बुधवार, 2 नवंबर 2011

बिहारःउपेक्षित है आयुर्वेद

आयुर्वेद का जिक्र आते ही हाथों में अमृत कलश लिए धन्वंतरि की तस्वीर जेहन में उभर आती है। आयुर्वेद में सभी असाध्य रोगों का इलाज उपलब्ध है लेकिन चिकित्सा की यह पद्धति बिहार में उपेक्षित ही रही है। गांवों में वैद्य परंपरा भी अब समाप्ति की ओर है। पहले लगभग हर गांव में ज़ड़ी-बूटी से इलाज करने वाले वैद्य होते थे। असाध्य रोग भी गांवों में ही ठीक हो जाते थे। लेकिन प्रोत्साहन के अभाव में गांवों से वैद्य परंपरा खत्म हो गई है। गांवों में अब हर जगह बिना डिग्री वाले एलोपैथ के झोलाछाप डॉक्टर दिखते हैं। आयुर्वेद शिक्षण का भी प्रदेश में बुरा हाल है। वैसे एलोपैथ में कई बीमारियों का इलाज नहीं होने के कारण लोग फिर से आयुर्वेद और होम्योपैथी की ओर मुखातिब हो रहे हैं। आयुर्वेदिक इलाज फिर चमकने लगा है लेकिन इसके लिए लोग बाबा रामदेव की दवाओं पर ही निर्भर हैं। 

बिहार में पहले ११ आयुर्वेदिक कालेज थे लेकिन एक-एक कर बंद होते गए। इन कालेजों को छात्र ही नहीं मिल पाते थे। मेडिकल काउंसिल के मानदंड पर खरे नहीं उतर पाने के कारण इन कालेजों की मान्यता रद्द हो गई। वर्तमान में पांच आयुर्वेदिक कॉलेज चल रहे हैं। पटना, बक्सर, भागलपुर, दरभंगा और बेगूसराय के आयुर्वेद कालेजों में बीएएमएस की प़ढ़ाई होती है। भारतीय चिकित्सा परिषद ने कालेजों को सशर्त मान्यता दी है। शर्तों को पूरा नहीं किए जाने पर मान्यता रद्द हो सकती है। अन्य छह कालेजों में दस वर्षों से छात्रों का नामांकन बंद है। पटना में आयुर्वेद के स्नातकोत्तर की प़ढ़ाई के लिए २०१० में मान्यता मिली थी लेकिन शर्तों को पूरा नहीं किए जाने पर मान्यता रद्द कर दी गई। 

आयुर्वेदिक अस्पतालों में संसाधनों की भारी कमी है। राज्य सरकार ने सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर भी आयुष डक्टरों की भर्ती का फैसला लिया था लेकिन यह लागू नहीं हो पाया। आयु्‌र्वेद, होम्योपैथ और यूनानी डाक्टरों के अधिकांश स्वीकृत पद खाली प़ड़े हैं। सरकारी अस्पतालों में आयुर्वेद और होम्योपैथ की दवाएं नहीं रहती हैं। आयुष डाक्टरों के आंदोलनों से भी कोई फर्क नहीं प़ड़ा है। आम लोग आयुर्वेद और होम्योपैथ की शरण में तभी जाते हैं जब एलोपैथ से उन्हें निराशा होती है। 

भाग-दौ़ड़ की वर्तमान जीवनशैली में अधिकांश लोग डिप्रेशन, डाइबिटीज, स्पॉन्डेलाइटिस जैसी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। एलोपैथ में इन बीमारियों से समूल नाश करने वाली दवाओं का अभाव है। लिहाजा लोगबाग आयुर्वेद की शरण लेने लगे हैं। लेकिन ऐसे मरीजों को कुशल डाक्टरों के परामर्श के लिए काफी भटकना प़ड़ता है। आयुर्वेद कालेजों की स्थिति दयनीय है और कुशल डॉक्टर तैयार नहीं हो पा रहे हैं। बक्सर, भागलपुर और दरभंगा के आयुर्वेद कालेजों में भी नामांकन बंद हैं। २००८-०९ में बेगूसराय आयुर्वेद कालेज को मान्यता मिली थी जो बाद में रद्द हो गई। बिहार राज्य आयुर्वेदिक एवं यूनानी परिषद कालेजों का निबंधन करता है और मान्यता अखिल भारतीय चिकित्सा परिषद देती है। यूनानी निदेशालय से ही आयुर्वेद कालेज भी संचालित होते हैं। गया में दो निजी आयुर्वेद कालेज हैं जिनमें से एक की मान्यता रद्द हो गई है। मुजफ्फरपुर और मोतिहारी में निजी आयुर्वेद कालेज चल रहे हैं। आयुर्वेदिक कालेजों में प्रोफेसर, रीडर और लेक्चरार के १८० पद हैं जिनमें से १३५ पद पर ही लोग काम कर रहे हैं। ४५ पद खाली हैं। छपरा और सीवान में भी एक-एक निजी आयुर्वेद कालेज हैं। एक सरकारी आयुर्वेद कालेज को चलाने में सलाना लगभग तीन करो़ड़ रुपए का खर्च आता है(राघवेन्द्र नारायण सिंह,नई दुनिया,दिल्ली,14.10.11)। ---------------------------------------------------------------------------------------------------- 


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1 टिप्पणी:

  1. प्राचीन समय में तो हकीम वैद नाड़ी से नहीं स्त्रीयों के कलाई से बंधे धागे से रोग की पहचान करते थे
    हमारे मामा हकीम हाकिम राय देल्ही करोलबाग के नाड़ी देख रोग को बताते थे
    अब फैशन का समय है दादी हूँ मामा जी और माँ जननी के घरेलू नुस्कों पर चलती हूँ

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