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गुरुवार, 28 जून 2012

अच्छी नींद के लिए....

रात भर बेड पर करवटें बदलते हैं, तो आपको स्लीपिंग डिस्ऑर्डर हो सकता है। आखिर क्या वजह है अच्छी नींद ना आने की और कैसे इस प्रॉब्लम को दूर किया जा सकता है, जानते हैं :  

कभी एक रात जागकर तो देखें, उसके अगले दिन आपको नींद की अहमियत समझ में आ जाएगी। वैसे, ऐसे कई लोग हैं, जो चाहकर भी अच्छी नींद नहीं ले पाते। ऐसे लोग सुबह उठकर भी फ्रेश फील नहीं करते, पूरा दिन थके-थके से रहते हैं और छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करते रहते हैं। यही नहीं, वे तनाव में भी जल्दी आते हैं। वैसे, अगर आपके साथ भी ऐसा है, तो जान लें कि आप स्लीप डिस्ऑर्डर की गिरफ्त में हैं।  

क्या है स्लीप डिस्ऑर्डर 

नींद ना आने की कई वजहें हैं। स्लीप स्पेशलिस्ट डॉ. मनचंदा बताते हैं, 'स्लीप डिस्ऑर्डर 80 तरह के हैं, जो अलग-अलग वजह से हर किसी में होते हैं। केवल इंडिया में ही 7 से 8 करोड़ लोग इस बीमारी की चपेट में हैं। हालांकि खासतौर पर लोगों में चार तरह के स्लीप डिस्ऑर्डर देखने में आते हैं।'  

खर्राटे लेना: खर्राटे लेने को अगर आप गहरी नींद की निशानी समझते हैं, तो यह बिल्कुल गलत है। दरअसल, यह नींद के दौरान ठीक से सांस न ले पाने की वजह से होता है। खर्राटे लेने वाले व्यक्ति की नींद अक्सर पूरी नहीं होती। वह दिनभर नींद से भरा व चिड़चिड़ा रहता है। उसकी याद्दाशत कम होती जाती है और उसे पर्सनैलिटी डिस्ऑर्डर का भी खतरा रहा है। 

नींद न आना: रुटीन सही न रहना, चाय व कॉफी अधिक पीना, ज्यादा ऐल्कॉहॉल लेना, इंटरनेट, लेट नाइट पार्टी, सोने का समय फिक्स न रखना वगैरह से भी स्लीप डिस्ऑर्डर होता है। 

सपने देखना: ज्यादा सपने आने से रात को बार-बार नींद टूटती है। दरअसल, नींद दो तरह की होती है। गहरी नींद यानी नॉन-पिड आई मूवमेंट स्लीप और कच्ची नींद, जिसे सपनों वाली नींद भी कहते हैं। अगर नॉन-पिड आई मूवमेंट स्लीप 6 घंटे की भी आ जाए, तो बॉडी रिलैक्स हो जाती है, लेकिन 9-10 घंटे की कच्ची नींद के बावजूद बॉडी थकी ही रहती है।  

क्यों होता है यह 
स्लीप डिस्ऑर्डर बेसिकली तनाव, चिंता और डिप्रेशन की वजह से होता है। इसके अलावा, शरीर में होने वाला दर्द भी नींद न आने की वजह होता है। एक हॉस्पिटल के क्रिटिकल केयर डिपार्टमेंट के हेड डॉ. अभिनव बताते हैं, 'यह प्रॉब्लम महानगरों में बड़ी बीमारी का रूप ले रही है। दरअसल, अवेयरनेस ना होने की वजह से लोग खर्राटे लेना और अच्छी नींद ना आना जैसी प्रॉब्लम्स को मामूली चीज समझ लेते हैं और डॉक्टर को नहीं दिखाते।' डॉ. अभिनव की मानें, तो इसी वजह से छोटी प्रॉब्लम भी कुछ टाइम बाद बड़ी हो जाती है। 

हो सकती हैं प्रॉब्लम्स 
डॉ. मनचंदा बताते हैं कि स्लीपिंग डिस्ऑर्डर से पीड़ित लोगों को हाइपरटेंशन, कोरोनरी हार्ट डिजीज, स्ट्रोक, शुगर, हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक का खतरा कई गुना ज्यादा रहता है। दरअसल, नींद थकी हुई मसल्स को रिलैक्स करती है और आपको दूसरे दिन की भागदौड़ के लिए रेडी करती है। यही नहीं, प्रॉपर नींद राइट व क्विक डिसीजन लेने में भी आपकी मदद करती है।  

यानी अगर अच्छी नींद नहीं आएगी, तो उसका असर आपकी फिजिकल व साइकॉलजिकल, दोनों हेल्थ पर पड़ेगा। पिछले दिनों आई एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, इंडिया में 93 फीसदी लोग सही नींद ना आने की प्रॉब्लम से जूझते हैं और 58 फीसदी लोग के रुटीन पर नींद पूरी ना होने का इफेक्ट बेहद नेगेटिव पड़ता है।  

किस पर ज्यादा अटैक 
वैसे तो, यह बीमारी किसी पर भी अटैक कर सकती है, लेकिन हॉस्पिटल, एयरलाइंस, न्यूज पेपर, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और कॉल सेंटर में काम करने वाले लोगों पर इसका ज्यादा असर नजर आता है। यानी ऐसे प्रफेशन्स जहां फिजिकल थकान थोड़ी कम होकर मानसिक थकान ज्यादा रहती है। ऐसे में पूरा आराम ना मिलने पर नींद ना आना, चिड़चिड़ापन, सिर भारी होना, जैसी परेशानियां हो जाती हैं।  

ऐसे आएगी अच्छी नींद  
रुटीन करें फिक्स 
सोने का समय फिक्स रखें। सही टाइमिंग्स ना होने की वजह से भी अच्छी नींद नहीं आती। कभी-कभी टाइमिंग्स का बिगड़ना तो चल जाता है, लेकिन ऐसी हैबिट होने पर नुकसान ही पहुंचता है। इसके अलावा, दिन में बहुत घंटे सोना भी रात को अच्छी नींद ना आने की एक वजह है।  

डेली एक्सरसाइज 
अगर आप रोजाना आधा घंटे की एक्सरसाइज कर लें, तो आपको अच्छी नींद आना तय है। एक्सरसाइज से आपके मसल्स व जॉइंट्स का वर्कआउट हो जाता है, जो अच्छी नींद लाने में मदद करता है। घर, जिम या ब्रिस्क वॉक, जो भी कम्फर्टेबल हो, वह कर लें। इसे रुटीन का हिस्सा बनाएं।  

हॉट बाथ 
सोने से पहले गर्म पानी से नहाएं। हॉट बाथ टेंशन वाली मसल्स को रिलैक्स कर देता है। खाना सोने से कम से कम दो घंटे पहले खा लें। डिनर में खाने की क्वॉन्टिटी कम रखें और स्पाइसी फूड अवाइड करें।  

