


इस बारे में उत्तर रेलवे के दिल्ली मंडल के वरिष्ठ मंडल यांत्रिक अभियंता जे के सिंह के अनुसार दिल्ली मंडल में ४.५ से ५ लाख बेडशीट, ७० हजार कंबल और २.७५ लाख तौलिया गाड़ियों में उपयोग में आ रहा है। बेडशीट व तौलिया रोजाना धुलता है जबकि कंबल महीने में एक बार धुलता है। उनका कहना है कि तौलिया के चोरी या छूट जाने के कारण ही शॉर्टेज की समस्या आती है, लेकिन यह समस्या बहुत अधिक नहीं है(नई दुनिया,दिल्ली,27.5.11)।

7 टिप्‍पणियां:

  1. उनका परिचय दमदार था तो सेवा ले ली । इसे जानकर दुख हुआ ।
    सभी अमीर आदमियों को अच्छी सेवा प्राप्त हो , रेलवे को यह सुनिश्चित करना चाहिए । कुछ वह मुफ्त में तो लेते नहीं । अगर ये लोग भी सेहतमंद न पाए तो फिर और कौन रह पाएगा ?

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  2. बहुत शर्मनाक स्थिति है ।

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  3. "कुछ लोग असाध्य समझी जाने वाली बीमारी से भी बच जाते हैं और इसके बाद वे लम्बा और सुखी जीवन जीते हैं, जबकि अन्य अनेक लोग साधारण सी समझी जाने वाली बीमारियों से भी नहीं लड़ पाते और असमय प्राण त्यागकर अपने परिवार को मझधार में छोड़ जाते हैं! आखिर ऐसा क्यों?"

    यदि आप इस प्रकार के सवालों के उत्तर जानने में रूचि रखते हैं तो कृपया "वैज्ञानिक प्रार्थना" ब्लॉग पर आपका स्वागत है?
    http://4timeprayer4u.blogspot.com/

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  4. शासकीय कर्मी जहाँ तक संभव हो अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कामचोरी करते पाये ही जाते हैं, और इनके पाले पडने वाला हर यात्री इतना जागरुक या उलझने के मूड में नहीं होता इसलिये भी ये पोल-पट्टी चलती रहती है ।

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