शनिवार, 16 अप्रैल 2011

16 एंटीबायोटिक दवाओं पर लगेगी रोक

राजधानी दिल्ली के आसपास स्थित अस्पतालों और सप्लाई वाले पानी में एनडीएम-1 बैक्टीरिया (दिल्ली सुपरबग) पाए जाने की खबर के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय हरकत में आ गया है।

‘सुपरबग’ जैसे और बैक्टीरिया पैदा न हों, इसके लिए मंत्रालय देश में पहली बार थर्ड जेनरेशन की सभी एंटी-बायोटिक दवाओं की सार्वजनिक बिक्री पर अंकुश लगाने जा रही है।

इस तरह की 16 एंटी-बायोटिक दवाओं की आम बिक्री पर रोक की अधिसूचना सोमवार को जारी होने वाली है। यह जानकारी ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) के प्रमुख सुरिंदर सिंह ने एक विशेष बातचीत में दी।

उन्होंने बताया कि एक बार अधिसूचना जारी होने के बाद इस श्रेणी की दवाएं सिर्फ ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) अपोलो, लीलावती और क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज (सीएमसी) जैसे मल्टी स्पेशिएलिटी अस्पतालों में ही वितरित की जा सकेगी।’

सुरिंदर सिंह ने आगे कहा कि ये सभी एंटी-बायोटिक दवाओं के पैकिंग में भी खास बदलाव किया जा रहा है। इस श्रेणी की सभी लाल रंग की विशेष पैकिंग में ही वितरित की जाएंगी।
‘भास्कर’ के पास मौजूद अधिसूचना के अंतिम प्रारूप की प्रति के अनुसार, थर्ड जेनरेशन की इन 16 एंटी-बायोटिक दवाओं में मेरोपेनन, इमीपेनम, एरटापेनम, डोरीपेनम, फेरोपेनम, पोलिमिक्सिन बी, कोलिस्टिन, वेंकोमाइसिन, टैकोप्लेनिन, लिनजोलिड, टाइसाइक्लिन, एजट्रिओनम, केफेपाइम, सेफाइरोम, मॉक्सीफ्लोक्सिन और गैमीफ्लैक्सोसिन हैं।

एम्स में मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ. रणदीप गुलेरिया का कहना है कि देश में सुपरबग जैसे बैक्टीरिया के पैदा होने का सबसे बड़ा कारण थर्ड और फोर्थ जेनरेशन की एंटी-बायोटिक दवाओं का धड़ल्ले से इस्तेमाल ही है।

किसी भी छोटे-मोटे संक्रमण के लिए भी एक नर्सिग होम से लेकर मामूली अस्पताल तक में सबसे ताकतवर एंटी-बायोटिक दवाएं दे दी जा रही हैं। डॉ. गुलेरिया का कहना है कि एक बार कोई बैक्टीरिया सबसे ताकतवर एंटी-बायोटिक दवाओं का आदी हो जाता है, तभी वह सुपरबग जैसे बैक्टीरिया का रूप लेता है।

यही वजह है कि इन एंटी-बायोटिक दवाओं के सार्वजनिक इस्तेमाल पर रोक का कदम एकदम सही है(प्रदीप सुरीन, दैनिक भास्कर,दिल्ली,16.4.11)।

3 टिप्‍पणियां:

  1. पता नहीं इनमें से कौन-कौन और कब कब हम खाते रहते हैं। बहुत अच्छी पोस्ट।

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  2. नियंत्रण तो ज़रूरी है ।
    लेकिन कहाँ तक करेंगे ।
    यहाँ तो क्वेक्स भी भरे पड़े हैं ।

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  3. कम्पनी की निति होती है मॉल बेचने की,डाक्टर तो टल्ले मारते है,मरीज को सब्र नहीं,वो २ दिन में ही ठीक होना चाहता है,आज कल के डाक्टर इन्हें मेडिकल रिप्रजेंटेटिव बता कर जाते है नयी है जी कारगर है जी,डाक्टर फिर टल्ले मारते है कोई रिजल्ट अच्छा मिल गया तो परमानेंट बना देते हैं शोध और स्टडी भी नहीं करते प्रयोग कर देते है बस
    यहाँ एक डाक्टर ने गंभीर मरीज़ बच्चे को डिप्थीरिया बता दिया और कहा उस का बचना मुश्किल है दूसरे डाक्टर ने टोंसिल का इलाज़ कर के उसे बचा लिया
    हा हा हा हा
    डाक्टर का बेटा डाक्टर बनेगा
    ५० लाख खर्च करके........
    काबिल हो या ना हो

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