चाय व कॉफी से तौबा 
आमतौर पर लोग खाने के बाद एक कप कॉफी या चाय पीना पसंद करते हैं। इसे हैबिट से बचें। दरअसल, इस तरह नींद समय पर आएगी ही नहीं और अगर आएगी, तो वह गहरी नहीं होगी। दरअसल, इनमें मौजूद कैफीन नींद को भगा देता है।

बुक रीडिंग 
सोने से पहले बुक रीडिंग की आदत डालें। 15 से 20 मिनट किताब पढ़ लेने से आपको अच्छी नींद आएगी। सोते समय टीवी देखना अवॉइड करें, क्योंकि इससे मांइड स्टेबल नहीं हो पाता।  

विंडो खुली रखें 
सोने से पहले कमरे की सभी खिड़कियां ओपन कर दें। इससे रूम में फ्रेश एयर आती रहेगी, जिससे आप अच्छी नींद ले पाएंगे। हां, ध्यान रखें कि जहां सो रहे हों, वह जगह शांत हो।  

अगर आती है दिन में नींद
नेक्रोलेप्सी एक न्यूरोलॉजिकल स्लीप डिस्ऑर्डर है, जिसमें पेशंट को दिन में बहुत गहरी नींद आती है। जिन्हें यह बीमारी होती है, वे दिन में किसी भी समय गहरी नींद का अनुभव करते हैं। इस प्रॉब्लम में नींद इतनी तेजी से आती है कि आप कोशिश करके भी जाग नहीं पाते।  

यह टाइम कुछ सेंकड्स से लेकर कुछ मिनटों तक के लिए हो सकता है। ऐसे लोग बात करते हुए और खाना खाते हुए ही नहीं, बल्कि ड्राइविंग करते हुए ही नींद के आगोश में चले जाते हैं(नभाटा,दिल्ली,१७.६.१२)।

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बुधवार, 11 अप्रैल 2012

रात को सोते समय ध्यान रखें इन बातों का

कैसी भी थकान हो या कैसी भी बीमारी हो, पर्याप्त नींद इन समस्याओं का सबसे अच्छा उपाय है। स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है प्रतिदिन पर्याप्त नींद ली जाए। यदि नींद पूरी नहीं हो पाती है तो ये आलस्य को बढ़ाती है और कई बीमारियों का न्यौता देती है। हमें अच्छे से नींद के लाभ मिल सके इसके लिए शास्त्रों में कई प्रकार के नियम बताए गए हैं। इन नियमों का पालन पर व्यक्ति को आरामदायक नींद आती है। 

नींद के संबंध में सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि हम लेटे कैसे? हमारा सिर और पैर किस दिशा में होना चाहिए? यदि इन बातों का ध्यान रखा जाए तो व्यक्ति को गहरी और अच्छी नींद प्राप्त होती है। सोने की सही अवस्था व्यक्ति को काफी ऊर्जा प्रदान करती है। गलत अवस्था में सोने पर कई प्रकार की बीमारियां होने की संभावनाएं रहती हैं। 

वास्तु या फेंगशुई और शास्त्रों के अनुसार में इंसान की सोने की अवस्था भी ऊर्जा को प्रभावित करती है। सोते समय हमारा सिर पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए। इन दिशाओं के विपरित सोना अशुभ माना गया है। 

पूर्व या दक्षिण दिशा में सिर रखकर सोने से दीर्घ आयु एवं अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त होता है। जबकि पश्चिम या उत्तर दिशा में सिर रखकर सोने पर स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां हो सकती हैं और इसे अशुभ भी माना जाता है।  

विज्ञान के दृष्टिकोण से देखा जाए तो पृथ्वी के दोनों ध्रुवों उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव में चुम्बकीय प्रवाह विद्यमान है। उत्तर दिशा की ओर धनात्मक प्रवाह रहता है और दक्षिण दिशा की ओर ऋणात्मक प्रवाह रहता है। इसी के आधार पर चुम्बक में भी दो पॉल साउथ (उत्तर) पॉल और नॉर्थ (दक्षिण) पॉल रहते हैं। यदि दो चुंबक के साउथ पॉल को मिलाया जाए तो वे चिपकते नहीं हैं बल्कि एक-दूसरे से दूर भागते हैं। जबकि अपोजिट पॉल्स मिलाए जाए तो चुंबक चिपक जाती है। यही सिद्धांत सोने के संबंध में हमारे शरीर पर भी लागू होता है। हमारे सिर की ओर धनात्मक ऊर्जा और पैर की ओर ऋणात्मक ऊर्जा रहती है। यदि हम उत्तर दिशा की ओर सिर रखकर सोते हैं तो उत्तर दिशा का धनात्मक तरंगे और हमारे सिर की धनात्मक तरंगे एक-दूसरे को दूर भगाती हैं जिससे मस्तिष्क हलचल बढ़ जाती है और ठीक से नींद नहीं आ पाती है। जबकि दक्षिण दिशा की ओर सिर रखने पर पैरों की ऋणात्मक तरंगे वातावरण की धनात्मक तरंगों को आकर्षित करती हैं और सिर की धनात्मक तरंगे वातावरण की ऋणात्मक तरंगों को आकर्षित करती हैं जिससे हमारे मस्तिष्क में कोई हलचल नहीं होती है। इससे नींद अच्छी आती है। अत: उत्तर की ओर सिर रखकर नहीं सोना चाहिए। 

पश्चिम दिशा में सिर रखकर सोते हैं तो हमारे पैर पूर्व दिशा की ओर होंगे जो कि शास्त्रों के अनुसार अशुभ माना गया है। क्योंकि पूर्व दिशा से सूर्योदय होता है और हम उस दिशा में पैर रखें तो यह सूर्य देव के अपमान के समान ही है। ऐसे सोने पर व्यक्ति बुद्धि संबंधी परेशानियां झेलता है। समाज में मान-सम्मान प्राप्त नहीं कर पाता(शशिकान्त साल्वी,दैनिक भास्कर,उज्जैन,11.4.12)।

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बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

अच्छी नींद के लिए विपरीतकरणी मुद्रा

अच्छी नींद एक सहज स्थिति है, जो हमारी कोशिकाओं को पुनर्जीवन देती है। किंतु जब किसी कारण आपको अच्छी नींद नहीं आती है तो इसे सहज बनाने के लिए अपनी मानसिक, भावनात्मक स्थिति के साथ जीवनशैली में परिवर्तन करना आवश्यक हो जाता है। योगासन इस समस्या का बहुत ही कारगर एवं स्थायी उपाय प्रदान करते हैं। 

आसन 
जरूरत से अधिक शारीरिक क्रियाशीलता एवं शरीर व मन को शिथिल करने में असमर्थता से यह समस्या उत्पन्न होती है। योग के कुछ प्रमुख आसन जैसे-विपरीतकरणी मुद्रा, शशांकासन, हलासन, कूर्मासन, सर्वागासन आदि इस समस्या का बेहतर समाधान देते हैं। 

विपरीतकरणी मुद्रा 
पीठ के बल जमीन पर लेट जाइए। दोनों पैरों को घुटने से मोड़कर जमीन के ऊपर उठाएं। इसके बाद एक हल्के झटके से नितम्ब को भी जमीन के ऊपर उठाइए। अब हाथों को कमर पर रखते हुए कमर को भी पैर तथा नितम्ब के साथ जमीन से ऊपर उठाइए। शरीर का भार कंधे, गर्दन तथा हाथ पर रखिए। जब तक इस स्थिति में आसानी से रह सकें, रुके रहिए। इसके बाद धीरे-धीरे वापस नीचे आ जाइए। लेकिन एक बात ध्यान रखें कि उच्च रक्तचाप तथा हृदय रोगी इसका अभ्यास न कर शशांकासन का अभ्यास करें। 

प्राणायाम 
अपनी नींद को बेहतर बनाने के लिए नाड़ीय तनाव को दूर करना बहुत आवश्यक है। नाड़ीशोधन, चन्द्रभेदी, भ्रामरी, शीतली व शीतकारी प्राणायाम इसके लिए बेहतर हैं। 

नाड़ीशोधन प्राणायाम 
पद्मासन, सिद्धासन, सुखासन या कुर्सी पर रीढ़, गला व सिर को सीधा कर बैठ जाइए। आंखों को ढीली बंद कीजिए। दायें हाथ को नासिकाग्र मुद्रा में रखकर बायीं नाक से एक गहरी तथा धीमी श्वास अंदर लीजिए। इसके तुरंत बाद बायीं नाक को बंद कर दायीं नाक से एक गहरी तथा धीमी श्वास बाहर निकालिए। फिर दायीं नाक से श्वास अंदर लेकर बायीं नाक से बाहर निकालिए। यह नाड़ीशोधन का एक चक्र है। इसके प्रारंभ में 6 चक्र तथा धीरे-धीरे चौबीस चक्रों का अभ्यास प्रतिदिन कीजिए। 

त्राटक 
रात में बिस्तर पर जाने के पहले इस क्रिया का निम्न विधि के अनुसार प्रतिदिन 15 मिनट तक अभ्यास कीजिए- अंधेरे कमरे में ध्यान से किसी आसन पर बैठ जाइए। एक जलती हुई मोमबत्ती शरीर से 2 फीट की दूरी पर जमीन पर रखिए। अब शरीर को बिल्कुल मूर्तिवत स्थिर रखते हुए लौ को बिना पलक झपकाए कुछ देर तक देखिए। प्रारम्भ में इसे 15 सेकेंड से शुरू कीजिए और धीरे-धीरे इसे 15 मिनट तक बढ़ाइए। 

योगनिद्रा 
प्रतिदिन कभी भी और कहीं पर भी एक बार योगनिद्रा का अभ्यास करने पर शरीर और मन के तनाव को पूरी तरह दूर किया जा सकता है। यह योग की ऐसी बेजोड़ क्रिया है, जो व्यक्ति को गहरी नींद के बराबर शक्ति और ऊर्जा देती है। वास्तव में यह जगकर गहरी नींद लेने की क्रिया है। -रात में सोने के 2 घंटे पहले हल्का तथा संतुलित भोजन लें। रात के भोजन के आधे घंटे बाद धीरे-धीरे टहलने की आदत बनाएं। -बायीं करवट लेटने से नींद जल्दी आती है। इसी प्रकार सिर सही दिशा में रखकर सोने से शांत और गहरी नींद आती है। -पैरों के तलवों पर सोने से पहले सरसों के तेल की मालिश करें। 

योगनिद्रा की विधि 
पीठ के बल जमीन पर लेट जाइए। आंखों को बहुत ढीली बंद कीजिए। अब सजग रहते हुए गहरी श्वास-प्रश्वास कीजिए। इसके बाद अपने दायें हाथ पर मन को एकाग्र कीजिए। दायें हाथ की अंगुलियां, हथेली, कलाई, निचली बांह, कुहनी, ऊपरी बांह तथा कंधे पर बारी-बारी से मन को ले जाइए और उन्हें पूरी तरह से ढीला कीजिए। इसके बाद यही क्रिया बायें हाथ, दायें पैर तथा बायें पैर से क्रमश: कीजिए। फिर पीठ, रीढ़ पर भी अपने मन को केंद्रित कर उसे ढीला कीजिए। सीने तथा पेट को भी उसी भांति ढीला कीजिए। अंत में गले तथा चेहरे को ढीला कीजिए। 

शरीर के सभी अंगों को शिथिल करने के बाद अब कल्पना कीजिए कि आप किसी एक नई दुनिया में हैं। यहां पर रहते हुए अपनी सौ सहज श्वास-प्रश्वास पर उल्टी गिनती के साथ मन को एकाग्र कीजिए। योगनिद्रा की यह क्रिया गहरी नींद के बराबर ताजगी, शांति, प्रसन्नता देती है(कौशल कुमार,हिन्दुस्तान,दिल्ली,२३.२.१२)।

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गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

लोरी और थपकी से क्यों सो जाते हैं बच्चे?

व्याकरण के सभी नियमों और शब्दार्थों से अनजान, दीन-दुनिया से बेखबर जब कोई बच्चा लोरी के रूप में मां के कंठ से निकली दिल की आवाज सुनता है तो सो ही जाता है। इन शब्दों का मतलब भले ही उसे न पता हो, लेकिन फिर भी वह मां के भावों को समझ लेता है और उसका दिल रखने के लिए लोरी की उंगली थामकर नींद के रास्ते पर चल पड़ता है। लोरी की शुरुआत कब और कहां हुई, यह अलग अध्ययन का विषय हो सकता है, इसके नतीजे भी कई हो सकते हैं, लेकिन इसकी शुरुआत क्यों हुई इस पर कोई दोराय नहीं है। सभी विद्वान एक सुर में इसके पक्ष में खड़े होते हैं। लोरी सुनने वाले बच्चे को कम से कम इस दुनिया की तो कोई भी भाषा नहीं आती, लेकिन फिर भी वह मां के इन "प्रेम-गीतों" का अर्थ बखुबी समझ जाता है। तभी तो सो जाता है। शायद यहीं से शुरू होता है लोरी का सफर।

कई प्रयोगों में पाया गया है कि जब बच्चा मां के गर्भ में होता है, तभी से मां की आवाज को समझने-पहचानने लगता है। इसी तरह, उस पर गीत-संगीत का भी प्रभाव पड़ता है। इससे उसके मस्तिष्क का तेजी से विकास होता है। लोरी के संबंध में भी बच्चों पर ऐसा ही सकारात्मक प्रभाव होता है। जहां छोटे बच्चे लोरी के संगीत का आनंद लेते हैं, वहीं कुछ बड़े बच्चे मां की इन शुभकामना रूपी लोरियों के अर्थ से भी निंद्रालोक की कल्पना करने लगते हैं। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि इससे उनके मस्तिष्क की सोचने-समझने की क्षमता अपेक्षाकृत तेजी से बढ़ने लगती है। लोरी में आई परियों की रानी, नींद की राजकुमारी, सपनों का उड़नखटोला और इंद्रधनुष का झूला आदि जहां एक ओर बच्चों को जल्दी सोने के लिए उकसाते हैं, वहीं दूसरी ओर उनके दिमाग की कल्पनाशीलता को तेज करते हैं। ऐसी ही कल्पनाशीलता आगे चलकर बड़े-बड़े आविष्कारों, कलाकृतियों और साहित्यिक रचनाओं की आधारशिला साबित होती है।

हर तरह के नियमों-कानूनों से आजाद इन लोरियों में मां अपने बच्चे के लिए हमेशा ही स्वर्ग का आनंद खोजने की कोशिश करती रही है। इन लोरियों की एक सबसे बड़ी खासियत यह भी रही है कि इनके लिए न तो मां को किसी तरह का कोई रियाज करना पड़ा और न ही उसे कभी कहीं से कोई प्रशिक्षण लेना पड़ा। ये तो मां के वे लयबद्ध सुरीले भाव रहे हैं जो बच्चे को कंठ की नहीं, दिल की आवाज सुनाते हैं। गांव-कस्बे से लेकर देश-विदेश तक में किसी न किसी रूप में लोरी की परंपरा रही है। भाषा, शब्द और उनका अर्थ भले ही अलग-अलग रहा हो, लेकिन मां के दिल से निकले भाव सभी में एक से रहे हैं। पर अब ऐसा नहीं रहा। आधुनिक हो-हल्ले के बीच लोरी के बोल ऐसे दबे की फिर न उठ सके। रही-सही कसर संयुक्त परिवारों के टूटने-चटखने की "तीखी गूंज" ने पूरी कर दी। शहरी संस्कृति में जी रही आजकल की नौकरी-पेशे वाली मांओं के पास जब अपने बच्चे को ठीक से दूध पिलाने तक का भी समय न मिल पाता हो, तो वे उसे लोरी ही क्या सुनाएंगी? वैसे भी लोरी के नाम पर आजकल की मांओं को केवल फिल्मी गीत ही गुनगुनाने आते हैं। जिनमें शब्द और सुर-ताल तो सुनाई देते हैं, पर ममत्व कहीं भी दिखाई नहीं देता। ऐसे माहौल में लोरी तो शांत हो गई, लेकिन बचपन असंतुष्ट और अशांत रह गया।

लोरी का बच्चे के मन-मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ता है इस विषय पर और गहन शोध किया जा सकता है, लेकिन लोरी के दौरान जिस कारण बच्चा मां की गोद में सोने लगता है उसके पीछे और भी कई चीजों की खास भूमिका होती है। लोरी गुनगुनाते समय बच्चे के शरीर पर हल्की-हल्की थपकी और एक लयबद्ध तरीके से बच्चे को झुलाना भी उसे सुलाने में बहुत मददगार साबित होते हैं। ये सभी चीजें बच्चे की "जाग" के खिलाफ एक तरह से नींद की नाकेबंदी होती हैं। इसमें बच्चे को इस तरह से "घेरा" जाता है कि वह बेचारा दुनिया से हटकर नींद के आगोश में चला जाता है। लोरी की आवाज के बीच उसका ध्यान आस-पास की आवाजों से हटने लगता है। इसी तरह, बच्चे को बार-बार इधर-उधर झुलाते रहने से उसकी नजर किसी भी चीज पर नहीं टिक पाती। अगर वह इसके लिए कोशिश करता भी है तो कुछ ही देर में उसकी आंखें थककर बोझिल-सी होने लगती हैं। ऐसे में उसे न चाहकर भी थकान के कारण अपनी आंखें बंद करनी पड़ जाती हैं। बच्चे को सुलाने के लिए झुलाना एक तरह से दाएं-बाएं दोलन कर रही सम्मोहित करने वाली "गेंद" या "छल्ले" की तरह हो जाता है। जिसमें आंखों का यहां-वहां घूमना कुछ देर बाद सम्मोहन की नींद में पहुंचा देता है।

इसके अलावा, बाकी बचा हुआ काम बच्चे को हल्के हाथों से थप-थपाने से पूरा हो जाता है। इस तरह से थप-थपाने के पीछे असली मकसद यही होता है कि बच्चे का सारा ध्यान लगातार लोरी व सोने पर ही केंद्रीत रहे और उसके हाथ-पांव हिलाने पर भी न जाए। कुल मिलाकर, लोरी और उसकी इन लयबद्ध सहायक क्रियाओं का मुख्य उद्देश्य बच्चे का सारा ध्यान समेटकर नींद की ओर लगाना होता है। ऐसा करने पर बच्चे का नन्हा-सा मस्तिष्क दुनियादारी से कटकर खुद को "बोर" महसूस करने लगता है और थक-हारकर सोने में ही अपनी भलाई समझता है। यही वजह है कि लोरी और इन क्रियाओं के कारण कुछ ही देर बाद बच्चे को उबासी आने लगती है और वह आखिर में नींद का दामन थाम लेता है। यह भी मानव मस्तिष्क की एक खूबी होती है कि जब उसे किसी चीज की आदत पड़ जाती है तो आगे चलकर इसके संकेत मात्र से ही शरीर भी अपनी प्रतिक्रिया दिखाने लगता है। इसी तरह, जब बच्चा बड़ा होने लगता है तो उस पर लोरी या नींद की इस "घेराबंदी" का असर कम होने लगता है, क्योंकि बढ़ता हुआ बच्चा अपने आस-पास के वातावरण के प्रति और ज्यादा सजग होने लगता है(राजीव शर्मा,नई दुनिया,दिल्ली,7.4.11)।

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गुरुवार, 16 सितंबर 2010

मच्छरदानीःबिल लगे न टेंशन,ऑल आउट रह जाएं

सदियों से "ड्रैकुला" की तरह इंसानों का खून पी-पीकर दिन का चैन और रातों की नींद हराम करने वाले मच्छर आज भी रक्त-पिपासु बनकर खून चूस रहे हैं। हालांकि इनसे निपटने के लिए बाजार में कई तरह के साधन उपलब्ध हैं लेकिन इनमें से ज्यादातर का लंबे समय तक प्रयोग करना खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होता है क्योंकि ऐसी स्थिति में तीव्र रसायन वाले ये साधन इनसानी सेहत के लिए तो खतरनाक साबित होने लगते हैं, पर मच्छर धीरे-धीरे अपनी प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ाकर खुद को इनके अनुसार ढालकर इनके अभ्यस्त होने लगते हैं। इस रूप में "मैट", "क्रीम", "लिक्विडेटर", "स्प्रे" या "क्वायल" जैसे तमाम साधन एक ही थैली के चट्टे-बट्टे साबित होते हैं। इन सब में कहीं न कहीं, कोई न कोई कमी रहती है। ऐसे में याद आता है नानी-दादी का बरसों पुराना सुरक्षा कवच यानी मच्छरदानी। अब तो वैज्ञानिक भी इस बात को मानने लगे हैं कि मच्छरों से बचने-बचाने का एकमात्र सबसे कारगर उपाय मच्छरदानी ही है। और मच्छर ही क्यों मक्खी, टिड्डे, भुनंगे जैसे तमाम कीट-पतंगों और कीड़े-मकौडों से बचाने में भी मच्छरदानी बेहतरीन "अंगरक्षक" साबित होती है। मच्छरदानी का प्रयोग करते समय न तो बिजली की जरूरत होती है और न ही किसी रासायनिक पदार्थ के दुष्प्रभाव का डर रहता है। इसके अलावा इसके इस्तेमाल से मक्खी, टिड्डे, छिपकली, बरसाती मौसम में निकलने वाले कीटों आदि से भी बचाव होता है। कहने-सुनने और देखने में भले ही मच्छर छोटे दिखते हों, पर बीमारी और मौत फैलाने में खून चूसने वाले ये नन्हे राक्षस बड़े से बड़े खूनी दरींदों को भी मात दे देते हैं। दुनियाभर में हर साल लाखों-करोड़ों लोग मच्छरों के काटने से होने वाली मलेरिया, डेंगू, पीत ज्वर जैसी बीमारियों का शिकार बनते हैं। हर साल लाखों मौतों के जिम्मेदार ये मच्छर ही होते हैं। जहां तक दूसरे कीट-पतंगों की बात है, उनसे परेशानी तो जरूर होती है पर मौत के मामलों में वे इन रक्त-खोरों से बहुत पीछे रहते हैं। इसलिए मच्छरों से बचाव ज्यादा महत्वपूर्ण होता है और मच्छरदानी यह काम बखूबी पूरा करती है। मच्छरदानियों पर भरोसे के कारण ही यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी इन्हें अपने विशेष कार्यक्रमों में शामिल करके रोगग्रस्त इलाकों के लोगों में बांटती हैं। विश्व में मच्छरदानियों की सबसे बड़ी वितरक ये संस्थाएं ही हैं। इससे असरदार नहीं है कुछ मच्छरों से बचने के लिए जापान में भी एक विशेष प्रकार की मच्छरदानी के निर्माण पर प्रयोग किया गया है। इसकी खासियत यह है कि इसके पास आते ही मच्छर मर जाते हैं। साधारणतः प्रयोग की जाने वाली मच्छरदानी हाई-डेनसिटी पॉलिएथीलीन (एचडीपीई) से बनाई जाती है लेकिन इस विशेष मच्छरदानी को बनाते समय एचडीपीई में मच्छर-रोधी पदार्थों को भी मिला दिया जाता है। इस तरह मच्छर इस मच्छरदानी के पास भी नहीं फटक पाते और अगर इसके पास आ भी जाएं तो मच्छर-रोधी पदार्थों के कारण मारे जाते हैं। हालांकि यह मच्छरों के लिए खतरनाक है लेकिन मनुष्यों के स्वास्थ्य पर इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा। सामान्य परिस्थितियों में इस प्रकार की मच्छरदानी बिना दोबारा मच्छर-रोधी पदार्थों के इस्तेमाल के करीब पांच सालों तक लगातार अपना काम कर सकती है। "कीटरोधी-उपचार" से तैयार ऐसी विशेष मच्छरदानियों पर अन्य देशों में भी काम किया गया है और ये बहुत उपयोगी सिद्ध हो रही हैं। "विश्व स्वास्थ्य संगठन" (डब्लूएचओ) के अनुसार कीटरोधी-उपचारित मच्छरदानियों के प्रयोग से मलेरिया जैसी बीमारियों की आशंका ५० प्रतिशत तक और बच्चों की मृत्युदर २० प्रतिशत तक कम की जा सकती हैं। अफ्रीका-एशिया के गरीब देशों के लिए तो ये बहुत कारगर साबित होती हैं। इस क्षेत्र में शोध कर रहे येल यूनिवर्सिटी के महामारी विशेषज्ञ माइकल रेड्डी के मुताबिक अफ्रीका में जहां बीमारी आमतौर पर घरों से फैलती है, मच्छरदानी का प्रयोग सबसे कारगर उपाय रहता है। माना जाता है कि मच्छरों से होने वाली बीमारियों की संभावना सबसे ज्यादा रात के समय ही होती है। ऐसे में मच्छरदानी का प्रयोग बहुत सही साबित होता है। इनका प्रयोग मच्छरों से होने वाली बीमारियों की आशंका को बहुत कम कर देता है। चाहे आप मच्छरों से भरी जोखिम वाली जगहों पर रहते हों या फिर ऐसी जगहों पर सफर कर रहे हों, मच्छरदानी का प्रयोग सबसे सुरक्षित होता है। आज बाजार में कई तरह की मच्छरदानी उपलब्ध हैं। इनमें छोटे बच्चों से लेकर डबल-बेड तक के लिए मच्छरदानी मौजूद हैं। आकार-प्रकार में भी बहुत ज्यादा विकल्प हैं। पिरामिड जैसी, कोण के आकार वाली, आयताकार, ट्रैकिंग के तंबू जैसी, फोल्डिंग और पोर्टेबल आदि हर तरह की मच्छरदानी उपलब्ध हैं। इनके अलावा ऐसी मच्छरदानियां भी आती हैं जिन्हें छत पर किसी एक ही हुक में लगा दिया जाता है। इसलिए अपनी जरूरत और सुविधा के हिसाब से आसानी से मच्छरदानी खरीदी जा सकती है लेकिन इस संबंध में कुछ खास बातों का हमेशा ध्यान रखना चाहिए। पहली तो यही कि उसका और उसके छेदों का आकार सही हो। छेद इतने बड़े हों कि पर्याप्त हवा का आवागमन तो होता रहे पर छोटे-छोटे मच्छरों से भी सुरक्षा बनी रहे, क्योंकि बड़ी जाली होने पर उसमें मच्छरों के घुसने की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है। मच्छरदानी इतनी बड़ी होनी चाहिए कि वह सोने वाले व्यक्ति के शरीर से पर्याप्त दूरी पर रहे, क्योंकि यह बिस्तर को पूरी तरह से ढक लेती हैं और सोने वाले व्यक्ति को बिस्तर पर लेटने-बैठने के लिए भी पूरी-पूरी जगह मिल जाती है। मच्छरदानी प्रयोग में लाने का एक अच्छा तरीका यह है कि उसे चारों तरफ से बिस्तर के गद्दे या चादर के नीचे दबाकर रखा जाए ताकि सोते समय कहीं से भी उसके खुलने की संभावना न रहे। आमतौर पर पॉलिस्टर या पॉलियामाइड लगाने-रखने की दृष्टि से हल्की, टिकाऊ और सुविधाजनक होती हैं। इसके अलावा ये विभिन्न आकार-प्रकार में भी मिलती हैं। इनकी एक खासियत यह भी रहती है कि ये आसानी से भीगती नहीं हैं। इसलिए मच्छरदानी खरीदते समय इन पर भी विचार किया जा सकता है। कॉटन से बनी मच्छरदानी भी इस्तेमाल की जा सकती है, पर ये अपेक्षाकृत बहुत भारी होती हैं और भीगने पर तो और ज्यादा भारी हो जाती हैं। इसके अलावा इन्हें उठाने, रखने और लगाने में भी ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है लेकिन फिर भी मच्छरों से तो पर्याप्त सुरक्षा हो ही जाती है। कोई और विकल्प न होने पर ऐसी मच्छरदानी से भी काम चलाया जा सकता है। अगर आपके पास कीटरोधी-उपचारित मच्छरदानी नहीं हैं, तो भी आप अपनी साधारण मच्छरदानी की सुरक्षा क्षमता बढ़ाने के लिए उसे कीटरोधी बना सकते हैं। इसका एक बहुत अच्छा और आसान तरीका यह है कि मच्छरदानी को नीम के पत्तों के रस में धोकर सुखा लिया जाए। इसके अलावा मच्छरदानी की साफ-सफाई पर भी खासतौर पर ध्यान रखना चाहिए। हो सके तो डेटॉल जैसी खास दवाओं से भी उसे धोया जा सकता है। कॉटन की मच्छरदानियों पर तो यह तरीका बहुत कारगर रहता है क्योंकि उनमें सोखने की क्षमता अपेक्षाकृत ज्यादा होती है(राजीव शर्मा,नई दुनिया,दिल्ली,16.9.2010)।

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सोमवार, 30 अगस्त 2010

क्या आप भी रात में काम करते हैं?

इंसान का मशीनीकरण न हो इसीलिए आज से कई साल पहले कामगारों ने श्रम के समय की सीमा बांधने के लिए एक बड़ा आंदोलन किया था, जिसके फलस्वरूप आठ घंटे की समय-सीमा तय हुई और श्रमिकों की इस जीत को हर वर्ष मई दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज जरूरत है एक दूसरे आंदोलन की जिसके द्वारा नाइट-शिफ्ट या रात्रि के समय श्रम द्वारा आय उपार्जन की प्रथा पर पूर्णरूपेण अंकुश लगाना होगा, क्योंकि वैज्ञानिक शोध दर्शाते हैं कि रात में लगातार काम करने से व्यक्ति के तन, मन व मस्तिष्क पर घातक असर पड़ता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो प्रकृति ने मानव शरीर की रचना ही इस प्रकार की है कि हम और आप दिन भर काम करें और रात भर आराम करें ताकि रात भर अपनी खोयी ऊर्जा पुन: अर्जित कर अगले दिन तरोताजा होकर फिर से दैनिक कामों में जुट सकें। परंतु मिलों या फैक्टि्रयों में जबसे कार्य करने की रात्रि की शिफ्ट प्रणाली आरंभ हुई है तभी से यह देखा गया है कि कामगार हमेशा थका हुआ, चिड़चिड़ा और निढाल रहता है। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन दर्शाते हैं कि रात की शिफ्ट में काम करते रहने से व्यक्ति की चिड़चिड़ाहट, थकान व मानसिक परेशानियों के साथ ही उसकी न केवल पाचन शक्ति प्रभावित होती है,अपितु वह सुरक्षा की दृष्टि से भी लापरवाह हो जाता है और उसकी कार्यक्षमता भी कम हो जाती है। हमारे शरीर की सभी प्रक्रियाएं हमारी जैवीय घड़ी की सुईयों के साथ चलती हैं। यह जैवीय घड़ी धरती के अपनी धुरी पर घूमने वाले चक्र के साथ-साथ चलती है और हमारा शरीर भी उसी के अनुरूप सोता-जागता है। प्राकृतिक समय-चक्र के अनुसार चलने वाली हमारी जैवीय घड़ी ही हमारे शरीर का तापमान बढ़ाने-घटाने, हार्मोन उत्पन्न करने और दिन या रात के हिसाब से शारीरिक गतिविधियों को नियंत्रित करने का काम करती है। एक बार हमारे शरीर की जैवीय-घड़ी यदि रात्रि-शिफ्ट जैसे अप्राकृतिक कार्यो से बिगड़ गई तो शरीर की गाड़ी कभी भी पटरी से नीचे उतर सकती है। इसका सबसे बुरा असर पड़ता है हमारी नींद पर, क्योंकि रात में जब आपके चारों तरफ गतिविधियों का शोर मच रहा हो तो न तो आप देर तक सो पाते हैं, न ही गहरी नींद ले पाते हैं। इसीलिए रात्रि-शिफ्ट का कामगार कभी भी खुद को तरोताजा नहीं महसूस करता और हमेशा थका-थका रहता है। इससे वह अपने काम के दौरान हैरान-परेशान व चिड़चिड़ा रहता है। रात्रि के समय मानसिक रूप से चुस्त न रह पाने का असर उसकी कार्य-क्षमता पर भी दिखाई पड़ता है। त्रासदी यह है कि इस प्रकार कार्य करने से होने वाली थकान के कारण दुर्घटना से बचने की शारीरिक व मानसिक क्षमता भी क्षीण होती चली जाती है। इसी कारण रात में दुर्घटना होने की संभावना बढ़ जाती है। रात में होने वाली दुर्घटनाओं के नतीजे भी दिन की दुर्घटना की अपेक्षा कहीं अधिक गंभीर व घातक होते हैं। अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षणों से ज्ञात होता है कि रात्रि में कार्य करने वाले श्रमिक दिन में काम करने वालों की तुलना में 12.5 प्रतिशत अधिक पाचनतंत्र या पेट की बीमारियों के शिकार होते हैं। पेट के फोड़ों यानी अल्सर, कब्ज आदि के साथ ही रात्रि-शिफ्ट स्नायु-तंत्र को भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है। देर रात में कार्य करने वाले श्रमिक का पाचनतंत्र इसीलिए गड़बड़ा जाता है, क्योंकि वह उस समय भोजन ग्रहण करता है जबकि उसका पचनतंत्र लगभग सो रहा होता है। यह शरीर की जैवीय घड़ी की सरकाडियन रिदम यानी जैवीय लय द्वारा निर्देशित होता है। जहां इस जैवीय लय का सामंजस्य बिगड़ा, वहीं पाचनतंत्र भी बिगड़ जाता है। हमारे शरीर की जैवीय लयों या तरंगों के माध्यम से ही हमारा मस्तिष्क हमें न केवल खाने, अपितु सोने व अन्य शारीरिक गतिविधियों के संचालन का आदेश देता है। उदाहरण के लिए,इन्हीं शारीरिक तरंगों के कारण हमारे पेट की नसें हर 90 मिनट में सिकुड़ने लगती हैं। शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि हमारी आंतरिक शारीरिक तरंगें मस्तिष्क के एक विशेष भाग से निर्देशित होती हैं। इन्हीं तरंगों के कारण शरीर का तापमान सुबह के 4 से 6 बजे के बीच सबसे कम होता है। यह हमारी मानसिक चुस्ती तथा कार्यक्षमता को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। इस समय के दौरान हमारी शारीरिक-मानसिक क्षमता सबसे कम होती है। रात्रि-शिफ्ट जैसी अप्राकृतिक व असामान्य प्रक्रिया के लगातार जारी रहने से हमारी शारीरिक घड़ी का लय-ताल बिगड़ जाता है और उसके द्वारा दिये गये निर्देश अस्त-व्यस्त हो जाते हैं, क्योंकि मस्तिष्क के उस हिस्से का सामंजस्य डगमगा जाता है, जो शारीरिक तरंगों का प्रबंधन करता है। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है जेट विमानों द्वारा देशों के सफर के बाद की थकान, क्योंकि जिस देश से आप चलते हैं वहां दिन था और जहां आप पहुंचे हैं वहां भी दिन है। इस कारण आपने रात देखी ही नहीं और इसी नींद को पूरा करने में आपको दो-तीन दिन लग जाते हैं, क्योंकि दिन और रात का पूरा चक्र ही बदल जाता है। लाख बातों की एक बात यह है कि दिन की जगह रात भर काम करने का असर काम करने वाले के तन, मन और पारिवारिक जीवन पर भी पड़ता है, क्योंकि वह रात के समय परिवार के साथ रहता ही नहीं, जिस कारण कामगार रात में जगे रहने के लिए विभिन्न दवाइयों का सेवन करता है और कुछ समय बाद ये दवाइयां भी असर करना बंद कर देती हैं और व्यक्ति समय से पहले ही बूढ़ा हो जाता है। अंततोगत्वा इसका समाधान यही है कि हम सबको एकजुट होकर नाइट शिफ्ट की इस कुप्रथा को रोकना होगा, जो न केवल आदमी को मशीन बनाने पर तुली है, बल्कि पूर्णरूपेण अमानवीय व असंवेदनशील है(राजीव गुप्ता,दैनिक जागरण,30.8.2010)।

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शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

नींद

रात को सोते समय दिमाग के विभिन्न हिस्सों की भूमिका भी अलग-अलग होती है। वहीं व्यक्ति गहरी नींद में पहुंचने से पहले कई अवस्थाओं से होकर गुजरता है। तभी वह हल्की नींद से गहरी नींद में पहुंचता है। इस तरह से वह पांच स्टेज से होकर गुजरता है, जिसमें लगभग 90 मिनट का समय लगता है।
इलेक्ट्रोइंसिफेलोग्राफ के जरिए डॉक्टर नींद और उसके प्रकारों के बारे में अध्ययन कर सकते हैं। इस आविष्कार के पहले ऐसा संभव नहीं था। नींद के अध्ययन के लिए वर्ष 1950 में शोधार्थी यूजीन असेरिंस्के ने ऐसे ही उपकरण का इस्तेमाल किया था। नींद के मुख्य तौर पर दो प्रकार होते हैं। रैपिड आई मूवमेंट (आरईएम), जिसे एक्टिव स्लीप या पैराडॉक्सिकल स्लीप कहा जाता है। इसमें पीड़ित को जल्दी नींद आ जाती है। नॉन रैपिड आई मूवमेंट (एनआरईएम), जिसे शांतिपूर्वक नींद आना कहते हैं। इस दौरान व्यक्ति को सपने नहीं आते हैं। ऐसे होती है शुरुआत नींद की शुरुआती अवस्था में व्यक्ति थोड़ा अलर्ट यानी होश में होता है। इस दौरान दिमाग कुछ तरंगे पैदा करता है, जिसे बीटा वेव्स के नाम से जाना जाता है। ये वेव्स छोटी, लेकिन तेज गति से संचालित होती हैं। जैसे-जैसे दिमाग रिलैक्सिंग मोड यानी आराम की स्थिति में आता है तो अल्फा वेव्स पैदा हो जाती हैं। ऐसे समय जब नींद में होने के बाद भी आप शांत अवस्था में नहीं होते हैं, तो इस स्थिति को हिप्नेगॉगिक हैल्यूसिनेशंस कहा जाता है। ऐसे समय में व्यक्ति को ऐसा महसूस होता है, जैसे मानो वह गिर रहा हो या कोई उसका नाम पुकार रहा हो। स्टेज 1 सोने के चक्र की शुरुआती अवस्था में नींद हल्की होती है। इसे एक ऐसा ट्रांजिक्शन पीरियड (संक्रमण अवधि) भी कहा जाता है, जो सोने व जागने के बीच की स्थिति से संबंधित होता है। इस अवस्था में दिमाग थीटा वेव्स को तेज गति से संचालित करता है। नींद की ऐसी अवस्था में पहुंचने में व्यक्ति को 5-10 मिनट मुश्किल से लगते हैं। ऐसी अवस्था में यदि किसी को जगाया जाए तो वह कहता है कि वह सोया नहीं था। स्टेज 2 यह नींद की दूसरी अवस्था होती है। इसमें शरीर का तापमान कम होने लगता है। साथ ही हार्ट रेट धीमी हो जाती है। इस तक पहुंचने में करीब 20 मिनट का समय लगता है। स्टेज 3 इस स्टेज पर दिमाग में संचालित होने वाली धीमी तरंगें कच्ची नींद से गहरी नींद में पहुंचाने में मदद करती हैं। इन तरंगों को डेल्टा वेव्स कहा जाता है। स्टेज 4 इस अवस्था में व्यक्ति गहरी नींद में पहुंच जाता है, जो लगभग 30 मिनट तक रहती है। विशेषज्ञों के अनुसार जिन लोगों को नींद में चलने की शिकायत होती है, वह अक्सर इसी स्टेज में होती है। स्टेज 5 सपने अक्सर इसी स्टेज में आते हैं, जिसे मेडिकल टर्म में रैपिड आई मूवमेंट (आरईएम) स्लीप कहा जाता है। इस अवस्था में सांस लेने की गति और दिमाग की गतिशीलता बढ़ जाती है। इस स्टेज को पैराडॉक्सिकल स्लीप के समान ही माना जाता है, क्योंकि जब दिमाग और शरीर की अन्य कार्यप्रणाली अधिक सक्रिय होती है, तो शरीर की मांसपेशियां रिलैक्सिंग मोड पर होती हैं। वहीं, जब व्यक्ति सपना देखता है तो दिमाग की गतिशीलता बढ़ जाती है और वॉलेंटरी मसल्स स्थिर हो जाते हैं। जब उसकी अंतिम अवस्था यानी आरईएम स्लीप का समय पूरा होता है, तो वह धीरे-धीरे दूसरी अवस्था में वापस लौटने लगता है। यह पूरी प्रक्रिया मुश्किल से 4-5 मिनट की होती है। सभी स्टेज की बात की जाए, तो अंतिम अवस्था में पहुंचते-पहुंचते औसतन 90 मिनट का समय लग जाता है। एक रात में यह प्रक्रिया चार-पांच होती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि गहरी नींद न आने से शारीरिक थकान खत्म नहीं होती। सोने के बाद भी यदि फ्रेशनेस न आए तो समझ लेना चाहिए कि गहरी नींद की अवधि पूरी नहीं हुई है। अच्छी नींद के लिए कमरे का तापमान कम रखा जाए तो बेहतर होता है क्योंकि इससे गहरी नींद जल्दी आती है। ऐसे काम करता है शरीर की मास्टर बायोलॉजिकल क्लॉक से ही व्यक्ति के सोने-जागने का समय निर्धारित होता है। यही क्लॉक लाइट के संपर्क में आने से प्रतिक्रिया देती है, जिसे सरकेडियन रिदम कहा जाता है। नींद की एनाटॉमी हाइपोथैलेमस : इसमें न्यूरॉन्स का समूह होता है, जो सरकेडियन रिदम को संचालित करने, सोने और जागने के लिए जिम्मेदार केमिकल्स को सक्रिय करने में मुख्य भूमिका निभाता है। थैलेमस : नींद के दौरान सभी ग्रंथियों को ब्लॉक करने और दिमाग को बीते दिनों की गतिविधियां याद करने की सूचना देता है। पीयूष ग्रंथि : यह मेलाटोनिन नामक हार्मोन को सक्रिय करता है। यह हार्मोन नींद के लिए जिम्मेदार होता है। हिप्पोकैम्पस : आरईएम स्लीप के दौरान व्यक्ति के दिमाग में स्टोर मेमोरी या बीते हुए पल दोबारा चलने लगते हैं। पोन्स : यह भाग रैपिड आई मूवमेंट (आरईएम) स्लीप के दौरान सपने देखने की प्रक्रिया के साथ ही स्पाइनल कॉर्ड को मिलने वाले संकेत ब्लॉक कर देता है। इससे सपने देखने के दौरान शरीर में कोई भी प्रतिक्रिया नहीं होती है। सेरेब्रल कॉर्टेक्स : आरईएम स्लीप के दौरान पोन्स द्वारा कुछ संकेत आते हैं। इससे कई बार व्यक्ति दिमाग में स्टोर सूचनाओं से हटकर सपने देखने लगता है। रेटीना : इस हिस्से में कुछ कोशिकाएं होती हैं, जो विजन यानी दृष्टि से नहीं, बल्कि लाइट की संवेदना को महसूस करने से संबंधित होती हैं। इससे नींद आने और जागने का सीधा संबंध होता है(दैनिक भास्कर,6.8.2010)।

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शनिवार, 10 जुलाई 2010

अगर आती है झपकी तो हो जाएं होशियार

क्या आप अनिंद्रा के शिकार है? क्या आपको मोबाइल पर बात करते, खाना खाते हुए या फिर कंप्यूटर पर काम करते हुए नींद तो नहीं आती है? कहीं आप बैठे-बैठे कुछ मिनटों के लिए अचानक सो तो नहीं जाते। यदि हां तो सावधान हो जाइए। डाक्टरों के अनुसार काम करते हुए यदि आप पांच से दस मिनट के लिए अचानक सो जाते है तो आप नारकोलेप्सी बीमारी से पीडि़त हैं। यह एक तरह का पेरासौम्य स्लीप डिसआर्डर है। मंडावली में शुक्रवार को ऐसे ही एक मामले में नारकोलेप्सी बीमारी से पीडि़त युवक की मौत का मामला प्रकाश में आया है। वह इस बीमारी के चलते फर्श पर गिर पड़ा। सिर में चोट लगने से उसकी मौत हो गई। गुरुतेग बहादुर अस्पताल की मनोचिकित्सक डा. श्रुति के अनुसार नारकोलेप्सी अनिंद्रा का ही एक रूप है। इससे पीडि़त व्यक्ति कभी भी कुछ भी काम करते हुए अचानक पांच से दस मिनट के लिए सो जाता है। इसे एक तरह का दौरा भी कह सकते हैं। इसका इलाज संभव है। मरीज के हिसाब से इसका इलाज होने में छह महीने से साल भर का समय लग सकता है। इसकी जांच पोलिसोमनो ग्राफी के जरिए होती है। डाक्टर मरीज से पूछताछ व उसके जांच कर यह पता लगाता है कि उसे अधिकतर किस समय व क्या काम करते हुए नींद आती है। मरीज की दिनचर्या के बारे में पता लगाकर उसका इलाज किया जाता है।

कारण

* मिर्गी से ग्रस्त मरीजों में यह बीमारी जल्दी होती है

* दुर्घटना में सिर में गंभीर चोट लगना

*किसी तरह की दिमागी बीमारी होना माइग्रेन, डिप्रेशन आदि

*कोई बड़ा सदमा लगना सावधानी

* मरीज को वाहन नहीं चलाना चाहिए

* अकेले यात्रा नहीं करनी चाहिए द्य अकेले या बिना सहारे के सीढि़यां उतरना या चढ़ना नहीं चाहिए

*उसे कभी भी अकेला न छोड़ें, उसे अकेले सोने से बचना चाहिए(अमित कसाना,Dainik Jagran,10.7.2010)


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सोमवार, 15 मार्च 2010

अनिद्रा,डायबिटीज और हृदय रोग

कम ही लोगों को पता है कि इस वर्ष मार्च और अप्रैल का महीना निद्रा जागरूकता माह के रूप मे मनाया जा रहा है। इंडियन स्लीप डिसॉर्डर एसोसिएशन ने कल विश्व निद्रा दिवस का आयोजन भी किया जो दुनिया मे इस प्रकार का पहला आयोजन था। आज जनसत्ता ने इसी संस्थान का एक सर्वेक्षण छापा है जिससे पता चलता है कि अनिद्रा केवल मस्तिष्क रोग नहीं,बल्कि मधुमेह और हृदय रोग का कारण भी बन सकती है। आप भी पढिएः

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बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

नींद और सेहत


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